Tuesday, December 31, 2013

‘आप’ की अग्निपरीक्षा शुरू

सामाजिक कार्यकर्ता से राजनीतिक बने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अग्निपरीक्षा शुरू हो गई है। चूंकि वे सिर्फ दिल्ली ही नहीं देश की जनता की आकांक्षाओं एवं अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं लिहाजा वे तलवार की धार पर हैं। अब दिल्ली की राजनीति में घटित होने वाली छोटी से छोटी घटनाओं पर भी देश की निगाहें रहेंगी तथा सवाल उठते रहेंगे। पहला सवाल है क्या अरविंद केजरीवाल जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति की अवधारणा को राजनीति में पुनर्स्थापित कर पाएंगे? इसका थोड़ा-बहुत जवाब अगले वर्ष मई-जून में होने वाले लोकसभा चुनाव से मिल सकेगा जब केजरीवाल की आम आदमी पार्टी मुम्बई, दिल्ली, एनसीआर और हरियाणा में जोर-आजमाईश करेगी। पूरा जवाब पाने के लिए हमें कुछ और लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनावों का इंतजार करना पड़ेगा। क्योंकि आप की राजनीतिक शक्ति का सही-सही आकलन तभी हो पाएगा लेकिन यदि दिल्ली राज्य विधानसभा के चुनावों को आधार मानकर कोई राय कायम करने की जरूरत महसूस होती हो तो यह निर्विवाद कहा जा सकता है कि आप ने देश में नई राजनीतिक क्रांति की आधारशिला रख दी है। दिल्ली चुनावों में चमत्कार की उम्मीद तो ‘आप’ को थी लेकिन चमत्कार इतना विराट होगा, उसकी कल्पना न तो पार्टी के प्रबुद्धजनों को थी और न ही देश की जनता को। लेकिन चमत्कार हुआ, जबर्दस्त हुआ। ‘आप’ ने बरसों से चली आ रही मठाधीशी राजनीति की चूलें हिला दीं। एक वर्ष के अल्प समय में कोई पार्टी एक राज्य की सत्ता पर काबिज हो जाए, देश के राजनीतिक इतिहास की अनहोनी और हैरतअंगेज घटना है। प्रादेशिक परिदृश्य से उभरने वाली अनेक राजनीतिक पार्टियां दशकों से अपने देशव्यापी अस्तित्व के लिए छटपटा रही हैं लेकिन अब तक किसी को भी यह मकाम हासिल नहीं हुआ। बीते तीन दशक को देखें तो केवल कांशीराम ही ऐसे नेता हैं जिन्होंने अपने दम पर बहुजन समाज पार्टी को खड़ा किया और उसे एक राज्य में सत्ता की दहलीज तक पहुंचाया लेकिन दिल्ली फिर भी दूर रही। कांशीराम की राजनीति और केजरीवाल की राजनीति में कोई तुलना नहीं हो सकती। कांशीराम ने जातीयता का विष फैलाकर अपनी राजनीतिक जड़ें कुछ राज्यों विशेषकर उ.प्र. में मजबूत की जबकि केजरीवाल ने जाति और धर्म से परे आम आदमी की पीड़ा को देखा-समझा और उनकी आवाज बनने की कोशिश की। उन्होंने कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों की तथाकथित लोकशक्ति को लोकतांत्रिक तरीके से चुनौती दी और साबित कर दिया कि उनकी राजनीति, जन-आकांक्षाओं पर खरी नहीं उतरती। स्वार्थपरक एवं आत्मकेन्द्रित राजनीति से जनता ऊब चुकी है और अब इन पाटिर्यों से उसका भरोसा टूटता जा रहा है। ‘आप’ ने जनता को इसी असंतोष को समर्थन और विश्वास का बाना पहनाकर अपने कंधे पर बैठा लिया है। दिल्ली के नतीजे इसका प्रमाण हैं।

