Wednesday, January 20, 2016

जोगी के बिना कांग्रेस ? कमजोर या मजबूत



 -दिवाकर मुक्तिबोध

छत्तीसगढ़ कांग्रेस क्या अपने दूसरे विभाजन की ओर बढ़ रही है। दिसंबर 2015 के अंतिम सप्ताह में अंतागढ़ उपचुनाव सीड़ी कांड के जाहिर होने के बाद जोगी परिवार पर पार्टी अनुशासन का कहर टूट पड़ा है। मरवाही से निर्वाचित अमित जोगी को 6 वर्ष के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है और उनके पिता पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के लिए भी पार्टी हाईकमान से ऐसी ही सिफारिश की गई है। अजीत जोगी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी में है लिहाजा उन पर फैसले का अधिकार प्रदेश कमेटी को नहीं है अलबत्ता वह अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए प्रस्ताव जरुर पारित कर सकती है। 6 जनवरी 2016 को प्रदेश कार्यालय में कार्यकारिणी की बैठक में उन्हें भी 6 वर्ष के लिए पार्टी से बाहर करने का निर्णय लिया गया। अब गेंद पार्टी हाईकमान के पाले में है। केंद्रीय अनुशासन समिति चाहे तो प्रदेश कमेटी के फैसलों को रद्द कर सकती है या अमित जोगी के निष्कासन पर मुहर लगाते हुए अजीत जोगी के खिलाफ कार्रवाई नामंजूर कर सकती है या स्थगित रख सकती है। जोगी पिता-पुत्र की आस अब मूलत: पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी एवं उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर टिकी हुई है जिनकी सहानभूति उन्हें प्राय: हर कठिन परिस्थितियों में मिलती रही है। ऐसा उनका दावा है और यह काफी हद तक सही भी है।
         छत्तीसगढ़ कांग्रेस में पहला विभाजन वर्ष अप्रैल 2003 में हुआ था जब श्री विद्याचरण शुक्ल ने पार्टी से बगावत करके शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में शामिल होने का ऐलान किया था। इसे विभाजन ही कहा जाएगा क्योंकि उनके साथ बड़ी संख्या में कांग्रेसजनों ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। प्रदेश कांग्रेस में यह बड़ी टूट-फूट थी जिसका नतीजा उसे राज्य विधानसभा चुनाव में देखने को मिला। नवंबर-दिसंबर 2003 में हुए चुनाव में विद्याचरण शुक्ल के नेतृत्व में एनसीपी ने अच्छा प्रदर्शन किया। उसे लगभग 7 प्रतिशत वोट मिले। यद्यपि पार्टी का एक ही प्रत्याशी जीत सका किन्तु उसने कांग्रेस को ऐसा नुकसान पहुंचाया कि अब तक वह इससे उबर नहीं सकी है। 2003 के बाद कांग्रेस अगले दो चुनाव भी हार गई पर 2008 एवं 2013 में पराजय की मुख्य वजह रही गुटीय प्रतिद्वंद्विता, प्रत्याशियों के चयन में गड़बड़ी एवं चुनाव के दौरान भितरघात। भाजपा, जिसका अविभाजित मध्यप्रदेश में छत्तीसगढ़ अंचल में कोई खास जनाधार नहीं था। वह पिछले 12 वर्षों से सत्ता में मात्र इसलिए है क्योंकि कांग्रेस एकजुट नहीं है और वह कोई सबक लेती नजर भी नहीं आ रही है।
       
