Friday, August 22, 2014

धोनी की कप्तानी पर इतनी हायतौबा क्यों?

- दिवाकर मुक्तिबोध
इंग्लैड के खिलाफ पांच टेस्ट मैचों की श्रृंखला में बुरी तरह पराजित टीम इंडिया, उसके कप्तान एमएस धोनी एवं मुख्यकोच डंकन फ्लेचर की आलोचना का गुबार धीरे-धीरे ठंडा पड़ता जा रहा है। बीसीसीआई ने फौरी तौर पर कदम उठाते हुए पूर्व कप्तान रवि शास्त्री को टीम इंडिया का निदेशक नियुक्त कर दिया है जिन्हें मुख्य कोच डंकन फ्लेचर रिपोर्ट करेंगे। इस महत्वपूर्ण फैसले से जाहिर है बतौर कोच फ्लेचर के अब गिनती के दिन रह गए हैं। संभव है इंग्लैंड के खिलाफ इंग्लैंड मेंं एक दिवसीय श्रृंखला के समाप्त होने एवं इसी अक्टूबर में वेस्टइंडीज के भारत दौरे के पूर्व वे पद से इस्तीफा दे दें। उनके इस्तीफे के बाद मुख्य कोच की जिम्मेदारी किसे मिलेगी , यह फिलहाल अबूझ सा सवाल है क्योंकि विदेशी कोच की नियुक्ति के मामले में विरोध के खासे स्वर उठते रहे हैं। यह स्वर तब और तेज हो जाते हैं जब भारतीय क्रिकेट टीम देश अथवा विदेश में श्रृंखलाएं गंवाती हैं।
         विश्व क्रिकेट में वेस्टइंडीज एवं आस्ट्रेलिया ही ऐसी टीमें रही हैं जिनकी बादशाहत लंबे समय तक कायम रही। लेकिन इन दोनों टीमें को भी किसी न किसी समय बुरे वक्त के दौर से गुजरना पड़ा है। प्राय: हर टीम के साथ ऐसा ही है। आस्ट्रेलिया में एशेज श्रृंखला गंवाने एवं श्रीलंका के खिलाफ श्रृंखला हारने के बाद ब्रितानी टीम और कप्तान एलिएस्टर कुक की खासी आलोचना हुई। यहां तक कि कुक की कप्तानी भी दांव पर लगी। लेकिन उसी कुक ने और उनकी उसी टीम ने भारत को पांच टेस्ट मुकाबलों में एकदम बौना साबित कर दिया। कभी टेस्ट एवं एक दिवसीय क्रिकेट की विश्व रैंकिंग में टॉप पर रही भारतीय क्रिकेट टीम इंग्लैंड दौरे में एक बार फिर ताश के पत्तों की तरह धराशायी हो गई। सन् 2011 के दौरे में भी मेजबानों ने धोनी की टीम को टेस्ट श्रृंखला में 3-0 से तथा एक दिवसीय में 4-0 से पराजित किया था। इंग्लैंड ने उसी इतिहास को पुन: शानदार ढंग से दोहराया है।
         इसका अर्थ है कि किसी भी टीम का प्रदर्शन स्थायी भाव नहीं है। हमेशा शीर्ष पर रहना लगभग नामुमकिन है क्योंकि यह खेल है वह भी क्रिकेट जिसमें अनिश्चितताएं ही उसकी विशेषता है। यानी हर विदेश दौरे या घरेलू श्रृंखलाओं में यह उम्मीद रखना कि टीम जीतेगी ही जीतेगी, खिलाड़ियों एवं कप्तान के साथ ज्यादती है अलबत्ता इस बात की जरूर चिंता की जा सकती है कि टीम का प्रदर्शन कुल जमा कैसा रहा? क्या उसने जमकर संघर्ष किया या बिना संघर्ष किए ही घुटने टेक दिए? इंग्लैंड में टीम इंडिया की निंदा के स्तर तक आलोचना इसलिए हो रही है क्योंकि श्रृंखला के अंतिम तीन टेस्ट मैचों में उसने विरोधियों के आगे आत्म समर्पण कर दिया। सिर्फ ढाई या तीन दिन में टेस्ट मैचों का समाप्त होना मुकाबले के एक तरफा होने का प्रमाण है। इसीलिए आलोचना स्वाभाविक है। कप्तान को हटाए जाने की मांग भी स्वाभाविक है। लेकिन भावनाओं में बहकर ऐसा कोई फैसला नहीं लिया जाना चाहिए जो भारतीय क्रिकेट के लिए और भी घातक हो। इस सन्दर्भ में यह नही भूलना चाहिए कि कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी, उपकप्तान विराट कोहली, चेतेश्वर पुजारा, शिखर धवन, राहुल शर्मा एवं टीम के अन्य बल्लेबाज एवं