Wednesday, December 10, 2014

पहले से कुछ बेहतर की उम्मीद

रायपुर साहित्य महोत्सव

- दिवाकर मुक्तिबोध

12 दिसंबर से प्रारंभ हो रहे तीन दिवसीय साहित्य महोत्सव के तनिक विवादित होने के बाद अब सवाल है कि गंभीर वैचारिक अनुष्ठान के जिस लक्ष्य को लेकर इसका आयोजन किया जा रहा है वह पूरा होगा अथवा नहीं। देश के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यिक मनीषियों की मौजूदगी में प्रादेशिक साहित्यिकों, साहित्यप्रेमियों एवं लोक कलाकारों को विचार-विमर्श के लिए एक सार्थक मंच उपलब्ध कराना आयोजन का दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य है। यह उद्देश्य भी पूरा होगा या नहीं इस बात का पता तीन दिन तक चलने वाले 53 सत्रों में उपस्थित श्रोताओं की सक्रिय एवं वैचारिक भागीदारी से स्पष्ट हो सकेगा। महोत्सव पर विवाद की परछाइयां मूलत: राजनीतिक हैं तथा उन दो-तीन बड़ी घटनाओं की वजह है जिसने समूचे जनमानस को उद्वेलित, चिंतित और गमगीन कर रखा है। बिलासपुर जिले में आयोजित नसबंदी शिविर में आॅपरेशन के बाद हुई मौतें, जहरीली दवा सिप्रोसिन का प्रदेश के बाजारों में फैलाव, उसके सेवन से स्वास्थ्यगत समस्याएं एवं कुछ का प्राणांत, दवा वापस लेने के तमाम सरकारी प्रयासों के बाद भी ग्रामीण बाजारों में उसकी उपलब्धता तथा सुकमा नक्सल हमले में सीआरपीएफ के जवानों का मारा जाना भीषण त्रासदी के रुप में है और प्रदेश की जनता इससे उबर नहीं पाई है लिहाजा शोक के इस माहौल के बीच रायपुर साहित्य महोत्सव का आयोजन कुछ खटकने वाला जरुर है लेकिन यह भी सत्य है कि भीषण से भीषण त्रासदियों के बावजूद जिंदगी चलती रहती है। न  वह रुकती है और न ही कोई ठहराव आता है अलबत्ता दु:ख और शोक की अनुभूतियां ठंडी नहीं पड़ती। वह सालों-साल मन को सालती रहती है और एक अव्यक्त शोक मन के किसी कोने में फड़फड़ाता रहता है। किन्तु रायपुर साहित्य महोत्सव का आयोजन चूंकि काफी पूर्व  से नियोजित था, लिहाजा इसे भावनात्मक आधार पर स्थगित करने या रद्द करने का कोई तार्किक आधार नहीं था और फिर चूंकि यह राज्य के गठन के 13 वर्षों बाद पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर हो रहा है इसलिए इस वैचारिक अनुष्ठान का अपना महत्व है जो अंतत: समाज, जनसाहित्य और जनसंस्कृति के अंतर संबंधों और उसके विकास में प्रेरक की भूमिका के रुप में दर्ज होने वाला  है, बशर्ते उसकी सफलता असंदिग्ध बनी रहे।
     चूंकि सरकार के स्तर पर आयोजित होने वाले साहित्यिक -सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ विवाद का रिश्ता काफी पुराना है और वह साथ ही साथ चलता है अत: स्वाभाविक था रायपुर साहित्य महोत्सव भी विवादों से परे नहीं रहता लेकिन दिक्कत यह है कि विवाद वैचारिकता के स्तर पर और आयोजन में आमंत्रित विशिष्ट वक्ताओं के चयन एवं उनकी प्रतिबद्धता की वजह से नहीं बल्कि राजनीति के कारण है, यह अलग बात है कि इसे भावनात्मकता से जोड़ दिया गया है। राजनीति में भी केवल कांग्रेस ही अकेली पार्टी है जिसे यह आयोजन गंवारा नहीं। दरअसल इसके पीछे भी उसकी राजनीतिक मजबूरियां हैं। राज्य में नगर निकायों के चुनाव सिर पर है तथा पार्टी ने पिछली घटनाओं को लेकर सरकार की नाक में दम कर रखा है। धरना, प्रदर्शन, धान खरीदी पर सरकार की कथित जनविरोधी नीतियां, गर्भाशय कांड, नसबंदी कांड, स्वास्थ्य विभाग में उपकरणों की खरीदी में करोड़ों के घपले, बस्तर में नक्सली हमले में हुई मौतें और इससे निपटने में सरकार विफलता, आदि-आदि मुद्दों को पार्टी आगामी निकाय चुनावों में पूरी तरह से भुनाने की कोशिश में है और इसी संदर्भ में उसे रायपुर साहित्य महोत्सव का मुद्दा हाथ लगा है। इसीलिए उसके विरोध के स्वर तेज है तथा उसका प्रयास है आयोजन में आमंत्रित देश के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार और लोकरंग से जुड़े विशिष्ट लोग रायपुर न आए। पार्टी इस मामले में किस कदर गंभीर है, इसका पता इस बात से भी चलता है कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भूपेश बघेल ने स्वयं टेलीफोन पर सर्वश्री अशोक वाजपेयी, प्रयाग शुक्ल, अपूर्वानंद, नंदकिशोर आचार्य सहित सभी प्रख्यात साहित्यिकों से आयोजन में शामिल न होने की अपील की। तर्क वहीं दिया गया कि राज्य में शोक का माहौल है, शहीदों की अभी तेरहवीं भी नहीं हुई है तथा राज्य आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है अत: ऐसी परिस्थतियों में उनका आना उचित नहीं रहेगा। कांग्रेस अध्यक्ष के इस अनुरोध पर आमंत्रित साहित्यकारों ने किस तरह प्रतिक्रिया व्यक्त की, यह स्पष्ट नहीं है पर यह तय है कि इसने एक संशय का निर्माण तो कर दिया है। संभव है इसके चलते तथा विवाद से बचने के लिए कुछ आमंत्रित वक्ता अपना इरादा बदल दें। वे न आएं। लेकिन इस घटना से भी एक बात पूर्णत: स्पष्ट है कि कांग्रेस का विरोध तार्किक कम राजनीतिक ज्यादा है। शोक का हवाला देकर उसने यह साबित कर दिया है कि  उसका उद्देश्य हर सूरत में त्रासद घटनाओं से सरकार को कटघरे में खड़ा करना है और इसके लिए एक और बहाने के रुप में सरकार द्वारा पोषित साहित्य महोत्सव हाथ लगा है। निश्चिय ही पार्टी को यह सब करने की जरुरत नहीं थी  क्योंकि कांग्रेस नेताओं के विरोध के बाद आयोजनकर्ता, सरकार के जनसंपर्क विभाग ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों को रद्द कर दिया और उसे विमर्श तक सीमित कर दिया है। यह बेहतर है क्योंकि राज्य में एक दशक से सत्तारुढ़ भाजपा सरकार का लोक विमर्श से नाता कम ही रहा है और सरकारी विज्ञापनों में उसका दावा भी है कि राज्य में पहली बार लोक साहित्य की बहार आई है।
           बहरहाल यह अच्छी बात है कि साहित्य और संस्कृति के आयोजनों को राजनीतिक चश्मे से देखने एवं उसके अनुसार साहित्यिक व्यवस्थाएं बनाने के बजाय विचारों को प्रधानता दी जा रही है। रायपुर साहित्य महोत्सव में गैर दक्षिणपंथी विचारकों को भी आमंत्रित करना इस बात का प्रमाण है कि भाजपा सरकार संकीर्णता के घेरे से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है जिसकी शुरुआत अब जाकर हो रही है हालांकि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह पहल आगे भी जारी रहेगी क्योंकि जनता को धर्म की घुट्टी पिलाने के लिए यह कोई राजिम कुंभ मेला नहीं है जिस पर राज्य सरकार प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए खर्च करती है और पार्टी के सत्ता में रहते आगे भी करती रहेगी।
           लोक साहित्य आयोजन के परिप्रेक्ष्य में यह कहना अप्रसांगिक नहीं होगा मीडिया का एक वर्ग जो भाजपा की सत्ता में अपने लिए खुशहाली देखता है, अब यह राग अलापने लगा है कि वामपंथी विचारकों और साहित्यकारों का जैसा सम्मान छत्तीसगढ़ में हो रहा है, वैसा देश के किसी और राज्य में नहीं। इसके उदाहरण के रुप में प्रख्यात कवि एवं लेखक स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध का हवाला दिया जा रहा है और यह कहा जा रहा है कि उनके वामंपथी रुझान के बावजूद मुख्यमंत्री डॉ.  रमन सिंह ने पिछले 11 वर्षों में अपने राज में मुक्तिबोध के सम्मान को सरकारी एवं सार्वजनिक स्तर पर बढ़ाया है और उन्हें सर्वाधिक महत्व दिया है। यह कितना सच है, इसका खुलासा इस बात से हो जाता है कि सन् 2000 में नया राज्य बनने के बाद से अब तक मात्र दो या तीन बार सरकार के स्तर पर कार्यक्रम हुए अलबत्ता निजी साहित्यिक संस्थाएं अपने स्तर पर प्रति वर्ष पुण्यतिथि एवं जयंती पर कार्यक्रम करती रहीं। चूंकि स्वर्गीय कवि की 50वीं पुण्यतिथि एवं प्रसिद्ध कविता ‘अंधेरे में ’ के 50 वर्ष भी इसी वर्ष पूरे हुए हैं इसलिए देशभर में साहित्य समारोह के जरिए उन्हें याद किया जा रहा है। मुक्तिबोधजी का अंतिम समय छत्तीसगढ़ में गुजरा है अत: पचासवें पर उन्हें पूरी प्रखरता से याद करना बहुत स्वाभाविक है।
        बहरहाल भाजपा सरकार ने प्रदेश के साहित्यकारों, कलाकारों, रंगकर्मियों एवं लेखकों को देश के मूर्धन्य रचनाकारों के सान्निध्य के साथ-साथ विचारों के आदान-प्रदान के लिए जो अवसर उपलब्ध कराया है, वह एक लोकतांत्रिक सरकार की सही भूमिका को दर्शाता है। ऐसे समय जब असहमतियों को सिरे से खारिज करने का दौर चला हुआ हो और जब विचारों को जानने-समझने की सहनशीलता जवाब दे रही हो, तब लोक साहित्य संवाद जैसे आयोजन निश्चय ही पहले से कुछ बेहतर की संभावना को जगाते है।

