Friday, December 23, 2016

चिकित्सा में पी. पी. पी. विचार करें सरकार

-दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं को निजी हाथों में सौंपने के राज्य सरकार के फैसले पर बहस की पर्याप्त गुंजाइश है, किंतु दुर्भाग्य से ऐसा कुछ होता नहीं है। जनकल्याणकारी योजनाएं चाहे केन्द्र की हों या राज्य सरकार की, वे वैसी ही होती हैं जैसा प्राय: सरकारें चाहती हैं, इसमें जनविचारों की भागीदारी कतई नहीं होती जबकि कहा जाता है सरकारें जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। यदि सभी नहीं, तो क्या कुछ योजनाओं पर प्रबुद्ध नागरिकों, विशेषज्ञों से विचार-विमर्श नहीं किया जा सकता? जाहिर है न नौकरशाही इसकी इजाजत देती हैं और न ही राजनीति क्योंकि यहां सवाल श्रेय का, श्रेष्ठता का एवं अहम् का होता है। बहरहाल पिछले दिनों की एक खबर के मुताबिक छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य के सभी 27 जिलों में बच्चों एवं माताओं के लिए अस्पताल बनाने एवं उन्हें पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी के तहत निजी हाथों में सौंपने का फैसला किया है। सरकारी खबर के अनुसार भवन एवं आवश्यक सभी सुविधाओं की व्यवस्था सरकार करेगी। बाद में उनके संचालन की जिम्मेदारी निजी उद्यमियों को सौंप दी जाएगी, ठीक वैसे ही जैसा कि राजधानी रायपुर में करीब 15 बरस पूर्व एस्काटर््स हार्ट सेंटर के मामले में हुआ। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के कार्यकाल में एस्काटर््स का रायपुर में पदार्पण हुआ और छत्तीसगढ़ को हृदय रोग से संबंधित पहला अस्पताल मिला जिसके लिए सरकार ने लगभग 300 करोड़ रुपए खर्च किए। यह अलग बात है कि गरीबों विशेषकर गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों की मुफ्त हृदय चिकित्सा की जिन शर्तों पर एस्कार्ट्स को अस्पताल सौंपा गया था, उसका सतत् उल्लंघन होता रहा और सरकार मूकदर्शक बनी रही। अब इस अस्पताल को अपने अधिकार में लेने सरकार प्रयत्न कर रही है। पता नहीं वह कब सफल होगी। 
    बहरहाल जोगी के जमाने के इस असफल प्रयोग पर अब भाजपा सरकार काम कर रही है। हालांकि घोषणा के बावजूद अभी इस दिशा में कुछ नहीं हुआ है। योजना के अनुसार सरकार अस्पतालों के लिए इमारतें बनाने, उसे वातानुकूलित करने, आवश्यक मशीनें एवं उपकरणों की व्यवस्था करने, पैथ लैब बनाने आदि पर करीब 300 करोड़ रुपए खर्च करेगी। अस्पताल तैयार होने के बाद इन्हें निजी संचालकों को सौंप दिया जाएगा। शर्तें क्या होंगी इसका खुलासा नहीं हुआ है पर यह तय है गरीबों के मुफ्त इलाज की शर्त अवश्य होगी। सरकार की तरफ से निगरानी की व्यवस्था क्या होगी? यह भी स्पष्ट नहीं है। क्या इन अस्पतालों की संचालन कमेटी में सरकार और जनता का कोई प्रतिनिधि होगा, इसका भी पता नहीं। अलबता इस योजना जो मुख्यत: गरीब तबके के लिए है, की सफलता ऐसे ही सवालों पर निर्भर है। 
छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सुविधाओं पर बात करें तो स्थिति निराशाजनक ही कही जाएगी। हालांकि शासन ने स्मार्ट कार्ड के जरिए 50 हजार रुपए तक की मुफ्त चिकित्सा की व्यवस्था कर रखी है। लेकिन यह नाकाफी है क्योंकि विभिन्न कारणों से जन स्वास्थ्य की समस्याएं ज्यादा विकराल हैं। शहरों, ग्रामीण अंचलों विशेषकर आदिवासी इलाकों में प्रत्येक वर्ष मलेरिया, डायरियां आदि बीमारियों से होने वाली मौतों में कोई कमी नहीं आई है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों का बुरा हाल है, वहां न तो डाक्टर होते हैं और न ही दवाइयां। मामूली बीमारियों के लिए भी लोगों को शहरों की ओर रुख करना पड़ता है जहां निजी अस्पतालों में महंगे इलाज की वजह से उन्हें जमीन-जायदाद तक बेचनी पड़ती है। 
     दरअसल सबसे बड़ा संकट विश्वास का है। वैसा ही संकट जो स्कूली शिक्षा और कानून व्यवस्था के मामले में नार आता है। सरकारी स्कूलों में गुणवत्ताविहीन शिक्षा अविश्वास की भावना पैदा करती है इसीलिए निजी स्कूल खूब पनप रहे हैं और लूट-पाट मचा रहे हैं। इसी तरह कानून-व्यवस्था के मामले में लोग पुलिस से दूर भागते हैं। वे उसके मित्र नहीं हैं जबकि आम लोगों को अपना मित्र बनाने पुलिस निरंतर प्रयास करती है पर उसका खौफ इस कदर है कि यह उक्ति यथावत है कि पुलिस से न दोस्ती भली, न दुश्मनी। स्वास्थ्य के मामले में संकट कुछ अलग है। यहां सवाल सिर्फ स्तर का नहीं, चिकित्सा की उपलब्धता का भी है। क्या कारण है कि दूर-दराज के ग्रामीण भी अपनी तमाम पूंजी के साथ निजी अस्पतालों की शरण लेते हैं। प्रायवेट अस्पतालों में विशेषकर सुविधा सम्पन्न बड़े अस्पतालों में ऐसे लोगों की भारी भीड़ इस बात की गवाह है कि वे इन्हें सरकारी अस्पतालों से बेहतर मानती है। जबकि चिकित्सा की श्रेष्ठता शासकीय चिकित्सालयों में भी कायम है। 
    ऐसा लगता है कि स्वास्थ्य के मामले में सरकार ने हार मान ली है। सभी 27 जिलों में अस्पताल बनाकर उन्हें निजी हाथों में सौंपने के पीछे यह दलील दी जा रही है कि सरकारी अस्पतालों के लिए डाक्टर नहीं मिलते। शहरी केन्द्रों में जब चिकित्सकों के पद रिक्त पड़े रहते हैं तो कस्बों के अस्पतालों की हालत का अंदाज लगाया जा सकता है। इसी तर्क के साथ स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजीकरण को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस विचार में कोई दिक्कत नहीं है बशर्तें पेशे के प्रतिबद्ध एवं इमानदार लोग चुने जाएं। क्या भ्रष्ट तंत्र के लिए यह संभव है? कतई नहीं। तब गरीबों को बेहतर एवं त्वरित चिकित्सा उपलब्ध कराने की जिस मकसद से यह योजना बनाई गई है, वह कैसे सफल होगी? यकीनन सरकारी खर्च से बने अस्पताल निजी संचालकों के लिए एक तरह से कमाई के वैसे ही स्रोत बनेंगे जैसे कि एस्काटर््स रायपुर है। यानी चिकित्सा के नाम पर लूट-खसोट के नए केन्द्र खुल जाएंगे। अत: सरकार को विचार करना होगा कि निजीकरण को प्रोत्साहित करने के बजाए क्या ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार के साथ-साथ मौजूदा उपायों को बेहतर नहीं बनाया जा सकता?

Saturday, December 10, 2016

सत्ता के 13 वर्ष कम तो नहीं होते

-दिवाकर मुक्तिबोध
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को देखकर आपको, आम आदमी को क्या लगता है? क्या राय बनती है? अमूमन सभी का जवाब एक ही होगा- भले आदमी हैं, नेकदिल इंसान। सीधे, सरल। मुख्यमंत्री होने का दंभ नहीं। सबसे प्रेम से मिलते हैं। सबकी सुनते हैं। लेकिन शासन? जवाब यहां भी एक जैसा ही होगा - लचर है। नौकरशाहों पर लगाम नहीं है। उनकी मनमानी रोकने में असमर्थ है। धाक नहीं है। भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं है। सुस्त है। सरकार वे नहीं, नौकरशाह चला रहे हैं। सरकारी योजनाओं का लाभ निचले तबके तक नहीं पहुंच पा रहा है। सरकारी कामकाज में पारदर्शिता नहीं है। फाइलों के आगे बढऩे की रफ्तार बेहद सुस्त है और सर्वत्र कमीशनखोरी का जलवा है। और उनकी राजनीति? यहां भी प्राय: सभी का जवाब तकरीबन एक जैसा ही होगा- बहुत घाघ हैं। जबरदस्त कूटनीतिज्ञ। अपने विरोधियों को कैसे चुन-चुनकर ठिकाने लगाया। आदिवासी नेतृत्व की मांग करने वालों की हवा निकाल दी। उनकी कुर्सी की ओर आंखें उठाने वालों की बोलती बंद कर दी। शासन की आलोचना करने वाले सांसदों व पार्टी नेताओं को आईना दिखा दिया। कईयों के लिए मार्गदर्शक की भूमिका का इंतजाम कर दिया। संगठन के नेतृत्व को भी अपनी मुट्ठी में रखा। कोई हूं की चूं नहीं। सभी महत्वपूर्ण स्थानों, पदों पर अपने मोहरे फिट किए? गजब के राजनेता। मासूमियत भरी राजनीति। भाजपा शासित पहला प्रदेश जहां पार्टी में असंतोष पानी के बुलबुले की तरह है, फूंक मारते ही ध्वस्त। और अब पार्टीजनों, नेताओं के न•ारों में रमन सिंह? जवाब मिलेगा- पंगा लेने का मतलब नहीं। केन्द्र में जबरदस्त पकड़। पीएम तक तारीफ करते हैं। लेकिन यहां अभयदान। खूब कमाओ, खाओ। लिहाजा चौथी पारी भी मिलनी ही चाहिए।
    तो ये हैं, प्रदेश की जनता के प्रति बेहद संवेदनशील, उदारमना मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह जिनके शासन के 13 वर्ष 12 दिसम्बर 2016 को पूर्ण होने वाले हैं। मुख्यमंत्री के बतौर तीसरी पारी के अभी दो वर्ष और बाकी हैं। यानी दो जलसे इन्हीं तारीखों में और होंगे जैसे कि इस बार हो रहे हैं। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि हर सरकार को यह हक है कि वह अपनी उपलब्धियों का खूब ढिंढोरा पीटे भले ही वे कमतर क्यों न हो। फिर सत्ता के 13 वर्ष कम नहीं होते। मुख्यमंत्री के बतौर तीसरी पार्टी हर किसी राजनेता को नसीब नहीं होती। भाजपा शासित राज्यों में दो ही मुख्यमंत्री ऐसे हैं जो तीसरी पारी खेल रहे हैं- एक म.प्र. के शिवराज सिंह और दूसरे रमन सिंह। रमन सिंह के अब तक के कार्यकाल का असली लेखा-जोखा जनता के पास है, जो चुनाव वर्ष 2018 में वोटों के जरिए सामने आएगा। सरकार विकास के दावे भले ही कितने ही क्यों न करे लेकिन तय जनता को करना है। इसमें संदेह नहीं कि सरकार की लोककल्याणकारी नीतियों की वजह से राज्य में काफी कुछ बदला है। यह बदलाव हर मोर्चे पर न•ार भी आता है विशेषकर आधारभूत संरचनाओं के मामले में। शहरों में जीवनस्तर सुधरा है, कुशल, अकुशल हाथों के पास पर्याप्त काम है किंतु गांंव? वे अभी भी समस्याग्रस्त हैं। राज्य के 19 हजार गांवों में से कुछ दर्जन गांवों को छोड़ दें तो शेष नागरिक जीवन की सुविधाओं के लिए तरस गए हैं। जबकि सरकार दावा करती है कि उसकी प्राथमिकता गांवों का विकास है। अभी चंद दिन पूर्व राजधानी में आयोजित युवा सम्मान समारोह में मुख्यमंत्री एवं सरकार के अन्य नुमाइंदों की मौजूदगी में प्रतिभाशाली युवाओं ने कहा- वे गांवों में मूलभूत सुविधाएं चाहते हैं और इसके लिए वे आगे चलकर अपने स्तर पर प्रयत्न करेंगे। वे ऐसा छत्तीसगढ़ चाहते हैं जहां हर गांव में स्कूल व अस्पताल हो। जिला दंतेवाड़ा के ग्राम बुरगुम के किशोर वय के भारत कुमार ने कहा उनके गांव में सिर्फ कक्षा 8वीं तक स्कूल है। गांव में बिजली नहीं, सड़क कच्ची है और पानी के नाम पर केवल हैंडपम्प है। अपनी प्रतिभा के दम पर गांवों से उच्च शिक्षा के लिए निकले प्राय: सभी युवाओं का एक ही दर्द है- उनके गांवों की बदहाली। ग्रामीण युवाओं के विचारों से जाहिर है नया राज्य बनने के बावजूद 16 वर्षों में गांवों की हालत बदली नहीं है। अब राज्य सरकार 12 दिसम्बर को राजधानी में एक विराट सम्मेलन करके युवाओं से जानना चाहती है कि गांव की जरूरतें क्या हैं और उनके क्या सुझाव है। गोया सरकार के बड़े-बड़े अफसर, राज्य के विधायक,ं नेता और प्रदेश पार्टी का नेतृत्व नहीं जानता कि गांवों की समस्याएं क्या हैं और सरकार को क्या करना चाहिए। जाहिर है, 12 दिसम्बर का सम्मेलन राजनीतिक है और पार्टी की न•ार में वे 34 लाख युवा हैं जिनके वोट उसके लिए कीमती हैं। सरकार उनके मुख से अपनी उपलब्धियां भी सुनना चाहती है। इसलिए इस सम्मेलन का गांवों के विकास से कोई लेना-देना नहीं है। बहरहाल बात फिर घूम फिरकर वहीं आ जाती है कि सरकार ने इन 13 वर्षों में गांवों के लिए क्या किया? क्यों नहीं तस्वीर बदली? अरबों रुपए खर्च हो गए। कहां गए वे? मलेरिया, पीलिया जैसे रोगों से अभी भी ग्रामीण क्यों मरते हैं? किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य क्यों नहीं मिलता? क्यों लुडेग, पत्थलगांव के किसानों को अपने टनों टमाटर सड़कों पर फेंकने पड़ते हैं जबकि तीन दशक पूर्व म.प्र. के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने जशपुर, रायगढ़ क्षेत्र में टमाटर की भारी पैदावार को देखते हुए वहां फूड प्रोसेसिंग यूनिट की स्थापना करने की घोषणा की थी। छत्तीसगढ़ नया राज्य बन गया, 15 वर्ष बीत गए किंतु एक अदद प्लांट वहां स्थापित नहीं हो सका जबकि सरकार फुड प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने की बात करती रही है। बस्तर में नक्सल समस्या के चलते स्वीकृत डेढ़ सौ से अधिक सड़कें पिछले कई वर्षों से नहीं बन पा रही हैं। कल्पना की जा सकती है, वनांचलों के सैकड़ों गांवों की स्थिति क्या होगी जहां पहुंच मार्ग ही नहीं है। छत्तीसगढ़ के गांवों की और भी मूलभूत समस्याएं हैं जबकि प्रत्येक वर्ष मुख्यमंत्री दर्जनों गांवों का दौरा करते हैं, गांवों से जनप्रतिनिधि विधानसभा एवं पंचायतों के लिए निर्वाचित होते हैं, छोटी-बड़ी तमाम किस्म की योजनाएं बनती है किंतु गांवों की तस्वीर नहीं बदलती। भूखमरी, बेरोजगारी, प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य तथा जीवन की अन्य कठिनाइयां और दरिद्रगी छत्तीसगढ़ के गांवों की अभी भी मूल पहचान है। राज्य स्थापना दिवस पर हर वर्ष सरकारी उत्सवों के बीच यह पहचान गुम हो जाती है, गुम कर दी जाती है पर जाहिर है समाप्त नहीं होती।

