Wednesday, July 5, 2017

अभी मैं 30 साल और जिंदा रहूंगा - जोगी

छत्तीसगढ़़ जनता कांग्रेस का एक वर्ष

 -दिवाकर मुक्तिबोध
पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के नेतृत्व में गठित प्रादेशिक राजनीतिक पार्टी छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस ने अभी हाल ही में अपना पहला स्थापना दिवस मनाया। गत वर्ष मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के गृह गाँव ठाठापुर में 21 जून को उन्होंने विशाल सम्मेलन में अपनी पार्टी को विधिवत नाम देते हुए घोषणा पत्र जारी किया था। तब से लेकर आज तक, इस पूरे एक वर्ष के दौरान अजीत जोगी चुप नहीं बैठे और निरंतर सभाएं, जनसंपर्क व जनआंदोलन के साथ-साथ घोषणाओं का पिटारा खोलते रहे। पार्टी का दावा है कि उसकी सदस्य संख्या दस लाख पार कर गई है जो कांग्रेस से कहीं अधिक है। भाजपा व कांग्रेस को छोड़कर छत्तीसगढ़ में जितनी भी राज्य स्तरीय अथवा राष्ट्रीय पार्टियों की शाखाएं है उन्हें जोगी कांगे्रस ने सार्थक जनदखल के मामले में पीछे छोड़ दिया है। वह राज्य में तीसरी शक्ति बनकर उभरी है जिसने प्रदेश के मतदाताओं के सामने सत्तारूढ़ भाजपा पर व कांग्रेस के अलावा नया राजनीतिक विकल्प पेश किया है। महज एक वर्ष के भीतर यह उपलब्धि असाधारण ही कही जाएगी। लेकिन राज्य विधानसभा के अगले चुनावों में अथवा नगरीय निकायों के चुनाव में उसे कितनी सफलता मिलेगी इसका फिलहाल अनुमान लगाना भी मुश्किल है। आम सभाओं में उमड़ने वाली भीड़ अथवा मुद्दों को लेकर जनआंदोलनों में उपस्थित लोगों की संख्या को देखकर ऐसा कोई दावा नहीं किया जा सकता कि वे पार्टी के वोटर हैं तथा चुनाव में उसे वोट भी देंगे। वर्ष 2003 में राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में स्व. विद्याचरण शुक्ल के रहते राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के परिणाम एक मिसाल के रुप में सामने है। इस चुनाव में शरद पवार के राष्ट्रीय नेतृत्व वाली इस पार्टी की प्रदेश में तेज आंधी के बावजूद उसे सिर्फ एक सीट हासिल हुई थी हालांकि उसने लगभग 7 प्रतिशत वोट प्राप्त करके कांगे्रस को सत्ता से बाहर कर दिया था। उस समय चुनाव पूर्व अनुमान लगाया जा रहा था कि सत्ता की चाबी विद्याचरण जी के हाथ में होगी पर तमाम अनुमान ध्वस्त हो गए। वर्ष 2003 के चुनाव में सत्ता से बेदखल हुए जोगी अब कांग्रेस व भाजपा को चुनौती पेश कर रहे हैं। वे चतुराई के साथ अपनी पार्टी में ताकत भरने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने पिछले निकाय चुनावों में भाग न लेकर अपनी मुट्ठी बंद रखी ताकि यह संदेश जाए कि वह लाख की हैं, वरना वे जानते हैं तो ऐसे मौकों पर खुली तो वह खाक की भी हो सकती है। ठीक वैसे ही, राष्ट्रवादी कांग्रेस जैसी जिसका अब राज्य में अस्तित्व न के बराबर है। 
