Thursday, February 27, 2014

तनाव का हद से गुजर जाना...

रिश्तेदारों की हत्या और उसके बाद आत्महत्या जैसी दर्दनाक घटनाएं छत्तीसगढ़ में इन दिनों आम हो गई हैं। कोरबा के बाकीमोंगरा में पैसे के लेनदेन के मामले में एक बेटे ने अपनी मां की हत्या की और बाद में खुद फांसी पर लटक गया। राज्य में ऐसे बहुतेरे उदाहरण हैं जिसमें जरा-जरा सी बात पर निकट रिश्तेदारों की हत्या करने के बाद आरोपियों ने खुद को गोली मार ली या अन्य तरीकों से जान दे दी। रायपुर की बात करें तो हाल ही में अवैध संबंधों के चलते ताजनगर पंडरी के अल्ताफ ने पहले अपनी बीवी ंऔर दो बच्चों का कत्ल किया और बाद में खुद फांसी पर लटक गया। ताजा वाकया जगदलपुर का है जो और भी दर्दनाक और दिल दहला देने वाला है। नक्सली मोर्चे पर वीरता के पुरस्कार से नवाजे गए सीएसपी देवनारायण पटेल को 24 फरवरी 2014 को एक जज के साथ मारपीट करने के आरोप में निलंबित कर दिया गया था और उसी दिन देर रात उन्होंने सर्विस रिवाल्वर से अपनी पत्नी की हत्या की और फिर खुद को गोली मार ली। गोली चलाने में उनके दो बच्चों को भी चोटें आई जिनमें एक की हालत गंभीर है।

दिनोंदिन बढ़ रही ये घटनाएं तेजी से बढ़ रहे सामाजिक विघटन की ओर इशारा करती हैं। यह इस बात का भी संकेत है कि लोगों का धैर्य चूक रहा है और मानसिक तनाव को झेलने एवं उसे खारिज करने की क्षमता का क्षरण हो रहा है। तनाव की वजह से विवेकशून्यता का परिणाम उन नाते-रिश्तेदारों को भी भोगना पड़ रहा है जो निर्दोष और मासूम हैं। मानसिक तनाव, व्यवस्था से नाराजगी एवं घनघोर निराशा की ऐसी परिणति चिंता का विषय है। विचार करने की जरूरत है कि सीएसपी देवनारायण पटेल की आत्महत्या के पीछे मूलत: क्या कारण हो सकते हैं। जगदलपुर में जिला एवं सत्र न्यायालय में पदस्थ अपर सत्र न्यायाधीश ए.टोप्पो के साथ मारपीट एवं बदसलूकी की घटना क्या इतनी भयावह थी कि पश्चाताप में पुलिस अधिकारी को जान लेने एवं जान देने के अलावा कोई रास्ता नहीं सूझा या फिर निलंबन की वजह से यह व्यवस्था के प्रति आक्रोश का परिणाम था? यह कतई आश्चर्यजनक नहीं है कि उन्हें निलंबित करने में विभाग ने जरा भी देर नहीं की। कारण स्पष्ट था- न्याय की आत्मा पर हमला। अन्यथा आमतौर पर पुलिस विभागीय कार्रवाई में इतनी तत्परता नहीं बरतती जितनी इस मामले में बरती गई। बहरहाल इस संदर्भ में बिलासपुर में पदस्थ रहे एसपी राहुल शर्मा द्वारा की गई आत्महत्या की घटना का सहज स्मरण हो आता है जिन्होंने मौजूदा व्यवस्था में खुद को मिसफिट पाकर जान देना मुनासिब समझा। यह अलग बात है कि यह कभी स्थापित नहीं हो पाया कि वे भ्रष्ट व्यवस्था के शिकार हुए। बहरहाल सीएसपी पटेल हत्या और आत्महत्या प्रकरण तो और भी विचित्र है। एक हंसता-खेलता सुदर्शन परिवार क्षणिक आवेश में किस तरह बिखर जाता है, यह इसका अन्यतम उदाहरण है। यह कहा जाता है कि देवनारायण पटेल विवादास्पद पुलिस अधिकारी थे तथा पिटाई उनका शगल था। न्यायाधीश टोप्पो द्वारा पहचान बताने के बावजूद उनका तथा उनके मातहतों का हाथ नहीं रुका। इसका अर्थ है, वे बात-बात में आपा खो बैठते थे और छोटी-छोटी घटनाएं भी उन्हें उत्तेजित कर देती  थीं। हालांकि परिचितों का कहना है कि वे बहुत सुलझे हुए इंसान थे तथा बड़ी से बड़ी परेशानी में भी संयम नहीं खोते थे। फिर एकाएक उनका संयम कैसे जवाब दे गया? मानसिक तनाव क्या इस कदर हावी हो गया? दरअसल पुलिस विभाग में अधिकारियों एवं जवानों का ऐसे तनाव से गुजरना तो सामान्य बात है। हवालात में आरोपियों के साथ मारपीट, थर्ड डिग्री का इस्तेमाल और शारीरिक एवं मानसिक यंत्रणाएं तो पुलिस के कामकाज का प्रमुख हिस्सा हैं और वर्दी पर बदनुमा दाग भी। हवालात में मौत की घटनाएं ऐसे ही तनाव का परिणाम होती हैं। जाहिर है इसका चरम घनघोर मानसिक त्रासदी है जो परिणाम की परवाह नहीं करती। सीएसपी पटेल संभवत: ऐेसे ही दौर से गुजरे लिहाजा उन्होंने प्राणों के सौदे किए। जैसा कि आमतौर पर होता है अन्य घटनाओं की तरह इस घटना की भी जांच होगी पर किसी नतीजे पर न पहुंचा जा सकेगा और न ही कोई जवाबदेही तय होगी क्योंकि यह मान लिया लिया जाएगा कि विशुद्ध रूप से यह एकाकी निर्णय है जिसके लिए संबंधित व्यक्ति खुद जिम्मेदार है। लेकिन बावजूद ऐसी घटनाएं चिंता का सबब है लिहाजा उनसे छुटकारा पाने के उपायों पर समाज-विज्ञानियों एवं पुलिस महकमे को विचार करने की जरूरत है।