आम आदमी पार्टी परंपरागत राजनीति के चरित्र और प्रकृति से हटकर है। वह अपने नए और अद्भुत राजनीतिक प्रयोगों के लिए मशहूर है। दिल्ली में सरकार बनाने के पूर्व उसने जनता से रायशुमारी की। यह अनूठी घटना है क्योंकि इसके पूर्व सरकार बनाने के लिए ऐसी पहल किसी पार्टी ने नहीं की और न ही इस बारे में कभी सोचा जबकि केन्द्र एवं राज्यों में अल्पसंख्यक सरकारें बनी-बिगड़ी हैं। ‘आप’ ने राजनीति में स्थापित मान्यताओं को न केवल ध्वस्त किया वरन् नई राह बनाई जो सीधे आम आदमी के दरवाजे तक जाती है। उसने आम आदमी की वे समस्याएं उठाई जिनसे उनका रोजाना साबका पड़ता है यानी सड़क, नाली, बिजली, पानी और स्थानीय प्रशासन से जुड़े अन्य काम। वस्तुत: ये समस्याएं समूचे देश की समस्याएं हैं तथा आमतौर पर इन्हें नगरीय संस्थाओं के चुनाव से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन यदि कोई राजनीतिक पार्टी इन्हीं मुद्दों पर राज्य विधानसभा का चुनाव जीत जाए तो यकीनन अनहोनी घटना है। हालांकि दिल्ली में आप की जीत के पीछे अन्य कई कारण हैं। राजनीति की विद्रूपताओं से तंगहाल जनता बदलाव चाहती थी, उसे बेहतर विकल्प की तलाश थी जो ‘आप’ के रूप में पूरी हुई। उसे ‘आप’ में अपना अक्स नज़र आया। ‘आप’ की सफलता का यही सबसे बड़ा कारण बना। चूंकि ‘आप’ ने अब लोकसभा चुनाव लड़ने का भी इरादा जाहिर कर लिया है तब यह सवाल उठता है कि क्या आम चुनाव में भी उसे ‘दिल्ली’ जैसी सफलता मिल पाएगी? लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में क्या स्थानीय मुद्दे इतने प्रभावी होंगे कि उसे चुनाव जीता दें? क्या राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक मुद्दे परिदृश्य से बाहर चले जाएंगे या गौण हो जाएंगे? देश की जनता क्या सोचकर ‘आप’ को वोट करेगी? इन सवालों का लोकसभा चुनावों में जवाब तो मिल जाएगा लेकिन क्या अभी इस बारे में कोई दावा किया जा सकता है कि ‘आप’ देश की राजनीति को पूरी तरह से बदल देगी? हां और ना के बीच देश की राजनीति में यह सवाल गूंजने लगा है।

बहरहाल ‘आप’ ने बड़ा कारनामा कर दिखाया है। उसके नेता आम बने रहने की कोशिश कर रहे हैं। केजरीवाल का सरकारी आवास एवं विशेष सुरक्षा को ठुकराना व अन्य सरकारी सुविधाएं लेने से इंकार करना एक आम आदमी की सोच को दर्शाता है। उनका सहज, सरल व्यक्तित्व तथा ईमानदार राजनीति पर चलने का संकल्प यद्यपि देश की जनता को लुभाता है लेकिन यह देखने की बात है कि ‘आप’ के प्रयासों से राजनीति का शुद्धिकरण कितना हो पाएगा? बड़े ओहदों पर रहने के बावजूद आमजनों के बीच घुल-मिलकर रहने वाले सादगी पसंद नेताओं की देश में कमी नहीं है। कई नाम गिनाए जा सकते हैं। मसलन त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार, प.बंगाल की ममता बेनर्जी, गोवा के मनोहर पर्रिकर, प.बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, केन्द्रीय मंत्री ए.के.एंटनी आदि। लेकिन ये नेता राजनीति की धारा को नहीं बदल पाए। गंदगी साफ नहीं कर पाए। अब केजरीवाल कितना कुछ कर पाते हैं, यह दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल से स्पष्ट हो जाएगा। 

Monday, December 16, 2013

कांग्रेस : अंधेरे में रोशनी की तलाश

अब क्या करे कांग्रेस? छत्तीसगढ़ राज्य विधानसभा चुनाव उसने बहुत उम्मीदों के साथ लड़ा था। बहुमत पाने का विश्वास था किंतु सारी उम्मीदें चकनाचूर हो गई। अब पार्टी बदहवास की स्थिति में है जिसे संभालना मौजूदा नेतृत्व के बस में नहीं। दरअसल इस बार चुनाव में मतदाताओं ने कांग्रेस को नहीं हराया, कांग्रेसियों ने खुद यह काम किया। आपसी खींचतान, बिखरा-बिखरा सा चुनाव प्रबंध तंत्र और टिकिट वितरण में राहुल फार्मूले से किनारा करना पार्टी को इतना महंगा पड़ा कि उसे लगातार तीसरी बार भाजपा के हाथों हार झेलनी पड़ी। 2008 के 38 में से 27 विधायकों की हार से यह प्रमाणित हुआ कि मतदाताओं को पुराने चेहरे पसंद नहीं आए लिहाजा उन्होंने उनके खिलाफ मतदान किया। पहले चरण की 18 सीटों के लिए जिस फार्मूले के तहत उम्मीदवारों का चयन किया गया था, वही फार्मूला यदि शेष 72 सीटों पर लागू किया गया होता तो संभवत: आज स्थिति कुछ और होती। पार्टी बहुमत के साथ सत्ता में होती तथा भाजपा विपक्ष में खड़ी नज़र आती। लेकिन चंद नेताओं का अतिआत्मविश्वास पार्टी को ऐसा ले डूबा कि अब उससे उबर पाना असंभव नहीं तो अत्यधिक कठिन जरूर प्रतीत होता है क्योंकि प्रदेश पार्टी का मनोबल खस्ता है तथा वह फिर आपसी सिर-फुटव्वल की दहलीज पर खड़ी हो गई है जैसे कि चुनाव के 6 माह पूर्व नज़र आ रही थी।