दरअसल वर्ष 2003 की पराजय के बाद से कांग्रेस दो खेमों में बंटी रही है। सत्ता से बेदखली के बाद संगठन की लगाम अपने हाथ में न रख पाने तथा उसे अपने इशारे पर न नचा पाने का क्षोभ अजीत जोगी को इस कदर उद्वेलित करता रहा कि उन्हें कोई भी नेतृत्व बर्दाश्त नहीं हुआ चाहे वे चरणदास महंत रहे हो या नंदकुमार पटेल या फिर अब भूपेश बघेल। वे एक तरह से समानांतर कांग्रेस चलाते रहे हैं। पिछले एक दशक से उनका गुट इतना प्रभावशाली था कि वह संगठन पर हावी रहा। भूपेश बघेल के नेतृत्व संभालने के बाद यद्यपि उनका गुट कमजोर पड़ गया है पर कांग्रेस की दो मोर्चो पर लड़ाई जारी है। एक आतंरिक दूसरा बाहरी। बाहरी मोर्चा सत्ता पर हमला करता है पर उसमें भी सत्ताधारियों से कांग्रेसियों की मिलीभगत की बातें सामने आती रही हैं। यानी विधानसभा के भीतर और बाहर नूरा-कुश्ती चलती हैं, ऐसा कहना शायद ज्यादा मुनासिब होगा। इस नूरा कुश्ती का एक उदाहरण टेप कांड के रुप में सामने आया है जिसके तीन किरदार हैं - कांगे्रस के दोनों खेमे और भाजपा। दिलीप सिंह जूदेव के बाद यह दूसरा टेप कांड है जिसने प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में जबरदस्त हलचल मचाई है और जिसकी धमक दिल्ली तक पहुंच गई है। दिलीप सिंह जूदेव को 17 नवंबर 2003 को रिश्वत संबंधी टेप कांड के उजागर होने के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा था। इस कांड के पीछे अमित जोगी का हाथ बताया गया। वर्ष 2005 में सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई ने जो रिपोर्ट दाखिल की थी उसमें कहा गया था जूदेव सीडी कांड के साजिश के पीछे अमित जोगी की संलिप्तता हैं जिन्होंने आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए अपने पिता को मदद पहुंचाने की दृष्टि से जाल रचा था ताकि कांग्रेस को माइलेज मिल सके। और अब अतांगढ़ उपचुनाव टेप कांड में भी उनका नाम सामने आया है। 
        बहरहाल कांग्रेस 2003 में हुई टूट-फूट के झटके से उबर चुकी है और राजनीतिक परिस्थितियां भी काफी कुछ बदल गई है। कांग्रेस में वापसी के बाद विद्याचरण शुक्ल झीरमघाटी नक्सली (25 मई 2013) हमले में मारे गए तथा एनसीपी भी राज्य में अपना अस्तित्व लगभग खो बैठी। प्रदेश कांगे्रस फिर अपने मूल रुप में है किन्तु गहरे आपसी मनमुटाव और खेमेबाजी से वह एक बार फिर विभाजन की दहलीज पर खड़ी है। वर्ष 2003 में तब के मुख्यमंत्री अजीत जोगी से खफा विद्याचरण शुक्ल टूट के कारण बने थे तो अब वर्ष 2016 में प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल की वजह से अजीत जोगी पार्टी के उस दरवाजे पर खड़े है जो सीधा बाहर की ओर जाता है। यदि हाईकमान ने बाप-बेटे को पार्टी से बेदखल कर दिया तो यह तय है वर्ष 2018 में होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव में एक और कांग्रेस नजर आएगी जो जोगी के नेतृत्व की होगी। यानी 2003 जैसा दृश्य 2018 में भी नजर आ सकता हैं और तब चुनाव का परिणाम क्या होगा, यह अभी कहना तो मुश्किल है पर पार्टी के अंदर हो रहे इन घटनाक्रमों से भाजपा की बांछे जरुर खिली हुई हैं।
कांग्रेस में अंदरुनी झगड़ों का सतह पर आना नई बात नहीं है। उसका इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जिसमें प्रतिद्वंद्वी गुटों के नेताओं ने एक-दूसरे पर तेज हमले किए, आरोप-प्रत्यारोप से लहुलूहान किया। याद आता वर्ष 1982 में अविभाजित मध्यप्रदेश में जब कांग्रेस में शुक्ल बंधुओं का बोलबाला था, पार्टी के तत्कालीन महासचिव अजीज कुरैशी की शामत आ गई थी। मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री