जोगी कांगे्रस का एक वर्ष का हिसाब लगाया जाए, उसके कामकाज को तौला जाए तो यह निर्विवाद है कि उसने जनता को अपने अस्तित्व का अहसास करा दिया है। उसे सोचने के लिए बाध्य कर दिया है। हालांकि विश्वसनीयता एवं साख के मामले में संकट कायम है। अभी भी आम लोगों के जेहन से सन् 2000 से 2003 के बीच के जोगी की छवि उतरी नहीं है। वे राज्य के पहले मुख्यमंत्री थे और बेहतर, चुस्त व जनोन्मुखी प्रशासन के बावजूद वर्ष 2003 के चुनाव में मतदाताओं द्वारा नकार दिए थे हालांकि उनके जनकल्याणकारी कार्यक्रम व नीतिगत फैसले उनके दूरगामी सोच के प्रतीक थे। मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी अधिनायकवादी छवि का अक्स अभी भी प्रदेश की जनता के दिलो-दिमाग में कायम है और इस एक बड़ी वजह से अपने दम पर आगामी चुनावों में फिलहाल उनकी पार्टी की संभावनाएं उज्ज्वल नजर नहीं आ रही है।
   लेकिन जोगी कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। शारीरिक दृष्टि से वे ठीक रहते तो अब तक न जाने कितने राजनीतिक हंगामे खड़े कर देते। एक कोशिश उन्होंने अंतागढ़ उपचुनाव में की थी किन्तु वह उन्हीं पर भारी पड़ गई। कांग्रेस में रहते हुए पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी को ऐन मौके पर चुनाव मैदान से हटाने में उनकी भूमिका की चर्चा अभी भी थमी नहीं है और उनका पीछा कर रही है। जोगी बेहतर जानते हैं कि उन्हें किस वजह से सत्ता खोनी पड़ी थी। निश्चय ही एक बड़ा कारण विद्याचरणजी की चुनाव में उपस्थिति थी। यदि राष्ट्रवादी कांगे्रस ने कांगे्रस के परंपरागत वोटों का बंटवारा न किया होता तो भाजपा कभी सत्ता में नहीं आ पाती। इस बार मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के भाग्य से फिर वैसी ही राजनीतिक परिस्थितियां मौजूद हैं। लेकिन अब तीसरा कोण अजीत जोगी बना रहे है जो दिवंगत विद्याचरण शुक्ल से कई मायनों में अलग है तथा वे वैसी गलतियां नहीं करेंगे जो राष्ट्रवादी कांग्रेस ने की थी। अति आत्मविश्वास शुक्ल व उनकी पार्टी को ले डूबा था। जोगी इससे बच रहे हैं। वे इस कोशिश में हैं कि कम से कम इतनी सीटें जरुर हासिल की जाए ताकि डूबने की नौबत न आए। शुक्ल अपनी गलतियों से सत्ता की चाबी जनता से हासिल नहीं कर पाए थे, जोगी ऐसा कर सकते हैं। क्योंकि अतीत में झांककर अपना अक्स देखते एवं उसे दुरुस्त करने की कूवत उनमें हैं और वे इस मामले में सतर्क भी हैं। 
कहा जा सकता है कि जोगी कांगे्रस का अब तक का सफर ठीक-ठाक रहा है। उसे चुनाव तक लगभग डेढ़ वर्ष और निकालने हैं। राज्य विधानसभा के चौथे चुनाव नवंबर-दिसंबर 2018 में होंगे। तैयारी के लिहाज से पार्टी के पास वक्त काफी है। जोगी जिस तरह मेहनत कर रहे हैं वह कांग्रेस व भाजपा दोनों के लिए चिंता का विषय हैं। भाजपा को उम्मीद हैं कि चुनाव में छत्तीसगढ़ जनता ़कांग्रेस की उपस्थिति की वजह से उसकी राह आसान हो जाएगी लेकिन फिर भी वह जी-जान से लगी हुई है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का लगातार दौरा एवं पार्टी पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद इस बात का संकेत है कि पार्टी कोई जोखिम उठाने तैयार नहीं। कांगेस भी चुनौती में पीछे नहीं है। भूपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस अपने पिछले डेढ़ दशक की तुलना में ज्यादा प्रभावी एवं आक्रामक है।    
   लेकिन अजीत जोगी मतदाताओं को लुभाने के लिए जिस तरह नये-नये प्रयोग कर रहे है, वे उद्यपि नाटकीयता से भरपूर हैं, वे सर्वथा भिन्न एवं अद्भुत है। पर वे कुछ तो असर छोड़ रहे हैं। मसलन वे मतदाताओं को पार्टी का शपथ-पत्र दे रहे हैं जिसमें उनके प्रमुख वायदों का उल्लेख है और कहा गया है कि इनमें से एक भी वादा पूरा नहीं हुआ तो जनता अदालत में मुकदमा दायर करने स्वतंत्र है। क्या ऐसा कभी किसी पार्टी या नेता ने किया था? उन्होंने स्टाम्प पेपर पर शपथ-पत्र 14 जून 2017 को तैयार करवाया था। 17 जून 2017 को वे अपने समर्थकों व किसानों के साथ मंदिरहसौद चंद्राखुरी पहुंचे। किसानों के साथ खेत में उतरे, खेती के उपकरणों के साथ बैलों की पूजा की। तथा मिट्टी हाथ में लेकर किसानों के सामने शपथ-पत्र पढ़ा कि यदि उनकी पार्टी सत्ता में आई तो किसानों का कर्ज माफ कर दिया जाएगा तथा धान का समर्थन मूल्य 2500 रुपये किया जाएगा। और तो और बस्तर के लिए उन्होंने अलग घोषणा पत्र जारी किया। यह भी कहा कि यदि पार्टी सत्ता में आती है तो उपमुख्यमंत्री बस्तर से होगा। अजीत जोगी ने एक और दांव चलाते हुए वादा किया कि यदि वे मुख्यमंत्री बन गए तो जगदलपुर को राजधानी बनाएंगे और बस्तर से सरकार चलाएंगे। बस्तर संभाग की आदिवासी बाहुल्य एक दर्जन सीटें उनके लिए किस कदर महत्वपूर्ण हैं, यह ऐसी घोषणाओं व वायदों से जाहिर है।
     वैसे जोगी ने घोषणाओं का पिटारा पार्टी की स्थापना के दिन ही खोल दिया था। 21 जून 2016 को उनके पहले घोषणा पत्र में कहा गया था - प्रदेश के हर किसान का कर्जा माफ, प्रत्येक थाने के सामने 20 गज चांदी का सड़क (जिसका आम लोगों को मतलब समझ में नहीं आया), मनरेगा मजदूर का हर सप्ताह भुगतान, सत्ता में आने पर एक लाख करोड़ का बजट, आउट सोर्सिंग बंद, स्थानीय को रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं में छत्तीसगढ़ी पर एक प्रश्न पत्र, साक्षात्कार भी छत्तीसगढ़ी में व किसानों को मुफ्त बिजली। इन घोषणाओं के अलावा जोगी ने कहा उनकी प्राथमिकताओं में हैं किसान, महिला और युवा। फंड इकट्‌ठा करने के लिए भी उन्होंने भावनात्मक तरीका अपनाया। उन्होंने 4 अप्रैल 2017 को 50 किलो चांदी से बने 5 हजार सिक्के जारी किए जिनमें उनका फोटो है। एक सिक्के की कीमत 2 हजार रुपये रखी गई। इस तरह पहेली खेप में डेढ़ करोड़ रुपये इकट्‌ठा करने का लक्ष्य रखा गया। 
जोगी ने घोषणाएं तो की किन्तु यह नहीं बताया कि वे उन्हें कैसे पूर्ण करेंगे। उसके लिए फंड कहां से आएगा। भाजपा सरकार चुनावी वायदे के बावजूद किसानों को धान का बोनस नहीं दे पा रही है और न ही समर्थक मूल्य बढ़ा पा रही है। जोगी कहां से लाएंगे पैसा? मुख्यमंत्री के रुप में अपने कार्यकाल में उन्होंने राज्यों को करमुक्त बनाने का वादा किया था। इस वायदे को उन्होंने अभी भी जिंदा रखा है। वह कैसे पूरा होगा। क्या मतदाताओं को लुभाने वे उन्हें दिवास्वप्न दिखा रहे हैं? यदि नहीं तो बेहतर होता अपने संकल्प पत्र में इसका खुलासा करते कि वादे कैसे पूरे किए जाएंगे और उनके लिए धन की व्यवस्था किस तरह होगी। इस तरह वे ज्यादा विश्वसनीय और ज्यादा भरोसेमंद बनते। 