गेंदबाज कई अवसरों पर कमाल का प्रदर्शन कर चुके हैं और उन्होंने जिताऊ पारियां या गेंदबाजी की है। यह ठीक है कि इस बार भी इंग्लैंड की टेस्ट श्रृंखला उनके लिए दु:स्वप्न की तरह रही और वे अपनी योग्यता एवं क्षमता के अनुरूप प्रदर्शन नही कर सके। लेकिन केवल एक श्रृंखला में नाकामयाबी से उनकी पिछली सफलताएं खारिज नहीं की जा सकती। यह भी नही भूलना चाहिए कि विदेशी धरती पर भारत की सफलता का ग्राफ घरेलू के मुकाबले उज्जवल नहीं है। टीम इंडिया ने विभिन्न कप्तानों के नेतृत्व में विदेश में अब तक सिर्फ 38 टेस्ट मैच जीते हैं। इन आंकड़ों से जाहिर है टीम इंडिया के प्रदर्शन में निरंतरता का अभाव रहा है लिहाजा खिलाड़ियों की निंदा या आलोचना करके उन्हें हतोत्साहित करने के बजाए उन्हें फिर जीवट संघर्ष के लिए मानसिक रूप से तैयार करना चाहिए। इंग्लैंड का दौरा अभी पूरा नहीं हुआ है। एक दिवसीय श्रृंखला शुरू होने को है अत: उम्मीद की जानी चाहिए कि यह श्रृंखला जीतकर टीम इंडिया हार के घाव को भरने की कोशिश करेगी।
         जहां तक कप्तान का सवाल है, एमएस धोनी इसके पूर्व में भी कई अग्नि परीक्षाएं दे चुके हैं और वे इसमें खरे उतरे हैं। उन्हें हटाए जाने की मांग कोई पहली बार नही है। दरअसल विदेशों में हो या घरेलू पिचों पर, जब जब टीम इंडिया हारती है, एक ही मांग उठती है कप्तान को बदल डालो। धोनी कोई अपवाद नहीं है। पिछले इंग्लैंड व आस्ट्रेलिया दौरे में हुई पराजय के बाद भी धोनी से कप्तानी छिनने की बात उठी थी। आलोचना का सैलाब उठा था। कुछ आलोचनाएं स्वस्थ थीं किन्तु कुछ के पीछे आलोचकों के मनोभावों को, उनके दुराग्रहों को बखूबी समझा जा सकता था। इनमें प्रमुख रूप से पूर्व क्रिकेटर मोहिन्दर अमरनाथ एवं बिशन सिंह बेदी का नाम लिया जा सकता है। कुछ ने यहां तक कहा कि धोनी टेस्ट मैचों में प्लेइंग इलेवन के लायक भी नहीं हैं। जबकि टेस्ट मैचों में जीत के लिहाज से धोनी नम्बर वन भारतीय कप्तान है। उन्होंने अब 59 टेस्ट मैचों में टीम इंडिया की कप्तानी की है और उनमें से 27 टेस्ट मैचों में जीत मिली है। टेस्ट मैच में जीत के मामले में किसी भी भारतीय कप्तान से कहीं आगे हैं। इस फेहरिस्त में गांगुली (21 टेस्ट जीत) मोहम्मद अजहरूद्दीन (14) गावस्कर व पटौदी (9) द्रविड़ (8), बेदी (6), कपिल देव, सचिन तेंदुलकर, अजीत वाडेकर (4) धोनी से कहीं पीछे हैं। ऐसे में यह कहना कि वे प्लेइंग इलेवन के लायक भी नहीं है, पूर्वाग्रहपूर्ण है। दरअसल तमाम आलोचनाओं के बावजूद इस बात का किसी के पास जवाब नहीं है कि कप्तान के रूप में क्या धोनी का कोई विकल्प है? क्या कोई ऐसा खिलाड़ी है जो टीम इंडिया को धोनी से कहीं आगे ले जा सके? जाहिर है मौजूदा बल्लेबाजों में से किसी एक पर भी नजर नहीं ठहरती। उपकप्तान विराट कोहली के बारे में जरूर यह कहा जाता है कि वे धोनी के उत्तराधिकारी हो सकते हैं पर मैदान पर उनका मिजाज एवं परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की क्षमता पर प्रश्न चिन्ह है। फिर मौजूदा इंग्लैंड दौरे में उनके फार्म ने उन्हें कप्तान की रेस से बाहर कर दिया है। उन पर दांव खेला नहीं जा सकता लिहाजा धोनी को कप्तान बनाए रखना मजबूरी नहीं, आवश्यकता है। धोनी की अच्छी चमकीली सफलताएं उन्हें सर्वश्रेष्ठ कप्तान के रूप में प्रतिष्ठित