Tuesday, December 2, 2014

इस तरह जड़ों से नहीं कटेंगे नक्सली

-दिवाकर मुक्तिबोध

यह तो होना ही था। सुकमा जिले के धुर नक्सली क्षेत्र चिंतागुफा से कुछ किलोमीटर दूर कसलपाड़ में सीआरपीएफ की दो टुकड़ियों को घेरकर नक्सलियों ने जो हमला किया वह कोई नई रणनीति के तहत नहीं था। घात लगाकर गोलियां बरसाने जैसी वारदातें जिसमें जनहानि सुनिश्चित रहती हैं, वे पहले भी कई बार कर चुके हैं। इस बार भी उन्होंने ऐसा ही किया। सर्चिंग आॅपरेशन के लिए निकले केन्द्रीय रिजर्व पुलिस के जवानों को बड़े आराम से अपनी मांद में घुसने दिया और जैसे ही वे टारगेट में आए उन पर गोलियां बरसा दीं। जाहिर है, एकाएक हुए इस हमले में जवानों को संभलने या मोर्चा लेने का मौका नहीं मिला, लिहाजा फटाफट गोलीबारी में 2 अफसरों सहित 13 जवान मारे गए। इस घटना के साथ ही नक्सली यह संदेश देने में कामयाब रहे कि उनकी शक्ति भले ही क्षीण हो गई हो लेकिन मारक क्षमता में किसी तरह की कोई कमी नहीं आई है इसलिए यदि छत्तीसगढ़ सरकार आत्मसमर्पण  करने वाले दूसरी-तीसरी पंक्ति के नक्सलियों की भारी भरकम संख्या देखकर मुदित हो रही हो, तो ऐसा करने का उसे हक है लेकिन नक्सली हिंसकों को बस्तर से समूल नष्ट करने का उसका मकसद कम से कम अर्द्ध सैनिकों एवं पुलिस के जवानों के बूटों से बस्तर के जंगलों को रौंदकर तो  पूरा नहीं हो सकता।
       दरअसल कसलपाड़ की घटना यकीनन आकस्मिक नहीं थी। नक्सली यदि एक दिसंबर को इस घटना को अंजाम नहीं देते तो वे आगे किसी भी दिन इसी तरह की हिंसा या इससे भयावह हिंसा करते क्योंकि ऐसा करना बस्तर में अपने अस्तित्व के अहसास को कायम रखने एवं राज्य पुलिस एवं केन्द्रीय बलों के बीच खौफ पैदा करने के लिए जरुरी था। इस घटना के बाद अब राज्य एवं केन्द्र सरकार एक बार फिर इस राष्ट्रीय समस्या पर विचार करने मजबूर हो गई है जैसे कि प्रत्येक बड़ी घटना के बाद होती रही है किन्तु हर उच्च स्तरीय बैठकों के बावजूद निष्कर्ष कुछ नहीं निकलता और विचारों की पुनरावृत्ति भर होती  है। माओवादियों के खिलाफ रणनीति में कोई सुधार हुआ हो या उसमें नयापन आया हो, ऐसा कभी नजर नहीं आया जबकि बीते वर्षों में कई बड़ी घटनाएं घटी और नक्सली हमले में सैकड़ों जवान और आम आदमी मारे गए। रणनीति के स्तर पर यही होता रहा है - मसलन नक्सली क्षेत्रों में विकास कार्य, आधुनिक संचार प्रणाली का विकास, आधारभूत संरचनाओं का विकास जिसमें मुख्यतरू सड़कें है, शिक्षा का प्रचार-प्रसार, जागरुकता अभियान, आदिवासियों को भयमुक्त करने अभियान तथा उनके लिए नौकरियों की व्यवस्था। माओवादियों से संवाद सरकार की अंतिम प्राथमिकता है। लेकिन नवंबर 2000 में नया राज्य बनने के बाद बीते 13 वर्षों में छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा में भयावह वृद्धि क्यों हुई, इसका जवाब राज्य सरकार के पास नहीं है क्योंकि रणनीतिक स्तर पर जो कार्य योजना तय हुई है, उस दिशा में बस्तर में कुछ खास नहीं हुआ। भले ही राज्य सरकार यह कहकर अपनी पीठ थपथपाती रहे कि उसने हिंसाग्रस्त सरगुजा संभाग को नक्सली मुक्त कर दिया है लेकिन बस्तर का क्या? बीते 40 वर्षों से वह हिंसा के दंश को झेल रहा है। निरपराध आदिवासियों की मौतें देखता रहा है। क्या यह सिलसिला कभी थमेगा या हिंसा का दौर ऐसे ही जारी रहेगा, भले ही पुलिस या अर्धसैनिक बलों के जवान ही क्यों न मारे जाएं।
          बस्तर में नक्सली हिंसा के संदर्भ में जैसा कि अमूमन होता रहा है, कसलपाड़ घटना भी लापरवाही की चूक है। इसमें कोई शक नही कि राज्य सरकार की परिवर्तित पुनर्वास नीति, जिसमें आर्थिक मुआवजे में जबर्दस्त उछाल लाया गया है, की वजह से नक्सलियों के समर्पण की घटनाओं में खासी वृद्धि हुई है। लेकिन यह पुलिस के दबाव की वजह से कम, माओवादियों के बीच चल रहे आंतरिक द्वंद की वजह से ज्यादा है। फिर भी भारी भरकम मुआवजे की लालच में एवं सरकारी नौकरी के साथ नए सिरे से जीवन प्रारंभ करने की ललक ने आत्मसमर्पण को बढ़ावा मिला है। नक्सल प्रभावित अन्य राज्यों की तुलना में छत्तीसगढ़ में शस्त्र डालने एवं आत्मसमर्पण की घटनाएं बढ़ी है। हाल ही में लोकसभा में गृह राज्यमंत्री किरेन रिजूजू के द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष 11 नक्सल प्रभावित राज्यों में कुल 472 उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण किया जिससे आधे से भी ज्यादा 247 अकेले छत्तीसगढ़ के है। पिछले आंकड़े देखे तो 2011 में 394  आत्मसमर्पितों में से छत्तीसगढ़ से 20 थे जबकि सन 2012 में 445 में से 26 तथा 2013 में 283 में से केवल 28 नक्सलियों ने हथियार डाले। यानी इस संख्या में इस वर्ष बहुत तेजी आई। लेकिन यह सवाल अपनी जगह कायम है कि आत्मसमर्पण में वर्ष दर वर्ष बढ़ोतरी के बावजूद क्या बस्तर या देश से नक्सली आतंक खत्म हो जाएगा? क्या बंदूक की नोक पर ऐसा होगा?
          केन्द्र में सत्तारुढ़ होने के तुरंत बाद मोदी सरकार के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने नक्सली समस्या को अपनी कार्य सूची में टॉप पर रखा तथा तद्नुसार उच्च स्तरीय बैठकों का भी सिलसिला शुरु हुआ। इस समस्या पर नई राष्ट्रीय नीति की भी परिकल्पना की गई जिसे अमलीजामा पहिनाने की कोशिशें भी प्रारंभ है लेकिन इसके साथ ही नक्सल प्रभावित राज्यों की सरकार को भी पूरी छूट दी गई है कि वे अपने स्तर इस समस्या पर निपटे तथा इसके लिए केन्द्र ने हर तरह की सहायता उपलब्ध कराने का वायदा किया है। चूंकि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद सबसे भीषण है अतरू केन्द्र का पूरा ध्यान इस राज्य पर है किन्तु इसके बावजूद बस्तर में हिंसा इसलिए नहीं थम रही है क्योंकि वहां के आदिवासियों को अपनी सुरक्षा को लेकर सरकार पर विश्वास नहीं है।  वे अभी भी नक्सली आतंक के साए में जी रहे हैं। नक्सलियों को पनाह देना उनकी मजबूरी है। यह इसलिए कि आखिरकार माओवादी सुरक्षा देने के साथ-साथ उन्हें सरकारी शोषण से मुक्त कराते हैं। प्रायरू हर घटना में उन्होंने घात लगाकर जो हमले किए या बारुदी विस्फोट किए वे गांव क्षेत्रों से दूर थे। अतरू कसलपाड़ घटना के संदर्भ में केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह का यह कहना कि नक्सलियों ने स्थानीय निवासियों का ढाल की तरह इस्तेमाल किया और इस वजह से सीआरपीएफ गोली का जवाब गोली से नहीं दे सकी, सही प्रतीत नहीं होता।
नक्सल मोर्चे पर अब जो स्थितियां नजर आ रही हंै उससे यह धारणा बनती है कि बस्तर में अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जूझ रहे माओवादियों के निशाने पर सिर्फ पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान है। हालांकि गांवों में आतंक कायम रखने वे निरअपराध आदिवासियों की जान लेते रहे है। आंकड़े बताते है कि सन 2009 में 586, 2010 में 713, 2011 में 275, 2012 में 146 और 2013 में 123 नागरिक अपनी जान से हाथ धो बैठे। इनमें से अधिकांश छत्तीसगढ़ के हैं। गांव वालों को सबक सीखाने एवं उन्हें पुलिस से दूर रखने के लिए मुखबिरों को जनअदालतें लगाकर निर्मम हत्याएं करना माओवादियों का शगल रहा है। यद्यपि अब ऐसी घटनाएं कम हुई हंै पर बस्तर में तैनात पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवानों को मारना एवं उनके हथियार लूटना उनकी प्राथमिकता है। जाहिर है यह सरकार के साथ अघोषित युद्ध है।
            बहरहाल इस समस्या से निपटने के लिए तेज गति से काम करने की जरुरत है। इस मुगालते में रहना कि माओवादियों की कमर टूट गई, घातक है। कसलपाड़ की घटना से पुनरू यह सबक है कि नक्सल फ्रंट पर थोड़ी सी भी लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जा सकती। नक्सल रणनीतिकार जैसा कि अक्सर बताते है- चहुंओर से प्रयत्न करने की आवश्यकता है। मसलन आदिवासी क्षेत्रों का सर्वागीण विकास, बेहतर संचार प्रणाली, पुलिस का बेहतर सूचना तंत्र और आदिवासियों का विकास जो व्यवस्थागत खामियों के चलते सबसे कठिन और सबसे ज्यादा जरुरी है। लेकिन साथ ही एक सर्वमान्य फार्मूले के तहत माओवादियों से संवाद व उन्हें मुख्य धारा में शामिल करने के पुरजोर प्रयत्न। सरकार पर चूंकि माओवादियों का विश्वास नहीं है इसलिए ज्यादा अच्छा होगा गैर सरकारी संगठन एवं संस्थाएं अथवा मानवतावादी एवं माओवादी विचारक सुलह वार्ता के लिए मध्यस्थता करने की जिम्मेदारी उठाएं। यकीनन नक्सल समस्या का एक मात्र हल यही है।

