Friday, June 27, 2014

बदलने को तैयार कांग्रेस ?

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-दिवाकर मुक्तिबोध
इन दिनों छत्तीसगढ़ प्रदेश कांगे्रस में पुनर्गठन का दौरा शुरू है। प्रदेश से लेकर जिले और ब्लॉक स्तर की तमाम इकाइयां भंग कर दी गई तथा नए पदाधिकारियों के चयन के लिए विचार-विमर्श का सिलसिला चला हुआ है ताकि कमेटियों के लिए योग्य पदाधिकारियों का चयन किया जा सके। इस पूरी प्रक्रिया में काफी वक्त लगना तय है। ब्लॉक, जिला एवं प्रदेश की नई कमेटियों की शक्ल कैसी होगी, चेहरे सामने आने के बाद ही पता चल सकेगा। लेकिन विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद नए सिरे से कमेटियों के गठन की कवायद बेहतर है बशर्ते गुटीय संतुलन को कायम रखते हुए ऐसे चेहरे तलाशें जाएं जिनके लिए पार्टी सर्वोपरि है, व्यक्ति नहीं। ऐसा हो पाएगा, संशय है क्योंकि नए राज्य के रूप छत्तीसगढ़ के गठन के बाद से ही पार्टी बेइंतिहा गुटीय द्वंद की शिकार है और यही द्वंद विभिन्न चुनावों में पार्टी की पराजय के रूप में सामने आता रहा है।
        दिसम्बर 2013 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की पराजय किसी सदमें से कम नहीं थी। हार  इस मायने में आश्चर्यजनक रही कि उसे सत्ता में लौटने का पूरा भरोसा था लेकिन उम्मीदवारों का चयन, भितरघात, निष्क्र्रियता एवं रणनीतिक भूलों की वजह से पार्टी सन 2008 के चुनाव की तुलना में केवल एक सीट का इजाफा कर सकी। जैसा कि अमूमन होता है चुनाव के नतीजे के बाद तथाकथित आत्म-मंथन का लंबा दौर चला और  संकल्प लिया गया कि अप्रैल-मई 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी राज्य में जबरदस्त वापसी करेगी। किन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ तथा पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी एवं चरणदास महंत जैसे दिग्गज चुनाव हार गए और स्थिति जस की तस रही यानी पार्टी को लोकसभा की 11 सीटों में से केवल 1 सीट नसीब हुई।  सन 2009 के लोकसभा चुनाव में भी कांगे्रस को सिर्फ एक सीट पर विजय मिली थी। चूंकि लोकसभा चुनाव में कांगे्रस की पूरे देश में दुर्गति हुई और कुछ राज्यों में तो उसका खाता भी नहीं खुला इसलिए छत्तीसगढ़ को लेकर संगठन में हाय-तौबा नहीं मची क्योंकि आखिरकार पार्टी राज्य में एक सीट जीतकर अपना चेहरा बचाने में कामयाब हुई थी। अब राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस अपने संगठनात्मक ढांचे में व्यापक फेरबदल के पक्ष में है और इसी प्रक्रिया के तहत छत्तीसगढ़ में भी ऊर्जावान, कर्मठ और जुझारू चेहरे तलाशे जा रहे हैं।
           लेकिन सवाल है कि क्या कांग्रेस पिछली घटनाओं से सबक लेने तैयार है? क्या नेताओं के आपसी मतभेद जो एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने किसी भी सीमा तक जाने तैयार रहते हैं, दूर हो सकेंगे? क्या दिखावे की एकता से पीछा छूटेगा और सही मायनों में एकजुटता दिखेगी? क्या गुटीय नेता अपने-अपने अहम् को त्याग कर पार्टी को सर्वोपरि समझेंगे? क्या अपने व्यावसायिक हितों के लिए भाजपा सरकार के मंत्रियों से सांठ-गांठ बंद होगी? क्या जनता के मुद्दे केवल औपचारिक रूप से उठकर जाएंगे और सरकार को बख्श दिया जाएगा? और क्या कांगे्रस सचमुच अपने आप को बदलने के लिए तैयार है और पुन: जड़ों से जुड़ना चाहती है? इन सवालों के प्रति यदि पार्टी गंभीर है और इच्छा पूर्वक प्रयत्न करती है तो बदलाव की तनिक उम्मीद की जा सकती है।
