Thursday, January 30, 2014

कमजोर पड़ रही ‘आप’ की लहर

आम आदमी पार्टी के संयोजक एवं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को अपनी सरकार बचाने की फिक्र नहीं है। उनका कहना है कि वे सरकार बचाने की राजनीति नहीं करते। केजरीवाल का यह दो-टूक बयान इस बात का संकेत है कि वे यह मानकर चल रहे हैं कि उनकी सरकार 6 माह से ज्यादा नहीं चल सकती। दरअसल सरकार की उम्र की अनिश्चितता तो उसी दिन तय हो गयी थी जिस दिन उन्होंने अल्पसंख्यक सरकार के प्रमुख के रूप में शपथ ली थी। दिल्ली में सरकार बनाने के पीछे उनकी मंशा अपनी पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र में उल्लेखित कुछ मुद्दों पर फैसले लेने, उन्हें लागू करने तथा पार्टी को राजनीतिक ताकत देने की थी। लेकिन सिलसिला शुरू होता इसके पूर्व ही पार्टी राजनीति के चक्रव्यूह में फंस गई। विदेशी महिलाओं के मामले में उनके कानून मंत्री सोमनाथ भारती का कानून के घेरे में आना, उनकी बर्खास्तगी की मांग पर भाजपा का धरना और अपनी ही पार्टी के विधायक विनोद कुमार बिन्नी को बाहर का रास्ता दिखाना, नई मुसीबतें खड़ी कर रहा है। पार्टी की किरकिरी तब और अधिक हुई जब सोमनाथ भारती से बदसलूकी करने वाले पुलिस अधिकारियों के तबादले की मांग को लेकर केजरीवाल केबिनेट सड़क पर आ गई। उनका दो दिवसीय धरना-आंदोलन, यद्यपि मांगें आंशिक रूप से स्वीकार करने के साथ खत्म हुआ था लेकिन जनमानस में इसका कोई अच्छा संदेश नहीं गया। दिल्ली में आप की सरकार का यह कदम आत्मघाती कहा जा सकता है क्योंकि इससे पार्टी की स्वीकार्यता को आंशिक रूप से ही सही झटका लगा है। दिल्ली विधानसभा चुनावों के बाद ऐसा लग रहा था आप की आंधी देशभर में खासकर हिन्द प्रांतों में जोर पकड़ेगी, दिल्ली में सरकार बनने के बाद लोकसभा की तीन सौ सीटों पर चुनाव लड़ने एवं 10 जनवरी से 26 जनवरी तक नि:शुल्क सदस्यता अभियान प्रारंभ करने के फैसले से इसे और हवा मिली लेकिन ‘आप’ सरकार की मौजूदा कार्यप्रणाली से यह महसूस किया जा रहा है कि हवा अब पहले जैसी खुशगवार नहीं है। बाह्य एवं आंतरिक संकटों का दौर शुरू हो गया है हालांकि इससे उबरने के लिए आम आदमी पार्टी किनारा पकड़ने की कोशिश कर रही है।

