Sunday, November 30, 2014

सन्नाटे में बीता क्रिकेट का एक दिन, उठे कई सवाल

- दिवाकर मुक्तिबोध
क्रिकेट में इन दिनों कुछ ठीक नहीं चल रहा है। दो बड़ी घटनाएं घटी हैं। दोनों स्तब्धकारी एवं क्रिकेट, क्रिकेटरों व क्रिकेट प्रेमियों के लिए चिंतनीय। आस्ट्रेलिया के युवा प्रतिभाशाली बल्लेबाज फिलिप ह्यूज की सिर पर गेंद टकराने से मौत व भारत में सु्प्रीम कोर्ट का मुद्गल कमेटी रिपोर्ट पर की गयी टिप्पणियां जिसमें उसने चैन्नई सुपर किंग्स (सीएसके) की मान्यता रद्द करने व उसे आईपीएल से बाहर का रास्ता दिखाने कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ और भी कड़ी टिप्पणियां की हैं और इसके घेरे में सीएसके एवं भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी भी आए हैं। ये दोनों ही घटनाएं विचलित करने वाली हैं।
          भारतीय क्रिकेट टीम इस समय आस्ट्रेलिया के दौरे पर हैं तथा उसे चार टेस्ट मैचों की श्रृंखला के बाद त्रिकोणीय एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच भी खेलने हैं और फिर कुछ दिनों बाद वर्ल्डकप में हिस्सा लेना है। फिलहाल टीम की कमान विराट कोहली के हाथ में हैं। वे 4 दिसंबर से ब्रिस्बेन में प्रारंभ होने वाले पहले टेस्ट के भी कप्तान हैं क्योंकि पूर्णकालिक कप्तान महेंद्र सिंह धोनी अभी चोट से पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं। टीम ने एक अभ्यास मैच खेला है जिसमें उसका प्रदर्शन बेहतर रहा है। लेकिन इस उत्साहवर्धक माहौल में गम की परछाइयां तब घनी हो गई जब 25 नवंबर को सिडनी में शेफिल्ड-शील्ड के एक मैच के दौरान फिलिप ह्यूज एक बाउंसर से गंभीर रूप से घायल हो गए और अंतत: 27 नवंबर को उनकी मौत हो गई। दक्षिण आस्ट्रेलिया के लिए खेल रहे ह्यूज के हेलमेट पर न्यू साउथवेल्स के गेंदबाज शॉन एबॉट की गेंद जोर से टकराई थी। ह्यूज की मौत से जाहिर है आस्ट्रेलिया क्रिकेट ही नहीं समूचा क्रिकेट जगत सन्नाटे में है और खिलाड़ियों की सुरक्षा को लेकर उनकी चिंताए बढ़ गई हैं। यद्यपि क्रिकेट मैचों के दौरान बुरी तरह जख्मी होने अथवा मौत की पहले भी कई घटनाएं हो चुकी हैं और प्राय: हर घटना के बाद क्रिकेट प्रबंधकों ने क्रिकेटरों की सुरक्षा पर नए सिरे से विचार किया है। और तद्नुसार नियमों में तब्दीलियां भी की हैं। जाहिर है ह्यूज के मामले में भी सुरक्षा के उपायों पर पुन: गौर किया जाएगा। इस घटना के बाद जो तथ्य सामने आए हैं, उनके अनुसार यह कुछ हद तक लापरवाही एवं बहुत कुछ इंसानी फितरत का परिणाम है जो प्राय: अपनी सुरक्षा के प्रति गाफिल रहती है। बताया गया है कि फिल ह्यूज ने जो हेलमेट पहनी थी, वह पुराने मॉडल की थी जिससे सिर के पीछे का हिस्सा ठीक तरह से कव्हर नहीं होता। हालांकि इस हेलमेट की आस्ट्रेलियाई निर्माता कम्पनी मसूरी हेलमेट ने दावा किया है कि उसका नया माडल समूचे सिर की सुरक्षा करता है। बहरहाल यह जांच की विषय है तथा फिलहाल आस्ट्रेलियाई क्रिकेट के लिए भारत के साथ भावी टेस्ट श्रृंखला एक अव्यक्त शोक के बीच खेली जाने वाली है।
         इधर आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग एवं सट्टेबाजी के मामले में मुकुल मुद्गल कमेटी की रिपोर्ट एवं उसके तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों से भारतीय क्रिकेट हैरान-परेशान है। कमेटी ने 17 नवंबर 2014 को सुप्रीम कोर्ट को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपी थी जिस पर सुनवाई जारी है। 