Tuesday, December 22, 2015

''सुजाता"" के बहाने

- दिवाकर मुक्तिबोध

6 दिसंबर 2015, रविवार के दिन रायपुर टॉकीज का ''सरोकार का सिनेमा"" देखने मन ललचा गया। आमतौर अब टॉकीज जाकर पिक्चर देखने का दिल नहीं करता। वह भी अकेले। लेकिन इस रविवार की बात अलग थी। दरअसल ''सुजाता"" का प्रदर्शन था। बिमल राय की सन् 1959 में निर्मित ''सुजाता"' के साथ कुछ यादें जुड़ी हुई थीं। सन् 1960 में हमने यह पिक्चर राजनांदगांव के श्रीराम टॉकीज में माँ-पिताजी और बहन के साथ देखी। पिताजी जिन्हें हम बाबू साहेब कहते थे, कुछ देर के लिए हमारे साथ बैठे, फिर बाहर निकल गए। घंटे - आधे घंटे के बाद फिर लौट आए। कवि, लेखक और पत्रकार के रुप में श्री गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म शताब्दी वर्ष अगले वर्ष यानी 13 नवंबर 1916 से शुरु हो जाएगा। उनके व्यक्तित्व और कृतित्च के विभिन्न पहलुओं पर बीते 50 सालों में काफी कुछ लिखा जा चुका है। उनकी कविताएं - कहानियां, उपन्यास, डायरी, आलोचनाएं, निबंध व अन्य विविध विषयों पर किया गया लेखन हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर है जिस पर दृष्टि, पुनर्दृष्टि, पुनर्पाठ, बिंबों, प्रतिबिंबों के नए-नए रहस्यों को खोजने, देखने-परखने, उद्घाटित करने तथा सामाजिक सरोकारों के साथ कुछ और नया खोजने का सिलसिला शताब्दी वर्ष में अधिक तेज हो जाएगा। पिताजी की जिन विभिन्न विषयों में गहरी रुचि थी उनमें विज्ञान और सिनेमा भी शामिल थे। विज्ञान पर विशेष आसक्ति पर सिनमा भी देखते थे। हमें याद हैं - हमने उनके साथ नागपुर में ''झांसी की रानी"" फिल्म देखी थी। सन् 1958 में हम राजनांदगांव आए। समय मिलने पर कभी-कभी वे टॉकीज जाकर फिल्म देखते थे। दो फिल्मों की याद है - ''अपना हाथ जगन्नाथ"" और ''सुजाता""। उनका सिनेमा पर लेखन बहुत सीमित है किन्तु यह उनकी अभिरुचि को दर्शाता है। तत्कालीन सिने उद्योग पर उनकी टिप्पणी ''दृष्टिकोण का दीवाला"" शीर्षक से 5 जनवरी 1941 में श्री भगवती चरण वर्मा की पत्रिका ''विचार"" में प्रकाशित हुई। एक सिने पत्रिका ''चित्रलोक"" के बारे में टिप्पणी व इसी पत्रिका में 27 जुलाई 1941 में छपी। दो फिल्में ''नगीना"" और ''नौजवान"" की समीक्षा एवं फिल्म निर्माताओं की योजनाओं पर एक लेख ''प्रतीक"" में सितम्बर 1951 में प्रकाशित हुआ। ये सभी वर्ष 2009 में राजकमल से प्रकाशित उनकी किताब ''शेष-अशेष"" में संकलित हैं। रविवार को सरोकार का सिनेमा में ''सुजाता"" को देखते हुए रह-रहकर पिताजी का स्मरण हो आया। प्रसंगवश फिल्म ''नगीना"" और ''नौजवान"" की समीक्षा यहां प्रस्तुत है -


