Thursday, July 24, 2014

नक्सल समस्या- विचारों का टकराव, केन्द्र व राज्य सख्ती के हिमायती

माओवादियों से वार्ता के पक्ष में छत्तीसगढ़ के नए राज्यपाल 

-दिवाकर मुक्तिबोध

छत्तीसगढ़ के नए राज्यपाल श्री बलरामदास टंडन ने छत्तीसगढ़ की नक्सल समस्या पर स्पष्ट रूप से अपने विचार रखे हैं। राज्यपाल के रूप में नामित होने के तुरंत बाद चंडीगढ़ में मीडिया से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वे इस समस्या का हल बातचीत के जरिए ही संंभव देखते हैं। श्री टंडन राजनीतिक बिरादरी से हैं तथा पंजाब के उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं। जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में गिने जाने वाले 87 वर्षीय वयोवृद्ध राज्यपाल का मानना है कि बंदूक की नोक पर राज्य की इस समस्या को सुलझाया नहीं जा सकता। अत: जरूरी है कि माओवादियों को वार्ता के लिए तैयार किया जाए। श्री टंडन राज्यपाल के रूप में इस दिशा में किस तरह पहल करेंगे, करेंगे भी या नहीं, यह भविष्य ही बताएगा लेकिन रमन सिंह सरकार अब बातचीत की बहुत इच्छुक नहीं है। यह इसलिए भी है क्योंकि केन्द्र सरकार के गृहमंत्री राजनाथ सिंह माओवादियों के साथ वार्ता के पक्ष में नहीं है और वे ताकत के बल पर नक्सल समस्या को खत्म करने का इरादा रखते हैं। इसीलिए उन्होंने छत्तीसगढ़ सहित नक्सल प्रभावित तमाम राज्यों को हर तरह से केन्द्रीय सहायता उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया है जिसमें अत्याधुनिक संचार साधनों के अलावा, अर्द्धसैनिक बलों की टुकड़ियां, हेलीकाप्टर, टोही विमान एवं गोला बारूद शमिल है। केन्द्र के रूख को देखते हुए राज्य सरकारों ने भी आक्रामक रवैया अपना रखा है। छत्तीसगढ़ इस मामले में दो कदम आगे ही है। पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों के जवान नक्सलियों के ठिकानों की तलाश में जंगल में चप्पा-चप्पा छान रहे हैं।  
      इसमें दो राय नहीं कि पिछले कुछ महीनों से फोर्स के दबाव की वजह से बस्तर के माओवादी बैकफुट पर है। वे कोई बड़ी वारदात भी नहीं कर पाएं हैं। उनमें भगदड़ जैसी स्थिति है।  बीते जून-जुलाई में ही लगभग तीन  दर्जन नक्सलियों ने जिनमें कमांडर भी शामिल है, आत्मसमर्पण किया है। पुलिस ने मुडभेड़ों के जरिए कईयों को मार गिराया है और बड़ी संख्या में उन्हें गिरफ्तार किया है। इन स्थितियों को को देखकर यह आभास होता है कि नेतृत्व के छिन्न-भिन्न होने एवं नक्सली कमांडरों के आत्मसमर्पण से नक्सलियों के पैर कम से कम बस्तर से उखड़ रहे हैं। ऐसी स्थिति में पुलिस का काम और आसान हो जाता है। जिस तैयारी के साथ आंध्र प्रदेश के ग्रेहाउंड के साथ मिलकर पुलिस संयुक्त आपरेशन चला रही है, उससे सफलता की उम्मीद बढ़ गई है। यानी फोर्स के दबाव के चलते नक्सली या तो हथियार डालेंगे या फिर बस्तर से पलायन करने विवश हो जाएंगें। यदि ऐसा हुआ तो यह कहा जाएगा कि बंदूक की नोक से नक्सलियों का सफाया कर दिया गया। और केन्द्र व राज्यों की रणनीति सफल रही।
