Saturday, May 6, 2017

बस्तर : बंदूक नहीं विश्वास की जीत होनी चाहिए

-दिवाकर मुक्तिबोध
28 अप्रैल को राज्य विधानसभा के विशेष सत्र में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा- नक्सलियों से अब आर-पार की लड़ाई है। जब तक उनका सफाया नहीं हो जाता, वे चैन से नहीं बैठेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि अब नक्सलियों से कोई बातचीत नहीं होगी। बस्तर में नक्सली हिंसा पर मुख्यमंत्री की चिंता, बेचैनी और नाराजगी स्वाभाविक है। वर्ष 2003 से उनके नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और राज्य की इस भीषणतम समस्या जो राष्ट्रीय भी है, पर अब तक काबू नहीं पाया जा सका है। और तो और मुख्यमंत्री के रूप में वर्ष 2013 से जारी उनके तीसरे कार्यकाल में नक्सली घटनाएं बढ़ी हैं तथा हिंसा का ग्राफ और उपर चढ़ा है। राज्य के नक्सल इतिहास में सर्वाधिक स्तब्धकारी घटना अप्रैल 2010 में बस्तर के ताड़मेटला में घटित नक्सल हमला था जिसमें केन्द्रीय सुरक्षा बल के 75 जवान मारे गए थे। तब केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी। इस नरसंहार से पूरे देश में शोक और गुस्से की जबरदस्त अभिव्यक्ति हुई। सरकार ने नक्सलियों से निपटने कमर कसी, व्यूहरचनाएं बनाई गई, बड़ी-बड़ी बातें की गई, छत्तीसगढ़ में संयुक्त अभियान चलाया गया और देश की जनता को यह भरोसा देने की कोशिश की गई कि धुआंधार विकास और बंदूक के जरिए नक्सलियों को खत्म किया जाएगा तथा छत्तीसगढ़ सहित नक्सल प्रभावित अन्य राज्यों में अमन चैन लौटेगा, शांति कायम होगी, हिंसा थमेगी। लेकिन 6 वर्ष बीत गए इस भरोसे का क्या हुआ? कम से कम छत्तीसगढ़ में यह तो टूटा ही। बस्तर में विकास का यह आलम है कि धूर नक्सली क्षेत्र दोरनापाल से जगरगुंड़ा तक 56 कि.मी. सड़क 40 वर्षों से नहीं बन पाई है। राज्य सरकार के लिए बस्तर में सड़कों और गांवों तक पहुंच मार्गों का निर्माण किस कदर महत्वपूर्ण और जोखिम भरा है, यह हाल ही में 24 अप्रैल को सुकमा जिले के बुर्कापाल में घटित घटना से जाहिर है। सड़क निर्माण कार्य में सुरक्षा की दृष्टि से क्षेत्र में तैनात सीआरपीएफ के 25 जवान आतंकी हमले के शिकार हुए और जान गंवा बैठे। दो माह के भीतर सीआरपीएफ पर यह दूसरा बड़ा हमला था, पहले से बड़ा। पिछले महीने 11 मार्च को इसी जिले के दुर्कापाल में सीआरपीएफ कैम्प के निकट नक्सलियों ने हमला बोला था जिसमें 11 जवान शहीद हो गए। दो माह के भीतर 36 जवानों की शहादत से एक बार फिर वैसा ही माहौल बना है जैसा कि ताड़मेटला कांड के बाद बना था। यानी मातम भरी स्तब्धता, विशेष कुछ न कर पाने की विवशता और नक्सलियों के प्रति नफरत और गुस्सा। नक्सलियों को नेस्तनाबूत करने का सरकार का संकल्प, आर-पार की लड़ाई का संकल्प, विकास की बयार बहाने का संकल्प व नक्सलियों से अब किसी भी तरह की वार्ता न करने का संकल्प जो अभी तक कभी हुई ही नहीं। हालांकि इस बार एक विशिष्टता यह है कि प्रधानमंत्री कार्यालय का नक्सलियों के खिलाफ चलाई जाने वाली मुहिम में सीधा दखल होगा तथा नक्सली कमांडरों को बिलों से बाहर निकालने पूरी ताकत झोंकी जाएगी। राज्य सरकार के सहयोग से आपरेशन का ब्लूप्रिंट तैयार किया जा रहा है। इसे केन्द्रीय गृह मंत्रालय से हरी झंडी मिलते ही बस्तर में अभियान की शुरुआत हो जाएगी। सवाल है क्या अब वास्तव में आर-पार की लड़ाई होगी, क्या वांछित नक्सली नेता मारे जाएंगे या गिरफ्तार होंगे और क्या बस्तर के सैकड़ों गांवों को नक्सल मुक्त किया जा सकेगा? बस्तर की भौगोलिक दृष्टि को देखते हुए क्या यह एक झटके में संभव है? क्या आदिवासियों को नक्सली आतंक से छुटकारा मिल सकेगा? क्या उन्हें पूरी सुरक्षा मिलेगी। और क्या सरकार के प्रति उनका विश्वास लौटेगा? नजरिया बदलेगा! 