इस बीच आगामी लोकसभा चुनावों के संदर्भ में कुछ चुनावी सर्वेक्षण भी जारी हुए हैं। कतिपय न्यूज चैनलों के इस सर्वेक्षणों में आज की स्थिति में आम आदमी पार्टी के लिए अच्छी संभावनाएं व्यक्त की गई है। लेकिन चुनाव में कम से कम तीन महीने का वक्त है लिहाजा ये सर्वेक्षण केवल ‘आप’ की हौसलाअफजाई कर सकते हैं। चुनाव के वक्त संभावनाओं की क्या शक्ल रहेगी कहा नहीं जा सकता। पर इतना जरूर है कि इस दौरान राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदलेंगे और तब ‘आप’ की शक्ति का शायद ठीक-ठीक आकलन संभव हो सकेगा। लेकिन यदि हम ‘आप’ को केन्द्र में रखकर हालातों पर चर्चा करें तो यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है आम आदमी पार्टी अपने सर्वोच्च को स्पर्श करने के बाद नीचे लौट रही है। जिस प्रबल वेग से जनभावनाओं का ज्वार उठा था, वह कम से कम दिल्ली से बाहर ठंडा पड़ते दिखाई दे रहा है। ‘आप’ ने अपने सदस्यता अभियान में एक करोड़ का लक्ष्य निर्धारित किया था। इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सका अथवा नहीं, इसकी अभी अधिकृत घोषणा नहीं हुई है। लेकिन जिस तरह अभियान की गति रही, इससे साफ लगता है कि लक्ष्य से पार्टी दूर ही रहेगी। दरअसल आम आदमी पार्टी के सामने फिलहाल एक ही उद्देश्य है जनता की अधिक से अधिक सहानुभूति एवं समर्थन बटोरना। उसे मालूम है लोहा गरम है इसलिए चोट करने का यही वक्त है। चूंकि आम आदमी पार्टी दिल्ली तक सीमित रहते हुए राष्ट्रीय पार्टी विशेषकर कांग्रेस एवं भाजपा के विकल्प के तौर पर अपनी धमक बनाने में सफल रही है लिहाजा उसे उम्मीद है लोकसभा चुनाव में वह तीसरी बड़ी ताकत के रूप में उभर सकती है बशर्ते जनभावनाओं के उबाल को किसी तरह कायम रखा जाए तथा उसे भुनाया जाए। दिल्ली में घटित राजनीतिक घटनाक्रम से इसका स्पष्ट आभास होता है।

‘आप’ ने अपने बुनियादी सिद्धांतों में इस बात का जिक्र किया था कि पार्टी में इमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और सेवाभावी लोगों को स्थान मिलेगा किंतु देशभर में जिस तरह सदस्यता अभियान चलाया गया, उससे लगता है पार्टी ने संख्या बल बढ़ाने की चिंता में इस सिद्धांत से समझौता कर लिया है। दिल्ली को छोड़ दिया जाए तो पार्टी का संगठनात्मक ढांचा कहीं भी मजबूत नहीं है। प्राय: तदर्थ व्यवस्था से काम चलाया जा रहा है तथा प्रादेशिक एवं जिलेवार नेतृत्व के अभाव में दिशाहीनता की स्थिति है। ऐसे में पार्टी को लोकसभा चुनाव में यही उम्मीद है कि जनता ही उसे चुनाव जिताएगी संगठन नहीं। किंतु यह विश्वास उसे मुंह के बल भी गिरा सकता है।

यद्यपि आम आदमी पार्टी अभी शैशवावस्था में है लेकिन उसने अहिस्ते-अहिस्ते कदम आगे बढ़ाने के बजाए तेज रफ्तार से चलने का फैसला किया है। दरअसल उसे डर है कि समय जैसे-जैसे आगे बढ़ेगा, जनसमर्थन की गति धीमी पड़ते जाएगी। इसीलिए वह इस बात की कोशिश कर रही है कि किसी तरह सुुर्खियों में रहा जाए। अरविंद केजरीवाल सहित पार्टी के कुछ नेताओं के विवादास्पद बयान इस ओर इशारा करते हैं। दरअसल ‘आप’ का भय निर्मूल नहीं है। देश का राजनीतिक इतिहास इस बात का गवाह है कि जनभावनाओं का जो ज्वार तेजी से ऊपर उठता है वह दुगुनी रफ्तार से नीचे गिरता है। दिल्ली में आप की सरकार ने एक महीने में अपने कार्यकाल में अद्भुत कुछ नहीं किया है हालांकि कामकाज के आकलन की दृष्टि से एक माह का समय कुछ भी नहीं होता। फिर भी एक तस्वीर तो बनती ही है और भविष्य की दृष्टि से ‘आप’ की तस्वीर कोई बहुत उत्साहवर्धक नहीं है। इसलिए यह कहना मुनासिब होगा कि एक वैकल्पिक राजनीति का जो स्वरूप ‘आप’ ने प्रारंभ में घड़ा था, वह धीरे-धीरे खुरच रहा है।

