Monday, November 30, 2015

मंत्रियों की पीड़ा, ये कैसे नौकरशाह

- दिवाकर मुक्तिबोध
किसी राज्य के मंत्री यदि यह गुहार लगाए कि अधिकारी उनकी सुनते नहीं, उनकी परवाह नहीं करते, उनका काम नहीं करते तो इसे क्या कहा जाए? जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि होने और सत्ताधिकार के बावजूद उनकी अपनी कमजोरी, भलमनसाहत, नेतृत्व की अक्षमता या और कुछ? नौकरशाही के अनियंत्रित होने की और क्या वजह हो सकती है? जाहिर सी बात है जब राजनीतिक नेतृत्व कमजोर होगा तो प्रशासनिक पकड़ भी कमजोर होगी और ऐसी स्थिति में स्वाभाविक है नौकरशाही बेलगाम होगी तथा मंत्री अपनी कमजोरियों के चलते मुख्यमंत्री के सामने उसकी निरंकुषता का रोना रोते रहेंगे। छत्तीसगढ़ में यही हो रहा है, यदि ऐसा कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। राज्य में सन् 2003 से डा. रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा का शासन है। इस दौरान राज्य के अनेक मंत्री मुख्यमंत्री एवं संगठन की बैठकों में प्रशासनिक अधिकारियों के कामकाज और उनके द्वारा की जा रही उपेक्षा की शिकायतें करते रहे हैं। अभी हाल ही में 24 नवंबर 2015 को मुख्यमंत्री निवास में केबिनेट मीटिंग में, अफसरों को विदा करने के बाद मंत्रियों ने जमकर नौकरशाही पर अपनी भड़ास निकाली। उनका आरोप था कि अफसर जान बूझकर मंत्रियों को बदनाम करने के लिए पुराने मामलों को हवा दे रहे हंै। जिस काम के लिए उन्हें निर्देशित किया जाता हंै, वे या तो करते नहीं या किसी न किसी बहाने से अटका देते हंै। अधिकारियों का एक ही धंधा है, पैसा बनाओ तथा मंत्रियों को बदनाम करो। अधिकारी इतने सयाने है कि अपना काम सुनियोजित तरीके से करवा लेते हंै और जिस मामलों में उनका हित नहीं सधता, उन्हें तरह-तरह के बहानों से लटका देते हंै। अपनी मंत्रियों की व्यथा सुनने के बाद मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने आश्वस्त किया कि वे इस मामले को देखेंगे और जहाँ आवश्यकता होगी जांच करवाकर उचित कदम उठाए जाएंगे।
    केबिनेट में हुई इन चर्चाओं से समझा जा सकता है कि राज्य में शासन-प्रशासन किस तरह चल रहा है और प्रशासनिक टकराव के कैसे-कैसे चेहरे हैं। वैसे भी नौकरशाही की निरंकुशता और राजनीतिक नेतृत्व के ढिलेपन का सवाल कोई नया नहीं हैं। पिछले दशक से जब से राज्य में डा. रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा की सत्ता हैं, नौकरशाही के बेलगाम होने, मंत्रियों, विधायकों को समुचित महत्व न देने और उनकी उपेक्षा की चर्चाएँ राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ जनसामान्य के बीच भी होती रही हैं। अफसरों के नाम लेकर सरेआम आरोप-प्रत्यारोप के उदाहरण यद्यपि कम ही हैं लेकिन मंत्रियों एवं प्रशासनिक अधिकारियों के बीच टकराव अनेक बार सार्वजनिक हुआ है। मिसाल के तौर पर लंबे समय तक प्रदेश के गृहमंत्री रहे ननकीराम कंवर एवं तत्कालीन राज्य पुलिस के मुखिया विश्वरंजन के बीच कार्यशैली को लेकर विवाद और अप्रिय संबंधों की खबरें अखबारों की सुॢखयां रही हंै। और तो और राज्य के पूर्व मुख्य सचिव सुनील कुमार और वरिष्ठ व कद्दावर मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के बीच कतिपय मामलों में रस्साकशी की काफी चर्चा रही।
      दोनों के बीच तनाव इस कदर बढ़ा कि बात मुख्यमंत्री तक पहुंची। बृजमोहन मुख्यमंत्री से मिले तथा उन्होंने मुख्य सचिव सुनील कुमार को हटाने की मांग की। ये दो उदाहरण यह दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि नौकरशाही और सत्ताधारियों के बीच अपेक्षित सामंजस्य नहीं है। नतीजन दोनों के अपने-अपने राग है, चीजों को देखने का अलग-अलग नजरिया है। यह नजरिया मुख्यत: योग्यता, कार्यक्षमता और बौद्धिक कौशल पर केंद्रित है। ऐसी स्थिति दोनों तरफ है। कई मंत्री अपने प्रशासनिक अफसरों को तुच्छ और नाकारा समझते हैं और कुछ मंत्रियों को लेकर ऐसी ही राय प्रशासनिक अफसर भी रखते हैं। ऐसा प्राय: उन मंत्रियों के साथ है जो स्वभाव और प्रकृति से सरल है तथा अपने अधिकारियों से भी ऊंचे स्वरों में बात नहीं कर सकते। किंतु 24 नवंबर को मंत्रिमंडल की बैठक में नौकरशाहों पर जो टीका-टिप्पणियां की गई, वे उन मंत्रियों के मुखारविन्द से भी निकली जिन्हें दबंग होने का सेहरा हासिल है। राज्य मंत्रिमंडल में राजनीतिक चतुराई में माहिर और तेज तर्रार समझे जाने वाले चंद मंत्रियों में सर्वश्री बृजमोहन अग्रवाल, राजेश मूणत, अजय चंद्राकर, केदार कश्यप, आदि का नाम लिया जाता है। यदि ऐसे मंत्री भी यदि अपने अधिकारियों से तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं और नौकरशाहों के सामने लाचार है तो चिंता का विषय हैं।
     दरअसल मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह कठोर नहीं है। वे सीधे सरल है किंतु राजनीतिक सूझ-बूझ और कूटनीति में माहिर। सरलता, सहजता और सर्वउपलब्धता की वजह से उनकी छवि एक भले आदमी की है। लेकिन यह भला आदमी किस कदर होशियार है यह उनकी कार्यशैली से जाहिर है। अब तक उनका शासन निद्र्वंद रहा है। हालांकि उन्हें अनेक बार असहज स्थितियों से गुजरना पड़ा किन्तु उन पर कोई दाग नहीं लगा, न व्यवहार का और न भ्रष्टाचार का। जबकि सरकार के बहुत से नुमाइंदों के भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे रहने की चर्चा सरेआम है। स्वभाव से ऐसे सहज-सरल मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह से दबंग नौकरशाही से कैसे दब सकती हैं? ऐसी स्थिति में मंत्रियों की क्या बिसात? मुख्यमंत्री के सामने बोलकर वे अपना दु:ख हल्का तो कर लेते हैं किन्तु उन्हें मालूम है कि होना जाना कुछ नहीं है। क्योंकि पहले भी कुछ नहीं हुआ है। सत्ता और संगठन के बीच तालमेल और नौकरशाही के व्यवहार पर पहले भी भाजपा की बैठकों में विचार-विमर्श होता रहा है। लेकिन शासन-प्रशासन के स्तर पर स्थितियां सुधरी हो, ऐसा नजर नहीं आता।