करती हैं। अलबत्ता लीक से हटकर लेकिन बहुत हद तक अटपटे उनके नीतिगत फैसलों पर सवाल भी खडे करती है किन्तु उसके बावजूद इसमें शक नही कि धोनी एक प्रयोगधर्मी एवं विचारशील नेतृत्वकर्ता है जो मैदान जो मैदान में हमेशा शांत और संयमित रहता है। खिलाफ गए उनके फैसलों की आलोचना हुई लेकिन अटपटे निर्णयों ने सफलताएं भी दीं। लार्ड्स टेस्ट इसका ताजा उदाहरण है जिसमें ईशांत शर्मा की शार्ट पिच गेंदों ने कहर बरपाया। धोनी के निर्देश पर वे लगातार शार्ट पिच गेंद फेंकते रहे और उन्होंने 7 विकेट चटकाकर कीर्तिमान रचा। 18 साल बाद टीम इंडिया ने जीत का स्वाद चखा था और इसका श्रेय जाहिर है कप्तान की रणनीतिक कुशलता को जाता है। इसी सन्दर्भ में सन् 2007 के टी 20 विश्व कप को कौन भूल सकता है जब पाकिस्तान के खिलाफ खिताबी जंग में धोनी ने एक नामालूम से गेंदबाज जोगेन्दर शर्मा से अंतिम ओव्हर फिंकवाया था। इसी ओव्हर से टीम इंडिया टी 20 में विश्वकप चैम्पियन बनी। ऐसे बहुतेरे उदाहरण हैं जो धोनी को बतौर कप्तान शाबाशी का हकदार बनाते हैं।
       दरअसल हर कप्तान की क्रिकेट जिंदगी में ऐसे दौर आते हैं जब सफलता का ग्राफ धीरे-धीरे नीचे उतरने लगता है और इसके साथ ही उसकी बिदाई तय हो जाती है। चाहे वह कितना भी श्रेष्ठ बल्लेबाज या गेंदबाज क्यों न हो। अजीत वाडेकर, सुनील गावस्कर, बिशन सिंह बेदी, वेंकट राघवन, मोहम्मद अजहरूद्दीन, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली, अनिल कुम्बले जैसे कप्तानों के खातों में भी असफलताएं आई हैं, उनकी नेतृत्व क्षमता पर भी सवालिया निशान लगे, उन्हें आलोचनाएं भी झेलनी पड़ी और अंतत: उन्हें हटना पड़ा। धोनी भी अब इसी दोराहे पर खडे हैं। पर उनका लक्ष्य साफ है -2015 का विश्वकप। न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया में होने वाले इस एकदिवसीय अंर्तराष्ट्रीय क्रिकेट में खिताब की रक्षा करना। इसलिए ऐसा संकेत पहले भी दे चुके हैं कि वे क्रिकेट के तीनों फार्मेट में से किसी एक फार्मेट की कप्तानी छोड़ने पर विचार कर रहे हैं। जाहिर है यह टेस्ट क्रिकेट का फार्मेट ही होगा। लार्ड्स में जीतने के बाद उनका यह कहना कि वे अंतिम बार लार्ड्स में खेल रहे हैं, से स्पष्ट हो जाता है कि वे समय आने पर टेस्ट कप्तानी के दायित्व से मुक्त होंगे किन्तु मौजूदा परिस्थितियों में क्या भारतीय क्रिकेट कंन्ट्रोल बोर्ड ऐसी कोई जोखिम उठा सकता है? इसका जवाब फिलहाल नहीं में है। यानी धोनी यदि चाहे तो भी कप्तानी नहीं  छोड़ सकते क्योंकि यह टीम को मंझधार में छोड़ने जैसी बात होगी। टीम इंडिया को इंग्लैंड के बाद इसी दिसम्बर में आस्टेÑलिया का दौरा करना है लेकिन इसके पूर्व अक्टूबर में वेस्टइंडीज के खिलाफ घरेलू मैदानों में तीन टेस्ट एवं पांच एक दिवसीय खेलने हैं। इसलिए वेस्टइंडीज और आस्ट्रेलिया श्रृंखला तक नि:संदेह धोनी ही तीनों फार्मेट के कप्तान बने रहेंगे। अलबत्ता 2015 का विश्वकप धोनी के भविष्य के लिए निर्णायक साबित होगा। या तो उनका डंका बजता रहेगा या खामोश हो जाएगा। यानी आगामी विश्वकप उनके क्रिकेट करियर के लिए महत्वपूर्ण है।

Saturday, August 2, 2014

राजनीतिक सदमे से उबरने की कोशिश में ‘आप’


-दिवाकर मुक्तिबोध