ऐसी स्थिति में निश्चय ही पार्टी को संजीवनी की जरूरत है। पर यह मिलेगी कब, कहां और कैसे? किसके पास है यह? राहुल या सोनिया गांधी के पास? यदि केन्द्रीय नेतृत्व दूरदर्शी और दृढ़ होता तो टिकिट वितरण में प्रादेशिक नेताओं के दबाव को खारिज करके राहुल फार्मूले को सख्ती से लागू करवाया जाता, लेकिन नेतृत्व दबाव में आ गया तथा राहुल ब्रिगेड की छत्तीसगढ़ में बहुत मेहनत से तैयार की गई जमीनी हकीकत की रिपोर्ट को नजरअंदाज करके टिकटें बांट दी गई, इस विश्वास साथ कि छत्तीसगढ़ में पार्टी को बहुमत मिलना तय है। लेकिन पांसें उल्टे पड़े। अतिआत्मविश्वास ले डूबा। कई कद्दावर नेता चुनाव हार गए तथा मैदानी इलाकों से कांग्रेस का सफाया हो गया।

छत्तीसगढ़ में पार्टी की लगातार तीसरी पराजय कई सवाल खड़े करती है। इस बड़े राजनीतिक हादसे से पार्टी तभी उबर पाएगी जब वह आगामी लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करेगी। अभी तो यह उम्मीद की जाती है कि पार्टी में आत्म-मंथन का दौर शुरू होगा। सारी शिकवे-शिकायतें भूला दी जाएंगी। आरोप-प्रत्यारोप से किनारा कर लिया जाएगा। एक-दूसरे पर लांछन लगाने के बजाए सही अर्थों में हार के कारणों का विश्लेषण किया जाएगा पर ऐसा कुछ होता नजर नहीं आ रहा है। हमेशा की तरह पार्टीजन वही रोना रो रहे हैं। टी.एस.सिंहदेव एवं नेता प्रतिपक्ष रह चुके रवीन्द्र चौबे जैसे नेता भितरघात को एक बड़ा कारण बता रहे हैं। यद्यपि उन्होंने किसी का सीधा नाम नहीं लिया लेकिन उनका इशारा मुख्यमंत्री अजीत जोगी की ओर है। लेकिन सच तो यह है कि 90 में से जो 51 कांग्रेसी प्रत्याशियों की पराजय की मूल वजह वे स्वयं हैं। पराजय के लिए पार्टी नहीं, वे जिम्मेदार हैं। चुनाव के ठीक पूर्व जागृत होने वाले ये नेता पूरे पांच साल तक जनता से कटे-कटे रहे। न तो उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं से जीवंत सम्पर्क रखा और न ही उनकी स्थानीय समस्याओं मसलन सड़क, बिजली, पानी और लोक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया। शासन-प्रशासन से जुड़े छोटे-मोटे कामों में भी उन्होंने जरूरतमंदों की मदद नहीं की। ऐसे नेताओं की अलोकप्रिय छवि हार का बड़ा कारण बनीं। भितरघात एवं निष्क्रियता भी एक वजह हो सकती है पर इससे चुनाव परिणाम प्रभावित नहीं हुआ है। इसलिए कुल मिलाकर प्रत्याशी की कमजोर छवि, कमजोर सांगठनिक-ढांचा, चुस्त प्रबंधन का अभाव जिनमें जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा भी शामिल है, हार के बड़े कारणों में शुमार है।

बहरहाल यदि वास्तविक आत्म-मंथन हुआ तो निष्कर्ष क्या निकलेगा? क्या संगठन जमीनी हकीकत को पहचान कर उसके अनुरूप कदम उठाएगा? या फिर वही ढाक के तीन पात जैसी स्थिति होगी जैसा कि अमूमन प्रत्येक चुनावी हार के वादे होती रही है। क्या इस बात पर दृढ़ता दिखाई जाएगी कि प्रदेश संगठन में युवा नेतृत्व पर भरोसा किया जाएगा? क्या वे चेहरे बदल दिए जाएंगे जो बरसों से कुर्सी पर जमे हुए हैं? क्या आगामी मई-जून में होने वाले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए जनता का विश्वास जीतने की कोशिश की जाएगी? इसके लिए क्या उपाय किए जाएंगे? कुल मिलाकर सवाल यह है कि क्या पार्टी आंतरिक व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए तैयार है? यदि ऐसा है तो लोकसभा चुनाव में कुछ उम्मीद की जा सकती है अन्यथा पार्टी का वही हश्र होगा जो 2009 के लोकसभा चुनावों में हुआ था।

अब सवाल है कि क्या पार्टी में नेतृत्व की नई पौध तैयार हुई है? जवाब ना में है। दरअसल प्रदेश पार्टी में ऊर्जावान नेतृत्व का अभाव है। पहली पंक्ति में गिने-चुने नेता हैं जिनसे अब कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। द्वितीय पंक्ति में यद्यपि नेताओं की फौज है लेकिन उनमें एक भी ऐसा नहीं जो संगठन की कायापलट कर सके। तृतीय पंक्ति युवाओं की है जिनके नेतृत्व की परख अभी होनी बाकी है। कुछ उम्मीद इन्हीं से की जा सकती है बशर्ते पार्टी उन पर विश्वास जताए। पार्टी के हक में यह अच्छी बात है कि राज्य विधानसभा चुनाव में काफी संख्या में युवा जीतकर आए हैं। वे संगठन को दिशा दे सकते हैं।