स्व. रविशंकर शुक्ल के संबंध में उन्होंने भोपाल में कथित अप्रिय टिप्पणी की थी। नतीजन जब एक दिन वे पार्टी के कामकाज के सिलसिले में रायपुर के लिए निकले तो रायपुर रेलवे स्टेशन पर ही विद्याचरण शुक्ल के समर्थकों ने उन्हें जूतों की माला पहनाई, झूमा-झटकी की और वापस लौटने विवश कर दिया। कांग्रेस भवन में पार्टी बैठकों में तो गाली-गलौज, मारपीट, तोड़फोड़ व एक-दूसरे पर कुर्सियों को उछालने की घटनाएं गुटबाजी के चरम की ओर इशारा करती रही है। और तो और यूपीए के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उनके रायपुर प्रवास के दौरान पार्टी के गुटबाजों ने नहीं बख्शा। भरी सभा में जोगी समर्थकों ने जबरदस्त शोरगुल और नारेबाजी करके अपने गुस्से का इजहार किया। अपनी ताकत दिखाने एवं अनुशासन को तार-तार करने का यह अप्रतिम दुस्साहस था। प्रदेश कांग्रेस फिर उसी दौर में है। अंतागढ़ उपचुनाव के करीब डेढ़ वर्ष बाद बाहर आई सीडी से यह स्थिति बनी है।
13 सितंबर 2014 को हुए अंतागढ़ उपचुनाव में कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी मंतूराम पवार ने नामांकन वापसी की तिथि बीतने के बाद 29 अगस्त 2014 को अप्रत्याशित रुप से चुनाव मैदान से हटने की घोषणा कर दी थी। प्रदेश कांगे्रस के लिए यह जबरदस्त झटका था विशेषकर भूपेश बघेल के लिए। वे ताजे-ताजे कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त हुए थे। जाहिर है मंतूराम पवार के मैदान से हटने से भाजपा प्रत्याशी भोजराज नाग को एकतरह से वाकओहर मिल गया। मजे की बात यह थी एक-एक करके अन्य दस निर्दलीय प्रत्याशी भी चुनाव समर से हट गए। केवल एक प्रत्याशी अंबेडकराइड पार्टी ऑफ इंडिया के रुपधर पुडो डटे रहे। भाजपा प्रत्याशी की रिकार्ड 50 हजार से अधिक मतों से जीत हुई। लेकिन इस घटना से लोकतांत्रिक परंपराओं को ऐसा आघात पहुंचा जिसकी कल्पना करना भी कठिन है। विधायक खरीद-फरोख्त की मिसालें राज्य में पहले भी रही है किन्तु गुटीय प्रतिद्वंद्विता में इस कदर नीचे गिरने की यह पहली घटना है। मंतूराम पवार जोगी समर्थक रहे है। अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित अंतागढ़ सीट से वे पहले भी चुनाव लड़ चुके थे। उन्हें कांग्रेस ने 5 बार टिकट दी। दो में वे हारे, दो जीते और एक में मैदान से हट गए। उपचुनाव में उनके मैदान छोड़ने के बाद यह आम चर्चा रही कि उन्हें भारी भरकम रकम देकर मैदान से हटाया गया और इस खेल में मुख्य रुप से अजीत जोगी के चिरंजीव व विधायक अमित जोगी की भाजपा से सांठगांठ रही।
       मंतूराम को ऐन वक्त पर मैदान से हटाने के पीछे पैसों के साथ-साथ जोगी समर्थकों को उद्देश्य भूपेश बघेल के नेतृत्व पर सवालिया निशान था। प्रदेश कांग्रेस के इतिहास में ऐसी घटना पहले कभी नहीं हुई। जाहिर है यह अनुशासनहीनता की पराकाष्ठा थी लेकिन जोगी पर कोई कार्रवाई इसलिए नहीं हो सकी क्योंकि साजिश का कोई प्रमाण नहीं मिला था। अब मंतूराम पवार भाजपा में है तथा इसी कांड की सीडी सार्वजनिक हुई है जिसमें लेन-देन सहित अमित जोगी, अजीत जोगी व मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के दामाद डा. पुनीत गुप्ता की कथित रुप से आवाज है, बातचीत है।