      देश को वैकल्पिक राजनीति देने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी क्या फिर जनता की निगाहों में चढ़ पाएगी? लोकसभा चुनाव में रणनीतिक भूलों की वजह से पार्टी को न केवल पराजय झेलनी पड़ी वरन आम लोगों की उम्मीदों को भी धक्का लगा जो अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में राजनीति के शुद्धिकरण का सपना देख रहे थे। चुनाव में पराजय एवं आतंरिक कलह से उपजी टूट-फूट के बाद पार्टी नए सिरे से जनता के बीच खडेÞ होने की कोशिश कर रही है। 3 अगस्त को पार्टी ने जंतर-मंतर पर विशाल जनआंदोलन का ऐलान किया है। प्रमुख मांग है दिल्ली राज्य विधानसभा के चुनाव। विधानसभा निलंबित है और राष्ट्रपति शासन लागू है। पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल लेफ्टिनेंट गवर्नर से अनुरोध करते रहें हैं कि चुनाव यथाशीघ्र कराए जाएं। अब इसी मांग को लेकर पार्टी ने जनशक्ति की अपनी बुनियाद को पुन: टटोलने का फैसला किया है। 3 अगस्त को स्पष्ट हो जाएगा कि जनसमर्थन की उसकी चूलें हिली हैं अथवा नहीं? यानी वास्तविक स्थिति क्या है।
       दिल्ली राज्य विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को अपेक्षा से कहीं ज्यादा सीटें मिलीं थी। उसके 28 विधायक चुनकर आए किन्तु बहुमत के लिए कसर रह गई। फिर भी कांगे्रस के समर्थन से अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली में आप की सरकार बनी। कोई नई पार्टी अपने पहले ही चुनाव में सरकार बना लें, यह देश के राजनीतिक इतिहास की पहली घटना है। लेकिन उसके बाद जनता की अपेक्षाओं का बोझ, अह्म का टकराव एवं महत्वाकांक्षाओं के अतिरेक ने पार्टी को 6-7 महीने के भीतर ही लगभग शून्य की स्थिति में पहुंचा दिया है। लोकसभा चुनाव में पार्टी के 300 से अधिक उम्मीदवारों में से केवल 4 विजयी हुए जो पंजाब से है। पार्टी ने यद्यपि लोकसभा में प्रवेश जरूर किया है किन्तु वह आंतरिक द्वंद से जूझ रही है। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व पर सवाल खडेÞ किए गए हैं तथा पार्टी के वे तेवर ढीले पड़ गए हैं जो उसके अस्तित्व में आने के बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव तक नजर आ रहे थे। शीर्ष नेताओं में विचारों का टकराव अनेक बार सतह पर आया। इससे पार्टी को नुकसान हुआ तथा शाजिया इल्मी सहित कुछ वरिष्ठ नेताओं ने अलग राह पकड़ ली।
        लोकसभा चुनावों के पूर्व इस बात पर काफी बहस थी कि पार्टी कितनी सीटों पर चुनाव लड़ना चाहिए? राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना था कि ‘आप’ जमीनी हकीकत को समझे तथा क्षणिक सफलता से अति उत्साह में आकर 250-300 सीटों पर चुनाव न लडेÞ। उसे अपने प्रभाव क्षेत्र वाले दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब जैसे कुछ राज्यों में जोर-आजमाइश करनी चाहिए। लेकिन पार्टी ने दिल्ली चुनाव के फैसले को देश की जनता का फैसला माना तथा 300 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। पार्टी के लिए यही कदम आत्मघाती सिद्ध हुआ। नतीजों के बाद विवादों का जो बवंडर उठा वह अभी भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। मिसाल के तौर पर योगेन्द्र यादव जैसे बडेÞ नेता हरियाणा में इसी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव लड़ने के पक्ष में थे किन्तु केजरीवाल इससे सहमत नहीं हुए। पार्टी ने केवल दिल्ली एवं पंजाब के दो उपचुनाव में प्रत्याशी उतारने का फैसला किया है। उसकी मंशा इस बार बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता हासिल करने की है। इसीलिए उन्होंने लोकसभा चुनाव के बाद पहला बड़ा प्रदर्शन 3 अगस्त को करने का फैसला किया है।    