Thursday, December 8, 2016

एनजीओ और मंत्री का दर्द

-दिवाकर मुक्तिबोध
     कहते हैं देश बदल रहा है, शहर बदल रहे हैं, गांव बदल रहे हैं लेकिन क्या वे बदल रहे हैं जिन्हें वास्तव में बदलना चाहिए, देश हित में, समाज हित में, लोक हित में? जवाब है - बिलकुल नहीं। न बदलने वालों की अनेक श्रेणियां हैं- भ्रष्ट राजनेता हैं, भ्रष्ट मंत्री हैं, भ्रष्ट अफसर हैं और इनके द्वारा पोषित वे संस्थाएं हैं, संगठन हैं जिन्होंने समाज सेवा का नकाब पहन रखा है। गैर सरकारी संगठन यानी एन.जी.ओ. भी इसी तरह की अमर बेल है जो सरकार के महकमों से लिपटी हुई है और जिनके कामकाज को लेकर लंबी बहसें होती रहती हैं। निष्कर्ष के रूप में यह माना जाता है कि देश-प्रदेश में कार्यरत बहुसंख्य एन.जी.ओ. अपनी भूमिका के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। वे सरकारी नुमाइंदों के साथ गठजोड़ करके बेतहाशा पैसा पीट रहे हैं। सामाजिक क्षेत्र में इनके द्वारा किए जाने वाले कथित कामकाज काफी हद तक कागजों तक सिमटे हुए हैं। इनके भौतिक सत्यापन की न तो कभी जरूरत महसूस की जाती है और न ही कभी जांच बैठायी जाती है। एक तरह से ये सरकार के नियंत्रण से मुक्त है। बेखौफ हैं। भ्रष्टाचार का माध्यम बने हुए हैं। 
    विचार करें, दशकों से कार्यरत इन संस्थाओं के जरिए कितना बदलाव आया? क्या वह संतोषजनक है? विशेषकर वनांचलों में, बेहद पिछड़े इलाकों में, आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में जन चेतना कितनी विकसित हुई है? लोग अपने अधिकारों के प्रति कितने जागरुक हुए हैं? शिक्षा व स्वास्थ्य के महत्व को कितनों ने पहचाना व स्वीकार किया है? जबकि सरकारें अपने तई व इनके माध्यम से भी अब तक बेतहाशा धन खर्च कर चुकी हैं। तो फिर ये संस्थाएं कर क्या रही हैं? 
    दरअसल इसमें शक नहीं कि सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के विकास एवं कुरीतियों से निजात पाने की दिशा में गैर सरकारी संगठनों की भूमिका अहम हो सकती है और है भी लेकिन कुछ दर्जन एनजीओ को छोड़ दें तो शेष सफेद हाथी बने हुए हैं जो सरकार के पालतू हैं। देश को छोड़ दें तो छत्तीसगढ़ में ही 173 एनजीओ पंजीकृत हैं जिन्हें केंद्र व राज्य सरकार से फंड मिलता है। अभी हाल ही में राज्य की महिला, बाल विकास व समाज कल्याण मंत्री श्रीमती रमशीला साहू ने विभागीय सचिव को निर्देशित किया कि सभी एनजीओ को नोटिस जारी कर उनसे कामकाज का हिसाब मांगा जाए। आंकड़ों के मुताबिक राज्य के 59 एनजीओ ऐसे हैं जिन्हें वर्ष 1986-87 से केंद्र सरकार से सहायता मिल रही है। इन संस्थाओं को अभी तक 86 करोड़ रुपए दिए जा चुके हैं। कतिपय खास संस्थाओं को विभिन्न प्रोजेक्ट्स के तहत राज्य सरकार ने भी लाखों रुपए दिए हैं। विभागीय मंत्री का दर्द यह है कि रायपुर की एक संस्था को दो-तीन सालों में 60 लाख रुपए जारी किए गए किंतु उन्हें इसकी भनक तक नहीं लगी और जब बात सामने आई तो शिकायतों का पुलिंदा जो कचरे में पड़ा हुआ था, उसे खोला गया और उसके आधार पर सभी एनजीओ से उनके कामकाज की जानकारी मांगी गई, खर्चों का ब्यौरा देने के लिए कहा गया। 
    लेकिन इस चिट्ठी-पत्री से होने-जाने वाला कुछ नहीं है। थोड़े समय के लिए कुछ हलचल मचेगी और फिर सब कुछ शांत हो जाएगा और व्यवस्था फिर पहले जैसे चलती रहेगी। दरअसल सामाजिकता के नाम पर आर्थिक षडय़ंत्र रचने वाले रैकेट बरसों से सरकारी विभागों में अपनी पैठ जमाए हुए हैं। जाहिर है उनका उद्देश्य पैसा बनाना है और ये पैसा बना रहे हैं। प्रमुख रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक जनजागरण के क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों के कामकाज का कभी भौतिक सत्यापन नहीं होता, न इनके कामकाज पर कभी निगरानी रखी जाती है। समाज कल्याण विभाग में ऐसी कोई व्यवस्था भी नहीं है कि इतने कामकाज की पड़ताल की जाए कि वास्तव में राज्य के दूरस्थ अंचलों में विशेषकर आदिवासी इलाकों में ये संस्थाएं कैसा काम कर रही हैं। क्या इनके कामकाज से कोई जागृति आई है? क्या आदिवासियों को शिक्षा का महत्व समझ में आ रहा है? क्या कभी किसी मंत्री ने या विभाग के अफसरों ने गांव, देहातों में जाकर आकस्मिक निरीक्षण किया है? क्या कभी अपने माध्यमों से पता लगाने की कोशिश की है कि वित्त पोषित ये संस्थाएं ठीक से काम कर रही हैं अथवा नहीं। क्या कभी इनके द्वारा पेश वित्तीय बिलों की असलियत जांचने की कोशिश की गई है? क्या कभी यह देखा गया है कि इनके संचालकों की माली हालत पहले क्या थी और अब क्या है? क्या इनके बैंक एकाउंट खंगालने की कोशिश की गई? क्या कभी यह जांचने की कोशिश की गई कि इनके तथा परिवार के सदस्यों के नाम पर चल-अचल सम्पत्ति कितनी है और वह कब अर्जित की गई है? वस्तुत: ऐसा कुछ करना इसलिए संभव नहीं है क्योंकि यह सरासर मिलीभगत का मामला है, शेयरिंग का मामला है। जिस व्यवस्था में सरकारी कामकाज देने के एवज में चैक जारी करने के पूर्व कमीशन की नगद राशि पहले ही रखवा ली जाती है, उससे बदलाव की उम्मीद भी क्या की जा सकती है? इसलिए एनजीओ को नोटिस जारी करने से कुछ नहीं होगा। यह तो केवल दबाव बनाने की कसरत है जो बीच-बीच में मामला सधते न देखकर होती रहती है। इसलिए भौतिक संरचनाओं की दृष्टि से गांव-शहर बदल सकते हैं पर व्यवस्था नहीं, क्योंकि वह सरासर भ्रष्टाचार की नींव पर टिकी हुई है।

Thursday, November 24, 2016

अब इस हवा का क्या करें

-दिवाकर मुक्तिबोध 
 स्मार्ट सिटी, स्मार्ट विलेज, मेक इन इंडिया, स्टैंडअप इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसे लुभावने नारों  के बीच गौर करें शहरों, गांवों में वस्तुस्थिति क्या है? ढाई वर्ष पूर्व केन्द्र में भाजपा सरकार के सत्तारुढ़ होने के बाद क्या वाकई देश बदल रहा है? लंबी बहस का विषय है। तर्क-कुतर्क अंतहीन क्योंकि बहुत कुछ राजनीतिक चश्मे से देखा जाना है। बहरहाल केवल राज्य की बात करते हैं। अपने राज्य की, छत्तीसगढ़ की, राजधानी रायपुर की। और बात भी केवल हवा की, वायुमंडल की जो दिनों दिन इतना विषाक्त हो रहा है कि सांस लेना भी मुश्किल। इस विषय पर आगे बढऩे के पूर्व हाल ही में मीडिया में आई दो खबरों पर गौर करेंगे। पहली खबर थी ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजिज की उस रिपोर्ट की जिसके अनुसार वर्ष 2015 में वायुप्रदूषण से सबसे अधिक मौतें भारत में हुई हैं जो चीन से भी अधिक है। आंकड़ों में कहा गया है कि 2015 में भारत में रोजाना 1640 लोगों की असामयिक मौतें हुई जबकि इसकी तुलना में चीन में 1620 जानें गई। चीन दुनिया का सबसे अधिक प्रदूषित देश माना जाता है। अब दूसरी खबर देखें, रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार आस्ट्रेलिया के मुकाबले रायपुर शहर के औधोगिक इलाकों में वायुमंडल में धूल के कणों की मात्रा 18 हजार गुना अधिक है। कुछ तर्कों के साथ आप इस अध्ययन को आराम से खारिज भी कर सकते हैं लेकिन अलग-अलग अध्ययन में ऐसी रिपोर्ट कई बार आई हैं कि रायपुर देश-विदेश के 10 सबसे गंदे शहरों में शुमार है।
       लेकिन यह तो हकीकत है कि शहर बदल रहे हैं। भौतिक संरचनाओं की प्रगति साफ नज़र आती है। किन्तु हवा का क्या? वायु मंडल निरंतर जहरीला क्यों हो रहा हैं? लोगों का स्वास्थ्य क्यों बिगड़ रहा है? दमा, अस्थमा, ब्रांकाइटिस जैसी वायुजनित बीमारियां क्यों बढ़ रही हैं? क्यों लोग मर रहे हैं? क्यों सब जगह धूल ही धूल है? सड़कें ऐसी क्यों बनाई जाती हैं कि सीमेंट की परत उखडऩे  के साथ ही बजरी का गुबार दो पहियों पर सवार लोगों एवं पदयात्रियों को धूल धूसरित कर देता है? क्यों ? क्यों ?
       दरअसल अनियोजित विकास, दृष्टि का अभाव एवं सरकार में इच्छाशक्ति की कमी इसका मूल कारण है। एक बड़ा कारण जनता का विद्रोही स्वभाव का न होना भी है जो हर कठिनाई को बर्दाश्त करती  है, गुस्से को पी जाती है। शांत रहते हुए ज्यादतियों को सहन करती हैं। आम तौर पर लोकतांत्रिक देश की जनता ऐसी ही होती है। और यह स्थिति प्रत्येक शासन के लिए मुफीद है, सरकारें चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हो। छत्तीसगढ़ में बीतें 12 वर्षों से भाजपा की सरकार है। इन वर्षों में उसने कई अच्छे काम किए हैं, किंतु कुछ चुनौतियां ऐसी भी हैं जिससे निपटने में उसकी कोई रूचि नजर नहीं आती। औद्योगिक प्रदूषण ऐसी ही एक चुनौती है जिसका जनस्वास्थ्य से सीधा संबंध है। इस मुददे को लेकर बहुत बाते होती रही हैं पर हुआ क्या? वायुमंडल में काली धूल के बारीक कणों की मात्रा निरंतर बढ़ती जा रही है। राजधानी के किसी भी घर की छत पर आप जाइए, पैरों के पंजों की छाप बनती चली जाएगी। शहर से सटे औद्योगिक इलाकों के संयंत्र औद्योगिक सुरक्षा व वायु प्रदूषण नियंत्रण इकाइयों के सारे सरकारी नियम कायदों को चुनौती देते नज़र आएंगे। किसी पर कोई नियंत्रण नहीं। और यह सब इस वजह से क्योंकि सारा कुछ सधा-बधा है। मंत्री, नेता, उद्योगपति और इनके बीच की कड़ी अधिकारी-कर्मचारी। रिश्वत में ताकत ही कुछ ऐसी होती है कि जनता एवं उसकी तकलीफों की परवाह करने की जरूरत नहीं।
        ऐसा नहीं कि विषाक्त होते वातावरण और इसके लिए जिम्मेदार उद्योग व उद्योगपतियों के खिलाफ आवा•ा न उठी हो, आंदोलन न हुए हों। कभी भाजपा के वरिष्ठ विधायक और अब राज्य शासन के एक महत्वपूर्ण ओहदे पर सवार देवजी पटेल ने आंदोलन की कमान संभाली थी। उद्योगपतियों के घरों के सामने प्रदर्शन किया गया था। और तो और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता स्व. विद्याचरण शुक्ल ने भी जन-आंदोलन खड़ा किया था। पर चंद दिनों की गहमागहमी के बाद सब कुछ शांत हो गया। स्पंज आयरन व इतर संयंत्र यथावत जहर उगलते रहे और अभी भी उगल रहे हैं। वर्षों से यह सिलसिला चला आ रहा है। 
       सरकार दावे बहुत करती है। हाल ही में दावा किया गया कि वायु प्रदूषण के नियंत्रण के उपाय न करने पर 42 रोलिंग मिलों  में उत्पादन रोक दिया गया है। एक और दावा जो बड़ा महत्वपूर्ण है, राज्य सरकार के अपर मुख्य सचिव आईएएस एन. बैजेन्द्र कुमार ने कुछ माह पूर्व किया था। उन्होंने मीडिया से कहा था कि 5 साल के भीतर आबादी से कहीं दूर नई औद्योगिक बस्ती बसायी जाएगी और उरला, सिलतरा, सोनडोंगरी, भनपुरी आदि क्षेत्रों के उद्योग वहां शिफ्ट कर दिए जाएंगे। क्या यह दिवास्वप्न है जो जनता को दिखाया जा रहा है? क्या सरकार ऐसा कर पाएगी? क्या उसमें ऐसी इच्छा शक्ति है? जिन उद्योगों से उसे राजस्व मिलता है, जिनसे हजारों श्रमिकों की रोजी-रोटी भी चल रही है, और जिनके पास अथाह दौलत और राजनीतिक ताकत है, ऐसे उद्योगपतियों को क्या वह झुका पाएगी? फिर आगे चुनाव है, पार्टी को पैसा भी चाहिए। फिर? जाहिर है सब कुछ ऐसा ही चलता रहेगा। स्वच्छ भारत मिशन, स्वच्छ रायपुर मिशन, स्वच्छ छत्तीसगढ़ मिशन कागजों में एकदम स्वच्छ न•ार आएंगे लेकिन जनता धूल फांकती रहेगी, उसके चेहरे काले पड़ते जाएंगे। वर्षों से जारी यह क्रम पता नहीं कब तक जारी रहेगा। दरअसल सरकार की आत्मा को झकझोरने वाला कोई जन नेता नहीं है। क्या शंकर गुहा नियोगी के बाद जनता को कोई ऐसा नेता मिला है? नहीं तो फिर बर्दाश्त करते रहिए।

