Monday, April 14, 2014

आखिर इस हिंसा का जवाब क्या है?

दिल दहल गया है। मुट्ठियां भींच गई हैं। आंखें शोले उगल रही हैं। यह आम आदमी का गुस्सा है जो बरसों से बस्तर में नक्सली हिंसा के तांडव को देखते-देखते आपे से बाहर हुआ जा रहा है। लेकिन लाचार है, मजबूर है। कर कुछ नहीं सकता। सिर्फ आंसू बहा सकता है या गुस्से से लाल-पीला हो सकता है। यही उसकी त्रासदी है। दरअसल जो कुछ करना है सत्ताधीशों को करना है, राजनीतिज्ञों को करना है, अफसरों को करना है। यह उनकी प्रतिबद्धता, समस्या को देखने का नजरिया और जवाबदेही का सवाल है। छत्तीसगढ़ या बस्तर के आम आदमी की भूमिका केवल इतनी हो सकती है कि वह सलवा जुडूम की तर्ज पर हिंसा के खिलाफ आवाज बुलंद करे, नक्सली खौफ को खारिज करे, एकजुटता दिखाए तथा जनजागरण के जरिए वातावरण बनाने की कोशिश करे। वह सरकार एवं पुलिस की मदद के लिए भी तैयार है बशर्ते उसे विश्वास में लिया जाए, उसकी सुरक्षा का माकूल बंदोबस्त किया जाए, उसका मान-सम्मान कायम रखा जाए, मदद के एवज में उसका जीना हराम न किया जाए और नक्सली समर्थक होने के शक में उसे फांसा न जाए, प्रताड़ित न किया जाए। लेकिन दिक्कत यह है कि उसके साथ ठीक उल्टा हो रहा है। इसीलिए बस्तर का आम आदमी पुलिस से दूर भाग रहा है, वह उसका मुखबिर होने तैयार नहीं है, वह नक्सलियों की गतिविधियों से वाकिफ है, पर खामोश है। जान की बाजी लगाकर वह अपनी लड़ाई खुद लड़ना चाहता है क्योंकि उसे सरकार और पुलिस पर भरोसा नहीं है। यही वजह है कि बस्तर में नक्सली हिंसा थम नहीं रही हैं। नक्सलियों का साम्राज्य अटूट है। वे जैसा चाहते हंैं, करते हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव के बहिष्कार की चेतावनी दी थी। परिणामत: दर्जनों पोलिंग बूथों में वोट नहीं पड़े। उन्होंने चुनाव के पूर्व और चुनाव के बाद हिंसा की घटनाओं को अंजाम देकर सुरक्षा व्यवस्था की धज्जियां उड़ाई। इस हिंसा में कई पुलिस जवान और सरकार कर्मचारी मारे गए। चुनाव ड्यूटी करने का उन्हें यह सिला मिला।

सवाल है, बस्तर में हिंसा का दौर कब और कैसे थमेगा? नक्सलवाद को गंभीर राष्ट्रीय समस्या माना गया है पर उससे निपटने के अब तक जितने भी उपाय किए गए हैं, उससे हिंसा कम जरूर हुई है, पर थमी नहीं है। हालांकि बस्तर इससे अप्रभावित है। यहां नक्सली हिंसा का ग्राफ बढ़ा है। विशेषकर जितनी बड़ी घटनाएं बस्तर में हो रही हैं, उतनी नक्सल प्रभावित अन्य राज्यों में नहीं। प्राय: हर घटना के बाद निष्कर्ष के रूप में दो-तीन बातें ही सामने आती हैं, रणनीतिक सोच का अभाव, सुरक्षाकर्मियों की लापरवाही तथा पुलिस का विफल सूचना तंत्र। निश्चितत: 12 अप्रैल को बीजापुर एवं सुकमा जिले में हुई हिंसक घटनाओं की जांच में भी यही तथ्य सामने आएंगे। पर यह सिलसिला कब तक चलेगा? क्या इसी तरह चूक होती रहेगी और लोगों की जानें जाएंगी? क्या हर घटना के बाद यही वाक्य दुहराया जाता रहेगा कि हम नक्सलियों को उनकी मांद में घुसकर मारेंगे? क्या हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा से देकर इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है? अगर ऐसा होता तो यह समस्या अब तक खत्म हो जानी चाहिए थी क्योंकि आपरेशन ग्रीन हंट ने दर्जनों नक्सलियों को मार गिराया है जिसमे कई बड़े माओवादी नेता भी शामिल हैं। सैकड़ों नक्सली या नक्सली समर्थक गिरफ्तार हुए हैं। पर इसके बावजूद समस्या यथावत इसलिए है क्योंकि बस्तर में नक्सलियों की पौध कुकरमुत्ते की तरह उग रही है। तो इलाज क्या है? वार्ता? यकीनन वार्ता। भाकपा (माओवादी) की सेन्ट्रल कमेटी के प्रवक्ता अभय ने सशर्त वार्ता की पेशकश की है। क्या केन्द्र सरकार अपने रुख को लचीला करते हुए इस दिशा में कुछ सोच सकती है? क्या छत्तीसगढ़ सरकार अपनी ओर से कुछ प्रयत्न कर सकती है? क्या ऐसी कोई संस्था अथवा व्यक्ति मध्यस्थता की जिम्मेदारी लेने तैयार है? अगर नहीं तो समस्या के समाधान की उम्मीद भी नहीं।