       इस सीडी के बाहर आते ही भूपेश बघेल ने यद्यपि मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह एवं भाजपा पर निशाना साधा किन्तु उनका लक्ष्य पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और उनके पुत्र विधायक अमित जोगी को दिन में तारे दिखाने का था। तारे उन्होंने दिखाए दिए है। 2003 में भाजपा विधायकों की खरीद-फरोख्त की कोशिशें उजागर होने के बाद जैसी स्थिति अजीत जोगी की हुई लगभग वैसे ही अब अंतागढ़ उपचुनाव टेप कांड से हुई है। उस समय केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें निलंबित कर दिया था, बाद में वे बहाल हुए। पार्टी ने उन पर पुन: विश्वास व्यक्त किया। और अब प्रदेश कांग्रेस ने उनके खिलाफ निष्कासन का प्रस्ताव पारित कर आलाकमान को भेजा है। गेंद पुन: केंद्र के पाले में है। फैसला करना उसके लिए कतई आसान नहीं क्योंकि अजीत जोगी का प्रदेश में व्यापक जनाधार है और इस समय तमाम गुटबाजी के बावजूद कांगे्रस बेहतर प्रदर्शन कर रही हंै, स्थानीय निकायों के चुनावों में उसकी सफलता इसका प्रमाण है। हालांकि भूपेश बघेल एवं नेता प्रतिपक्ष टी.एस. सिंहदेव आश्वस्त हैं कि जोगी को पार्टी से बाहर करने से संगठन की एकता मजबूत होगी और उसकी चुनावी संभावनाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
       बहरहाल अंतागढ़ उपचुनाव टेप कांड ने कई सवाल खड़े किए हैं। एक के बाद और भी टेप सामने आ रहे है। जिनकी विश्वसनीयता संदिग्ध है। तकनीकी जांच के बाद सत्य सामने आएगा पर उपचुनाव के करीब डेढ़ साल बाद हुए विस्फोट से किस तरह की कानूनी कार्रवाई संभव होगी, फिलहाल कहना मुश्किल है। उपचुनाव में निर्वाचित भाजपा विधायक भोजराज नाग के लिए भी शायद कोई चुनौती नहीं होगी। अलबत्ता मंतूराम पवार को पैसों से खरीदकर लालच देकर मैदान से हटाया गया, यदि यह आरोप सिद्ध हुआ तो कार्रवाई के लिए कानूनी आधार बनेगा वरना इस कांड को प्रदेश कांग्रेस के आंतरित संघर्ष का परिणाम कहा जाएगा जिसका उद्देश्य जोगी गुट का सफाया करना है। यह अलग बात है कि टेप प्रकरण जिसकी बुनियाद में जोगी पिता-पुत्र की कथित संलिप्तता का आरोप है, में भाजपा की कम से कम इतनी भूमिका तो है कि उसने कथित रुप से वांछित धन उपलब्ध कराया हैं। इस सौदेबाजी में पार्टी को फायदा इस मायने में था कि उसके प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित हो गई थी।
      इस प्रकरण में सर्वाधिक प्रखर भूमिका अवसरवादी नेता फिरोज सिद्दिकी की रही है। कभी अजीत जोगी एवं अमित जोगी के लिए रहस्यमय ढंग से काम करने वाले फिरोज जग्गी हत्याकांड में सजायाफ्ता हंै और फिलहाल जमानत पर है। आरोप है कि फिरोज सिद्दिकी ने प्रदेश अध्यक्ष के साथ सौदेबाजी की। परिणाम स्वरुप टेप सार्वजनिक हो गया। सिद्दिकी का दावा है कि उसके पास और भी टेप है जो कई नेताओं को बेनकाब करेंगे। इस दावे के परिप्रेक्ष में कुछ और टेप सामने भी आए। 11 जनवरी 2016 को एक ऐसे ही टेप से अजीत जोगी को बड़ी राहत मिलने की संभावना है। इसमें फिरोज सिद्दिकी एवं प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल के बीच जोगी संबंधी टेप के संदर्भ में हुई बातचीत रिकार्ड है जिसमें सिद्दिकी को पार्टी का महामंत्री बनाने का ऑफर दिया गया है। भूपेश बघेल ने स्वीकार किया है कि टेप में आवाज उनकी है किन्तु संदर्भ अलग है।