'श्रेय' की राजनीति में निपट गया रायपुर साहित्य महोत्सव

-दिवाकर मुक्तिबोध

कुछ तारीखें भुलाए नहीं भूलती। याद रहती हैं, किन्हीं न किन्हीं कारणों से। रायपुर साहित्य महोत्सव को ऐसी ही तारीखों में शुमार किया जाए तो शायद कुछ गलत नहीं होगा। इसकी चंद वजहें है - पहली - 12 से 14 दिसंबर 2014 को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आयोजित साहित्य महोत्सव बेजोड़ था, अद्भुत था। दूसरी वजह - उस सरकार द्वारा आयोजित था जो दक्षिण पंथी विचारधारा से अनुप्राणित है। तीसरी वजह - इस आयोजन में इतना खुलापन था कि माक्र्सवादी विचारधारा से प्रेरित लेखकों, कवियों, कलाकारों एवं अन्य क्षेत्रों के दिग्गज हस्तियों ने इसमें शिरकत की और वैचारिक विमर्श में सक्रिय भागीदारी निभाई। चौथी वजह - सरकारी आयोजन होने के बावजूद विमर्श में सरकार का कोई दखल नहीं रहा। पांचवीं वजह - मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने समारोह का उद्घाटन किया लेकिन वे स्वयं एवं संस्कृति मंत्री मंच पर नहीं, दर्शक दीर्घा में बैठे क्योंकि वामपंथी लेखक ऐसा चाहते थे जिन्होंने समारोह की तैयारियों के दौरान इस तरह की प्रतिक्रिया जाहिर की थी। छठवीं वजह - समारोह अपने उद्देश्य में, राजनीतिक और साहित्यिक दृष्टि से सफल रहा। सातवीं वजह - भाजपा की रमन सिंह सरकार देश भर में यह संदेश देने में कामयाब रही कि वह असहमति का भी सम्मान करती है। आठवीं और मेरे विचार से समारोह की तारीखों को याद रखने की अंतिम वजह है - असहमति के सम्मान का सिर्फ एक साल, 12 से 13 दिसंबर 2014। इस वर्ष यानी 2015 में यह आयोजन नहीं होगा। कारण प्रदेश में सूखा। इसलिए वर्ष 2014 की यें तारीखें जेहन में रहेंगी और याद रखी जाएंगी कि छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय स्तर का कोई साहित्य-संस्कृति का अपूर्व समागम हुआ था जिसमें वामपंथी एवं दक्षिणपंथी लेखक बिरादरी ने एक साथ एक ही मंच साझा किया।
दरअसल इस वर्ष अल्प वर्षा के कारण प्रदेश में भीषण सूखा पड़ा है। ऋण ग्रस्त किसानों द्वारा आत्महत्या की बढ़ती घटनाएं स्थिति की भयावहता की ओर इशारा करती है। लिहाजा किसी भी प्रकार का जश्न मनाने के लिए यह समय उचित नहीं है, ऐसा माना जाता है। पर समाराहों से कन्नी कैसे काटी जा सकती है? प्रदेश में वे तो हो रहे हंै और अच्छे स्तर पर हो रहे हैं। मिसाल के तौर पर 1 नवंबर 2015 को सिर्फ एक दिन के लिए पूरे राज्य में स्थापना दिवस समारोह मनाया गया। यह अलग बात है कि पूर्व की तरह इस बार ज्यादा तामझाम नहीं किया गया। करोड़ों तो खर्च हुए पर पहले ही तुलना में कम। राज्य स्तरीय अलंकरण भी बांटे गए। विजेताओं को पुरस्कृत किया गया। संगीत समारोह भी हुआ। यानी सूखे के बीच में जश्न मना। चलिए और उदाहरण देखें - राजधानी में पहली बार खेलों के अंतरराष्ट्रीय आयोजन हुए। विश्व कप हॉकी लीग फायनल एवं आई.पी.टी.एल. (इंडियन प्रीमियर टेनिस लीग) टेनिस जिसमें विदेशी टीमों एवं खिलाडि़यों ने भाग लिया। नवंबर 2015 में हफ्ते-दस दिन चलने वाले विश्व कप हॉकी लीग का आयोजन भव्य और गौरवपूर्ण रहा। दिसंबर में लॉन टेनिस ने भीअपनी चकाचौंध बिखेरी। यह भी भव्य और महत्वपूर्ण आयोजन हुआ, छत्तीसगढ़ सरकार की मेजबानी में। और भी उदाहरण है जो यह जाहिर करते हैं कि शोक अपनी जगह पर है और समारोह अपनी जगह पर। जब ऐसी स्थिति है तो सवाल उठता है - साहित्य-संस्कृति का राष्ट्रीय समारोह क्यों नहीं? वह भी जब देश में असहिष्णुता पर अच्छी खासी बहस चल रही हो तथा साहित्य-संस्कृति के मनीषी इस मुद्दे पर अपनी राय पक्ष या विरोध में व्यक्त कर रहे हो, तब राज्य में साहित्य समारोह के बहाने क्या इस विषय पर चिंतन नहीं किया जा सकता था? संसद में बहस हो सकती है तो राज्य के सार्वजनिक मंच पर क्यों नहीं? क्या सरकार ने तय कर लिया था कि साहित्यिक आयोजन सिर्फ एक वर्ष होगा, हर वर्ष नही। इसकी क्या वजह? यदि ऐसा है तो धार्मिक आयोजन राजिम कुंभ प्रतिवर्ष क्यों? क्यों इस आयोजन पर प्रतिवर्ष 2 से 3 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं?