Monday, October 31, 2016

इस उत्सव में जन कहां

-दिवाकर मुक्तिबोध
     इस वर्ष का राज्योत्सव छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार के लिए खास महत्व का है। यह गंभीर चुनौतियों की दृष्टि से भी है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति की वजह से भी। मोदी राज्योत्सव का उद्घाटन करेंगे तथा काफी वक्त बिताएंगे। जाहिर है उनकी उपस्थिति को देखते हुए राज्य सरकार विकास की झलक दिखाने और बहिष्कार पर आमादा कांग्रेस व अन्य पार्टियों से राजनीतिक स्तर पर निपटने में कोई कोर कसर नहीं छोडऩी चाहती। प्रधानमंत्री को यह दिखाना जरूरी है कि राज्य में सब कुछ ठीक-ठाक है, अमन-चैन है, सरकार की योजनाएं दुत गति से चल रही हैं और विकास छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में पसरा नजर आ रहा है। राजनीतिक चुनौतियों से निपटने में भी सरकार और पार्टी सफल है तथा सन् 2018 के राज्य विधानसभा चुनाव व उसके अगले वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव के संदर्भ में प्रधानमंत्री को फिकर करने की जरूरत नहीं है। इसके लिए सब कुछ युद्ध स्तर पर चल रहा है, राजनीतिक मोर्चे के साथ ही सामाजिक व आर्थिक मोर्चे पर भी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह संदेश देने, उन्हें आश्वस्त करने सरकार और पार्टी जीतोड़ मेहनत कर रही है।
    राज्य जवान हो चुका है। 16 वर्ष का। दसवीं वर्षगांठ के बाद यह विचार चल पड़ा था कि राजधानी में राज्योत्सव के दिनों को कम करके, तामझाम को सीमित रखा जाए, खर्च भी कम किया जाए। अब सलमान खान या करीना कपूर जैसी फिल्मी हस्तियों को भी बुलाने की जरूरत नहीं जिन्होंने चंद घंटों के लिए लाखों रुपए सरकार से वसूले थे। इस वर्ष भी यह सोचा गया कि राज्योत्सव सिर्फ एक दिन का हो। हवाला सूखे का दिया गया पर वर्षा औसत से कहीं अधिक हो गई। खैर सूखे की चिंता जाती रही। चूंकि घोषणा एक दिन के राज्योत्सव की थी, लेकिन जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुख्य अतिथि के रूप में राज्य सरकार के आमंत्रण को स्वीकार कर लिया तो यह पांच दिन का हो गया। अब 1 नवम्बर से 5 नवम्बर तक राज्य की जनता छत्तीसगढ़ में दनादन विकास के कथित प्रवाह से अभिभूत होगी और अपना मनोरंजन करेगी।
     प्रधानमंत्री के प्रवास के मद्देनजर, तैयारियों के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने पार्टी के नेताओं को निर्देशित किया था कि मुख्य समारोह में कम से कम एक लाख की भीड़ आनी चाहिए। जब मुख्यमंत्री स्वयं ऐसा कहे तो जाहिर है केन्द्र की परीक्षा में पास होने की उन्हें कितनी चिंता है। यह पहली बार है जब मुख्यमंत्री ने संख्या में बात कही। बहरहाल तैयारियां अंतिम दौर में है किंतु इसकी वजह से सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों की दिवाली चौपट हो गई। बहरहाल इसमें कोई शक नहीं कि प्रधानमंत्री संतुष्ट होकर जाएंगे क्योंकि राजधानी गुल•ाार है, शहर गुल•ाार है। लेकिन क्या वास्तव में राज्य के हालात काबू में है? संतोषजनक है? जनहित के मुद्दों पर खूब शोर-शराबा मचा रही कांग्रेस और नई नवेली जोगी कांग्रेस के तेवरों, राजनीतिक विवादों और आरोप-प्रत्यारोप को छोड़ दें तो क्या आम आदमी विशेषकर गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों तक राज्य एवं केन्द्र सरकार की योजनाओं का समुचित लाभ पहुंच पा रहा है? जनकल्याणकारी योजनाएं दर्जनों हैं पर क्या वे वास्तव में फलदायी हैं? क्या लोगों का कल्याण हो पा रहा है? आंकड़े बताते हैं कि राज्य में गरीबी व बेरोजगारी बढ़ी है। यह अलग बात है कि इसके बावजूद छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कारों में अव्वल है। विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियों के लिए उसे वर्ष 2015-16 के दौरान ही एक दर्जन से अधिक पुस्कार मिल चुके हैं। यदि इन पुरस्कारों की विश्वसनीयता पर संदेह न किया जाए तो यह मानना होगा राज्य में सर्वत्र खुशहाली है और विकास द्वार-द्वार तक पहुंच रहा है। पर क्या यह सच है?
आधारभूत संरचनाओं की दृष्टि से देखें तो क्रांतिकारी परिवर्तन नजर आएंगे। पिछले डेढ़ दशक में राजधानी सहित प्राय: सभी बड़े शहरों की तस्वीर बदल गई है, बदल रही है। सोलह साल के पहले के छत्तीसगढ़ और आज के छत्तीसगढ़ में जमीन आसमान का अंतर है। यह अंतर प्राय: सभी स्तरों पर दिखाई पड़ता है। पर यह सब कुछ शहरियों के लिए है। लेकिन क्या चमचमाती सड़कों, सुंदर-सुंदर इमारतों, रोशनी बिखरते सोडियम लैम्पों या मेट्रो का अहसास कराने विमानतल को राज्य के सर्वांगीण विकास का पैमाना माना जा सकता है? इसमें गरीब कहां है, खेत-खलिहान कहां है, गांव कहां हैं, शिक्षा की नींव मजबूत करने वाली प्राथमिक शिक्षा कहां है, शिक्षित युवाओं को नौकरियां कहां हैं, उच्च गुणवत्ता वाली उच्च शिक्षा कहां है, स्वस्थ रहने के लिए शुद्ध हवा कहां है, दर्द से तड़पते गांव के गरीबों के लिए सर्वसुविधायुक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र कहां है और कहां है शुद्ध पेयजल जिसके अभाव में आदिवासी बहुल गांवों में डायरिया जैसी बीमारी से प्रतिवर्ष सैकड़ों मरते हैं। वर्षों से मर रहे हैं।
दरअसल विकास के तमाम दावों के बावजूद गरीब किसानों, खेतिहर मजदूरों, निम्न व अति निम्न के दायरे में आने वाले लोगों का जीवन कठिन है। भ्रष्टाचार, महंगाई, नौकरशाही की असंवेदनशीलता और नौकरी के लगातार घट रहे अवसरों के कारण यह वर्ग खुशहाली से कोसों दूर है। सरकार चुनौतियों का सामना तो कर रही है पर विश्वास के साथ नहीं। फैसलों में विलंब सरकार की दुविधापूर्ण स्थिति का प्रतीक है। नक्सल मोर्चे पर हाल ही में घटित घटनाओं जिसमें आला अफसरों का व्यवहार भी शामिल है, से सरकार की किरकिरी हो रही है। भौतिक संरचनाओं पर यदि अरबों रुपए खर्च किए जा सकते हैं तो किसानों को बोनस भी दिया जा सकता है जिससे सरकार मुकर रही है। जबकि यह उसका चुनावी वायदा रहा है। राजनीतिक मोर्चे पर भी सरकार और पार्टी हैरान-परेशान है। जबकि चौथी पारी के लिए उसकी राजनीतिक कवायद अरसे से तेज है। दिनों दिन तेज होती सत्ता विरोधी लहर उसकी सबसे बड़ी चिंता है। इसमें भी कोई शुबहा नहीं कि पिछले दो कार्यकालों की तुलना में उसका तीसरा कार्यकाल ज्यादा कठिन और चुनौती भरा है।
     चुनावी वर्ष 2018 तक सरकार को दो और राज्योत्सव देखने हैं। यानी सरकार के पास अभी दो वर्ष है। अब इन दो वर्षों में विकास के केंद्र में सिर्फ और सिर्फ गांव और ग्रामीण रहेंगे तथा शासन-प्रशासन शतप्रतिशत जनोन्मुखी रहेगा तो एक नई तस्वीर उभरेगी जो गौरवपूर्ण होगी और तब राज्योत्सव सही अर्थों में राज्योत्सव होगा, जन उत्सव होगा।

Monday, October 17, 2016

स्मरण: वे कहीं गए हैं, बस आते ही होंगे

-दिवाकर मुक्तिबोध  

'शिष्य। स्पष्ट कह दूं कि मैं ब्रम्हराक्षस हूँ किंतु फिर भी तुम्हारा गुरु हूँ। मुझे तुम्हारा स्नेह चाहिए। अपने मानव जीवन में मैंने विश्व की समस्त विद्या को मथ डाला, किन्तु दुर्भाग्य से कोई योग्य शिष्य न मिल पाया कि जिसे मैं समस्त ज्ञान दे पाता। इसलिए मेरी आत्मा इस संसार में अटकी रह गई और मैं ब्रम्हराक्षस के रुप में यहाँ विराजमान रहा। '
'नया खून' में जनवरी 1959 में प्रकाशित कहानी 'ब्रम्हराक्षस का शिष्य' मैंने बाबू साहेब से सुनी थी। बाबू साहेब यानी स्वर्गीय श्री गजानन माधव मुक्तिबोध, मेरे पिता जिन्हें हम सभी, दादा-दादी भी बाबू साहेब कहकर पुकारते थे। यह उन दिनों की बात है जब हम राजनांदगाँव में थे - दिग्विजय कॉलेज वाले मकान में। वर्ष शायद 1960। तब हमें बाबू साहेब यह कहानी सुनाते थे पूरे हावभाव के साथ। हमें मालूम नहीं था कि यह उनकी लिखी हुई कहानी हैं। वे बताते भी नहीं थे। कहानी सुनने के दौरान ऐसा प्रभाव पड़ता था कि हम एक अलग दुनिया में खो जाते थे। विस्मित, स्तब्ध और एक तरह से संज्ञा शून्य। अपनी दुनिया में तभी लौटते थे जब कहानी खत्म हो जाती थी और ब्रम्हराक्षस अंतरध्यान हो जाता था।       
 बचपन की कुछ यादें ऐसी होती हैं जो कभी भुलायी नहीं जा सकती। कितनी भी उम्र हो जाए वे अंत:करण में जिंदा रहती हैं। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही है। अक्सर कोई न कोई याद जोर मारने लग जाती है। अतीत को टटोलते हुए मन कुछ पल के लिए ही सही, हवा में उड़ने लगता है। ऐसा पिताजी को लेकर, माँ को लेकर होता है। बाबू साहेब को गुजरे हुए अद्र्धशती बीत गई। 52 वर्ष हो गए। 11 सितंबर 1964 और माँ शांता मुक्तिबोध 8 जुलाई 2010। हम खुशनसीब हंै कि हम पर माँ का साया लंबे समय तक बना रहा। पिताजी के गुजरने के बाद लगभग 46 वर्षों तक वे हमारे लिए कवच का काम करती रहीं। हमारी शिक्षा-दीक्षा, नौकरी-चाकरी, शादी-ब्याह, बहू-बेटी, पोते-पोतियों सभी को उन्होंने अपने वात्सल्य से एक सूत्र में बांधे रखा। वात्सल्य का यह धागा अटूट हैं और हम सभी अभी भी साथ-साथ हैं और जिंदगी भर साथ-साथ रहने वाले हैं।      
      बहरहाल, पिताजी की याद करते हुए मैं कुछ सिलसिलेवार कहने की कोशिश करता हूं इसलिए ताकि कुछ क्रमबद्धता आए। वरना छुट-पुट प्रसंगों को पहले भी शब्दों में पिरोया जा चुका है। कुछ यत्र-तत्र छपा भी हैं।
जहाँ तक मेरी यादें जाती हैं, शुरु करता हूँ नागपुर से। आज से करीब 60 बरस पूर्व, वर्ष शायद 1954-55। नागपुर की नयी शुक्रवारी में हमारा किराये का कच्चा मकान। मिट्टी का। छत कवेलू की। फर्श गोबर से लिपा-पुता। घर में भाई-बहनों में मैं, दिलीप, ऊषा एवं सरोज। हमें नहीं मालूम था हमारा कोई बड़ा भाई भी है जो उज्जैन में दादा-दादी के पास रहता है। एक दिन जब वे नयी शुक्रवारी के घर में आए तो पता चला बड़े भाई हैं - रमेश।
     6-7 वर्ष की उम्र में कितनी समझदारी हो सकती है? इसलिए नयी शुक्रवारी के उन दिनों को लेकर मन में कुछ खास नहीं है। अलबत्ता मकान का स्वरुप और कुछ गतिविधियां जरुर ध्यान में आती हैं।
मसलन पिताजी आकाशवाणी में थे। रात में उन्हें घर लौटने में प्राय: विलंब हो जाता था। उनकी प्रतीक्षा में माँ घर के बाहरी दरवाजे पर चौखट पर, घंटों बैठी रहती थी। कुछ टोटके भी करती थी, ताकि वे जल्दी घर लौटे। चुटकीभर नमक चौखट के दोनों सिरे पर बाएँ-दाएँ रखती थी। पता नहीं इस क्रिया में ऐसी क्या शक्ति थी। जाहिर है विश्वास जो उन्हें ताकत देता था। मनोबल बढ़ाता था। पिताजी देर रात लौटते। तब तक हम सो चुके होते। आँखों के सामने एक और दृश्य है - दूर कुएँ से पिताजी रोज सुबह या शाम जब जैसी जरुरत पड़े, पानी भरकर लाते थे। दोनों हाथों में पीतल की दो बड़ी-बड़ी बाल्टियां लिए उनका चेहरा अभी भी आँखों के सामने हैं, पसीने से नहाया हुआ। बाल्टी से छलकता हुआ पानी, पसीने की बूंदे और तेज चाल।
      उन दिनों की न भूलने वाली एक और घटना हैं - स्कूलिंग की। स्कूल में दाखिले के वक्त की। स्कूल का पहला दिन प्राय: सभी बच्चों के लिए भारी होता है। उनका जी घबराता है। रोना-धोना शुरु कर देते हैं। माँ-बाप का हाथ नहीं छोड़ते। शिक्षकों को उन्हें चुप कराने, मनाने में पसीना आ जाता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। बल्कि अपेक्षाकृत कुछ ज्यादा ही। एक दिन पिताजी मुझे गोदी में उठाकर स्कूल ले गए। कक्षा पहिली में दाखिले के लिए। कक्षा में जब तक वे साथ में थे, मैं दहशत में होने के बावजूद खामोश था। वे मुझे पुचकारते हुए, दिलासा देते रहे और फिर कक्षा के बाहर निकल गए। कुछ पल मैंने इंतजार किया और फिर जोर की रूलाई फूट पड़ी। शिक्षक रोकते, इसके पूर्व ही मैं कक्षा से बाहर। सड़क पर दूर पिताजी जाते हुए दिख पड़े। मैं रोते हुए उनके पीछे। पता नहीं कितना सफर तय हुआ। न जाने किस अहसास से एकाएक वे पलटे और पीछे मुझे देखकर हैरान रह गए। लौटे, मुझे गोद में लिया, पुचकारा, चुप कराया और फिर नीचे उतारकर उंगली पकड़कर मुझे घर ले आए।
        स्कूल न जाने का परिणाम यह निकला कि मेरी बड़ी बहन जो उसी स्कूल में कक्षा तीसरी में पढ़ती थी, उसे मेरे साथ पहली में बैठाया गया। आज बड़ी बहन भी दुनिया में नहीं है। पर उसका मासूम त्याग व बालपन की तस्वीर दिलो-दिमाग में जस की तस है।
नयी शुक्रवारी के बारे में और ज्यादा कुछ याद नहीं। इतना जरुर है कि जाफरीनुमा कक्ष में बैठकें हुआ करती थी, चाय-पानी का दौर चलता था। बैठकों में शामिल होने वाले पिताजी के मित्रों में मुझे शैलेंद्र कुमार जी का स्मरण है। नागपुर नवभारत के संपादक। एक कारोबारी भी थे मोटेजी। विचारों से कामरेड। उनके यहाँ हमारा आना-जाना काफी था। उनकी पत्नी वत्सला बाई मोटे माँ की अच्छी सहेली थी। मुझे याद नहीं, स्वामी कृष्णानंद सोख्ता उस घर में आया करते थे। साप्ताहिक 'नया खून' के संपादक। विशाल व्यक्तित्व और दबंग आवाज। भैया बताते हैं - नयी शुक्रवारी की उस मकान में हमारे यहाँ आने वालों में प्रमुख थे सर्वश्री स्वामी कृष्णानंद सोख्ता, जीवनलाल वर्मा विद्रोही, प्रमोद वर्मा, शरद कोठारी, लज्जाशंकर हरदेनिया, के.के. श्रीवास्तव, श्रीकांत वर्मा, रामकृष्ण श्रीवास्तव, अनिल कुमार, मुस्तजर, भीष्म आर्य और नरेश मेहता।
      स्वामी कृष्णानंद सोख्ता के बारे में याद हैं वे हमारे गणेशपेठ के मकान में अक्सर आया करते थे। जीवनलाल वर्मा व्रिदोही, प्रमोद वर्मा, रम्मू श्रीवास्तव, हरिशंकर परसाई, टी.आर. लूनावत, भाऊ समर्थ और प्रभात कुमार त्रिपाठी (जबलपुर) इन विद्वानों के चेहरे याद हैं। लेकिन कांतिकुमार जैन जिनके संस्मरण बहुचर्चित माने जाते हैं, घर कभी नहीं आए। न नागपुर के दोनों मकानों में आए न राजनांदगाँव में। बहरहाल घर में होने वाली साहित्यिक बहसों में और भी लोग शामिल रहते थे, पर अधिक कुछ स्मरण नहीं। सोख्ता जी का स्मरण इसलिए कुछ ज्यादा है क्योंकि वे आते ही हम लोग के साथ घुल मिल जाया करते थे। छोटे भाई दिलीप को कंधों पर बिठा लेते थे और इसी अवस्था में पिताजी के साथ चर्चा करते थे। चूंकि कच्ची उम्र दुनिया से बेखबर वाली होती है इसलिए साप्ताहिक 'नया खून' के बारे में हम विशेष कुछ जानते नहीं थे। यह उस समय का गंभीर वैचारिक साप्ताहिक पत्र था जिसकी महाराष्ट्र एवं महाराष्ट्र के बाहर, बुद्धिजीवियों की जमात में अच्छी पकड़ थी, प्रतिष्ठा थी।
      गणेशपेठ निवास में दो घटनाएँ स्मृतियों में बेहतर तरीके से कैद है - पहली - मेरी छोटी बहन सरोज से जुड़ी हुई है। बहुत सुंदर थी, घुघराले बाल थे उसके। एक बार उसे बुखार आया। पता नहीं कितने दिन चला। लेकिन एक दिन माँ ने देखा वह बिस्तर पर नहीं थी। ढूंढा गया तो वह मकान से अलग-थलग, बाथरुम में फर्श पर दोनों घुटनों को मोड़कर, गठरीनुमा पड़ी हुई थी। शायद बुखार तेज था, बर्दाश्त नहीं हो रहा था, सो वह शरीर को ठंडा करने गुसलखाने में पहुंच गई थी। वह नहीं रही। उसके न रहने का सदमा, कैसा और कितना गहरा था, मैं नहीं जानता था अलबत्ता माँ का रो-रोकर बुरा हाल था, और पिताजी गुमसुम से थे। अब सोचता हूं उन्होंने किस कदर अपने आपको संयमित रखा होगा, कैसे इस अपार दुख से उबरने की कोशिश की होगी।
    दूसरा प्रसंग - प्रायमरी में पढ़ता था। कक्षा याद नहीं। एक दिन स्कूल से लौटा। माँ ने खाना खाने बुलाया। रसोई में मैं और माँ खाना खाने बैठे। खाते-खाते माँ ने मुझे दाल परोसने के लिए गंजी में बड़ा चम्मच डाला तो उसमें एक मरी हुई छिपकली आ गई जो फूलकर काफी मोटी हो गई थी। छिपकली को देखते ही माँ को मितली शुरु हो गई और भागकर गुसलखाने में चली गई और उल्टियां करने लगी। मुझे पर मरी छिपकली का कोई असर नहीं हुई। मैं मजे से कटोरी में परोसी हुई दाल खाता रहा जब तक माँ लौट न आई। मुझे उल्टियां नहीं हुई। कुछ भी विचित्र सा नहीं लगा। लेकिन तनिक स्वस्थ होने के बाद माँ हाथ पकड़कर उसी अवस्था में पैदल जुम्मा टैंक के निकट स्थित 'नया खून' के दफ्तर ले गई। पिताजी को बाहर बुलाया, बताया। और फिर मुझे मेयो हॉस्पिटल में भर्ती कर दिया गया। शरीर से विष निकालने डाक्टरों ने क्या प्रयत्न किए नहीं मालूम। अलबत्ता मैं कुछ दिन तक अस्पताल में पड़ा रहा। दिन-दुनिया से बेखबर। माँ-पिताजी की चिंता से बेखबर। माँ को चूंकि उल्टियां हो गई थी इसलिए वे लगभग स्वस्थ थी। हालांकि वे भी अस्पताल में भर्ती थी। मेरी चिंता उन्हें खाए जा रही थी। उन्हें इस बात का अफसोस था अंगीठी पर रखी दाल की गंजी खुली क्यों छोड़ी। कैसे पता नहीं लगा कि छिपकली कब गिरी। कब से उबल रही थी। बहरहाल यह घटना दिमाग से कभी नहीं गई। छिपकली को देखता हूँ, तो वह दिन याद आ जाता है। अब उसे देख घिन आने लगती है लेकिन मारने की कभी कोशिश नहीं करता। छिपलियां तो घर की दीवारों पर चिपकी रहती ही हैं। इसलिए उन्हें भी जिंदगी के हिस्से के रुप में देखता हूँ क्योंकि वे यादें ताजा करती हैं। अच्छी-बुरी जैसी भी।
     इसके पूर्व का एक और प्रसंग - मकान गणेशपेठ का ही। शुक्रवारी से कुछ बेहतर। पक्का खुला मकान। बड़ा सा ऑगन। ऊपर छत। पतंगें उड़ाने के लिए और कटी पतंग को पकड़ने के लिए लगभग पूरा दिन हम छत पर ही बिताते थे। पतंगबाजी में खूब मजा आता था। मैं और बड़े भैय्या रमेश। मेरा काम चक्री पकड़ने का रहता था, पतंगे वे उड़ाया करते थे, पैच लड़ाते, काटते-कटते। जब भी कोई कटी पतंग हमारे छत के ऊपर से गुजरती थी, हम धागा पकड़ने के फेर में रहते थे। मुझे याद है एक बार जब ऐसी ही कटी पतंग को पकड़ने की कोशिश की, कुछ बड़े लड़के अपशब्दों की बौछार करते हुए घर में लड़ाई करने आ गए। वे काफी उत्तेजित थे और मारने-पिटने पर उतारु थे। माँ ने किसी तरह समझाकर उन्हें बिदा किया। हमें जो डांट पड़ी, वह किस्सा तो अलग है।  इस घटना ऐसा असर हुआ कि हम कुछ दिन तक छत पर ही नहीं गए। न मंजा पकड़ा और न ही पतंगे उड़ाई।
     पिताजी आकाशवाणी में ही थे। नया मध्यप्रदेश बनने के बाद उनका भोपाल ट्रांसफर हो गया। इस ट्रांसफर को लेकर वे काफी पसोपेश में थे। क्या किया जाए। जाए या नहीं। इस बीच सोख्ताजी के चक्कर यथावत थे। वे घर आते थे और पिताजी की अवस्था देखते थे। अंतत: पिताजी ने भोपाल जाना तय किया। उनका बिस्तर बंध गया। एक छोटी पेटी के साथ रस्सी से बंधा उनका बिस्तर हाल में रख दिया गया। शायद दोपहर की कोई ट्रेन थी। हम सब हाल में इक_े थे। इस बीच सोख्ताजी आ गए। पता नहीं उनके बीच क्या बातचीत हुई। नतीजा यह निकला कि बिस्तर खोल दिया गया, पेटी अंदर चली गई और सामान फिर अपनी जगह पर रख दिया गया। पता चला पिताजी ने आकाशवाणी की नौकरी छोड़ दी और सोख्ताजी के अखबार में संपादक बन गए। लिखने-पढऩे के लिए उन्हें नया ठिकाना मिला। यह उनके मन के अनुकूल बात थी। अब यह कहने की जरुरत नहीं कि 'नया खून' को नई प्रतिष्ठा मिली और वैचारिक पत्रकारिता को नया आयाम। साहित्य के अलावा नया खून सहित समय-समय पर साप्ताहिक पत्रों के लिए उनके द्वारा किया गया लेखन उन्हें श्रेष्ठ पत्रकार के रुप में भी स्थापिता करता है।
     नागपुर की यादें बस इतनी ही। उसके अंतिम दृश्य को याद करता हूँ। आज भी जब कभी नागपुर रेलवे स्टेशन से गुजरता हूँ, या रुकता हूँ तो मुझे पिताजी सीढिय़ों से नीचे उतरते हुए दिखाई देते हैं। हम लोग राजनांदगाँव जाने के लिए पैसेंजर ट्रेन के डिब्बे में बैठे हुए थे। ट्रेन छूटने को ही थी कि पिताजी सीढिय़ों पर दिखाई दिए। माँ की जान में जान आई। वे आए और ट्रेन चल पड़ी। वह दृश्य कैसे भुलाया जा सकता है?
     अब बात सन् 1957-58 की। हम राजनांदगाँव के बसंतपुर में रहते थे। शहर से चंद किलोमीटर दूर बसा गाँव। राजनांदगाँव भी इन दिनों बड़ा गाँव जैसा ही था। कस्बाई जैसा जहाँ कॉलेज थे, अस्पताल था, शालाएं थीं। शहरी चहल-पहल थी। शांत-अलसाया सा लेकिन सुंदर। दिल को सुकून देने वाली हवा बहती थी, लोगों में आपस में बड़ी आत्मीयता थी, भाईचारा था। पिताजी राजनांदगाँव के दिग्विजय महाविद्यालय में प्राध्यापक नियुक्त हुए थे और बसंतपुर से आना-जाना करते थे। कभी पैदल, कभी साइकिल से।
    