         लेकिन क्या वास्तव में यह इतना आसान है? क्या बस्तर के जंगल माओवादियों से खाली हो जाएंगें? क्या पुलिस मुठभेड़ों के जरिए समस्या को खत्म कर देगी? पुलिस के संयुक्त अभियान को भले ही प्रारंभिक सफलता मिली हो किन्तु बस्तर मेें नक्सलवाद की 50 सालों की जड़ों को उखाड़ फेंकना लगभग असंभव सा प्रतीत होता है। इसलिए यदि नए राज्यपाल वार्ता की वकालत कर रहे हैं तो यह उचित ही है। अब यह अलग बात है कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह इस मामले में दोहरी मानसिकता में है। जब नक्सली कोई बड़ी हिंसात्मक वारदात करते हैं तो वे उनसे सख्ती से निपटने एवं बातचीन न करने का ऐलान करते हैं। लेकिन अलग-अलग अवसरों पर इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान वे नक्सलियों से मुख्यधारा में शामिल होने की अपील के साथ बातचीत की इच्छा भी जताते हैं। अब प्रश्न यह है कि क्या वे इस दुविधा से उबरेंगे? राज्यपाल श्री टंडन के विचारों को जानने के बाद  क्या वे इस दिशा में सरकार की ओर से पहल करेंगे? वह भी ऐसी स्थिति में जब केन्द्र बातचीत की संभावना को नकार रहा हो। 
        बहरहाल यह देखना दिलचस्प रहेगा कि नक्सल मुद्दे पर राज्य सरकार की अगली रणनीति क्या होती है। चूंकि यह समस्या राष्ट्रीय है तथा देश के 76 जिले इससे प्रभावित हैं लिहाजा एक राज्य से इसका खात्मा स्थायी हल नहीं है। हालांकि आंध्रप्रदेश ने अपने युद्ध प्रशिक्षित कमांडों ग्रेहाउंड के जरिए नक्सलियों को अपने यहां से मार भगाया है। इससे सीमान्ध्र और तेलंगाना में तो शांति स्थापित हो गई  किन्तु बस्तर एवं पड़ोसी अन्य राज्यों में नक्सलियों की हिंसक गतिविधियां बढ़ गई।  भारत सरकार के गृहमंत्रालय द्वारा जारी किए गए अधिकृत आंकड़ों के अनुसार सन 2011 में 1760 नक्सली घटनाओं में 611 लोग मारे गए। सन 2012 में 1415 घटनाओं में 415 लोगों की मौंतें हुई। तथा सन 2013 में 1136 घटनाओं में 397 लोग जान से हाथ धो बैठे। सन 2014 में 31 मई तक 158 लोग नक्सल हिंसा में मारे जा चुके हैं। तीन सालों के इन आंकड़ों में सर्वाधिक घटनाएं एवं मौंते छत्तीसगढ़ में हुई हैं।  
           छत्तीसगढ़ के राज्यपाल चूंकि बातचीत के जरिए समस्या का हल चाहते हैं लिहाजा इस मुद्दे पर नए सिरे से पहल की संभावना दिखती है। वार्ता के समर्थक बहुतेरे नामचीन लोग हैं जो संगठित होकर वार्ता के लिए माहौल बना सकते हैं। दिक्कत सही प्लेटफार्म तैयार करने की। आश्चर्य है कि इतनी गंभीर राष्ट्रीय समस्या, जिसे देश की अखंडता के लिए खतरनाक माना गया है, पर गंभीर प्रयास कभी नहीं हुए। विकास और प्रतिहिंसा को आधार बनाकर इस समस्या को हल करने की कोशिश की गई जो अभी भी जारी है। पर नतीजा सबके सामने है। नक्सलियों पर काबू नहीं पाया जा सका है। न हिंसा रूकी है और न ही बस्तर संभाग जैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की गंगा बही है। और तो और शोषण चक्र और भी मजबूत हुआ है, भ्रष्टाचार बेइंतिहा बढ़ा है तथा आदिवासी पुलिस और नक्सली, दो पाटों के बीच में फंस गए हैं। दोनों तरफ खाई है, गिरे कि मरे। घटनाएं इसकी गवाह हैं।