Friday, February 21, 2014

लोकसभा चुनाव : जोगी का सियासी दांव

अजीत जोगी फिर सुर्खियों में हैं। नवम्बर 2013 में राज्य विधानसभा चुनाव के पूर्व उन्होंने संगठन खेमे के वर्चस्व को चुनौती देकर खूब सुर्खियां बटोरी थी और अंतत: पार्टी हाईकमान पर भी दबाव बनाने में कामयाब हुए थे। दरअसल पूर्व मुख्यमंत्री राजनीति के इस खेल में बड़े माहिर हैं। जब प्रदेश के चुनाव नतीजे कांग्रेस के खिलाफ गए और सरकार बनने की उम्मीदें टूट गई तब जोगी ने पुन: पैंतरा बदला। उन्होंने घोषणा की कि वे एक वर्ष तक सक्रिय राजनीति से दूर रहेंगे, चुनाव नहीं लड़ेंगे। अलबत्ता दिल्ली के बुलावे पर पार्टी बैठकों में भाग लेते रहेंगे। उन्होंने पूरे वर्ष अपने निवास में भजन-कीर्तन आयोजित करने की भी बात कही और लगे हाथ एक आयोजन भी कर डाला। जाहिर है नाटकीयता से भरा उनका यह कदम भी बेइंतिहा चर्चा में आया। और अब वे फिर सुर्खियों में हैं जो लोकसभा चुनाव के संदर्भ में है। मई 2014 में लोकसभा चुनाव होने हैं और प्रदेश प्रत्याशियों की सूची में उनका नाम शामिल कर लिया गया है। राज्य विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष टी.एस.सिंहदेव से लेकर प्रदेश कांग्रेस के तमाम बड़े नेता चाहते हैं कि जोगी लोकसभा चुनाव लड़ें। इसलिए पार्टी ने बिलासपुर से उनकी उम्मीदवारी अनधिकृत रूप से घोषित कर रखी है। पार्टी के इस मनोभाव से जोगी के हाथ में तुरूप का इक्का आ गया है। अब उनके मान-मनौव्वल का दौर भी फिर शुरू हो गया। कूटनीति के लिहाज से जोगी की यह बड़ी जीत है। उन्होंने पुन: साबित कर दिया कि राजनीति के वे वाकई सिद्ध पुरुष हैं।
दरअसल जोगी कभी गेंद अपने पाले में नहीं रखते। जैसे ही वह उनकी ओर निशाना करके फेंकी जाती है, वे तुरंत रिवर्स किक करके लौटा देते हैं फिर चाहे उसे विरोधी फेंके या कोई और। उन्होंने राज्य विधानसभा चुनाव के बाद बहुत सूझबूझ से अपनी चालें चलीं थीं क्योंकि वे जानते थे लोकसभा चुनाव की वजह से वे पुन: सौदेबाजी की स्थिति में आ जाएंगे। जैसे-जैसे चुनाव की घड़ी नजदीक आते गई और प्रत्याशियों के नामों पर मंथन शुरू हुआ, जोगी का नाम स्वयमेव सतह पर आ गया। जोगी जानते थे, ऐसा ही होगा क्योंकि राजनीति में बेहद खराब दौर से गुजर रही कांग्रेस के लिए एक-एक सीट कीमती है और खासकर ऐसी सीटें जहां से उम्मीदवारों के जीतने की शत-प्रतिशत गारंटी हो, यों ही नहीं छोड़ी जा सकती। छत्तीसगढ़ में जोगी कांग्रेस के ऐसे नेता हैं जो जीत की गारंटी देते हैं। और तो और पिछले चुनाव में कोरबा संसदीय सीट से चुने गए पार्टी के एकमात्र सांसद और वर्तमान में केन्द्रीय मंत्री चरणदास महंत पर भी ऐसा दांव खेला नहीं जा सकता। प्रदेश के वरिष्ठतम दिग्गज नेता एवं कांग्रेस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा भी एक लोकसभा चुनाव हार चुके हैं। यानी जोगी का चुनाव मैदान में उतरना सफलता की शत-प्रतिशत गारंटी है। जोगी इसी गारंटी को राजनीतिक ढंग से भुनाना चाहते हैं और इसीलिए वे तने हुए हैं और फिलहाल तटस्थ भाव से पार्टी नेताओं की कसरत को देख रहे हैं।