Thursday, April 10, 2014

रास्ता तो खुला पर है अंधेरा

लोकसभा चुनाव की खबरों की भीड़ में एक खबर दबकर रह गई जबकि वह बेहद महत्वपूर्ण थी। बीबीसी हिन्दी सेवा ने 5 अप्रैल 2014 को एक खबर प्रसारित की जिसमें कहा गया था कि माओवादी कुछ शर्तों के साथ सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं। संगठन की केन्द्रीय कमेटी के प्रवक्ता अभय के हवाले से कहा गया कि वार्ता सचमुच की शांति के लिए और ईमानदारी के साथ होनी चाहिए लेकिन इसके लिए जेल में बंद वरिष्ठ नेताओं को रिहा करना होगा ताकि वार्ता के लिए माओवादियों की तरफ से प्रतिनिधिमंडल का गठन किया जा सके। चूंकि सेन्ट्रल कमेटी के प्रवक्ता अभय के साक्षात्कार के रूप में यह बयान जारी हुआ है लिहाजा इसमें संदेह की गुंजाइश नहीं है और यह माना जाना चाहिए कि पार्टी बातचीत के लिए वाकई तैयार है। यह सुखद है। इसे नक्सल समस्या के समाधान की दिशा में एक नई पहल के रूप में देखा जा सकता है।