      दरअसल कांगे्रस को सबसे पहले जरूरत है जनता से जुड़ाव की। पार्टी की जडेÞं टूटी नहीं है सिर्फ दाना-पानी के अभाव में सूख गई हैं। इसे फिर से हरा-भरा किया जा सकता है बशर्ते आम लोगों से जुड़कर, उनकी तकलीफों को समझकर, उनकी मदद के लिए आगे बढ़कर उन्हें राहत दिलाने की ईमानदार पहल की जाए। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की सफलता पर राहुल गांधी ने कहा था-कांग्रेसियों को आप से सीखने की जरूरत है। लेकिन क्या पार्टी इकाई के किसी भी स्तर पर ऐसा हुआ? छत्तीसगढ़ में पार्टी की दुर्दशा इसलिए है क्योंकि वह आम आदमी से कट गई है। नेता अहंकार में डूबे हुए हैं तथा पार्टी की उन्हें परवाह नहीं है। विधानसभा एवं लोकसभा चुनाव में कुछ सीटों पर पार्टी की पराजय बहुत कम वोटों से हुई। ये सीटें जीती जा सकती थीं बशर्ते पार्टी में एकजुटता रहती तथा तमाम स्वार्थों को त्यागकर केवल पार्टी के लिए काम किया जाता। महासमुंद लोकसभा सीट इसका सर्वोत्तम उदाहरण है जहां पार्टी के प्रत्याशी अजीत जोगी मात्र 1553 वोटों से पराजित हुए। लोकसभा चुनावों में जहां लाखों की संख्या में वोट पड़ते हो, कुछ सौ वोट मायने नहीं रखते अलबत्ता हार-जीत का फैसला जरूरत करते हैं। यह सोचने वाली बात है कि इस हार के पीछे वास्तविक कारण क्या है? जाहिर है यदि रागद्वेष एवं गुटीय प्रतिद्वंदिता को त्यागकर पार्टी के लिए काम किया जाता तो नतीजे कुछ और होते। इस संदर्भ में यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा चुनावों में कांग्रेस  संगठन पीछे रहता है और प्रत्याशी आगे यानी चुनाव संगठन नहीं लड़ता प्रत्याशी लड़ते हैं और अपने-अपने हिसाब से लड़ते हैं। चुनावों में पार्टी के कमजोर प्रदर्शन का यह एक बड़ा कारण है।
     

   यह कितनी विचित्र बात है कि एक तरफ प्रदेश पार्टी के अध्यक्ष भूपेश बघेल संभागीय आयोजन के जरिए कार्यकर्ताओं की राय जानना चाहते हैं और इस सिलसिले में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी से भी मुलाकात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ अजीत जोगी प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की वकालत करते हैं। कांगे्रस की राजनीति में अजीत जोगी एक बड़ी शख्सियत है और वे तथा उनका गुट संगठन पर हावी है। यह बात भी छिपी नहीं है कि अजीत जोगी को भूपेश बघेल का नेतृत्व मन से मंजूर नहीं है इसीलिए विधानसभा एवं लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद उन्होंने प्रदेश में नेतृत्व परिर्वतन का राग छेड़ा हुआ है। ऐसे समय जब हाईकमान के निर्देश पर नये सिरे से कमेटियों के पुनर्गठन की प्रक्रिया चल रही हो और जिसके नेतृत्व में चल रही हो, उसे ही हटाने की मांग क्या समयानुकूल है? इससे स्पष्ट है कि शीर्ष नेता एकाधिकारवाद की भावना से मुक्त नहीं है और पार्टी में अपने दबदबे को हर सूरत में बनाए रखना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि पार्टी नई ऊर्जा के साथ खड़ी हो पाएगी?