इन दिनों राष्ट्रीय मीडिया से जो खबरें आ रही हैं, उनके मुताबिक केन्द्रीय नेतृत्व ने जोगी को मनाने की कवायद शुरू कर दी है। नई दिल्ली में स्क्रीनिंग कमेटी के प्रमुख आस्कर फर्नांडीज और छत्तीसगढ़ के प्रभारी बीके हरिप्रसाद ने अजीत जोगी से लंबी बातचीत की। फर्नांडीस पहले भी उनसे मिल चुके हैं। कहा गया है कि यह पहल सोनिया गांधी के निर्देश पर हो रही है। इन मुलाकातों एवं बातचीत से क्या नतीजे निकले, उनका खुलासा अभी नहीं हुआ है अलबत्ता अजीत जोगी जरूर कह रहे हैं कि वे अपने फैसले पर अडिग हैं यानी फिलहाल चुनावी राजनीति से दूर रहने का उनका इरादा अटल है। किंतु वे यह भी कह रहे हैं कि यदि सोनिया गांधी से उनकी मुलाकात होती है तो उनका आदेश शिरोधार्य करेंगे लेकिन उन्हें उम्मीद है कि सोनिया गांधी भी उनके फैसले का सम्मान करेंगी तथा चुनाव लड़ने पर जोर नहीं देंगी। जोगी का ऐसा कहना भी उनकी कूटनीति को दर्शाता है। लेकिन क्या ऐसा होगा? जोगी भी जानते हैं कि पार्टी को उनकी जरूरत है लिहाजा हाईकमान के आग्रह पर चुनाव लड़ने में क्या दिक्कत है? वे तो सिर्फ स्थितियों को तौल रहे हैं ताकि उनकी आवश्यकता एवं उपयोगिता कायम रहे। वे उपरी तौर पर ना-नुकुर कर रहे हैं। वे जानते हैं रबर को उतना ही खींचना चाहिए ताकि वह न टूटे। इसलिए वे अभी जिद पर अड़े हुए हैं लेकिन अंतत: उन्हें मान जाना है। प्रदेश की राजनीति में वर्चस्व बनाए रखने एवं अपने गुट को ताकत देने के लिए सांसद बनने में क्या बुराई है?

यह तो हुई जोगी की अपनी राजनीति किंतु प्रदेश कांग्रेस की बात करें तो उसके लिए यह जरूरी है कि जोगी चुनाव लड़ें। वे किस सीट से लड़ेंगे बिलासपुर या महासमुंद से यह तो बाद में तय होगा, संभवत: जोगी की मर्जी के अनुसार ही होगा। उनके चुनाव लड़ने एवं प्रचार अभियान में शामिल होने से यह तो निश्चित है कांग्रेस की सीटें पूर्व की तुलना में बढ़ेंगी। सन् 2009 के चुनाव में वह राज्य की 11 में से मात्र 1 सीट पार्टी जीत पाई थी, 2004 के चुनाव में भी यही स्थिति थी। लेकिन इस बार के चुनाव में यह क्रम तो निश्चितत: टूटेगा। कांग्रेस कितनी सीटें जीत पाएगी, यह उम्मीदवारों के चयन पर निर्भर है। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि जीतने की बेहतर संभावना रखने वाले उम्मीदवारों को ही टिकट दी जाए। जोगी में ऐसी क्षमता है इसीलिए उनकी मान-मनौैव्वल का दौर चला हुआ है।

Friday, February 14, 2014

झुलस गया लोकतंत्र

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का दु:ख और बढ़ गया होगा। 12 फरवरी को लोकसभा में अंतरिम रेल बजट पेश होने के दौरान जिस तरह के दृश्य उपस्थित हुए उन्हें देख प्रधानमंत्री का मन अवसाद से भर गया था। रेलवे मंत्री मल्लिकार्जुन खड़गे को तेलंगाना विरोधी सांसदों ने बजट भाषण नहीं पढ़ने दिया, खूब हंगामा बरपा किया, सरकार के मंत्री के.एस.राव, चिरंजीवी, डी.पुरंदेश्वरी और सूर्यप्रकाश रेड्डी जोर-शोर से चिल्लाते रहे। और तो और चिरंजीवी और सूर्यप्रकाश रेड्डी तो लोकसभा स्पीकर के सामने वेल में कूद गए। भारी हंगामे और विरोध की वजह से रेलवे मंत्री केवल 20 मिनट भाषण पढ़ पाए। ऐसा पहली बार है जब हंगामे की वजह से किसी मंत्री को अपना बजटीय भाषण आधा-अधूरा छोड़ना पड़ा हो। प्रधानमंत्री का दु:खी होना स्वाभाविक था क्योंकि उनकी अपील का भी कोई असर नहीं हुआ। प्रधानमंत्री ने कहा- मंत्रियों की करतूत से लोकतंत्र शर्मसार हुआ है।