         अब सवाल है, क्या पार्टी को पहले जैसा जनसमर्थन हासिल है? दिल्ली की बात भले ही छोड़ दें लेकिन इतना तय है, अरविंद केजरीवाल ने देश की जनता को एक स्वप्न तो दिखाया था जो आर्थिक भ्रष्टाचार, राजनीतिक भ्रष्टाचार, नौकरशाहों की लालफीताशाही एवं महंगाई से बेहद त्रस्त थी तथा बदलाव चाहती थी। आम आदमी पार्टी के जनसरोकारों से लोग प्रभावित थे तथा उन्हें उम्मीद की किरणें नजर आने लगी थी। दिल्ली खास प्रभाव क्षेत्र तो था ही, बाकी राज्यों में भी आम आदमी पार्टी चर्चा के केन्द्र में थी। लेकिन राज्यों में ठीक से संगठन खड़ा नही हो पाया और कोई सबल नेतृत्व का भी अभाव रहा। इसी वजह से न तो जनता के बीच कोई लहर बन पाई और न ही चुनाव का कामकाज ठीक से संभाला जा सका। लोगों ने वोट नहीं किया और पार्टी लोकसभा में केवल एक राज्य तक सिमटकर रह गई। यह अति महत्वाकांक्षा, अति आत्मविश्वास और यथार्थवादी दृष्टिकोण न अपनाने का परिणाम था। निश्चय ही पार्टी ने लोकसभा चुनाव से सबक लिया है। पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने स्वीकार किया उनसे गलतियां हुई। खासकर दिल्ली की सत्ता छोड़ने का उन्हें मलाल रहा।
        दिल्ली विधानसभा के जब कभी चुनाव होगें पार्टी को आशातीत सफलता मिल पाएगी या नहीं, कहना मुश्किल है। लेकिन यह तय है आम आदमी पार्टी का जनाधार कमजोर पड़ गया है। उसमें अब पहले जैसी ऊर्जा नहीं रही। हालांकि केन्द्र में भाजपा के सत्तारूढ़ होने के बाद परिस्थितियों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। समस्याएं यथावत हैं और महंगाई बर्दाश्त के बाहर हो गई है। यानी आम आदमी पार्टी के पास जनता से जुडेÞ वे तमाम मुद्दे हैं जिसके जरिए उसने सफलता का स्वाद चखा था। लेकिन दिक्कत यह है कि जनता नेतृत्व के पलायनवादी रुख से आहत है।  ऐसी स्थिति में खोए हुए विश्वास को पुन: प्राप्त करना आसान नहीं।  राजनीतिक परिस्थितियां भी बदल गई हंै। केन्द्र की सत्ता के साथ-साथ भाजपा दिल्ली विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी है। यानी राजधानी में उसका दबदबा है। यदि चुनाव होते हैं तो बहुत संभव है, भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल जाए। पिछले राज्य विधानसभा चुनाव में वह बहुमत से सिर्फ 3 कदम दूर थी। उसके 33 विधायक चुनकर आए थे जबकि सरकार बनाने के लिए 36 की दरकार थी।
आम आदमी पार्टी ने अगले कुछ महीनों में प्रस्तावित 4 राज्यों के विधानसभा चुनाव से स्वयं को अलग कर सिर्फ दिल्ली तक सीमित रहने का फैसला करके ठीक ही किया।  दिल्ली में उसका संगठन सशक्त है। जनता अभी उससे पूर्णत: नाउम्मीद नहीं हुई है लिहाजा मुद्दों को लेकर जनता के साथ खडेÞ होने की उसकी कोशिशें रंग ला सकती है। अब देखना यह है कि 3 अगस्त को प्रस्तावित धरना प्रदर्शन कितना सफल रहता है। यह प्रदर्शन इस बात का संकेत होगा कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी का राजनीतिक भविष्य क्या है।