        प्रदेश कांग्रेस में भूपेश बघेल एवं अजीत जोगी के बीच घात-प्रतिघात के इस खेल में नुकसान जाहिर है पार्टी का हो रहा है। कांग्रेस हाईकमान के सामने इस मामले को लेकर विकट स्थिति है। भूपेश बघेल एवं टी.एस. सिंहदेव का दावा हैं कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के ''सफाई अभियान'' के तहत ही पार्टी के विरुद्ध काम करने वालों को पार्टी से बाहर किया गया है। यदि इस दावे में सच्चाई तो संभव है जोगी पिता-पुत्र को कोई राहत न मिले। लेकिन जोगी समर्थकों की जवाबी कार्रवाई की अनदेखी करना भी केंद्रीय नेतृत्व के लिए कठिन होगा। पर यह तय है, यह लड़ाई अब ऐसे पड़ाव पर पहुंच गई है जहां एकता की बातें दिवा स्वप्न की तरह है। लिहाजा आने वाले दिन प्रदेश कांग्रेस के लिए निश्चय ही महत्वपूर्ण रहेंगे।

Friday, January 8, 2016

किसान मरे नहीं तो क्या करें


छत्तीसगढ़ में ऋणग्रस्तता का कहर

-दिवाकर मुक्तिबोध

   लालसाय पुहूप। आदिवासी किसान। उम्र करीब 33 वर्ष। पिता - शिवप्रसाद पुहूप। स्थायी निवास - प्रेमनगर विकासखंड स्थित ग्राम कोतल (सरगुजा संभाग, छत्तीसगढ़)। ऋण - 1 लाख। ऋणदाता बैंक - सेंट्रल बैंक प्रेमनगर शाखा। बैंक का ऋण वसूली नोटिस - लोक अदालत में 10 हजार रुपये जमा। आत्महत्या दिनांक - 26 दिसंबर 2015। वजह - कर्ज न पटा पाने से मानसिक संताप। सबूत - सुसाइडल नोट। प्रशासन का पक्ष - जांच के बाद स्थिति स्पष्ट होगी।
     छत्तीसगढ़ में पिछले 4-5 महीनों में बैंक के कर्जदार किसानों की आत्महत्याओं का यह 36वां प्रकरण है। ऋणग्रस्तता की वजह से जिंदगी खत्म कर देने वाले और भी कई नाम है - मसलन - रेखराम साहू (धमतरी), केजूराम बारले (अभनपुर), गोकुल साहू (आरंग), मानसिंह (कोण्डागांव), रघुराम मंडावी (विश्रामपुर), शत्रुहन देवांगन (छुरिया), बलिराम सोनवानी (भाटापारा), जागेश्वर कुमार (कोरबा) आदि आदि। और तो और नए वर्ष की शुरुआत भी फांसी की घटनाओं से हुई। बेमेतरा जिले के सनकपाट गाँव के 55 वर्षीय किसान फिरंगी राम साहू ने फांसी लगाकर जान दे दी। इस सीमांत कृषक ने बैंक से कर्ज लिया हुआ था। नए वर्ष में आत्महत्या की दूसरी घटना मुंगेली जिले के बावली गाँव में घटी। शत्रुहन साहू भी कर्जदार था। 36 से 38 हुए ये आंकड़े चौकाने वाले है और राज्य में किसानों की बदहाली का जीता - जागता सबूत भी। बीते वर्ष यानी 2015 में छत्तीसगढ़ में वर्षा औसत से कम हुई फलत: धान की फसल लगभग चौपट हो गई। सरकार ने 117 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित करके व्यापक पैमाने पर किसानों की मदद के तथाकथित उपाय किए है लेकिन आत्महत्या की घटनाएं नहीं थम रही है। जान देने वाले अलग - अलग जिलों के हैं जिनमें आदिवासी किसान भी शामिल है। सभी सीमांत कृषक है। दो-ढाई एकड़ जोत के मालिक। प्राय: सभी ने खेती के लिए ऋण ले रखा है और उसे अदा न कर पाने व बैंकों के वसूली अभियान से संतप्त होकर जान दी है। जैसा कि आमतौर होता है - राज्य सरकार भूख से हुई मौतों एवं अकाल व सूखे के कारण होने वाली आत्महत्या की घटनाओं को स्वीकार नहीं करती लिहाजा छत्तीसगढ़ में अब