लेकिन संसदीय गरिमा की अगले ही दिन यानी 13 फरवरी को और धज्जियां उड़ गई। कल से कहीं ज्यादा। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार लोकसभा में केंद्र सरकार ने तेलंगाना विधेयक पेश किया। आंध्रप्रदेश को विभाजित कर अलग से तेलंगाना राज्य बनाने के सरकार के फैसले के पक्ष और विपक्ष में देश की राजनीति उसी दिन से गर्म है जिस दिन केन्द्र ने आंध्र के विभाजन की मांग आधिकारिक रूप से स्वीकार की। दरअसल इस मुद्दे पर वर्षों से आंध्र झुलस रहा है। इसकी चिंगारी आज लोकसभा में शोले के रूप में उस समय तब्दील हुई जब कांग्रेस से निष्कासित सांसद एल.राजगोपाल ने सदन में मिर्च पावडर का स्प्रे किया। टीडीपी सांसद वेणुगोपाल ने चाकू लहराया और शीशों को तोड़ने की कोशिश की। कुछ सांसद आपस में गुत्थम-गुत्था हुए और सदन बेइंतिहा शोर-शराबे और हंगामे में डूब गया। स्प्रे की वजह से भगदड़ की स्थिति पैदा हो गई तथा  भारी अफरा-तफरी मची। चीखते, चिल्लाते और आंखों से आंसू पोछते सांसद सदन से बाहर निकल गए। कुछ को अस्पताल में पहुंचाया गया है। कुल मिलाकर सदन में अजीबो-गरीब स्थिति पैदा हो गई जो बेहद दु:खद थी। लोकसभा में संसदीय मर्यादाओं का उल्लंघन यद्यपि पहले भी कई बार हुआ है, माइक तोड़े गए हैं, आस्तीने चढ़ाई गई हैं और अपशब्द कहे गए हैं लेकिन आज जैसा दृश्य अभूतपूर्व है। ऐसी घटना संसदीय इतिहास में पहले कभी घटित नहीं हुई। ऐसा आक्रोश जो लोकतंत्र को तार-तार कर दे, पहले कभी अभिव्यक्त नहीं हुआ। लोकसभा अध्यक्ष ने फौरी कार्रवाई के रूप में 18 सांसदों को निलंबित कर दिया है। तेलंगाना विधेयक अब शायद इस सत्र में पारित नहीं हो सकेगा।

राज्यों के पुनर्गठन को लेकर जनआंदोलन पहले भी होते रहे हैं। आंदोलनों के दौरान छिटपुट हिंसा भी हुई लेकिन संसद में या प्रभावित राज्यों की विधानसभाओं में पृथक राज्य विधेयक को लेकर ऐसी अभद्रता की नौबत कभी नहीं आई। 12 वर्ष पूर्व सन् 2000 में बिहार, उ.प्र. और म.प्र. के हिस्सों को काटकर तीन नए राज्य उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ बने जिनके पीछे आंदोलन का लंबा इतिहास रहा है लेकिन बिना किसी खून-खराबे के राज्यों की जनता ने तहेदिल से विभाजन को स्वीकार किया। आंध्रप्रदेश के विभाजन का मुद्दा भी काफी पुराना है। प्रदेश के गठन के 12 वर्ष बाद ही तेलंगाना के लिए चिंगारियां फूट पड़ी थी। सन् 1969 के दौरान तो आंदोलन इतना उग्र हुआ कि उसे कुचलने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी जिसमें करीब 350 लोग मारे गए जिसमें अधिकांश छात्र थे। पृथक राज्य के लिए इतनी जानें किसी और आंदोलन में नहीं गई। बहरहाल तब से लेकर अब तक यानी 44 वर्षों में आग कभी बुझी नहीं। बीच-बीच में अंगारों पर राख जरूर पड़ती रही लेकिन वे भीतर ही भीतर धधकते रहे और आज अंतत: उसकी आंच से लोकतंत्र झुलस गया। आंध्र के विभाजन की यह आग कैसे बुझेगी, कहना मुश्किल है। फिलहाल तो यह मामला टल गया, लगता है। लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस की दिक्कतें कम नहीं होंगी। सामने लोकसभा चुनाव है और आंध्र की 42 लोकसभा सीटें दांव पर लगी हुई हैं। प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता है लेकिन इस मुद्दे पर वह स्वयं विभाजित है। राज्य में किरण रेड्डी की सरकार विभाजन के खिलाफ है यानी केन्द्रीय नेतृत्व का फैसला उसे मंजूर नहीं है। दरअसल तेलंगाना मामले पर 30 जुलाई 2013 को कांग्रेस कार्यपरिषद के तेलंगाना बनाने के निर्णय के बाद पार्टी आंतरिक संकटों से जूझ रही है। यद्यपि उसने फैसला लिया है लेकिन उसकी हालत इधर खाई और उधर कुएं जैसी है। पार्टी को उम्मीद नहीं थी कि तेलंगाना के विरोध में इतना जबर्दस्त माहौल बनेगा और खुद उसके मुख्यमंत्री, मंत्री, केंद्रीय मंत्री, सांसद, विधायक किसी भी हद तक जाने तैयार रहेंगे। देश में कई तरह की राजनीतिक चुनौतियों से जूझ रही कांग्रेस के लिए इस मुद्दे को सुलझाना आसान नहीं है। वह मुख्यत: अपनों के ही निशाने पर है। अब उसकी बेहतरी तो इसी में है कि वह कम से कम लोकसभा चुनाव तक इस मुद्दे को लटकाए रखे। चूंकि विधेयक लोकसभा में पेश हो चुका है और मौजूदा संसद का यह अंतिम सत्र भी है लिहाजा विधेयक को लंबित रखना सहज है। जाहिर है लोकसभा चुनाव के बाद नई सरकार बनने तक इस मसले पर अगली कार्रवाई की संभावना नहीं है।

