Tuesday, September 30, 2014

आलोक तोमर के बहाने

alok-tomar-media-दिवाकर मुक्तिबोध 
आलोक तोमर को मैं व्यक्तिगत रुप से नहीं जानता. औपचारिक परिचय का सिलसिला भी कभी नहीं बना. हालांकि वे एकाधिक बार रायपुर आए पर खुद का परिचय देने के अजीब से संकोच की वजह से उनसे कभी नहीं मिल पाया किंतु बतौर पत्रकार मैं भावनात्मक रुप से उनसे काफी करीब रहा. पता नहीं इस दृष्टि से वे मुझे कितना जानते थे, किंतु मैं यह मानकर चलता हूं कि वे मुझे इतना तो जानते होंगे कि मैं उन्हीं की बिरादरी का हूं, हमपेशा हूं.

बहरहाल इस बात का अफसोस बना रहेगा कि मैं एक प्रखर व तेजस्वी पत्रकार से रुबरु नहीं हो पाया. मैं उनकी प्रतिभा का उस समय से कायल था जब उन्होंने जनसत्ता, नई दिल्ली में कदम रखा था. निश्चय ही अपनी रिपोर्टिंग एवं विश्लेषणात्मक लेखों के जरिए जिन पत्रकारों ने अत्यल्प समय में अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाई उनमें आलोक तोमर महत्वूपर्ण थे.

प्रभाष जोशी ने न केवल उनकी प्रतिभा को पहचाना बल्कि उन्हें उडऩे के लिए पूरा आकाश भी दिया. आलोक तोमर ने उनके विश्वास का कायम रखा लेकिन बतौर प्रभाष जोशी वे और भी आगे बढ़ सकते थे. जनसत्ता में अपने विख्यात स्तंभ 'कागद कारे’ में उन्होंने एक बार अपने उन सहयोगियों का जिक्र किया हैं जिनमें अटूट संभावनाएं थी किंतु उन संभावनाओं को 'पॉलिटिक्स एंड ब्यूरोक्रेसी’ का ग्रहण लग गया. आलोक तोमर भी इनमें से एक थे.

दरअसल प्रभाष जोशी जी ने जो बात संकेतों के रुप में कही, उसका आशय यही था कि आलोक एवं जनसत्ता के कुछ अन्य युवा पत्रकार अंतत: व्यवस्था का दबाव बर्दाश्त नहीं कर सके. यदि वे और अधिक दृढ़ता दिखाते और दिग्भ्रमित न होते हुए तो यकीनन बहुत ऊंचे जाते. इतने ऊंचे कि लंबे समय तक कोई उन्हें छू भी नहीं पाता. फिर भी यह तो मानना पड़ेगा कि आलोक तोमर ने बहुत यश कमाया. उनके असामयिक निधन से निश्चित ही हिन्दी पत्रकारिता में एक विराट शून्य घिर आया है.

चूंकि आलोक से मेरा सीधा परिचय नहीं था अत: उनके व्यक्तित्व एवं सामाजिक सरोकारों पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा किंतु यह जरुर कह सकता हूं कि पत्रकारों की बिरादरी में वे बिरले थे. उनकी कलम में गज़ब का ओज़ एवं समदृष्टि थी जिसके बल पर वे बेबाकी से घटनाओं की चीरफाड़ किया करते थे. वे भूसे में से भी सुई ढूंढ निकालने की कूव्वत रखते थे. जनसत्ता सहित यत्र-तत्र प्रकाशित उनकी रिपोर्टस इस बात की गवाह है कि ऐसी कई सुइयां उन्होंने ढूंढ़ निकाली और खोजी पत्रकारिता में नये आयाम स्थापित किए. निश्चय ही उनके न रहने से प्रिंट मीडिया में ऐसी स्तब्धता छा गई है कि इससे उबरने में वक्त लगेगा. जब कभी मीडिया के सौंदर्यशास्त्र पर चर्चा होगी, आलोक तोमर सम्मान के साथ याद किए जाएंगे.

यहां आलोक तोमर के बहाने मीडिया के सामाजिक दायित्व एवं मीडिया के प्रति समाज के दृष्टिकोण पर केंद्रित कुछ मूलभूत बातों पर चर्चा करना जरुरी प्रतीत होता है.

यह भयानक त्रासदी है कि शब्दों के साथ जीने-मरने वाले बहुत जल्द भुला दिए जाते हैं. यह कहा जाता है, और इसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी है कि व्यक्तिश: कीर्ति मौत के बाद हासिल होती है. वे लोग सचमुच भाग्यवान है कि जिनके जीते जी उनके कार्यों का मूल्यांकन हो जाता है और वे इतिहास पुरुष का दर्जा पा लेते हैं. यद्यपि ऐसे लोग काफी कम होते हैं और पर होते जरुर हैं.

