Thursday, September 29, 2016

पितरों का तर्पण और छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस

-दिवाकर मुक्तिबोध

पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के नेतृत्व में गठित छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस प्राय: हर मौके को राजनीतिक दृष्टि से भुनाने की फिराक में रहती है। कह सकते हैं, एक ऐसी राजनीतिक पार्टी जिसे अस्तित्व में आए अभी 6 माह भी नहीं हुई हैं, के लिए यह स्वाभाविक है कि वह जनता के सामने आने का, उनका समर्थन हासिल करने का तथा उनके बीच अपनी पैठ बनाने का कोई भी अवसर हाथ से जाने न दें लेकिन ऐसा करते वक्त एक चिंतनशील राजनेता को यह भी देखने की जरूरत है कि मानवीय संवेदनाओं की आड़ में उनकी राजनीति क्या तर्कसंगत और न्यायोचित कही जाएगी और क्या इस तरह की राजनीति पार्टी के लिए फायदेमंद होगी? यह ठीक है कि अजीत जोगी हर सूरत में वर्ष 2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव में अपनी दमदार उपस्थिति दिखाना चाहते हैं और इसके लिए वे हर किस्म की कवायद के लिए तैयार हैं, आगे-पीछे नहीं सोच रहे हैं।
          बीते महीनों के कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो तार्किक दृष्टि से राजनीति करने के लिए उचित नहीं ठहराए जा सकते अथवा सवालिया निशान खड़े करते हैं। ताजातरीन दो मामले सामने हैं- राजधानी के सेरीखेड़ी में चार बच्चों की दुर्घटना में अकाल मौत और दूसरी पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध पक्ष के अंतिम दिन तर्पण की घोषणा। जोगी कांग्रेस ने इस तर्पण कार्यक्रम के लिए बाकायदा समाज विशेष से अनुमति हासिल की। पार्टी का आरोप है कि राज्य सरकार की जनविरोधी नीतियों के चलते किसान आत्महत्या कर रहे हैं। नक्सली घटनाओं में बेगुनाह नागरिक मारे जा रहे हैं। मुठभेड़ों में राज्य पुलिस व अद्र्धसैनिक बलों के जवान भी शहीद हो रहे हैं। पुलिस प्रताडऩा से हिरासत में निरपराध युवकों की मौतों की घटनाएं बढ़ रही हैं आदि-आदि। चूंकि मृत व्यक्तियों की आत्माएं कथित रूप से भटक रही हैं अत: उनकी शांति के लिए पितृपक्ष के अंतिम दिन तर्पण, हवन-पूजन का आयोजन जरूरी है। इसके बाद गांधी जयंती के दिन उन्हें श्रद्धांजलि और उपवास। ऐसा पहली बार हुआ है जब मुद्दों की तलाश में किसी राजनीतिक पार्टी ने इतनी दूर तक सोचा हो। यह सचमुच हैरतअंगेज ख्याल है कि पितृपक्ष को भी राजनीतिक तौर पर भुनाया जा सकता है। जोगी कांग्रेस ऐसा कर रही है। क्या यह उसकी उपलब्धि है अथवा राजनीतिक प्रपंच? इसे जनता ही तय करेगी जो बहुत समझदार है।
बहरहाल, पहली घटना जिसमें चार बच्चे अकाल मौत के शिकार हुए, दर्दनाक और दुर्भाग्यजनक है। सड़क दुर्घटनाएं आम तौर पर चालकों की लापरवाही के परिणामस्वरूप घटित होती हैं। दुर्घटनाएं प्राय: रोज होती हैं जिसमें लोग मारे जाते हैं या घायल होते हैं। लेकिन प्रत्येक घटना के विरोध में सड़क पर एलाने-जंग नहीं होता। अलबत्ता गंभीर हादसों में गुस्साए लोगों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया के रूप में चक्काजाम या शव के साथ प्रदर्शन जरूर होता रहा है। सेरीखेड़ी की घटना गंभीर थी लिहाजा जनता का गुस्सा स्वाभाविक था। जोगी कांग्रेस ने इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश की। वह इसमें कूद पड़ी। राजमार्ग पर घंटों चक्काजाम किया गया। खुद जोगी सड़क पर लेट गए। चक्काजाम खोलने पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। गिरफ्तारियां करनी पड़ी। जोगी ने पीडि़त परिवार की मांग का समर्थन किया कि मृतकों के परिवार को 25-25 लाख का मुआवजा दिया जाए। जोगी पीडि़त परिवार से मिले तथा उन्हें सांत्वना दी। यानी राजनीति के साथ-साथ संवेदनशीलता भी प्रदर्शित की। 
            अब सवाल है क्या सड़क दुर्घटनाओं को भी राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है? क्या इससे पार्टी का कद ऊंचा होता है? क्या जनता के बीच अच्छा संदेश जाता है? क्या ऐसा करना सकारात्मक राजनीति है? क्या ऐसे आंदोलन से जनाधार मजबूत होता है? क्या मानवीय संवेदनाओं से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक हस्तक्षेप तर्कसंगत है? अगर इन सभी सवालों का जवाब हां में है तो प्रत्येक सड़क दुर्घटना के बाद जिसमें मौते होती हैं, सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन, सड़कजाम किया जाना चाहिए। क्या जोगी कांग्रेस ऐसे आंदोलनों के लिए तैयार है? यह भी प्रश्न है कि तब उसका रुख क्या होगा जब किसी सड़क दुर्घटना में हुई मौतों के लिए पार्टी के कार्यकर्ता जिम्मेदार होंगे? 26 सितम्बर को राजमार्ग 353 पर महासमुंद के बेलसोंडा में उनकी पार्टी के कार्यकर्ता की जीप से कुचलकर दो बाइक सवार युवकों की मौत हो गई। अब जोगी कांग्रेस क्या करेगी? क्या मृतकों के परिवार को पार्टी फंड से पर्याप्त मुआवजा देगी? तथा न्यायसंगत कार्रवाई के लिए सरकार के साथ सहयोग करेगी। 
         दरअसल प्रत्येक घटना-दुर्घटना जनसमर्थन के विस्तार का आधार नहीं बन सकती। सड़क दुर्घटनाएं भी इसी श्रेणी में है। इसी तरह पितरों का तर्पण राजनीतिक नाटकीयता से अधिक कुछ नहीं है। एक राजनीतिक स्टंट। इससे जोगी कांग्रेस की आत्मा को शांति मिल सकती है, पितरों को नहीं। प्रबुद्ध जनता भी ऐसी नाटकीयता से प्रभावित नहीं होती लिहाजा यह कवायद आत्मसंतुष्टि दे सकती है, पार्टी को ऊंचाई नहीं। पार्टी को ऐसे कार्यक्रमों से बचने की कोशिश करनी चाहिए जो नकारात्मक मूल्यों का बायस बनते हैं। जोगी कांग्रेस ने अपने अस्तित्व में आने के चंद महीनों के भीतर ही समूचे राज्य में जिस तेजी से अपनी उपस्थिति दर्ज की है, वह काबिले तारीफ है और ऐसा इसलिए संभव हुआ है क्योंकि पार्टी ने लगातार जनता के मुद्दे उठाए हैं, जनआंदोलन किए हैं। जब पार्टी स्वयं को कांग्रेस व भाजपा के बाद तीसरे विकल्प के रूप में जनता के मन में विश्वास पैदा करना चाहती है तो 'स्तरहीन राजनीतिÓ किस लिए? राज्य में जनता से जुड़े मुद्दों की कमी नहीं है किंतु मानवीय संवेदनाओं से जुड़े सवालों पर गंभीर रहने की जरूरत है, राजनीति की नहीं।