27 नवंबर को कोर्ट ने पूछा भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के निर्वासित अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन को चुनाव लड़ने और उनकी मालिकाना टीम चैन्नई सुपर किंग्स को क्यों न अयोग्य ठहरा दिया जाए? बैंच ने कहा- श्रीनिवासन का बीसीसीआई अध्यक्ष होना और आईपीएल की एक टीम चैन्नई का मालिक होना, हितों का टकराव है। जब चैन्नई सुपर किंग्स के अधिकारी गुरूनाथ मय्यपन सट्टेबाजी के दोषी पाए गए हैं तो बीसीसीआई ने अपने कायदे कानून के तहत कार्रवाई क्यों नहीं की? क्यों नहीं उसने सीएसके को अयोग्य ठहराया? कोर्ट ने कहा- क्यों न बीसीसीआई के चुनाव होने दिए जाएं और मुद्गल कमेटी की रिपोर्ट में जिन खिलाड़ियों एवं खेल प्रशासकों के नामों का उल्लेख है, उन्हे इस चुनाव से क्यों न दूर रखा जाए। सुप्रीम कोर्ट अब आगामी 1 दिसम्बर को इस मामले में स्पष्ट निर्देश जारी करेगा। उसकी तल्ख टिप्पणियों से बीसीसीआई आहत है और अब उसके सामने निर्णायक कदम उठाने के अलावा कोई चारा नहीं है क्योंकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि मुद्गल कमेटी की जांच के बाद अब किसी और जांच की जरूरत नहीं है। इसका मतलब है चैन्नई सुपर किंग्स के आईपीएल से बाहर होने के पूरे आसार हैं तथा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट कांफ्रेंस (आईसीसी) के अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन के बीसीसीआई का पुन: अध्यक्ष बनने का ख्वाब चूर-चूर होने वाला है।
        इस बीच सुप्रीम कोर्ट की एक और टिप्पणी गौर करने लायक है जो धोनी के संबंध में है। कोर्ट ने चैन्नई सुपर किंग्स के कप्तान के साथ-साथ इंडिया सीमेंट के उपाध्यक्ष के रूप में उनकी दोहरी भूमिका पर चिंता जाहिर की है। इन दोनों के मालिक एन. श्रीनिवासन हैं। इसे देखते हुए आइपीएल 6 स्पॉट फिक्सिंग एवं सट्टेबाजी के मामले में धोनी भी संदेह से परे नहीं है। भले ही उनकी इसमें कोई भूमिका न हो फिर भी कुछ न कुछ कीचड़ तो उन पर उछलना स्वाभाविक है। सीएसके के मुख्य कर्ताधर्ता एवं एन. श्रीनिवासन के दामाद गुरूनाथ मयप्पन की इस मामले में संलिप्तता इसकी मुख्य वजह है।
          बहरहाल सन 2013 के आईपीएल फिक्सिंग के मामले में अगले कुछ दिनों में स्थितियां काफी स्पष्ट हो जाएंगी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है समय। फिक्सिंग पर कोर्ट का फैसला ऐसे समय आएगा जब धोनी की कप्तानी में भारतीय क्रिकेट टीम आस्ट्रेलिया से टक्कर लेगी। इसमें भी खास बात है वर्ल्ड कप जो आस्टेÑलिया-न्यूजीलैंड की संयुक्त मेजबानी में आयोजित होगा। इसकी शुरुआत 14 फरवरी 2015 से होने वाली है। और जिसके लिए बीसीसीआई खासी तैयारी कर रहा है ताकि वर्ल्ड कप के खिताब पर कब्जा बरकरार रखा जा सके। इस दृष्टि से टीम को तैयार करने में लगातार प्रयोग होते रहे हैंं और अब बेहतर युवा टीम धोनी की अगुवाई में मोर्चे पर निकल गई है। ऐसे में यदि धोनी अथवा चेन्नई सुपर किंग्स को लेकर कोर्ट का विपरीत फैसला आता है तो वह न केवल धोनी वरन पूरी टीम के मनोबल को प्रभावित करेगा। धोनी वैसे काफी ठंडे दिमाग के क्रिकेटर माने जाते हैं, किंतु खिलाफ टिप्पणियां भी कहीं न कहीं व्यक्ति को आंदोलित करती हैं। इसलिए ज्यादा बेहतर होता यदि मुद्गल कमेटी की रिपोर्ट पर फैसला थोड़ा ठहरकर आता या वर्ल्ड कप के बाद आता। यह ठीक है कि अप्रैल 15 से प्रारंभ होने वाला आईपीएल 8 टूर्नामेंट का कार्यक्रम इससे प्रभावित होता, किंतु वर्ल्ड कप की महत्ता को देखते हुए इसे आगे बढ़ाने में कोई दिक्कत नहीं होती।  बहरहाल अब फिक्सिंग पर फैसला आने को है। उम्मीद की जानी चाहिए विपरीत फैसलों एवं प्रतिकूल टिप्पणियों के बावजूद महेंद्र सिंह धोनी विचलित नहीं होंगे तथा वर्ल्ड कप की भारतीय उम्मीदों को जिंदा रखेंगे।

Friday, November 14, 2014

बर्खास्तगी,गिरफ्तारी,न्यायिक जांच के बाद आगे क्या?