साहित्य, कला और संस्कृति सहित विभिन्न विधाओं में तकरीबन एक जैसी स्थिति है. सिर्फ मीडिया ही एक मात्र विधा है जहां बीते हुए कल को याद नहीं किया जाता. न लेखन को, न व्यक्ति को. जबकि साहित्य की तरह पत्रकारिता में भी स्थायी भाव होता है. यानी छपे हुए शब्दों की दुनिया का एक ऐसा हिस्सा जो सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों एवं घटनाक्रमों से हमें परिचित कराता है तथा भविष्य का संकेत भी देता है.

प्रख्यात कवि विनोद कुमार शुक्ल कहते हैं ''अखबार का सब कुछ लिखा हुआ, दूसरे दिन रद्दी नहीं होता और अखबार का कुछ लिखा हुआ ऐसा जरुर होता है जो कभी रद्दी नहीं होता”. मीडिया के महत्व को रेखांकित करने वाले विनोद कुमार शुक्ला अकेले नहीं है. समूचा समाज मीडिया को लोकतंत्र के संवाहक के रुप में सम्मान की दृष्टि से देखता है लेकिन समाज में मीडिया की इतनी महत्वपूर्ण उपस्थिति के बावजूद आमतौर पर मीडिया अध्येताओं को वह स्थान हासिल नहीं है जो साहित्य, कला, संस्कृति एवं सामाजिक सरोकारों से जुड़े मनीषियों को हासिल है. क्या वजह है इसकी? क्या महज इसलिए कि अखबारों में छपे शब्द अगले दिन बासी हो जाते है? किंतु बासी का भी तो अपना महत्व है. 

छत्तीसगढ़ में ग्रामीणों का मुख्य आहार है बासी भात. स्वाद के साथ-साथ पौष्टिकता से भरपूर. खैर, यह तो क्षेत्र विशेष की बात हुई पर मूल कारण है पत्रकारिता पर तात्कालिकता का प्रभाव. लेकिन जैसा कि विनोद जी ने लिखा है 'समय का इतिहास हमेशा होता है चाहे वह इतिहास में दर्ज हो या नहीं. अवशेष या खंडहर के रुप में उसकी उपस्थिति हो जाती है. समाचार पत्र तत्काल एवं त्वरित होकर एक दिनांक में दर्ज होता है, यह घटना एक दिन की दिनचर्या है या दिनचर्चा की घटना है. और इसके साथ ही विशेष जुड़ाव होता है. लेकिन इस विशेष जुड़ाव के बावजूद यह हैरत की बात है कि कार्यक्षमता की उम्र खो चुके अथवा जिंदगी से ही विदा हो चुके कलम के ये सिपाही गुमनामी के अंधेरे में पड़े रहते हैं.

करीब पौने दो सौ साल के भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में कितने ऐसे पत्रकार हैं, जिनके योगदान की चर्चा होती है? पत्रकारिता दिवस पर याद किए जाने वाले पत्रकार इने-गिने है, वे भी प्राचीन. मसलन गणेशशंकर विद्यार्थी, बाबूराव विष्णु पराड़कर, माखनलाल चतुर्वेदी, माधवराव सप्रे सहित कुछ और. आधुनिक पत्रकारिता के शीषस्थ भूले से भी याद नहीं किए जाते.

इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक ने अपनी मौत की खबर जीवित रहते ही लिख ली, पीछे एक ही काम छोड़ा तारीख भरने का. दरअसल वे इस आशंका से ग्रस्त थे कि उनकी मौत की खबर भी अखबारों में ठीक से छपेगी अथवा नहीं. इसलिए सारा इंतजाम उन्होंने खुद किया. यह है मीडिया की आंतरिक निष्ठुरता जिसमें किसी अखबार नवीश से संबंधित खबर को छापना गैर जरुरी और फालतू समझा जाता है. इसलिए यह माना जाना चाहिए कि मीडिया कर्मियों का केवल वर्तमान होता है, इतिहास नहीं.

लेकिन समाज इस बात को बेहतर समझता है कि मीडिया केवल बंद कमरे की खिड़कियों को नहीं खोलता बल्कि अंधेरे बंद कमरे में ऐसी रोशनी भी बिखेरता है जो जिसके माध्यम से समग्र विकास की राह आसान हो जाती है. लिहाजा रोशनी की मशाल थामने वाले पत्रकारों की कृतियों को भी उसी शिद्दत के साथ याद किया जाना चाहिए जैसा नामचीन कलाविदों, साहित्यकारों, संस्कृति कर्मियों, इतिहासविदों तथा अन्य विधाओं के पारंगतों को याद किया जाता है.

क्या देश-प्रदेश के मीडिया शिक्षा संस्थानों, पत्रकारिता विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में प्रखर पत्रकारों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित सामग्री शामिल है? क्या प्रभाष जोशी पाठ्क्रमों में है? क्या राजेंद्र माथुर या मायाराम सुरजन रायपुर व भोपाल के पत्रकारिता विश्वविद्यालय में पढ़ाए जाते हैं?