Wednesday, September 21, 2016

दलित की मौत और दलित होने का अर्थ

-दिवाकर मुक्तिबोध
खुशहाल छत्तीसगढ़, विकास की दौड़ में सबसे तेज छत्तीसगढ़, हमर छत्तीसगढ़ और भी ऐसे कई जुमले जो राज्य सरकार उछालती रहती है, दावे करती है। परन्तु क्या वास्तव में यही पूरा सच है ? क्या सब कुछ व्यवस्थित चल रहा है ? क्या राज्य में अमन चैन है ? क्या शासन-प्रशासन की संवेदनशीलता कायम है ? क्या नक्सल मोर्चे में पर सब कुछ ठीक चल रहा है ? अब कोई फर्जी मुठभेड नहीं ? पुलिस का चेहरा सौम्य और कोमल है तथा वह जनता की सच्चे मायनों में मित्र है। और क्या अब वह थर्ड डिग्री का इस्तेमाल नहीं करती तथा थाने में तलब किए गए निरपराध लोगों के साथ में सलीके से पेश आती है? अब अंतिम प्रश्न-क्या पुलिस हिरासत में मौतों का सिलसिला थम गया है? इन सभी सवालों का एक ही जवाब है- ऐसा कुछ भी नहीं है। न पुलिस का चेहरा बदला है न शासन-प्रशासन का। संवेदनशीलता गायब है तथा क्रूरता चरम पर । इसीलिए पुलिस हिरासत में मौत की घटनाएं भी थमी नहीं है।
          बीते वर्षो में घटित पुलिस-पशुता की कितनी घटनाएं याद करें। कवर्धा में पुलिस हिरासत में बलदाऊ कौशिक की मौत, नवागढ़ में भगवन्ता साहू, आरंग में राजेश, जीआरपी भिलाई थाने में सुखलाल लोधी, कुरूद में योगेश, बिलासपुर में शिवकुमार, अंतागढ़ में जागेश्वर साहू और रायपुर फाफाडीह थाने में बिदेश्वर शाह। ये कुछ नाम है जो पुलिस अमानुषता के शिकार हुए हैं। वे पिटाई से मर गए या उन्होंने भयाक्रान्त होकर थाने में फांसी लगा ली। ये वे लोग हैं जो बेवजह मारे गए। परिजनों को पता नहीं न्याय मिला कि नहीं। ये वे घटनाएं हैं जो उजागर हुईं। वनांचलों या दूरस्थ इलाकों में स्थित थानों में कितना कुछ घटित होता होगा, कल्पना की जा सकती है। सोचें, कितना बर्दाश्त करते होंगे वे ग्रामीण जो पूछताछ के नाम पर पुलिस की क्रूरता के शिकार होते हैं। नदी-नाले पार करके, राजधानी या जिला मुख्यालय आना, पुलिस अत्याचार के खिलाफ बड़े पुलिस वालों से शिकायत करना क्या आसान है? इसके लिए कितना जबरदस्त-साहस चाहिए, कलेजा चाहिए। क्या अत्याचार पीडि़त ऐसा कर पाते हैं? जाहिर है-नहीं। कई घटनाओं की रिपोर्टिंग नहीं होती और वे रफा-दफा कर दी जाती हैं। ऐसे में क्या यह नहीं कहा जाना चाहिए कि राज्य के ग्रामीण थाने यातना शिविर बने हुए हैं। 
दरअसल संदर्भ है अभी हाल में (17 सितम्बर 2016) जांजगीर जिले के पामगढ़ के अन्तर्गत मुलमुला थाने में 21 वर्षीय युवक सतीश नवरंगे की मौत की घटना । बिजली विभाग के कर्मचारियों की एक मामूली सी शिकायत पर पुलिस ने उसे थाने में तलब किया और इतना पीटा की उसकी मौत हो गई। युवक दलित था। दलितों का आक्रोश तो फूटा ही, पुलिस अत्याचार के खिलाफ आम लोग भी सड़क पर उतर आए। जन आक्रोश को देखते जिला पुलिस प्रशासन को तत्काल कार्रवाई करनी पड़ी। थानेदार सहित तीन को संस्पेड कर दिया गया। 
      ऐसी घटनाओं में राजनीतिक दखल स्वाभाविक है और होना भी चाहिए। भले ही यह कहा जाए कि इस तरह की राजनीति स्वार्थपरक होती है। यकीनन काफी हद तक यह सही भी है किन्तु यह भी सच है कि इससे जो दबाव बनता है, वह सरकार को कार्रवाई करने के लिए विवश करता है। विचार करें यदि सतीश प्रकरण में जनआक्रोश नहीं उबलता, राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होता, धरना-प्रदर्शन, चक्काजाम, नगर बंद एवं सीएम हाऊस के सामने विपक्ष नहीं गरजता तो क्या त्वरित कार्रवाई होती ? आरोपी पुलिस वालों के निलबंन के साथ-साथ मुख्यमंत्री पीडि़त परिवार के लिए 1 लाख की सहायता की घोषणा करते? बाद में 5 लाख और देने का ऐलान होता? सतीश की पत्नी को सरकारी नौकरी दी जाती ? और क्या उसके दोनों बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का खर्च सरकार वहन करती ? जाहिर है इसके पीछे एक बड़ा कारण विपक्ष और जनता का दबाव भी था। जिसकी वजह से सरकार को एकमुश्त राहतों की घोषणा करनी पड़ी। ऐसा पहली बार हुआ जब तुरत-फुरत एसआई समेत चार पुलिस वालों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया। और न्यायिक जांच के लिए हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश इंदर उपवेजा की नियुक्ति की गई। 
       लेकिन यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि राज्य सरकार ने सतीश की मौत के मामले में जिस संवेदनशीलता का परिचय दिया है, वह आम तौर इसके पूर्व घटित घटनाओं में कभी दिखाई नहीं दिया। क्या ऐसा इस वजह से है कि मृतक दलित वर्ग से था ? चूंकि देश में इस जमात पर अत्याचार की घटनाएं बेतहाशा बढ़ी हैं इसलिए राज्य सरकार ने इस घटना को तुरंत संज्ञान में लेकर कार्रवाई की ? लगता तो यही है। बहरहाल सरकार की सदाशयता में भी विवशता की प्रतिध्वनि सुनी जा सकती है। इसमें राजनीति को भी नकारा नहीं जा सकता। राज्य की भाजपा सरकार ने एक झटके में मौत के इस मामले में विपक्ष की राजनीति का पटाक्षेप कर दिया। अब दोनों कांग्रेस के पास सरकार को कटघरे में खड़ा करने के लिए कोई मुद्दा शेष नहीं है। सतीश की मौत की घटना भले ही मर्मांतक हो पर इसमें शक नहीं कि सरकार ने बाजी जीती है। यह उसकी कूटनीतिक जीत है।

Friday, September 16, 2016

राजधानी ही नहीं गांवों की ओर भी झांकिए जनाब

फोटो कैप्शन : सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री टी.एस.ठाकुर ने 10 सितंबर को राजधानी रायपुर के भारतीय प्रबंध संस्थान (आई.आई.एम.) के प्रेक्षागृह में राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण बिलासपुर द्वारा आदिवासियों के अधिकारों का संरक्षण और प्रवर्तन विषय पर आयोजित देश की पहली कार्यशाला को संबोधित किया। इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह भी मौजूद थे।
-दिवाकर मुक्तिबोध

सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति टी एस ठाकुर छत्तीसगढ़ की प्रगति से अभिभूत हैं। हाल  मेंही में वे रायपुर प्रवास पर थे। महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के अलावा उन्होंने नई राजधानी का भी दौरा किया। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी उनके साथ थे। यहां चमचमाती चौड़ी सड़कें, ऊंची-ऊंची खूबसूरत इमारतें, हरे-भरे पेड़-पौधे उन्हें आनंदित करने के लिए काफी थे। यह सब देखकर उनकी सकारात्मक प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी-''छत्तीसगढ़ को बाहर के लोग गरीब और पिछड़े राज्य के रूप में देखते हैं पर ऐसा नहीं हैं। राज्य तेजी से प्रगति कर रहा है और इसका श्रेय मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को है।ÓÓ अब अभिभूत  होने की बारी मुख्यमंत्री रमन सिंह की थी। पर वे निर्विकार रहे दरअसल मुख्यमंत्री को अब इस तरह की कोई तारीफ प्रभावित नहीं करती। देश की राजधानी दिल्ली या मेट्रो से जो भी अति महत्वपूर्ण व्यक्ति जिनमें केन्द्रीय मंत्री भी शामिल है, रायपुर आते हैं, विकास को देखकर गद्गद् हो जाते हैं। तारीफ के पुल बांधते हैं और  इसका पूरा श्रेय राज्य की भाजपा सरकार और उसके मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को देते हैं। और तो और केन्द्र में यूपीए सरकार के जमाने में भी छत्तीसगढ़ के दौरे पर आने वाले कांग्रेसी और गैरकांग्रेसी मंत्री भी मुख्यमंत्री और राज्य की प्रगति की तारीफ करते अघाते नहीं थे। उनके इस रवैये से, प्रतिक्रियाओं से प्रदेश कांग्रेस के नेता परेशान रहते थे क्योंकि वे प्रतिपक्ष के नाते राज्य सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते थे। कुप्रशासन, भ्रष्टाचार, महंगाई, बेलगाम नौकरशाही, आम आदमी की परेशानी, किसानों की आत्महत्याएं, गरीबी, बेरोजगारी आदि मुद्दों पर मुख्यमंत्री को कटघरे में खड़ा करते थे, आरोपों की बौछार करते थे, सड़क की लड़ाई लड़ते थे पर उनके किए-धरे पर केन्द्रीय मंत्री पानी फेर देते थे। सर्टिफिकेट देकर जाते थे कि मुख्यमंत्री अच्छा काम कर रहे हैं, प्रदेश तेजी से प्रगति कर रहा है। प्रदेश के कांग्रेसी सख्त नाराज रहते थे कि केन्द्र में उनकी सरकार, उनके मंत्री पर रायपुर आकर भाजपा सरकार का गुणगान! यह कैसे राजनीति!
        बहरहाल राजनीति अपनी जगह और काम अपनी जगह। इसमें क्या शक कि  पिछले 12 वर्षों में यानी भाजपा सरकार के दौर में जो अभी जारी है, कम से कम रायपुर की तो कायापलट हो गई है। विवेकानंद एयरपोर्ट पर उतरते ही उसकी सुुंदरता देखकर आंखें फट जाती हैं। गज़ब का विमानतल। बेहद सुंदर। फिर नया रायपुर के क्या कहने। ऐसी दिलकश आधारभूत संरचनाएं, जो भी देखता है, तारीफ किए बगैर नहीं रहता। नए के साथ पुराना रायपुर भी तो बदल गया है। लिहाजा रायपुर की मुकम्मल तस्वीर यही बनती है कि जिस प्रदेश की राजधानी इतनी खूबसूरत हो, वह पिछड़ा और गरीब कैसे हो सकता है।