Saturday, November 21, 2015

असहिष्णुता, बहस और सत्ता का अहंकार

- दिवाकर मुक्तिबोध
      देश में बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में नामचीन साहित्यकारों, फिल्मकारों, संस्कृतिकर्मियों और वैज्ञानिकों द्वारा राष्ट्रीय सम्मान लौटाने की घटनाओं पर राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी की प्रतिक्रिया के बाद कुछ सवाल सहजत खड़े होते हैं। लेकिन इन पर चर्चा के पूर्व राष्ट्रपतिजी के विचारों पर गौर करना होगा जो उन्होंने नई दिल्ली में 16 नवंबर को राष्ट्रीय प्रेस दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय प्रेस परिषद द्वारा आयोजित कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए। उन्होंने कहा- ''प्रतिष्ठित पुरस्कार व्यक्ति की प्रतिभा, योग्यता और कड़ी मेहनत के सम्मान में दिए जाते हैं। ये राष्ट्रीय आदर के प्रतीक होते हैं। अत: पुरस्कार लेने वालों को इनका महत्व समझते हुए इन पुरस्कारों का सम्मान करना चाहिए। समाज में कुछ घटनाओं के कारण संवेदनशील व्यक्ति कभी-कभी विचलित हो जाते हैं किन्तु भावनाओं को तर्क पर हावी होने नहीं देना चाहिए और असहमति को बहस तथा चर्चा से व्यक्त किया जाना चाहिए।''
       राष्ट्रपति के इन विचारों से स्पष्ट है कि राष्ट्रीय सम्मान लौटाने की घटनाओं को वे ठीक नहीं मानते और विरोध के इस तरीके से असहमत हैं। उन्होंने उन पुरस्कार विजेताओं को नसीहत देने की कोशिश की है जिन्होंने देश में बढ़ती धार्मिक असहिष्णुता, उन्माद एवं इससे उपजे तमाम तरह के अपराध जिनमें विचारकों, लेखकों की हत्या, हत्या की धमकियां तथा सरकार की मूकदर्शक के रुप में भूमिका भी शामिल है, के विरोध में अपने राष्ट्रीय अलंकरण, सम्मान एवं पुरस्कार स्वरुप प्राप्त राशि लौटाई है। एक-एक करके लगभग 80 विख्यात विद्वानों द्वारा लौटाए गए सम्मान की वजह से असहमति की तेज आवाज देश-दुनिया में गूंजी और इससे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं को बल मिला। विरोध की इन चर्चाओं की धमक अब धीमी पड़ गई है और नई आवाजें जुड़ने का सिलसिला भी थम सा गया है। यह इसलिए नहीं कि एक सम्मानजनक मंच पर बुलाकर विरोधियों से बातचीत की गई हो, (याद रहे ऐसी कोई पहल नहीं हुई) बल्कि इसलिए क्योंकि बिहार चुनाव और समय की रफ्तार ने हवा की दिशा बदल दी और साहित्यकारों, कलाकारों, लेखकों एवं विचारकों के विरोध का तूफान एक जगह आकर ठहर गया लेकिन उसका अस्तित्व कायम है।
       बहरहाल चर्चा राष्ट्रपतिजी के द्वारा व्यक्त विचारों पर है। देश में बढ़़ती असहिष्णुता पर वे कई बार अपने चिंता व्यक्त कर चुके हैं। उनकी चिंता और लेखकों की चिंता में कोई अंतर नहीं है। फर्क केवल प्रतिक्रिया का है। अब सवाल हंै कि एक-एक करके जब इस्तीफे आ रहे थे, पुरस्कार लौटाए जा रहे थे, तो क्या तब केंद्र सरकार ने अपनी ओर से कोई संवेदनशीलता दिखाई? केंद्र सरकार के मंत्री पुरस्कार लौटाने की घटनाओं को अनुचित तो बताते रहे किन्तु, किसी ने भी किसी लेखक से भेंट करने की जरुरत नहीं समझी। किसी ने भी लेखकों, विचारकों, कलाकारों को बहस के लिए एक मंच पर लाने की कोशिश नहीं की। और तो और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पूरे घटनाक्रम पर मौन रहे। यह कैसी संवेदनशीलता जिसका दावा किया जाता है? प्रधानमंत्री चाहते तो प्रारंभ में ही जब पुरस्कार लौटाने का दौर शुरु हुआ था, प्रतिक्रिया देते, अपील करते तथा प्रधानमंत्री कार्यालय में लेखकों को सम्मानजनक ढंग से आमंत्रित करते और देश में बढ़ती धार्मिक असहनशीलता व तनाव पर सरकार की चिंता तथा उसके प्रयत्नों से अवगत कराते और भरोसा देने की कोशिश करते। राष्ट्रपति वैचारिक बहस चाहते हैं, यह हो सकती थी बशर्ते वैसी सरकार के स्तर पर संवेदनशीलता दिखाई जाती, वैसी पहल की जाती। यह समझ से परे है कि हमारे देश में उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे हुए व्यक्ति पद के आतंक में इस कदर क्यों गिरफ्त हो जाते हैं और उनके सोचने, समझने व व्यवहार का तौर-तरीका क्यों बदल जाता है। यह कोई तुलना नहीं है पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की कार्यशैली को एक उदाहरण के बतौर ले सकते हैं। हाल ही में मनीला में एशियाई पैसिफिक इकनॉमिक कोऑपरेशन सम्मेलन के एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने अलीबाबा डॉट कॉम के मालिक जैक मा को मंच पर बुलाया और वे खुद उनका इंटरव्यू लेने लगे। जैक मा आर्थिक दुनिया की बहुत बड़ी हस्ती है तथा वे 13 लाख करोड़ रुपये की कंपनी के मालिक हैं। यहां सवाल तरीके का है। राष्ट्रपति के लबादे को किनारे रखते हुए ओबामा ने एक सामान्य व्यक्ति, एक सामान्य इंटरव्यूकर्ता के रुप में खुद को सामने रखा तथा जैक मा से उनकी उपलब्धियों एवं भविष्य की योजनाओं पर बातचीत की। क्या बातचीत के लिए इसी तरह की पहल या व्यवहार हमारे प्रधानमंत्री या मंत्री देश में घट रही घटनाओं से आहत लेखक बिरादरी से नहीं कर सकते थे? क्यों सत्ता के मठाधीश समस्याओं के नासूर बन जाने तक इंतजार करते हैं? क्यों तुरंत राहत का मरहम नहीं लगाते? मनुष्यता को तार-तार करने वाले दादरी जैसे कांड में भी लंबी चुप्पी किसलिए? यह संभव था कि कर्नाटक के लेखक, विचारक एमएम कालबुर्गी की हत्या की घटना की केंद्र शासन के स्तर पर अविलंब भत्र्सना की जाती। लेखक की हत्या यानी विचारों को कुचलने की कोशिश। एक लोकतांत्रिक देश में ऐसा कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है। जब असहनशीलता के विरोध में पुरस्कार लौटाने का दौर शुरु हुआ तब भी सत्ता का जमीर नहीं जागा। क्या यह तानाशाही प्रवृत्ति का संकेत नहीं है?