   बहरहाल कुल मिलाकर अजीत जोगी अगले विधानसभा चुनाव में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने दिन-रात एक कर रहे हैं। वे राज्य सरकार की नीतियों की आलोचना तो कर रहे हंै पर यह बात किसी से किसी से छिपी हुई नहीं है कि मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के प्रति उनका रुख नरम है। राजनीति के गलियारों में यह भी चर्चा है कि भाजपा और जोगी कांग्रेस के बीच नूरा कुश्ती चल रही है जिसका अंतिम मकसद कांगे्रस को सत्ता में नहीं आने देना है। लेकिन जोगी नहीं चाहेंगे इस चक्कर में उनकी राजनीतिक साख दांव पर लगे लिहाजा उन्होंने विकल्प खुले रखे हंै। बीच में यह चर्चा जोरों पर थी कि यदि प्रदेश कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन होता है और यदि भूपेश बघेल हटा दिए जाते हैं तो जोगी को कांग्रेस में वापसी में कोई दिक्कत नहीं है हालांकि जोगी ने इसका खंडन किया। चूंकि गठबंधन की राजनीति में क्षेत्रीय पार्टियों का महत्व काफी बढ़ा हुआ है फलत: जोगी की कोशिश पार्टी को जिंदा रखने और मौका परस्त राजनीति में अपने फायदे के लिए हर तरह के समझौतों के लिए तैयार रहने की है।
   जोगी चुनाव के पूर्व पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र जारी नहीं करेंगे। उनका संकल्प पत्र ही चुनावी घोषणा पत्र है, जो चुनाव के डेढ़ वर्ष पूर्व ही जारी कर दिया गया। उनका यह फैसला भी लीक से हटकर है। अंत में उनकी एक बात और सुन ले -यह उनकी दृढ़ इव्छा शक्ति एवं संकल्प का प्रतीक हैं। 15-16 फरवरी 2016 को, अपनी पार्टी के गठन के पूर्व, उन्होंने खरोरा में आयोजित सर्वधर्म सम्मेलन में कहा था 'जो लोग मुझे बुजुर्ग और बेकार समझते हैं वे समझ लें कि छत्तीसगढ़ के हक की लड़ाई लड़ने के लिए मैं अभी 30 साल तक और जिंदा रहूंगा जोगी इस समय 71 के हैं।

जोगी का घोषणा पत्र
मैं अजीत जोगी पिता प्रमोद जोगी निवासी सिविल लाइन्स रायपुर (छग) ये शपथ लेता हूँ कि, मैं अगले वर्ष दिसंबर 2018 में, मैं, मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के दिन ही तत्काल निम्न निर्णयों पर हस्ताक्षर कर इन्हें तत्काल प्रभाव से लागू करूँगा।
किसान
मैं शपथ लेता हूँ कि, मैं, मेरे छत्तीसगढ़ के किसान भाइयों को 2500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से धान का समर्थन मूल्य दूंगा। मैं अजीत जोगी ये शपथ लेता हूँ कि, मैं, मेरे छत्तीसगढ़ के अधिकांश किसान भाइयों को पूर्णत: ऋण मुक्त कर दूंगा। इन किसान भाइयों द्वारा बैंकों से पूर्व में लिए गए ऋण की अदायगी मेरी सरकार करेगी।
युवा
मैं अजीत जोगी ये शपथ लेता हूँ कि, मैं, मेरे छत्तीसगढ़ के सभी स्थानीय युवाओं को रोजगार दूँगा। प्रत्येक बेरोजगार युवा के लिए उसके योग्यता अनुसार रोजगार व स्वरोजगार का प्रबंध करूँगा। मेरे छत्तीसगढ़ में संचालित सभी निजी, शासकीय एवं अर्ध शासकीय संस्थानों में 90 प्रतिशत पदों पर छत्तीसगढ़ के योग्य युवाओं को रोजगार देने का कड़ा नियम बनाऊंगा। प्रदेश में रोजगार पाने के लिए छत्तीसगढ़ी भाषा का ज्ञान अनिवार्य होगा।
महिला
मैं अजीत जोगी ये शपथ लेता हूँ कि, मैं, छत्तीसगढ़ में पूर्ण शराबबंदी कड़ाई से लागू करूँगा। मेरे छत्तीसगढ़ की माताओं, बहनों और बेटियों को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा देने के लिए, मेरी सरकार, कन्या के जन्म होते ही उसके नाम से 1 लाख रुपये की एफडी करेगी। इस जमा राशि का उपयोग लाभार्थी कन्या भविष्य में अपने उच्च शिक्षा व इलाज के लिए कर सकेगी। महिलाओं को शिक्षा, सम्मान एवं समानता के बल पर आत्मनिर्भर बनाने, सभी क्षेत्रों में 33 प्रतिशत आरक्षण का नियम लागू करूँगा।