      इस बारे में दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता। आखिरकार देश में नक्सल हिंसा की लहर पिछले लगभग पांच दशक से चली आ रही है। पिछले दो दशक की बात करें तो नक्सली घटनाओं में अब तक १४ हजार से अधिक लोगों की जाने गईं जिसमें लगभग 8  हजार नागरिक हैं। इन आंकड़ों से समस्या की गहराई को समझा जा सकता है। लिहाजा बुर्कापाल घटना के बाद केंद्र व राज्य सरकार का आर-पार की लड़ाई का संकल्प यानी बस्तर को नक्सलमुक्त करने का संकल्प कामयाब हो पाएगा, कहना मुश्किल है। दरअसल जन हिंसा की लगभग प्रत्येक बड़ी घटना के बाद सरकार ऐसे ही संकल्प दोहराते रही है लिहाजा यह खंडित विश्वसनीयता के दायरे में है। जाहिर है इस पर भरोसा कम होता है। 
    यह आश्चर्य की बात है कि सरकार सिर्फ बंदूक पर क्यों विश्वास करती है। क्या हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा है और क्या इससे समस्या का समाधान, उसका अंत संभव है? अगर ऐसा होता तो जम्मू-कश्मीर भी यूं न जलता रहता हालांकि वहां की परिस्थितियां अलग हैं और वे राजनीतिक भी हैं। बस्तर भी जल रहा है तो इस वजह से क्योंकि सरकार आदिवासियों की विश्वासपात्र नहीं बन सकी है, उन्हें पूंजीवादी शोषण से मुक्त नहीं कर सकी है, अपने शोषक अफसरों व पुलिस की प्रताडऩा से बचा नहीं सकी है और उन्हें जल, जंगल और जमीन से बेदखल करने के सुनियोजित अभियान को भी रोक नहीं सकी है बल्कि इसमें उसकी सहभागिता रही है। ऐसी स्थिति में बस्तर का आदिवासी अलग-थलग पड़ गया है इसलिए नक्सली आतंक को झेलना और नक्सलियों को शरण देना उसकी मजबूरी है। सरकार उनकी इस मजबूरी को समझती है लेकिन इस दिशा में क्या कभी कोई सार्थक पहल हुई है? क्या कभी उनका दिल जीतने ईमानदार कोशिश हुई है? अगर हुई होती तो ऐसी नौबत न आती। 
     अब केन्द्र व छत्तीसगढ़ सरकार निर्णायक लड़ाई चाहती है। किंतु इसके पहले कि सशस्त्र अभियान शुरू हो, क्या उन आदिवासियों के बारे में सोचा गया है जो सरकारी प्रतिहिंसा के शिकार हो सकते हैं। बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर व दंतेवाड़ा जिले में गांवों के आसपास नक्सलियों के शिविरों पर हमला करने के पूर्व क्या इस बात की गारंटी होगी कि गांव महफूज रहेंगे? कोई ग्रामीण नहीं मारा जाएगा? यह नहीं भूलना चाहिए कि नक्सली पुलिस से मुठभेड़ की स्थिति में आदिवासी युवकों, युवतियों व बच्चों को ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं यानी ऐसी मुठभेड़ हुई तो निहत्थे आदिवासी ही पहले मारे जाएंगे। नक्सली कमांडरों को मार गिराना तो खैर जायज होगा लेकिन बरगलाए गए, भटके हुए विवशता में बंदूक थामने वाले, आदिवासी युवा व युवतियों को गोलियों का निशाना बनाना न्यायोचित होगा? नहीं तो फिर बेहतर उपाय यही है कि बातचीत के दरवाजे बंद न किए जाए। समस्या इसलिए विकराल होती चली जा रही है क्योंकि राज्य अथवा केन्द्र सरकार के स्तर पर सार्थक पहल नहीं हुई। केवल बातें होती रही। सवाल है क्यों नहीं माओवाद समर्थक जाने-माने साम्यवादी नेताओं, बुद्धिजीवियों को एक मंच पर लाकर उनके माध्यम से, उनकी मध्यस्थता में नक्सल नेताओं को वार्ता के लिए राजी करने की कोशिश की गई। क्यों नहीं ऐसा