           बहरहाल यह तो तय है कि पार्टी में गुटीय असंतुलन एक बड़ी समस्या है। इसे बर्र्दाश्त करते हुए संगठन को काम करना होगा। संगठन यद्यपि जनता से जुडेÞ सवालों को उठा रहा है लेकिन क्या उसका जनता से वास्तविक जुड़ाव है और क्या वह मुददों को सही ढंग से उठा पा रहा है? अभी हाल ही में पार्टी ने तीन-चार बडेÞ आंदोलन किए। महंगाई के विरोध में, रेल भाडेÞ में वृद्धि के खिलाफ, धान के समर्थन मूल्य में वृद्धि को लेकर और बिजली दरों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी पर उसने प्रदेशव्यापी धरना प्रदर्शन एवं सभाएं की। ये आंदोलन अपनी जगह तो ठीक है पर इससे आखिरकार प्रदेश की जनता को क्या फायदा हुआ? आंदोलनों का क्या असर हुआ? क्या महंगाई कम हुई? क्या रेल भाडेÞ में वृद्धि वापस ली गई? क्या धान के समर्थन मूल्य में पार्टी की मांग के अनुरूप पर्याप्त इजाफा हुआ? क्या बिजली की दरें घट गई? जब ऐसा कुछ नहीं हुआ तो क्या ये आंदोलन केवल प्रतीकात्मक थे? अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए थे? और क्या आम जनता इन आंदोलन से संतुष्ट हो गई? दरअसल एक दशक की बात करें तो कांगे्रस का कोई भी जनआंदोलन परिणाममूलक नहीं रहा। सतत् आंदोलनों के जरिए सरकार पर जो दबाव बनाना चाहिए था, कभी नहीं बना। विधानसभा के भीतर भी मुद्दे प्रभावकारी ढंग से नहीं उठाए गए और कभी सरकार को असहज स्थिति में लाकर खड़ा नहीं किया गया। यानी विधानसभा के भीतर एवं बाहर केवल औपचारिकताएं पूरी की गईं। विपक्ष की ऐसी करुणाजनक स्थिति हर सरकार के लिए मुफीद होती है। फिर बहुतेरे कांग्रेसियों पर यह आरोप तो लगता ही रहा है कि वे सरकार से मिली हुए हैं और थोड़ा बहुत जो विरोध दर्ज किया जाता है वह दरअसल नूराकुश्ती है। 
         प्रदेश कांगे्रस को यदि वास्तव में अपनी जड़ों की ओर लौटना है तो उसे जमीनी कार्यकर्ताओं में विश्वास पैदा करना होगा। कार्यकर्ता ही पार्टी की ताकत है जो दुर्भाग्य से लंबे समय से उपेक्षित हैं। गांवों से लेकर शहरों तक ये कार्यकर्ता ही अपने कामकाज से लोगों में पार्टी के प्रति विश्वास का भाव पैदा करेंगे। समस्याएं छोटी हो या बड़ी उन्हें हल करना होगा चाहे आंदोलन के जरिए या नौकरशाही पर दबाव के जरिए। सरकारी योजनाओं की प्रभावी ढंग से निगरानी एवं जनसमस्याओं का हल ही पार्टी की मजबूती की गारंटी है। पुनर्गठन के बाद क्या ब्लॉक, जिला एवं प्रदेश स्तर पर कमान संभालने वाले नए पुराने चेहरे यह काम कर पाएंगे? क्या पार्टी का आत्मविश्वास लौटेगा या फिर थोडेÞ बहुत बदलाव के बाद वही ढर्रा कायम रहेगा जो अब तक चला आ रहा है?