बसंतपुर स्थित मकान का पिछला हिस्सा।
बसंतपुर में हमारा मकान था बढिय़ा। बाहर परछी, परछी से सटा छोटा कमरा जो पिताजी की बैठक थी, दो लंबे कमरे और पीछे रसोई तथा रसोई के बाहरी दीवारों से सटा खूब बड़ा बगीचा जिसमें फलों के झाड़ थे, सब्जियां उगाई जाती थी। यह मकान चितलांगियाजी का था और बगीचा भी उनका। बसंतपुर के दिन वाकई बहुत खूबसूरत थे। उसका सुखद अहसास अभी तक कायम है।
      यहाँ रहते हुए कोई ऐसी घटना याद नहीं है जो पिताजी के व्यक्तित्व को नए ढंग से रेखांकित करती हो। अलबत्ता वे कितने पारिवारिक थे वह जरुर जाहिर होता है। रात को कंदिल की रोशनी में वे हमें पढ़ाते थे। क्लास लेते थे। वक्त-वक्त पर मेरे साथ शतरंज खेलते थे। जानबूझकर मुझे जीताते थे। शाम को कॉलेज से घर आने के बाद शायद ही कभी शहर जाते हो। यानी उसके बाद उनका पूरा समय हमारा था। हमारे साथ वक्त बिताते। बाते करते या फिर हाथ में किताब या कागज कलम लेकर लिखने बैठ जाते।
जीर्णोद्धार के बाद दिग्विजय कॉलेज परिसर स्थित मकान।
    बसंतपुर में हम ज्यादा दिन नहीं रहे। शायद साल-डेढ़ साल। राजनांदगाँव महाविद्यालय परिसर में अंतिम सिरे पर स्थित शीर्ण-जीर्ण लेकिन महलनुमा मकान में रंग-रोगन चल रहा था, हम यही शिफ्ट होने वाले थे। एक दिन शिफ्ट हो गए। पुराने जमाने के बड़े-बड़े कमरों और मंजिलों वाला नहीं था - नया मकान। दरअसल राजनांदगाँव बहुत छोटी रियासत थी इसलिए महल भी साधारण थे। नीचे एक अलग-थलग कमरा जहाँ बड़े भैया रमेश पढ़ाई करते थे, दूसरे छोर पर प्रवेश कक्ष और ऊपर की मंजिल पर तीन हालनुमा कमरे, एक रसोई और खुली बालकनी। खिड़कियां बड़ी-बड़ी व दरवाजों के पल्ले भी रंग-बिरंगे काँच से दमकते हुए। पिताजी ने जिस कक्ष में अपनी बैठक जमाई वहाँ छत पर जाने के लिए चक्करदार सीढिय़ां थी जो उनकी प्रसिद्ध कविता 'अंधेरे में' प्रतीक के रुप में है। इसी कक्ष में वे लिखते-पढ़ते, आराम करते थे। जब कभी दादा-दादी राजनांदगाँव आते, उनका डेरा भी यही लगता था। दादाजी के लिए पलंग था, दादी फर्श पर बिस्तर लगाकर सोती थी। यहाँ उनकी उपस्थिति के बावजूद लिखते या पढ़ते वक्त पिताजी की एकाग्रता भंग नहीं होती थी। शुरु-शुरु में दादाजी का पलंग प्रवेश द्वार यानी भूतल पर स्थित कक्ष में रखा गया था ताकि बाथरुम तक जाने के लिए उन्हें कष्ट न हो। लेकिन पिताजी के लिए यह भी एक प्रकार से मिनी बैठक ही थी।
     वे देर रात तक लिखते और सुबह होने पहले उठ जाते। करीब 4 बजे। हमें भी जगाते थे ताकि हम पढऩे बैठे। लिखने के लिए बैठने के पूर्व चाय उनके लिए बेहद जरुरी थी। कोयला रहता था तो सिगड़ी जलाते थे या फिर रद्दी कागजों को जलाकर खुद चाय बनाते थे। कभी-कभी यह काम हम भी कर देते थे। सिगड़ी के आसपास बैठना, या फिर कागज जलाकर चाय बनाने में अलग आनंद था। आग की रोशनी में पिताजी का चेहरा दमकता रहता था। वे इत्मीनान से कंटर भर (पीतल का बड़ा गिलास) चाय पीते और फिर लिखने बैठ जाते थे। यह सिलसिला सुबह 8 बजे तक चलता था। फिर उनके कपड़े, इस्त्री करने का काम मेरा था। पैजामा-कुर्ता और कभी भी खादी की जैकेट भी।
    दोपहर हो, शाम हो या फिर रात। लिखते-लिखते जब वे थक जाते, मुझसे जासूसी किताब मांगा करते तनाव मुक्त होने के लिए। मुझे उन दिनों जासूसी किताबें पढऩे का इतना शौक था कि दिन में एक किताब खत्म हो जाती। जासूसी दुनिया, जासूसी पंजा, रहस्य, जे.बी. जासूस, गुप्तचर, मनोहर कहानियां आदि। लेखकों में इब्ने सफी बीए, ओमप्रकाश शर्मा, निरंजन चौधरी, बाबू देवकीनंदन खत्री आदि। जासूसी दुनिया के लेखक इब्ने सफी बी.ए. उन्हें पसंद थे और उनके पात्र कर्नल विनोद, केप्टन हमीद को वे याद करते थे। वेदप्रकाश काम्बोज के भी जासूसी उपन्यास उन्हें अच्छे लगते थे। हिन्दी में रहस्य -रोमांच के उपन्यासों के अलावा वे अंग्रेजी के डिटेक्टिव नॉवेल भी खूब पढ़ा करते थे। पैरी मेसन, आर्थर कानन डायल और भी बहुत सी किताबें वे पढऩे के लिए कहीं से लाते थे। मेरे लिए उनकी यह पसंद एक सुरक्षित व्यवस्था थी क्योंकि मुझे जासूसी किताब को कापी के भीतर छिपाकर पढऩे की जरुरत नहीं पड़ती थी। माँ की डाट-फटकार से भी, मैं बचा रहता था। मुझे तब और अच्छा लगता था जब वे मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर रेखाओं को पढऩे की कोशिश करते। मेरी हथेली की रेखाएँ बहुत कटी-पिटी हैं और अंगूठा काफी चौड़ा। मेरी माँ के अंगूठे जैसा। वे तल्लीन होकर देखते थे, बताते कुछ नहीं थे। जाहिर है ज्योतिष भी उनकी रुचि का विषय था, साइंस की तरह।
     पिताजी प्राय: रोज सुबह-सुबह, अखबार के आते ही, नीचे उतर आते थे और दादाजी को अखबार की खबरें पढ़कर सुनाया करते थे। खबरों पर लंबी-लंबी बाते होती थीं। घंटे दो घंटे कैसे निकल जाते थे, पता ही नहीं चलता था। कॉलेज से लौटने के बाद शाम को भी वे दादाजी के पास बैठते थे। बातें करते थे। हमारी दादी को पढऩे का बहुत शौक था। पिताजी कॉलेज की लायब्रेरी से उनके लिए उपन्यास-कहानी संग्रह लेकर आते थे। मुझे पढऩे का चस्का दादीजी की वजह से हुआ। किताबें आती थी, मैं भी देखता-परखता था। कुछ-कुछ पढ़ता भी था। बंकिम चटर्जी, शरतचंद्र, प्रेमचंद, कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी, आचार्य चतुरसेन, वृंदावन लाल वर्मा और यशपाल भी मेरे प्रिय लेखक थे।
    बसंतपुर के तुलना में दिग्विजय कॉलेज के दिन और भी बेहतर थे। मित्रों के साथ साहित्यिक चर्चाओं का सिलसिला तेज हो गया था। दूसरे शहरों से आने वालों में प्रमुख थे शमशेर बहादुर सिंह, श्रीकांत वर्मा, हरिशंकर परसाई, आग्नेश्का कोलावस्का सोनी व विजय सोनी। प्राय: रोज आने वालों में ये प्रमुख थे- डा. पार्थ सारथी, अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक। कॉलेज में एकमात्र वे ही थे जिनसे प्राय: अंग्रेजी में वैचारिक बहस हुआ करती थी। डा. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी व उनका परिवार भी पास ही में रहता था पर वे शायद ही कभी आए। अलबत्ता पिताजी कभी-कभी उनके यहाँ जाया करते थे। वे भी हिन्दी पढ़ाते थे। शरद कोठारी, रमेश याग्निक, जसराज जैन, विनोद कुमार शुक्ल, निरंजन महावर, कन्हैयालाल अग्रवाल, अटल बिहारी दुबे, कॉमरेड किस्म के कुछ और लोग, जिनके नाम याद नहीं, आया जाया करते थे। कॉलेज के प्रिंसीपल किशोरीलाल शुक्ल भी घर आते थे। महफिल जमती थी, बातें खूब होती थी। प्राय: शाम के बाद। पिताजी धार्मिक कर्मकांड पर कितना विश्वास रखते थे, मुझे नहीं मालूम। उन्हें मंदिर जाते न मैंने देखा न सुना। अलबत्ता दादाजी की गैरहाजिरी में या अस्वस्थ होने पर वे घर में पूजा जरुर करते थे, पूरे मंत्रोच्चार के साथ। होलिका दहन के दिन होली घर के बाहर सजाकर होली पूजा भी वे करते थे, बाकायदा धवल वस्त्र यानी धोती पहनकर। इसलिए वे नास्तिक तो नहीं थे, कितने आस्तिक वह थे, यह अब कौन तय कर सकता है? इतना जरुर कहा जा सकता है कि वामपंथी विचारधारा से सहमत होने का अर्थ नास्तिक होना नहीं है। ईश्वर में आस्था सबकी होती है, भले ही कोई कुछ भी कहे।
बहरहाल राजनांदगाँव में जितना समय भी बीता था, सुखद था, बहुत सुखद। अभावग्रस्तता कभी इतनी विकट नहीं थी कि फाके करने की नौबत आए। वरन यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि राजनांदगाँव में अर्थाभाव चिंतात्मक नहीं था। काम चल रहा था, मजे से चल रहा था। पिताजी खुश थे और हम सभी भी। छोटे थे, पढ़ते थे, खेलते-कूदते थे। सारा दिन खुशी-खुशी बीत जाता था। हमारे घर के आजू-बाजू में दो बड़े तालाब थे, हैं, जो अब और भी खुबसूरत हो गए हैं। पिताजी हमें सुबह तालाब में नहाने-तैरने ले जाते थे। तैरना हमने उन्हीं से सीखा। खुद अच्छे तैराक थे, दूर तक जाते थे। लौटने के बाद एक-एक करके हम भाई-बहनों को तैरना सीखाते थे। कभी-कभी साथ में माँ भी हुआ करती थी। घंटे दो घंटे कैसे निकल जाते थे, पता ही नहीं चलता था।
चाय और बीड़ी के बाद पिताजी को भोजन में यदि सबसे अधिक प्रिय कोई चीज थी तो वह थी दाल। तुवर दाल। दाल के बिना उनका भोजन पूर्ण नहीं होता था। वे दाल खूब खाते थे। अंडे को कच्चे निगल लेते थे क्योंकि सवाल दूध की उपलब्धता का था।
    उन्हें जब कभी समय मिलता, लिखने बैठ जाते थे। एक बैठक के बाद जब वे उठते थे, नीचे फर्श पर कटे-पिटे कागजों का ढेर पड़ा रहता था जिन्हें वे सहेजकर रद्दी की टोकरी में डाल देते थे। मेरी लिखावट कुछ बेहतर थी इसलिए कई बार अपनी कविताओं की कॉपी करने देते थे। लंबी-लंबी कविताएँ। कार्बन काफी तैयार की जा सकती थी लेकिन इसके लिए पैसे की जरुरत होती है। लिहाजा पत्र-पत्रिकाओं को हस्तलिखित कविताएँ भेजने के बाद शायद कोई दूसरा ड्राफ्ट नहीं रहता होगा। यह भी संभव है प्रकाशन के लिए स्वीकार न किए जाने की स्थिति में कविताएँ लौटकर न आती हों। प्रकाशक ने वापस न भेजी हों। नागपुर में उनके एक मात्र उपन्यास का ड्राफ्ट, जैसा कि मैने सुना, खोने का संभवत: यह भी एक कारण रहा होगा।
     बहरहाल उन्हीं दिनों 1962-63 में मुझे दमे की शिकायत हो गई। पिताजी के सामने नई चिंता। मेरा इलाज शुरु हो गया। पिताजी की आदत थी, जब कभी उन्हें जोर-शोर से अपनी कविताओं का पाठ करना होता था, वे हम में से किसी एक को गोद में बैठा लेते थे। चूंकि मैं बीमार रहता था अत: वे प्राय: मुझे गोद में लिटाकर कविताएं पढ़ते थे। आगे पीछे डोलते हुए। हमें नींद लग जाती थी, उठते थे तो देखते थे - हम बिस्तर पर हैं।
चूंकि घर के आजू-बाजू तालाब था-रानी सागर और बूढ़ासागर। लिहाजा ठंड के दिनों में ठंडी हवाएं खूब चलती थी। वातावरण में हमेशा आद्र्रता रहती थी। यह समझा गया कि मेरे दमे की एक वजह हवा में पसरी हुई ठंडक हो सकती है। फलत: शहर से दूर जैन स्कूल में मेरे रहने का प्रबंध किया गया। गर्मी के दिन थे, स्कूल में छुट्टियां थी। मैं कुछ दिन माँ के साथ वहीं रहा। बाद में लेबर कॉलोनी में मेरे लिए अलग से छोटा सा मकान किराये पर लिया गया जहाँ मैं और बड़े भैय्या रहने लगे। कॉलेज छूटने के बाद पिताजी रोज अपने किसी न किसी मित्र को लेकर मुझे देखने आते थे। धीरे-धीरे मेरी तबीयत ठीक होती गई और शायद जनवरी 1964 में मैं फिर से कॉलेज वाले घर में आ गया। लेकिन पिताजी बीमार पड़ गए। उन पर अकस्मात पैरालिसिस का अटैक हुआ। शायद कॉलेज से लौटते हुए वे गिर गए। उनका आधा शरीर निर्जीव हो गया, अलबत्ता चेहरा अछूता था। लेकिन शब्द टूटने लगे थे। बहुत धीमे बोल पाते थे।
     वे बीमार पड़ गए। मैं ठीक होता गया। इतिहास का वह किस्सा मुझे याद आने लगा कि कैसे बादशाह बाबर ने अपने बीमार बेटे हुमायूं की जिंदगी बचाने के लिए प्रार्थनाएं की जो कबूल हुई। हुमायंू ठीक हो गए। बादशाह बीमार पड़ गए और अंतत: चल बसे।
     क्या मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ होने वाला था? यह बात तर्क संगत यह भले न लगे पर मैं इतिहास के उस किस्से को अपने साथ जोड़ ही सकता हूं। दरअसल एक दिन मैं घर की बड़ी सी खिड़की पर बैठा हुआ था। घर की खिड़कियां कमरे के भीतर से इतनी चौड़ी रहती थी कि कोई भी उस पर आराम से बैठ सकता था। रात हो चली थी, पिताजी आए। वे अपने साथ पासपोर्ट साइज की जैकेट से वाली तस्वीर लेकर आए थे। फोटो उन्होंने कब और किससे खिंचवायी थी मुझे याद नहीं। वह फोटो उन्होंने मुझे देखने के लिए दी। किन्तु उनका फोटो देखकर न जाने क्यों मेरा मन रुआंसा हो गया। क्या यह कोई संकेत था?
    दूसरी घटना - भोपाल रेलवे स्टेशन की। हमीदिया अस्पताल में उनकी सेहत सुधरती न देखकर उन्हें नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती कराने की व्यवस्था की गई थी। हम रेलवे स्टेशन पर थे। एक कंपार्टमेंट में बर्थ पर पिताजी अद्र्धचेतनावस्था में लेटे हुए थे। आसपास के वातावरण से एकदम बेखबर। माँ साथ में थी और पिताजी मित्रगण - परसाई जी, प्रमोद वर्मा जी और भी कई। पिताजी की ऐसी अवस्था देखकर मन फिर भीग गया। लगा जैसा कि यह उनका अंतिम दर्शन है। वाकई मेरे लिए वह अंतिम दर्शन ही था। उनसे मिलने हम दिल्ली जा नहीं पाए। पिताजी 11 सितंबर 1964 को विदा हो गए। हूमायूं का किस्सा मुझे लगता है, मेरे लिए हकीकत बन गया। मेरे लिए, मेरे जीवन का यह सबसे बड़ा सत्य हैं।
     मुझे याद नहीं पिताजी कभी बीमार पड़े हो। ऊंचे पूरे, स्वस्थ और सुदर्शन व्यक्तित्व। हमेशा प्रसन्न रहने वाले। मैंने उन्हें गुस्से में कभी नहीं देखा। अलबत्ता कभी-कभी विषाद और चिंताएं उनकी बेचैनी भरी चहलकदमी से महसूस की जा सकती थी। स्वामी कृष्णानंद सोख्ता के रोड एक्सीडेंट में मारे जाने की खबर जब उन्हें मिली तो वे बेहद दु:खी हुए। इसी तरह भोपाल के हमीदिया अस्पताल में बिस्तर पर पड़े-पड़े जीवन के प्रति उनका निराशा को चेहरे पर देखा-पढ़ा जा सकता था। हालांकि इलाज के चलते उनकी तबीयत में कुछ सुधार हुआ था। सहारा लेकिन वे कुछ कदम चलने-फिरने लगे थे लेकिन इलाज का प्रभाव सीमित ही रहा। मुझे लगता है दो बड़ी घटनाओं ने उन्हें तगड़ा मानसिक आघात दिया जिसका असर उनकी सेहत पर पड़ा। पहली घटना जब तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार के पाठ्यपुस्तक के रुप में स्वीकार की गई उनकी किताब भारत: इतिहास और संस्कृति पर प्रतिबंध लगा, संघ समर्थकों ने जगह-जगह किताब की होली जलाई और दूसरी घटना बीमारी के दौरान उनके लिए की गई आर्थिक सहायता की अपील। धर्मयुग में प्रभाकर माचवेजी का लेख और मदद की अपील ने उन्हें बहुत विचलित किया। स्वाभिमान पर ऐसी चोट उनके जैसा संवेदनशील कवि कैसे बर्दाश्त कर सकता था? उन्होंने इस अभियान को पसंद नहीं किया किन्तु उसे रोक नहीं पाए। शारीरिक अवस्था ऐसी नहीं थी कि प्रतिकार किया जाए। पर वे बहुत दुखी थे।
    पिताजी को गुजरे 52 वर्ष हो गए। आधी शताब्दी बीत गई। हम, उम्र दराज हो गए, एक को छोड़ तीनों भाई 60 के पार। इस बीच माँ नहीं रही, विवाहिता बहन नहीं रही, भाभी नहीं। कितना कुछ बदल गया लेकिन नहीं बदला तो घर का वातावरण। वह अभी भी वैसा ही है जैसा हमारे नागपुर में नयी शुक्रवारी, गणेश पेठ, राजनांदगाँव में बसंतपुर व दिग्विजय कॉलेज परिसर वाले मकान में था। पिताजी की सशरीर मौजूदगी वहाँ थी और अब रायपुर में हमारे घर में उनकी अदृश्य उपस्थिति, हमारी आत्मा में उपस्थिति मौजूद हैं। इसलिए हमेशा यह महसूस होता हैं, वे कहीं गए हैं, बस आते ही होंगे।