नसबंदी हादसा


- दिवाकर मुक्तिबोध
बिलासपुर के कानन पेंडारी नसबंदी हादसे की न्यायिक जांच की घोषणा के साथ ही छत्तीसगढ़ सरकार ने संकेत दिया है कि दोषियों को सजा दिलाने के मामले में उसकी नीयत पर शक  करने की जरुरत नहीं है। बिलासपुर के कानन पेंडारी और गौरेला में सरकारी नसबंदी शिविरों में  आपरेशन के बाद अब तक 14 महिलाओं की मृत्यु हो चुकी है। मौत का सिलसिला यद्यपि अभी थमा है, लेकिन 122 अभी भी अस्पतालों में है जिसमें से कई की स्थिति गंभीर है। जन स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने  वाली यह अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी है जिसने राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। चूंकि परिवार नियोजन जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों को आयोजित एवं नियंत्रित करने की जिम्मेदारी अंतत: जिला प्रशासन की होती है लिहाजा इस मामले में वह भी अपनी  जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। इसीलिए सरकार ने घटना के चार दिनों के भीतर ही न केवल न्यायिक जांच की घोषणा की अपितु आॅपरेशन के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार डॉक्टर आर.के. गुप्ता एवं मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. एस सी.भांगे को निलंबित करने के बाद अंतत: बर्खास्त कर दिया। पिछली तमाम बड़ी घटनाओं मसलन बालोद एवं बागबाहरा मोतियाबिंद आॅपरेशन के बाद दर्जनों मरीजों के आंखों की रोशनी खोने का मामला हो या फिर अनेक जिलों में निजी चिकित्सालयों में स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत स्वीकृत राशि हड़पने के लिए जबरिया सैंकड़ों महिलाओं का गर्भाशय निकालने का प्रकरण हो या फिर कांकेर जिले के झलियामारी आदिवासी कन्या छात्रावास की छात्राओं का यौन शोषण हो, कार्रवाई के नाम पर केवल लीपापोती हुई, जांच का नाटक होता रहा, फौरी तौर पर कुछ कर्मचारियों का निलंबन हुआ  लेकिन अंतत: बिना माकूल सजा पाए सभी बहाल भी हो गए। दिलों को झंझोड़ने वाले उस दौर में भी जबरदस्त जन आक्रोश फूटा, राजनीतिक धरने-प्रदर्शन हुए किंतु सरकार की सेहत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। यकीनन नसबंदी हादसा और भी ज्यादा गंभीर है और सरकार के गले की हड्डी बन गया है लिहाजा फौरन एवं सख्त  कार्रवाई करना सरकार की मजबूरी है। इसीलिए प्रथम दृष्टया दोषी चिकित्सकों के निलंबन और बर्खास्तगी के साथ-साथ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने जैसे कदम उठाए गए और न्यायिक जांच की घोषणा की गई। लेकिन इसके साथ ही राज्य सरकार ने पीड़ितों को बेहतर चिकित्सा उपलब्ध कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दिल्ली, हैदराबाद से चिकित्सकों की टीमें आई जो स्थानीय चिकित्सकों के साथ मिलकर मौत से लड़ रही महिलाओं का सम्बल बनी हुई हैं।
           इन कार्रवाइयों के बावजूद सवाल है क्या सरकार अपने स्वास्थ्य मंत्री को भी बर्खास्त करने या, इस्तीफा देने बाध्य करने  या फिर उनका विभाग बदलने पर पुर्नविचार कर रही है? मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने चारों ओर से बढ़ते दबाव को देखते हुए इस मामले में अपने वरिष्ठ मंत्रियों तथा पार्टी संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों से विचार-विमर्श के बाद स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल को न हटाने का फैसला किया। इस फैसले के पीछे राजनीतिक कारण हैं क्योंकि पार्टी नेतृत्व का