Saturday, June 14, 2014

सिर्फ विकास के हथियार से बस्तर नक्सल-मुक्त नही होगा

 - दिवाकर मुक्तिबोध


क्या छत्तीसगढ़ में सक्रिय नक्सलवादी संगठनों के सफाए की घड़ी नजदीक आ गई है? क्या नक्सली कमांडरों को आंध्रप्रदेश की तरह छत्तीसगढ़ से भी पलायन करना पडेगा? क्या छत्तीसगढ़ में पुलिस के दबाव की वजह से नक्सली गतिविधियां न्यूनतम स्तर पर आ जाएंगी? क्या नक्सल प्रभावित बस्तर एवं सरगुजा में विकास कार्यों में तेजी आएगी? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो नक्सल मोर्चे पर राज्य सरकार की गंभीरता एवं उसे केन्द्र से मिलने वाली मदद के फलस्वरूप उभरकर सामने आंए हैं। नई दिल्ली में 9 जून को केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री राजनाथ सिंह एवं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के बीच इस मुद्दे पर दीर्घ मंत्रणा हुई। राज्य सरकार के अनुरोध पर गृहमंत्री ने 10 अतिरिक्त बटालियनों के साथ दो हेलीकाफ्टर एवं विकास कार्यों में मदद के लिए दो हजार हुनरमंद कर्मचारियों की सेवांए भी उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया है। ऐसा पहली बार है जब राज्य को विकास कार्योंं की देखरेख के लिए कुशल मानव संसाधन भी उपलब्ध होंगे। मुख्यमंत्री ने अगले दिन 10 जून को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी राज्य के मामलों पर बातचीत की तथा उनसे नक्सली इलाको के लिए विशेष पैकेज के साथ-साथ बस्तर मेंं युनिर्वसिटी एवं सरगुजा में पावर प्लांट की स्वीकृति मांगी। यानी अब मुख्यमंत्री का पूरा जोर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों को गति देने के साथ-साथ माओवादियों का नाश करना है। वे अपने अभियान में कितने सफल हो पाते हैं यह भविष्य की बात है लेकिन अब केन्द्र में भी पार्टी की सरकार होने से उन्हें उम्मीद है कि राज्य को अगले कुछ सालों में माओवादियों से मुक्त कर लेंगे।     
          दरअसल पूर्ववर्ती यूपीए सरकार की तरह ही नक्सलवाद-आतंकवाद का उन्मूलन भाजपा सरकार की उच्च प्राथमिकता में हैं। 9 जून को संसद के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि राज्य सरकारों से परामर्श करके राष्ट्रीय योजना तैयार की जाएगी ताकि वामपंथी चरमपंथ से उत्पन्न चुनौतियों एवं साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं पर प्रभावी तरीके से अंकुश लगाया जा सके। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान जनसभाओं में पार्टी के इस संकल्प को दोहराया है। पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में भी इसका उल्लेख है। यह अच्छी बात है कि केन्द्र में सत्तारूढ़ होने के तुरंत बाद गृहमंत्री ने इस दिशा में पहल की तथा अपने विभाग के उच्चाधिकारियों की मौजूदगी में मुख्यमंत्री रमन सिंह से बातचीत की। यद्यपि जैसा कि राष्ट्रपति के अभिभाषण में कहा गया है, नक्सलवाद, आतंकवाद की समस्या से निपटने राष्ट्रीय नीति तैयार की जाएगी लेकिन नक्सली हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ के सन्दर्भ में फौरन कार्रवाई शुरू कर दी गई है। राज्य सरकार को अर्द्ध सैनिक बलों की अतिरिक्त बटालियनों, हेलीकाफ्टर