अभियान चलाया गया। श्री श्री रविशंकर जैसे आध्यात्मिक गुरू राज्य सरकार से बीजापुर में जमीन तो मांग सकते हैं पर स्वयं नक्सली इलाकों में जाकर उन्हें आध्यात्मिकता का पाठ पढ़ाने का साहस नहीं दिखा सकते, उनका मन नहीं जीत सकते। और भी  महात्मा संत हैं, धर्मगुरु हैं जो नक्सल मुद्दे पर बेबाकी से अपनी राय रखते रहे हैं, मानवाधिकार की हिमायत करने वाले प्रखर बुद्धिजीवी हैं, समाजशास्त्री हंै, सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जनप्रतिनिधि हैं। क्यों नहीं जगदलपुर को राज्य की उपराजधानी बनाने सरकार पर दबाव बनाया गया? क्या ही अच्छा होता यदि वे नक्सल इलाकों में डेरा-डालते, उनसे वार्ता के लिए आगे आने का आग्रह करते। सरकार उन्हें भरोसा देती कि वह बदले की भावना से कार्रवाई नहीं करेगी। उनके प्रति सहानुभूति का रुख अपनाएगी, उनके पुनर्वास की व्यवस्था करेगी और उन्हें सुरक्षित जीवन जीने का मौका देगी बशर्ते वे हथियार डाल दें तथा हिंसा से तौबा करे। दरअसल यह बंदूक का नहीं अविश्वास पर विश्वास की जीत का अभियान होना चाहिए। सचमुच यदि ऐसी कोई पहल होती तो नक्सल समस्या से निजात की उम्मीद बंधती। इसी संदर्भ में यहां एक सवाल है- नक्सल मोर्चे पर केन्द्र व राज्य सरकार की चाक-चौबंद व्यवस्था व प्रत्येक पहलू पर विचार के बाद बनाई गई कार्ययोजना यदि असफल होती है, यदि इस बार आर-पार की लड़ाई में नक्सलियों से पार नहीं पाया जा सका तो क्या सरकार बस्तर में पांचवीं व छठवीं अनुसूची लागू करने पर गंभीरतापूर्वक विचार करेगी? बस्तर के वरिष्ठ आदिवासी नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम, सीमा सुरक्षा बल के पूर्व महानिदेशक ई.एन. राममोहन, डॉ. ब्रम्हदेव शर्मा सरीखे अनेक विद्वानों व आदिवासी नेताओं ने समय-समय पर राय व्यक्त की है कि बस्तर में आदिवासियों को स्वशासन का अधिकार दिया जाए जो संविधान सम्मत है। संविधान में आदिवासी बहुल इलाकों में आदिवासी विकास परिषद के जरिए राज्यपाल को शासन करने का अधिकार है। राममोहन का कहना है कि आज तक कभी भी किसी भी राज्यपाल ने संविधान के इस हक का पालन नहीं किया। यदि ऐसा किया गया होता, आदिवासी विकास परिषद के माध्यम से सत्ता चलायी जाती तो आज स्थितियां दूसरी होती। जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों का हक होता। और नक्सलवाद को पनपने का मौका नहीं मिलता। 
     यकीनन बस्तर में शांति लौटाने का यह बहुत सीधा व सरल तरीका है पर राज्यपाल कोई जोखिम उठाने इसलिए तैयार नहीं है क्योंकि उनकी नियुक्तियां राजनीतिक हैं जो सत्ता प्रतिष्ठान से किसी तरह का टकराव नहीं चाहती। जाहिर है यदि आदिवासी विकास परिषदों को सत्ता सौंपी गई और राज्यपाल का शासन लागू हुआ तो राज्य में सत्ता के दो केंद्र बनेंगे। कोई राजनीतिक पार्टी अपने हितों की रक्षा के लिए इस फार्मूले को मंजूर नहीं कर सकती, भले ही मासूमों, निरपराधों का खून निरंतर क्यों न बहता रहे। लेकिन राज्य के दीर्घकालीन हितों को देखते हुए क्या छत्तीसगढ़ सरकार इस बारे में विचार करेगी? बस्तर में शांति लौटाने के लिए क्या अपने राजनीतिक स्वार्थ की बलि चढ़ाने सत्तारुढ़ पार्टी तैयार है? शायद नहीं। यकीनन नहीं। लेकिन एक समाधान तो यह है ही जिस पर विचार किया जाना चाहिए।   