Sunday, October 16, 2016

धोनी की कप्तानी की अग्निपरीक्षा आज से

हेलीकॉप्टर शॉट आसमान छुएगा या जमींदोज होगा?

-दिवाकर मुक्तिबोध

आज से एम.एस. धोनी की एक नई परीक्षा की शुरुआत है। यह परीक्षा ठीक वैसे ही है जब कोई नवोदित खिलाड़ी टेस्ट कैप के लिए घरेलू क्रिकेट में झंडा फहराने की कोशिश करता है। दरअसल न्यूजीलैंड के खिलाफ एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय 5 मैचों की शुरुआत 16 अक्टूबर को धर्मशाला से हो रही है। एक दिवसीय के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी इस शृंखला में कड़ी परीक्षा के दौर से गुजरने वाले हैं। इस परीक्षा को टेस्ट कप्तान विराट कोहली ने और भी कठिन बना दिया है। उन्होंने तीन टेस्ट मैचों की शृंखला में मेहमान टीम को बुरी तरह से धोया और आईसीसी रैंकिंग में भारत को पुन: नम्बर एक की स्थिति में पहुंचा दिया। धोनी भी ऐसा कमाल कर चुके हैं किंतु अब एक दिवसीय में रैकिंग सुधारने के लिए उन्हें न्यूजीलैंड को 4-1 से हराना होगा। धर्मशाला की पिच सफलता के लिहाज से भारत के लिए अनुकूल नहीं है। वहां अब खेले गए 2 एक दिवसीय में भारत ने 1 मैच जीता, एक हारा हालांकि इस पिच पर अलग-अलग क्रिकेट देशों के बीच अब तक कुल 10 मुकाबले हुए हैं। तो अब सवाल क्या धोनी की कप्तानी में धर्मशाला में हार से शुरुआत होगी या धमाकेदार जीत से। क्रिकेट में इस तरह का कोई भी सवाल बेमतलब सा है लिहाजा सिर्फ एक बात तय है, धोनी के सामने चुनौती बहुत कठिन है। इसमें सफलता या असफलता दोनों, धोनी के क्रिकेट कॅरियर का भविष्य तय करेगी जो फिलहाल ढलान पर है।
     सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली जैसे महान भारतीय क्रिकेटरों की तुलना में एम.एस. की बल्लेबाज के रूप में उपलब्धियां बहुत चमकीली नहीं है। उन्होंने न तो शतकों का कोई पहाड़ खड़ा किया और न ही एक रन के आगे शून्य लगाते चले गए लेकिन इसके बावजूद कप्तान के बतौर उनका कोई मुकाबला नहीं है। जो उपलब्धियां उनकी कप्तानी में भारतीय टीम ने हासिल की है, वे उन्हें सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटर के रूप में प्रतिष्ठित करती है। उनका मिजाज भी उन्हें अन्य से अलग करता है और क्रिकेट में एक नई शैली हेलीकाप्टर शॉट के ''अविष्कार'' का श्रेय उन्हें देता है। वे पहले ऐसे क्रिकेटर भी हैं जिनके जीवन पर नीरज पांडे जैसे ख्यात फिल्मकार ने फिल्म बनाई जबकि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उनका सफर अभी जारी है। पूर्व कप्तान अजरूद्दीन की बायोपिक 'अजहर'  व्यावसायिक दृष्टि से फ्लाप रही पर एम.एस. धोनी-अनटोल्ड स्टोरी 100 करोड़ के दायरे में शामिल हो गई।
बहरहाल इसमें कोई शक नहीं, धोनी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहने की स्थिति में आ गए हैं। सफर शायद दो चार साल और चले। शायद 2019 के वल्र्ड कप तक। लेकिन यह निर्भर करता है, उनके परफार्मेंस पर जो अब फीका पड़ता जा रहा है। हेलीकाप्टर शॉट लगभग गायब हो गए हैं तथा सर्वश्रेष्ठ फिनिशर की आसंदी भी डोलने लगी है। संकट में पड़ी भारतीय टीम को जीत के मुहाने पर ले जाने की भूमिका में भी वे पिछडऩे लगे हैं। पिछले मुकाबले इसके गवाह हैं। इसी वर्ष जुलाई-अगस्त में वेस्टइंडीज के विरुद्ध अमेरिका के फ्लोरिडा में खेले गए तीन टी-20 मैचों में वे सीरीज नहीं जीत पाए जबकि टेस्ट सीरीज में विराट ने पताका फहरा दी। फ्लोरिडा में पहला मैच जीतने के बाद दूसरे में वेस्टइंडीज के बनाए पहाड़ जैसे रनों का सफलतापूर्वक पीछा करते हुए धोनी ने टीम को जीत की दहलीज पर ला खड़ा किया लेकिन आखिरी गेंद पर जरूरत का एक रन वे नहीं बना सके। इसके पूर्व जिम्बाब्वे के खिलाफ पहले टी-20 के अंतिम ओव्हर में धोनी 8 रन नहीं बना सके। इस साल वल्र्ड कप में भी धोनी बैरंग नजर आए। वल्र्ड कप- टी-20 के पांच मैचों में वे सिर्फ 89 रन जोड़ सके। इसके अलावा और भी आंकड़े हैं जो धोनी की साख पर सवाल उठा रहे हैं। ऐसा लगता है, उनका वह जादुई टच लुप्त हो गया है जो धोनी को धोनी बनाता रहा है।
    यकीनन अब भारतीय क्रिकेट में विराट का दौर शुरू हो गया है। टेस्ट क्रिकेट में बतौर कप्तान और एक बल्लेबाज के रूप में विराट की सफलताएं भविष्य में सचिन तेंदुलकर के विश्व कीर्तिमानों को पीछे छोड़ दें तो कोई आश्चर्य नहीं। वे फिलहाल टेस्ट कप्तान हैं पर देर-सबेर  क्रिकेट के शेष दोनों फार्मेट की भी कप्तानी उनके हाथों में होगी। सवाल सिर्फ समय और परिस्थितियों का है। न्यूजीलैंड के खिलाफ धोनी यदि कामयाब रहते हैं तो विराट को इंतजार करना पड़ सकता है। अन्यथा नहीं। वैसे न्यूजीलैंड को फतह करने के बाद विराट की एक टिप्पणी गौर करने लायक है जिसमें उन्होंने कहा था कि रिद्धिमान साहा के रूप में टीम को निचले क्रम का सर्वश्रेष्ठ विकेटकीपर एवं आलराउंडर मिला है जो पुछल्ले बल्लेबाजों के साथ जीत का सफर तय करता है। क्या यह टिप्पणी धोनी के सन्दर्भ में है जो विकेट कीपर व मध्यमक्रम के बल्लेबाज हैं? क्या इसे भविष्य का संकेत माना जाए?
     धोनी के आलोचकों की संख्या कम नहीं है। मोहिंदर अमरनाथ, बिशन सिंह बेदी, योगराज सिंह अग्रणी रहे हैं जो धोनी को हटाने की मांग अरसे से कर रहे हैं। इसमें पूर्व कप्तान अजरुद्दीन भी शामिल है। वे धोनी से कप्तानी छीनने किंतु विकेटकीपर बल्लेबाज के रूप में खेलते रहने की वकालत करते हैं। लेकिन केप्टन कूल ने कभी किसी पर पलटवार नहीं किया, कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। प्रवासी न्यूजीलैंड के खिलाफ यदि उनकी टीम सीरीज हार जाती है तो जाहिर है उन्हें हटाने एवं विराट की कप्तानी सौंपने की मांग जोर पकड़ेगी। अप्रत्याशित फैसले से सभी को चकित करने वाले धोनी संभव है क्रिकेट के दोनों फार्मेट से स्वयं हट जाएं  और खुद को आईपीएल तक सीमित रखें। ऐसा कोई फैसला सीरीज जीतने के बावजूद वे ले सकते हैं। लिहाजा यह कहा जा सकता है कि मौजूदा एकदिनी शृंखला धोनी के लिए परीक्षा की घड़ी है। यदि वे खोयी लय को प्राप्त कर लेंगे तो एक नए धोनी का अवतरण होगा। कहा जाता है दिए की लौ बुझने के पूर्व ज्यादा दीप्तिमान होती है। क्या धोनी के साथ ऐसा ही होगा, शृंखला तय करेगी।