पर यह पूरा सच नहीं हैं। आधा सच भी नहीं। रायपुर को देखकर पूरे प्रदेश के बारे में राय नहीं बनाई जा सकती। अंदर के हालात काफी खराब हैं। आंकड़े बताते हैं कि गरीबी बढ़ी है, बेरोजगारी बढ़ी है, किसानों की ऋणग्रस्तता, ऋण अदा न कर पाने की स्थिति, व्याप्त निराशा और आत्महत्याएं की घटनाएं भी बढ़ी हंै। उच्च और प्राथमिक शिक्षा की दुरावस्था की अनेक कहानियां हैं जो सच है। प्राथमिक स्वास्थ्य भी बेहाल है। अधोसरंचना का विकास केवल चंद बड़े शहरों तक सीमित हैं। गांव अभी भी विकास से कोसो दूर हैं। बस्तर अभी बरसों से नक्सल दहशत में है। नक्सलियों के मारे जाने या उनके सरकार के सामने शरणागत होने के जितने भी दावे किए जाएं, पर समस्या रंच मात्र भी कम नहीं हुई है। पहुंचविहीन गांवों की लंबी फेहरिस्त है। जिस पी.डी.एस सिस्टम की देशव्यापी तारीफ हुई, वह किस कदर भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबा हुआ है, यह बहुचर्चित नान घोटाले से जाहिर है। बहुतेरे आदिवासियों का अभी भी राशन के लिए मीलों पैदल चलना पड़ता है, नदी-नाले और पहाडिय़ों लांघनी पड़ती हैं। केन्द्र व राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाएं किनका कल्याण कर रही है, यह सर्वविदित है। शासन-प्रशासन की बात करे तो मुख्यमंत्री संवेदनशील हो सकते हैं पर अफसरशाही नहीं, कामकाज में पारदर्शिता भी नहीं। राज्य में भ्रष्टाचार तो खैर चरम पर है। इतना सब होते हुए भी यह अलग बात है कि छत्तीसगढ़ को विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति के लिए राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा जाता रहा है। वर्ष 2015-16 की बात करें तो पुरस्कारों  की झड़ी लगी हुई है। एक के बाद एक फिलहाल एक दर्जन से ज्यादा पुरस्कारों की प्राप्ति हो चुकी हैप् तो क्या इसे ही सच माना जाए ? कुछ भी मैनेजबल नहीं ? जैसा कि आमतौर पर पुरस्कारों  के मामलों में देखा जाता रहा है।
      दरअसल प्रगति की तस्वीर गांवों से बननी चाहिए। विशेषकर आदिवासी गांवों से। यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि आजादी के 68 वर्षों के बाद भी छत्तीसगढ़ के गांव बदहाल क्यों है। एक पूरी पीढ़ी बदहाली में मर गई, दूसरी, तीसरी, चौथी भी अभावों में जी रही है। पिछले 12 वर्षों से मुख्यमंत्री एवं मंत्री गांवों का स्थिति का जायजा लेने हफ्ते दस दिन का सम्पर्क अभियान चलाते हैं पर क्या उन गांवों का हालत सुधरी? अब विधायकों एवं सांसदों को गांव एॅलाट किए गए हैं, लेकिन क्या उनकी तस्वीर थोड़ी बहुत बदली? सभी सवालों का जवाब है-कहीं कुछ-कुछ बदला, कहीं कुछ भी नहीं बदला, बदला तो केवल रायपुर बदला।
सोचे, एक आदर्श ग्राम की तस्वीर क्या हो सकती है। गांवों में भी पक्की सड़कें, नालियां, प्राथमिक अथवा उच्च माध्यमिक स्वास्थ्य केन्द्र, प्राथमिक व माध्यमिक शालाएं, उनके भवन, शुद्ध एवं स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था, श्रमदान से बने तालाब, पहुंच मार्ग, बरसात में गांव टापू न बने ऐसी व्यवस्था और कुटीर उद्योग। क्या इतने बरसों में छत्तीसगढ़ के कुछ गांव ऐसी तस्वीर पेश नहीं कर सकते थे ? नहीं तो मंत्रियों, नेताओं व अफसरों के ग्राम जनसम्पर्क अभियान से क्या फायदा! क्या औचित्य।
अंत में एक बात और कही जा सकती है। क्या हमारी सरकार बाहर से आने वाले अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों को नई राजधानी की सैर कराने के साथ-साथ ग्राम दर्शन भी करा सकती है ? कोई एक गांव! क्या सीएम साहब ऐसा साहस जुटा सकते हैं ? ऐसे दौरे से जो तस्वीर बनेगी वह सच्ची प्रगति की सूचक होगी। तब मेहमानों की वास्तविक प्रतिक्रिया सामने आएगी। फिर इस योजना से कम से कम इतना फायदा तो होगा, उस गांव का उद्धार हो जाएगा। वैसे ही जैसे जब राष्ट्राध्यक्ष या प्रधानमंत्री दौरे पर आते हैं और जिस मार्ग से गुजरने को होते हैं तो रातों-रात उसकी तस्वीर बदल जाती है। सड़कें चकाचक हो जाती हैं। हमारे गांव इस तरह भी बदले, तो क्या बुरा है।