तीन वर्ष पूर्व, 1 जुलाई 2010 को 58 वर्षीय चेरिकुटि राजकुमार उर्फ आज़ाद के कथित इनकाउंटर में मारे जाने के बाद यह पहला मौका है जब माओवादियों की तरफ से वार्ता के लिए पहल की गई हो। सीपीआई (माओवादी) सेन्ट्रल कमेटी के प्रवक्ता एवं पोलित ब्यूरो के सदस्य आज़ाद वह शख्स था जिसके प्रयासों एवं मध्यस्थता की वजह से केन्द्र सरकार और माओवादियों के बीच वर्षों से जमी बर्फ पिघल रही थी और वार्ता के लिए वातावरण बन रहा था। इसके पूर्व नई दिल्ली में नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक के बाद तत्कालीन गृहमंत्री पी.चिदम्बरम ने 9 फरवरी 2010 को अपने एक बयान में कहा था कि यदि नक्सली हिंसा छोड़ते हैं तो सरकार किसी भी मुद्दे पर उनसे बातचीत के लिए तैयार हैं लेकिन बाद के बयानों में चिदंबरम ने यह भी कहा था कि यदि नक्सली हिंसा जारी रही तो सरकार का आपरेशन भी जारी रहेगा। छत्तीसगढ़ सहित नक्सल प्रभावित राज्यों में आपरेशन ग्रीन हंट पूरे शबाब पर था तथा तमाम हिंसक वारदातों के बावजूद नक्सली बैकफुट पर नज़र आ रहे थे। लेकिन हिंसा और प्रतिहिंसा के उस दौर में भी केन्द्र सरकार ने वार्ता के लिए दरवाजे खुले रखे। हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में शामिल होने की गृहमंत्री की नक्सलियों से अपील पर अपील का यह नतीजा निकला कि एक सिलसिला शुरु हुआ, कुछ शर्तें एक-दूसरे के सामने रखीं गईं। माओवादियों की प्रमुख शर्त यह थी कि आपरेशन ग्रीन हंट तत्काल बंद किया जाए तथा अर्द्धसैनिक बलों को अपने बैरकों में लौटने के निर्देश दिए जाएं जबकि केन्द्र सरकार चाहती थी कि नक्सली हिंसा बंद करें और हथियार डालें तथा उसके बाद ही वार्ता जैसी कोई चीज संभव होगी। सार्वजनिक रूप से जारी किए गए पत्रों एवं बयानों के बीच वार्ता की दिशा में आगे बढ़ा जा रहा था कि इस बीच आज़ाद की गिरफ्तारी एवं आंध्रप्रदेश के जंगलों में उसके मारे जाने की घटना से नक्सली बिफर गए और वार्ता की सारी संभावनाएं खत्म हो गईं। तब से लेकर अब तक न तो केन्द्र एवं छत्तीसगढ़ सहित नक्सल प्रभावित राज्यों की ओर से बातचीत के लिए वातावरण बनाने की कोशिश की गई और न ही माओवादियों ने ऐसा कोई इरादा जाहिर किया। लेकिन माओवादियों के प्रवक्ता के हालिया बयान से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि माओवादी बातचीत के लिए राजी हैं लेकिन उनकी अपनी कुछ शर्तें हैं। माओवादी प्रवक्ता अभय के बयान को केन्द्र ने कितनी गंभीरता से लिया, फिलहाल इसके कोई संकेत नहीं मिले हैं लेकिन यह खबर मीडिया में भी दबकर रह गई और किसी छोर से कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। यह संभव है लोकसभा चुनाव के बाद नई सरकार इसे संज्ञान में ले या यह भी संभव है कोई प्रतिक्रिया न दें।
दरअसल माओवादी प्रवक्ता के बयान में कुछ बातें ऐसी हैं जिसे स्वीकार करना किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए नामुमकिन है। मसलन अभय का कहना है- ‘‘शांतिवार्ता के लिए जरूरी है कि सरकार माओवादियों के आंदोलन को देश के लोगों का आंदोलन, एक आंतरिक संघर्ष और गृहयुद्ध के रूप में स्वीकार करें। तब कहीं जाकर वार्ता के जरिए बुनियादी मुद्दों को सुलझाया जा सकेगा ताकि गृहयुद्ध खत्म हो जाए।’’ माओवादी प्रवक्ता के इस बयान को कैसे स्वीकार किया जा सकता है? नक्सलियों के द्वारा की गई हिंसा को जिसमें पुलिस, अर्द्धसैनिक बलों के जवानों एवं निरपराध नागरिक बड़ी संख्या में मारे गए हैं और यह दौर अभी भी जारी है, को कैसे जनआंदोलन कह सकते हैं? क्या इसे आंतरिक संघर्ष और गृहयुद्ध कहा जाएगा? क्या लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान होता है? यकीनन जिनके लिए लोकतंत्र के मायने अलग हैंऔर जो अधिनायकवादी हैं, वे ही ऐसा कह सकते हैं? चूंकि हिंसा के जरिए बदलाव माओवादियों की सोच है इसीलिए वे अपने अभियान को जनआंदोलन अथवा गृहयुद्ध की संज्ञा दे सकते हैं और दे रहे हैं। उनकी ऐसी सोच के साथ इत्तफाक रखना लोकतांत्रिक सरकार के लिए संभव नहीं है इसलिए इस बयान को स्वीकार करने का प्रश्न ही नहीं है। यानी अगर इसी मुद्दे पर वार्ता की संभावना टिकी हुई हैं, तो इसे खत्म समझना चाहिए।