एवं अन्य संसाधन उपलब्ध कराने का फैसला इसका प्रमाण है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा भी है कि बस्तर में वामपंथी उग्रवाद के समूल नाश के लिए सुरक्षा और विकास की छत्तीसगढ़ की नीति को केन्द्र सरकार का पूरा समर्थन है। यानी नक्सलवाद से निपटने के लिए राज्य सरकार को फ्री हैंड दे दिया गया है। राज्य शासन ने 16 जून को इस सिलसिले में चर्चा के लिए राजधानी रायपुर में यूनिफाइड कमांड की बैठक बुलाई है जिसमें पुलिस के आला अफसरों के अलावा राज्य में तैनात अर्द्धसैनिक बलों के उच्चाधिकारी भी भाग लेंगे।
         देश की बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में क्या यह माना जाए कि केन्द्र में भाजपा के सत्तारूढ़ होने के बाद छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार नक्सली मुददे पर ज्यादा गंभीर हुई है? यों पूर्ववर्ती कांग्रेस गठबंधन सरकार ने नक्सल प्रभावित राज्यों को मदद के मामले में कोई भेदभाव नहीं किया बल्कि सरकार ने इसे राष्ट्रीय समस्या मानते हुए गंभीर प्रयास किए और तदनुसार नीतियां भी बनाईं लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार पर यह आरोप लगता रहा है कि वह माओवादियों के खिलाफ सख्ती से पेश नहीं आती और उसमें इच्छा शक्ति का अभाव दिखता है। इस सन्दर्भ में यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि नक्सल प्रभावित अन्य राज्यों बिहार, महाराष्ट्र, उडीसा, आंध्रप्रदेश, झारखंड आदि की तुलना में बीते वर्षों में नक्सली वारदातें छत्तीसगढ़ में अधिक हुई है और उसमें बड़ी संख्या में पुलिस जवानों के अलावा नागरिक मारे गए हैं। पिछले वर्ष मई में जीरम घाटी में कांग्रेस काफिले पर नक्सली हमला अब तक का सबसे बड़ा हमला था जिसमे विद्याचरण शुक्ल, महेन्द्र कर्मा, नंदकुमार पटेल जैसे वरिष्ठ नेताओं सहित 31 लोग मारे गए थे। यह सर्वविदित है कि छत्तीसगढ़ नक्सलियों की अत्यंत सुरक्षित शरणस्थली है। राज्य में 40 सक्रिय माओवादी संगठन है जिसमें करीब 50 हजार सशस्त्र माओवादी हैं। बस्तर में इतनी बड़ी संख्या में उनकी उपस्थिति और हिंसात्मक गतिविधियां चिंताजनक है नक्सली हिंसा के सन्दर्भ में मुख्यमंत्री रमन सिंह ने ठीक ही कहा है कि अगर देश से उग्रवाद को समाप्त करना है तो उसके लिए सबसे बड़ी लड़ाई बस्तर में लड़नी होगी। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि अगर हम बस्तर के सभी हिस्सों में शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार, रोजगार और अधोसंरचना का जाल फैलाने में कामयाब हो गए तो माओवादी आम लोगों को गुमराह नहीं कर पाएंगे और इस समस्या का हल निकाला जा सकेगा। 
           नक्सली मुददे पर केन्द्र एवं राज्य की नीति माओवादियों को खदेड़ने अथवा मार गिराने के साथ-साथ क्षेत्र के विकास कीजहां तक नक्सलियों को पीछे ढकेलने या बस्तर से हकालने का सवाल है, पुलिस बुरी तरह नाकाम रही है। चूंकि क्षेत्र नक्सलियों से खाली नहीं कराए जा सके इसलिए वहां विकास कार्य भी नहीं हुए। माओवादियों ने ऐसी कोशिशों पर तेज हमले किए तथा भय व आतंक का ऐसा वातावरण निर्मित किया कि शासकीय-अशासकीय विकास एजेंसियों ने तौबा कर ली । बस्तर में अनेक परियोजनाएं इसीलिए वर्षों से लटकी हुई हैं अथवा आधी-अधूरी हैं। 