       दरअसल पिछले वर्ष समारोह के समापन के बाद ही तय हो गया था यह साहित्य महोत्सव पहला और आखिरी है। आयोजन इसलिए हुआ क्योंकि नौकरशाहों में कुछ ऐसे प्रखर बुद्धिजीवी थे जो चाहते थे सरकार को राजनीति से उपर उठकर साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में कुछ ऐसे कार्य करने चाहिए जिससे जनता के बीच अच्छा संदेश जाए और मुख्यमंत्री की छवि भी निखरे। इसी वजह से समारोह में वामपंथी विचारधारा के दिग्गज लेखकों, विचारकों व कलाकारों को भी आमंत्रित किया गया जिन्होंने सरकार का आमंत्रण न केवल स्वीकार किया वरन बाद में आयोजन की भूरि-भूरि प्रशंसा भी की। ऐसे लेखकों में प्रख्यात कवि व आलोचक अशोक वाजपेयी भी शामिल है। लेकिन वामपंथी विचारकों का एक वर्ग इसके खिलाफ था तथा उसने निमंत्रण स्वीकार करने वाले अपने सहविचारकों की खूब लानत -मलानत की। ऐसे लेखकों में प्रमुख है वीरेंद्र यादव व मंगलेश डबराल। वीरेंद्र यादव की प्रतिक्रिया देखिए - ''साहित्य संसार में रायपुर प्रसंग के गहरे निहितार्थ है। इसमें शामिल होने वाले लेखक भाजपा की उस सरकार के जनतांत्रिक होने को वैधता प्रदान कर रहे थे जो माओवाद के उन्मूलन के नाम पर छत्तीसगढ़ राज्य में असहमति की आवाजों और आंदोलनों का क्रूर दमन कर रही है। आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन की कारपोरेट लूट का संगठित अभियान जितना तेज रमन सिंह की सरकार के शासन में है, उतना पहले कभी नहीं था।''
अब मंगलेश डबराल की टिप्पणी - ''यह भाजपा सरकार का आयोजन है। यह क्यों हो रहा है, समझना कठिन है। दरअसल छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड जो तीन नए राज्य बने हैं, उनकी कोई सांस्कृतिक नीति नहीं है। छत्तीसगढ़ भौतिक रुप से सक्षम है लेकिन सांस्कृतिक तौर पर विपन्न। ऐसे में इस आयोजन का मतलब समझना मुश्किल है।''
         साहित्य समारोह के आयोजन के समर्थन में अशोक वाजपेयी ने अपने चर्चित स्तंभ 'कभी-कभार' में लिखा - ''किसी अंचल के शहरों जैसे जयपुर, लखनऊ, आगरा, अजमेर, बनारस, पटना में ऐसे साहित्यिक महोत्सव होते रहे है। लेकिन अधिकांश सरकार की पहल पर नहीं। ऐसे में रायपुर महोत्सव का सरकारी पहल पर होना अनूठा है। लोकतंत्र में हर सरकार की संस्कृति के प्रति जिम्मेदारी होती है। पर सरकार को संस्कृति के मसले को विचारधारा के ऊपर रखना चाहिए और दृष्टियों, शैलियों की बहुलता का सम्मान करना चाहिए।''
रायपुर महोत्सव पर प्रख्यात कवि विनोद कुमार शुक्ल की टिप्पणी बहुत सहज और सरल थी। उन्होंने कहा - 'कुछ तो हो रहा है' को कहना चाहूंगा - कुछ तो अच्छा होना चाहिए।''
तीन दिन और 53 सत्रों में चले रायपुर साहित्य महोत्सव के आयोजन पर वामपंथी विचारधारा के लोग ही गरजे- बरसे किन्तु, आश्चर्यजनक रुप से दक्षिण मार्ग के समर्थक लेखकों व साहित्यकारों ने खामोशी अख्तियार की। उन्होंने वामपंथियों की बहस में हस्तक्षेप नहीं किया। कोई एतराज नहीं जताया। कोई विवाद में नहीं उलझा। आयोजन आशा से अधिक सफल रहा तथा देश में इसकी अच्छी चर्चा हुई। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह वैसे ही सीधे-सरल राजनेता हैं। समारोह में वे स्वयं होकर लेखकों से एक-एक करके मिले, उनका कुशल-क्षेम पूछा। और मंच साझा न करके उन्होंने वामपंथी लेखकों की भावनाओं का सम्मान किया व राज्य में एक नई मिसाल कायम की। उनकी वैचारिक उदारता की छवि तो निखरी किन्तु आयोजन की निरंतरता को बनाए रखने के लिए वे न तो कठोरता से पेश आए और न ही प्रतिबद्धता दिखाई। राज्य में सूखा तो एक बहाना है, दरअसल साहित्यिक आयोजन, राजनीति और नौकरशाही के द्वंद्व का शिकार हुआ। भाजपा के अंदरखाने में यह चर्चा जोरदार हुई कि बड़ी संख्या में वामपंथी लेखकों को बुलाने की क्या जरुरत थी, क्यों इसे विवादास्पद बनाया गया? विचारधारा के विपरीत क्यों चला गया? कांग्रेस ने सवाल उठाया कि जब राज्य में नक्सली घटनाओं में बड़ी संख्या में आदिवासी मारे जा रहे हों एवं बिलासपुर नसबंदी कांड में दर्जनों महिलाओं की मृत्यु जैसी घटनाएं घटित हुई हों, किसान आत्महत्या कर रहे हों और इस वजह से राज्य में शोक का माहौल हो, तो साहित्य उत्सव क्यों होना चाहिए? नौकरशाही में भी श्रेय को लेकर खींचतान मची। यह कहा गया कि जनसंपर्क विभाग को मेजबानी करने की क्या जरुरत थी? यह संस्कृति विभाग का काम था। मुख्यमंत्री के सामने अपने को बेहतर साबित करने की कोशिश में साहित्य समारोह का आयोजन जनसंपर्क विभाग के आला अफसरों ने किया। जाहिर सी बात है, नौकरशाही के एक बड़े तबके ने आयोजन को पसंद नहीं किया लिहाजा इसकी निरंतरता खटाई में पड़ गई।
       बहरहाल सूखे की मार झेल रहे प्रदेश में साहित्य-संस्कृति की धारा किस तरह बहेगी, फिलहाल कहना मुश्किल है किन्तु यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी वर्ष में राज्य सरकार का धार्मिक अनुष्ठान ''राजिम कुंभ'' होगा अथवा नहीं। करोड़ों के खर्च का यह समारोह विगत वर्षों से नियमित रुप से हो रहा है। यदि अगले वर्ष 2016 में इसका आयोजन स्थगित रखा गया तो मानना होगा सरकार की समदृष्टि है। वरना साहित्य उसी खूंटी में टंगा नजर आएगा जहां कभी-कभार ही उसे हिलाया-डुलाया जाता है। और यह सवाल फिर गूंजेगा - ''पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है।''