मानना है कि यदि स्वास्थ्य मंत्री से इस्तीफा लिया गया तो इससे सत्ता की राजनीति में गलत परंपरा की शुरूआत होगी। चूंकि कांग्रेस राजनीतिक दृष्टि से इस मौके को भुनाने की फिराक में है लिहाजा उसकी मांग को स्वीकार करने  का अर्थ है हथियार डालना। इसीलिए मुख्यमंत्री अपने स्वास्थ्य मंत्री को बचाने की भरसक कोशिश कर रहे है। घटना के तुरंत बाद दिया गया उनका  यह बयान बचकाना ही है कि आपरेशन डॉक्टर करते हैं, स्वास्थ्य मंत्री नहीं। लेकिन अब ग्रामीण विकास एवं पंचायत मंत्री अजय चंद्राकर ने नसबंदी हादसे के लिए सरकार की नैतिक जिम्मेदारी कबूल की है पर स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे के मुद्दे पर सरकार चुप है। यदि नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार की है तो अपने लिए सजा भी खुद तय करे या फिर घटना के लिए खेद व्यक्त करे। दरअसल जन-स्वास्थ्य के संदर्भ में पिछले तमाम हादसे एवं नसबंदी से हुई मौत की घटनाओं को देखते हुए अमर अग्रवाल को स्वयं होकर इस्तीफा देना चाहिए।  लेकिन वे कहते हैं कि वे अपने मामले में खुद फैसला नहीं लेते, उनके इस्तीफे पर पार्टी संगठन या सरकार को फैसला  करना है। मंत्री जब ऐसा बयान दे तो जाहिर सी बात है मुख्यमंत्री फैसला लेने में हिचकिचा रहे हैं। पर यह तय प्रतीत होता है कि कांग्रेस के आंदोलन की आग जैसे ही बुझेगी, मुख्यमंत्री मंत्रिमंडल के फेरबदल के बहाने या तो अमर अग्रवाल को विदा करेंगे या फिर उनका विभाग बदल देंगे। लेकिन इस दौरान इस मामले में सरकार की किरकिरी होती रहेगी और यह बात फिर सिद्ध होगी कि मुख्यमंत्री उचित समय पर उचित फैसले लेने से परहेज करते हैं। जबकि उनके पास जनता को संतुष्ट करने एवं इस हादसे से उबरने का अच्छा मौका है।
           सरकार को विलुप्त होती जनजाति बैगा समुदाय की दो महिलाओं की नसबंदी एवं उनकी मौत का भी जवाब देना है। केंद्र ने वर्ष 1998 से परिवार नियोजन कार्यक्रम के तहत बैगा, कमार, अबुझमाड़िया और बिरहीर जनजातियों के सदस्यों की नसबंदी पर प्रतिबंध लगा रखा है और ये जनजातियां संरक्षित घोषित है। ऐसी स्थिति में दो  बैगा महिलाओं की नसबंदी और उनकी मृत्यु सवालों के घेरे में है और आपराधिक मामला है। जाहिर है कि नसबंदी के आंकडेÞ जुटाने के लिए बिना देखे परखे, बिना पता-साजी किए महिलाओं को नसबंदी शिविरों में लाया गया। जबकि कायदे से शिविरों में लाई गई या स्वेच्छा से  आई तमाम महिलाओं का प्रोफाइल  चेक करने के साथ ही स्वास्थ्य परीक्षण किया जाना चाहिए और उसके बाद ही नसबंदी की जानी चाहिए।
          बहरहाल राज्य सरकार के सामने अब बड़ा सवाल है जनस्वास्थ्य के मामले में जनता का विश्वास कैसे अर्जित किया जाए। सरकारी अस्पतालों में तमाम दुरावस्थाओं और लूट खसोट के बावजूद राज्य की गरीब जनता उन्हीं पर आश्रित है। इस सहारे को चुस्त-दुरुस्त बनाना  राज्य सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है। यह तभी संभव है जब स्वास्थ्य विभाग का प्रशासन जनोन्मुखी और इमानदार हो। प्रशासन किस तरह चलता रहा है यह इसी बात से जाहिर है स्वास्थ्य संचालक आई.ए.एस. कमलप्रीत सिंह साढे तीन  साल तक इस पद पर बने और नसबंदी घटना के बाद हटाए गए। जबकि इस बीच नेत्रकांड एवं गर्भाशय जैसे गंभीर कांड  हो गए। अब उन्हें पदोन्नत करने की तैयारी है। इससे समझा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में शासन-प्रशासन किस तरह चल रहा है।

Tuesday, November 11, 2014

स्वास्थ्य विभाग को सुधारने का जिम्मा किसका?