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जोगी को झटका, जाति प्रमाण पत्र निरस्त

आगामी विधानसभा चुनाव के संदर्भ में अजीत जोगी एवं उनकी पार्टी को बड़ी चुनौती मानने वाले मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह जोगी की जाति संबंधी नए घटनाक्रम से जरुर खुश होंगे। हाई पॉवर कमेटी की अनुशंसा पर 3 जुलाई 2017 को बिलासपुर कलेक्टर ने जोगी का जाति प्रमाण निरस्त कर दिया है। जोगी आदिवासी है या नहीं यह सवाल लगभग तीन दशक से विवाद का विषय बना हुआ है। राजनीतिक आरोप - प्रत्यारोप, सामाजिक फैसले और अदालतों में दायर याचिकाओं ने इस मुद्दे को कभी ठंडा नही होने दिया। जब अजीत जोगी 21 जून 2017 को अपनी पार्टी की पहली साल गिराह मनाने के बाद तनिक संतोष की सांस ले रहे थे कि एकाएक उनकी जाति पर पड़ा हुआ 'रहस्य'  का पर्दा हट गया। राज्य सरकार द्वारा गठित उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने 28 जून को फैसला सुना दिया कि जोगी आदिवासी जमात से नहीं है। आईएएस रीना बाबा साहेब कंगाले की अध्यक्षता वाली समिति सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के निर्देश पर गठित की गई थी जिसे दो माह के भीतर निष्कर्ष पर पहुंचना था पर उसने जोगी की जाति संबंध स्थिति तय करने में लगभग 6 वर्ष लगा दिए। इससे जाहिर है कि इसे लटकाए रखने को पूरी कोशिश की गई जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 13 अक्टूबर 2011 को माधुरी पाटिल वर्सेज एडिशनल कलेक्टर आंध्रप्रदेश सरकार के मामले की सुनवाई करते हुए हाईपावर कमेटी बनाने का निर्देश राज्य सरकारों को दिया था जो आरक्षित जाति वर्ग की पहचान करेगी। छत्तीसगढ़ सरकार के सामाजिक, सांस्कृतिक संरक्षण अधिनियम 2013 के मुताबिक धारा 8 के तहत किसी का जाति प्रमाण पत्र नकली पाया गया तो उसे जप्त कर निरस्त कर दिया जाएगा और धारा 10 का दोषी पाए जाने पर उसके खिलाफ फर्जीवाड़ा का अपराध दर्ज किया जाएगा।
    जोगी की जाति पर न जाने कितनी बार पेंच आते रहे। राजनीतिक फायदे के लिए परिस्थितियों के अनुसार यह मामला जोर शोर से उठाया जाता रहा। कभी जोगी विरोधी कांग्रेसजनों ने इसे हवा दी तो कभी भाजपा ने राज्य की सत्ता पर काबिज होने के पूर्व इसे अपना प्रमुख राजनीतिक हथियार बना कर रखा। जोगी आदिवासी नहीं है, इसकी सबसे पहली शिकायत 1986-87 में संतकुमार नेताम ने भाजपा नेता दिलीप सिंह भूरिया की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग से की थी। संतकुमार नेताम भूरिया के कर्मचारी थे। स्पष्ट है कि शिकायत राजनीति प्रेरित थी। आयोग ने फैसला सुना दिया था कि जोगी आदिवासी नहीं है। जोगी ने आयोग के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिका-पुर्नयाचिकाएं लगाती रही। इस वजह से यह मामला एक बार इंदौर, हाईकोर्ट, 2 बार जबलपुर हाईकोर्ट व एक बार बिलासपुर हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा। बिलासपुर हाईकोर्ट के भूरिया के फैसले को यह कहकर खारिज कर दिया था कि आयोग को किसी की जाति तय करने का अधिकार नहीं है। लिहाजा भूरिया सुप्रीम कोर्ट गए थे। 