        यह तय है कि राष्ट्रपति के विचारों एवं साहित्य अकादमी की पूर्व में की गई अपील के बावजूद अकादमी एवं अन्य राष्ट्रीय अलंकरण लौटाने वाले विद्वान अपने कदम पीछे नहीं लेंगे। और उन्हें लेना भी क्यों चाहिए। जिन वजहों से उन्होंने यह कदम उठाया है वे आज भी यथावत हैं। दरअसल हर समस्या का हल बातचीत है, तार्किकता के साथ बहस है। पर सवाल है इसके लिए माहौल बनाने की पहली जिम्मेदारी किसकी है? क्या सत्तापक्ष यह जिम्मेदारी नहीं ले सकता? देश चलाने के लिए देश की जनता ने उन्हें यह अधिकार सौंप रखा है, लिहाजा वह जवाबदेह भी है तथा जिम्मेदार भी। इसलिए बहस के लिए पहल की अपेक्षा भी उसी से की जाती है। सत्ता का अहंकार बस यही नहीं होने देता। बड़ी दिक्कत यही है।

Sunday, November 15, 2015

यादों में बबनजी

- दिवाकर मुक्तिबोध
       पहले सर्वश्री मायाराम सुरजन फिर रामाश्रय उपाध्याय, मधुकर खेर, सत्येंद्र गुमाश्ता, रम्मू श्रीवास्तव, राजनारायण मिश्र, कमल ठाकुर और अब श्री बबन प्रसाद मिश्र। छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता के ये शीर्ष पुरुष एक - एक करके दुनिया से विदा हो गए और अपने पीछे ऐसा शून्य छोड़ गए जिसकी भरपाई मुश्किल नजर आ रही है। यह मेरा सौभाग्य रहा है कि मुझे इनका सानिंध्य प्राप्त हुआ। अलग - अलग समय में मैंने इनके साथ काम किया, मुझे इनका आर्शीवाद मिला, पत्रकारिता की समझ विकसित हुई, विशेषकर मूल्यपरक एवं ईमानदार पत्रकारिता को आत्मसात करने की प्रेरणा मिली। इन श्रेष्ठ संपादकों में से बबन प्रसाद मिश्र ही ऐसे थे जिनके साथ मैंने सबसे कम अवधि एवं सबसे आखिर में काम किया। वर्ष था सन् 2010 एवं अवधि 8-10 महीने। हालांकि इसके पूर्व सन् 2000 से 2003 तक मेरा उनका साथ रहा लेकिन संस्करण अलग थे, भूमिकाएं अलग थीं और शहर भी अलग। बहरहाल वर्ष 2010 पत्रकारिता में उनका उत्तरार्ध था और कुछ-कुछ मेरा भी। लेकिन इसके बावजूद उनके साथ मेरा संपर्क लगभग 40 वर्षों तक बना रहा। यानी ''युगधर्म'' के दिनों से, जब वे इस अखबार के संपादक थे और मैं दैनिक देशबंधु में नवजात उपसंपादक। वर्ष शायद 1976-77। चंूकि उनके साथ बिताई गई अवधि बहुत कम थी लिहाजा यादगार लम्हों का कोई लंबा चौड़ा इंद्रधनुष मेरे पास नहीं है अलबत्ता उनका व्यक्तित्व, उनकी कार्यशैली, उनका लेखन, उनकी दृष्टि और सबको साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति पर जरुर कुछ बातें, निजी प्रसंगों के तौर पर की जा सकती है।
      श्री बबन प्रसाद मिश्र उदार हिन्दुत्ववादी विचारधारा के थे। जाहिर सी बात है राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से उनका रिश्ता था जिसे उन्होंने कभी छिपाया नहीं और वैचारिक स्तर पर इसका प्रकटीकरण उनके लेखन में भी होता रहा। विशेषकर राजनीतिक टिप्पणियों में। लेकिन खास विचारधारा से बंधे रहने के बावजूद खबरों के मामले में उन्होंने निष्पक्षता की हदें नहीं लांघी और समय-समय पर संघ और भाजपा के कामकाज पर भी कटाक्ष करते रहे। वे दरअसल मार्गदर्शक की भूमिका में थे जिन्हें राज्य में पार्टी के सत्तारुढ़ होने के बावजूद पर्याप्त महत्व नहीं मिला अलबत्ता श्री मिश्र निष्पक्ष भाव से पत्रकारिता में अपनी भूमिका के साथ न्याय करते रहे।
      मैं सन् 1976 में अपने एक पत्रकार मित्र से मिलने पंडरी स्थित दैनिक 'युगधर्म' कार्यालय गया था वहां उनसे पहली मुलाकात हुई, पहला परिचय हुआ। उन्हें इस बात का इल्म नहीं था कि मैं किसी अखबार की नौकरी में हूं। उन्होंने अंग्रेजी दैनिक हिन्दुतान टाइम्स की दो खबरें मुझे अनुवाद करने के लिए दे दी। मैं अचकचा गया। उन्हें बताया मैं देशबन्धु में हूँ। ओह कहते हुए उन्होंने अखबार वापस ले लिया। मैं समझ गया कि वे 'युगधर्म' के लिए ऑफर दे रहे थे। मेरी कोई इच्छा नहीं थी। यह अलग बात है 10 साल बाद जब सन् 1986 में 'युगधर्म' का प्रबंधन बदला तो मैं इसी अखबार का संपादक नियुक्त हुआ। तब तक बबनजी यहां से विदा हो चुके थे। इस छोटी सी घटना में खास कुछ नहीं है किन्तु इससे बबनजी की एक सद्य परिचित के प्रति स्नेह की अभिव्यक्ति होती है। ऐसे निर्मल स्वभाव के थे वे। बाद में पत्रकारवार्ताओं में या कभी-कभी कार्यक्रमों में उनसे मुलाकात हुआ करती थी लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि उनसे लंबी बातचीत हुई हो अलबत्ता 'युगधर्म' जहां वे सन् 1972 से 1986 तक रहे, उनके लेखन से रुबरु होता रहा। खास विचारशैली की वजह से कई बार मुद्दों पर मेरी असहमति भी रही लेकिन मैंने जाहिर नहीं किया केवल यह सोचकर कि ऐसा करना वरिष्ठ के प्रति अशिष्टता होती वैसे भी विचारधारा से बंधे हुए लेखन में ऐसा होना स्वाभाविक था।