Monday, December 7, 2015

यादें : जब मुक्तिबोध ने ट्रेन की जंजीर खींची

 - दिवाकर मुक्तिबोध

नाम - श्री कन्हैयालाल अग्रवाल। उम्र 93 साल। मुकाम - राजनांदगांव, छत्तीसगढ़। पीढ़ी दर पीढ़ी। पिछले करीब डेढ़ सौ वर्ष से। व्यवसाय - व्यापार। संस्थान-भारती प्रिंटिंग प्रेस एवं बुक डिपो। स्थापना - 19 अगस्त 1948 स्वास्थ्य - एकदम फिट। चुस्त-दुरुस्त। अभी भी अपने रोममर्रा के काम के लिए किसी के सहारे की जरुरत नहीं, खुद करते हैं।
      यह संक्षिप्त परिचय एक ऐसे व्यक्ति का है जो कट्टर राष्ट्रवादी हैं, चिंतक हैं और जिसने अपने व्यवसाय के हित में कभी कोई अनैतिक कार्य नहीं किए। कोई समझौते नहीं किए। इसलिए सदर बाजार स्थित उनकी प्रिटिंग प्रेस एवं दुकान 66-67 साल पहले जिस हालत में थी, अभी भी उसी हालत में है।
     श्री कन्हैयालाल जी का एक और परिचय है जो साहित्यिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण  है। वे साहित्यिक नहीं है पर साहित्य और साहित्यकारों से उन्हें प्रेम है। विशेष लगाव है। साहित्यिक बिरादरी में प्राय: रोजाना उठना-बैठना होता रहा है और वे मेरे पिता स्व. गजानन माधव मुक्तिबोध के अनन्य मित्र रहे हैं। आज की तारीख में संभवत: पिताजी के एकमात्र जीवित मित्र।
     सन् 1958 में पिताजी नागपुर के ''नया खून''  से विदा लेकर राजनांदगांव दिग्विजय कॉलेज में प्रोफेसरी करने आए थे। इसके पूर्व नागपुर में श्री शरद कोठारी ने उनकी मुलाकात कन्हैयालालजी से करवाई थी। हम सब भाई-बहन छोटे-छोटे थे और राजनांदगांव आने के बाद केवल इतना जानते थे कि पिताजी की मित्र मंडली में कन्हैयालालजी भी है। वे अक्सर हमारे किलापारा स्थित घर में आया करते थे। पिताजी के साथ हम भी उनके यहां जाया करते थे। विशेषकर स्कूल खुलने के दिनों में, जब कापी-किताबों की जरुरत पड़ती थी। इसके अलावा भी दूसरे दिनों में जब मर्जी हो, हम उनके यहां पहुंच जाते थे, साथ में माँ भी हुआ करती थी। चूंकि उनके बेटे-बेटियां हमारी ही उम्र के थे इसलिए हमारी दोस्ती एक अलग रंग की हुआ करती थी। यह रंग कभी हमारे यहां बिखरता था तो कभी उनके यहां। उस जमाने की दोस्ती जिसे अब 50-55 वर्ष हो गए, अभी भी कायम है।
      11 सितंबर 1964 को पिताजी गुजरे और राजनांदगांव से रिश्ता करीब-करीब टूट सा गया। भिलाई नगर और रायपुर में पढ़ाई लिखाई और बाद में नौकरी। इस चक्कर में आधी सदी कब बीत गई पता ही नहीं चला। सालों-साल राजनांदगांव भी नहीं जा पाए अलबत्ता आत्मीय संबंधों की महक हृदय में बनी रही। शहर भले ही छूट जाए लेकिन मन के किसी कोने में वह हमेशा जीवित रहता है तथा एक अनोखे सुख का अहसास देता रहता है। इसलिए सिर्फ काम के सिलसिले में राजनांदगांव प्रवास और बिना किसी से मिले, रायपुर लौट आने के बावजूद उसी ताजगी का एहसास जीवित होता रहा जो बचपन में हुआ करता था। हमारे वास्तव में खूब मजे के दिन थे।
       राजनांदगांव में मेरे लिए ऐसा कुछ नहीं था कि व्यक्तिगत संबंधों पर कोई संस्मरण लिखूं। वहां हमारे कुल जमा वर्ष थे सन् 1958 से 1964 यानी महज 6 साल। वह भी बचपन के 6 वर्ष। इसलिए कभी ख्याल नहीं आया कि पिताजी के मित्रों से, घनिष्ठ मित्रों से जो गिनती के थे, कोई संस्मरणात्मक बातचीत करनी चाहिए। इसकी एक और वजह थी उनके (पिताजी) के साहित्यिक मित्रों ने जिनमें श्री शरद कोठारी एवं रमेश याग्निक (दोनों स्वर्गीय) प्रमुख थे, काफी कुछ लिखा था। इंटरव्यू दिए थे जो पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। इसलिए मेरे लिए कोई गुंजाइश नहीं थी। पर सच तो यही है कि पत्रकार होने के बावजूद मैं इस बारे में सोच नहीं सका और समय की रफ्तार के साथ पिताजी के ये दोनों घनिष्ठ दुनिया से विदा हो गए।