तक किसानों की खुदकुशी के जितने भी मामले सामने आए है संबंधित जिला प्रशासन ने कारण कुछ और बताए है। फसल के चौपट होने एवं सरकारी व राष्ट्रीय बैंकों द्वारा ऋण वसूली के लिए बनाए गए दबाव को नहीं। कतिपय मामलों में ऐसा संभव है लेकिन यह भी अपनी जगह सत्य है कि सूखे की वजह से खेतों के सूख जाने तथा बैंक कर्ज की अदायगी में नाकामयाबी की वजह से जो मानसिक उत्पीड़न हुआ है, जान देने की एक बड़ी वजह यह भी है, जैसा कि परिजन बताते हैं।
 
राज्य विधानसभा में प्रतिपक्ष कांग्रेस ने किसानों की आत्महत्या की घटनाओं पर स्थगन प्रस्ताव जरुर पेश किया किन्तु इस मुद्दे पर न तो वह सदन में कोई दबाव बनी सकी और न ही विधानसभा के बाहर, शहर और गाँवों की सड़कों पर किसानों के हक में कोई प्रभावशाली प्रदर्शन कर सकी। अलबत्ता किसान नेताओं ने अपने स्तर पर अपनी जमात को इकट्ठा कर रखा है और उनका धरना-प्रदर्शन व आंदोलन लगातार जारी है।
       कांग्रेस ने केवल इतना किया उसने आत्महत्या की प्रत्येक घटनाओं पर अपनी जांच बैठायी। टीम गठित की जिसने क्षेत्र का दौरा किया और प्रभावितों से बातचीत की। प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने दावा किया कि उसने 53 मामलों की जांच कराई जिसमें तकरीबन हर मामले में किसान की आत्महत्या की वजह फसल चौपट होने के कारण गहरी निराशा या ऋण अदा नहीं कर पाने और परिवार के भरण-पोषण की चिंता हैं। कांग्रेस की जांच रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के राजनांदगाँव, बालोद, दुर्ग, बेमेतरा, धमतरी, रायपुर, कोण्डागाँव, बलौदाबाजार, भाटापारा आदि में किसान आत्महत्या की घटनाएँ घटी। अकेले राजनांदगाँव जिले में एक दर्जन से अधिक किसानों ने खुदकुशी की।
किसान आत्महत्या प्रकरणों के संदर्भ में आम आदमी पार्टी (आप) का भी यही मत है। प्रदेश संयोजक और कृषि विशेषज्ञ संकेत ठाकुर के अनुसार पार्टी के संज्ञान में 29 मामले आए। इनमें से 8 की विस्तार से जांच रिपोर्ट राज्य मानवाधिकार आयोग को सौंपी गई है लेकिन इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई। महाराष्ट्र के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि किसान आत्महत्या करता है तो इसके लिए सरकार जिम्मेदार है।
       1 नवंबर 2000 में मध्यप्रदेश से अलग होकर एक पृथक राज्य के रुप में अस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ न केवल प्राकृतिक संपदाओं से समृद्ध है वरन खेती किसानी के मामले में विशेषकर धान के उत्पादन में देश में अग्रणी रहा है। विपुल उत्पादन की वजह से उसे धान के कटोरे के रुप में विशेषीकृत किया जाता है बावजूद इसके कि सिंचाई सुविधाओं के सवाल पर वह अभी भी फिसड्डी है जबकि राज्य की भाजपा सरकार ने बीते महीने में ही अपनी बारहवीं वर्षगांठ मनाई है। यानी खेती में उसकी उत्पादकता मूलत: प्रकृति पर आश्रित रही है। इन 12 वर्षों में राज्य पहली बार सूखे की जबरदस्त मार झेल रहा है हालांकि वर्ष 2000-2001 में भी अल्पवर्षा की वजह से अकाल ने दस्तक दी थी लेकिन राज्य बनने की खुशी में इसे बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया। वैसे भी अकाल का प्रभाव प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप से शहरों में कम, गाँवों में ज्यादा नजर आता है। वह पूरी आबादी को समान रुप से प्रभावित नहीं करता। विश्वविख्यात अर्थशास्त्री एवं नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अमत्र्य सेन के अनुसार अकाल हमेशा एक विभाजक प्रक्रिया होती है। पीडि़त लोग अमूूमन समाज के सबसे निचले तबके के होते है - गरीब किसान, अधिकांश भूमिहीन खेतिहर मजूदर, सीमांत या छोटे किसान आदि। कदाचित ऐसा अकाल कभी नहीं हुआ जिसने हर एक व्यक्ति को समान रुप से प्रभावित किया हो। प्रो. अमत्र्य सेन के ये विचार कितने यथार्थपरक है इसका प्रमाण राज्य में सूखे एवं अकाल पीडि़त ग्रामीणों के आर्तनाद से जाहिर हैं। वर्ष 2000 में नया राज्य बनने की खुमारी के बावजूद अकाल की त्रासद घटनाओं में कोई कमी नहीं आई थी। तत्कालीन केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री एवं रायपुर लोकसभा के वर्तमान विधायक रमेश बैस ने छत्तीसगढ़ में करीब 4 लाख किसानों एवं कृषि मजदूरों के पलायन मुद्दा जोरशोर से उठाया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने अकाल से निपटने एवं राहत कार्यों के लिए केंद्र से 500 करोड़ की मांग की थी। राहत कार्य खुले पर अकाल का कोई ज्यादा हल्ला-गुल्ला नहीं हुआ। किसी किसान ने जान नहीं दी। लेकिन वर्ष 2015 में कम वर्षा के कारण जो सूखा पड़ा है वह इस मामले में भयावह है कि कृषि जीवन की बदहाली से तंग होकर छोटी जोत के किसान जान देने पर उतारु हैं और दे भी रहे हैं। इसकी तुलना यद्यपि अकाल की अन्य विभीषिकाओं से नहीं की जा सकती पर छत्तीसगढ़ का इतिहास भीषण हैं। सन् 1828-29 में तत्कालीन छत्तीसगढ़ जिले में घोर अकाल पड़ा था जब बिलासपुर में चावल 1 रुपये में 12 सेर यानी 10 गुना अधिक कीमत पर बिका था। जबकि सामान्यत: चावल 1 रुपये में 120 सेर मिलता था। मध्यप्रदेश शासन द्वारा 1973 में प्रकाशित अकाल संहिता में दिए गए विवरण के अनुसार वर्ष 1832-35 के दौरान फसलें अत्यंत खराब हुई थी जिसमें विभिन्न भागों के हजारों लोग अकाल मौत के शिकार हुए थे। पुन: 1885 के सूखे ने छत्तीसगढ़ में विभीषिका दिखाई। फिर 1893-1900, 1902-03, 1918-19, 1920-29, 1940-41 अकाल के त्रासद वर्ष रहे। 1965-1970 के दौरान अविभाजित मध्यप्रदेश में भारी अकाल पड़ा था जिसमें 43 में से 38 जिले बुरी तरह प्रभावित हुए थे। सौभाग्य से राज्य में पिछले तीन-चार दशक में प्रकृति का कोई ऐसा चित्र उपस्थित नहीं हुआ जिससे समस्त छत्तीसगढ़ समान रुप से प्रभावित हो।
नया राज्य बने डेढ़ दशक हो गए हैं पर छत्तीसगढ़ के किसानों की माली हालत में कोई खास परिवर्तन होता नजर नहीं आता। विशेषकर सीमांत कृषक वैसे ही परेशान है जैसे दशकों पूर्व थे बल्कि उनके जीवन में कठिनाईयां ज्यादा बढ़ी हंै, वह तरह-तरह के दबाव वह झेल रहा हंै। खेती के लिए ऋण, खाद, बीज आदि की सरकारी व्यवस्था हंै पर खेतों के लिए पानी कहां हंै? सरकार उद्योगों को पानी, बिजली और भूमि देने के मामले में अतिरिक्त उदारता बरतती है पर छोटी जोत के किसानों के जीवन को सुगम बनाने की न तो उसे चिंता हंै और न ही कोई उपाय समझ में आता है। अब यदि बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं से उसके कान खड़े हो जाए तो अलग बात है हालांकि इसकी संभावना भी नगण्य है क्योंकि खेती का अगला सीजन आते ही बात आई गई हो जाएगी और किसान ऋण के बोझ से नीचे और नीचे धंसता चला जाएगा।