जहां तक लोकसभा में सांसदों के आचरण का प्रश्न है, उस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। लोकसभा में एक सदस्य चाकू तथा दूसरा मिर्ची पावडर लेकर पहुंच सकता है, तो और भी हथियार लेकर आने में क्या दिक्कत है? सुरक्षा के मौजूदा उपायों पर गौर करने एवं आवश्यकतानुसार नई व्यवस्था बनाने की जरूरत है। यद्यपि हंगामा करने वालों के खिलाफ निलंबन जैसी कार्रवाई की गई है लेकिन क्या वह काफी है? चूंकि लोकतंत्र कलंकित हुआ है अत: दोषियों की संसद सदस्यता खत्म करने एवं आपराधिक प्रकरण दर्ज करने से कम कोई बात नहीं होनी चाहिए ताकि औरों के लिए वह नज़ीर बने। यह भी उम्मीद की जाती है कि संबंधित पार्टियां अपने ऐसे लोगों के खिलाफ बर्खास्तगी की कार्रवाई करे। दो दिन पूर्व कांग्रेस ने अपने 6 सांसदों को पार्टी से निष्कासित किया था। आंध्र प्रदेश के ये सांसद पृथक तेलंगाना राज्य के विरोध में लगातार संसद की कार्रवाई में बाधा डाल रहे थे तथा उन्होंने संप्रग सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया था। कांग्रेस को ऐसे ही सख्त कदम उठाने की जरूरत है क्योंकि तेलंगाना का मुद्दा उसकी प्रतिष्ठा का प्रश्न है। लोकसभा में हुए हंगामे से उसकी भी किरकिरी हुई है।

Sunday, February 9, 2014

रह गई कसर

मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह द्वारा वर्ष 2014-15 के लिए पेश किए गए बजट में कुछ बेहतर प्रावधानों के अलावा कोई विशेष बात नहीं है। विकास की बातें तो बजट का एक अनिवार्य हिस्सा होती ही हैं लिहाजा इस बजट में भी विकास पर विशेषकर कृषि एवं शिक्षा पर खासी धनराशि की व्यवस्था की गई है। कई अर्थों में इसे हम विकास-परक बजट कह सकते हैं लेकिन इस बजट में आम आदमी को कोई फौरी राहत नहीं है अलबत्ता किसानों, उद्योगपतियों, व्यवसायियों का अच्छा ध्यान रखा गया है। राज्य की जनता को सिर्फ इतनी राहत है कि उस पर किसी नए कर का बोझ नहीं लादा गया है। लेकिन महंगाई को कम करने के कोई उपाय भी नहीं किए गए हैं। राज्य सरकार चाहती तो कम से कम रसोई गैस एवं पेट्रोल-डीजल पर वैट को घटाकर उपभोक्ताओं को सीधी राहत पहुंचा सकती थी किंतु ऐसा कुछ नहीं किया गया। अलबत्ता विकास की मूल अवधारणा को ध्यान में रखते हुए जो बजटीय प्रावधान किए गए हैं, उससे उम्मीद बंधती है कि विकास के जिस मॉडल की परिकल्पना की गई है, उस दिशा में राज्य एक कदम निश्चितत: आगे बढ़ेगा।