Monday, May 1, 2017

खास से आम बनने की कवायद

 -दिवाकर मुक्तिबोध

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह पिछले कुछ समय से बदले-बदले से नजर आ रहे हैं। बातचीत का उनका तौर-तरीका और व्यवहार में फर्क महसूस होने लगा है। वे कठोर बनने की कोशिश कर रहे हैं। सरकारी मुलाजिमों को यह जताने का प्रयास कर रहे हैं कि उन्हें ढीला-ढाला और सीधा-साधा शासनाध्यक्ष न समझा जाए जो भयानक से भयानक गलतियों पर भी 'भूल गया, माफ किया' नीति पर चलता है। उनकी बातचीत का टोन बदल गया है। वे अब भरी सभा में, सरकारी बैठकों में लापरवाह, कामचोर व भ्रष्ट अफसरों पर फटकार बरसाने लगे हैं। चेतावनी देने लगे हैं कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सरकार को जनता से दूर करने की कोशिशें कामयाब नहीं होने दी जाएंगी। हर सूरत में प्रदेश के गरीब-बेसहारों को प्रसन्न रखना, उनके दु:ख दर्द को दूर करना, उनकी समस्याओं का समाधान करना व राज्य में विकास की गंगा बहाना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। प्रदेश की गायों को लेकर वे अब इतने ज्यादा संवेदनशील हो गए हैं कि उन्होंने यहां तक कह दिया है कि जो गायों का वध करेगा उसे लटका दिया जाएगा। गायों के प्रति आस्था के देशव्यापी उबाल के बाद इतनी सख्त बात तो भाजपा शासित किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री ने नहीं की। और वह भी दो-दो बार। अपने सालाना कार्यक्रम लोक सुराज अभियान बनाम समाधान शिविर का तीसरा चरण प्रारंभ होने के पूर्व 1 अप्रैल 2017 को उन्होंने जगदलपुर में मीडिया से कहा गोवध कानून पहले से ही राज्य में लागू है और यदि कोई गाय का वध करते पकड़ा गया तो उसे लटका दिया जाएगा यानी फांसी दे दी जाएगी। गोरक्षा के साथ-साथ मुख्यमंत्री राज्य में फिलहाल शराब बंदी लागू न करने के फैसले पर भी अडिग हैं। हालांकि आश्वासन पर आश्वासन दे रहे हैं कि राज्य में शराबबंदी होकर रहेगी, लेकिन कब? फिलहाल सरकार का लक्ष्य है शराब बिक्री से प्राप्त होने वाले राजस्व में करीब 700 करोड़ की वृद्धि करना। अब तक 3300 करोड़ मिलते थे जो 4000 करोड़ होने चाहिए। इसलिए जरूरी है इसकी अवैध बिक्री रोकी जाए। जाहिर है इसके लिए सख्ती जरूरी है। लिहाजा वे अवैध शराब का धंधा करने वाले कोचियों के प्रति भी बहुत सख्त हैं। 6 अप्रैल को अपनी समाधान यात्रा के एक पड़ाव कोरबा में उन्होंने कोचियों को सलाह दी कि वे दूध बेचना शुरू करें। यदि ऐसा करेंगे तो सरकार उन्हें सहायता देगी अन्यथा पकड़े जाने पर लटका दिए जाएंगे। यानी लटका दिए जाएंगे यह मुख्यमंत्री का तकिया कलाम जैसा हो गया है।
  
  दरअसल डॉ. रमन सिंह बहुत नर्म दिल एवं रहमदिल इंसान हैं। मुख्यमंत्री के रूप में वे तीसरी पारी खेल रहे हैं। बीते 13 वर्षों में उनके राजकाज के तौर-तरीके भले ही प्रभावित करने वाले न रहे हों किंतु एक व्यक्ति के रूप में, एक नेता के रूप में और एक राज्य के मुखिया के रूप में उनकी पर्याप्त ख्याति है, लोकप्रियता है और उन्हें ईमानदार और सच्चा मुख्यमंत्री माना जाता है जो किसी से भी ऊंचे स्वरों में बात नहीं कर सकता। और कभी आपा भी नहीं खोता।  