यह स्पष्ट है कि मौजूदा नेतृत्व से बदलाव की अपेक्षा नहीं की जा सकती। चरणदास महंत, रविन्द्र चौबे तथा धनेन्द्र साहू जैसे वरिष्ठ नेता कसौटी पर कसे जा चुके हैं। वरिष्ठतम में अब दो ही नेता हैं मोतीलाल वोरा एवं अजीत जोगी। इनमें से अजीत जोगी सब पर भारी हैं। बड़ी संख्या में उनके समर्थक जीतकर आए हैं। संगठन में पहले भी उनका दबदबा था और अभी भी है। जाहिर है कोई भी नेतृत्व उनकी उपेक्षा करके चल नहीं सकता। इसलिए सांगठनिक एकता की कोशिशों में इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि तुष्टीकरण के बावजूद गुटीय संतुलन बना रहे। लेकिन पार्टी में ऐसे नेतृत्व को तलाशना आसान नहीं है। संगठन की इन आंतरिक चुनौतियों से केन्द्रीय नेतृत्व किस तरह निपटेगा और कैसे राह को सुगम बनाएगा, यह निकट भविष्य में स्पष्ट होना चाहिए। देखें क्या होता है।

Saturday, December 14, 2013

उम्मीदों के पहाड़ पर तीसरी पारी

राज्य विधानसभा चुनाव में सत्ता की हैट्रिक जमाने वाले मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह क्या अगले पांच साल तक निर्द्वंद्व होकर शासन कर सकते हैं? क्या जनता की अपेक्षाओं का बोझ वे बखूबी झेल पाएंगे? क्या वे फिर विपक्ष की धार को उसी तरह बोथरा बना देंगे जैसा कि सन् 2003 एवं 2008 के अपने शासनकाल में उन्होंने कर दिखाया था? क्या अगले पांच सालों में अपनी पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र पर शत-प्रतिशत अमल कर पाएंगे? क्या सरकार की चाल-ढाल एवं चेहरे में कोई रद्दोबदल होगा? सरकार पूर्वापेक्षा ज्यादा जनोन्मुखी तथा संवेदनशील होगी या तीसरा कार्यकाल उसे निरंकुशता की ओर ले जाएगा? क्या वे सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार को न्यूनतम स्तर पर ले जा सकेंगे? इस तरह के और भी कुछ सवाल हैं जो अब प्रबुद्घ जन-मानस में उमड़-घुमड़ रहे हैं। इसका बेहतर जवाब मुख्यमंत्री स्वयं तथा उनकी सरकार ही दे सकेगी पर इसमें जरा भी संशय नहीं कि उनके सामने अनेक चुनौतियां हैं जिनका सामना उन्हें तथा उनकी सरकार को करना है। विशेषकर जनअपेक्षाओं का दबाव पूर्व की तुलना में अधिक इसलिए होगा क्योंकि राज्य के मतदाताओं ने बड़ी उम्मीदों के साथ उन्हें तीसरी बार सत्ता सौंपी है।

जहां तक चुनौतियों का सवाल है, मुख्यमंत्री के सामने बड़ी समस्या है, भ्रष्टाचार से निपटने एवं शासन के कामकाज में पारदर्शिता की। भ्रष्टाचार ने सरकार की छवि को बहुत मलिन किया है। यह अलग बात है कि भाजपा चुनाव जीत गई लेकिन आमचर्चाओं में भ्रष्टाचार एवं उससे निपटने में सरकार की उदासीनता की जमकर आलोचना होती रही है। भ्रष्टाचार के आरोपों की गिरफ्त में आए उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को कथित अभयदान भी चर्चाओं के केन्द्र में रहा है। लोकप्रियता का दावा करने वाली किसी भी सरकार के लिए ऐसी चर्चाएं असहनीय होनी चाहिए लेकिन दुर्भाग्य यही है कि ये चर्चाएं पिछले दस सालों में सरकार के साथ-साथ चलती रही हैं। अब उम्मीद की जानी चाहिए सरकार ऐसी चर्चाओं पर विराम लगाने के लिए अपने कामकाज में सुधार के जरिए सकारात्मक संदेश देने की कोशिश करेगी। जाहिर है इसके लिए उसे प्रशासन से जुड़े प्रत्येक कार्य में पारदर्शिता लानी पड़ेगी।