हिन्दी, अंग्रेजी व अन्य प्रादेशिक भाषाओं के और भी अनेक ऐसे पत्रकार हैं जिन्होंने समाज को नई दिशा दी है. क्या वे इस लायक नहीं है कि उन्हें पाठ्यक्रमों से शामिल किया जाए? क्या पत्रकारिता के छात्र इनसे प्रेरणा नहीं ले सकते? उन्हें इस अधिकार से वंचित क्यों किया जा रहा है?

आलोक तोमर ने अपनी दीर्घ पत्रकारिता के दौरान क्या ऐसा कुछ नहीं लिखा जिससे मील का पत्थर माना जाए और जो पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हो? जनसत्ता में सन् 1984 के दंगों की उनकी रिपोर्टिंग एवं पीडि़तों के दर्द का जैसा दृश्य उन्होंने खींचा क्या वह हृदयविदारक नहीं है और क्या उससे कुछ सीखा नहीं जा सकता? पत्रकारिता पाठ्क्रमों में पत्रकारिता के उद्भव एवं विकास के नाम पर क्या पढ़ाया जाता? केवल कुछ नामों का उल्लेख, थोड़ा बहुत परिचय. लेकिन उनके रचनाकर्म पर अध्यापन की जरुरत नहीं समझी जाती. जबकि सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचनाकर्म ही है जो समय, काल एवं परिस्थितियों का दस्तावेज होता है. अत: क्या नामों के उल्लेख मात्र से इतिहास के साथ न्याय हो पाता है?

दरअसल आज के वैचारिक अकाल की वजह से ऐसा है. मीडिया के शिक्षा संस्थान या ऐसे निजी संस्थाओं में जहां पत्रकारिता के प्रशिक्षण की व्यवस्था है, एक विषय के तौर पर राजेंद्र माथुर, मायाराम सुरजन, प्रभाष जोशी, पी. साईनाथ, आलोक तोमर सरीखे तेजस्वी पत्रकारों को शामिल किया जाना चाहिए. इससे पत्रकारिता के छात्रों को न केवल अपने पूर्ववर्तियों को जानने-समझने का मौका मिलेगा वरन उनके लेखन से भी वे कुछ न कुछ ग्रहण करेंगे. जाहिर है पत्रकारिता विश्वविद्यालय भी इस आक्षेप से बाहर निकालेंगे कि वे केवल डिग्रियां बांटते है, पत्रकार तैयार नहीं करते.
 

                                                             : ( मैंने यह लेख तीन वर्ष पूर्व लिखा था ) 