         केंद्र  के समर्थन से उत्साहित रमनसिंह अब माओवादियों पर चौतरफा हमले के साथ-साथ विकास कार्यों को आगे बढ़ाना चाहते हैं लेकिन क्या ऐसा हो पाएगा? सड़कों पुल-पुलियों, स्कूल भवनों एवं अन्य सिविल कार्यों के लिए दो हजार दक्ष इंजीनियरों की भर्ती से विकास के पहिए घूमने लग जाएंगे? क्या वे नक्सली खौफ से आजाद रहेंगे? क्या इस बात की कोई गारंटी है कि नक्सली नवनिर्मित सड़कें, स्कूल भवन पुन: ध्वस्त नहीं करेंगे जैसा कि वे करते रहे हैं? क्या बस्तर से माओवाद की जड़ों को उखाड़ फेंकने का मूलमंत्र शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार की उपलब्धता है? क्या इससे जागृति फैलेगी और आदिवासी नक्सलियों को पनाह देना बंद कर देंगे? क्या गांव-देहातों से उनका खौफ जाता रहेगा? और क्या अर्द्धसैनिक बलों की छापामार कार्रवाई माओवादियों को बस्तर से पलायन के लिए मजबूर कर देगी? ऐसे बहुत से सवाल हैं जिनमें से कुछ का जवाब हां या ना में है। दरअसल केन्द्र एवं राज्य सरकार के स्तर पर नक्सलवाद के खात्मे के लिए हर युक्ति अपनायी जा चुकी है। बस्तर में अर्द्धसैनिक बलों की भारी तैनाती, अत्याधुनिक हथियार, संचार की नवीनतम सुविधाएं, सुरक्षा बलों की देखरेख में विकास कार्य, सघन गश्त और अनेक मुडभेड़ों में नक्सलियों के मारे जाने अथवा उनकी गिरफ्तारी के बावजूद बस्तर में उनकी गतिविधियां कम होने के बजाए बढ़ी ही हंै। इसीलिए केवल सर्वांगिण विकास समस्या का एकमात्र हल नहीं है। फिर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं आधारभूत संरचनाओं के लिए लंबा वक्त चाहिए। जनजागृति एक दिन में नहीं आएगी जिसके डर से माओवादी भाग खडेÞ होंगे? दरअसल पहली जरुरत है आदिवासियों को उनका हक देने की, उन्हे शोषण मुक्त करने की, उन्हें मुख्यधारा में लाने की, उनकी पहचान कायम रखने की, उनकी संस्कृति एवं परम्पराओं से छेड़छाड़ न करने की और उन्हें उनके अधिकारों का अहसास दिलाने की। इसके साथ ही उनके गांवों, कस्बों का सम्यक विकास। विकास कार्यों के अलावा बड़ी जरुरत है माओवादियों के साथ वार्ता के लिए वातावरण बनाने की। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह माओवादियों के साथ वार्ता की वकालत तो करते हैं लेकिन वातावरण बनाने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाते। यह तो तय है विकास और अर्द्धसैनिक बलों के दबाव के बावजूद बस्तर में माओवादी हिंसा नहीं रूकेगी। अत: जब तक इन तीनों मोर्चों पर एक साथ काम नहीं होगा, समस्या का निदान भी संभव नहीं है। केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकार माओवाद के खिलाफ कितनी भी फूल-प्रूफ रणनीति क्यों न बनाए, वार्ता के पक्ष की उपेक्षा भारी पडेÞगी। अत: जरूरी है देश के प्रखर माओवादी विचारकों को इस मुहिम से जोड़ा जाए। चूंकि छत्तीसगढ़ सर्वाधिक नक्सल प्रभावित राज्य है अत: इस दिशा में उसे ही पहल करनी चाहिए। क्या रमन सिंह ऐसा करेंगें?

Friday, June 6, 2014

मोदी मंत्रिमंडल में छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधित्व का सवाल.......