      बबनजी बहुत अच्छे वक्ता थे। समां बांध देते थे। विषयों का गहरा ज्ञान था जो उनकी अध्ययनशीलता को दर्शाता था। गजब के मिलनसार थे। उनके सम्पर्कों का भी दायरा बहुत विशाल था। पेशेवराना ईमानदार के कायल थे, उसे जीते भी थे किन्तु कभी-कभी इसे हल्के से खुरचते भी थे। यहां मेरी उनसे असहमति थी। मुझे यह कभी समझने में नहीं आया कि किसी मंत्री या विधायक के जन्मदिन के अवसर पर ''नवभारतÓÓ जैसे बड़े अखबार के संपादकीय पृष्ठ पर प्रशस्तिपूर्ण लेख छापने का क्या तुक है। विशेषकर विचारों और टिप्पणियों के लिए सुरक्षित पृष्ठ पर। छत्तीसगढ़ के तत्कालीन कांग्रेसी मंत्री और विधायक सत्यनारायण शर्मा के जन्मदिन पर ऐसा चित्र देखने में आता था। बबनजी इसके संपादक थे। जाहिर है कि यह संबंधों के निर्वाह की बात थी या प्रबंधकीय विवशता थी। पत्रकार और व्यक्ति के रुप में उनके संबंधों की झलक 7 नवंबर 2015 को उनकी अंतिम यात्रा में देखने मिली जिसमें भारी संख्या में विभिन्न वर्गों के लोग शामिल हुए। रायपुर शहर एवं दूरदराज के लोगों की उपस्थिति एक पत्रकार के रुप में उनकी लोकप्रियता एवं स्वीकार्यता को दर्शाती है।
      नौकरी की दृष्टि से बबनजी मेरा अधिकाधिक संवाद वर्ष 2000 में स्थापित हुआ। 'नवभारत' के बिलासपुर संस्करण के लिए संपादक की जरुरत थी और मुझे नौकरी बदलनी थी। बबनजी ने मेरा नाम आगे बढ़ाया और नागपुर से 'नवभारत' समूहके संचालक श्री प्रकाश माहेश्वरीजी से सहमति मिल गई। संयुक्त संपादक के रुप में माहेश्वरीजी के हस्ताक्षर का नियुक्ति पत्र मुझे बाद में मिला। बबनजी ने औपचारिक पत्र जारी करते हुए बिलासपुर से 1 मई 2000 को मेरी ज्वाईनिंग कराई और फिर रायपुर-बिलासपुर संस्करण के बीच बेहतर तालमेल की शुरुआत हुई। आमतौर पर देखा गया है कि किसी अखबार समूह के संपादकों के बीच तालमेल में कई बार अहम् आड़े आता है। अखबारी दुनिया के लिए यह सामान्य बात है। बबनजी चूंकि वरिष्ठ थे, अनुभव और पद में बड़े थे, इसलिए हमारे बीच कोई समस्या नहीं थी। फिर बबनजी का स्वभाव ऐसा था कि वह सबको भाता था, विश्वास जगाता था। यह अहसास रहता था कि यदि अखबार में कुछ गलत हो जाए तो प्रबंधन का कोप झेलने के लिए सरपरस्त के रुप में बबनजी मौजूद है। इसलिए मैं भी कुछ निश्चिंतता का अनुभव करता था।
       'नवभारत' बिलासपुर में मैं महज डेढ़-दो साल रहा। इस दौरान बबनजी का आना-जाना लगा रहा। इस दौर की कोई विशेष घटना नहीं है अलबत्ता एक बात मुझे हमेशा याद रहेगी बल्कि सालती रहेगी कि बिना किसी वजह के केवल न्यायिक प्रक्रिया से खौफ खाते हुए एक मामले में मुझे खेद प्रकट के लिए विवश होना पड़ा था। दरअसल मेरे अपने नियमित साप्ताहिक कॉलम में जिसकी प्रकृति व्यंग्यात्मक थी, मैंने एक टिप्पणी लिखी थी जिसके केंद्र में बिलासपुर उच्च न्यायालय के तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश श्री रमेश चंद्र गर्ग थे। इसे लेकर भारी बवाल मचा और बात नागपुर तक गई। बबनजी परेशान थे और इस संदर्भ में संचालक प्रकाश माहेश्वरी से उनकी बातचीत होती थी। हाईकोर्ट प्रबंधन ने अप्रत्यक्ष रुप से संकेत दे दिया था कि अवमानना का केस होगा और कोर्ट में हाजिरी देनी पड़ेगी। हालांकि अखबारों के साथ यह सामान्य सी बात थी। मानहानि के मुदकमें तो चलते रहते हैं लेकिन इस मामले में न जाने क्यों खौफ कुछ ज्यादा गहराया हुआ था। नागपुर में श्री प्रकाश माहेश्वरी ने वकीलों से विचार-विमर्श किया और इस नतीजे पर पहुंचा गया कि मैटर में आपित्तजनक और अवमानना जैसा कुछ नहीं है किन्तु शीर्षक गड़बड़ है। यह तय हुआ कि अखबार में खेद प्रकट किया जाए। मुझे इसकी उम्मीद नही थी। बबनजी के रहते तो बिल्कुल नहीं। लेकिन रायपुर से मैटर बनकर आया और हमें उसे अपने नाम के साथ छापना पड़ा। यह बेहद दु:खद था। दुख इस बात का भी था कि सारे फैसले नागपुर और रायपुर में लिए गए।
       बहरहाल इस दौर की एक और बात खटकती थी कि बिलासपुर संस्करण में व्यवस्था के खिलाफ विचारों को रायपुर में पसंद नहीं किया जाता था। विशेषकर मेरे साप्ताहिक कॉलम एवं एडिट पेज पर प्रकाशित टिप्पणियों को। ऐसा हमेशा नहीं होता था किन्तु गाहे-बगाहे मिश्राजी का फोन आ जाया करता था। वे कहते थे नाहक क्यों मोर्चा खोल रहे हो, अखाड़े में कुश्ती लड़ना छोड़ दो। मैं समझ रहा था कि चूंकि वे राजधानी में रहते हैं अत: प्रतिरोध का सामना उन्हें करना पड़ता है। अत: यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी हालांकि नागपुर से इसे लेकर कभी कोई चिट्ठी पत्र नहीं आई। 'नवभारत' में विचारों का खुलापन था। यह इस बात से भी जाहिर है कि बबनजी की वैचारिक प्रतिबद्धताओं से भिज्ञ होने के बावजूद राष्ट्रवादी विचारों के लिए ख्यात 'नवभारत' के प्रबंधन ने उनके हाथों में अखबार की कमान दे रखी थी।