    यह निश्चित है, हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा से नहीं दिया जा सकता। अदालतें हत्यारों को फांसी की सजा देती हैं पर फैसला सुनाने के पूर्व उन्हें बचाव का पूरा मौका दिया जाता है। सरकार भी नक्सलियों को आत्मसमर्पण का अवसर दे रही है लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। दरअसल माओवादियों को मुख्यधारा  में शामिल करने के लिए मनोवैज्ञानिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल करना होगा। उन्हें वार्ता की टेबिल पर लाने के लिए विशेष मुहिम चलानी होगी। क्या सरकार इसके लिए एक विशेष कार्यदल का गठन नहीं कर सकती जिसमें जाने-माने विचारकों के अलावा मीडिया के लोग भी शामिल हो? माओवादी, सरकार पर नहीं मीडिया पर ज्यादा भरोसा करते हैं इसलिए माओवादी विचारकों एवं उनके शीर्षस्थ नेताओं को मानसिक रूप से तैयार करना यद्यपि कठिन जरूर है पर असंभव नहीं। क्या केन्द्र या छत्तीसगढ़ सरकार इस संदर्भ में विचार करेगी? नए राज्यपाल अपने विचारों के अनुरूप प्रभावकारी पहल कर सकते हैं। देखे वे कितना कुछ कर पाते हैं या केवल भावनाओं तक सीमित रहते हैं।
        छत्तीसगढ़ के नए राज्यपाल श्री बलरामदास टंडन ने छत्तीसगढ़ की नक्सल समस्या पर स्पष्ट रूप से अपने विचार रखे हैं। राज्यपाल के रूप में नामित होने के तुरंत बाद चंडीगढ़ में मीडिया से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वे इस समस्या का हल बातचीत के जरिए ही संंभव देखते हैं। श्री टंडन राजनीतिक बिरादरी से हैं तथा पंजाब के उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं। जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में गिने जाने वाले 87 वर्षीय वयोवृद्ध राज्यपाल का मानना है कि  बंदूक की नोक पर राज्य की इस समस्या को सुलझाया नहीं जा सकता। अत: जरूरी है कि माओवादियों को वार्ता के लिए तैयार किया जाए। श्री टंडन राज्यपाल के रूप में इस दिशा में किस तरह पहल करेंगे, करेंगे भी या नहीं, यह भविष्य ही बताएगा लेकिन रमन सिंह सरकार अब बातचीत की बहुत इच्छुक नहीं है। यह इसलिए भी है क्योंकि केन्द्र सरकार के गृहमंत्री राजनाथ सिंह माओवादियों के साथ वार्ता के पक्ष में नहीं है और वे ताकत के बल पर नक्सल समस्या को खत्म करने का इरादा रखते हैं। इसीलिए उन्होंने छत्तीसगढ़ सहित नक्सल प्रभावित तमाम राज्यों को हर तरह से केन्द्रीय सहायता उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया है जिसमें अत्याधुनिक संचार साधनों के अलावा, अर्द्धसैनिक बलों की टुकड़ियां, हेलीकाप्टर, टोही विमान एवं गोला बारूद शमिल है। केन्द्र के रूख को देखते हुए राज्य सरकारों ने भी आक्रामक रवैया अपना रखा है। छत्तीसगढ़ इस मामले में दो कदम आगे ही है। पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों के जवान नक्सलियों के ठिकानों की तलाश में जंगल में चप्पा-चप्पा छान रहे हैं।

Monday, July 14, 2014

देश के दुश्मन से मुलाकात किसलिए

- दिवाकर मुक्तिबोध