माओवादी प्रवक्ता के बयान के अगले हिस्से में कहा गया है कि सरकार को चाहिए कि वह माओवादी आंदोलन को एक राजनीतिक आंदोलन के रूप में स्वीकार करें। माओवादियों के इस विचार को भी स्वीकार करना केन्द्र के लिए संभव नहीं है क्योंकि माओवादी आंदोलन राजनीतिक नहीं हिंसक आंदोलन है और राजनीति और लोकतंत्र से इसका कोई सरोकार नहीं है। यदि यह राजनीतिक आंदोलन होता तो माओवादी एवं इस विचारधारा के समर्थक लोकतंत्र की हिमायत करते हुए देश की मुख्यधारा में शामिल होते। नेपाल के माओवादियों की तरह वे भी चुनाव लड़कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनते पर पिछले 40-45 बरस में ऐसा कोई मौका नहीं आया जब उनके विचारों में कोई तब्दीली आई हो और उन्होंने चुनाव लड़ने का इरादा जाहिर किया हो। ऐसी स्थिति में उनका आंदोलन राजनीतिक आंदोलन कैसे हो सकता है? हालांकि संगठन का कहना है कि उनके आंदोलन का मुख्य एजेंडा है- लोकतंत्र, भूमि सुधार के साथ-साथ कृषि और अर्थव्यवस्था के विकास का आत्मनिर्भर मॉडल का निर्माण ताकि देश के विकास के लिए शांति का लम्बा दौर चले। माओवादियों के इस विचार पर असहमति का प्रश्न नहीं है लेकिन उनके विचार और कर्म दो विपरीत ध्रुव पर खडेÞ नज़र आते हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर सहित नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास को हिंसा के जरिए रोकने की सैकड़ों घटनाएं इसकी साक्षी हैं। यानी लोकतंत्र, विकास एवं भूमि सुधार की दुहाई देना अलग बात है और इस पर अमल करना अलग बात।

माओवादी प्रवक्ता के बयान में आगे कहा गया है- ‘‘सरकार हमारे संगठन पर से प्रतिबंध हटाएं तथा जेलों में बंद वरिष्ठ नेताओं को या तो जमानत पर रिहा किया जाए या मामले हटा लिए जाएं ताकि वार्ता के लिए ये नेता माओवादियों की ओर से प्रतिनिधियों के चयन में मदद कर सकें। अगर सरकार हमारी पेशकश स्वीकार कर शांति-वार्ता के लिए अनुकूल माहौल तैयार कर लेती है तो हम उसमें शामिल होंगे।’’ जहां तक इस पेशकश का सवाल है, केन्द्र इसे स्वीकार कर सकती है लेकिन पूरी तसल्ली के बाद। दरअसल भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) पर लागू प्रतिबंध तभी हटाया जा सकेगा जब संगठन अपने आप को हिंसा से पूरी तरह अलग करें। जेलों में बंद वरिष्ठ नेताओं की जमानत पर रिहाई या मामले वापस लेने का मामला समीक्षा के बाद ही आगे बढ़ सकता है पर यही लंबी कानूनी प्रक्रिया है हालांकि छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा के सिलसिले में जेलों में बंद विचाराधीन बंदियों जिनमें अधिकांश आदिवासी हैं, की रिहाई के लिए पहल हुई तथा अनेक मामले वापस भी लिए गए। लेकिन इसके पूर्व शासन के स्तर पर गठित उच्च स्तरीय समिति ने पहले मामलों की समीक्षा की। केन्द्र के स्तर पर भी ऐसी पहल की जा सकती है बशर्ते इस बात की गारंटी होनी चाहिए कि माओवादी सचमुच वार्ता के इच्छुक हों तथा उसके अनुकूल आचरण करें।