Saturday, September 10, 2016

इंतजार है जब लोग कहेंगे बैस मजबूरी नहीं, जरुरी है

- दिवाकर मुक्तिबोध   
      
प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं रायपुर लोकसभा से 7 बार के सांसद रमेश बैस पर अरसे से मेहरबान किस्मत अब रुठती नजर आ रही है। राज्य में मोतीलाल वोरा के बाद बैस को ही किस्मत का सबसे धनी नेता माना जाता है। कांग्रेस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष व कार्यसमिति के सदस्य वयोवृद्ध वोराजी पर किस्मत अभी भी मेहरबान है बल्कि उसमें और चमक पैदा हुई है क्योंकि वे सोनिया गाँधी के सबसे अधिक विश्वासपात्रों में से एक है। पर अब भाजपा में रमेश बैस के साथ ऐसा नहीं है। भाग्य दगा देने लगा है जबकि इसी के भरोसे वे भाजपा की राजनीति में सीढिय़ां चढ़ते रहे हैं। राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों को अभी भी अच्छी तरह याद होगा कि अटलजी के जमाने में लोकसभा चुनाव के दौरान छत्तीसगढ़ में एक नारा बुलंद हुआ करता था - 'अटल बिहारी जरुरी है, रमेश बैस मजबूरी है।Ó इस नारे में सारा फलसफा छिपा हुआ है। लेकिन अब नरेंद्र मोदी-अमित शाह के युग में रमेश बैस न तो जरुरी है और न मजबूरी। इसलिए आगामी लोकसभा चुनाव में जो 2019 में होने वाला है, बैस की पतंग कट सकती है बशर्ते उन पर किस्मत फिर फिदा न हो जाए।
यकीनन बैस के सितारे गर्दिश में चल रहे है। दरअसल मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के सन् 2003 में मुख्यमंत्री बनने के बाद बैस की उनसे कभी नहीं बनी। हुआ यूं कि बैस भविष्य की राजनीति में पढऩे में गच्चा खा गए। अंदाज नहीं लगा पाए कि छत्तीसगढ़ में वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सरकार बन सकती है। उनके पास मौका था। जब वे और रमन सिंह केंद्र में मंत्री थे तो छत्तीसगढ़ भाजपा की बागडोर सम्हालने के लिए उनसे पूछा गया। अध्यक्ष बनने का अर्थ था केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा। बैस राजी नहीं हुए, रमन सिंह तैयार हो गए। बस यहीं बैस चूक गए।  अप्रत्याशित रुप से भाजपा रमन सिंह के नेतृत्व में 2003 का विधानसभा चुनाव जीत गई और स्वाभाविक रुप से उन्हें मुख्यमंत्री चुन लिया गया। काश, यदि बैस से उस समय गलती न हुई होती तो वे रमन सिंह की जगह मुख्यमंत्री होते व लगातार तीसरा कार्यकाल देखते। किन्तु यहाँ किस्मत ने आँखें जरुर तरेर दी पर उन्हें 2004, 2009 व 2014 का लोकसभा चुनाव जीताते गई। इसके पूर्व लोकसभा चुनाव की गिनती करें - 1989, 96, 98, 99 यानी 7 बार लोकसभा के लिए चुना जाना बहुत मायने रखता है। यह बैस की लोकप्रियता का प्रमाण भी है किन्तु इतना सब होने के बावजूद भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उन्हें हाशिए पर ढकेलने तुला हुआ है। क्या गलती हो गई बैस से?