सरकार को यह भी सोचना होगा कि बस्तर और सरगुजा में भरपूर ध्यान देने के बावजूद सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस से क्यों कमतर रही? चाहे मुख्यमंत्री रमन सिंह की विकास यात्रा हो या ग्राम सुराज अभियान, उसका श्रीगणेश दंतेवाड़ा से किया गया, बस्तर और सरगुजा में मुख्यमंत्री ने पिछले पांच सालों में अरबों के विकास कार्यों की सौगातें दीं लेकिन ऐसा क्या हुआ कि बस्तर में उसके हाथ से 7 सीटें निकल गई जबकि 2008 के चुनाव में उसे 12 में से 11 सीटें मिली थीं। क्या जीरम घाटी नक्सली हमले में दिग्गज कांग्रेसियों की मौत पार्टी पर कहर बनकर टूटा? क्या विकास कार्यों में हुआ भारी भ्रष्टाचार उसे ले डूबा अथवा नक्सली आतंक से उसके खिलाफ मतदान हुआ या फिर स्थानीय समस्याओं यथा सड़क, नाली, बिजली, पानी तथा खस्ताहाल लोक स्वास्थ्य ने उसका मार्ग रोका? दरअसल आजादी के 66 वर्षों के बावजूद बस्तर के घने जंगलों में बसे आदिवासियों तक प्रशासन की कोई पहुंच नहीं है तथा उनका जीवन भगवान भरोसे है। मतलब स्पष्ट है कि बस्तर में अरबों रुपए मुख्यत: ग्रामीण स्वास्थ्य, पेयजल, शिक्षा तथा सड़क और बिजली की व्यवस्था के नाम पर जो खर्च किए गए, वे बेमानी हैं, कागजों पर हैं। अन्यथा स्थानीय समस्याओं पर हुआ मतदान भाजपा के खिलाफ नहीं जाना चाहिए था। मुख्यमंत्री को अब अपने अगले पांच सालों में बस्तर में वास्तविक विकास पर ध्यान देना होगा। यदि वास्तविक विकास हुआ होता तो जाहिर है, नक्सली समस्या पर भी कुछ हद तक काबू पाया जा सकेगा।
अपने चुनावी घोषणापत्र में पार्टी ने जनता से जो वायदे किए हैं, उन पर अमल की शुरुआत मुख्यमंत्री ने अपनी तीसरी पारी के पहले दिन से ही कर दी है। इनमें प्रमुख हैं आगामी 1 जनवरी से 47 लाख परिवारों को एक रुपए किलो चावल तथा किसानों को धान पर प्रतिवर्ष 300 रु. प्रति क्विंटल बोनस। धान का समर्थन मूल्य 2100 रु. निर्धारित करने के लिए मुख्यमंत्री ने गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दी है। घोषणा पत्र के अन्य वायदों पर अमल इसलिए भी कठिन नहीं है क्योंकि सभी सामान्य है, भारी-भरकम  नहीं, लिहाजा उन पर अमल करने में सरकार को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।

मुख्यमंत्री के 2003 एवं 2008 के शासनकाल में जो सबसे बड़ी कमी महसूस की गई थी, वह थी प्रशासन पर उनकी कमजोर पकड़। मुख्यमंत्री ने अपनी छवि को साफ-सुथरी बनाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी किंतु प्रशासन को उन्होंने इतना ढीला छोड़ दिया कि वह स्वेच्छाधारी हो गया। इसलिए प्रशासनिक कसावट पहली जरूरत है। चूंकि डॉ.रमन सिंह को तीसरा कार्यकाल मिला है लिहाजा यह उम्मीद की जाती है कि वे अब प्रशासनिक ढिलाई बर्दाश्त नहीं करेंगे तथा उसमें भरपूर पारदर्शिता लाएंगे। शासन-प्रशासन के स्तर पर एक और बड़ी जरूरत है कामकाज पर सतत निगरानी की। जनहित की योजनाएं तो बहुतेरी हैं किंतु उन पर अमल का पक्ष उतना ही कमजोर। भ्रष्टाचार के फलने-फूलने की यह एक बड़ी वजह है। राज्य में विकास के अरबों रुपए के काम हो रहे हैं, और यह स्थापित सत्य है कि मंत्रियों, राजनेताओं, अफसरों से लेकर शासकीय सेवा के निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति तक कमीशनखोरी रोजाना के व्यवहार में शामिल है। कल्पना की जा सकती है कि राज्य में भ्रष्टाचार किस कदर भयानक है। इसे खत्म करना तो नामुमकिन है अलबत्ता इसे सीमित जरूर किया जा सकता है। शासन के सामने यह एक बड़ी चुनौती है।

मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह को यह भी ध्यान में रखना होगा कि प्रदेश में गरीबी बढ़ी है, कुपोषण के मामले में भी छत्तीसगढ़ देश के आंकड़ों में आगे है। यह ठीक है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली की सुगठित व्यवस्था को तारीफ मिली है किंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि दूरदराज के आदिवासियों को सस्ते राशन के लिए अभी भी मीलों पैदल चलना पड़ता है, नदी-नाले लांघने पड़ते हैं। एक रुपए किलो चावल या 4 रु. किलो चने से उनकी गरीबी दूर नहीं होगी, इसके लिए स्थायी रोजगार का सृजन करना होगा। भाजपा के घोषणापत्र में रोजगार की कोई गारंटी नहीं की गई है। कोई जिक्र नहीं है। यह अजीब सी बात है। राज्य में आईटी हब बनाने तथा नई औद्योगिक क्रांति लाने की पूर्व घोषणाएं भी थोथी साबित हुई हैं। राज्य को देश की ऊर्जा राजधानी बनाने का संकल्प तो वर्षों पुराना है? लेकिन हुआ क्या? ऐसे बहुत सारे सवाल हैं, चुनौतियां हैं, जिन्हें पूरा करने का दायित्व सरकार का है। राज्य की कायापलट करने के लिए 15 साल काफी होते हैं। 10 साल निकल चुके हैं, शेष पांच सालों मेंं उम्मीदों के पहाड़ को लांघना है। क्या डॉ.रमन सिंह ऐसा कर पाएंगे?