लेकिन इस तीसरी पारी के उत्तरार्ध में उनमें कुछ बदलाव न•ार आने लगा है। वे अब कठोर और सख्त प्रशासक के रूप में अपनी छवि बनाना चाहते हैं। अफसरों के साथ सख्ती से पेश आ रहे हैं। उनसे उनके कार्यों का हिसाब मांगा जा रहा है। शासन को गतिशील व जनोन्मुखी बनाने के लिए वे जोर-शोर से प्रयास कर रहे हैं। ऐसी कोशिशों के दौरान उनके सख्त बोल जहां एक ओर आश्चर्यचकित करते हैं वहीं दूसरी ओर भविष्य में कुछ बेहतर घटने की उम्मीद भी जगाते हैं।
    डॉ. रमन सिंह वर्ष 2003 से भाजपा शासित छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री हैं। वे जनता से सीधा संवाद करने अपने आवास में सप्ताह में एक बार जन-दर्शन कार्यक्रम तो करते ही हैं, प्रतिवर्ष हफ्ते-दस दिन 'सुराज यात्राÓ पर भी निकल पड़ते हैं। हर वर्ष गर्मियों में उनकी लोक सुराज यात्रा गांवों की किस्मत बदलने के लिए होती है। वर्ष 2004 से अब तक 13 वर्षों में वे अपने सरकारी अमले के साथ राज्य के दूर-दराज के आदिवासी गांवों, नक्सल हिंसा से प्रभावित गांवों, अत्यंत पिछड़े गांवों व सभ्यता की रौशनी से कोसों दूर जिंदगी बसर करने वाले गांवों व ग्रामीणों से रुबरु हुए हैं और उनकी मिजाजपुर्सी करते रहे हैं। इन वर्षों में उनके इस उपक्रम से कितना कुछ बदला, कैसा परिवर्तन आया, गांव में विकास की रौशनी फैली या नहीं, ग्रामीणों की शिक्षा, पेयजल व स्वास्थ्य तथा अन्य मूलभूत समस्याएं दूर हुई अथवा नहीं, नक्सली हिंसा में इजाफा हुआ अथवा हिंसा घटी आदि सवालों का जवाब ढंूढना बेहद कठिन है अलबत्ता इस बात में दो राय नहीं कि मुख्यमंत्री ने ईमानदार कोशिश की जो अभी भी जारी है। यह अलग बात है कि जनकल्याणकारी योजनाओं पर अमल व ग्रामीण समस्याओं के निदान में नौकरशाही लापरवाह बनी रही इसलिए जन सुराज या ग्राम सुराज अभियान या समाधान शिविर अब तक सार्थक नतीजे नहीं दे पाया है। लिहाजा समस्याओं का पहाड़ जहां के तहां खड़ा है।
    
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ठेठ छत्तीसगढिय़ा हैं इसलिए गांवों की यात्रा के दौरान चौपाल लगाना, ग्रामीणों से छत्तीसगढ़ी भाषा में बातचीत करना, उनके दु:ख-दर्द के बारे में पूछताछ करना, उनके कंधे पर हाथ रखना और उन्हें स्थितियों के बेहतर होने का भरोसा दिलाना अपनत्व का अहसास कराता है। ग्रामीण जनता को लगता है कि वे उन्हीं के जमात के आदमी हैं जो उनकी जिंदगी के संघर्ष को आसान बनाने आए हैं। इसलिए वे उन पर भरोसा करते हैं। मुख्यमंत्री ने उनके इस विश्वास को टूटने नहीं दिया है बल्कि उसे और पुख्ता करने प्रयासरत है। मसलन इस बार का उनका लोक सुराज अभियान तब्दीलियां लिए हुए है। अब मुख्यमंत्री न केवल गांव वालों से मिलते हैं वरन उनके यहां खाना भी खाते हैं, काम में हाथ भी बंटाने लगते हैं। स्कूलों का निरीक्षण करते हैं, बच्चों की क्लास लेते हैं।  उनके साथ भोजन करते हैं। ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं की जानकारी देते हैं और पीठ थपथपाते हैं। 