बहरहाल वार्ता के लिए माओवादी प्रवक्ता अभय के विचारों को देखते हुए यह मुश्किल ही है कि बात आगे बढ़ पाएगी। दरअसल यदि माओवादियों को सरकार की नीयत पर शक है तो सरकार को भी उनके इरादे पर संदेह है। ऐसा इसलिए क्योंकि माओवादी प्रवक्ता ने अपने बयान में हिंसक आंदोलन को जनआंदोलन, राजनीतिक आंदोलन, गृहयुद्ध, आंतरिक संघर्ष जैसे लफ्ज़ों का इस्तेमाल किया है। जबकि वार्ता के नाम पर उनके उपयोग की कतई जरुरत नहीं थी। बेहतर होता यदि सीधे-सादे शब्दों में वार्ता की मंशा प्रकट की जाती। यह ठीक है, वार्ता के लिए वातावरण बनाने की दृष्टि से दोनों पक्षों की ओर से कुछ शर्तें स्वाभाविक हैं जिनमें प्रमुख है- माओवादियों का हिंसा से तौैबा करते हुए हथियार डालना तथा सरकार की ओर से आपरेशन ग्रीन हंट को तब तक बंद रखना जब तक शांतिवार्ता मुकम्मल न हो जाए। यकीनन यह आपसी विश्वास का प्रश्न है तथा बगैर विश्वास के इस दिशा में आगे नहीं बढ़ा जा सकता। फिलहाल केवल एक बात जरूर अच्छी हुई है कि माओवादियों ने बातचीत की इच्छा जाहिर की है। इससे कुछ तो उम्मीद बंधती है। संभव है इस दिशा में आगे प्रगति हो। अगर ऐसा हुआ तो नक्सल समस्या के् समाधान का मार्ग प्रशस्त होगा।

Tuesday, April 8, 2014

दावे हैं, दावों का क्या

मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह कई बार यह कह चुके हैं कि लोकसभा चुनाव में भाजपा छत्तीसगढ़ की सभी 11 सीटें जीतेंगी। उन्होंने ऐसा विश्वास नरेन्द्र मोदी के छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान भी व्यक्त किया है। हाल ही में नई दिल्ली की दूरदर्शन टीम को दिए गए एक साक्षात्कार में भी मुख्यमंत्री ने कहा कि भाजपा के मिशन 272 के लक्ष्य को पूरा करने में छत्तीसगढ़ का शत-प्रतिशत योगदान रहेगा। उनका मानना है कि लोकसभा चुनाव में राज्य में भाजपा सरकार का दस वर्ष का कामकाज और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी के नाम का प्रभाव जबर्दस्त है और निश्चितत: इसके सकारात्मक परिणाम आएंगे। अब सवाल उठता है कि मुख्यमंत्री के इस विश्वास के पीछे ठोस वजह क्या है? क्या दस साल के कथित सुशासन के अलावा पिछले दो लोकसभा चुनावों एवं राज्य विधानसभा चुनाव में पार्टी का शानदार प्रदर्शन एवं जमीनी पकड़ प्रमुख कारण हैं या मुख्यमंत्री अतिआत्मविश्वास के शिकार हैं? सन् 2009 के लोकसभा चुनाव में रमन के नेतृत्व में पार्टी ने राज्य की 11 में से 10 सीटें जीती थीं। केवल एक सीट कोरबा, कांग्रेस के खाते में गई। अब मुख्यमंत्री कोरबा को भी अपने खाते में डाल रहे हैं जहां से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में केन्द्रीय मंत्री चरणदास महंत चुनाव लड़ रहे हैं। मुख्यमंत्री की सोच के मुताबिक वे भी चुनाव हार रहे हैं। क्या सचमुच ऐसा होने वाला है? क्या महासमुंद से अजीत जोगी जैसे धुरंधर भी चुनाव हार जाएंगे? अगर ऐसा हुआ तो यकीनन यह चमत्कार होगा। लेकिन अगर ऐसा न हुआ तो इसे क्या कहा जाए? क्या मुख्यमंत्री सभी सीटों पर जीत का दावा करके रस्म अदायगी कर रहे हैं? या कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने ऐसा कहा जा रहा है जबकि वास्तविकता कुछ और है? दरअसल पार्टी का प्रदेश नेतृत्व भी इस तथ्य से बेखबर नहीं है कि इस बार के चुनाव, पिछले चुनाव के मुकाबले ज्यादा कठिन एवं संघर्षपूर्ण है। कुछ सीटों मसलन महासमुंद, दुर्ग, बस्तर, कांकेर, सरगुजा, रायगढ़ और रायपुर में कांग्रेस भाजपा को कड़ी टक्कर दे रही है। रायगढ़, राजनांदगांव, और बिलासपुर पार्टी की बेफिक्री वाली सीटें मानी जा रही हैं। दूसरे अर्थ में राज्य की अधिकांश सीटें कड़े मुकाबले में फंसी हुई हैं। इस स्थिति में मुख्यमंत्री का सभी सीटें जीतने का दावा धराशायी होता नज़र आ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार महासमुंद, सरगुजा, दुर्ग एवं कोरबा कांग्रेस के खाते में जाती दिख रही है। यानी यह लगभग निश्चित है कि भाजपा सन् 2004 एवं 2009 के लोकसभा चुनावों के परिणामों को नहीं दोहरा पाएगी।