Sunday, November 30, 2014

सन्नाटे में बीता क्रिकेट का एक दिन, उठे कई सवाल

- दिवाकर मुक्तिबोध
क्रिकेट में इन दिनों कुछ ठीक नहीं चल रहा है। दो बड़ी घटनाएं घटी हैं। दोनों स्तब्धकारी एवं क्रिकेट, क्रिकेटरों व क्रिकेट प्रेमियों के लिए चिंतनीय। आस्ट्रेलिया के युवा प्रतिभाशाली बल्लेबाज फिलिप ह्यूज की सिर पर गेंद टकराने से मौत व भारत में सु्प्रीम कोर्ट का मुद्गल कमेटी रिपोर्ट पर की गयी टिप्पणियां जिसमें उसने चैन्नई सुपर किंग्स (सीएसके) की मान्यता रद्द करने व उसे आईपीएल से बाहर का रास्ता दिखाने कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ और भी कड़ी टिप्पणियां की हैं और इसके घेरे में सीएसके एवं भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी भी आए हैं। ये दोनों ही घटनाएं विचलित करने वाली हैं।
          भारतीय क्रिकेट टीम इस समय आस्ट्रेलिया के दौरे पर हैं तथा उसे चार टेस्ट मैचों की श्रृंखला के बाद त्रिकोणीय एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच भी खेलने हैं और फिर कुछ दिनों बाद वर्ल्डकप में हिस्सा लेना है। फिलहाल टीम की कमान विराट कोहली के हाथ में हैं। वे 4 दिसंबर से ब्रिस्बेन में प्रारंभ होने वाले पहले टेस्ट के भी कप्तान हैं क्योंकि पूर्णकालिक कप्तान महेंद्र सिंह धोनी अभी चोट से पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं। टीम ने एक अभ्यास मैच खेला है जिसमें उसका प्रदर्शन बेहतर रहा है। लेकिन इस उत्साहवर्धक माहौल में गम की परछाइयां तब घनी हो गई जब 25 नवंबर को सिडनी में शेफिल्ड-शील्ड के एक मैच के दौरान फिलिप ह्यूज एक बाउंसर से गंभीर रूप से घायल हो गए और अंतत: 27 नवंबर को उनकी मौत हो गई। दक्षिण आस्ट्रेलिया के लिए खेल रहे ह्यूज के हेलमेट पर न्यू साउथवेल्स के गेंदबाज शॉन एबॉट की गेंद जोर से टकराई थी। ह्यूज की मौत से जाहिर है आस्ट्रेलिया क्रिकेट ही नहीं समूचा क्रिकेट जगत सन्नाटे में है और खिलाड़ियों की सुरक्षा को लेकर उनकी चिंताए बढ़ गई हैं। यद्यपि क्रिकेट मैचों के दौरान बुरी तरह जख्मी होने अथवा मौत की पहले भी कई घटनाएं हो चुकी हैं और प्राय: हर घटना के बाद क्रिकेट प्रबंधकों ने क्रिकेटरों की सुरक्षा पर नए सिरे से विचार किया है। और तद्नुसार नियमों में तब्दीलियां भी की हैं। जाहिर है ह्यूज के मामले में भी सुरक्षा के उपायों पर पुन: गौर किया जाएगा। इस घटना के बाद जो तथ्य सामने आए हैं, उनके अनुसार यह कुछ हद तक लापरवाही एवं बहुत कुछ इंसानी फितरत का परिणाम है जो प्राय: अपनी सुरक्षा के प्रति गाफिल रहती है। बताया गया है कि फिल ह्यूज ने जो हेलमेट पहनी थी, वह पुराने मॉडल की थी जिससे सिर के पीछे का हिस्सा ठीक तरह से कव्हर नहीं होता। हालांकि इस हेलमेट की आस्ट्रेलियाई निर्माता कम्पनी मसूरी हेलमेट ने दावा किया है कि उसका नया माडल समूचे सिर की सुरक्षा करता है। बहरहाल यह जांच की विषय है तथा फिलहाल आस्ट्रेलियाई क्रिकेट के लिए भारत के साथ भावी टेस्ट श्रृंखला एक अव्यक्त शोक के बीच खेली जाने वाली है।
         इधर आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग एवं सट्टेबाजी के मामले में मुकुल मुद्गल कमेटी की रिपोर्ट एवं उसके तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों से भारतीय क्रिकेट हैरान-परेशान है। कमेटी ने 17 नवंबर 2014 को सुप्रीम कोर्ट को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपी थी जिस पर सुनवाई जारी है। 27 नवंबर को कोर्ट ने पूछा भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के निर्वासित अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन को चुनाव लड़ने और उनकी मालिकाना टीम चैन्नई सुपर किंग्स को क्यों न अयोग्य ठहरा दिया जाए? बैंच ने कहा- श्रीनिवासन का बीसीसीआई अध्यक्ष होना और आईपीएल की एक टीम चैन्नई का मालिक होना, हितों का टकराव है। जब चैन्नई सुपर किंग्स के अधिकारी गुरूनाथ मय्यपन सट्टेबाजी के दोषी पाए गए हैं तो बीसीसीआई ने अपने कायदे कानून के तहत कार्रवाई क्यों नहीं की? क्यों नहीं उसने सीएसके को अयोग्य ठहराया? कोर्ट ने कहा- क्यों न बीसीसीआई के चुनाव होने दिए जाएं और मुद्गल कमेटी की रिपोर्ट में जिन खिलाड़ियों एवं खेल प्रशासकों के नामों का उल्लेख है, उन्हे इस चुनाव से क्यों न दूर रखा जाए। सुप्रीम कोर्ट अब आगामी 1 दिसम्बर को इस मामले में स्पष्ट निर्देश जारी करेगा। उसकी तल्ख टिप्पणियों से बीसीसीआई आहत है और अब उसके सामने निर्णायक कदम उठाने के अलावा कोई चारा नहीं है क्योंकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि मुद्गल कमेटी की जांच के बाद अब किसी और जांच की जरूरत नहीं है। इसका मतलब है चैन्नई सुपर किंग्स के आईपीएल से बाहर होने के पूरे आसार हैं तथा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट कांफ्रेंस (आईसीसी) के अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन के बीसीसीआई का पुन: अध्यक्ष बनने का ख्वाब चूर-चूर होने वाला है।
        इस बीच सुप्रीम कोर्ट की एक और टिप्पणी गौर करने लायक है जो धोनी के संबंध में है। कोर्ट ने चैन्नई सुपर किंग्स के कप्तान के साथ-साथ इंडिया सीमेंट के उपाध्यक्ष के रूप में उनकी दोहरी भूमिका पर चिंता जाहिर की है। इन दोनों के मालिक एन. श्रीनिवासन हैं। इसे देखते हुए आइपीएल 6 स्पॉट फिक्सिंग एवं सट्टेबाजी के मामले में धोनी भी संदेह से परे नहीं है। भले ही उनकी इसमें कोई भूमिका न हो फिर भी कुछ न कुछ कीचड़ तो उन पर उछलना स्वाभाविक है। सीएसके के मुख्य कर्ताधर्ता एवं एन. श्रीनिवासन के दामाद गुरूनाथ मयप्पन की इस मामले में संलिप्तता इसकी मुख्य वजह है।
          बहरहाल सन 2013 के आईपीएल फिक्सिंग के मामले में अगले कुछ दिनों में स्थितियां काफी स्पष्ट हो जाएंगी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है समय। फिक्सिंग पर कोर्ट का फैसला ऐसे समय आएगा जब धोनी की कप्तानी में भारतीय क्रिकेट टीम आस्ट्रेलिया से टक्कर लेगी। इसमें भी खास बात है वर्ल्ड कप जो आस्टेÑलिया-न्यूजीलैंड की संयुक्त मेजबानी में आयोजित होगा। इसकी शुरुआत 14 फरवरी 2015 से होने वाली है। और जिसके लिए बीसीसीआई खासी तैयारी कर रहा है ताकि वर्ल्ड कप के खिताब पर कब्जा बरकरार रखा जा सके। इस दृष्टि से टीम को तैयार करने में लगातार प्रयोग होते रहे हैंं और अब बेहतर युवा टीम धोनी की अगुवाई में मोर्चे पर निकल गई है। ऐसे में यदि धोनी अथवा चेन्नई सुपर किंग्स को लेकर कोर्ट का विपरीत फैसला आता है तो वह न केवल धोनी वरन पूरी टीम के मनोबल को प्रभावित करेगा। धोनी वैसे काफी ठंडे दिमाग के क्रिकेटर माने जाते हैं, किंतु खिलाफ टिप्पणियां भी कहीं न कहीं व्यक्ति को आंदोलित करती हैं। इसलिए ज्यादा बेहतर होता यदि मुद्गल कमेटी की रिपोर्ट पर फैसला थोड़ा ठहरकर आता या वर्ल्ड कप के बाद आता। यह ठीक है कि अप्रैल 15 से प्रारंभ होने वाला आईपीएल 8 टूर्नामेंट का कार्यक्रम इससे प्रभावित होता, किंतु वर्ल्ड कप की महत्ता को देखते हुए इसे आगे बढ़ाने में कोई दिक्कत नहीं होती।  बहरहाल अब फिक्सिंग पर फैसला आने को है। उम्मीद की जानी चाहिए विपरीत फैसलों एवं प्रतिकूल टिप्पणियों के बावजूद महेंद्र सिंह धोनी विचलित नहीं होंगे तथा वर्ल्ड कप की भारतीय उम्मीदों को जिंदा रखेंगे।

Friday, November 14, 2014

बर्खास्तगी,गिरफ्तारी,न्यायिक जांच के बाद आगे क्या?