Friday, September 26, 2014

ऐसे में बेहतर था कार्यक्रम न होता

संदर्भ: मुक्तिबोध की 50वीं पुण्यतिथि

- दिवाकर मुक्तिबोध 
 देश के शीर्षस्थ कवि श्री विनोद कुमार शुक्ल की 75वीं वर्षगांठ मनाने क्या सरकारी आयोजन की दरकार है? वैसे शुक्ल पिछले वर्ष ही अपना 75वां पूरा कर चुके हैं। उन्हें इष्टमित्रों से जन्मदिन की बधाईयां भी मिलीं और छोटे-मोटे कार्यक्रम भी हुए। अब इसे समारोहपूर्वक मनाने की बात सामने आई है। विभिन्न क्षेत्रों में सुविख्यात एवं कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के अंतर्गत गठित हिन्द स्वराज शोध पीठ के अध्यक्ष कनक तिवारी ने राज्य शासन से अपील की है कि 15 जनवरी 2015 को राज्य सरकार एक वृहद कार्यक्रम आयोजित करके शुक्ल के जन्मदिन का सम्मान करें। 20 सितंबर को राजनांदगांव में स्व. गजानन माधव मुक्तिबोध की 50वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में कनक तिवारी ने मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से यह अपील की। संस्कृति विभाग के इस कार्यक्रम में संस्कृति मंत्री अजय चंद्राकर, स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल, लोक निर्माण मंत्री राजेश मूणत के अलावा स्वयं श्री विनोद कुमार शुक्ल भी मंच पर मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन करते हुए कनक तिवारी ने कहा कि चूंकि वे (तिवारी) पिछले वर्ष भयंकर हृदयाघात से पीड़ित थे अत: शुक्ल की हीरक जयंती शानदार ढंग से मनाई नहीं जा सकी। चूंकि विनोद कुमार जी देश के शीर्षस्थ कवियों में से एक है तथा मुक्तिबोध की परंपरा के प्रथम ध्वजवाहक हैं अत: राज्य सरकार को उनका जन्मदिन कायदे से एक; भव्य कार्यक्रम के जरिए मनाना चाहिए। कनक तिवारी की इस अपील पर मुख्यमंत्री ने सीधी स्वीकारोक्ति न करते हुए गेंद संस्कृति मंत्री अजय चंद्राकर एवं कनक तिवारी के पाले में डाल दी। चूंकि विनोद कुमार शुक्ल मंचस्थ थे अत: वे अपनी ओर से इस प्रस्ताव पर कोई टिप्पणी नहीं कर सके। जबकि यह जानना जरुरी है कि वे ऐसा चाहते हैं अथवा नहीं। वैचारिक विभिन्नताओं के चलते यह कोई आवश्यक नहीं है कि हर साहित्यिक कवि या कलाकार सरकार का कोई ऐसा आतिथ्य स्वीकार करें। छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है और कवि विनोद कुमार शुक्ल कम से कम दक्षिणपंथी विचारधारा के तो नहीं ही हैं। इसीलिए उनकी राय जानना जरुरी है कि राज्य सरकार की पेशकश, बशर्ते वह की जाए, उन्हें मंजूर होगी अथवा नहीं। वैसे रमन सिंह सरकार ने मानवतावादी एवं वामपंथी विचारधारा के कवि मुक्तिबोध की 50वीं वर्षगांठ उनके कर्म क्षेत्र राजनांदगांव में मनाकर विचारों का सम्मान करने की जो पहल की, वह स्वागत योग्य है। यह अलग बात है कि राजनांदगांव में संस्कृति विभाग का यह कार्यक्रम सुपर फ्लाप रहा। 20 सितंबर को शहर में लगभग दिनभर हुई तेज बारिश को कोई बहाना नहीं बनाया जा सकता। दरअसल संस्कृृति विभाग ने यह आयोजन इतनी हड़बड़ी में किया कि निमंत्रण पत्रों पर उन प्रमुख वक्ताओं के नाम भी नहीं छापे जा सके जिन्हें कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था। पटना से प्रख्यात कवि अरुण कमल, सागर से युवा आलोचक पंकज चतुर्वेदी, भोपाल से सुधीर रंजन, रायगढ़ से प्रभात त्रिपाठी, रायपुर से विनोद कुमार शुक्ल एवं राजेन्द्र मिश्र, मुक्तिबोध पर केन्द्रित वैचारिक विमर्श एवं काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किए गए थे। जाहिर है अंतिम समय तक ये नाम तय नहीं हो पाए थे लिहाजा उन्हें कार्ड में स्थान नहीं मिला। चूंकि कार्यक्रम सुनियोजित नहीं था अत: वह स्तरीय भी नहीं बन पाया। दोपहर चार बजे उद्घाटन सत्र की यह हालत थी कि राज्य के तो छोड़िए राजनांदगांव के भी साहित्यकार, कलाधर्मी मौजूद नहीं थे। मुख्यमंत्री ने संबोधित किया दिग्विजय महाविद्यालय के प्राध्यापकों एवं छात्रों को जिनकी संख्या अत्यल्प थी। सुबह के कार्यक्रम में वर्षा ने बाधा डाली, कनात उखड़ गए, सभा स्थल पर पानी भर गया और पूरी विचार गोष्ठी चौपट हो गई। शाम के कार्यक्रम में खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय द्वारा तैयार की गई ‘अंधेरे में’ की नाट्य प्रस्तुति देखने के लिए इने-गिने लोग मौजूद थे। सोचा जा सकता है कि लोगों की इस कदर कम उपस्थिति से आमंत्रित वक्ता एवं कलाकार कितने मायूस हुए होंगे। सवाल उठता है कि क्या कार्यक्रम को जानबूझकर फ्लाप किया गया? यह आशंका इसलिए है कि राज्य सरकार को राज्य गठन के बीते 13 वर्षों में यह याद नहीं आया कि मुक्तिबोध छत्तीसगढ़ के हंै तथा उनके लेखन का सर्वोत्तम समय इस राज्य में बीता है। उनके नाम पर एक-दो फुटकर आयोजनों के अलावा ऐसा कोई काम नहीं हुआ जो चिरस्थायी हो। राजनांदगांव के ‘त्रिवेणी’ को हम इसलिए नहीं कह सकते क्योंकि यह अकेले मुक्तिबोधजी का स्मारक नहीं है, साथ में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी एवं बलदेव प्रसाद मिश्र भी है। इस एक मात्र यादगार के अलावा उनके नाम पर न तो किसी विश्वविद्यालय में शोध पीठ है और न ही उनके साहित्य के अनुशीलन की पहल हुई है। हालांकि राज्य के विश्वविद्यालयों में साहित्य, पत्रकारिता और संस्कृति के उन्नयन के नाम पर गठित तमाम शोध पीठ सफेद हाथी साबित हुए हैं। इसी संदर्भ में एक बात और स्मरणीय है कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने सन् 2008 में मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कहानी ‘ब्रम्हराक्षस का शिष्य’ के फिल्मांकन को मंजूरी दी थी किन्तु यह मंजूरी राजनीति के भंवरजाल में ऐसी फंसी कि निकल ही नहीं सकी। ऐसी स्थिति में यह सोचना स्वाभाविक है कि क्या राजनांदगांव का आयोजन औपचारिकता को निभाने के लिए किया गया? यह बिना सोचे-समझे, बिना किसी तैयारी के इसलिए कर दिया गया क्योंकि स्वर्गीय कवि को देशभर की साहित्यिक बिरादरी उनकी 50वीं पुण्यतिथि पर शिद्दत से याद कर रही है। यदि सचमुच प्रतिष्ठा के अनुरुप कार्यक्रम आयोजित करने की सरकार की मंशा थी तो बेहतर होता समय लेकर, पूरी तैयारी के साथ आयोजन किया जाता जिसमें शहर एवं राज्य के साहित्यप्रेमियों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाती। पिछले कुछ कार्यक्रमों एवं राजनांदगांव के कार्यक्रम को देखकर ऐसा लगता है कि संस्कृति विभाग बहुत हड़बड़ी में है तथा वह आनन-फानन में राज्य में सांस्कृतिक क्रांति लाना चाहता है। पर जाहिर है कला एवं संस्कृति का उन्नयन इस तरह नहीं होता। 
           अब फिर लौटते है, उद्घाटन समारोह पर। 1 जनवरी 1937 को राजनांदगांव में जन्मे शुक्ल अगले वर्ष 77 के हो जाएंगे। अत: उनके 77 वें को समारोहपूर्वक मनाने में किसे क्या आपत्ति हो सकती है? लेकिन क्या यह जरुरी है कि मंच से संस्कृति मंत्री और सरकार की तारीफ के कसीदे काढ़ते हुए कवि का जन्मदिन मनाने सरकार से याचना की जाए? क्या राजधानी रायपुर एवं राज्य के साहित्यकार, साहित्यप्रेमी, संस्कृति कर्मी, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक संस्थाएं इतनी समर्थ नहीं है कि वे अपने बीच के महाकवि की वर्षगांठ मना सके? सरकार खुद होकर पहल करे तो बात अलग है पर यह तो सरकार के आगे झोली फैलाने जैसी बात है? क्या विनोद कुमार शुक्ल जैसे संवेदनशील व्यक्ति को इस ‘याचना’ से धक्का नहीं लगा होगा? मंच पर मौजूद वे संकोच से गड़ नहीं गए होंगे? क्या संचालक ने सरकार से निवेदन करने के पूर्व उनकी रजामंदी ली थी? यकीनन ऐसा कुछ नहीं हुआ होगा। निश्चय ही इसे कवि पर एकाधिकार जताने एवं सत्ता के साथ नजदीकियां गांठने की कवायद के रूप में देखा जा सकता है।