सरकार ने इस बार कृषि के लिए कोई अलग बजट पेश नहीं किया। कृषि तथा संबद्ध क्षेत्रों के लिए 8459 करोड़ की राशि रखी गई। सरकार ने कृषकों को उस मायने में राहत देने की कोशिश की है, कि उन्हें अब कृषि ऋण पर कोई ब्याज नहीं देना होगा। पहले उन्हें 1 प्रतिशत ब्याज दर का भुगतान करना पड़ता था। यह बड़ी राहत है। इसी तरह चुनाव घोषणा-पत्र में किए गए वायदे के अनुसार धान पर बोनस 300 रु. प्रति क्विंटल कर दिया गया है जबकि यह राशि 270 रु. थी। जीडीपी में कृषि का योगदान 22 प्रतिशत है पर आश्चर्य की बात है कि कृषि रकबे के विस्तार की कोई सोच नहीं है जबकि राज्य में कृषि का रकबा निरंतर घट रहा है। सरकार के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए।

बजट के अनुसार राज्य की वित्तीय स्थिति बेहतर है। यह भी सुखद है कि राज्य सरकार की कोशिशों की वजह से सरकार का वित्तीय प्रबंधन कई राज्यों से बेहतर है। इसमें भी कोई शक नहीं कि राज्य बनने के बाद 12 वर्षों में आधारभूत संरचनाओं के विकास में जबर्दस्त प्रगति हुई है लेकिन उद्योग एवं रोजगार के मामले में स्थिति उत्साहवर्धक नहीं है। सरकार ने औद्योगिक प्रगति का ढिंढोरा तो बहुत पीटा, हजारों करोड़ के एमओयू हस्ताक्षरित हुए किंतु प्रगति असंतोषजनक रही। सरकार की नीतियों की वजह से उद्योग भारी संकटों के दौर से गुजर रहा है। इसे ध्यान में रखते हुए इस बार बजट में उद्योगों को खासकर इस्पात उद्योग को विभिन्न तरीकों से राहत प्रदान की गई है। इससे उद्योग सेक्टर में बेहतरी की उम्मीद की जा सकती है।

छत्तीसगढ़ की 33 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है। आजादी के 65 सालों के बावजूद अभी भी वे जीवन के अंधेरे से जूझ रहे हैं और दारुण स्थिति में हैं। बजट में यद्यपि उनकी शिक्षा सुविधाओं पर ध्यान केन्द्रित किया गया है पर वन ग्रामों के विकास की किसी समुन्नत योजना का जिक्र नहीं है।  बजट में राजनांदगांव में खेल विश्वविद्यालय की स्थापना खेलों के विकास के लिए एक जरूरी कदम के रूप में है। लोककला संगीत अकादमी की स्थापना काफी पहले की जानी चाहिए थी। बहरहाल इस बार इसे बजट में जगह मिली है। इससे कला और संस्कृति के क्षेत्र का एक बड़ा अभाव दूर होगा। कुल मिलाकर बजट मिश्रित रूप से सामने आया जो उम्मीदें भी जगाता है किंतु अभावों की टीस भी देता है।

Saturday, February 8, 2014

इस गुस्से का क्या मतलब निकालें

नक्सली हिंसा के खिलाफ हाल में छत्तीसगढ़ में एक ऐसी घटना देखने में आई जो कुछ अर्थों में सलवा जुडूम अभियान की याद को ताजा करती है। घटना है जशपुर जिले के गांव ठुठीअंबा की है। ठुठीअंबा और आसपास के पच्चीस गांवों के लगभग 500 आदिवासियों ने नक्सलियों के खिलाफ हथियार उठा लिए। कुल्हाड़ी, फरसे, तीर-कमान जैसे हथियारों से लैस ये ग्रामीण क्षेत्र में सक्रिय 50 से अधिक नक्सलियों से मुकाबला करने जंगलों में घुस गए। इस टोली में बच्चों से लेकर 70-72 साल के वृद्ध भी शामिल थे जो माओवादियों की हिंसा, लूटपाट एवं हफ्तावसूली से परेशान थे। उनके धैर्य का बांध तब टूटा जब माओवादियों ने बहू-बेटियों की इज्जत पर हाथ डालना शुरू किया। झारखंड सीमा से सटा ग्राम ठुठीअंबा आरा ग्राम पंचायत के अन्तर्गत आता है। नक्सलियों के खिलाफ मोर्चा खोलने ग्रामीणों ने बाकायदा रणनीति बनाई और 27 जनवरी 2014 को नक्सलियों की तलाश में वे जंगल में घुस गए। यह अलग बात है कि उनके हत्थे एक भी नक्सली नहीं चढ़ा और रात होते-होते ही वे अपने गांव इस संकल्प के साथ लौट गए कि नक्सली ज्यादतियों का विरोध जारी रखेंगे, भले ही जान क्यों न गंवानी पड़े। मारेंगे या मरेंगे की तर्ज पर ऐसा वाकया राज्य में पहले कभी देखने में नहीं आया। इस लिहाज से यह नक्सली इतिहास की अनोखी घटना है।