नसबंदी हादसा


- दिवाकर मुक्तिबोध
बिलासपुर के कानन पेंडारी नसबंदी हादसे की न्यायिक जांच की घोषणा के साथ ही छत्तीसगढ़ सरकार ने संकेत दिया है कि दोषियों को सजा दिलाने के मामले में उसकी नीयत पर शक  करने की जरुरत नहीं है। बिलासपुर के कानन पेंडारी और गौरेला में सरकारी नसबंदी शिविरों में  आपरेशन के बाद अब तक 14 महिलाओं की मृत्यु हो चुकी है। मौत का सिलसिला यद्यपि अभी थमा है, लेकिन 122 अभी भी अस्पतालों में है जिसमें से कई की स्थिति गंभीर है। जन स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने  वाली यह अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी है जिसने राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। चूंकि परिवार नियोजन जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों को आयोजित एवं नियंत्रित करने की जिम्मेदारी अंतत: जिला प्रशासन की होती है लिहाजा इस मामले में वह भी अपनी  जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। इसीलिए सरकार ने घटना के चार दिनों के भीतर ही न केवल न्यायिक जांच की घोषणा की अपितु आॅपरेशन के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार डॉक्टर आर.के. गुप्ता एवं मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. एस सी.भांगे को निलंबित करने के बाद अंतत: बर्खास्त कर दिया। पिछली तमाम बड़ी घटनाओं मसलन बालोद एवं बागबाहरा मोतियाबिंद आॅपरेशन के बाद दर्जनों मरीजों के आंखों की रोशनी खोने का मामला हो या फिर अनेक जिलों में निजी चिकित्सालयों में स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत स्वीकृत राशि हड़पने के लिए जबरिया सैंकड़ों महिलाओं का गर्भाशय निकालने का प्रकरण हो या फिर कांकेर जिले के झलियामारी आदिवासी कन्या छात्रावास की छात्राओं का यौन शोषण हो, कार्रवाई के नाम पर केवल लीपापोती हुई, जांच का नाटक होता रहा, फौरी तौर पर कुछ कर्मचारियों का निलंबन हुआ  लेकिन अंतत: बिना माकूल सजा पाए सभी बहाल भी हो गए। दिलों को झंझोड़ने वाले उस दौर में भी जबरदस्त जन आक्रोश फूटा, राजनीतिक धरने-प्रदर्शन हुए किंतु सरकार की सेहत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। यकीनन नसबंदी हादसा और भी ज्यादा गंभीर है और सरकार के गले की हड्डी बन गया है लिहाजा फौरन एवं सख्त  कार्रवाई करना सरकार की मजबूरी है। इसीलिए प्रथम दृष्टया दोषी चिकित्सकों के निलंबन और बर्खास्तगी के साथ-साथ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने जैसे कदम उठाए गए और न्यायिक जांच की घोषणा की गई। लेकिन इसके साथ ही राज्य सरकार ने पीड़ितों को बेहतर चिकित्सा उपलब्ध कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दिल्ली, हैदराबाद से चिकित्सकों की टीमें आई जो स्थानीय चिकित्सकों के साथ मिलकर मौत से लड़ रही महिलाओं का सम्बल बनी हुई हैं।
           इन कार्रवाइयों के बावजूद सवाल है क्या सरकार अपने स्वास्थ्य मंत्री को भी बर्खास्त करने या, इस्तीफा देने बाध्य करने  या फिर उनका विभाग बदलने पर पुर्नविचार कर रही है? मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने चारों ओर से बढ़ते दबाव को देखते हुए इस मामले में अपने वरिष्ठ मंत्रियों तथा पार्टी संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों से विचार-विमर्श के बाद स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल को न हटाने का फैसला किया। इस फैसले के पीछे राजनीतिक कारण हैं क्योंकि पार्टी नेतृत्व का मानना है कि यदि स्वास्थ्य मंत्री से इस्तीफा लिया गया तो इससे सत्ता की राजनीति में गलत परंपरा की शुरूआत होगी। चूंकि कांग्रेस राजनीतिक दृष्टि से इस मौके को भुनाने की फिराक में है लिहाजा उसकी मांग को स्वीकार करने  का अर्थ है हथियार डालना। इसीलिए मुख्यमंत्री अपने स्वास्थ्य मंत्री को बचाने की भरसक कोशिश कर रहे है। घटना के तुरंत बाद दिया गया उनका  यह बयान बचकाना ही है कि आपरेशन डॉक्टर करते हैं, स्वास्थ्य मंत्री नहीं। लेकिन अब ग्रामीण विकास एवं पंचायत मंत्री अजय चंद्राकर ने नसबंदी हादसे के लिए सरकार की नैतिक जिम्मेदारी कबूल की है पर स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे के मुद्दे पर सरकार चुप है। यदि नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार की है तो अपने लिए सजा भी खुद तय करे या फिर घटना के लिए खेद व्यक्त करे। दरअसल जन-स्वास्थ्य के संदर्भ में पिछले तमाम हादसे एवं नसबंदी से हुई मौत की घटनाओं को देखते हुए अमर अग्रवाल को स्वयं होकर इस्तीफा देना चाहिए।  लेकिन वे कहते हैं कि वे अपने मामले में खुद फैसला नहीं लेते, उनके इस्तीफे पर पार्टी संगठन या सरकार को फैसला  करना है। मंत्री जब ऐसा बयान दे तो जाहिर सी बात है मुख्यमंत्री फैसला लेने में हिचकिचा रहे हैं। पर यह तय प्रतीत होता है कि कांग्रेस के आंदोलन की आग जैसे ही बुझेगी, मुख्यमंत्री मंत्रिमंडल के फेरबदल के बहाने या तो अमर अग्रवाल को विदा करेंगे या फिर उनका विभाग बदल देंगे। लेकिन इस दौरान इस मामले में सरकार की किरकिरी होती रहेगी और यह बात फिर सिद्ध होगी कि मुख्यमंत्री उचित समय पर उचित फैसले लेने से परहेज करते हैं। जबकि उनके पास जनता को संतुष्ट करने एवं इस हादसे से उबरने का अच्छा मौका है।
           सरकार को विलुप्त होती जनजाति बैगा समुदाय की दो महिलाओं की नसबंदी एवं उनकी मौत का भी जवाब देना है। केंद्र ने वर्ष 1998 से परिवार नियोजन कार्यक्रम के तहत बैगा, कमार, अबुझमाड़िया और बिरहीर जनजातियों के सदस्यों की नसबंदी पर प्रतिबंध लगा रखा है और ये जनजातियां संरक्षित घोषित है। ऐसी स्थिति में दो  बैगा महिलाओं की नसबंदी और उनकी मृत्यु सवालों के घेरे में है और आपराधिक मामला है। जाहिर है कि नसबंदी के आंकडेÞ जुटाने के लिए बिना देखे परखे, बिना पता-साजी किए महिलाओं को नसबंदी शिविरों में लाया गया। जबकि कायदे से शिविरों में लाई गई या स्वेच्छा से  आई तमाम महिलाओं का प्रोफाइल  चेक करने के साथ ही स्वास्थ्य परीक्षण किया जाना चाहिए और उसके बाद ही नसबंदी की जानी चाहिए।
          बहरहाल राज्य सरकार के सामने अब बड़ा सवाल है जनस्वास्थ्य के मामले में जनता का विश्वास कैसे अर्जित किया जाए। सरकारी अस्पतालों में तमाम दुरावस्थाओं और लूट खसोट के बावजूद राज्य की गरीब जनता उन्हीं पर आश्रित है। इस सहारे को चुस्त-दुरुस्त बनाना  राज्य सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है। यह तभी संभव है जब स्वास्थ्य विभाग का प्रशासन जनोन्मुखी और इमानदार हो। प्रशासन किस तरह चलता रहा है यह इसी बात से जाहिर है स्वास्थ्य संचालक आई.ए.एस. कमलप्रीत सिंह साढे तीन  साल तक इस पद पर बने और नसबंदी घटना के बाद हटाए गए। जबकि इस बीच नेत्रकांड एवं गर्भाशय जैसे गंभीर कांड  हो गए। अब उन्हें पदोन्नत करने की तैयारी है। इससे समझा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में शासन-प्रशासन किस तरह चल रहा है।

Tuesday, November 11, 2014

स्वास्थ्य विभाग को सुधारने का जिम्मा किसका?