Tuesday, December 10, 2013

भरोसे की हैट्रिक

आखिरकार धुंध साफ हो गई। भाजपा और कांगे्रस के बीच चुनावी जंग में ऐसी कश्मकश की स्थिति बनी थी कि अंदाज लगाना मुश्किल था, बहुमत किसे मिलेगा। दोनो पार्टियों के अपने-अपने दावे थे। अपने-अपने तर्क थे। जीत का सेहरा दोनों अपने सिर पर देख रहे थे। राज्य में भारी मतदान से दो तरह की राय बन रही थी। एक अनुमान था सन् 2008 के चुनाव की तुलना में करीब 6 प्रतिशत अधिक मतदान सत्ता के पक्ष में लहर के रूप में है जबकि इसके ठीक विपरीत राय रखने वाले भी बहुतायत थे। उनका मानना था कि अधिक मतदान सत्ता के प्रति विक्षोभ का परिणाम है। इसीलिए इसका फायदा कांग्रेस को मिलेगा। वह सत्ता में लौटेगी। और तो और एक्जिट पोल भी अलग-अलग राय दे रहे थे। अधिकांश की राय थी कि भाजपा पुन: सरकार बनाने जा रही है। कांग्रेस के पक्ष में भी कुछ एक्जिट पोल थे। यानी कुल मिलाकर असमंजस की स्थिति थी। मतगणना के पूर्व तक विचारों का ऐसा धुंधलका छाया हुआ था, कि ठीक-ठीक अनुमान लगाना भी मुश्किल था। लेकिन अब मतगणना के साथ ही कुहासा छंट गया है। कयासों  को दौर खत्म हो गया है। और नतीजे जनता के सामने हैं। भाजपा ने हैट्रिक जमायी है। डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में पार्टी की यह बड़ी उपलब्धि है। यह उनके विकास परक सोच की जीत है।

दरअसल इस बार भाजपा को कांगे्रस से इतने बड़ी चुनौती की उम्मीद नहीं थी। हालांकि पार्टी और स्वयं मुख्यमंत्री रमन सिंह हैट्रिक सुनिश्चित मान रहे थे। उन्होंने मतदान के बाद जीत के दावे भी किए लेकिन आशंकाओं से पार्टी उबर नहीं पाई। जिस जीत को वे एकतरफा मान रहे थे, वह अंतिम दौर तक पहुंचते-पहुंचते काफी कठिन हो गई। लेकिन अंतत: भाजपा ने मैदान मार लिया।  और अच्छे से मारा।  उसकी हैट्रिक दरअसल रमन सिंह की हैट्रिक है क्योंकि रमन सिंह न केवल उसके स्टार प्रचारक थे बल्कि उनके नेतृत्व में सरकार ने जो जनकल्याणकारी नीतियां बनाई और उन पर अमल किया, उस पर मतदाताओं ने अपना भरोसा जताया। यह जनता के भरोसे की तीसरी जीत थी। निश्चय ही इस भरोसे को जीतने का श्रेय अकेले रमन सिंह को है।
   
छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांगे्रस के बीच हमेशा सीधी टक्कर रही है। चाहे वह 2003 के चुनाव हो या 2008 के। लेकिन 2013 के चुनाव में छत्त्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच की मौजूदगी से यह उम्मीद की जा रही थी कि इस बार उसका खाता खुलेगा। बसपा, स्वाभिमान मंच एवं कम्युनिस्ट पार्टी कम से कम 3-4 सीटें जरूर निकाल लेंगी। किन्तु ऐसा नहीं हो सका। सिर्फ बसपा का एक प्रत्याशी जीता और एक भाजपा के बागी उम्मीदवार ने निर्दलीय के रूप में अपनी धमक बनाई। इसका सीधा अर्थ है कि छत्तीसगढ़ के चुनावी समर में किसी तीसरे की अभी भी कोई गुंजाइश नही है। जहां तब कांगे्रस का सवाल है, उसने सन् 2008 चुनाव के मुकाबले इस दफे ज्यादा संगठित होकर चुनाव लड़ा तथा मुद्दों को भुनाने की कोशिश की।  शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं कुशासन के प्रमुख हथियार के साथ-साथ उसने जीरम घाटी सहानुभूति की लहर पर भी सवार होने की कोशिश की किन्तु पार्टी को इसका लाभ नहीं मिला। राज्य में भारी भरकम मतदान से उसे यह भी उम्मीद थी कि सत्ता विरोधी लहर का भी उसे फायदा मिलेगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। भारी मतदान सत्ता के विरोध में नहीं, सत्ता के पक्ष में गया।