Thursday, September 29, 2016

पितरों का तर्पण और छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस

-दिवाकर मुक्तिबोध

पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के नेतृत्व में गठित छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस प्राय: हर मौके को राजनीतिक दृष्टि से भुनाने की फिराक में रहती है। कह सकते हैं, एक ऐसी राजनीतिक पार्टी जिसे अस्तित्व में आए अभी 6 माह भी नहीं हुई हैं, के लिए यह स्वाभाविक है कि वह जनता के सामने आने का, उनका समर्थन हासिल करने का तथा उनके बीच अपनी पैठ बनाने का कोई भी अवसर हाथ से जाने न दें लेकिन ऐसा करते वक्त एक चिंतनशील राजनेता को यह भी देखने की जरूरत है कि मानवीय संवेदनाओं की आड़ में उनकी राजनीति क्या तर्कसंगत और न्यायोचित कही जाएगी और क्या इस तरह की राजनीति पार्टी के लिए फायदेमंद होगी? यह ठीक है कि अजीत जोगी हर सूरत में वर्ष 2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव में अपनी दमदार उपस्थिति दिखाना चाहते हैं और इसके लिए वे हर किस्म की कवायद के लिए तैयार हैं, आगे-पीछे नहीं सोच रहे हैं।
          बीते महीनों के कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो तार्किक दृष्टि से राजनीति करने के लिए उचित नहीं ठहराए जा सकते अथवा सवालिया निशान खड़े करते हैं। ताजातरीन दो मामले सामने हैं- राजधानी के सेरीखेड़ी में चार बच्चों की दुर्घटना में अकाल मौत और दूसरी पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध पक्ष के अंतिम दिन तर्पण की घोषणा। जोगी कांग्रेस ने इस तर्पण कार्यक्रम के लिए बाकायदा समाज विशेष से अनुमति हासिल की। पार्टी का आरोप है कि राज्य सरकार की जनविरोधी नीतियों के चलते किसान आत्महत्या कर रहे हैं। नक्सली घटनाओं में बेगुनाह नागरिक मारे जा रहे हैं। मुठभेड़ों में राज्य पुलिस व अद्र्धसैनिक बलों के जवान भी शहीद हो रहे हैं। पुलिस प्रताडऩा से हिरासत में निरपराध युवकों की मौतों की घटनाएं बढ़ रही हैं आदि-आदि। चूंकि मृत व्यक्तियों की आत्माएं कथित रूप से भटक रही हैं अत: उनकी शांति के लिए पितृपक्ष के अंतिम दिन तर्पण, हवन-पूजन का आयोजन जरूरी है। इसके बाद गांधी जयंती के दिन उन्हें श्रद्धांजलि और उपवास। ऐसा पहली बार हुआ है जब मुद्दों की तलाश में किसी राजनीतिक पार्टी ने इतनी दूर तक सोचा हो। यह सचमुच हैरतअंगेज ख्याल है कि पितृपक्ष को भी राजनीतिक तौर पर भुनाया जा सकता है। जोगी कांग्रेस ऐसा कर रही है। क्या यह उसकी उपलब्धि है अथवा राजनीतिक प्रपंच? इसे जनता ही तय करेगी जो बहुत समझदार है।
बहरहाल, पहली घटना जिसमें चार बच्चे अकाल मौत के शिकार हुए, दर्दनाक और दुर्भाग्यजनक है। सड़क दुर्घटनाएं आम तौर पर चालकों की लापरवाही के परिणामस्वरूप घटित होती हैं। दुर्घटनाएं प्राय: रोज होती हैं जिसमें लोग मारे जाते हैं या घायल होते हैं। लेकिन प्रत्येक घटना के विरोध में सड़क पर एलाने-जंग नहीं होता। अलबत्ता गंभीर हादसों में गुस्साए लोगों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया के रूप में चक्काजाम या शव के साथ प्रदर्शन जरूर होता रहा है। सेरीखेड़ी की घटना गंभीर थी लिहाजा जनता का गुस्सा स्वाभाविक था। जोगी कांग्रेस ने इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश की। वह इसमें कूद पड़ी। राजमार्ग पर घंटों चक्काजाम किया गया। खुद जोगी सड़क पर लेट गए। चक्काजाम खोलने पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। गिरफ्तारियां करनी पड़ी। जोगी ने पीडि़त परिवार की मांग का समर्थन किया कि मृतकों के परिवार को 25-25 लाख का मुआवजा दिया जाए। जोगी पीडि़त परिवार से मिले तथा उन्हें सांत्वना दी। यानी राजनीति के साथ-साथ संवेदनशीलता भी प्रदर्शित की। 
            अब सवाल है क्या सड़क दुर्घटनाओं को भी राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है? क्या इससे पार्टी का कद ऊंचा होता है? क्या जनता के बीच अच्छा संदेश जाता है? क्या ऐसा करना सकारात्मक राजनीति है? क्या ऐसे आंदोलन से जनाधार मजबूत होता है? क्या मानवीय संवेदनाओं से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक हस्तक्षेप तर्कसंगत है? अगर इन सभी सवालों का जवाब हां में है तो प्रत्येक सड़क दुर्घटना के बाद जिसमें मौते होती हैं, सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन, सड़कजाम किया जाना चाहिए। क्या जोगी कांग्रेस ऐसे आंदोलनों के लिए तैयार है? यह भी प्रश्न है कि तब उसका रुख क्या होगा जब किसी सड़क दुर्घटना में हुई मौतों के लिए पार्टी के कार्यकर्ता जिम्मेदार होंगे? 26 सितम्बर को राजमार्ग 353 पर महासमुंद के बेलसोंडा में उनकी पार्टी के कार्यकर्ता की जीप से कुचलकर दो बाइक सवार युवकों की मौत हो गई। अब जोगी कांग्रेस क्या करेगी? क्या मृतकों के परिवार को पार्टी फंड से पर्याप्त मुआवजा देगी? तथा न्यायसंगत कार्रवाई के लिए सरकार के साथ सहयोग करेगी। 
         दरअसल प्रत्येक घटना-दुर्घटना जनसमर्थन के विस्तार का आधार नहीं बन सकती। सड़क दुर्घटनाएं भी इसी श्रेणी में है। इसी तरह पितरों का तर्पण राजनीतिक नाटकीयता से अधिक कुछ नहीं है। एक राजनीतिक स्टंट। इससे जोगी कांग्रेस की आत्मा को शांति मिल सकती है, पितरों को नहीं। प्रबुद्ध जनता भी ऐसी नाटकीयता से प्रभावित नहीं होती लिहाजा यह कवायद आत्मसंतुष्टि दे सकती है, पार्टी को ऊंचाई नहीं। पार्टी को ऐसे कार्यक्रमों से बचने की कोशिश करनी चाहिए जो नकारात्मक मूल्यों का बायस बनते हैं। जोगी कांग्रेस ने अपने अस्तित्व में आने के चंद महीनों के भीतर ही समूचे राज्य में जिस तेजी से अपनी उपस्थिति दर्ज की है, वह काबिले तारीफ है और ऐसा इसलिए संभव हुआ है क्योंकि पार्टी ने लगातार जनता के मुद्दे उठाए हैं, जनआंदोलन किए हैं। जब पार्टी स्वयं को कांग्रेस व भाजपा के बाद तीसरे विकल्प के रूप में जनता के मन में विश्वास पैदा करना चाहती है तो 'स्तरहीन राजनीतिÓ किस लिए? राज्य में जनता से जुड़े मुद्दों की कमी नहीं है किंतु मानवीय संवेदनाओं से जुड़े सवालों पर गंभीर रहने की जरूरत है, राजनीति की नहीं।

Wednesday, September 21, 2016

दलित की मौत और दलित होने का अर्थ

-दिवाकर मुक्तिबोध
खुशहाल छत्तीसगढ़, विकास की दौड़ में सबसे तेज छत्तीसगढ़, हमर छत्तीसगढ़ और भी ऐसे कई जुमले जो राज्य सरकार उछालती रहती है, दावे करती है। परन्तु क्या वास्तव में यही पूरा सच है ? क्या सब कुछ व्यवस्थित चल रहा है ? क्या राज्य में अमन चैन है ? क्या शासन-प्रशासन की संवेदनशीलता कायम है ? क्या नक्सल मोर्चे में पर सब कुछ ठीक चल रहा है ? अब कोई फर्जी मुठभेड नहीं ? पुलिस का चेहरा सौम्य और कोमल है तथा वह जनता की सच्चे मायनों में मित्र है। और क्या अब वह थर्ड डिग्री का इस्तेमाल नहीं करती तथा थाने में तलब किए गए निरपराध लोगों के साथ में सलीके से पेश आती है? अब अंतिम प्रश्न-क्या पुलिस हिरासत में मौतों का सिलसिला थम गया है? इन सभी सवालों का एक ही जवाब है- ऐसा कुछ भी नहीं है। न पुलिस का चेहरा बदला है न शासन-प्रशासन का। संवेदनशीलता गायब है तथा क्रूरता चरम पर । इसीलिए पुलिस हिरासत में मौत की घटनाएं भी थमी नहीं है।
          बीते वर्षो में घटित पुलिस-पशुता की कितनी घटनाएं याद करें। कवर्धा में पुलिस हिरासत में बलदाऊ कौशिक की मौत, नवागढ़ में भगवन्ता साहू, आरंग में राजेश, जीआरपी भिलाई थाने में सुखलाल लोधी, कुरूद में योगेश, बिलासपुर में शिवकुमार, अंतागढ़ में जागेश्वर साहू और रायपुर फाफाडीह थाने में बिदेश्वर शाह। ये कुछ नाम है जो पुलिस अमानुषता के शिकार हुए हैं। वे पिटाई से मर गए या उन्होंने भयाक्रान्त होकर थाने में फांसी लगा ली। ये वे लोग हैं जो बेवजह मारे गए। परिजनों को पता नहीं न्याय मिला कि नहीं। ये वे घटनाएं हैं जो उजागर हुईं। वनांचलों या दूरस्थ इलाकों में स्थित थानों में कितना कुछ घटित होता होगा, कल्पना की जा सकती है। सोचें, कितना बर्दाश्त करते होंगे वे ग्रामीण जो पूछताछ के नाम पर पुलिस की क्रूरता के शिकार होते हैं। नदी-नाले पार करके, राजधानी या जिला मुख्यालय आना, पुलिस अत्याचार के खिलाफ बड़े पुलिस वालों से शिकायत करना क्या आसान है? इसके लिए कितना जबरदस्त-साहस चाहिए, कलेजा चाहिए। क्या अत्याचार पीडि़त ऐसा कर पाते हैं? जाहिर है-नहीं। कई घटनाओं की रिपोर्टिंग नहीं होती और वे रफा-दफा कर दी जाती हैं। ऐसे में क्या यह नहीं कहा जाना चाहिए कि राज्य के ग्रामीण थाने यातना शिविर बने हुए हैं। 
दरअसल संदर्भ है अभी हाल में (17 सितम्बर 2016) जांजगीर जिले के पामगढ़ के अन्तर्गत मुलमुला थाने में 21 वर्षीय युवक सतीश नवरंगे की मौत की घटना । बिजली विभाग के कर्मचारियों की एक मामूली सी शिकायत पर पुलिस ने उसे थाने में तलब किया और इतना पीटा की उसकी मौत हो गई। युवक दलित था। दलितों का आक्रोश तो फूटा ही, पुलिस अत्याचार के खिलाफ आम लोग भी सड़क पर उतर आए। जन आक्रोश को देखते जिला पुलिस प्रशासन को तत्काल कार्रवाई करनी पड़ी। थानेदार सहित तीन को संस्पेड कर दिया गया। 
      ऐसी घटनाओं में राजनीतिक दखल स्वाभाविक है और होना भी चाहिए। भले ही यह कहा जाए कि इस तरह की राजनीति स्वार्थपरक होती है। यकीनन काफी हद तक यह सही भी है किन्तु यह भी सच है कि इससे जो दबाव बनता है, वह सरकार को कार्रवाई करने के लिए विवश करता है। विचार करें यदि सतीश प्रकरण में जनआक्रोश नहीं उबलता, राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होता, धरना-प्रदर्शन, चक्काजाम, नगर बंद एवं सीएम हाऊस के सामने विपक्ष नहीं गरजता तो क्या त्वरित कार्रवाई होती ? आरोपी पुलिस वालों के निलबंन के साथ-साथ मुख्यमंत्री पीडि़त परिवार के लिए 1 लाख की सहायता की घोषणा करते? बाद में 5 लाख और देने का ऐलान होता? सतीश की पत्नी को सरकारी नौकरी दी जाती ? और क्या उसके दोनों बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का खर्च सरकार वहन करती ? जाहिर है इसके पीछे एक बड़ा कारण विपक्ष और जनता का दबाव भी था। जिसकी वजह से सरकार को एकमुश्त राहतों की घोषणा करनी पड़ी। ऐसा पहली बार हुआ जब तुरत-फुरत एसआई समेत चार पुलिस वालों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया। और न्यायिक जांच के लिए हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश इंदर उपवेजा की नियुक्ति की गई। 
       लेकिन यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि राज्य सरकार ने सतीश की मौत के मामले में जिस संवेदनशीलता का परिचय दिया है, वह आम तौर इसके पूर्व घटित घटनाओं में कभी दिखाई नहीं दिया। क्या ऐसा इस वजह से है कि मृतक दलित वर्ग से था ? चूंकि देश में इस जमात पर अत्याचार की घटनाएं बेतहाशा बढ़ी हैं इसलिए राज्य सरकार ने इस घटना को तुरंत संज्ञान में लेकर कार्रवाई की ? लगता तो यही है। बहरहाल सरकार की सदाशयता में भी विवशता की प्रतिध्वनि सुनी जा सकती है। इसमें राजनीति को भी नकारा नहीं जा सकता। राज्य की भाजपा सरकार ने एक झटके में मौत के इस मामले में विपक्ष की राजनीति का पटाक्षेप कर दिया। अब दोनों कांग्रेस के पास सरकार को कटघरे में खड़ा करने के लिए कोई मुद्दा शेष नहीं है। सतीश की मौत की घटना भले ही मर्मांतक हो पर इसमें शक नहीं कि सरकार ने बाजी जीती है। यह उसकी कूटनीतिक जीत है।

Friday, September 16, 2016

राजधानी ही नहीं गांवों की ओर भी झांकिए जनाब

फोटो कैप्शन : सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री टी.एस.ठाकुर ने 10 सितंबर को राजधानी रायपुर के भारतीय प्रबंध संस्थान (आई.आई.एम.) के प्रेक्षागृह में राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण बिलासपुर द्वारा आदिवासियों के अधिकारों का संरक्षण और प्रवर्तन विषय पर आयोजित देश की पहली कार्यशाला को संबोधित किया। इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह भी मौजूद थे।
-दिवाकर मुक्तिबोध

सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति टी एस ठाकुर छत्तीसगढ़ की प्रगति से अभिभूत हैं। हाल  मेंही में वे रायपुर प्रवास पर थे। महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के अलावा उन्होंने नई राजधानी का भी दौरा किया। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी उनके साथ थे। यहां चमचमाती चौड़ी सड़कें, ऊंची-ऊंची खूबसूरत इमारतें, हरे-भरे पेड़-पौधे उन्हें आनंदित करने के लिए काफी थे। यह सब देखकर उनकी सकारात्मक प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी-''छत्तीसगढ़ को बाहर के लोग गरीब और पिछड़े राज्य के रूप में देखते हैं पर ऐसा नहीं हैं। राज्य तेजी से प्रगति कर रहा है और इसका श्रेय मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को है।ÓÓ अब अभिभूत  होने की बारी मुख्यमंत्री रमन सिंह की थी। पर वे निर्विकार रहे दरअसल मुख्यमंत्री को अब इस तरह की कोई तारीफ प्रभावित नहीं करती। देश की राजधानी दिल्ली या मेट्रो से जो भी अति महत्वपूर्ण व्यक्ति जिनमें केन्द्रीय मंत्री भी शामिल है, रायपुर आते हैं, विकास को देखकर गद्गद् हो जाते हैं। तारीफ के पुल बांधते हैं और  इसका पूरा श्रेय राज्य की भाजपा सरकार और उसके मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को देते हैं। और तो और केन्द्र में यूपीए सरकार के जमाने में भी छत्तीसगढ़ के दौरे पर आने वाले कांग्रेसी और गैरकांग्रेसी मंत्री भी मुख्यमंत्री और राज्य की प्रगति की तारीफ करते अघाते नहीं थे। उनके इस रवैये से, प्रतिक्रियाओं से प्रदेश कांग्रेस के नेता परेशान रहते थे क्योंकि वे प्रतिपक्ष के नाते राज्य सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते थे। कुप्रशासन, भ्रष्टाचार, महंगाई, बेलगाम नौकरशाही, आम आदमी की परेशानी, किसानों की आत्महत्याएं, गरीबी, बेरोजगारी आदि मुद्दों पर मुख्यमंत्री को कटघरे में खड़ा करते थे, आरोपों की बौछार करते थे, सड़क की लड़ाई लड़ते थे पर उनके किए-धरे पर केन्द्रीय मंत्री पानी फेर देते थे। सर्टिफिकेट देकर जाते थे कि मुख्यमंत्री अच्छा काम कर रहे हैं, प्रदेश तेजी से प्रगति कर रहा है। प्रदेश के कांग्रेसी सख्त नाराज रहते थे कि केन्द्र में उनकी सरकार, उनके मंत्री पर रायपुर आकर भाजपा सरकार का गुणगान! यह कैसे राजनीति!
        बहरहाल राजनीति अपनी जगह और काम अपनी जगह। इसमें क्या शक कि  पिछले 12 वर्षों में यानी भाजपा सरकार के दौर में जो अभी जारी है, कम से कम रायपुर की तो कायापलट हो गई है। विवेकानंद एयरपोर्ट पर उतरते ही उसकी सुुंदरता देखकर आंखें फट जाती हैं। गज़ब का विमानतल। बेहद सुंदर। फिर नया रायपुर के क्या कहने। ऐसी दिलकश आधारभूत संरचनाएं, जो भी देखता है, तारीफ किए बगैर नहीं रहता। नए के साथ पुराना रायपुर भी तो बदल गया है। लिहाजा रायपुर की मुकम्मल तस्वीर यही बनती है कि जिस प्रदेश की राजधानी इतनी खूबसूरत हो, वह पिछड़ा और गरीब कैसे हो सकता है।
पर यह पूरा सच नहीं हैं। आधा सच भी नहीं। रायपुर को देखकर पूरे प्रदेश के बारे में राय नहीं बनाई जा सकती। अंदर के हालात काफी खराब हैं। आंकड़े बताते हैं कि गरीबी बढ़ी है, बेरोजगारी बढ़ी है, किसानों की ऋणग्रस्तता, ऋण अदा न कर पाने की स्थिति, व्याप्त निराशा और आत्महत्याएं की घटनाएं भी बढ़ी हंै। उच्च और प्राथमिक शिक्षा की दुरावस्था की अनेक कहानियां हैं जो सच है। प्राथमिक स्वास्थ्य भी बेहाल है। अधोसरंचना का विकास केवल चंद बड़े शहरों तक सीमित हैं। गांव अभी भी विकास से कोसो दूर हैं। बस्तर अभी बरसों से नक्सल दहशत में है। नक्सलियों के मारे जाने या उनके सरकार के सामने शरणागत होने के जितने भी दावे किए जाएं, पर समस्या रंच मात्र भी कम नहीं हुई है। पहुंचविहीन गांवों की लंबी फेहरिस्त है। जिस पी.डी.एस सिस्टम की देशव्यापी तारीफ हुई, वह किस कदर भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबा हुआ है, यह बहुचर्चित नान घोटाले से जाहिर है। बहुतेरे आदिवासियों का अभी भी राशन के लिए मीलों पैदल चलना पड़ता है, नदी-नाले और पहाडिय़ों लांघनी पड़ती हैं। केन्द्र व राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाएं किनका कल्याण कर रही है, यह सर्वविदित है। शासन-प्रशासन की बात करे तो मुख्यमंत्री संवेदनशील हो सकते हैं पर अफसरशाही नहीं, कामकाज में पारदर्शिता भी नहीं। राज्य में भ्रष्टाचार तो खैर चरम पर है। इतना सब होते हुए भी यह अलग बात है कि छत्तीसगढ़ को विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति के लिए राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा जाता रहा है। वर्ष 2015-16 की बात करें तो पुरस्कारों  की झड़ी लगी हुई है। एक के बाद एक फिलहाल एक दर्जन से ज्यादा पुरस्कारों की प्राप्ति हो चुकी हैप् तो क्या इसे ही सच माना जाए ? कुछ भी मैनेजबल नहीं ? जैसा कि आमतौर पर पुरस्कारों  के मामलों में देखा जाता रहा है।
      दरअसल प्रगति की तस्वीर गांवों से बननी चाहिए। विशेषकर आदिवासी गांवों से। यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि आजादी के 68 वर्षों के बाद भी छत्तीसगढ़ के गांव बदहाल क्यों है। एक पूरी पीढ़ी बदहाली में मर गई, दूसरी, तीसरी, चौथी भी अभावों में जी रही है। पिछले 12 वर्षों से मुख्यमंत्री एवं मंत्री गांवों का स्थिति का जायजा लेने हफ्ते दस दिन का सम्पर्क अभियान चलाते हैं पर क्या उन गांवों का हालत सुधरी? अब विधायकों एवं सांसदों को गांव एॅलाट किए गए हैं, लेकिन क्या उनकी तस्वीर थोड़ी बहुत बदली? सभी सवालों का जवाब है-कहीं कुछ-कुछ बदला, कहीं कुछ भी नहीं बदला, बदला तो केवल रायपुर बदला।
सोचे, एक आदर्श ग्राम की तस्वीर क्या हो सकती है। गांवों में भी पक्की सड़कें, नालियां, प्राथमिक अथवा उच्च माध्यमिक स्वास्थ्य केन्द्र, प्राथमिक व माध्यमिक शालाएं, उनके भवन, शुद्ध एवं स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था, श्रमदान से बने तालाब, पहुंच मार्ग, बरसात में गांव टापू न बने ऐसी व्यवस्था और कुटीर उद्योग। क्या इतने बरसों में छत्तीसगढ़ के कुछ गांव ऐसी तस्वीर पेश नहीं कर सकते थे ? नहीं तो मंत्रियों, नेताओं व अफसरों के ग्राम जनसम्पर्क अभियान से क्या फायदा! क्या औचित्य।
अंत में एक बात और कही जा सकती है। क्या हमारी सरकार बाहर से आने वाले अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों को नई राजधानी की सैर कराने के साथ-साथ ग्राम दर्शन भी करा सकती है ? कोई एक गांव! क्या सीएम साहब ऐसा साहस जुटा सकते हैं ? ऐसे दौरे से जो तस्वीर बनेगी वह सच्ची प्रगति की सूचक होगी। तब मेहमानों की वास्तविक प्रतिक्रिया सामने आएगी। फिर इस योजना से कम से कम इतना फायदा तो होगा, उस गांव का उद्धार हो जाएगा। वैसे ही जैसे जब राष्ट्राध्यक्ष या प्रधानमंत्री दौरे पर आते हैं और जिस मार्ग से गुजरने को होते हैं तो रातों-रात उसकी तस्वीर बदल जाती है। सड़कें चकाचक हो जाती हैं। हमारे गांव इस तरह भी बदले, तो क्या बुरा है।

Saturday, September 10, 2016

इंतजार है जब लोग कहेंगे बैस मजबूरी नहीं, जरुरी है

- दिवाकर मुक्तिबोध   
      
प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं रायपुर लोकसभा से 7 बार के सांसद रमेश बैस पर अरसे से मेहरबान किस्मत अब रुठती नजर आ रही है। राज्य में मोतीलाल वोरा के बाद बैस को ही किस्मत का सबसे धनी नेता माना जाता है। कांग्रेस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष व कार्यसमिति के सदस्य वयोवृद्ध वोराजी पर किस्मत अभी भी मेहरबान है बल्कि उसमें और चमक पैदा हुई है क्योंकि वे सोनिया गाँधी के सबसे अधिक विश्वासपात्रों में से एक है। पर अब भाजपा में रमेश बैस के साथ ऐसा नहीं है। भाग्य दगा देने लगा है जबकि इसी के भरोसे वे भाजपा की राजनीति में सीढिय़ां चढ़ते रहे हैं। राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों को अभी भी अच्छी तरह याद होगा कि अटलजी के जमाने में लोकसभा चुनाव के दौरान छत्तीसगढ़ में एक नारा बुलंद हुआ करता था - 'अटल बिहारी जरुरी है, रमेश बैस मजबूरी है।Ó इस नारे में सारा फलसफा छिपा हुआ है। लेकिन अब नरेंद्र मोदी-अमित शाह के युग में रमेश बैस न तो जरुरी है और न मजबूरी। इसलिए आगामी लोकसभा चुनाव में जो 2019 में होने वाला है, बैस की पतंग कट सकती है बशर्ते उन पर किस्मत फिर फिदा न हो जाए।
यकीनन बैस के सितारे गर्दिश में चल रहे है। दरअसल मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के सन् 2003 में मुख्यमंत्री बनने के बाद बैस की उनसे कभी नहीं बनी। हुआ यूं कि बैस भविष्य की राजनीति में पढऩे में गच्चा खा गए। अंदाज नहीं लगा पाए कि छत्तीसगढ़ में वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सरकार बन सकती है। उनके पास मौका था। जब वे और रमन सिंह केंद्र में मंत्री थे तो छत्तीसगढ़ भाजपा की बागडोर सम्हालने के लिए उनसे पूछा गया। अध्यक्ष बनने का अर्थ था केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा। बैस राजी नहीं हुए, रमन सिंह तैयार हो गए। बस यहीं बैस चूक गए।  अप्रत्याशित रुप से भाजपा रमन सिंह के नेतृत्व में 2003 का विधानसभा चुनाव जीत गई और स्वाभाविक रुप से उन्हें मुख्यमंत्री चुन लिया गया। काश, यदि बैस से उस समय गलती न हुई होती तो वे रमन सिंह की जगह मुख्यमंत्री होते व लगातार तीसरा कार्यकाल देखते। किन्तु यहाँ किस्मत ने आँखें जरुर तरेर दी पर उन्हें 2004, 2009 व 2014 का लोकसभा चुनाव जीताते गई। इसके पूर्व लोकसभा चुनाव की गिनती करें - 1989, 96, 98, 99 यानी 7 बार लोकसभा के लिए चुना जाना बहुत मायने रखता है। यह बैस की लोकप्रियता का प्रमाण भी है किन्तु इतना सब होने के बावजूद भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उन्हें हाशिए पर ढकेलने तुला हुआ है। क्या गलती हो गई बैस से?
           दरअसल अब भाजपा की राजनीति में खेल, किस्मत का नहीं परफार्मेन्स का है। भाजपा में अटल-आडवाणी व मुरली मनोहर जोशी जैसों का जमाना लद चुका है। एक-एक करके महत्वपूर्ण पदों पर बैठे ऐसे तमाम नेताओं को किनारे किया जा रहा है जो पार्टी की नीतियों एवं मापदण्डों के अनुरुप अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे पा रहे है। बैस अपने ससंदीय जीवन के 30 वर्ष पूर्ण कर चुके है और 7वीं पारी खेल रहे हंै। कुल जमा 32 वर्ष। इस दौरान याद नहीं आता कि ससंद में उन्होंने कभी छत्तीसगढ़ के मुद्दों को जोर-शोर से उठाया हो। वे दो अलग-अलग अवधि में केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी रहे किन्तु केवल शोभा बनकर रह गए। इसलिए भाजपा तो भाजपा छत्तीसगढ़ में आम व खास चर्चाओं में उन पर ठप्पा लग गया कि वे किसी काम के नहीं। चुनाव जीतना अलग बात है, जीतने के बाद जनता की कसौटी पर खरे उतरना अलग बात। सरल व शान्त स्वभाव के रमेश बैस यही मार खा गए। लोकसभा चुनाव तो जीतते हुए पर अपने कामकाज से केंद्रीय नेतृत्व का दिल नहीं जीत पाए।
लेकिन पिछले चंद वर्षों से वे कुछ करना चाहते थे, कुछ कर दिखाना चाहते थे। वे अविभाजित मध्यप्रदेश व बाद में छत्तीसगढ़ भाजपा संगठन में महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके थे। चूंकि कुछ कर दिखाने की चाहत थी इसलिए वर्ष 2010 में प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में उन्होंने अपनी दावेदारी पेश कर दी। पिछड़े वर्ग से थे, वरिष्ठता के नाते दावेदारी तो बनती थी। लेकिन रमन सिंह की पसंद नहीं थे, इसलिए बैस को निराशा हाथ लगी। वे मनमसोसकर रह गए। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी भड़ास राज्य सरकार के कामकाज पर नुक्ताचीनी करके निकालनी शुरु की। प्रखर आलोचक तो नहीं बने पर हौले-हौले चिमटियां काटते रहे। अप्रत्याशित रुप से जब वर्ष 2014 में केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा सरकार का अभ्युदय हुआ तो उन्हें प्रगाढ़ उम्मीदें नजर आने लगी। लेकिन मोदी मंत्रिमंडल के गठन में उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। 7 बार के सांसद की अहमियत को समझा नहीं गया। खैर दूसरे विस्तार के पूर्व फिर चर्चाओं ने जोर पकड़ा कि इस बार तो मंत्रिमंडल में प्रवेश पक्का है। पर इस बार भी दाल नहीं गली। फिर तीसरे की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखा जाने लगा। पर हत्भाग, फिर निराशा। विष्णुदेव साय मंत्री बन गए - बैस रह गए। कैसे रुठी किस्मत। हाय रे किस्मत।
           यह तो तय है राजनीति में ऐसी स्थितियों का सामना करना बहुत मुश्किल होता है। जी को कड़ा करके चेहरे पर मुस्कान लानी पड़ती है। इंतजार करना पड़ता है, कर्म करते हुए भाग्य कब खिलेगा? लेकिन भाग्य का खिलना तो दूर, उसने एक और पटखनी दे दी। गत 16 वर्षों से जिस प्रदेश कोरग्रुप के वे सदस्य थे, वे वहाँ से भी हटा दिए गए। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने उनके नाम पर मोहर नहीं लगाई। आदिवासी मुख्यमंत्री को अरसे से हवा देने वाले आदिवासी नेता नंदकुमार साय को भी चलता कर दिया। बैस तसल्ली कर सकते है कि मैं नहीं तो साय भी नहीं। बहरहाल भविष्य की राजनीति पर अभी कुछ कहना मुश्किल है। लोकसभा के चुनाव 2019 में होंगे और उसके पूर्व राज्य विधानसभा के चुनाव निपट जाएंगे। इसी बीच समीकरण काफी बदलेंगे। बैस को रायपुर लोकसभा से आठवीं बार टिकिट मिलेगी या नहीं, यह अब उनके राजनीतिक कामकाज के तौर-तरीकों पर निर्भर है। लेकिन उनके लिए फिलहाल आसार अच्छे नहीं नजर आ रहे हैं। यदि उन पर लगा यह तमगा किसी तरह हटा दिया जाए कि बैस मजबूरी नहीं, जरुरी है तो बात बन सकती है। पर क्या ऐसा होगा?