संदर्भ - नसबंदी ऑपरेशन के बाद मौतें


- दिवाकर मुक्तिबोध
बिलासपुर के कानन पेंडारी नसबंदी शिविर में ऑपरेशन के बाद 11 महिलाओं की मौत की हृदयग्राही घटना के बाद क्या राज्य के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देंगे? या छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह उन्हें इस्तीफा देने की हिदायत देंगे अथवा स्वास्थ्य मंत्रालय उनसे छीनने का राजनीतिक साहस दिखाएंगे? ये सवाल घटना की गंभीरता को देखते हुए सहज स्वाभाविक है और इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केन्द्र में सत्तारुढ़ भाजपा के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सख्त मिजाज है और सरकारी कामकाज में किसी भी किस्म की लापरवाही को बर्दाश्त करने के पक्ष में नहीं है। इसका उदाहरण इस बात से भी मिलता है कि घटना के फौरन बाद केन्द्र ने 5 सदस्यीय विशेष टीम का गठन किया जो घटनास्थल का दौरा करके सही-सही आंकलन करेगी। जाहिर है केन्द्र ने कानन पेण्डारी नसबंदी शिविर में हुई मौतों के मामलों को बेहद गंभीरता से लिया है तथा राज्य सरकार को स्पष्ट संकेत दिया है कि उसे इस मामले में कठोर कदम उठाने की जरुरत है। राजनीतिक दृष्टि से भले ही मंत्री पर गाज न गिरे किन्तु देर-सबेर उनका विभाग बदल जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इस संदर्भ में हाल ही में केन्द्रीय मंत्रिमंडल के पुनर्गठन एवं विस्तार का उदाहरण देना बाकी होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन मंत्रियों के विभाग बदल दिए जो वांछित नतीजे देने में नाकाम थे। इसमें पेशे से चिकित्सक डॉ. हर्षवर्धन भी शामिल है जिनके पास स्वास्थ्य मंत्रालय था। राज्य में अमर अग्रवाल एक दशक से स्वास्थ्य मंत्री हैं और उनका विभाग अपनी कारगुजारियों के कारण खासी चर्चा में रहा है।
दरअसल छत्तीसगढ़ सरकार के स्वास्थ्य विभाग के लिए राष्ट्रीय एवं राज्यीय योजनाओं के क्रियान्वयन में घनघोर लापरवाही बरतने की घटनाएं कोई नई नहीं हैं । परिवार नियोजन जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्यक्रम में ऐसी घटनाएं पलीता लगाने का काम करती हैं। राज्य में इस तरह की घटनाएं होती रही हैं पर आश्चर्य का विषय है कि विभाग इससे सबक लेने तैयार नहीं हैं। विशेषकर पिछले तीन वर्षों के भीतर इतना कुछ भीषण घटित हुआ है कि देखकर न केवल हैरानी होती है बल्कि प्रशासन की बेपरवाही पर, उसकी उदासीनता पर लोगों को गुस्सा आता है। राज्य की जनता को यह अच्छी तरह याद है कि बालोद, बागबाहरा एवं कवर्धा नेत्र कांड तथा गर्भाशय कांड में विभागीय लापरवाही की कितनी कीमत आम आदमियों को चुकानी पड़ी, कितने जीवन तबाह हो गए किन्तु किसी सरकारी अधिकारी का बाल भी बांका नहीं हुआ।
         26, 27 एवं 28 सितंबर 2011 को बालोद के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में मोतियाबिंद के आॅपरेशन के लिए शिविर आयोजित किए गए थे। इस शिविर में 170 महिलाओं एवं पुरुषों की आंखों का कुछ इस तरह आॅपरेशन किया गया कि 49 लोगों की आंखों चली गई। उनके जीवन में स्थाई अंधेरा छा गया। घटना चूंकि बेहद गंभीर थी इसलिए राज्य सरकार ने जांच तो बैठाई, एक चिकित्सक सहित 4 अधिकारियों को निलंबित भी किया किन्तु किसी की बर्खास्तगी की जरुरत नहीं समझी गई और आज स्थिति यह है कि सारे आरोपी फिर सेवा में बहाल हो गए। और तो और कुछ की पदस्थापना पुन: उसी जगह बालोद में हो गई। इससे समझा जा सकता है कि सरकार बड़ी से बड़ी दुर्घटना का किस तरह सरलीकरण कर देती है। यह केवल एक उदाहरण नहीं है रायपुर सहित राज्य के 11 जिलों में गर्भाशय कांड की भी इसी तरह गूंज हुई थी जिसमें चंद रुपयों के खातिर सैकड़ों महिलाओं को जबरिया गर्भाशय निकाल दिए गए। प्रारंभ में सरकार ने जिम्मेदार निजी अस्पतालों एवं डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई का दम तो दिखाया लेकिन चिकित्सकों के संगठनों के दबाव के चलते मामले के शांत होने में देर नहीं लगी लेकिन ये दोनों घटनाएं दु:स्वप्न की तरह आम जनता के जेहन में है और लगातार उनका पीछा करती है।
           लेकिन इस बार सरकार सन्नाटे में है। बिलासपुर के कानन पेंडारी सहित विभिन्न स्थानों पर जननी सुरक्षा योजना के अंतर्गत आयोजित नसबंदी शिविरों में आपरेशन के बाद अब तक 11 महिलाओं की मृत्यु हो चुकी है। तथा दर्जनों मौत से जूझ रही हैं। स्वास्थ्य शिविरों में बरती गई लापरवाही का यह अप्रतिम और वीभत्स उदाहरण है। सरकार ने स्वास्थ्य संचालक को हटा दिया है, 4 डॉक्टरों को निलंबित किया तथा एक के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है लेकिन क्या यह कार्रवाई काफी है, फौरी कार्रवाई के रुप में निलंबन और चंद महीनों बाद बहाली के दर्जनों उदाहरण विभिन्न प्रकरणों में देखने मिल जाएंगे। क्या किसी को उपयुक्त सजा मिल पाती है? क्या पीड़ितों अथवा उनके परिजनों के प्रति न्याय हो पाता है? क्या 11 महिलाओं की मौतों की घटना को मुआवजा देकर भुलाया जा सकता है? यकीनन नहीं। घावों पर तभी मरहम लगेगा, वे तभी वह सूखेंगे जब घटना के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। कार्रवाई बर्खास्तगी से कम नहीं होनी चाहिए तथा आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए। जब सरकार ऐसी सख्ती दिखाएगी तब वह नजीर बनेगी और शायद तब लापरवाहियों पर अकुंश लगेगा और जन स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ नहीं होगा। क्या राज्य सरकार ऐसा करेगी?
           दरअसल राज्य का स्वास्थ्य विभाग जनस्वास्थ्य की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण होने के बावजूद कार्यशैली एवं अनुशासन के मामले शायद सबसे गरीब है। भ्रष्टाचार, खरीदी में करोड़ों का गोलमाल, उपचार के घटिया उपकरण, सरकारी अस्पतालों एवं प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की दुर्दशा, दवाइयों एवं डॉक्टरों का अभाव आदि तो विभाग के स्थायी भाव है। उपर से जागरुकता एवं जनस्वास्थ्य की रक्षा के नाम पर समय-समय पर लगने वाले विभिन्न अस्त-व्यस्त शिविर। यह तथ्य है कि आंकड़ों की बाजीगरी के लिए शिविर आयोजित किए जाते है ताकि लक्ष्य पूरे किए जा सके। जब ऐसी मानसिकता हो तो जाहिर है, शिविरों में व्यवस्थाएं किस तरह की होंगी। नसबंदी शिविरों में मौत की घटनाओं के पीछे जो भी तथ्य होंगे, वे जांच में सामने आएंगे ही पर प्रथम दृष्टया यह साफ-साफ लापरवाही एवं गैर जिम्मेदारी का मामला है। भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए जरुरी है स्वास्थ्य शिविरों की व्यवस्था सुधरे एवं निगरानी दस्ते बने। यदि जवाबदेही तय होगी तो व्यवस्थाएं सुधरेंगी और तब शिविर जानलेवा नहीं जीवनदायी साबित होंगे।