6-7 अप्रैल के दौरे में वे बलरामपुर के जोकापार गांव में सोबरन नाग के यहां गए और सिर पर गमछा बांधकर ईंटे जोडऩे में उसकी मदद करने लगे। उन्होंने सोबरन की पत्नी उर्मिला से खाने के लिए गुड़ और बिस्किट मांगा। फिर देवसाय नाग के कुएं पर गए और कुएं का पानी पीया। गौरेला के गौरीखेड़ी में मनरेगा श्रमिक उर्मिला कोर्राम के यहां उन्होंने भोजन किया। यहीं उनके मन में विचार आया कि श्रमिकों को स्टील के टिफिन दिए जाएं। अम्बिकापुर में उनका अंदाज और भी निराला था। अपने लाव-लश्कर के साथ सरकारी गाड़ी पर सवार रमन सिंह सर्किट हाउस से कलेक्टोरेट जाते हुए अकस्मात गांधी चौक में अपने वाहन से उतर गए व एक ऑटो रिक्शा में बैठ गए। वे इसी ऑटो में कलेक्टोरेट गए।  सफर के दौरान महिला आटो चालक गीता से वे बातचीत करते रहे और उसे 500 रु. दिए जबकि भाड़ा 20 रु. होता है। 12 अप्रैल को सरायपाली के ग्राम जम्हारी में उन्होंने स्कूली बच्चों के साथ मध्यान्ह भोजन किया, उनकी पढ़ाई के बारे में पूछताछ की, कुछ प्रश्न किये, बच्चों को टाफियां बांटी, अच्छे भोजन के लिए रसोइयों को पुरस्कृत किया। इसी मौके पर उन्होंने कठोर कार्रवाई भी की। ड्यूटी से गायब रहने वाले एसडीओ को उन्होंने सस्पेंड कर दिया। ऐसे अनेक प्रसंग हैं जो ये दर्शाते हैं कि मुख्यमंत्री राजनेता से आम आदमी बनने की कोशिश कर रहे हैं। उनमें यह एक बदलाव है जिसे फौरी तौर पर सार्थक कह सकते हैं पर सवाल है ऐसा किसलिए? परिवर्तन किस वजह से? गांवों व ग्रामीणों की इस कदर चिंता क्यों सताने लगी? अचानक ऐसा क्या हुआ कि शासन-प्रशासन पर मुख्यमंत्री सख्त हो गए। तथा नौकरशाहों को चेतावनी पर चेतावनी देने लगे। इन सभी का जवाब बहुत साफ है। अगले वर्ष विधानसभा चुनाव है। नवम्बर, दिसम्बर 2018 में चौथी विधानसभा के लिए वोट डाले जाएंगे। यानी अब मात्र 18-19 महीने शेष हैं। लेकिन इससे बड़ी चिंता 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव की है। सन् 2014 के चुनाव में मुख्यमंत्री ने राज्य की 11 में से 10 सीटें पार्टी की झोली में डाली थी। अब इससे कम का सवाल ही नहीं है। क्योंकि केंद्र में सख्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं जिन्हेें शतप्रतिशत नतीजे चाहिए। अब वे 2019 का नहीं 2024 के लोकसभा चुनाव को टारगेट कर रहे हैं। यानी 2019 में उन्हें हर हालत में छत्तीसगढ़ से बेहतर नतीजे चाहिए। यह गंभीर चिंता है क्योंकि राज्य की राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। 2019 में मुख्यमंत्री के नेतृत्व में भाजपा छत्तीसगढ़ की सभी 11 सीटें जीतने के अत्यंत दुष्कर लक्ष्य का पीछा करेगी किंतु इसके पहले जरूरी है राज्य विधानसभा के चुनाव जीते जाएं। जब पार्टी चौथी पारी के लिए पुन: सत्ता प्राप्त करेगी तब 2019 का लोकसभा चुनाव ज्यादा दमदारी से लड़ा जा सकेगा। इसलिए अगले दो वर्ष मुख्यमंत्री व प्रदेश पार्टी के लिए चिंता भरे वर्ष हैं। लिहाजा पार्टी व सरकार ने कमर कस ली है। दरअसल यह मोदी का खौफ है जो सरकार और पार्टी को आम आदमी के अधिक से अधिक नजदीक जाने विवश कर रहा है। तो क्या यह माना जाए कि मुख्यमंत्री के रुख में बदलाव के पीछे मोदी का आतंक है? व्यवहार के स्तर पर बदलाव के पीछे एक खास मंशा है, एक उद्देश्य है? क्या मिजाज में परिवर्तन का यह अस्थायी दौर है? लक्ष्य के हासिल होते ही क्या रमन सिंह पहले जैसे रमन सिंह हो जाएंगे जिन्हें नौकरशाही कोई भाव नहीं देती थी?