           दरअसल अब भाजपा की राजनीति में खेल, किस्मत का नहीं परफार्मेन्स का है। भाजपा में अटल-आडवाणी व मुरली मनोहर जोशी जैसों का जमाना लद चुका है। एक-एक करके महत्वपूर्ण पदों पर बैठे ऐसे तमाम नेताओं को किनारे किया जा रहा है जो पार्टी की नीतियों एवं मापदण्डों के अनुरुप अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे पा रहे है। बैस अपने ससंदीय जीवन के 30 वर्ष पूर्ण कर चुके है और 7वीं पारी खेल रहे हंै। कुल जमा 32 वर्ष। इस दौरान याद नहीं आता कि ससंद में उन्होंने कभी छत्तीसगढ़ के मुद्दों को जोर-शोर से उठाया हो। वे दो अलग-अलग अवधि में केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी रहे किन्तु केवल शोभा बनकर रह गए। इसलिए भाजपा तो भाजपा छत्तीसगढ़ में आम व खास चर्चाओं में उन पर ठप्पा लग गया कि वे किसी काम के नहीं। चुनाव जीतना अलग बात है, जीतने के बाद जनता की कसौटी पर खरे उतरना अलग बात। सरल व शान्त स्वभाव के रमेश बैस यही मार खा गए। लोकसभा चुनाव तो जीतते हुए पर अपने कामकाज से केंद्रीय नेतृत्व का दिल नहीं जीत पाए।
लेकिन पिछले चंद वर्षों से वे कुछ करना चाहते थे, कुछ कर दिखाना चाहते थे। वे अविभाजित मध्यप्रदेश व बाद में छत्तीसगढ़ भाजपा संगठन में महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके थे। चूंकि कुछ कर दिखाने की चाहत थी इसलिए वर्ष 2010 में प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में उन्होंने अपनी दावेदारी पेश कर दी। पिछड़े वर्ग से थे, वरिष्ठता के नाते दावेदारी तो बनती थी। लेकिन रमन सिंह की पसंद नहीं थे, इसलिए बैस को निराशा हाथ लगी। वे मनमसोसकर रह गए। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी भड़ास राज्य सरकार के कामकाज पर नुक्ताचीनी करके निकालनी शुरु की। प्रखर आलोचक तो नहीं बने पर हौले-हौले चिमटियां काटते रहे। अप्रत्याशित रुप से जब वर्ष 2014 में केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा सरकार का अभ्युदय हुआ तो उन्हें प्रगाढ़ उम्मीदें नजर आने लगी। लेकिन मोदी मंत्रिमंडल के गठन में उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। 7 बार के सांसद की अहमियत को समझा नहीं गया। खैर दूसरे विस्तार के पूर्व फिर चर्चाओं ने जोर पकड़ा कि इस बार तो मंत्रिमंडल में प्रवेश पक्का है। पर इस बार भी दाल नहीं गली। फिर तीसरे की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखा जाने लगा। पर हत्भाग, फिर निराशा। विष्णुदेव साय मंत्री बन गए - बैस रह गए। कैसे रुठी किस्मत। हाय रे किस्मत।
           यह तो तय है राजनीति में ऐसी स्थितियों का सामना करना बहुत मुश्किल होता है। जी को कड़ा करके चेहरे पर मुस्कान लानी पड़ती है। इंतजार करना पड़ता है, कर्म करते हुए भाग्य कब खिलेगा? लेकिन भाग्य का खिलना तो दूर, उसने एक और पटखनी दे दी। गत 16 वर्षों से जिस प्रदेश कोरग्रुप के वे सदस्य थे, वे वहाँ से भी हटा दिए गए। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने उनके नाम पर मोहर नहीं लगाई। आदिवासी मुख्यमंत्री को अरसे से हवा देने वाले आदिवासी नेता नंदकुमार साय को भी चलता कर दिया। बैस तसल्ली कर सकते है कि मैं नहीं तो साय भी नहीं। बहरहाल भविष्य की राजनीति पर अभी कुछ कहना मुश्किल है। लोकसभा के चुनाव 2019 में होंगे और उसके पूर्व राज्य विधानसभा के चुनाव निपट जाएंगे। इसी बीच समीकरण काफी बदलेंगे। बैस को रायपुर लोकसभा से आठवीं बार टिकिट मिलेगी या नहीं, यह अब उनके राजनीतिक कामकाज के तौर-तरीकों पर निर्भर है। लेकिन उनके लिए फिलहाल आसार अच्छे नहीं नजर आ रहे हैं। यदि उन पर लगा यह तमगा किसी तरह हटा दिया जाए कि बैस मजबूरी नहीं, जरुरी है तो बात बन सकती है। पर क्या ऐसा होगा?