Wednesday, October 15, 2014

अजीत जोगी : एक दृष्टि

- दिवाकर मुक्तिबोध
(छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी पर केन्द्रित यह आलेख सन 2009-10 के दरमियान लिखा गया था। लिहाजा उनकी राजनीतिक गैर राजनीतिक कथा यात्रा इसी अवधि तक सीमित है।)
छत्तीसगढ़ की राजनीति में अजीत प्रमोद कुमार जोगी का क्या स्थान होना चाहिए, एक लंबी बहस का विषय है। कांग्रेस की राजनीति में भी उनके संदर्भ में एकबारगी कोई ठोस राय कायम नहीं की जा सकती। इस पर भी काफी मतांतर हो सकता है। दरअसल यह स्थिति इसलिए है क्योंकि जोगी का व्यक्तित्व अजीबोगरीब है। राजनेताओं में वैसे भी व्यक्तित्व की पारदर्शिता का अभाव रहता है। उसमें सच और झूठ की कई परतें होती हैं लिहाजा उन्हें ठीक-ठीक पढ़ा नहीं जा सकता। पढ़ने की कोशिश करें तो उसमें भी काफी वक्त लगता है और ऐसे में यदि जोगी जैसे गूढ़ व्यक्तित्व आपके सामने हों और उसे पढ़ने की चुनौती आपने स्वीकार कर ली हो तो जाहिर सी बात है, आपको काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। उनकी जिंदगी की किताब जिसमें साल दर साल नए-नए पन्ने जुड़ते जा रहे हैं, इतनी विचित्र और हैरतअंगेज है कि उन्हें पढ़ते-पढ़ते न केवल आप रोमांचित होंगे बल्कि इस नतीजे पर पहुंचेगे कि यह आदमी लाजवाब है, जबर्दस्त है, जीवट है और काफी हद तक तानाशाह भी। राजनीति में ऐसी शख्सियतें कम देखने मिलती है जो उसकी धारा को मनमाफिक ढंग से मोड़ने का सामर्थ्य रखते हों। फिर शारीरिक अपंगता के चलते राजनीति की धुरी बने रहना और भी कठिन। जोगी कुछ ऐसे ही शख्स हैं।
जोगी मेरे कभी करीबी नहीं रहे। दरअसल पत्रकारिता के अपने लंबे करियर में मैंने सभी नेताओं से एक समान दूरी बनाए रखी। किसी के कैम्प में शामिल नहीं हुआ हालांकि तोहमत लगाने वाले तीर चलाते रहे, लेकिन मैंने अपने मन को कभी घायल नहीं होने दिया। दृढ़तापूर्वक अपने पेशे को इमानदारी से जीता रहा जिसका अंतत: नतीजा यह निकला कि यह मान लिया गया कि मैं उनके किसी काम का नहीं। अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए न तो मेरा इस्तेमाल किया जा सकता है और न ही मुझे भरमाया जा सकता है। जब यह राय धीरे-धीरे पुख्ता हो गई तब किसी ने नजदीक फटकने की कोशिश नहीं की और न ही दूर भागने की। एक निश्चित दूरी बनाएं रखी। हालांकि लोग-बाग अपने-अपने तरीके से रिश्ते को परिभाषित करते रहे और मैं अपना काम करता रहा। यही स्थिति अभी भी कायम है।
जैसा कि मैंने बताया, जोगी कभी करीबी नहीं रहे। जिस तरह हर नेता के लिए आम तौर पर यह जरुरी होता है कि वह अपनी नेतागिरी को चमकाने अथवा उसे जिंदा रखने के लिए पत्रकारों व रिपोर्टरों को जाने पहिचाने, उनकी खुशामद करें उसी तरह पत्रकारों के लिए भी यह आवश्यक है कि नेताओं की खोज-खबर लेते रहे, उन पर बारीक निगाह रखें ताकि राजनीति के समुद्र में गोता लगाकर खबरों की सीप हासिल की जा सके। यानी दोनों का चोली-दामन का साथ। दोनों का एक दूसरे के बिना काम नहीं चल सकता। लिहाजा अजीत जोगी को मैं खूब अच्छी तरह जानता था। जब वे आई.ए.एस. थे और रायपुर में कलेक्टर। तब और जब वे राजनीति में आए तब भी। उनसे यदा-कदा मुलाकातें हुआ करती थीं। एक प्रशासनिक अधिकारी के रुप में मेरे मन में उनकी कोई छाप नहीं थी लेकिन बाद में एक राजनेता के रुप में और छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री के रुप में मैने उन्हें देखने-समझने की कोशिश की और कई मायनों में वे मुझे अन्य समकालीन राजनेताओं से अलग लगे, प्रभावशाली लगे। उनके व्यक्तित्व को भीतर से झांक न पाने के बावजूद मैं यह राय कायम कर सका कि यदि इस व्यक्ति में कतिपय कमजोरियां न होती तो यह न केवल छत्तीसगढ़ में लंबे समय तक शासन करता बल्कि कांग्रेस की राजनीति में भी धु्रव तारे की तरह चमकता।
जोगी पर आगे कुछ लिखूं, इसके पूर्व यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि उनके व्यक्तित्व का आकलन उनके उन राजनीतिक कार्यों, निर्णयों एवं प्रतिक्रियाओं पर आधारित है जिन्हें मैंने देखा, सुना, पढ़ा एवं महसूस किया है। उनके पूरे प्रशासनिक एवं राजनीतिक करियर का न तो मैं गवाह हूं और न ही मैने उनके साथ कभी कोई समय बिताया है। यह विशुद्ध रुप से उनकी राजनीतिक यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर एक दृष्टि है जिससे उनके व्यक्तित्व को तौला जा सकता है और किसी निष्कर्ष पर भी पहुंचा जा सकता है। लिहाजा इसे सकल अध्ययन नहीं माना जाना चाहिए। जो उनके निकटस्थ हैं, वर्षों से उन्हें देखते आ रहे हैं, उनके कामकाज में सहभागी रहे हैं, उन्हें मार्गदर्शन देते रहे हैं, जो उनके दरबारी हैं अथवा ऐसे लोग जो राजनीति में उनके प्रतिद्वंदी हैं, दुश्मन है और उन्हें तानाशाह मानते है, इन सभी की राय उनके (जोगी) बारे में अलग-अलग हो सकती है। इसलिए जरुरी नहीं है कि मेरे लिखे शब्दों पर ऐसे लोग गौर करें अथवा सहमति में सिर हिलाएं। वे मुझे खारिज भी कर सकते हैं, उल्टा-सीधा भी सोच सकते हैं। ऐसा करने के लिए निश्चितत: वे स्वतंत्र हैं।