     राजनीति में आम कार्यकर्ता से मुख्यमंत्री बनने और मुख्यमंत्री बनने के बाद भी आम आदमी बने रहने के बहुतेरे उदाहरण हैं। कई नाम लिए जा सकते हैं, मसलन त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार पं. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, इसी राज्य के पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी, केंद्र में मंत्री व राज्य में मुख्यमंत्री रह चुके ए.के. एंटोनी आदि आदि। शासनाध्यक्ष होने के बावजूद उन्होंने सादगी की मिसाल पेश की। सरकारी सुविधाओं का त्याग किया, अपना बैंक बैलेंस नहीं बढ़ाया। अपने उपर कोई लांछन नहीं लगने दिया। यकीनन मुख्यमंत्री रमन सिंह इस श्रेणी में नहीं हैं पर आ सकते हैं बशर्ते शहर के रमन सिंह अलग और गांव के रमन सिंह अलग-अलग न हो। सरकारी सुविधाओं का त्याग करने की हिम्मत यदि वे जुटाते हैं, मन बनाते हैं तो वे आम आदमी के मुख्यमंत्री कहलाएंगे जो अभावों में जीते हैं। संघर्ष करते हैं। उनके सामने सबसे अच्छा उदाहरण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भी है जो प्रोटोकाल को ताक पर रखकर आम आदमी बन जाते हैं। हाल ही में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री का दिल्ली विमानतल पर स्वागत करने वे बिना किसी लाव-लश्कर के अकेले ही पहुंच गए। यही नहीं नई दिल्ली में भारत प्रवास पर आए ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री मैलकल टर्नबुल के साथ उन्होंने मेट्रो में सफर किया। अक्षरधाम मंदिर पहुंचे, साथ-साथ पूजा-अर्चना की और बाद में मंदिर की सीढिय़ों पर बैठकर दोनों काफी देर तक बातचीत करते रहे। ऐसा उदाहरण अब तक किसी प्रधानमंत्री ने पेश नहीं किया था। राजनीति के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। किसी ने भी लीक से हटकर चलने की कोशिश नहीं की। किंतु मोदी ऐसा करते हैं लिहाजा उनके मुख्यमंत्रियों के लिए यह एक मिसाल है। अब प्रश्न यह है कि मुख्यमंत्री रमन सिंह इस नीति पर चलने की इच्छा रखते हैं? क्या वे शहर में आम नागरिक की तरह घूमते हुए मिल जाएंगे, क्या अकेले बाजार में दिखेंगे? गांव में स्कूली बच्चों के साथ जमीन पर बैठकर उन्होंने भोजन तो किया, तो क्या शहरों में भी ऐसा कुछ करेंगे? क्या कभी स्लम बस्तियों का दौरा करेंगे? क्या बेइंतिहा तकलीफों को झेल रहे शहरी गरीबों के बीच कुछ वक्त बिताएंगे? क्या सायरन बजाकर उनके काफिले के लिए रास्ता बनाने की सामंती पद्धति से तौबा करेंगे? ऐसे बहुत से सवाल हैं जिनके जवाब तय करेंगे कि मुख्यमंत्री वाकई अपने राजनीतिक जीवन व्यवहार में तब्दीलियां ला रहे हैं वरना हर जागरूक नागरिक यह समझता है कि व्यवहार में नाटकीय बदलाव की असली वजह क्या है?