                

फिलहाल कितने दूर, कितने पास


-दिवाकर मुक्तिबोध 
हाल ही में सीएम हाउस में आयोजित एक कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला। सीएम डॉ. रमन सिंह के बोलने की जब बारी आई तो उन्होंने अपने प्रारंभिक संबोधन में मंच पर आसीन तमाम हस्तियों मसलन मुख्य सचिव विवेक ढांड, रियो ओलम्पिक में महिला हाकी टीम की सदस्य के रूप में प्रतिनिधित्व करने वाली राजनांदगांव की कल्पना यादव, महापौर प्रमोद दुबे, राज्य के मंत्री राजेश मूणत तथा आयोजन के प्रमुखों का नाम लिया किंतु राज्य के सबसे कद्दावर मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का नाम लेना वे भूल गए। क्या वास्तव में भूल गए या जानबूझकर छोड़ दिया? ऐसा प्राय: होता नहीं है। मुख्यमंत्री मंचस्थों के सम्मान का हमेशा ध्यान रखते हैं। इसलिए मान लेते हैं कि बृजमोहन अनायास छूट गए। पर यदि राजनीति की परतों को एक एक करके खोला जाए तो यह बात पुन: स्पष्ट होती है कि बृजमोहन मुख्यमंत्री के निकटस्थ मंत्रियों में शुमार नहीं है। इसलिए इस घटना से दूरियां दर्शाने वाला एक संदेश तो जाता ही है। सो, वह गया।
      दरअसल रमन सिंह मंत्रिमंडल में जो इने-गिने प्रगतिशील विचारों एवं राजनीतिक सूझ-बूझ के मंत्री हैं, उनमें बृजमोहन टॉप पर हैं। मुख्यमंत्री के नेतृत्व को यदि चुनौती किसी से है तो वे बृजमोहन से ही है। भारतीय जनता पार्टी में प्रदेश स्तर की लोकप्रियता की बात करें तो सिर्फ दो ही नाम आएंगे स्वयं मुख्यमंत्री रमन सिंह और बृजमोहन अग्रवाल। मुख्यमंत्री की छवि एक सीधे-सरल, मिलनसार व्यक्ति की है, तो बृजमोहन सामाजिक सरोकारों में बेजोड़ हैं, व्यक्तित्व संबंधों के वे सबसे बड़े खिलाड़ी हैं, हर किसी के सुख-दु:ख में शामिल होने वाले। पर कूटनीति में वे रमन सिंह के मुकाबले कच्चे हैं। शांत प्रकृति के रमन सिंह ने जिस कूटनीति से पिछले 12 वर्षों से अपनी सत्ता को बनाए रखा है, अद्भुत है। और तो और यदि भाजपा राज्य में अगले दो चुनावों में यानी चौथी-पांचवीं बार भी अपनी सत्ता कायम रख पाई तो उनके (रमन सिंह के) नेतृत्व को चुनौती नहीं है, ऐसा इंतजाम उन्होंने कर रखा है। दूर-दूर तक कोई विकल्प नहीं-बशर्तें बृजमोहन को छोड़ दें। डाक्टर साहब ने बार-बार आदिवासी नेतृत्व की मांग करने वाले वरिष्ठ आदिवासी नेताओं को या तो ठिकाने लगा दिया है या अपने वश में कर लिया है। सबसे प्रखर नंदकुमार साय तो भीगी बिल्ली बन गए हैं और अब पार्टी अनुशासन का राग अलापते रहते हैं। पार्टी में पिछड़े वर्ग का प्रबल प्रतिनिधित्व करने वाले व सातवीं बार लोकसभा के लिए चुने गए रमेश बैस की दाल उन्होंने कभी गलने नहीं दी। बैस अभी भी फडफ़ड़ा रहे हैं। वे अब प्रदेश की कोर कमेटी में भी नहीं है। कुल मिलाकर पार्टी में रमन सिंह का दबदबा कायम है। हालांकि केंद्रीय नेतृत्व के लिए यह चिंता का विषय है। क्योंकि विकल्प की मौजूदगी राजनीतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए जरूरी होती है। इसके अलावा दलीय राजनीति में किसी की इतनी उंचाई बर्दाश्त नहीं की जाती कि वह आसमान को छूने लगे। इसलिए रमन सिंह को अभयदान नहीं हैं, तलाश जारी है।
अब बृजमोहन पर लौटते हैं। बृजमोहन पार्टी में सबसे बड़े ट्रबल शूटर हैं। सदन में व सदन के बाहर विपक्ष के हमलों का ताबड़तोड़ जवाब देने में माहिर बृजमोहन को बेजोड़ चुनाव संचालक माना जाता है। प्रदेश में पिछले 12 वर्षों में जितने भी उपचुनाव हुए हैं, बृजमोहन को कमान दी जाती रही है। उनके संचालन में चुनाव जीते गए हैं। भले ही पार्टी ने उनके इशारे पर करोड़ों रुपए बहा दिए हों। चुनाव के दौरान प्रतिबद्ध वोटों को भी कैसे पलटाया जाता है, उन्हें अच्छी तरह आता है। वे दाम वाले नेता हैं, दंड से दूर रहते हैं। संसदीय जीवन के 25 वर्ष पूर्ण कर चुके बृजमोहन का सपना प्रदेश का नेतृत्व संभालने का रहा है पर अतीत में कुछ राजनीतिक घटनाएं ऐसी हुई हैं जिन्होंने उच्च सत्ता के मार्ग पर उनके लिए कांटे बिछा रखे हैं। वे इस बात को समझते हैं इसलिए उनकी समूची ताकत अपनी मौजूदा स्थिति को बनाए रखने में लगी रहती है। हालांकि मंत्रिमंडल में नम्बर दो की पोजीशन से वे कब के बिदा हो चुके हैं। मुख्यमंत्री ने उनके पर कतरने में कभी कोई कमी नहीं की पर उन्हें एकदम जमीन पर नहीं लिटा पाए। बृजमोहन ने ऐसा नहीं होने दिया है।
      दरअसल अविभाजित मध्यप्रदेश एवं बाद में छत्तीसगढ़ प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रहे स्वर्गीय लखीराम  अग्रवाल की वह रिपोर्ट बृजमोहन की राजनीति प्रगति में अभी भी सबसे बड़ी बाधा है जो उन्होंने 2000-२००१ के दौरान पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के पास भेजी थी। उन दिनों छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी और भाजपा विपक्ष में। नेता प्रतिपक्ष के चुनाव के दौरान संघ कार्यालय, एकात्म परिसर में बृजमोहन समर्थकों ने जो हंगामा पेश किया था, जो तोड़-फोड़ व आगजनी की थी, लखीराम बहुत आहत हुए थे। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी छत्तीसगढ़ प्रभारी थे और नेता प्रतिपक्ष के चुनाव के दौरान कार्यालय में मौजूद थे। घटना के बाद बृजमोहन पार्टी से निलंबित कर दिए गए। बाद में उनकी वापसी जरूर हुई पर लखीराम की रिपोर्ट अपना काम करती रही। हालांकि अब दिल्ली दरबार में उन्होंने अपनी अच्छी पैठ बना रखी है फिर भी प्रदेश के मामले में होता वही है जो रमन सिंह चाहते हैं। बृजमोहन इस बात से संतुष्ट हैं कि प्रदेश सरकार हो या संगठन उनकी वरिष्ठता, संसदीय अनुभव एवं राजनीतिक क्षमता को नकारा नहीं जा सकता। इसीलिए कोर कमेटी के लिए प्रदेश से उनका नाम न आने पर दिल्ली ने वरिष्ठतम मंत्रियों के नाम मांगे और उनके नाम का समर्थन किया। हरी झंडी दी।
           बहरहाल बृजमोहन के ख्याली पुलाव जो सरकार का नेतृत्व करने के संबंध में है, पकेंगे अथवा नहीं, कहा नहीं जा सकता। वैसे डॉ. रमन सिंह के रहते संभावना नगण्य है। वैसे भी चुनाव के पूर्व राजनीतिक फिजा कैसी क्या रहेगी, फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता। यह तय है वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव प्रदेश भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहेंगे। कांग्रेस व जोगी कांग्रेस की तगड़ी चुनौतियों के बीच भाजपा यदि कोई रास्ता निकाल पाएगी तो जाहिर है रमन सिंह फिर ताजदार बादशाह रहेंगे। और यदि ऐसा नहीं हो पाया तो भाजपा की राजनीति में भारी बदलाव आएगा। तब क्या होगा, कहा नहीं जा सकता अलबत्ता रमन सिंह कह चुके हैं कि सक्रिय राजनीति में अभी उनके पास बारह वर्ष है। बारह वर्ष।

Wednesday, August 3, 2016

व्यवस्था पर कड़ी चोट है एक शिक्षित बेरोजगार का आत्मदाह

-दिवाकर मुक्तिबोध


एक नवंबर, 2001 को मध्यप्रदेश से अलग होकर पृथक राज्य के रूप में अस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ की अब तक की सबसे त्रासद घटना है विकलांग योगेश साहू की मौत। 12वीं तक शिक्षित राजधानी रायपुर के इस युवा ने दो साल के निरंतर संघर्ष के बाद जब एक  अदद सरकारी नौकरी की आस छोड़ दी, तब उसने स्वयं को खत्म करने का निर्णय लिया। 21 जुलाई को प्रात: आठ बजे वह अपने बीरगांव स्थित घर से मुख्यमंत्री जनदर्शन में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से मिलने आखिरी उम्मीद के साथ निकला और नाउम्मीद होने के बाद मुख्यमंत्री आवास के सामने पेट्रोल छिड़ककर खुद को आग के हवाले कर दिया। लगभग 85 प्रतिशत झुलसी उसकी काया ने छह दिन के संघर्ष के बाद अंतत: जिंदगी का साथ छोड़ दिया। उसकी मौत दरअसल रोजगार के लिए संघर्षरत शिक्षित युवाओं में व्याप्त असंतोष, निराशा, कुंठा और बेपनाह दर्द की मार्मिक अभिव्यक्ति है। यह सड़ी-गली व्यवस्था पर एक और निर्मम चोट है।
       
21 जुलाई को मुख्यमंत्री आवास के समक्ष विकलांग शिक्षित बेरोजगार योगेश साहू ने आत्मदाह किया।
छत्तीसगढ़ के इतिहास में आत्मदाह की यह पहली घटना है जिसने संपूर्ण तंत्र को हिला दिया है। इसके पूर्व बेरोजगारी से तंग होकर जान देने या जान देने के प्रयास की घटनाएं हो चुकी हैं किन्तु उन्हें कभी सुर्खियां नहीं मिलीं, कभी समग्र समाज को आंदोलित नहीं किया और न ही सरकार ने कभी उन्हें गंभीरता से लिया। दूरदराज में घटित ऐसी घटनाओं से कुछ समय के लिए सीमित दायरे में निस्तब्धता जरूर फैली और फिर बात आई-गई हो गई। लेकिन योगेश साहू की मौत ऐसी पहली वारदात है जो सत्ता और समाज के अंतर्संबंधों में व्याप्त विसंगतियों के साथ-साथ स्थितियों की भयावहता की ओर इशारा करती है। यह पहली ऐसी घटना है जिसमेें सरकार ने तत्परता से कार्य करते हुए योगेश के इलाज की व्यवस्था की, उसे आर्थिक अनुदान दिया और उसकी मृत्यु के बाद परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया। लेकिन सरकार की इस संवेदनशीलता के बावजूद यह सवाल मुंह-बाएं खड़ा है कि क्या बेरोजगारी दूर करने के सरकारी उपक्रम पर्याप्त हैं? क्या वे ठीक से कार्य कर रहे हैं या क्या पिछले 12 वर्षों से सत्तारूढ़ भाजपा सरकार बेरोजगार युवकों को रोजगार दिलाने के लिए अनुकूल वातावरण बनाने में सफल है? जाहिर है, ऐसा कुछ नहीं है वरना योगेश साहू अटूट निराशा के गर्त में क्यों डूबता, क्यों जान देता?
       
 22 जुलाई को मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह योगेश का हालचाल जानने अस्पताल पहुंचे।
यह बिलकुल ठीक है कि सरकारी नौकरियों की एक सीमा है। प्रत्येक शिक्षित बेरोजगार को सरकारी काम में नहीं लगाया जा सकता, लेकिन रोजगार के लिए अनुकूल माहौल बनाना सरकार के हाथ में है। यह उसका दायित्व भी है। 16 बरस के छत्तीसगढ़ में ऐसा वातावरण अब तक नहीं बना है जबकि औद्योगिक निवेश के नाम पर सरकार अब तक अरबों रुपए के एमओयू संपन्न करने का दावा करती रही है। जाहिर है, सरकारी आंकड़े कुछ कहते हैं, जमीनी हकीकत कुछ और है। स्टील और पॉवर प्रोजेक्ट को छोड़ दें, तो शेष उद्योगों की हालत खस्ता है। मझोले और लघु उद्योगों में धीरे-धीरे तालेबंदी हो रही है और कुटीर उद्योग तो लगभग बंद हो गए हैं जिससे बेरोजगारी को और बढ़ावा मिल रहा है। राज्य सरकार समय-समय पर राज्य में निवेश के लिए देश-विदेश में उद्योगपतियों के साथ बातचीत एवं सम्मेलन करती रही है, उन्हें राज्य में आमंत्रित करती रही है पर नतीजा लगभग सिफर है। इसी वर्ष 14 फरवरी को केंद्र सरकार के आव्हान पर मेक इन इंडिया कार्यक्रम के अंतर्गत छत्तीसगढ़ सरकार ने भी इन्वेस्टर मीट में भाग लिया। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह अपने उच्चाधिकारियों के साथ मौजूद रहे। उन्होंने देश के बड़े औद्योगिक घराने मसलन रिलायंस, आदित्य बिड़ला ग्रुप, लैंको सोलर, हीराचंदानी, आईटीसी आदि के अध्यक्षों, संचालकों एवं सीईओ से मुलाकात की, बातचीत की। और तो और जापान, चेक गणराज्य जैसे कुछ देशों के उच्चायुक्तों एवं दूतावास के वाणिज्य अफसरों से भी बातचीत हुई। उन्हें छत्तीसगढ़ में निवेश के लिए आमंत्रित किया गया। 6 महीने बीत गए हैं पर कोई हलचल नहीं। स्पष्ट है, सरकार उद्योगपतियों को लुभाने में असफल है क्योंकि उद्योग स्थापना के मार्ग में आने वाली सरकारी एवं गैर सरकारी अड़चनों को वह दूर नहीं कर पा रही है। नौकरशाही की बदमिजाजी भी अरुचि का एक बड़ा कारण है। टाटा के बाद बस्तर से एस्सार ग्रुप की विदाई राज्य में उद्योगों की हालत बयान करती हैं। जाहिर है बेरोजगारी घटाने की दिशा में सरकारी प्रयत्न फलीभूत नहीं हो रहे हैं।
    यद्यपि रोजगार जैसे संवदेनशील मुद्दे पर सरकार कुछ बेहतर करने की कोशिश अवश्य कर रही है। उनमें से एक है कौशल विकास कार्यक्रम। इस योजना के तहत राज्य के सभी 27 जिलों के लाइवलीवुड कॉलेजों की स्थापना की गई है जहां विभिन्न टे्रड में युवा और प्रौढ़ता को स्पर्श करने वाले लोगों को प्रशिक्षण दिया जाता है पर कुशलता हासिल करने के बावजूद रोजगार है कहां? निजी उद्योग-धंधे इतने नही हैं कि सभी प्रशिक्षितों को काम मिल सके। फिर रोजगार उन्हें ही मिलता है जो अत्यंत कुशल हैं। कहना होगा, लाइवलीवुड कॉलेजों से भी कुशल बेरोजगारों की फौज तैयार हो रही है। राज्य के रोजगार कार्यालयों जीवित पंजीयन को देंखे तो वर्ष 2015 में 2 लाख 78 हजार 258 पंजीकृत बेरोजगारों में से सिर्फ 1,508 को ही रोजगार मिल पाया। यह चौंकाने वाला आंकड़ा है। नौकरियां नहीं है। इसीलिए राज्य से श्रम का पलायन हो रहा है। हालांकि खेतीहर मजदूरों एवं कामगारों का काम के लिए पलायन राज्य की शाश्वत समस्या रही है जिसका आकार फिल्हाल कुछ  घटा है किंतु अस्तित्व कायम है। ऐसी स्थिति में स्वरोजगार को बढ़ावा ही कारगर उपाय हो सकता है बशर्ते उसके लिए अधिकृत एजेंसियां अपने काम को बेहतर तरीके से संपादित करें। कहना न होगा, इसमेें बैंकों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। और यह बात सभी जानते हैं कि बैंकों की अफसरशाही कैसी होती है और ऋण के लिए औपचारिकताएं पूरी करने में कितना पसीना बहाना पड़ता है? केंद्र सरकार नि:शक्तजनों के प्रति अधिक संवेदनशील है तथा उन्हें हर संभव मदद देने के लिए तत्पर है तब छत्तीसगढ़ में एक विकलांग शिक्षित बेरोजगार की आत्मदाह की घटना वह भी मुख्यमंत्री के सिंह द्वार पर, सरकारी योजनाओं के प्रति निराशा की मार्मिक अभिव्यक्ति है। सरकार को राज्य की रोजगार नीति पर नए सिरे से मनन करने की जरुरत हैं।
बहरहाल जीवन से पलायन किसी समस्या का हल नहीं है, इसलिए योगेश की मौत को सामाजिक स्तर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। उसके परिवार के किसी सदस्य को नौकरी देना भी एक गलत परंपरा की शुरुआत है। अलबत्ता सरकार अन्यान्य तरीकों से परिजनों की मदद कर सकती है ताकि उनका आर्थिक ढांचा सुधरे। दरअसल, जरूरत इस बात की है कि सरकार बेरोजगारी को न्यूनतम स्तर पर ले जाने के लिए निजी क्षेत्रों को बढ़ावा देने के साथ-साथ कृषि एवं वनोपज आधारित उद्योगों की स्थापना को सर्वोच्च प्राथमिकता दे। यह कितनी विचित्र बात है कि लाखों बेरोजगारों की फौज के बावजूद सरकार नौकरियों में आउटसोर्सिंग का सहारा ले रही है। तर्क दिया जाता है कि कुशलता व योग्यता के मापदंड पर छत्तीसगढ़ के युवा खरे नहीं उतरते। यदि यह सच है तो दोष किसका है? इसका अर्थ है राज्य की समूची शिक्षा प्रणाली भी ध्वस्त है जो शिक्षा के नाम केवल डिग्रियां या सर्टिफिकेट बांट रही है। यानी चिंता कुछ ज्यादा ही गहरी है। योगेश की मौत को शायद इसी नजरिए से देखने की जरूरत है।