      'नवभारत' के बाद बबनजी दैनिक भास्कर रायपुर-बिलासपुर में प्रबंधकीय सलाहकार की भूमिका में आ गए। प्रबंधकीय कार्यों से बिलासपुर में भी उनका आना-जाना बना रहा। मैं उन दिनों दैनिक भास्कर बिलासपुर में संपादक था। सो उनसे मुलाकात और बातचीत होती रही। मुझे याद है, 2003 के विधानसभा चुनाव के दौरान दैनिक भास्कर बिलासपुर ही एकमात्र ऐसा प्रमुख अखबार था जो श्री विद्याचरण शुक्ल के प्रादेशिक नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की चुनाव संबंधी गतिविधियों को भी यथोचित स्थान देता था जबकि राजधानी रायपुर सहित प्रदेश के प्राय: सभी अखबारों में एनसीपी की खबरों को ब्लेकआउट करने या दबाकर देने के निर्देश थे। अजीत जोगी कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री थे तथा उनका दबाव अखबारों के प्रबंधकों पर था। किन्तु बिलासपुर भास्कर ने अलग राह पकड़ रखी थी जो पार्टी और सरकार के स्तर पर बर्दाश्त नहीं की जा सकती थी। लिहाजा भोपाल भास्कर प्रबंधन की ओर से मुझसे संबंधित एक कड़ी चिट्ठी बबनजी के पास आई। भोपाल से फोन पर मुझे फटकारा गया। बबनजी बिलासपुर आए और काफी देर तक मुझे प्रबंधन के व्यावसायिक हितों को समझाते रहे। उन्होंने चिट्ठी मुझे नहीं दिखाई, यह सोचकर कि मैं आहत न हो जाऊँ। यहां भी वे ढाल बनकर खड़े रहे। इलेक्शन खत्म हुआ और बात आई-गई, हो गई। पर यादों में एक और घटना जुड़ गई जो बबनजी के व्यवहार की विशिष्टता को दर्शाती है।
      फिर आया वर्ष 2010। मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के एक न्यूज चैनल की नौकरी से मैं ताजा-ताजा मुक्त हुआ था। बबनजी का फोन आया - 'आज की जनधारा में काम करना है। संसाधन सीमित है इसलिए पैसा कम मिलेगा। मैं साथ में हूं। मैंने हामी भरी। 1 मई 2010 को मैंने बतौर संपादक ज्वाइनिंग दी। बबनजी थे प्रधान संपादक। वे इस अखबार में 8-10 महीने ही रहे किन्तु इस बीच कभी ऐसा मौका नहीं आया कि उन्होंने अखबार में खबरों से लेकर विचारों की अभिव्यक्ति तक कोई टोका-टाकी की हो। काम करने की पूरी आजादी दी और कभी अपने विचारों को थोपने की कोशिश नहीं की। उनका अपना लेखन था, मेरा अपना। वैचारिक सहिष्णुता के वे कायल थे और इसे जीते भी थे। कुछ समय बाद 'आज की जनधारा' से मैं भी मुक्त हुआ। इसके बाद बीते 4 वर्षों में उनसे यदा-कदा ही मुलाकातें हुईं। अकस्मात एक दिन (7 नवंबर 2015) उनके निधन की खबर मिली। मैं कुछ क्षण के लिए स्तब्ध रह गया। एक शून्य सा महसूस हुआ फिर ऑखों के सामने उनकी यादों के सितारे झिलमिलाने लग गए।
      बबनजी मूलत: पत्रकार थे, सात्यिकार नहीं। यह अलग बात है कि छत्तीसगढ़ सरकार का राज्य स्तरीय सुंदरलाल शर्मा साहित्य पुरस्कार उन्हें उनके साहित्यिक योगदान के लिए मिला। यह शायद इसलिए कि हिन्दी साहित्य में उनकी गहरी दिलचस्पी थी और वे अनेक साहित्यिक संस्थाओं के अध्यक्ष थे। बहरहाल छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में बबनजी का स्थान निश्चित रुप से विशिष्ट रहेगा। इसलिए क्योंकि वैचारिक असहमति का भी वे सम्मान करते थे और उसे अखबार में यथोचित स्थान देते थे। अर्थात उनकी पत्रकारीय दृष्टि निष्पक्ष थी जो वर्तमान समय की सबसे बड़ी जरुरत है।

Tuesday, November 10, 2015

मुठभेड़ के नाम पर बंद हो सरकारी हिंसा



- दिवाकर मुक्तिबोध
       आत्मसमर्पित नक्सलियों को छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा नौकरी में लेने की पेशकश क्या राज्य में हिंसात्मक नक्सलवाद के ताबूत पर आखिरी कील साबित होगी? शायद हां, पर इसकी पुष्टि के लिए कुछ वक्त लगेगा जब राज्य सरकार की इस योजना पर पूरी गंभीरता एवं ईमानदारी से अमल शुरु होगा। दरअसल बस्तर और सरगुजा संभाग के आदिवासी बाहुल्य गाँवों में युवाओं के पास कोई काम नहीं है। पढ़ाई-लिखाई से भी उनका रिश्ता टूटता -जुड़ता रहा है। साक्षर, असाक्षर, शिक्षित और अशिक्षित या अर्धशिक्षित युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में सरकार तो विफल थी ही, निजी क्षेत्रों में भी उनके लिए कोई काम नहीं था अत: उन्होंने एक सुविधाजनक रास्ता चुन लिया जो नक्सलवाद की ओर जाता था। यहाँ रोजगार था, एवज में खर्चे के लिए पैसे मिलते थे, दो जून की रोटी की व्यवस्था थी, गोलियों से भरी हुई बंदूकें हाथ में थी, शिकार की भी स्पष्टता थी, पुलिस के जवानों पर अचानक आक्रमण करने एवं घेरकर गोली मारने के अपने अलग मजे थे और थी जंगल की स्वच्छंदता तथा ऐशो आराम। सजा केवल इतनी थी कि उनका आकाश केवल जंगलों और गाँवों तक सीमित था। शहर व कस्बे की सरहदें वे छू सकते थे लेकिन लौटना जंगल की ओर ही था। इसे मामूली सजा मानकर ऐसे युवाओं ने पिछले दो दशकों में छत्तीसगढ़ में हिंसा का जो तांडव पेश किया उससे पूरा देश कांप उठा। नक्सलवाद सबसे बड़ी राष्ट्रीय समस्या घोषित हुई तथा मरने - मारने का खेल शुरु हो गया। इस खूनी खेल में बस्तर-सरगुजा के जंगलों में जीवन-यापन कर रहे वे आदिवासी पिसते चले गए जिनका कसूर सिर्फ इतना था कि वे निरीह थे, बहकावे में आ जाते थे, पुलिस के भी और माओवादियों के भी। इसका फल उन्हें जान देकर भोगना पड़ता था। आंकडं़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में 2005 से अब तक 700 से अधिक आदिवासी मारे गए हैं। फर्जी मुठभेड़ों, अपहृत आदिवासियों एवं माओवादियों द्वारा मुखबिरों को जनअदालत लगाकर हत्या करने की घटनाएँ अलग हैं जो इस संख्या में भारी इजाफा करती हैं।