अब हाई पॉवर कमेटी के फैसले से यह मामला पुन: गर्मा गया है। जोगी ने निर्णय पर तीव्र प्रतिरोध जाहिर करते हुए हाईकोर्ट में चुनौती देने का मन बनाया है जबकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने जोगी के खिलाफ एक अपराध दर्ज करने की मांग मुख्यमंत्री से की है। यानी भाजपा व कांग्रेस दोनों इस मुद्दे को राजनीतिक हथियार के रुप में इस्तेमाल करना चाहती है। इसके पीछे मूल कारण है छत्तीसगढ़  जनता कांग्रेस पार्टी का बढ़ता जनाधार व इससे घनीभूत होती आशंकाए। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि जोगी की जाति पर संदेह का कुहासा होने के कारण छत्तीसगढ़ की आदिवासी जमात के वे सर्वमान्य नेता नहीं है। हालांकि इस वर्ग के साथ-साथ अनुसूचित जाति भी उनका प्रभावी वोट बैंक है जिनकी आबादी लगभग 12 प्रतिशत है जबकि आदिवासी करीब करीब 32 प्रतिशत। इसका अर्थ है सरकार बताने में ये दोनों जातियां निर्णायक भूमिका निभाती है। ऐसी स्थिति में यदि जोगी की जाति पर कोर्ट से कोई निर्णायक फैसला आता है और वह जोगी के खिलाफ जाता है तो जाहिर है आगामी चुनाव में जोगी विरोधियों का प्रमुख मुद्दा बनेगा। इससे निश्चित ही नए राजनीतिक समीकरण बनेंगे जो चुनाव के दौरान कितने प्रभावी होंगे फिलहाल कहना मुश्किल है।
   लेकिन यह भी तय है यह मामला अभी और लंबा खींचेगा तथा अदालतों के गलियारों में घूमता रहेगा। संभव है अगले वर्ष नवंबर - दिसंबर में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव के पूर्व फैसला आ जाए, क्योंकि ऐसी कोशिशें होंगीं किन्तु तब तक जोगी को इतना समय मिल जाएगा कि वे इससे होने वाले राजनीतिक नुकसान की भरपाई कर सकें। हालांकि उच्चाधिकार कमेटी का फैसला जोगी परिवार के लिए किसी सदमे से कम नहीं है और मरवाही से जोगी-पुत्र अमित जोगी की विधायकी खतरे में पड़ गई है। मरवाही अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी पहले यहां से निर्वाचित हुए है। 

जाति के मुद्दे पर ही केंद्रित है जोगी की राजनीति - नेताम

पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ आदिवासी नेता अरविंद नेताम का मानना है कि जोगी की जाति संबंधी मुद्दा जिंदा रहेगा, जिंदा रखा जाएगा क्योंकि जोगी की समूचा राजनीति इसी मुद्दे पर टिकी हुई है। आदिवासी समाज एवं विधानसभा चुनाव में इसके असर पर नेताम का कहना था कि आदिवासी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे तत्काल प्रतिक्रिया नहीं देते। अत्याचार सहन कर लेते है पर प्रतिरोध वक्त आने पर ही दर्ज करते है। चुनाव वोट के माध्यम से प्रतिक्रिया व्यक्त करने का अवसर होता है। पिछले चुनाव इसका प्रमाण है। अनुसूचित जनजाति बहुत इलाकों में कांग्रेस का ग्राफ गिरा है। यह उनकी खामोश प्रतिक्रिया है। इसकी शुरुआत 2003 से हुई थी जब कांग्रेस ने चुनाव अजीत जोगी के नेतृत्व में लड़ा था। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस कभी पराजित नहीं होती बशर्ते वर्ष 2000 में नवगठित राज्य में कांग्रेस सरकार की बागडोर जोगी के बजाए किसी कांग्रेस संस्कृति वाले नेता को सौंपी जाती। यदि हाईकमान को विद्याचरण शुक्ल मंजूर नहीं थे तो अन्य विकल्प खुले हुए थे। मोतीलाल वोरा थे, श्यामाचरण शुक्ल थे। लेकिन कमान जोगी को दी गई। परिणाम सामने है। नेताम ने कहा कि जाति को लेकर आदिवासी समाज बहुत संवेदनशील है और इस मुद्दे पर कोई भी गड़बड़ बर्दाश्त नहीं करता।