                

फिलहाल कितने दूर, कितने पास


-दिवाकर मुक्तिबोध 
हाल ही में सीएम हाउस में आयोजित एक कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला। सीएम डॉ. रमन सिंह के बोलने की जब बारी आई तो उन्होंने अपने प्रारंभिक संबोधन में मंच पर आसीन तमाम हस्तियों मसलन मुख्य सचिव विवेक ढांड, रियो ओलम्पिक में महिला हाकी टीम की सदस्य के रूप में प्रतिनिधित्व करने वाली राजनांदगांव की कल्पना यादव, महापौर प्रमोद दुबे, राज्य के मंत्री राजेश मूणत तथा आयोजन के प्रमुखों का नाम लिया किंतु राज्य के सबसे कद्दावर मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का नाम लेना वे भूल गए। क्या वास्तव में भूल गए या जानबूझकर छोड़ दिया? ऐसा प्राय: होता नहीं है। मुख्यमंत्री मंचस्थों के सम्मान का हमेशा ध्यान रखते हैं। इसलिए मान लेते हैं कि बृजमोहन अनायास छूट गए। पर यदि राजनीति की परतों को एक एक करके खोला जाए तो यह बात पुन: स्पष्ट होती है कि बृजमोहन मुख्यमंत्री के निकटस्थ मंत्रियों में शुमार नहीं है। इसलिए इस घटना से दूरियां दर्शाने वाला एक संदेश तो जाता ही है। सो, वह गया।
      दरअसल रमन सिंह मंत्रिमंडल में जो इने-गिने प्रगतिशील विचारों एवं राजनीतिक सूझ-बूझ के मंत्री हैं, उनमें बृजमोहन टॉप पर हैं। मुख्यमंत्री के नेतृत्व को यदि चुनौती किसी से है तो वे बृजमोहन से ही है। भारतीय जनता पार्टी में प्रदेश स्तर की लोकप्रियता की बात करें तो सिर्फ दो ही नाम आएंगे स्वयं मुख्यमंत्री रमन सिंह और बृजमोहन अग्रवाल। मुख्यमंत्री की छवि एक सीधे-सरल, मिलनसार व्यक्ति की है, तो बृजमोहन सामाजिक सरोकारों में बेजोड़ हैं, व्यक्तित्व संबंधों के वे सबसे बड़े खिलाड़ी हैं, हर किसी के सुख-दु:ख में शामिल होने वाले। पर कूटनीति में वे रमन सिंह के मुकाबले कच्चे हैं। शांत प्रकृति के रमन सिंह ने जिस कूटनीति से पिछले 12 वर्षों से अपनी सत्ता को बनाए रखा है, अद्भुत है। और तो और यदि भाजपा राज्य में अगले दो चुनावों में यानी चौथी-पांचवीं बार भी अपनी सत्ता कायम रख पाई तो उनके (रमन सिंह के) नेतृत्व को चुनौती नहीं है, ऐसा इंतजाम उन्होंने कर रखा है। दूर-दूर तक कोई विकल्प नहीं-बशर्तें बृजमोहन को छोड़ दें। डाक्टर साहब ने बार-बार आदिवासी नेतृत्व की मांग करने वाले वरिष्ठ आदिवासी नेताओं को या तो ठिकाने लगा दिया है या अपने वश में कर लिया है। सबसे प्रखर नंदकुमार साय तो भीगी बिल्ली बन गए हैं और अब पार्टी अनुशासन का राग अलापते रहते हैं। पार्टी में पिछड़े वर्ग का प्रबल प्रतिनिधित्व करने वाले व सातवीं बार लोकसभा के लिए चुने गए रमेश बैस की दाल उन्होंने कभी गलने नहीं दी। बैस अभी भी फडफ़ड़ा रहे हैं। वे अब प्रदेश की कोर कमेटी में भी नहीं है। कुल मिलाकर पार्टी में रमन सिंह का दबदबा कायम है। हालांकि केंद्रीय नेतृत्व के लिए यह चिंता का विषय है। क्योंकि विकल्प की मौजूदगी राजनीतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए जरूरी होती है। इसके अलावा दलीय राजनीति में किसी की इतनी उंचाई बर्दाश्त नहीं की जाती कि वह आसमान को छूने लगे। इसलिए रमन सिंह को अभयदान नहीं हैं, तलाश जारी है।