Sunday, January 5, 2014

धर्मसंकट में रमन

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह उन गिने-चुने मुख्यमंत्रियों में शामिल हैं जिनकी सरलता, सादगी और इमानदारी की दाद दी जाती है। वे लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बने हैं। सन् 2003 से 2008 और फिर 2013 तक उनके दस साल के शासन के दौरान सरकार भ्रष्टाचार एवं कुशासन से संबंधित विभिन्न  आरोपों से घिरी रही लेकिन रमन सिंह बेदाग रहे। एक राजनीतिक के रूप में उनकी छवि निर्मल है तथा प्रदेश भाजपा संगठन में वे एकमात्र ऐसे नेता हैं जिनके उदारवादी चेहरे को जनता ने पसंद किया तथा उनके नेतृत्व में पार्टी को पुन: सत्ता सौंप दी। अब मुख्यमंत्री के पास पार्टी के घोषणा पत्र में उल्लेखित संकल्पों एवं जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए पूरे पांच वर्ष हैं। वे इस अवधि में कितना कुछ कर पाएंगे, यह तो समय ही बताएगा लेकिन देश की राजधानी दिल्ली में जो राजनीतिक फिजां बदली है, उसके परिप्रेक्ष्य में क्या उनकी पार्टी तथा वे अपनी राजनीतिक सोच एवं क्रियाकलापों में कोई बदलाव लाएंगे? खासकर ऐसे वक्त पर जब आगामी मई-जून में लोकसभा के चुनाव होने हैं और पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी का भविष्य दांव पर लगा हुआ है। छत्तीसगढ़ से लोकसभा की 11 सीटें हैं जिनमें से दस पर भाजपा का कब्जा है। सवाल है क्या यह स्थिति कायम रह पाएगी या बस्तर जैसे नतीजे आएंगे। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में बस्तर में भाजपा अपनी पूर्व स्थिति (12 में से 11 सीटें) बहाल नहीं रख पाई थी। कांग्रेस ने इस आदिवासी अंचल में तगड़ी सेंध लगाई तथा भाजपा से 7 सीटें छीन ली। क्या लोकसभा चुनाव में भी ऐसा दृश्य नज़र आएगा? डॉ.रमन सिंह एवं प्रदेश संगठन के लिए चिंता का विषय है- लोकसभा चुनाव एवं आम आदमी पार्टी जिसका भले ही छत्तीसगढ़ में मजबूत आधार न हो लेकिन दिल्ली से चली आंधी छत्तीसगढ़ में भी अपना असर दिखाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

दरअसल मुख्यमंत्री की सहज-सरल प्रकृति एवं जज्बे को देखते हुए सहज जिज्ञासा होती है कि क्या वे भी कुछ-कुछ अरविंद केजरीवाल की तरह काम करने की कोशिश करेंगे? प्रदेश की राजनीति में आम आदमी पार्टी के प्रभाव को रोकने का एकमात्र तरीका यही है कि आम आदमी की पॉलिटिक्स की जाए यानी राजनीति के केन्द्र में आम आदमी हो। राज्य विधानसभा चुनाव में भले ही भाजपा ने 49 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया हो या कांग्रेस ने 39 सीटें जीतकर चुनौती पेश की हो, पर दोनों आम आदमी के मानस से जुड़ी हुई नहीं हैं और न ही वे उनकी संवेदनाओं, अपेक्षाओं, आकांक्षाओं एवं आम जरूरतों का ध्यान रखती हैं। बेहतर विकल्प के अभाव में मतदाताओं के सामने इन दो में से एक को चुनने की मजबूरी रही है। लेकिन राजनीति में अब आम आदमी पार्टी के दखल के बाद जिसने लोकसभा की 300 सीटों पर चुनाव लड़ने पर इरादा जाहिर किया है, अपनी जड़ों को मजबूत रखना एवं चुनाव जीतना भाजपा के लिए आसान नहीं है।