ग्राम ठुठीअंबा, कटहलडाड, आरोटोली, सकरडेगा, लाटादाइन, पुरनापानी, कोदोपानी, सालामाली सहित 25 गांवों के इन ग्रामीणों के गुस्से का इजहार ठीक उसी तरह है जैसा जून 2005 में दक्षिण बस्तर के भैरमगढ़ ब्लाक के ग्राम अंबेली-करकेरी में नक्सलियों के आतंक के खिलाफ आदिवासी मुखर हुए थे और यहीं से विवादास्पद सलवा-जूडूम अभियान की शुरुआत हुई थी। सलवा जुडूम का प्रारंभ शांति के आदर्शवादी विचारों के साथ हुआ था जो कालांतर में राज्य सरकार के हस्तक्षेप और पुलिस की शह पर भटक गया और हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा से दिया जाने लगा। लेकिन जशपुर जिले में आदिवासियों का प्रतिरोध प्रतिशोध के रूप में सामने आया है। इसे राज्य में किसी आंदोलन की शुरुआत नहीं मानी जानी चाहिए। उनकी तात्कालिक प्रतिक्रिया कह सकते हैं लेकिन यदि असंतोष की चिंगारी धधकती रही तो बहुत संभव है माओवादियों के खिलाफ एक नए प्रकार के संघर्ष की शुरुआत हो जाए। अगर ऐसा हुआ तो यह सलवा जुडूम से भी अधिक खतरनाक होगा। 

यह तो एक घटना हुई। दूसरी घटना है- दक्षिण बस्तर में माओवादियों के खिलाफ पोस्टर युद्ध। जिला मुख्यालय दंतेवाड़ा के आसपास के गांवों में इन दिनों बड़ी संख्या में नक्सल विरोधी पोस्टर देखे गए हैं। मुख्य मार्गों के पेड़ों पर लगाए गए इन पोस्टरों के जरिए नक्सलियों द्वारा ध्वस्त किए गए सरकारी भवनों, पुल-पुलियों, सड़कों तथा खाली पड़े हाटबाजारों को तस्वीरों के माध्यम से दर्शाया गया है। छत्तीसगढ़ी में लिखे गए इन पोस्टरों में बताया गया है कि वर्ष 2001 से 2013 तक माओवादियों ने 5969 लोगों की हत्या की। पोस्टरों में शासन की योजनाओं से होने वाले लाभ के साथ-साथ सीआरपीएफ के सिविल एक्शन कार्यक्रमों का भी बखान किया गया है। इस पोस्टर युद्ध की शुरुआत अ.भा. नक्सली विरोधी संगठन भोपाल म.प्र. ने की है। नक्सलियों के चेतावनी भरे पोस्टरों का जवाब पोस्टर से देने की इस मुहिम के पीछे जाहिर है जनता को नक्सलियों के विरोध में एकजुट करना है। क्या इस पोस्टरवार से जो पहले भी छेड़ा जा चुका है, कोई फर्क पडेÞगा? क्या बस्तर में नक्सली हिंसा थमेगी? या क्या आग और भड़केगी? 