जोगी से पहली मुलाकात कब हुई, तिथि ठीक से याद नहीं। अलबत्ता रायपुर के कलेक्टर के रुप में मैं उन्हें जानता था। यह भी जानता था, वे लोकप्रिय प्रशासनिक अधिकारी हैं और खेलों में उनकी गहरी रुचि है। रायपुर में स्टेडियम बनाने धन उगाही के लिए उन्होंने लाटरी चलाई थी किन्तु अन्यान्य कारणों से यह प्रयास सफल नहीं हो सका था। कलेक्टरी के दौरान वे सबसे ज्यादा लोकप्रिय युवाओं, खासकर विश्वविद्यालयीन छात्रों के मध्य थे। वे अच्छे और बुरे दोनों को साथ लेकर चलते थे। यानी बदनामशुदा छात्रों की फौज भी उनके साथ हुआ करती थी। बल्कि यो कहें ऐसे लोगों की तादाद उनके पास ज्यादा थी। कुख्यात बालकृष्ण अग्रवाल  उन्हीं का पैदाइश माना जाता है जो छात्र जीवन में उनके साथ जुड़ा और लंबे समय तक उनके साथ बना रहा। जब वे राजनीति में आए तब भी ऐसे लोग उनके इर्द-गिर्द मंडराते रहे। राजनीति में यह बात तो समझ में आती है क्योंकि नेताओं को ऐसे लोगों की जरुरत पड़ती ही है किन्तु कलेक्टर को क्यों ऐसे लोगों की जरुरत होनी चाहिए? सोचें तो प्रतीत होता है, ऐसा स्वभावगत है। पक्ष में दलील दी जा सकती है कि आखिरकार भगवान शिवजी की बारात में भी ऐसे ही लोगों की भरमार थी।
बहरहाल इसमें दो राय नहीं कि जिलाधीश के रुप में अजीत जोगी ने जो लोकप्रियता हासिल की चाहे वह इंदौर हो या रायपुर, वह बेमिसाल है। उनके पूर्व और अब तक रायपुर में ऐसा कोई कलेक्टर नहीं हुआ जिसके अपने कार्यों के जरिए जनता के बीच खास जगह बनाई हो। जोगी की लोकप्रियता इस बात का प्रतीक थी कि वे बहुत जहीन, संवेदनशील एवं कुशल प्रशासक हैं और जिन्हें जनता की नब्ज को पकड़ना खूब अच्छी तरह आता है।
एक राजनेता के रुप में उनके करियर की शुरुआत जिस तरह हुई, यह विवादास्पद है। जोगी का अपना दावा है कि वे राजनीति में स्वइच्छा से नहीं आए, वे लाए गए। हालांकि राजनीति उन्हें प्रिय थी। कांग्रेस की राजनीति में उनके लिए रास्ता बनाया गया और माकूल समय सन 1986 में उन्हें राज्यसभा के जरिए राजनीति के समुद्र में तैरने के लिए धकेल दिया गया। राजीव गांधी से उनके संबंध कितने दृढ़ थे, इस बारे में जोगी का भी कोई दावा नहीं है अलबत्ता सन 1986 में राज्यसभा के लिए उनके नामांकन की बात आई तो प्रधानमंत्री के रुप में राजीव गांधी ने उस पर मोहर लगाई। यह शायद उस परिचय के कारण था जब राजीव पायलट के रुप में इंडियन एयरलाइंस का यात्री विमान दिल्ली से रायपुर लेकर आते थे। कलेक्टर के रुप में जोगी तत्कालीन उड्डयन मंत्री एवं रायपुर लोकसभा से निर्वाचित सांसद पुरुषोत्तम कौशिक के आग्रह पर उनका खास ध्यान रखते थे। निश्चय ही जोगी को राजनीति में लाने एवं सांसद बनाने का श्रेय अर्जुन सिंह एवं दिग्विजय सिंह को है। आई.ए.एस. की नौकरी छुड़वाकर उन्हें क्यों राज्यसभा के लिए कांग्रेस के उम्मीदवार के रुप में नामांकित किया गया, तरह-तरह की बातें हैं। खुद जोगी ने उन अफवाहों का जिक्र किया है जो उन्हें लेकर उस दौरान उड़ी। महासमुंद जिले का कोडार कांड उनका पीछा तो कर ही रहा था, इंदौर के पामोलीव कांड ने उन पर जो कीचड़ उछाला, उससे बचने का एक मात्र उपाय था प्रशासनिक नौकरी छोड़कर राजनीति की राह पकड़ना। कोडार कांड से जोगी किसी तरह अपने को बचा ले गए थे। यह अलग बात है आई. ए.एस. कृपाशंकर शर्मा जो कि बाद में म.प्र. के मुख्य सचिव हुए , की एक सदस्यीय जांच आयोग की रिपोर्ट में उनकी ओर स्पष्ट इशारा किया गया था। बाद में राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो की रायपुर इकाई ने अपनी जांच पड़ताल के बाद राज्य शासन को भेजी गई रिपोर्ट में जोगी को दोषी करार दिया था। हालांकि राजनीतिक दबाव के चलते अंतत: इस रिपोर्ट से जोगी का नाम हटा दिया गया जबकि 14 आरोपियों की सूची में वह प्रथम स्थान पर था।