देश एवं समाज के लिए खतरा बने आतंकवादियों से क्या किसी पत्रकार को बातचीत करनी चाहिए? क्या उसका इंटरव्यू लेना चाहिए? क्या ऐसा करना देशहित में है? क्या पेशेगत इमानदारी का यह तकाजा है? क्या लेखकीय स्वतंत्रता सर्वोपरि है? क्या वह देश से ऊपर है? क्या ऐसा केवल सस्ती लोकप्रियता हासिल करने,मीडिया में चर्चा में रहने एवं सनसनी पैदा करने के खातिर है? क्या स्वशासित मीडिया इसे ठीक मानता है? क्या नैतिक एवं सार्वजनिक हितों की दृष्टि से इसका समर्थन किया जा सकता है? ये कुछ सवाल हैं जो बेहद गंभीर हैं तथा इन पर गहन चिंतन की जरूरत है। ये सवाल अभी इसीलिए उठ खडेÞ हुए हैं क्यों कि देश के वरिष्ठ पत्रकार एवं भाषा के पूर्व सम्पादक वेदप्रताप वैदिक ने 3 जुलाई को पाकिस्तान के प्रवास के दौरान लाहौर में पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन जमात-उद-दावा के प्रमुख  हाफिज मोहम्मद सईद से मुलाकात की जो लगभग सवा घंटे तक चली।  हाफिज को मुंबई ब्लास्ट का मुख्य आरोपी माना जाता है तथा भारत के लिए मोस्ट वांटेड है जिसने पाकिस्तान में पनाह ले रखी है। कुख्यात अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के इस प्रमुख पर अमेरिका ने 60 करोड़ का इनाम घोषित कर रखा है। ऐसे व्यक्ति से वैदिक की मुलाकात ने मीडिया और राजनीति को गर्मा दिया है। कांग्रेस ने इस मसले पर संसद में अपना जबरदस्त विरोध दर्ज किया। हंगामें की वजह से राज्यसभा की कार्रवाई दो बार स्थगित करनी पड़ी। पार्टी ने मामले की सघन जांच एवं वैदिक की गिरफ्तारी की मांग की। अन्य विपक्षी दलों ने भी निशाना साधा एवं आपत्तियां दर्ज की। सरकार ने इस मामले में अपना पल्ला झाड़ लिया है। राज्य सभा में सरकार की ओर से जवाब देते हुए अरूण जेटली ने कहा कि इस मुलाकात से सरकार को कोई लेना-देना नहीं है। अगर कोई पत्रकार किसी से स्वयं होकर मिलता है तो इसमें कुछ नहीं किया जा सकता। न्यूज चैनलों ने वैदिक से इस घटना पर बातचीत की तथा लाइव कवरेज किया। कुल मिलाकर कई घंटे यह बहस का विषय बना रहा और शायद कुछ दिन और बना रहेगा।
       वैदिक नि:संदेह प्रखर पत्रकार हैं, चिंतक व लेखक भी। लेकिन वे बड़बोले हैं। आत्मस्तुति उनका प्रिय शगल है। जब भी उन्हें चैनलों एवं सार्वजनिक सभाओं में बात करने का मौका मिलता है, वे आत्मप्रचार के अपने हथियार खूब तराशते हैं,  उसकी धार तेज करते रहते हैं। वे यह बताने से नही चूकते कि उनका कितने बडेÞ-बडेÞ राजनयिकों, राष्ट्राध्यक्षों से  संबंध हैं तथा एक पत्रकार के रूप में उनका कैसा रूतबा है। 14 जुलाई को स्टार न्यूज के साथ इंटरव्यू में भी उन्होंने कोई मौका नहीं छोड़ा। हाफिज सईद से मुलाकात पर विस्तार से चर्चा करते हुए उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, नरसिंह राव, मनमोहन सिंह सहित विदेशी राष्ट्र प्रमुखों के साथ अपने सम्पर्कों एवं मुलाकातों का हवाला दिया।  विदेश मामलों में विशेषज्ञता का दावा करने वाले वैदिक यह भी बताने से नहीं चूके कि पूर्ववर्ती सरकारें उनसे विदेशी मसलों पर विचार-विमर्श करती रही हैं।
         संभव है, वैदिक की सभी बातें ठीक हो, उनमें अतिशयोक्ति न हो। वे वरिष्ठ हैं, ज्ञानी हैं इसमें क्या शक? लेकिन आत्म-श्लाघा किसलिए? क्या यह व्यक्तिगत कमजोरी है या कोई विकार? बहरहाल इस फेर में न पड़कर यह सोचने की जरूरत है कि हाफिज सईद से मुलाकात करने का औचित्य क्या था? जो भारत के खिलाफ जहर उगलता हो, भारत के टुकड़े-टुकडेÞ चाहता हो, जो कुख्यात अन्तरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन का संचालक हो