प्रदेश में इस बार लोकसभा चुनाव के रंग भी कुछ अलग हैं। देशभर में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की हिन्दीभाषी प्रदेशों में आंधी चल रही है लेकिन छत्तीसगढ़ अछूता है। हालांकि मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह एवं भाजपा के नेता इस तथ्य को स्वीकार नहीं करते लेकिन प्रदेश में भाजपा के पक्ष में मोदी लहर जैसा कुछ नहीं है। पार्टी ने यद्यपि अभी अपना चुनाव घोषणा पत्र जारी नहीं किया है किंतु केन्द्र में यूपीए सरकार की हर मोर्चे पर विफलता, महंगाई एवं भ्रष्टाचार उसका प्रमुख मुद्दा है जिसे नरेन्द्र मोदी सहित सभी स्टार प्रचारक भुनाने में लगे हुए हैं। दूसरी ओर कांग्रेस का चुनाव घोषणा पत्र पिछले महीने, 26 मार्च को नई दिल्ली में जारी किया गया। ‘आपकी आवाज, हमारा संकल्प’ नाम से जारी घोषणा पत्र में कांग्रेस ने देश के मतदाताओं को लुभाने बड़े-बड़े वादे किये हैं। मसलन 5 साल में 10 करोड़ युवाओं को प्रशिक्षण एवं रोजगार के अवसर, स्वास्थ्य सुविधाओं एवं आवास का अधिकार, बुजुर्गों एवं शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए सावधि पेंशन योजना, शहरों में रहने वाले झुग्गी-झोपड़ियों को 2017 तक पक्के मकान और सन् 2020 तक 10 करोड़ नए रोजगार का सृजन। इन लोकलुभावन संकल्पों से आम मतदाताओं को अवगत कराने की मुख्य जिम्मेदारी पार्टी कार्यकर्ताओं एवं प्रत्याशियों की है किंतु यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि पार्टीजन और प्रत्याशी घोषणापत्र का न तो महत्व को समझ पा रहे हैं न ही उसके प्रस्तावों से पूर्णत: अवगत हैं। यही कारण है कि कांग्रेस प्रत्याशियों के जनसम्पर्क अभियान एवं सभाओं  में घोषणापत्र के संकल्पों का जिक्र या तो होता ही नहीं है या होता भी है तो सतही तौर पर। दोनों पार्टियों के प्रत्याशियों का पूरा जोर केवल आरोप-प्रत्यारोप पर है।