     एक दिन राजनांदगांव प्रवास के दौरान एकाएक ख्याल आया - कन्हैयालालजी से मिलना चाहिए। उनके बारे में, उनके स्वास्थ्य के बारे में रायपुर में सरकारी नौकरी कर रहे उनके बड़े बेटे भारत अग्रवाल से जानकारी मिल जाती थी। वे स्वस्थ्य हैं , अभी भी दुकान का कामकाज देखते हैं। इसलिए उनके स्वास्थ्य के प्रति निश्चितता थी। चूंकि मन उनसे मिलने के लिए उमड़ा जा रहा था, लिहाजा हम चारों भाई बड़े भैया रमेशजी, दिलीप, गिरीश और मैं एक दिन उनके घर-दुकान पहुंच गए। गोरे चिट्टे और दुबले-पतले कन्हैयालालजी के प्रभावशाली व्यक्तित्व पर उम्र की कोई खरोंचे नहीं आई थी। अभी भी वैसे ही थे, ताजा दम। हल्की-फुल्की बातें हुई, कुछ यादें उन्होंने ताजा की। उनका स्नेह भरा आशीर्वाद लेकर हम रायपुर के लिए लौटे तो इस इरादे के साथ कि शीघ्र दुबारा राजनांदगांव जाकर कन्हैयालालजी से पिताजी के संबंध में लंबी बातचीत करेंगे।
      उम्र भले ही कितनी भी क्यों न हो जाए, जिंदगी की भाग-दौड़ कभी कम नहीं होती। सो राजनांदगांव जाने का मामला टलता रहा। आखिरकार नवम्बर 2015 को फिर हम चारों कन्हैयालालजी से मिलने राजनांदगांव पहुंच गए। हमारे लिए यह आश्चर्य की बात थी कि इसके पूर्व कन्हैयालालजी से किसी ने कोई इंटरव्यू नहीं लिया और न ही कोई बातचीत की। जबकि पिताजी के राजनांदगांव के मित्रों का पत्र-पत्रिकाओं में जहां कहीं भी जिक्र हुआ, कन्हैयालालजी भी उसमें नामांकित रहे हंै। सिर्फ नामांकित। यह वंचना शायद इसलिए क्योंकि कन्हैयालालजी साहित्यिक चर्चाओं में केवल श्रोता के रुप में उपस्थित रहते थे। बहस-मुबाहसे में उनकी भागीदारी नहीं हुआ करती थी। खुद कन्हैयालालजी का मानना था कि मुक्तिबोध के साहित्य पर वे क्या बोल सकते थे। लेकिन राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मसलों पर चलने वाले विमर्श में उनकी खूब भागीदारी रहती थी। इसलिए किसी के साथ संस्मरणों को साक्ष करने जैसी बात कभी नहीं बनी अलबत्ता अनौपचारिक बातचीत में वे पिताजी के साथ बिताए गए दिनों का जिक्र अवश्य किया करते थे। बहरहाल हमारे उनके साथ बातचीत महज आधे घंटे चली। इस आधे घंटे में उन्होंने पिताजी से संबंधित कुछ घटनाओं का जिक्र किया जो पिताजी की प्रकृति का आभास कराती है। ये यादें अनोखी हैं, अद्भुत है। उन्हीं की जुबानी संस्मरण के कुछ किस्से सुनिए -
*        मुक्तिबोध सन् 1958 में नागपुर से परिवार एवं साजो सामान के साथ राजनांदगांव आ रहे थे। पैसेंजर से। ट्रेन का नांदगांव में स्टॉपेज महज 1-2 मिनट का था। इतने कम समय में घर-घर गृहस्थी के सामान को उतारना संभव नहीं था। और तो और मुक्तिबोध जी को नींद लग गई है। राजनांदगांव स्टेशन आने पर एक सहयात्री ने उन्हें उठाया। मुक्तिबोध जी घबरा गए। किसी ने उन्हें सलाह दी ट्रेन के शुरु होते ही चेन खींच दीजिए। मुक्तिबोध ने ऐसा ही किया। ट्रेन 5-6 मिनट तक रुकी रही और इस बीच सामान नीचे उतर गया। लेकिन कुछ दिनों बाद मुक्तिबोध के नाम कोर्ट का नोटिस आ गया। अदालत में हाजिरी देने के निर्देश। पेशियां अटेण्ड करते-करते मुक्तिबोध परेशान। एक दिन उन्होंने मुझे ये परेशानी बताई। मैंने कहा चिंता ना करें। मैंने पता लगा जज दामले थे। लाँजी वाले मेरे मित्र के बेटे। लेकिन मैं उनसे इस विषय पर सीधी बात नहीं कह सकता था। एक दिन व्यापारिक कार्य से मैं लाँजी गया और दामले के यहाँ भोजन के दौरान उन्हें परेशानी बताई। नतीजा यह निकाला कि अगली ही पेशी में मामला खत्म हो गया। मुक्तिबोधजी ने चैन की सांस ली। मुझे भी अच्छा लगा कि मैं उनके काम आया।
*         एक और घटना है। मुक्तिबोध बहुत स्वाभिमानी थे। आर्थिक संकट से घिरे रहते थे किन्तु किसी से कहते कुछ नहीं थे। उनकी मदद के लिए मुझे एक उपाय सूझा। मैंने उन्हें 500 रुपये दिए और कहा दुर्ग जिले के सामाजिक अध्ययन पर एक किताब लिख दीजिए। मैंने उन्हें संदर्भ देखने कुछ किताबें दे दी। मुक्तिबोधजी ने कहा किताब तो लिख दूंगा पर उसमें मेरा नाम नहीं जाएगा। मैंने कहा मंजूर है। उन्होंने किताब लिखी और वह हीरालाल सोनबोईर के नाम से छपी। अपने लिखे पर दूसरे का नाम देखना सहज नहीं है। पर पैसों की दिक्कत के चलते मुक्तिबोधजी ऐसा लेखन किया करते थे।
*       मुक्तिबोध से पहली मुलाकात नागपुर में हुई, शरद कोठारी के साथ। दिग्विजय कॉलेज नया-नया खुला था। शरद कोठारी चाहते थे, मुक्तिबोध यहां आए। उन्होंने मुझे उनके बारे में बताया। कोठारी के साथ मैं भी कॉलेज प्रबंधन कमेटी का सदस्य था। राजनांदगांव जिले के निर्माता और तत्कालीन मध्यप्रदेश के पूर्व मंत्री किशोरीलाल शुक्ल अध्यक्ष थे। कोठारी निंश्चित थे, मैं कहूंगा तो शुक्ल ना नहीं करेंगे। नागपुर में मुक्तिबोधजी से मुलाकात के बाद मैंने शुक्लजी से बात की। बात बन गई। शुक्लजी ने मंजूरी दी और मुक्तिबोध दिग्विजय कॉलेज में लेक्चरर की नौकरी पा गए। उनका यहां आना कितना सार्थक रहा, यह सभी को ज्ञात है। उनका महत्वपूर्ण लेखन राजनांदगांव में ही हुआ। क्योंकि उनके जीवन में कुछ निश्चिंतता आई थी। अर्थभाव कुछ कम हुआ था।
*     किशोरीलालजी के बारे में कुछ कहूं। वे उदारवादी, सरल व्यक्ति थे। मुक्तिबोधजी माक्र्सवादी थे। उनकी गतिविधियों पर शासन के लोग नजर रखते थे। किशोरीलालजी से पूछा गया कि मुक्तिबोध अपने माक्र्सवादी चिंतन को छात्रों पर थोपने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं? शुक्लजी से रिपोर्ट मांगी गई। उन्होंने शासन को जवाब दिया - मुक्तिबोधजी अध्यापन के दौरान विचारों का घालमेल नहीं कर रहे हैं। वे अपने कत्र्तव्य के प्रति बहुत सचेत और ईमानदार हैं।
*         मुक्तिबोधजी लेखक और कवि हैं, हम इतना ही जानते थे। लेकिन इतने महान थे, इसका अहसास उनकी मृत्यु के बाद हुआ। उन्हें गुजरे हुए 50 साल से ज्यादा हो गए है लेकिन उनकी ख्याति उत्तरोत्तर बढ़ रही है। मुझे गर्व है कि इतने बड़े साहित्यकार मेरे मित्र हैं। राजनांदगांव में रहते हुए उनका मुझे भरपूर स्नेह मिला जो मेरे लिए जीवनभर की पूंजी है।
पिताजी की यादों में खोए कन्हैयालाल अग्रवाल ज्यादा कुछ नहीं कह पाए। लेकिन उनकी ऑखों में यादों के झिलमिलाते अक्स को देखा-पढ़ा जा सकता था। 93 की उम्र में घटनाओं को याद रखना कम बड़ी बात नहीं है। यह हमारा सौभाग्य है कि उनके जैसे प्रखर राष्ट्रवादी एवं उनके स्नेहिल परिवार से हमारे घनिष्ठ संपर्क रहे हैं और वे आज भी हैं।