     कहने के लिए कृषि सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसीलिए पिछले कुछ वर्षों से वह कृषि के अलग बजट विधानसभा में पेश करती रही है जिसमें कृषि की उत्पादकता बढ़ाने, रसायनों की मार से आहत भूमि की उर्वरा शक्ति को मजबूत करने खाद, बीमा, ऋण की व्यवस्था एवं सिंचाई के साधनों के विस्तार के उपायों के लिए बजटीय प्रावधान करती है। सरकारी व्यवस्थाओं से उत्पादकता तो बढ़ी है लेकिन खेती का रकबा तेजी से सिमटता जा रहा है। जाहिर है घाटे के सौंदे की वजह से खेती छोड़कर अन्य कार्यों में किसानों को दिलचस्पी बढ़ी है। किंतु छोटी जोत के करीब 30 लाख किसानों के पास खेती के अलावा कोई उपाय नहीं है। और यदि प्रकृति दगा दे जाए तो फाकेकशी निश्चित है। ऐसे में ऋण का दबाव, बीमारी, गरीबी और अन्य पारिवारिक कारण उसकी जान के ग्राहक बन जाते है। छत्तीसगढ़ में कम से कम वर्ष 2015 के रबी और खरीफ फसल सीजन में तो यही हुआ है।
आंकड़े बताते है कि देश में किसान और खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश अग्रणी है। छत्तीसगढ़ 5वें-6वें पर है। यह कहा जाता है कि आत्महत्या की ऐसी घटनाओं के लिए राज्य सरकार कैसे जिम्मेदार है? जवाब है- क्या सरकार की सीधी और नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती है कि वह ऐसे उपाय करें कि ताकि कोई भी व्यक्ति अकाल और भूख से न मरे और सभी को रोजी-रोटी के साधन आसानी से मुहैय्या हो। बड़ों एवं समृद्धों को छोड़ दें किंतु छोटी जोत के किसानों का अकाल की स्थिति में संरक्षण सरकार का दायित्व है और अनहोनी की स्थिति में इसकी जवाबदेही से वह बच नहीं सकती। उसके ऐसे उपाय किस काम के जो गरीब किसानों को मौजूदा हालातों से न उबार सकें। सिर्फ सिंचाई कर माफ करने या राजस्व वसूली को स्थगित रखने या राहत कार्य खोलने से उनका काम नहीं चलेगा। उन्हें ठोस उपाय चाहिए पर सरकार के नीति निर्धारकों की योजनाएँ कागजों पर भले ही लुभावनी नजर आए पर हकीकतन वे व्यावहारिता से कोसों दूर हैं।
        यह बात ठीक है कि ऋण माफी भी समस्या का स्थाई हल नहीं है। छोटी जोत के तमाम किसानों के खेतों तक नहरों का पानी पहुंचाना भी असंभव हैं लेकिन ऐसी व्यवस्थाएं तो की जा सकती है ताकि अवर्षा या अल्पवर्षा की स्थिति में खेतों को पानी मिल सकें। सिंचाई के छोटे-छोटे साधन मसलन डबरी, कुएं तथा छोटे-छोटे तालाबों का निर्माण, बरसात में पानी का संरक्षण आदि काफी कुछ मदद कर सकते हैं। इसके अलावा स्थायी रोजगार की व्यवस्था से भी स्थितियां बेहतर हो सकती हंै। वैसे भी छत्तीसगढ़ का किसान एक फसली धान लेने के बाद तो लगभग 6 महीने इधर-उधर के काम-धंधों में लग जाता या रोजगार के लिए सपरिवार पलायन कर जाता है। नया राज्य बनने के बाद यद्यपि पलायन का सिलसिला कम जरुर हुआ है पर खत्म नहीं। इसलिए सीमांत कृषकों एवं खेतिहर मजदूरों के लिए काम की व्यवस्थाएँ ऐसी होनी चाहिए जिसमें निरंतरता हो। तब शायद वह ऋण का भार बर्दाश्त करने की स्थिति में होगा और तब कम से कम इस वजह से तो आत्महत्या नहीं करेगा।