और जिसकी अमेरिका को भी तलाश हो, ऐसे व्यक्ति से एक भारतीय पत्रकार की मुलाकात को किस नजर से देखा जाना चाहिए? वैदिक कहते हैं कि उन पर किसी का अंकुश नहीं है, वे स्वतंत्र हैं और पत्रकार की हैसियत से वे किसी से भी मिल सकते हैं। हाफिज से उनकी भेंट पत्रकार के रूप में हुई थी। इसके पहले भी वे अतिवादियों, माओवादियों, नक्सलियों से इसी हैसियत से मिलते रहे हैं? इसलिए हाफिज मामले को तूल देने का औचित्य क्या है? वैदिक के ये तर्क पेशेगत इमानदारी की कसौटी पर ठीक हो सकते हैं पर विचार करने की जरूरत है क्या ऐसा कृत्य राष्ट्रीयता के दायरे में है? क्या इससे देश का कोई भला होने वाला है? क्या पत्रकारिता का धर्म राष्ट्रधर्म से बड़ा है? क्या वह सईद से मुलाकात के बगैर पूरा नहीं होता? क्या हाफिज जैसे आतंकवादियों का इंटरव्यू करके हम उनका सम्मान नहीं कर रहे हैं? बातचीत में, जैसा कि खुलासा हुआ है कि हाफिज सईद  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संभावित पाकिस्तान दौरे के समय उनका स्वागत करना चाहता है? ऐसा आतंकवादी जिसने मुम्बई ब्लास्ट में सैकड़ों की जानें ली हों, जो संसद पर हमले के लिए जिम्मेदार हो, जो भारत में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देता रहा हो, वह भारतीय प्रधानमंत्री का स्वागत करे? अचरज, हैरानी व दु:खद है। वैदिक के जरिए अपनी बातों को भारत तक पहुंचाने का हाफिज का तरीका कितना कामयाब रहा बताने की जरूरत नहीं। यह अफसोस की बात है कि वैदिक उसके माध्यम बन गए। अब यह मामला क्या शक्ल लेगा, गर्म रहेगा या ठंडा पड़ जाएगा? भविष्य की बात है।
        वैदिक कहते हैं कि हाफिज से हुई बातचीत का एक-एक शब्द छपेगा। उन्होंने नोट्स लिए हैं, इंटरव्यू टेप नहीं हुआ है। इसका मतलब है वैदिक जो कुछ लिखेंगें भरोसा करना होगा। चूंकि इस मामले में अब राजनीति भी शुरू हो गई है इसलिए इंकार के बावजूद संभव है केन्द्र सरकार कुछ पहल करे, कुछ निर्देश जारी करे। चूंकि मीडिया स्वअनुशासित है, स्वतंत्र है, जिम्मेदार है और जनता के प्रति जवाबदेह भी लिहाजा उसे ज्यादा गंभीरता पूर्वक सोचने की जरूरत है कि उसे राष्ट्रधर्म व पत्रकारिता के धर्म के निर्वहन में किस तरह संतुलन एवं संयम बरतना चाहिए।

Monday, July 7, 2014

कांग्रेस के आंदोलन में आम आदमी

छत्तीसगढ़ प्रदेश कांगे्रस कमेटी के नेतृत्व में देश में बढ़ती महंगाई, राज्य में बिजली दरों मेें वृद्धि, राशन कार्डों में गड़बड़ी, धान के समर्थन मूल्य में बढ़ोत्तरी एवं जनता के अन्य सवालों को लेकर कांगे्रस ने राजधानी में जंगी प्रदर्शन किया। इन मुद्दों पर मुख्यमंत्री के घेराव का पूर्व घोषित संकल्प था और जैसा कि स्वाभाविक था, पुलिस की चाक-चौबंद व्यवस्था के चलते यह घेराव हो नहीं सकता था। यानी मुख्यमंत्री के घेराव की घोषणा औपचारिक मात्र थी। मकसद था जनता से सम्बद्ध सवालों को जोर-शोर से उठाना ताकि उसका सकारात्मक संदेश जाए तथा निष्क्रियता के आरोप एवं चुनाव में पराजय की हताशा से पीछा छूटे। लेकिन क्या ऐसा हो पाया? क्या संगठन के सभी गुटोें ने सरकार के खिलाफ मोर्चे में एकजुटता का परिचय दिया? और क्या इस आंदोलन का आम लोगों पर कोई असर हुआ?