संदर्भ - नसबंदी ऑपरेशन के बाद मौतें


- दिवाकर मुक्तिबोध
बिलासपुर के कानन पेंडारी नसबंदी शिविर में ऑपरेशन के बाद 11 महिलाओं की मौत की हृदयग्राही घटना के बाद क्या राज्य के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देंगे? या छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह उन्हें इस्तीफा देने की हिदायत देंगे अथवा स्वास्थ्य मंत्रालय उनसे छीनने का राजनीतिक साहस दिखाएंगे? ये सवाल घटना की गंभीरता को देखते हुए सहज स्वाभाविक है और इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केन्द्र में सत्तारुढ़ भाजपा के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सख्त मिजाज है और सरकारी कामकाज में किसी भी किस्म की लापरवाही को बर्दाश्त करने के पक्ष में नहीं है। इसका उदाहरण इस बात से भी मिलता है कि घटना के फौरन बाद केन्द्र ने 5 सदस्यीय विशेष टीम का गठन किया जो घटनास्थल का दौरा करके सही-सही आंकलन करेगी। जाहिर है केन्द्र ने कानन पेण्डारी नसबंदी शिविर में हुई मौतों के मामलों को बेहद गंभीरता से लिया है तथा राज्य सरकार को स्पष्ट संकेत दिया है कि उसे इस मामले में कठोर कदम उठाने की जरुरत है। राजनीतिक दृष्टि से भले ही मंत्री पर गाज न गिरे किन्तु देर-सबेर उनका विभाग बदल जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इस संदर्भ में हाल ही में केन्द्रीय मंत्रिमंडल के पुनर्गठन एवं विस्तार का उदाहरण देना बाकी होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन मंत्रियों के विभाग बदल दिए जो वांछित नतीजे देने में नाकाम थे। इसमें पेशे से चिकित्सक डॉ. हर्षवर्धन भी शामिल है जिनके पास स्वास्थ्य मंत्रालय था। राज्य में अमर अग्रवाल एक दशक से स्वास्थ्य मंत्री हैं और उनका विभाग अपनी कारगुजारियों के कारण खासी चर्चा में रहा है।
दरअसल छत्तीसगढ़ सरकार के स्वास्थ्य विभाग के लिए राष्ट्रीय एवं राज्यीय योजनाओं के क्रियान्वयन में घनघोर लापरवाही बरतने की घटनाएं कोई नई नहीं हैं । परिवार नियोजन जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्यक्रम में ऐसी घटनाएं पलीता लगाने का काम करती हैं। राज्य में इस तरह की घटनाएं होती रही हैं पर आश्चर्य का विषय है कि विभाग इससे सबक लेने तैयार नहीं हैं। विशेषकर पिछले तीन वर्षों के भीतर इतना कुछ भीषण घटित हुआ है कि देखकर न केवल हैरानी होती है बल्कि प्रशासन की बेपरवाही पर, उसकी उदासीनता पर लोगों को गुस्सा आता है। राज्य की जनता को यह अच्छी तरह याद है कि बालोद, बागबाहरा एवं कवर्धा नेत्र कांड तथा गर्भाशय कांड में विभागीय लापरवाही की कितनी कीमत आम आदमियों को चुकानी पड़ी, कितने जीवन तबाह हो गए किन्तु किसी सरकारी अधिकारी का बाल भी बांका नहीं हुआ।
         26, 27 एवं 28 सितंबर 2011 को बालोद के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में मोतियाबिंद के आॅपरेशन के लिए शिविर आयोजित किए गए थे। इस शिविर में 170 महिलाओं एवं पुरुषों की आंखों का कुछ इस तरह आॅपरेशन किया गया कि 49 लोगों की आंखों चली गई। उनके जीवन में स्थाई अंधेरा छा गया। घटना चूंकि बेहद गंभीर थी इसलिए राज्य सरकार ने जांच तो बैठाई, एक चिकित्सक सहित 4 अधिकारियों को निलंबित भी किया किन्तु किसी की बर्खास्तगी की जरुरत नहीं समझी गई और आज स्थिति यह है कि सारे आरोपी फिर सेवा