पूर्व लोकसभा चुनावों की तुलना में इस बार प्रत्याशियों का प्रचार स्थानीय स्तर पर सिमटकर रह गया है। आमतौर पर लोकसभा चुनावों में राष्ट्रीय मुद्दों पर बात की जाती है। प्रादेशिक एवं स्थानीय मुद्दे भी होते हैं लेकिन इस बार प्रचार में स्थानीयता हावी है और यह ठीक भी है। लेकिन राज्य के मतदाता जानना चाहते हैं कि पिछले चुनावों में निर्वाचित सांसदों ने क्षेत्र के विकास के लिए क्या किया? रायपुर लोकसभा से 6 बार चुने गए भाजपा सांसद रमेश बैस, प्रदेशाध्यक्ष विष्णुदेव साय, दिनेश कश्यप तथा एक से अधिक बार चुने गए अन्य सांसदों ने क्या कुछ ऐसा किया है जिससे जनता को राहत मिली हो, उन्हें सुविधाएं मिली हों, उन्हें रोजगार मिलता हो, या नए उद्योग-धंधे खुले हों? या पेयजल, ग्रामीण स्वास्थ्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने योगदान दिया हो या छत्तीसगढ़ में रेल यातायात की सुविधाएं बढ़ाने में केन्द्र पर दबाव बनाने में कामयाब हुए हों? या नक्सलवाद से निपटने सार्थक पहल की हो? दरअसल सांसद के रूप में किसी के खाते में कोई उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं हैं। और तो और सांसद निधि के तहत मिलने वाली करोड़ों रुपए की राशि का सदुपयोग नहीं हुआ तथा अपनों को उपकृत किया गया। ये सारे सवाल मतदाताओं को मथ रहे हैं। लेकिन वे खामोश हैं। यह प्रत्याशियों के लिए राहत की बात है कि छत्तीसगढ़ के मतदाता कोई जवाब-तलब नहीं कर रहे हैं। यदि जवाब-तलब का दौर शुरू हो जाए तो वे मुश्किल में पड़ जाएंगे। बहरहाल आमतौर पर राज्य में ऐसी घटनाएं काफी कम होती हैं जब चुनाव प्रचार के दौरान प्रतिरोध की वजह से प्रत्याशियों को उल्टे पैर लौटना पड़ता हो। चूंकि सांसद निष्क्रिय हैं इसलिए स्थानीय मुद्दे भी मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर पा रहे हैं। वे फिलहाल उदासीन बने हुए हैं। उनकी उदासीनता मतदान के दिन किस तरह टूटेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता है अलबत्ता यह निश्चित प्रतीत होता है कि डॉ.रमन सिंह का सभी 11 सीटें जीतने का सपना पूरा होता नहीं दिख रहा है।

Wednesday, April 2, 2014

चंदू और जोगी

इसमें जरा भी संदेह नहीं कि अजीत जोगी कुशल रणनीतिकार हैं। चुनावी शतरंज की बिसात पर वे अपने मोहरे कुछ इस तरह चलते हैं कि प्रतिद्वंद्वी की सारी आक्रामकता हवा हो जाती है और उसका पूरा ध्यान मात से बचने में लग जाता है। महासमुंद में यही हो रहा है। अजीत जोगी के सामने भाजपा के चन्दूलाल साहू हैं जिन्हें अपनी सीट बचाने की चिंता है। जोगी है कि शह पर शह देते जा रहे हैं। अपनी उम्मीदवारी की अधिकृत घोषणा होते ही उन्होंने पहला पांसा फेंका। उनके राजनीतिक इशारे को समझते हुए महासमुंद से एक-दो नहीं 10-10 चन्दूलाल साहुओं ने नामांकन दाखिल किया और उसके बाद वे गायब हो गए। लौटे तभी जब नाम वापसी की तारीख निकल गई। अब महासमुंद में भाजपा के चंदूलाल साहू के हमनाम 10 उम्मीदवार हैं जो कुछ और नहीं तो कुछ हजार वोट तो खराब कर ही सकते हैं। जोगी की रणनीति का यह कोई नया दांव नहीं है। इस तरह के चुनावी हथकंडे पहले भी आजमाये जाते रहे हैं। नवम्बर 2013 में सम्पन्न हुए राज्य विधानसभा चुनाव में बृजमोहन अग्रवाल के रायपुर दक्षिण से 19 मुस्लिम प्रत्याशियों को खड़ा कर दिया गया था। इसका मकसद सिर्फ इतना ही है कि मतदाताओं के सामने भ्रम की स्थिति पैदा कर जाति विशेष के वोट विभाजित किए जाएं। लोकसभा चुनाव में चूंकि बड़ी संख्या में मतदाता ग्रामीण अंचलों से होते हैं इसलिए वे भ्रम के शिकार हो सकते हैं। और होते भी हैं। इस चुनाव में उम्मीदवारों को लेकर महासमुंद जैसी स्थिति राज्य के और किसी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में नहीं है। जाहिर है यह चुनावी रणनीति का हिस्सा हैं। हालांकि जोगी भाजपा के इस आरोप से इंकार करते हैं कि उनके इशारे पर चंदूलाल साहूओं को निर्दलीय के रूप में खड़ा किया गया है लेकिन इसमें शक नहीं है यह उनकी सुविचारित नीति के अनुसार ही है। इससे भाजपा प्रत्याशी को कुछ हजार वोटों का नुकसान होना तय है। यद्यपि औसतन 17-18 लाख मतदाताओं की भारी-भरकम संख्या में कुछ हजार वोटों का कोई मूल्य नहीं है पर यह नहीं भूलना चाहिए कि जब फैसला बहुत कम वोटों के अंतर से होता है तो विभाजित वोट मायने रखते हैं। इस सन्दर्भ में सन् 1991 में रायपुर से कांग्रेस की टिकट पर निर्वाचित पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं राज्य के प्रभावशाली नेता विद्याचरण शुक्ल का हवाला दिया जा सकता है जो भाजपा के रमेश बैस के खिलाफ मात्र 981 वोटों से जीत पाए थे।