Friday, December 4, 2015

न जोगी खारिज, न वोरा

-दिवाकर मुक्तिबोध
कांग्रेस बैठे-ठाले मुसीबत मोल न ले तो वह कांग्रेस कैसी? अपनों पर ही शब्दों के तीर चलाने वाले नेता जब इच्छा होती है, शांत पानी में एक कंकड़ उछाल देते है और फिर लहरे गिनने लग जाते हैं। छत्तीसगढ़ कांग्रेस में पिछले चंद महीनों से काफी कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। तीसरे कार्यकाल के ढाई साल देख चुकी रमन सरकार के खिलाफ उसका ऐसा आक्रामक रुप इसके पहले कभी देखने में नहीं आया। विशेषकर भूपेश बघेल के हाथों में प्रदेश कांग्रेस की कमान आने के बाद कांग्रेस की राजनीति में एक स्पष्ट परिवर्तन लक्षित है। बरसों से चली आ रही खेमेबाजी तो अपनी जगह पर कायम है पर आतंरिक द्वंद्व और गुटीय राजनीति के तेवर कुछ ढीले पड़े हैं। ऐसा लगता है कि प्रदेश कांगे्रस ने तीन वर्ष बाद सन् 2018 में होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव के लिए अभी से कमर कस ली है और एक सुनियोजित अभियान के तहत राज्य सरकार की नीतियों, उसके कामकाज के तौर-तरीकों, जनता से किए गए उसके वायदे, नीतियों के क्रियान्वयन में हो रही घपलेबाजी तथा आधारभूत संरचनाओं के निर्माण में भारी भ्रष्टाचार से संबंधित मुद्दे खड़े किए जा रहे हैं एवं जनता को सही संदेश देने के लिए सिलसिलेवार धरना प्रदर्शन, रैलियां एवं सभाएं की जा रही हैं। कुल जमा प्रदेश कांग्रेस विधानसभा के भीतर एवं बाहर एक दमदार विपक्ष की भूमिका का निर्वहन कर रही हैं ।
     
प्रदेश कांग्रेस में ऊपरी तौर पर नजर आने वाले दो स्पष्ट खेमे है। संगठन खेमे का नेतृत्व भूपेश बघेल एवं टीएस सिंहदेव करते हैं जिन्हें वयोवृद्ध नेता एवं राष्ट्रीय कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा का आर्शीवाद प्राप्त है। दूसरा खेमा पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का है जो संगठन खेमे से पिछले एक दशक से लड़ रहे हैं। गुटीय प्रतिद्वंद्विता के अनियंत्रित उफान की वजह से ही कांग्रेस पिछले तीन चुनाव हार चुकी है लेकिन अब चौथे के लिए फिलहाल सबक लेती दिख रही है। राज्य विधानसभा के चुनाव में अभी तीन वर्ष पड़े हुए हैं। काफी लंबा वक्त है इसलिए टीएस सिंहदेव द्वारा उछाले गए कंकड़ से राजनीति के अंत:पुर में जो लहरे उठ रही हैं उससे कोई बहुत ज्यादा नुकसान होने की संभावना नहीं है। अलबत्ता निश्चय ही उनका बयान गैरजरुरी था और इससे बाहृय तौर पर कांगे्रस में जो एकता नजर आ रही थी, उसे इससे झटका लगा है और तनाव का फिर  एक नया मोर्चा खुल गया है।
      टीएस सिंहदेव ने हाल ही में एक न्यूज चैनल को दिए गए इंटरव्यू में कह दिया कि मोतीलाल वोरा और अजीत जोगी के दिन लद गए हैं और अगले चुनाव में उनका नाम मुख्यमंत्री के रुप में प्रोजेक्ट नहीं किया जा सकता। उन्होंने इस दौड़ में भूपेश बघेल, चरणदास महंत, रविंद्र चौबे और सत्यनारायण शर्मा के साथ स्वयं को भी शामिल होना बताया। उनके इस बयान के बाद अजीत जोगी की प्रतिक्रिया स्वाभाविक ही थी। कांग्रेस में माहौल गर्म हो गया। अजीत जोगी ने कहा - ''टीएस सिंहदेव अपने मुंह मियां मिट्ठू बन रहे हैं। वे किसी खुशफहमी न रहे। राजशाही का दौर खत्म हो गया है। लोकतंत्र में किसका समय कब खत्म होता है जनता तय करती है। टीएस सिंहदेव, भूपेश बघेल, अजीत जोगी या मोतीलाल वोरा का समय कब खत्म होगा, यह भी जनता तय करेगी।''
    