में बहाल हो गए। और तो और कुछ की पदस्थापना पुन: उसी जगह बालोद में हो गई। इससे समझा जा सकता है कि सरकार बड़ी से बड़ी दुर्घटना का किस तरह सरलीकरण कर देती है। यह केवल एक उदाहरण नहीं है रायपुर सहित राज्य के 11 जिलों में गर्भाशय कांड की भी इसी तरह गूंज हुई थी जिसमें चंद रुपयों के खातिर सैकड़ों महिलाओं को जबरिया गर्भाशय निकाल दिए गए। प्रारंभ में सरकार ने जिम्मेदार निजी अस्पतालों एवं डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई का दम तो दिखाया लेकिन चिकित्सकों के संगठनों के दबाव के चलते मामले के शांत होने में देर नहीं लगी लेकिन ये दोनों घटनाएं दु:स्वप्न की तरह आम जनता के जेहन में है और लगातार उनका पीछा करती है।
           लेकिन इस बार सरकार सन्नाटे में है। बिलासपुर के कानन पेंडारी सहित विभिन्न स्थानों पर जननी सुरक्षा योजना के अंतर्गत आयोजित नसबंदी शिविरों में आपरेशन के बाद अब तक 11 महिलाओं की मृत्यु हो चुकी है। तथा दर्जनों मौत से जूझ रही हैं। स्वास्थ्य शिविरों में बरती गई लापरवाही का यह अप्रतिम और वीभत्स उदाहरण है। सरकार ने स्वास्थ्य संचालक को हटा दिया है, 4 डॉक्टरों को निलंबित किया तथा एक के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है लेकिन क्या यह कार्रवाई काफी है, फौरी कार्रवाई के रुप में निलंबन और चंद महीनों बाद बहाली के दर्जनों उदाहरण विभिन्न प्रकरणों में देखने मिल जाएंगे। क्या किसी को उपयुक्त सजा मिल पाती है? क्या पीड़ितों अथवा उनके परिजनों के प्रति न्याय हो पाता है? क्या 11 महिलाओं की मौतों की घटना को मुआवजा देकर भुलाया जा सकता है? यकीनन नहीं। घावों पर तभी मरहम लगेगा, वे तभी वह सूखेंगे जब घटना के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। कार्रवाई बर्खास्तगी से कम नहीं होनी चाहिए तथा आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए। जब सरकार ऐसी सख्ती दिखाएगी तब वह नजीर बनेगी और शायद तब लापरवाहियों पर अकुंश लगेगा और जन स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ नहीं होगा। क्या राज्य सरकार ऐसा करेगी?
           दरअसल राज्य का स्वास्थ्य विभाग जनस्वास्थ्य की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण होने के बावजूद कार्यशैली एवं अनुशासन के मामले शायद सबसे गरीब है। भ्रष्टाचार, खरीदी में करोड़ों का गोलमाल, उपचार के घटिया उपकरण, सरकारी अस्पतालों एवं प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की दुर्दशा, दवाइयों एवं डॉक्टरों का अभाव आदि तो विभाग के स्थायी भाव है। उपर से जागरुकता एवं जनस्वास्थ्य की रक्षा के नाम पर समय-समय पर लगने वाले विभिन्न अस्त-व्यस्त शिविर। यह तथ्य है कि आंकड़ों की बाजीगरी के लिए शिविर आयोजित किए जाते है ताकि लक्ष्य पूरे किए जा सके। जब ऐसी मानसिकता हो तो जाहिर है, शिविरों में व्यवस्थाएं किस तरह की होंगी। नसबंदी शिविरों में मौत की घटनाओं के पीछे जो भी तथ्य होंगे, वे जांच में सामने आएंगे ही पर प्रथम दृष्टया यह साफ-साफ लापरवाही एवं गैर जिम्मेदारी का मामला है। भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए जरुरी है स्वास्थ्य शिविरों की व्यवस्था सुधरे एवं निगरानी दस्ते बने। यदि जवाबदेही तय होगी तो व्यवस्थाएं सुधरेंगी और तब शिविर जानलेवा नहीं जीवनदायी साबित होंगे।