बहरहाल महासमुंद लोकसभा के साहू वोटों को विभाजित करने की यह तिकड़म जोगी के कितने काम आएगी, फिलहाल कहा नहीं जा सकता लेकिन वे जानते हैं जातिगत समीकरण का हर चुनाव में महत्व होता है। चूंकि इस लोकसभा क्षेत्र में साहू मतदाता बड़ी संख्या में हैं, और यदि उनका ध्रुवीकरण होता है तो जोगी मुसीबत में पड़ सकते हैं इसीलिए वे राजनीति की तरकश के अपने सारे तीर आजमाना चाहते हैं। अपने जनसम्पर्क अभियान एवं ग्रामीण सभाओं में वे अपने भाषणों के जरिए मतदाताओं को लुभाने की भरपूर कोशिश करते हैं। मसलन वे अपने आप को ग्रामीणों का ‘कमिइया’ बताते हैं यानी उनके लिए मेहनत मजदूरी करने वाला। सन् 2004 के राज्य विधानसभा के चुनाव के दौरान जब वे मुख्यमंत्री थे, उस समय भी उनके बोल यही थे। अपनी लच्छेदार बातों से वे मतदाताओं की भावनाओं को पंख देते हैं। इसीलिए महासमुंद में उन्हें ‘मायावी’ कहा जाता है जिसके सम्पर्क में जो भी आता है, वह उनका हो जाता है। वाकपटुता में माहिर जोगी अपने निकटतम भाजपा प्रतिद्वंद्वी से बहुत आगे हैं। उन्होंने साहू वोटरों में सेंध लगाने के साथ-साथ पिछड़े वर्ग के गैर साहू वोटों पर ध्यान केन्द्रित किया है। जो आमतौर पर साहू प्रत्याशी के विरोध में वोट करते हैं। सरायपाली, बसना, बिन्द्रानवागढ़, खल्लारी के अनुसूचित जाति-जनजाति के वोटों पर भी उन्हें पूरा भरोसा है। कांग्रेस के इस वोट बैंक पर व्यक्तिगत रूप से जोगी की पकड़ अच्छी है। यद्यपि महासमुंद लोकसभा की 8 विधानसभा सीटों में से 6 पर भाजपा का कब्जा है और एक निर्दलीय विधायक भी भाजपा के पक्ष में काम कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद जोगी निश्चिंत हैं क्योंकि कार्यकर्ताओं की फौज के साथ-साथ उन्हें अपने चुनाव प्रबंधन पर भी पूरा भरोसा है जो नैतिक-अनैतिक की परवाह नहीं करतीं।

राजनीतिक हैसियत की दृष्टि से भी जोगी अपने प्रतिद्वंद्वी पर भारी हैं। उनके लिए एक और अच्छी बता है कि मोदी फैक्टर का असर नहीं है अलबत्ता राज्य सरकार के जनहितकारी फैसलों से मतदाता जरूर प्रभावित हैं। यानी यहां रमन फैक्टर ज्यादा असरकारक है। इसीलिए जोगी ने ‘भावनात्मक दोहन’ को अपना प्रमुख हथियार बना रखा है। उनकी शारीरिक असशक्तता भी उनके प्रति आकर्षण का भाव पैदा करती है क्योंकि व्हील चेयर पर बैठा व्यक्ति राजनीतिक रूप से मजबूर नहीं मजबूत है, यह उन्होंने सिद्ध किया है।