कांग्रेस की राजनीति में यह वाकयुद्ध जारी है। पर यह अभी दोनों के ही बीच में है। कोई तीसरा, चौथा या पांचवां और दोनों खेमों के कांग्रेसी फिलहाल इस विवाद से दूर है। मोतीलाल वोरा ने भी सिंहदेव के विचारों पर कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं दी है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह विवाद ज्यादा तूल नहीं पकड़ेगा और शीघ्र शांत हो जाएगा लेकिन इसने प्रदेश कांग्रेस में एक नई बहस की शुरुआत तो कर दी है। सवाल है कि क्या कांग्रेस भी अपनी नीतियों में परिवर्तन करते हुए राज्य विधानसभा के आगामी चुनावों में मुख्यमंत्री के रुप में किसी को प्रोजेक्ट करेगी? पार्टी की मान्य परपंरा इसके खिलाफ है। कांग्रेस का अब तक का इतिहास रहा है कि आम चुनाव अथवा राज्य के चुनाव में वह किसी नाम को प्रोजेक्ट नहीं करती। चुनाव के बाद आलाकमान के निर्देश पर रायशुमारी की जाती है तथा बहुमत के आधार पर नेता का चयन किया जाता है। अगले वर्ष पश्चिम बंगाल सहित 5 राज्यों में चुनाव होने वाले है और उसके अगले वर्ष यानी 2017 में उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण चुनाव है। यानी अगले दो वर्ष पार्टी के लिए संभावनाओं से भरे हुए है।
     दरअसल बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों से कांग्रेस उत्साहित है। उसकी दृष्टि से परिणाम उसके लिए बेहतर रहे हैं जबकि सत्ता की प्रमुख दावेदारी रही भाजपा को पराजय के बाद अहसास हो रहा है कि मुख्यमंत्री का नाम प्रोजेक्ट न करके उसने गलती की। भाजपा अब पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों के चुनाव के संदर्भ में इस मसले पर विचार कर रही है। कांग्रेस में इस पर कोई गंभीर विचार-विमर्श नहीं है क्योंकि पश्चिम बंगाल में वह प्रमुख प्रतिपक्ष नहीं है। इसलिए उन राज्यों में जहां उसकी द्वितीय हैसियत नहीं है, उसे ऐसा करने की जरुरत नहीं है। उसे वहां बिहार की तरह अपना प्रदर्शन सुधारना है। लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में वह प्रमुख विपक्ष की भूमिका में है इसलिए नाम प्रोजेक्ट करना तार्किक कहा जा सकता है।
      लेकिन ऐसा करने से कांगे्रस के लिए खतरे ज्यादा है। क्योंकि वह पार्टी अनुशासन में भाजपा से बेहतर नहीं है। मिसाल के तौर पर देखें - सिंहदेव ने बयान क्या दिया विवाद का छोटा-मोटा ही सही, तूफान खड़ा हो गया। कल्पना कीजिए यदि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने वास्तव में किसी का नाम मुख्यमंत्री के बतौर प्रोजेक्ट किया तो क्या होगा? जब चुनाव की गंभीर तैयारियों के दौरान ही टिकट वितरण से लेकर चुनाव प्रचार तक आपस में तलवारें चलती हैं और सिपहसलार और प्यादें नापसंदगी व राजनीतिक दुश्मनी की वजह से एक-दूसरे को हराने की जुगत करते हैं, तब सोचा जा सकता है कि मुख्यमंत्री का नाम प्रोजेक्ट होने के बाद भीतरघात की शक्ल कितनी भयावह होगी? इसलिए वर्ष 2018 के राज्य विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस ऐसा कुछ नहीं करेगी जिससे उसकी संभावनाओं पर विराम लगे। अब सवाल है, टीएस सिंहदेव ने ऐसा विवादित बयान क्यों दिया? क्या इसके पीछे कोई खास वजह थी? स्थितियों को भांपने क्या हाईकमान की ओर से कोई संकेत था? या यों ही, बेखयाली में कह दिया ताकि जनता को पता चलें कि भावी मुख्यमंत्री की दौड़ में वे भी शामिल हैं। अंतिम बात ज्यादा सटीक नजर आती हैं।
     अब टीएस सिंहदेव के बयान का दूसरा पक्ष देखें। उन्होंने कहा मोतीलाल वोरा और अजीत जोगी के दिन अब लद गए। यानी अपनी निजी राय में उन्होंने इन दोनों को मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर कर दिया। मोतीलाल वोरा 85 के घेरे में है और चाल-ढाल से काफी अशक्त दिखते हैं किन्तु कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में उनके पैर अभी भी गहराई से जमे हुए हैं। इसलिए ऐन वक्त पर वे छत्तीसगढ़ में टपक पड़े तो हैरानी नहीं होनी चाहिए क्योंकि वे राज्य के कांग्रेसियों के सर्वमान्य है। उनका नाम आने पर सभी दावे-प्रतिदावे पस्त हो जाएंगे। इसलिए यह कहना है कि उनका समय बीत गया है, उचित प्रतीत नही होता। और जहाँ तक अजीत जोगी का सवाल है, वे सन् 2003 के चुनाव से ही दोबारा मुख्यमंत्री बनने की ख्याहिश पाले हुए हैं। सन् 2008 के चुनाव में तो उन्होंने अपनी सभाओं में स्वयं को मुख्यमंत्री के बतौर पेश भी किया। शारीरिक रुप से अशक्त होने के बावजूद उनके तेज में कमी नही आई है तथा उन्होंने अपने गुट को एकजुट और मजबूत रखा है। उन्हें सन् 2018 के चुनाव की प्रतीक्षा है। उनका प्रयास रहेगा, वे नहीं तो उनकी विधायक पत्नी मुख्यमंत्री बने। इसलिए उनके बारे में भी यह कहना कि उनके दिन समाप्त हो चुके है, ठीक नहीं है। फिर यह नहीं भूलना चाहिए कि कांगे्रस एक विस्मृत और मुख्यधारा से हट चुके नेता को भी अप्रतिम सौगात देकर जिंदा कर देती है। पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव इसके सर्वोत्तम उदाहरण है। इसलिए दोनों की भी संभावनाएँ जीवित हैं। कुल मिलाकर सिंहदेव विवाद का पटाक्षेप एक अप्रिय बहस के साथ समाप्त होने वाला है।