यकीनन कांग्रेस को ऐसी करारी हार की उम्मीद नही थी। उसकी स्थिति लगभग 2008 जैसी ही रही। उसकी सीटों में कोई इजाफा नहीं हुआ। तमाम संभावनाओं के बावजूद पार्टी की हार क्यों हुई,  दिग्गज क्यों हारे, मैदानी इलाकों में पिछले चुनाव की तुलना में उसका प्रदर्शन क्यों खराब रहा, आदि प्रश्नों पर उसे विचार करना होगा। चुनाव में लगातार तीसरी हार उसके लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए। प्रारंभिक तौर पर यही कहा जा सकता है कि पार्टी गुटबाजी से उबर नही पाई हालांकि बाह्य रूप से वह एकता दिखाने की कोशिश जरूर करती रही। चुनाव के दौरान भितरघात और निष्क्रियता ने भी उसे कमजोर किया। जैसा कि अजीत जोगी ने स्वीकार किया है, पार्टी जीरमघाटी में दिग्गज कांग्रेसियों की शहादत के मुद्दे को भी जन सहानुभूति के रूप में तब्दील नही कर पाई। और सबसे बड़ी बात है कि विधानसभा के भीतर एवं बाहर विपक्ष के रूप में पूर कार्यकाल में उसकी भूमिका लचर रही। न तो इस दौरान वह जनहित के मसलों को ठीक से उठा पाई और न ही उसने जनता के साथ खड़े होने की कोशिश की। उसकी निष्क्रियता एवं जनता से उसकी दूरी का पूरा लाभ भाजपा ने उठाया। इसलिए भाजपा की हैट्रिक दरअसल सकारात्मक वोटों की हैट्रिक है।


            

Thursday, December 5, 2013

एक्जिट पोल का सच

स्पष्ट बहुमत के साथ तीसरी बार सरकार बनाने का मुख्यमंत्री रमन सिंह का दावा क्या सच साबित होगा? चुनाव पूर्व एवं चुनाव के बाद हुए सर्वेक्षणों पर गौर करें तो ऐसा संभव प्रतीत हो रहा है। राज्य में चुनाव आचार संहिता लागू होने के पहले कुछ न्यूज चैनलों के एवं भाजपा के अपने सर्वेक्षण तथा मतदान के बाद हुए सर्वेक्षणों से यह बात उभरकर सामने आई कि लगभग 50-53 सीटों के साथ भाजपा छत्तीसगढ़ में पुन: सत्तारूढ़ होने जा रही है। मुख्यमंत्री ने राज्य में 11 नवम्बर को हुए भारी भरकम मतदान को देखते हुए विश्वास व्यक्त किया था कि उनकी हैट्रिक तय है। लेकिन यही दावा पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी सहित राज्य के वरिष्ठ कांग्रेस नेता भी कर रहे हैं। एक्जिट पोल के नतीजे आने के बावजूद वे अपने दावे पर कायम हैं। जाहिर है किसके दावे में कितना दम है, यह दो दिन बाद, 8 दिसम्बर को होने वाली मतगणना से स्पष्ट हो जाएगा।

जहां तक चुनाव सर्वेक्षणों की बात है, वे केवल संकेत देते हैं। वे एकदम सच नहीं होते किंतु जिज्ञासुओं को सच के काफी करीब ले जाते हैं। इन सर्वेक्षणों से यह अनुमान तो लगाया ही जा सकता है कि किस पार्टी को बहुमत मिल रहा है तथा कौन सी पार्टी चुनाव हार रही है। हालांकि विभिन्न न्यूज चैनलों एवं सर्वेक्षण एजेंसियों के इस संयुक्त उपक्रम में आंकड़ों का भी काफी अंतर होता है। मसलन इंडिया-टुडे-ओआरजी सर्वे छत्तीसगढ़ में भाजपा को कुल 90 में से 53 सीटें दे रहा है यानी सरकार बनाने लायक बहुमत से 7 सीटें ज्यादा। यह आंकड़ा पिछले चुनाव से भी 3 अधिक है। एक और न्यूज चैनल न्यूज 24 टुडेज-चाणक्य भी इसी आंकड़े के करीब है। वे भाजपा को 51 सीटें दे रहे हैं और कांग्रेस को 39। लेकिन कुछ अन्य सर्वेक्षणों मसलन टाइम्स नाउ, इंडिया टीवी, आईबीएन-सीएसडीएस - द वीक आदि के नतीजों पर गौर करें तो भाजपा और कांग्रेस के बीच सीटों का बहुत ज्यादा फासला नहीं है। बल्कि पिछले चुनाव के मुकाबले यह अंतर घटा है। पिछले चुनाव में भाजपा को 50 एवं कांग्रेस को 38 सीटें मिली थीं। अब 2013 के एक्जिट पोल दोनों के बीच महज 4-5 सीटों का अंतर बता रहे हैं। यदि इन सर्वेेक्षणों को सच के नजदीक माने तो दोनों पार्टियों को सरकार बनाने लायक बहुमत यानी 46 सीटें नहीं मिल रही हैं। ये सर्वेक्षण बसपा और निर्दलियों को 3 से 5 सीटें दे रहे हैं। यदि ऐसा है तो इसका अर्थ यह हुआ कि दोनों पार्टियों को सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ का सहारा लेना पड़ेगा। जो पार्टी दो-तीन विधायकों का विश्वास जीत लेगी, वह सरकार बनाने में कामयाब हो जाएगी। चूंकि जोड़-तोड़ की राजनीति में भाजपा से कहीं ज्यादा कांग्रेस के खिलाड़ी माहिर हैं, इसलिए यदि ऐसी नौबत आई तो पार्टी की उम्मीदें पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी पर टिक जाएंगी जिन्होंने सन् 2000 से 2003 के अपने कार्यकाल में भाजपा के एक दर्जन विधायकों को तोड़कर तहलका मचा दिया था।