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दिवाकर मुक्तिबोध
मोदी मंत्रिमंडल में क्या छत्तीसगढ़ को प्रतिनिधित्व मिल पाएगा, इस सवाल को लेकर काफी चचाएं शुरू हो गई हैं। इन चर्चाओं में कहा जा रहा है कि भावी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस राज्य से कम से कम दो सांसदों को सरकार में शामिल करेंगें-रायपुर के सांसद रमेश बैस एवं रायगढ़ से निर्वाचित विष्णु देव साय जो प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष भी हैं। इन दोनों के पक्ष में यह तर्क दिया जा रहा है कि दोनों का राजनीतिक अनुभव काफी विशाल है। रमेश बैस रायपुर लोकसभा से सातवीं बार निर्वाचित हुए हैं और विष्णुदेव साय लगातार चौथी बार। रमेश बैस अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में राज्य मंत्री भी रह चुके हैं। अत: इस बार उनका दावा ज्यादा मजबूत है। विष्णुदेव साय को आदिवासी जमात से होने का लाभ मिल सकता है। चर्चा इन दोनों के ही इर्द-गिर्द है, कोई तीसरा नाम नहीं है। यह अलग बात है कि यदि सरोज पांडे दुर्ग से चुनाव जीत गई होती तो उनका मंत्रिमंडल में स्थान लगभग निश्चित रहता। एक तो वे भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा दिल्ली की राजनीति में भी उन्होंने अच्छी पकड़ बना रखी है। बहरहाल हार के साथ ही उनकी संभावना खत्म हो गई है।
नरेन्द्र मोदी की प्रकृति एवं उनकी कार्यशैली को जिसने भी नजदीक से देखा है वह यह मानता है कि वे काफी रफ-टफ तथा स्पष्टवादी हैं। चूंकि वे चौबिसों घंटें काम करते हैं अत: वे अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के रूप में भी ऐसे ही लोगों को चुनेंगें जो उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने का जज्बा रखते हों। वे ढीले-ढाले सांसदों को इस बिना पर नहीं चुनेंगें कि उनका संसदीय जीवन लम्बा चौड़ा है, दीर्घ राजनीतिक अनुभव है लेकिन सांसद के रूप में उनकी कोई छाप नहीं है। कई दफे लोकसभा के चुनाव जीतना अलग बात है तथा संसद में जनप्रतिनिधि के रूप में प्रभावी प्रदर्शन करना अलग बात। लिहाजा मंत्रिमंडल में ऐसे ही लोगों को शामिल किए जाने की संभावना है जो परर्फामर हो, जो संसद में जनता के मुद्दे लगातार उठाते रहे हों, जिन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए बेहतर काम किया हो तथा उनकी अपने क्षेत्र में पहचान काम करने वाले संसद सदस्य की हो। मोदी मंत्रिमंडल में चयन के इसी मापदंड पर कठोरता से अमल की संभावना को देखते हुए यह मुश्किल ही प्रतीत होता है कि सात बार के सांसद रमेश बैस की लॉटरी खुले। स्वभाव से सहज-सरल बैस के साथ दिक्कत यह है कि वे अच्छे परफार्मर या प्रशासक नहीं है जबकि वे केन्द्र में मंत्री रह चुके हैं। पिछले तीस सालों से वे संसद में रायपुर और छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं पर इस दीर्घ अवधि के बावजूद उनके खाते में एक भी ऐसी उपलब्धि नहीं है जिसे जनता याद रखे। फिलहाल वे तेजी से अलोकप्रियता की ओर बढ़ रहे सांसद हैं हालांकि वे यह बात जुदा है कि वे हर बार चुनाव जीत जाते हैं। राजनीतिक हलको में और तो और संगठन के गलियारों में उनके लिए यही कहा जाता है कि वे भाग्य के प्रबल हैं और मजबूरी के सांसद हैं। प्राय: हर चुनाव