      बीते 5 वर्षों में नक्सली मोर्चे पर सरकार एवं विचारकों की दृष्टि से काफी कुछ बेहतर घटा है। घोर नक्सल प्रभावित 7 राज्यों में समस्या की तीव्रता कुछ कम हुई है जिसमें छत्तीसगढ़ भी शामिल है। यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि केंद्र एवं राज्य सरकारों की पुलिस व अद्धसैनिक बलों के दबाव की वजह से माओवादियों के कार्यक्षेत्र का दायरा सिमटता जा रहा है और अब छत्तीसगढ़ ही उनकी प्रमुख पनाहगार है जहां वे स्वयं को बेहद सुरक्षित समझते हैं। लेकिन अब उनका यह सुरक्षित गढ़ भी दरक रहा है। विकास, आत्मसमर्पण, मुठभेड़, नई पुर्नवास नीति, नक्सल पीडि़त परिवार के बच्चों की शिक्षा-दीक्षा और अब आत्मसमर्पितों को सरकारी नौकरी देने का फैसला नक्सल मोर्चे पर सरकार की रणनीति का हिस्सा है जिसे वांछित सफलता मिलती दिख रही है। लेकिन यहाँ कुछ सवाल खड़े होते हैं। नक्सलवाद के खात्मे के नाम पर क्या पुलिस को यह छूट दे दी गई है कि शक के आधार पर किसी को भी गोली मार दें? बीती घटनाएँ इस बात की साक्षी हैं जिसमें चौपाल में इकट्‌ठा हुए ग्रामीणों, खेतों में भेड़-बकरी चराने वालों तथा पुलिस को देखकर डर कर भागने वाले लोगों को पुलिस ने भून दिया। उदाहरण के तौर पर दो वर्ष पूर्व की घटना याद आती है। 7 मई 2013 को बीजापुर जिले के एड्समेटा में पूजा के लिए एक स्थल पर इकट्‌ठा हुए आदिवासियों को पुलिस एवं कोबरा बटालियन के जवानों ने घेर लिया और गोलियां बरसाईं। इस गोलीबारी में 3 बच्चों सहित 8 ग्रामीण मारे गए। पुलिस को जब अपनी गलती का एहसास हुआ तो इस घटना को उसने मुठभेड़ की शक्ल दे दी। इसके पूर्व घटित मीना खलको कांड को कौन भूल सकता है? 6 जुलाई 2011 को बलरामपुर जिले के चांदो थाना क्षेत्र के अंतर्गत लांगर टोला में 17 वर्षीय मीना खलको को पुलिस ने माआवोदी बताकर उस समय मार गिराया जब वह भेड़ों को चरा रही थी। अनीता झा न्यायिक आयोग की हाल ही पेश रिपोर्ट में उसकी हत्या एवं बलात्कार की पुष्टि हुई तथा इसके आधार पर तत्कालीन थाना प्रभारी सहित 25 पुलिस जवानों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया। इस तरह की अनेक ऐसी घटनाएँ हैं जिनमें निर्दोष नागरिकों की जाने पुलिस की गोली से गई और महिलाएँ सामूहिक अनाचार की शिकार हुई। सुकमा क्षेत्र की आदिवासी महिलाओं का आरोप था कि पिछले महीने (अक्टूबर 2015) बड़ागुड़ा थाना क्षेत्र के चित्रागेलूर, पेदागेलूर, गोदेम और मुर्गीचेरु समेत कई गाँवों में सीआरपीएफ और पुलिस के जवान माओवादियों को तलाशने के नाम पर जबरिया घरों में घुसे, लूटपाट की, मारापीटा और महिलाओं के साथ बलात्कार किया। कांग्रेस ने इस घटना की जांच के लिए सुकमा विधायक कवासी लखमा के नेतृत्व में 11 सदस्यीय जांच दल गठित किया है। पुलिस विभाग ने भी एएसपी इंदिरा कल्याण के नेतृत्व में 4 सदस्यीय टीम बनाई है। इस वाकये के बाद इसी माह 4 नवंबर को सुकमा थाना क्षेत्र के अदलमपल्ली जंगल में पुलिस ने तीन नक्सलियों को मुठभेड़ में मारने का दावा किया है किन्तु दोरनापाल थाने को घेरकर ग्रामीणों ने दावा किया कि मारे गए तीनों आदिवासी किसान थे, नक्सली नहीं।
      ये कुछ उदाहरण हैं जो इस सत्य को स्थापित करते हैं कि केंद्र और राज्य सरकारों के संयुक्त नक्सल विरोधी अभियान में निर्दोष आदिवासियों की भी जाने जा रही हैं। पूर्व के दर्जनों उदाहरणों एवं ताजा घटनाओं से यह भी स्पष्ट होता है कि नक्सली मामले में पुलिस की नीति है - शक है तो गोली मारो, पड़ताल मत करो, गिरफ्तार मत करो। तो क्या एक लोकतांत्रिक देश में नक्सल समस्या के उन्मूलन के नाम पर निर्दोष नागरिकों की बलि मंजूर है? कानून की भाषा में कहा जाता है कि भले ही 99 अपराधी छूट जाए पर एक निरपराध को फांसी नहीं होनी चाहिए। लेकिन यहाँ, बस्तर एवं सरगुजा में क्या हो रहा है? पुलिस के वहशियाना तौर-तरीके से बेकसूर गरीब आदिवासी मारे जा रहे हैं। जब मानवाधिकारवादी उनके पक्ष में खड़े होते है, पीडि़त परिवारों से मिलते हैं, घटनाओं की समीक्षा करते हैं और सही तथ्य जनता के सामने लाते हैं तो सरकार को परेशानी होती है और प्रत्युत्तर में वह नक्सलियों द्वारा आदिवासियों के अपहरण और उनके कत्लेआम पर मानवाधिकारवादियों की चुप्पी पर कटाक्ष करती है, चुनौती देती है। यह दलील तर्कसंगत नहीं है अलबत्ता इसमें शक नहीं कि नक्सली हिंसा पर मानवाधिकारवादी ऐसा करते रहे है लेकिन सवाल सरकारी बंदूक की नली से निकली गोली का है जो सीधे निर्दोष आदिवासियों के सीने में धसती है। इस सरकारी हिंसा को जायज कैसे ठहराया जा सकता है? इसलिए जब सरकारी अत्याचार होते हैं तो मानवाधिकारों की आवाज बुलंद होती है और होती रहेगी।