अब बृजमोहन पर लौटते हैं। बृजमोहन पार्टी में सबसे बड़े ट्रबल शूटर हैं। सदन में व सदन के बाहर विपक्ष के हमलों का ताबड़तोड़ जवाब देने में माहिर बृजमोहन को बेजोड़ चुनाव संचालक माना जाता है। प्रदेश में पिछले 12 वर्षों में जितने भी उपचुनाव हुए हैं, बृजमोहन को कमान दी जाती रही है। उनके संचालन में चुनाव जीते गए हैं। भले ही पार्टी ने उनके इशारे पर करोड़ों रुपए बहा दिए हों। चुनाव के दौरान प्रतिबद्ध वोटों को भी कैसे पलटाया जाता है, उन्हें अच्छी तरह आता है। वे दाम वाले नेता हैं, दंड से दूर रहते हैं। संसदीय जीवन के 25 वर्ष पूर्ण कर चुके बृजमोहन का सपना प्रदेश का नेतृत्व संभालने का रहा है पर अतीत में कुछ राजनीतिक घटनाएं ऐसी हुई हैं जिन्होंने उच्च सत्ता के मार्ग पर उनके लिए कांटे बिछा रखे हैं। वे इस बात को समझते हैं इसलिए उनकी समूची ताकत अपनी मौजूदा स्थिति को बनाए रखने में लगी रहती है। हालांकि मंत्रिमंडल में नम्बर दो की पोजीशन से वे कब के बिदा हो चुके हैं। मुख्यमंत्री ने उनके पर कतरने में कभी कोई कमी नहीं की पर उन्हें एकदम जमीन पर नहीं लिटा पाए। बृजमोहन ने ऐसा नहीं होने दिया है।
      दरअसल अविभाजित मध्यप्रदेश एवं बाद में छत्तीसगढ़ प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रहे स्वर्गीय लखीराम  अग्रवाल की वह रिपोर्ट बृजमोहन की राजनीति प्रगति में अभी भी सबसे बड़ी बाधा है जो उन्होंने 2000-२००१ के दौरान पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के पास भेजी थी। उन दिनों छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी और भाजपा विपक्ष में। नेता प्रतिपक्ष के चुनाव के दौरान संघ कार्यालय, एकात्म परिसर में बृजमोहन समर्थकों ने जो हंगामा पेश किया था, जो तोड़-फोड़ व आगजनी की थी, लखीराम बहुत आहत हुए थे। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी छत्तीसगढ़ प्रभारी थे और नेता प्रतिपक्ष के चुनाव के दौरान कार्यालय में मौजूद थे। घटना के बाद बृजमोहन पार्टी से निलंबित कर दिए गए। बाद में उनकी वापसी जरूर हुई पर लखीराम की रिपोर्ट अपना काम करती रही। हालांकि अब दिल्ली दरबार में उन्होंने अपनी अच्छी पैठ बना रखी है फिर भी प्रदेश के मामले में होता वही है जो रमन सिंह चाहते हैं। बृजमोहन इस बात से संतुष्ट हैं कि प्रदेश सरकार हो या संगठन उनकी वरिष्ठता, संसदीय अनुभव एवं राजनीतिक क्षमता को नकारा नहीं जा सकता। इसीलिए कोर कमेटी के लिए प्रदेश से उनका नाम न आने पर दिल्ली ने वरिष्ठतम मंत्रियों के नाम मांगे और उनके नाम का समर्थन किया। हरी झंडी दी।
           बहरहाल बृजमोहन के ख्याली पुलाव जो सरकार का नेतृत्व करने के संबंध में है, पकेंगे अथवा नहीं, कहा नहीं जा सकता। वैसे डॉ. रमन सिंह के रहते संभावना नगण्य है। वैसे भी चुनाव के पूर्व राजनीतिक फिजा कैसी क्या रहेगी, फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता। यह तय है वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव प्रदेश भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहेंगे। कांग्रेस व जोगी कांग्रेस की तगड़ी चुनौतियों के बीच भाजपा यदि कोई रास्ता निकाल पाएगी तो जाहिर है रमन सिंह फिर ताजदार बादशाह रहेंगे। और यदि ऐसा नहीं हो पाया तो भाजपा की राजनीति में भारी बदलाव आएगा। तब क्या होगा, कहा नहीं जा सकता अलबत्ता रमन सिंह कह चुके हैं कि सक्रिय राजनीति में अभी उनके पास बारह वर्ष है। बारह वर्ष।