Wednesday, September 3, 2014

कविताएं

यों कविताएं मैं नहीं लिखा करता। न पढ़ने में बहुत रूचि है और लिखने का तो प्रश्न ही नहीं। लेकिन जिंदगी के दौर में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जब कविता खुद-ब-खुद अपना रास्ता ढूंढ लेती हैं। कुछ ऐसा ही हुआ। अलग-अलग समय में पता नहीं कैसे मैने दो-चार कविताएं लिख डाली। न किसी को दिखायी और न ही उन्हे छपने योग्य माना। सालों बाद एक दिन कागजों के ढेर को अलटते-पलटते ये कविताएं हाथ लगीं। सोचा और कहीं न सही, इन्हे अपने फेसबुक वॉल पर डाल दूं। सो देख लीजिए। शायद पसंद आ जाए।
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अपने सूरज के लिए
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नंगे, भूखे, बेसहारों
नियति को
अब तो ठोकर मारो
तुम्हारे सीने पर
उनका महल टिका है
अनंत काल से।
हिलना नहीं
हिलना नहीं
कानों में निरंतर
जहर घोलती आवाजें
और
खून की लकीरें खींचते
चाबुक
तुम्हारे हिलने का
उन्हे
कितना डर है
खुद तुम्हे नहीं मालूम।

गहरी-गहरी सांसें
लेने से अब
काम नहीं बनेगा
उठो
प्रयत्नपूर्वक उठो
वे तुम्हें
ठोकरों पर रख लेंगे
बस चले तो
तुम्हारी
एक-एक हड्डी गला देंगे
अपने सूरज के लिये

तुम्हारा घर
(बशर्ते तुम उसे घर कहो)
अंधेरे में
जुगनुओं से
रोशन होता है
छप्पर फाड़कर
झिलमिलाती रोशनी
तुम्हारे लिये
हर दिन
एक नया सूरज है
काश,
तुम उसे पहचानते।

आस-पास
चारों ओर
हवा के कण-कण में
बिखरे
सूरज के ये
अनगिनत चेहरे
विकराल
बेबस और कुरूप
दर्द की लकीरों का
सौन्दर्य समेटे
खामोशी को
आत्मसात किये
जिन्दगी में
हजार-हजार बार
मर रहे हैं।

जीने-मरने की
यह
उबा देने वाली पीड़ा
अपने सूरज को
पहचानने की
अंतिम कोशिश में
ठोकरों पर ठोकरें मार रही है
अपने सूरज को अब
उनकी हथेली पर
दे मारो
यही मौका है
जीने का
जिन्दगी बनाने का।