      बहरहाल बिना गोली चलाए आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित करना, आत्मसमर्पितों को नई जिंदगी देने की व्यवस्था के अंतर्गत उन्हें योग्यतानुसार सरकारी नौकरी में लेने का फैसला व नक्सल हिंसा से प्रभावित परिवार के बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का प्रबंध दशकों से चली आ रही नक्सल समस्या के समाधान की दिशा में बेहतर कदम है किन्तु मुठभेड़ का नाम देकर निर्दोष ग्रामीणों की हत्या का सिलसिला बंद होना चाहिए। अन्यथा इसके लिए न तो पुलिस को माफ किया जा सकता है और न ही सरकार को।

Tuesday, November 3, 2015

भ्रष्टाचार का भयावह चेहरा, जान का सौदा

- दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के सवाल पर राज्य सरकार की जीरो टाललेंस की नीति है। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह एवं सरकार के अन्य नुमाइंदे सरकारी एवं गैरी सरकारी कार्यक्रमों में जीरो टॉलरेंस की नीति का एलान भी करते रहे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐलान-ए-जंग का खुद नौकरशाही पर कितना क्या असर हुआ है, यह राज्य में घटित अलग- अलग किस्म की घटनाओं से जाहिर है। कही-कहीं रिश्वतखोरों को सरेआम पीटा जा रहा है तो कहीं भ्रष्ट अफसरशाही से त्रस्त होकर आदमी अपनी जान दे रहा है। हाल ही में दो घटनाएँ ऐसी हुई हैं जो इस बात का अहसास कराती है कि भ्रष्ट नौकरशाही पर सरकार का कोई अंकुश नहीं है तथा जीरो टॉलरेंस की सरकारी घोषणा के बावजूद वह बेखौफ है तथा बिना रिश्वत लिए कोई कागज आगे न बढ़ाने या फाइलों को लटकाए रखने की उसकी नीति यथावत है। यानी जीरो टॉलरेंस केवल घोषणाओं तक सीमित है। लिहाजा आम आदमी को कोई राहत नहीं है। किंतु अब पीडि़तों का मरने-मारने पर उतारु होना इस बात का संकेत है कि यदि सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कानूनों का सख्ती से पालन नहीं किया, नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगा, भ्रष्ट अफसरों एवं कर्मचारियों के खिलाफ दर्ज मामलों में तत्काल दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई, धरपकड़ के अभियान को तेज नहीं किया गया और यदि आम आदमी के लिए प्रशासन को सरल एवं सुगम नहीं बनाया गया तो लोगों को कानून हाथ में लेने से रोका नहीं जा सकेगा। और ऐसी स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए अच्छी नहीं होगी।
       दो घटनाएं मिसाल के रुप में दी जा सकती हैं। हालांकि ऐसे वाकये पहले भी हुए हैं लेकिन इस हद तक नहीं। पूर्व में कई दफे मुख्यमंत्री निवास के सामने आत्महत्या करने की चेतावनी दी गई, कोशिशें भी हुई लेकिन वे कामयाब नहीं होने दी गई। अतीत में हुई ऐसी घटनाएँ इस बात की साक्षी थी कि प्रशासन असंवेदनशील था तथा आम आदमी के दु:ख-दर्द से उसका कोई वास्ता नहीं था जबकि उसकी संवेदनशीलता, पारदर्शिता तथा कामकाज तेजी से निपटाने के संकल्प की दुहाई दी जाती थी। यह स्थिति आज भी नहीं बदली है बल्कि भ्रष्टाचार चरम पर है। भ्रष्ट व्यवस्था का जीता - जागता सबूत और क्या चाहिए कि आम आदमी अपनी जान की भी परवाह न करें। इसी माह की 26 तारीख को राज्य के दूसरे बड़े शहर बिलासपुर से सटे बिल्हा में एसडीएम कार्यालय के सामने युवक कांग्रेस के नेता राजेंद्र तिवारी ने स्वयं पर पेट्रोल छिड़कर आत्मदाह कर लिया। उसका आरोप था कि उसके खिलाफ की गई प्रतिबंधात्मक कार्रवाई में उसे जमानत देने के एवज में एसडीएम अर्जुन सिंह सिसोदिया ने 40 हजार रुपये की मांग की और न देने पर जेल भेजने की धमकी दी। व्यथित 24 वर्षीय राजेंद्र ने एसडीएम दफ्तर के बाहर खुद को आग के हवाले कर दिया। बुरी तरह झुलसे युवा नेता को बचाया नहीं जा सका और कुछ ही घंटों बाद रायपुर के एक अस्पताल में उसकी मौत हो गई। इस घटना से बिल्हा में तनाव फैलना स्वाभाविक था। गुस्साए लोग सड़क पर उतर आए। अगले दिन यानी 27 अक्टूबर को नगर बंद रहा तथा शव के साथ 5 घंटे तक नेशनल हाईवे जाम रखा गया। इस घटना से प्रशासन के होश उड़ गए। प्रशासन ने फौरन कार्रवाई करते हुए एसडीएम अर्जुन सिंह सिसोदिया को हटा दिया और बाद में पूरे मामले की दंडाधिकारी जांच के आदेश दिए। मुख्यमंत्री रमन सिंह ने भी घटना पर दुख व्यक्त किया तथा शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की। उन्होंने इस घटना के साथ ही जीवन लाल मनहर प्रकरण में भी जांच के आदेश दिए। 15 दिन पूर्व ग्राम सेवती निवासी मनहर को प्रतिबंधात्मक धारा 107-16 के मामले में जेल भेज दिया गया था जहां उसकी मौत हो गई। उसके बेटे का आरोप था कि अनुविभागीय दंडाधिकारी सिसोदिया ने जमानत देने के एवज में उससे 50 हजार रुपये की मांग की थी।