            दरअसल यह एक राजनीतिक पार्टी का राजनीतिक आंदोलन था जिसमें आम आदमी गायब था। राजनीतिक आंदोलन, धरना प्रदर्शन, रैली अमूमन इसी तरह हुआ करते हैं, अपनी ताकत दिखाने के लिए जिसके पीछे मूल भावना राजनीतिक लाभ उठाने, कार्यकर्ताओं में जोश भरने तथा उनकी सक्रियता बनाए रखने के लिए होती है। ऐसे आंदोलन का जनता से सरोकार तो होता है पर इसमें जनता की भागीदारी नहीं होती इसीलिए वे प्राय: परिणाममूलक नहीं होते यानी जनता को इससे कोई सीधा फायदा नहीं पहुंचता, कोई राहत नहीं मिलती। प्रदेश कांग्रेस का 01 जुलाई को प्रदेशव्यापी आंदोलन भी इसी तरह का आंदोलन था जिसमें कार्यकर्ताओं की भीड़ तो थी पर इसमें आम लोगों को शामिल नहीं किया गया था। लिहाजा परंपरागत रूप से पार्टी के पिछले आंदोलनों की कड़ी में एक कड़ी और जुड़ गई। परिणाम की चिंता पार्टी को नहीं थी। उसे लगता है, आंदोलन के जरिए जनता के प्रति राजनीतिक धर्म का उसने निर्वाह कर दिया है।
     फिर ऐसे आंदोलन से फायदा क्या? क्या राजनीतिक आंदोलन जनआंदोलन में तब्दील नहीं हो सकते? देश में ऐसे अनेक आंदोलन हुए हैं जिनकी शुरूआत राजनीति की  बुनियाद पर हुई पर बाद में वे लोक आंदोलन के रूप में तब्दील हुए। लेकिन छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के आंदोलन की बात करें तो ऐसा कुछ नजर नहीं आता। यदि वास्तव में जनता के लिए लड़ाई लड़नी है तो उसमें जन क्यों नहीं होना चाहिए? उसमें निरंतरता क्यों नहीं होनी चाहिए? उसे परिणाम मूलक क्यों नहीं बनाना चाहिए? अण्णा हजारे के आंदोलनों की ताकत क्या किसी से छिपी हुई है? क्या उन्होंने अपने अनेक आंदोलनों को परिणाम मूलक नहीं बनाया? क्या पिछले वर्ष नई दिल्ली में जनलोकपाल विधेयक को लेकर उनके द्वारा किया गया आंदोलन कोई भूल सकता है? क्या उसमें विशाल जनभागीदारी एवं उसकी ताकत के आगे केन्द्र सरकार झुकने मजबूर नहीं हुई? यानी आंदोलनकारी चाहे व्यक्ति हो या संगठन, स्थितियां बदल सकता है, सकारात्मक नतीजे ला सकता है। बशर्ते ऐसी सोच के साथ आगे बढेÞ। प्रदेश कांगे्रस ने यकीनन जनता के प्रासंगिक मुद्दे उठाए। महंगाई से निम्न-मध्यम एवं गरीब वर्ग बेहद त्रस्त हैं। उन्हें राहत चाहिए, फौरी राहत। देश एवं प्रदेश में कांग्रेस विपक्ष की भूमिका में है इसलिए जनता के पक्ष में खड़े होने के लिए उसके पास अच्छा मौका है। सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य जैसी प्राथमिक किन्तु अत्यंत महत्वपूर्ण  समस्याओं के समाधान के लिए वह राज्य सरकार पर वांछित दबाव क्यों नहीं डाल सकती? बिजली दरों में वृद्धि के खिलाफ पार्टी ने पहले भी आंदोलन किए पर क्या कोई नतीजा निकला? क्या बढ़ी दरें घटी? नहीं घटी तो ऐसे आंदोलनों से आम जनता को फायदा क्या हुआ? क्या विपक्ष के रूप में पार्टी ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया? जाहिर है आंदोलनों का उद्देश्य जनता के बीच केवल अपनी छवि बनाने तक सीमित है ताकि चुनावों में उसे इसका राजनीतिक लाभ मिल सके। कांग्रेस के एक जुलाई के प्रदेश व्यापी आंदोलन से भी यही अर्थ ध्वनित होता है?
                जहां तक संगठन की ताकत का सवाल है, वह गुटीय द्वंद के कारण विभाजित है। इसका प्रदर्शन इस आंदोलन में भी हुआ। स्वयं पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी एवं उनका पूरा गुट गायब रहा। क्या यह कृत्य अनुशासनहीनता के दायरे में नहीं है? हल्ला बोल में भी पालिटिक्स? क्या गुटीय हित पार्टी हित से भी प्रबल है? स्पष्ट है पिछली तमाम पराजयों के बावजूद कांग्रेस ने कोई सबक नहीं लिया, अपना चरित्र नहीं बदला? ऐसे में कोई आंदोलन सफल कैसे हो सकता है? पार्टी 1 जुलाई के आंदोलन की सफलता का भले ही दावा करे, वास्तविकता यह है जनता ने इसका कोई नोटिस नहीं लिया वरन जगह-जगह सड़कों के जाम रहने एवं रास्ता रोके जाने की वजह से उसे परेशान ही होना पड़ा। आंदोलन फ्लाप रहा।