एक और घटना है जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली में समाजशास्त्र विभाग की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर का वह बयान जिसमें उन्होंने आरोप लगाया है कि छत्तीसगढ़ पुलिस नक्सलियों के नाम पर उन्हें फंसा सकती है। दरअसल नक्सलियों के लिए धन की वसूली करने वाले कांग्रेस नेता बद्री गावड़े के साथ नाम जोड़े जाने पर नंदिनी ने आपत्ति जताई है। बयान में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ की सुरक्षा एजेंसियों एक कहानी गढ़ने में लगी हुई है कि नक्सलियों के कहने पर वे रावघाट का मुद्दा उठा रही है। नंदिनी सुंदर ने स्पष्ट किया है कि वे माओवादियों की विचारधारा तथा छत्तीसगढ़ या किसी और स्थान पर उनके द्वारा अपनाई जा रही रणनीति का समर्थन नहीं करती।
उपरोक्त तीनों घटनाओं का जिक्र महज इसलिए ताकि यह जाना जा सके कि छत्तीसगढ़ में नक्सली मुद्दे पर इन दिनों किस तरह के दृश्य सामने आ रहे हैं। नक्सलियों के खिलाफ आदिवासियों का शस्त्र उठाना गैरकानूनी घटना है। सवाल पुलिस की भूमिका पर भी है जो कोई नई बात नहीं है। फर्जी मुठभेड़ों की अनेक घटनाएं हैं जिसमें नक्सली होने के शक पर गरीब आदिवासी मारे गए हैं। लेकिन इन सबके बावजूद यह तथ्य है कि सीआरपीएफ सहित केन्द्र द्वारा भेजी गई बटालियन एवं पुलिस के संयुक्त अभियान से नक्सली पीछे हटने मजबूर हुए हैं। हालांकि यह दावा किया जाता है कि नक्सलियों की खामोशी आने वाले तूफान का संकेत है। बहरहाल पुलिस को बड़ी कामयाबी नक्सलियों के शहरी नेटवर्क को ध्वस्त करने में मिली है। शीर्ष नक्सली नेता गुड़सा उसेंडी ने भले ही आंध्र पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया हो, पर इससे राज्य की पुलिस ने राहत की सांस ली है। लिहाजा कुछ विशिष्ट सफलताओं के मद्देनजर क्या यह माना जाए कि बस्तर से नक्सली खत्म हो जाएंगे जैसा कि विश्वास मुख्यमंत्री रमन सिंह ने बारम्बार व्यक्त किया है? क्या बस्तर को नक्सली हिंसा एवं आतंक से छुटकारा मिलेगा? नक्सल मुद्दे पर क्या वह सही अर्थों में बौद्धिक, सामाजिक एवं राजनीतिक अन्तरसंबंधों को भेद पा रही है? पुलिस ने एक बड़ी सफलता के रूप में कांग्रेस के बद्री गावड़े, धर्मेंद्र चोपड़ा तथा अन्य को हाल ही में गिरफ्तार किया है। उनसे पूछताछ के बाद पुलिस का दावा है कि उनके संबंध विशिष्ट सामाजिक ंएवं राजनीतिक हैसियत रखने वाले लोगों के साथ हैं जिनके तार राज्य के अलावा दिल्ली से भी जुड़े हुए हैं। समाजविज्ञानी नंदिनी सुंदर का नाम भी इसी सिलसिले में आया है। एडीजी इंटेलिजैंस मुकेश गुप्ता का दावा है कि छत्तीसगढ़ की लाइफलाइन कहलाने वाले रावघाट रेल प्रोजेक्ट के खिलाफ कांग्रेस नेता बद्री गावड़े साजिश कर रहा था। उसने दिल्ली विवि की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर तथा कई अन्य स्वयंसेवी संगठनों से जुड़े लोगों को माओवादियों से मिलाने का भी काम किया था। पुलिस का यह दावा यदि सही है तो माओवादियों की पहुंच का पता चलता है। डॉ.विनायक सेन के बाद अरुंधती राय, नंदिनी सुंदर जैसे कई और नाम हैं जिन पर पुलिस का फंदा कसने बेताब है। इसमें दो राय नहीं कि शहरी नेटवर्क माओवादियों की लाइफलाइन है। यदि पुलिस इस नेटवर्क को पूर्णत: ध्वस्त करने में सफल रहती है तो यह उम्मीद की जा सकती है कि छत्तीसगढ़ से माओवादियों को पलायन करना पडे़गा। लेकिन क्या माओवादी विचारों का समर्थन करना या माओवादियों के प्रति सहानुभूति रखना कोई अपराध है? दरअसल पुलिस हर उस व्यक्ति को शक की निगाहों से देखती है जो इस विचारधारा का समर्थक है। ऐसी स्थिति में क्या वह उन हस्तियों को भी इस दायरे में लेगी जो नक्सलियों एवं राज्य सरकार के बीच अपहृतों को छुड़ाने के मामले में मध्यस्थ की भूमिका निभाते रहे हैं और जो घोषित रूप से माओवाद समर्थक हैं।

दरअसल नक्सली मोर्चे पर अजीबोगरीब स्थिति है। एक तरफ पुलिस की तेज रफ्तार कार्रवाई, दूसरी ओर नक्सलयिों का रक्षात्मक मुद्रा में आना तथा तीसरा आदिवासियों का नक्सलियों के खिलाफ एकजुट होना। क्या यह माना जाए कि सरगुजा के आदिवासियों को हिंसक कार्रवाई के लिए उकसाने के पीछे पुलिस की कोई भूमिका है? वर्ना सैकड़ों आदिवासियों का एकत्र होना और नक्सलियों को तलाशने जंगल में घुसना और पुलिस को भनक तक न लगना संभव है? क्या सलवा जुडूम एक नए रूप में सामने आ रहा है? जिस जुडूम को सुप्रीम कोर्ट ने 5 जुलाई 2011 को अपने आदेश में अवैध एवं असंवैधानिक करार देकर बंद करवाया था, वह ढंके-छिपे रूप में, पुलिस की शह पर पुन:  शुरू हो रहा है? क्या माओवादियों एवं उनके समर्थकों, सहानुभूति रखने वालों को चारों तरफ से घेरने की नई रणनीति है? क्या पुलिस नक्सलियों के उच्चस्तरीय राजनीतिक सम्पर्कों पर हाथ डालने का साहस दिखा सकती है। यदि डॉ.विनायक सेन, अरुंधती राय या नंदिनी सुंदर जैसे बुद्धिजीवी सवालों के घेरे में हैं तो पुलिस भी कैसे बच सकती है? राज्य में मानवाधिकार हनन के सैकड़ों मामले इसके गवाह हैं। सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार को कैसे भूल सकते हैं?