      राजेंद्र तिवारी आत्महत्या प्रकरण शासन - प्रशासन के लिए ङ्क्षचता का सबब होना चाहिए। क्योंकि यह एक व्यक्ति की प्रशासन से उपजी हताशा की पराकाष्ठा है। जान की बाजी लगाना सहज नहीं है। चिंता इसलिए भी होनी चाहिए क्योंकि भ्रष्टाचार की वजह से परेशान आम आदमी की प्रतिक्रिया विभिन्न रुपों में सामने आ रही है। मिसाल के तौर पर इसी अक्टूबर की 19 तारीख को इस्पात नगरी भिलाई के निकट जामुल नगर पालिका की व्यवस्था और विकास कार्यों की गुणवत्ता से खिन्न एक युवक मोहित देवांगन ने नगर पालिका अध्यक्ष रेखराम बंछोर से पहले सवाल जवाब किया और बाद में उन पर हंसिये से हमला कर दिया। पालिका दफ्तर में पहुंचे इस युवक ने बंछोर से पूछा आपकी तनख्वाह सिर्फ 30 हजार रुपये महीना है तो आपने दस वर्षों में लाखों की संपत्ति कैसे बनाई? दो चुनावों में आपने 50 लाख से अधिक खर्च किए, कहाँ से आया ये पैसा? अध्यक्ष पर प्राणघातक हमले के बाद हमलावर घटनास्थल से भागा नहीं बल्कि चिल्ला-चिल्लाकर पालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं अव्यवस्था पर रोष प्रकट करता रहा। यह घटना भी इस बात का संकेत है कि प्रशासन के कामकाज एवं भ्रष्टाचार से असंतुष्ट लोगों का धैर्य जवाब देने लगा है तथा वे अब अपने - अपने तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे है।
        छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक भ्रष्टाचार के मामले कोई नई बात नहीं है। दरअसल नक्सली समस्या के बाद यह राज्य की दूसरी सबसे बड़ी समस्या है जो आम आदमी को सीधे प्रभावित करती है। हालांकि समय-समय पर शासन-प्रशासन भ्रष्ट अफसरों, कर्मचारियों के खिलाफ छापे की कार्रवाई करता रहा है किन्तु इन अभियानों का खास असर इसलिए नहीं पड़ता क्योंकि लोकप्रतिष्ठा पर धनपशुता हावी है। अफसरों, कर्मचारियों को इसलिए न तो दण्ड का भय और न ही कानून का, सोने पर सुहाना यह कि न्याय के अत्यधिक विलंब से मामलों को रफा-दफा करने में या स्थितियों को अपने वश में करने में, सबूतों को नष्ट करने में अथवा केस को ढीला करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। सिर्फ पिछले पांच वर्षों की बात करें तो एंटी करप्शन ब्यूरो ने भ्रष्टाचार के दर्जनों मामले पकड़े। ये बड़े मामले थे जिनमें न केवल लाखों की नगद राशि एवं करोड़ों की बेनामी संपत्ति बरामद हुई वरन इनमें प्रशासनिक अधिकारियों एवं कर्मचारियों की संलिप्तता के भी ठोस प्रमाण मिले किन्तु, सजा के नाम पर निलंबन, अथवा जमानत के मिलते तक कुछ दिनों की जेल से अधिक कुछ नहीं हुआ। इस दौरान शायद ही किसी की नौकरी गई हो या कठोर दण्ड मिला हो। दरअसल राज्य में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का मतलब है कुछ दिनों की सनसनी। बाद में सबकुछ पहले जैसा, यथावत। ऐसी स्थिति में स्पष्ट है-संस्थागत भ्रष्टाचार खूब फल-फूल रहा है और रिश्वतखोरों को कानून का कोई भय नहीं है।
        इन दिनों राज्य की रमन सिंह सरकार चौतरफा समस्याओं से घिरी हुई है। संरक्षित जनजाति के पहाड़ी कोरवा लंबूराम की भूख से हुई मौत का मामला हो या फिर कर्ज में डूबे एवं गरीबी की मार से त्रस्त किसानों की आत्महत्याओं के प्रकरण हो या फिर राज्य में सूखे की स्थिति हो या फिर सूखाग्रस्त इलाकों के किसानों का जंगी प्रदर्शन हो, प्राय: सभी मोर्चांे पर सरकार के लिए अप्रिय परिस्थितियां है। राजनीति स्तर पर भी स्थितियां दु:खदायी हंै क्योंकि प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को कई मुद्दे हाथ लगे हंै जिन्हें लेकर वह जनता के बीच में हैं, सड़क पर है। इन विपरीत स्थितियों में प्रशासनिक भ्रष्टाचार की वजह से जान देने अथवा कानून हाथ में लेने की घटनाएं, भले ही वह अभी सीमित संख्या में हो, चिंताजनक है। जिस तरह भूख से हुई मौत के लिए सरकार को जवाबदेह माना जाता है और उसे सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकारी नहीं होता, उसी तरह रिश्वत देने के बजाए जान देने जैसी घटनाओं के लिए भी सरकार को जवाबदेही होना चाहिए। मौत की ऐसी घटनाओं में राज्य की भाजपा सरकार केवल मुआवजा देकर छुट्टी नहीं पा सकती, उसे यह दिखाना होगा कि अपनी जनोन्मुख नीतियों जिनमें भ्रष्टाचार का मुद्दे भी शामिल है, पर वह गंभीर है तथा नौकरशाही उसके वैसे ही नियंत्रण में है जैसे सन् 2000 से 2003 तक अजीत जोगी के नेतृत्व में कांग्रेस शासन के समय में थी।