- दिवाकर मुक्तिबोध


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मै कभी मर नहीं सकता
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उंची उंची इमारतों एवं
टूटी-फूटी झोपड़ियों के
मध्य
जो
गहरी खाई है
क्रंदन और आहों से अटी हुई
उसमे मैं छिपा बैठा हूं
सदियों से
अपना सिर छिपाये
कछुए की तरह
खाल में- घुसा हुआ
अलमस्त

बाहर तलवारें चल रही हैं
हाहाकार मचा हुआ है
लोग चिल्ला रहे हैं
कलप रहे हैं
खिलखिला रहे हैं
पर मेरी पीठ मजबूत है
काफी मजबूत

सदियां बीत गयीं
चांद-सितारे अपनी जगह
अटल हैं
खाल से उठाकर
मैं उन्हे कनखियों से
निहार लेता हूं कभी-कभी
निश्चिन्त हो
फिर खाल में घुस जाता हूं
मुझे कोई फिक्र नहीं
सचमुच।
जब तक सिर पर यह
आसमान है
मै हूं, गरीबी है
अमीर हैं, गरीब हैं
फिर फिक्र किस बात की
तुम तकदीर नहीं बदल सकते
तुम्हारी कोशिश में दम नहीं
इस खाई को कौन
पाट सकता है
मै आश्वस्त हूं
मै कभी नहीं मर सकता।।

- दिवाकर मुक्तिबोध

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लौट आओ कामरेड
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सुनो कामरेड
उठो और लौट आओ
बस्तर के घन जंगलों से
तुम्हारा लौटना ही ठीक है
लौटोगे तो शेष जिंदगी
सांसों में बंधी रहेगी
अस्तित्व तुम्हारा जताती रहेगी
कि तुम कभी जिंदा थे
विचारों की दुनिया में
खूब जिंदा
देश-दुनिया में तुम-तुम थे
तुम्हारी आशाएं, आकांक्षाएं, महत्वाकांक्षाएं
मनुष्य को मनुष्य समझने में
समझाने में
तुम्हारा दिन तुम्हारी रात
केवल तुम-तुम
खौफ और आतंक से दूर
तुम्हारी पहिचान
तुम्हारी जिंदगी।
लेकिन इंसानी फितरत
विचारों पर सवार अविचार
सब तरफ सौदेबाज
लूट-खसोट
आदर्श और सिद्धांतों
का जाम पीते हुए
क्रांति की बातें
तुमने भी की।
है तुम्हे एहसास
40 बरसों में तुमने क्या खोया?
किस दुनिया में भटक रहे हो
क्या-क्या करते रहे हो
क्या तुम नहीं जानते?
एक दिन पेड़-पौधे भी नहीं पहिचानेंगे तुम्हे।
बातें नहीं करेंगे
दोस्ती नहीं दिखाएंगे
ढंक जाएगी
तुम्हारी देह
गिरे हुए पत्तों से
सूख जाएगी तुम्हारी देह
सूखे पत्तों सी
झर जाएगा तुम्हारा अस्तित्व
स्पर्श मात्र से
इसीलिए लौट आओ कामरेड
यदि कुछ सांसें चाहते हो
ताकि जिंदा रह सको
नई क्रांति के लिए
बंदूक की नली से नहीं
आदमीयत के भरोसे।

लोग पूछते हैं
सालों साल बस्तर में
तुमने क्या किया?
कैसे जिया, कितनों को दी जिंदगी
सरगुजा में तुम क्या करते रहे
क्यों अपनी देह पर
कांटे उगाते रहे
सीना छलनी करते रहे
तुमने कोशिश की
दरख्तों से शहद टपके
महुए की खुशबू
जीवन को खूब मदहोश करे
तुम्हारे अधनंगे दोस्त
अज्ञानता की गहरी कंदराओं
से बाहर निकले
चांद को देखें
सूरज देखें
नीले आकाश को छुए।
शोषण को मारे लात
शोषकों को धिक्कार।
लेकिन इसके लिए
नहीं चाहिए थी बंदूक
नहीं चाहिए था गोला-बारूद
इंद्रावती का स्नेहल स्पर्श
जीवन में मिठास घोलने काफी था
बशर्ते तुम
अपनी राह न बदलते।

लेकिन अब और नहीं कामरेड
तुम भटक गए हो
बहक गए हो
तुम्हारे सिद्धांत, तुम्हारे आदर्श
तुम्हारी कमजोर हथेलियां।
फिसल गए तुम
आतंक के हाथों तुम क्लीन बोल्ड हो गए
कितना दुर्भाग्य
कैसी विडम्बना।
सफर पर निकले थे
हमसफर तलाशने । कारवां बनाने।
निरपराध, मासूम जिंदगियां
तुम्हारे गले में
तख्तियां बनकर टंग गई।
कोर्ट में हांका लगा
मानवता के हात्यारों
हाजिर हों।