छत्तीसगढ़ में इस बार 77 प्रतिशत रिकार्ड मतदान हुआ है। यद्यपि भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर थी किंतु एक दर्जन से ज्यादा निर्वाचन क्षेत्रों में बसपा, छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने चुनाव समीकरणों को बिगाड़ रखा है। हालांकि चैनलों के चुनाव सर्वेक्षण इन पार्टियों को ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहे हैं किंतु इनकी उपस्थिति दोनों पार्टियों की संभावनाओं को क्षीण जरूर करती है। इसके बावजूद उम्मीद की जा रही है कि 2008 के चुनाव की तुलना में इस बार उनकी उपस्थिति कुछ ज्यादा होगी। यह 5-6 हो सकती है। पिछले चुनाव में एक भी निर्दलीय नहीं जीत पाया था जबकि दो सीटें बसपा को मिली थीं।

चुनाव सर्वेक्षणों के आंकड़ों पर यकीन करें तो यह बात भी सिद्घ होती है कि छत्तीसगढ़ में 77 प्रतिशत मतदान सत्ता के विरोध में नहीं, सत्ता के पक्ष में जा रहा है। इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि डॉ.रमन सिंह की उज्जवल छवि एवं उनकी जनकल्याणकारी नीतियां, विशेषकर गांव-देहातों में दो रुपए किलो चावल का जादू अभी भी चल रहा है। सन् 2008 के चुनावों में इसी जादू ने काम किया था तथा रमन सिंह को दूसरी बार सत्ता सौंप दी थी। उनकी राजनीतिक बाजीगरी का असर फीका नहीं पड़ा है। भाजपा को बहुमत मिलने की स्थिति में यह स्पष्ट हो जाएगा कि राज्य के मतदाताओं को विकास का मुद्दा भाया है तथा उन्होंने रमन के नेतृत्व पर विश्वास व्यक्त किया है। बहरहाल सर्वेक्षणों के नतीजों से भाजपा में उत्साह का माहौल है। होना भी चाहिए क्योंकि 5 में से 4 राज्य विधानसभा चुनावों में पार्टी को बढ़त मिलने का अनुमान है। फिर भी आशंकाओं से इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि आखिरकार सर्वे के नतीजे अनुमानित हैं। इसलिए इसके आधार पर यह माना जा सकता है कि राज्य में भाजपा या तो बहुमत हासिल कर लेगी या कुछ पीछे रह जाएगी। यानी मुख्यमंत्री रमन सिंह की हैट्रिक उम्मीद और नाउम्मीद के बीच झूल रही है। देखें क्या होता है, फैसले की घड़ी ज्यादा दूर नहीं है।

Wednesday, December 4, 2013

दिल्ली पर निगाहें

पांच राज्य विधानसभा के चुनावों में दिल्ली का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। देश की निगाहें इस चुनाव पर इसलिए टिकी हुई हैं क्योंकि पहली बार राजधानी में त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बनी है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी की पार्टी का मुकाबला दो स्थापित राष्ट्रीय दल कांग्रेस एवं भाजपा से है। 70 सीटों के इस चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा, कहा नहीं जा सकता अलबत्ता तीनों पार्टियां बहुमत का दावा कर रही हैं। नक्शा 8 दिसम्बर को साफ हो जाएगा जब मतपेटियों से जनता का फैसला बाहर आएगा। इसमें दो राय नहीं है कि चुनाव प्रचार के दौरान केजरीवाल की पार्टी ने बड़ा दम-खम दिखाया है। स्थानीय मुद्दों को लेकर वह दिल्ली की जनता को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करती करी है कि कांग्रेस अथवा भाजपा के राज में उसका भला नहीं होने वाला। इसमें भी दोय राय नहीं कि आम आदमी की पार्टी ने लोगों के दिलों को झंझोड़ा है और वे उसकी ओर आकर्षित हुए हैं। लेकिन यह आकर्षण उसे सत्ता तक पहुंचा पाएगा अथवा नहीं, कहना कठिन है पर यह भी स्पष्ट है कि उसने एक तीसरी ताकत के रूप में दिल्ली में अपनी धमक बनाई है। पार्टी ने चूंकि शून्य से शुरुआत की है इसलिए उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है अलबत्ता उसे चुनाव में जो कुछ भी हासिल होगा, वह उसे कम से कम दिल्ली की राजनीति में जरूर स्थापित करेगा। कहा जा सकता है कि वह भविष्य की पार्टी है जो कांग्रेस एवं भाजपा के साथ खड़ी नजर आएगी।  अभी तो उसने अपनी मौजूदगी से दोनों को हलाकार कर रखा है। दोनों चिंतित एवं सशंकित हैं। चूंकि दिल्ली में भारी मतदान हुआ है इसलिए नतीजे चौंकाने वाले आ सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो वह राजधानी की राजनीति में ने बदलाव का संकेत होगा।