तो क्या डॉ.रमन सिंह भी अपने राजनीतिक तौर-तरीकों एवं विचारों में बदलाव लाएंगे? क्या वे भी केजरीवाल की तरह अतिविशिष्ट सुविधाओं के घेरे से बाहर निकलने का साहस दिखाएंगे? क्या वे  वीवीआईपी सुरक्षा को तिलांजलि देंगे? क्या वे केजरीवाल की तरह ट्रेफिक नियमों का पालन करते हुए चौराहों के रेड सिग्नलों पर अपने काफिले को रोकेंगे? क्या वे भव्य सरकारी बंगले का मोह छोड़कर एक सामान्य मकान में रहना पसंद करेंगे? क्या वे अतिविशिष्ट होने के बावजूद आम आदमी बने रहना पसंद करेंगे? और भी बहुत सारी बातें हैं जो विशिष्टता कायम रखते हुए उन्हें सामान्य की ओर ले जा सकती हैं। कई प्रदेशों के मुख्यमंत्री एवं सत्ताधारी नेता सादगीपसंद हैं और उनके दैनंदिन व्यवहार में यह शामिल भी है। क्या रमन सिंह दस साल के शानदार एवं वैभवपूर्ण सत्ता सुख के बाद राजनीति के बदलते हुए माहौल के अनुरूप स्वयं को ढालने की कोशिश करेंगे। क्या वे इस पर विचार करेंगे?

दरअसल यह सब कुछ व्यक्ति के सोच पर निर्भर करता है। मुख्यमंत्री एवं अति उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों को मिलने वाली सारी सुख-सुविधाएं, सुरक्षा आदि विधिसम्मत है। उपभोग का उन्हें अधिकार है पर व्यक्ति चाहे तो आदर्श प्रस्तुत कर सकता है जैसा कि केजरीवाल एवं अन्य ने किया है। और तो और राजस्थान की नई मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने भी सरकारी बंगला छोड़ने एवं सुरक्षा में कटौती का फैसला किया है। झारखंड के मुख्यमंत्री भी इसी राह पर चल पड़े हैं। जाहिर है यह ‘आप’ का असर है। डॉ.रमन सिंह से भी उम्मीद इसलिए कर सकते हैं क्योंकि वे भी सादगी पसंद हैं। 

यह तो हुई वीवीआईपी सुख-सुविधाओं को त्यागने की बात। लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है सच्चे जनसेवक की तरह आचरण की। दिल्ली में आम आदमी पार्टी को सफलता इसलिए मिली क्योंकि उसने जनता के मुद्दे उठाए, जन-आंदोलन किया, उनकी आवाज को अपनी आवाज दी। लोगों की अपेक्षाओं एवं आकांक्षाओं को समझकर उनमें एक विश्वास जगाने की कोशिश की। आप ने राजनीति की एक नई दिशा तय की। इस पर चलना अब राजनीतिक दलों की मजबूरी है क्योंकि सत्ता को कायम रखने एवं चुनाव जीतने का नायाब अस्त्र यही है। इसलिए यदि रमन सिंह विपक्ष के हमलों से बचना चाहते हैं और लोकसभा चुनाव में भाजपा का परचम पुन: लहराना चाहते हैं तो उन्हें तथा उनकी पार्टी को सीधे तौर पर जनता से जुड़ना पडे़गा, जनहित के फैसले लेने पड़ेंगे, समय-सीमा के भीतर समस्याएं निपटानी पड़ेंगी, भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त मुहिम छेड़नी पड़ेगी तथा शासन-प्रशासन को पारदर्शी बनाना पडे़गा। कांग्रेस के लिए भी यही बात लागू होती है। कांग्रेस को सत्ता पक्ष के साथ नूराकुश्ती छोड़कर एक सशक्त विपक्ष की भूमिका निभानी पड़ेगी और जनता के मुद्दों के साथ अपनी भागीदारी सुनिश्चित करते हुए उन्हें परिणाममूलक बनाना पड़ेगा। जो पार्टी ऐसा कर पाएगी, जनता भी उसके साथ खड़ी होगी। ‘आप’ की जीत का मंत्र भी यही है।