इसलिए कामरेड
लौट जाओ
कोई नया घर तलाशो।
ताकि तुम्हारी देह सुरक्षित रहे।
उस पर कैक्टस नहीं
गुलाब उगे।
जंगल महक उठे
नए विचारों की खुशबू से।
इंसान और इंसानियत के
पर्याय बनो तुम कामरेड
कह दो उन्हे जो
मासूमों का रक्त बहाते हैं,
तुम्हारी आड़ लेकर।
गला काटते हैं, आंखे निकालते हैं।
हाथ-पैर टुकडे-टुकड़े
कितने निर्मम, कितने नृशंस
माओ का नाम जपते हैं।
क्रांति की बात करते हैं
ऐसे हत्यारों से पीछा छुड़ाओ
तुम कामरेड
अपने दामन को और दागदार होने
से बचाओ तुम कामरेड।
तुमसे उम्मीद
तुमसे आशा
इसलिए लौट आओ कामरेड
बेहतर है लौट आओ।

- दिवाकर मुक्तिबोध
 

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Tuesday, September 2, 2014

ऐसी फजीहत दुबारा न हो

-दिवाकर मुक्तिबोध   
 छत्तीसगढ़ प्रदेश कांगे्रस के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ, उस दौर में भी नहीं जब छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश का एक हिस्सा था। राज्य विधानसभा के किसी चुनाव, उपचुनाव में पार्टी द्वारा घोषित अधिकृत प्रत्याशी नामांकन वापसी की तिथि के एक दिन पूर्व नाम वापस ले ले और पार्टी को डूबने के लिए मंझधार में छोड़ दे, हैरतअंगेज है और दु:खद भी। यह राजनीति का वह स्याह चेहरा भी है जो आर्थिक प्रलोभन के लिए मूल्यों के साथ समझौते में विश्वास रखता है। राज्य के अंतागढ़ उपचुनाव में कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी मंतूराम पवार द्वारा नाम वापस लेने की घटना राजनीति के इसी चरित्र की ओर संकेत है। प्रदेश कांगे्रस के लिए यह घटना स्तब्धकारी है। इससे भाजपा को अंतागढ़ में एक तरह से वाकओव्हर मिल गया है। क्योंकि पवार के अलावा डमी उम्मीदवार के रूप में उनकी पत्नी ने नामांकन भरा था वह भी खारिज हो गया।  कांग्रेस अब हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं कर सकती। अंतागढ़ बिना लडेÞ ही हाथ से जा चुका है।
            पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के निकट रहे मंतूराम पवार ने ऐसा क्यों किया, यह कांगे्रस के लिए शोध और सोच का विषय है। ऐसी कौन सी परिस्थितियां थीं जिससे इस आदिवासी नेता को ऐसा कदम उठाने के लिए विवश होना पड़ा? क्या वे अपनी जीत के प्रति आश्वस्त नहीं थे? क्या उन्हें लगता था कि वे  फिर चुनाव हार जाएंगे? अगर ऐसा था तो वे टिकिट लेने से ही इंकार कर सकते थे? लेकिन उन्होंने दृढ़तापूर्वक ऐसा नहीं किया। सवाल है कि क्या कांगे्रस ने भी उन पर जबरिया दांव खेलकर गलती की? क्या लगातार तीन बार पराजित प्रत्याशी को पुन: मैदान में, वह भी उपचुनाव में जो प्राय: सत्ताधारी दल के लिए आसान रहता है, टिकिट देना कांगे्रस की मजबूरी थी? क्या मंतूराम के अलावा और किसी योग्य प्रत्याशी के नाम पर पार्टी ने विचार करना जरूरी नहीं समझा? आखिरकार हारे हुए को पुन: उम्मीदवार बनाने के पीछे वास्तविक कारण क्या थे? राजनीतिक नासमझी या अति आत्मविश्वास या फिर एकाधिकारवाद? दरअसल यह गुटीय राजनीति का परिणाम है। पार्टी के बडेÞ नेता अजीत जोगी कह चुके हैं टिकिट फायनल करने से पूर्व उनसे या वरिष्ठतम नेता मोतीलाल वोरा से राय नहीं ली गई। अगर यह सच है तो यह गुटीय प्रतिद्वंदिता एवं संगठन पर एकाधिकारवाद का उदाहरण है। बहरहाल इस घटना की वजह से कांगे्रस ने अपनी साख को थोड़ा सा और खुरच दिया है। पिछले विधानसभा चुनाव में पराजय की टीस से भी शायद कही ज्यादा यह घटना उसे चुभेगी, चुभनी भी चाहिए क्योंकि इससे  पूर्व किसी चुनाव या उपचुनाव में किसी उम्मीदवार ने पार्टी को ऐसा घाव नही दिया था जैसा मंतूराम ने दिया है।