में कुछ न कुछ ऐसा घट जाता है जो उनके पक्ष में जाता है और वे जीत जाते हैं। पिछले चुनावों के दौरान यह नारा बहुत चला था-अटल जरूरी है, बैस मजबूरी है। इस बार के चुनाव में अटल के स्थान पर मोदी आ गए। यानी ‘मोदी जरूरी है बैस मजबूरी’। यह मोदी लहर का ही कमाल था कि वे इस बार 1 लाख 76 हजार से अधिक वोटों से जीत गए। जब भाग्य प्रबल हो तो सारी चीजें बौनी हो जाती है। भले ही इसे मजबूरी का नाम क्यों न दें। बैस उसी स्थिति में मोदी केबिनेट में शामिल किए जा सकते हैं बशर्ते एक बार तकदीर पुन: उनका साथ दे तथा मोदी संघ के दबाव में उन्हें मंत्री बनाने मजबूर हो जाएं। यदि ऐसा हुआ तो फिर एक विशेषण उनसे चिपक जाएगा-मजबूरी के मंत्री।
बहरहाल बैस की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता। चूंकि वे प्रदेश के वरिष्ठतम सांसद हैं लिहाजा उनके चयन पर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह खुला विरोध नहीं कर पाएंगें। भाजपा में रमन सिंह और बैस के रिश्ते ऊपरी तौर पर भले ही सामान्य दिखाई देते हों लेकिन हकीकतन ऐसा नहीं है। बीते वर्षों में रमेश बैस कई बार राज्य के काम-काज की आलोचना करते रहे हैं। यह बात भी छिपी हुई नहीं है कि वे सरकार का नेतृत्व संभालने लालायित रहे हैं। और तो और उनकी महत्वाकांक्षा प्रदेशाध्यक्ष पद के इर्द-गिर्द भी मंडराती रही है। सन 2010-11 में प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में उन्होंने अपनी इच्छा को सार्वजनिक भी किया था। रमन सिंह उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को बखूबी समझते हैं। लिहाजा वे नहीं चाहेंगें कि बैस केन्द्र में मंत्री बने और उनकी राजनीतिक हैसियत में इजाफा हो क्योंकि मोदी मंत्रिमंडल में शामिल होने का अर्थ होगा प्रदेश की राजनीति में एक नए शक्ति केन्द्र का उदय। इस संभावना को खारिज करने के लिए उनके पास तुरुप के इक्के के रूप में विष्णु देव साय हैं जो आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा मुख्यमंत्री के नजदीकी भी हैं और जिनसे उन्हे कोई चुनौती नहीं है। इसलिए उनकी कोशिश होगी मोदी मंत्रिमंडल में राज्य का प्रतिनिधित्व कोई आदिवासी करे। विष्णुदेव साय या फिर चार बार के सांसद दिनेश कश्यप उनकी पसंद हो सकते हैं।
यह तो तय है प्रधानमंत्री के रूप में मोदी के शपथ-ग्रहण के साथ मंत्रिमंडलीय सहयोगी के रूप में जो बडेÞ नाम चल रहे हैं, उनमें रमेश बैस नहीं हो सकते। मंत्रिमंडल के विस्तार की दूसरी या तीसरी किस्त में छत्तीसगढ़ का नम्बर लग सकता है। बहरहाल तमाम किन्तु-परन्तु के बावजूद यदि रमेश बैस मंत्रिमंडल के लिए जाते हैं तो उन्हें अपनी कार्यशैली सुधारनी होगी। और विचार पूर्वक छत्तीसगढ़ की ऐसी समस्याओं जिससे आम आदमी जुड़ा हुआ है, को सुलझाना होगा। या कम से कम उस दिशा में सार्थक पहल करनी होगी। उन्हें तीस साल से ओढेÞ हुए उस लबादे को उतार फेंकना होगा जो उन्हें निष्क्रिय, नाकारा, असरहीन व परिवारवाद का पोषक बताता है। अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में वे सूचना प्रसारण, वन एवं पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रह चुके हैं लिहाजा उम्मीद की जानी चाहिए यदि उन्हें पुन: अवसर मिलता है तो वे एक नए रमेश बैस नजर आएंगें।