    अब जैसे कि खबरें आ रही हैं, मंतूराम भाजपा में शामिल हो सकते हैं। इससे यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि नाम वापसी की घटना आकस्मिक नहीं है। मंतूराम ने अपने राजनीतिक भविष्य का अनुमान लगाते हुए बहुत सोच समझकर यह फैसला किया होगा। उन्हें मालूम था, नामांकन वापसी के बाद वे पार्टी में नही रह सकेंगे। वे अनुभवी राजनीतिज्ञ है इसलिए उन्होंने अपनी दिशा तय करते हुए इतना बड़ा कदम उठाया। ऐसा लगता है कि मंतूराम की डावांडोल मन:स्थिति को भांपते हुए भाजपा ने अपने चालें चलीं। इसे भाजपा के प्रबंधन कौशल का कमाल माना जाना चाहिए कि उसने बाजी के बिछते ही असली मोहरा पीट दिया और कांगे्रस को मात दे दी। यानी मंतूराम को इतने गुपचुप तरीके से ‘ट्रेप’ किया गया कि कांग्रेस को हवा तक नहीं लगी। उन्हें ‘ट्रेप’ करने के लिए कैसे-कैसे प्रलोभन दिए गए होंगे, इसका खुलासा देर सबेर होना तय हैं। भाजपा भले ही इस बात से इंकार करती रहे कि मंतूराम मामले में उसकी कोई भूमिका नहीं है और घटना कांग्रेस में आंतरिक कलह का परिणाम है लेकिन नाम वापसी के अंतिम दिन, 30 अगस्त को एक को छोड़ सभी 10 निर्दलीय प्रत्याशियों का मैदान से हटना स्वाभाविक घटना नही है। जाहिर है रणनीतिकारों द्वारा यह कोशिश की गई कि भाजपा के पक्ष में निर्विरोध की स्थिति बन जाए। लेकिन अम्बेडकराइट पार्टी आफ इंडिया के रूपधर पुड़ो के चुनाव में डटे रहने की वजह से  यह संभव नहीं हो सका। निश्चय ही यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नही है।     
              प्रदेश कांगे्रस ने मंतूराम पर कार्रवाई करते हुए उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया है। अब संगठन को इस बात पर विचार करना होगा कि उससे आखिर गलती कहां हुई? पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने अपनी निकटता के बावजूद मंतूराम को पुन: प्रत्याशी बनाए जाने का विरोध किया था। खुद मंतूराम चुनाव लड़ने के बहुत इच्छुक नहीं थे।  जब कोई प्रत्याशी इस मानसिकता में हो तो उस पर नेतृत्व की मेहरबानी किसलिए? दूसरी गलती यह भी हुई कि डमी प्रत्याशी के रूप में पवार की पत्नी से नामांकन भराया गया। यदि उनके स्थान पर किसी और से फार्म भरवाया गया होता तो मंतूराम के मैदान छोड़ने के बावजूद पार्टी चुनावी रेस में बनी रहती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पवार दंपत्ती ने पार्टी को ऐसा झटका दिया जो उसके लिए चुनावी राजनीति की सबसे बड़ी दुघर्टना है।     
    इस समूचे घटनाक्रम से प्रदेश कांगे्रस के अध्यक्ष भूपेश बघेल की स्थिति कमजोर हुई है। वैसे भी प्रदेश कांगे्रस कार्यकारिणी को लेकर वे पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के निशान पर हैं। प्रदेश कमेटी में अपने समर्थकों को संतुलित प्रतिनिधित्व न मिलने से आहत जोगी ने अपना पक्ष पार्टी हाईकमान के सामने रखा है। चूंकि इस मामले में पुनर्विचार की संभावना है अत: जोगी खेमा उत्साहित है लेकिन मंतूराम पवार के मैदान छोड़ने से फिर आरोप लग रहे हैं कि खेमे के दबाव की वजह से मंतूराम ने नामांकन वापस लिया ताकि भूपेश बघेल की स्थिति हाईकमान के सामने कमजोर पडेÞ तथा उनकी नेतृत्व क्षमता पर प्रश्न चिन्ह लगे। चूंकि इन आरोपों का कोई आधार नहीं है लिहाजा इसे राजनीतिक शरारत मानना चाहिए किन्तु यह तय है कि इस घटना से भूपेश बघेल मुश्किल में पड़ जाएंगे। जहां तक प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उनके कामकाज का प्रश्न है, वह काफी असरदार रहा है। अपने पूर्ववर्तियों के मुकाबले उन्होंने ज्यादा दमखम के साथ जनता के मुद्दे उठाए हैं। राशन कार्ड नवीनीकरण एवं बिजली दरों में वृद्धि दो ऐसे प्रमुख प्रश्न थे जिस पर पार्टी ने प्रदेश में मजबूत आंदोलन खड़ा किया और विधानसभा में भी सरकार को परेशानी में डाला। यानी परफार्मेस की दृष्टि से भूपेश बघेल के नेतृत्व में प्रदेश कांगे्रस कमेटी ने बेहतर करने की कोशिश की है। यदि इसे रिपोर्ट कार्ड माने तो बघेल के नेतृत्व को मंतूराम घटना के बावजूद कोई खतरा नहीं है। फिर भी प्रदेश कांगे्रस को इस घटना से सबक लेना चाहिए।