उन दिनों सन 1986 में मैं दैनिक अमृत-संदेश में था। हमारे संपादक थे श्री गोविंदलाल वोरा। मोतीलाल वोरा जो उस समय म.प्र. के मुख्यमंत्री थे, के अनुज गोविंदलाल जी ने जोगी के आनन-फानन में राज्यसभा के लिए कांग्रेस के उम्मीदवार घोषित हो जाने के संदर्भ में हमें बताया था कि मोतीलाल जी, जोगी के अनुनयन विनय के आगे पिघल गए और उन्होंने अपनी ओर से उनके नाम को हरी झंडी दे दी। पर बात तय मानी जा रही थी कि जोगी यदि राजनीति में नहीं आते तो भ्रष्टाचार के प्रकरणों से उनका बच पाना कठिन था। यह भी स्पष्ट है कि वे राजनीति में लाए नहीं गए थे, उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया था, जैसा कि वे दावा करते हैं। यकीनन उन्होंने इसके लिए अथक प्रयास किया था, अपने लिए राह बनाई थी। हालांकि यह भी सच है कि कांग्रेस को भी उनकी जरुरत थी। जोगी के चयन के पीछे एक बड़ा कारण उनका आदिवासी होना भी था । एक ऐसा पढ़ा लिखा, बुद्धिमान एवं चतुर आदिवासी युवा जिसे तगड़ा प्रशासनिक अनुभव हो, कांग्रेस की राजनीति में आदिवासी मतदाताओं को लुभाने की दृष्टि से मुफीद सिद्ध हो सकता था। लिहाजा जोगी का प्रवेश पार्टी के दीर्घकालीन राजनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए हुआ। यह अलग बात है कि उनकी जाति पर बाद में सवाल खड़े किए गए और मामला अदालत तक पहुंच गया जिस पर अभी भी फैसला होना बाकी है।
बहरहाल राजनयिक के रुप में उनकी पारी की शुरुआत धुधांधार हुई। एक ऐसे व्यक्ति को जो किसी भी राजनीतिक पार्टी का प्राथमिक सदस्य भी न हो, सीधे राज्यसभा का टिकट थमा देना, उस दौर में कम अचरज की बात नहीं थी। इसलिए जब जोगी के प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देने एवं राज्यसभा के लिए कांग्रेस प्रत्याशी के रुप में नामांकित होने की खबर बिजली की तरह फैली, राजनीतिज्ञ एवं गैर राजनीतिक क्षेत्रों में बहस के लिए नया विषय मिल गया। बहरहाल वे लगातार तीन बार राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए, दो बार वे लोकसभा में पहुंचे, एक लोकसभा चुनाव उन्होंने हारा और कुल मिलाकर लगभग 25 वर्षों के अपने राजनीतिक कैरियर में जो अभी जारी है उन्होंने अपना विशेष स्थान बना लिया। वे एक ऐसे विवादित नेता हैं जिन्हें अखबार की सुर्खियों में बने रहना खूब अच्छी तरह आता है।

संसद सदस्य के रूप में जोगी ने विशेष छाप छोड़ी। छत्तीसगढ़ के मामले में वे ज्यादा मुखर थे तथा उन्होंने इस अंचल के मुद्दे जोर-शोर से उठाए भी। कांग्रेस प्रवक्ता के रुप में उन्होंने मीडिया का सामना बेहतर ढंग से किया। एक लेखक के बतौर भी उन्होंने अपनी पहचान बनाई। समय-समय पर विभिन्न अखबारों में सम-सामायिक विषयों पर उनकी लिखी टिप्पणियां ध्यानपूर्वक पढ़ी जाती थीं।
जोगी के राजनीतिक जीवन के दो हिस्से हैं। एक संसदीय राजनीति के जोगी, दूसरे प्रदेश के मुखिया जोगी। उनकी संसदीय यात्रा के दौरान कोई ऐसी घटना नहीं हुई जो उनके स्वभाव एवं चरित्र के विपरीत मानी जाए। वे एक निर्मल जोगी थे, तिकड़मों से दूर, स्वस्थ्य राजनीति के प्रतीक लेकिन प्रदेश के मुखिया के रुप में एक दूसरे जोगी सामने आए, पहले से ठीक उलटे, चालाक, खूंखार और कुटिल राजनीति के पक्षधर। जोगी के ये दो चेहरे, उनका दुहरा व्यक्तित्व। कैसे थे ये जोगी, देखे जरा।
तिथि 1 नवम्बर सन 2000। इस दिन मध्यप्रदेश से अलग होकर नया छत्तीसगढ़ राज्य अस्तित्व में आया और अजीत जोगी इसके प्रथम मुख्यमंत्री के रुप में चुने गए। 90 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में चूंकि कांग्रेसी विधायकों की संख्या सर्वाधिक 48 थी इसलिए संवैधानिक दृष्टि से कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका मिला। इसके पूर्व म.प्र. में रहते हुए राजधानी के सवाल पर एवं नेतृत्व के मुद्दे पर कांग्रेसी राजनीति में खूब रस्साकसी चलती रही। राजधानी के मुद्दे पर भी म.प्र. कांग्रेस बंटी हुई थी तथा प्रथम मुख्यमंत्री का पद हथियाने के लिए भी शतरंजी चालें चली जा रही थीं। नेतृत्व की दौड़ में सबसे आगे थे विद्याचरण शुक्ल। विधायकों का बहुमत भी उनके साथ था। अजीत जोगी समर्थन के मामले में बहुत पीछे थे। आदिवासी नेतृत्व के नाम पर  जब उनकी उम्मीदवारी सामने आई, तब महज 2-3 विधायक उनके साथ थे। कांग्रेस के दिग्गज नेता अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह एवं कमलनाथ की भी उनके नाम पर कोई खास रजामंदी नहीं थी लेकिन विद्याचरण शुक्ल के साथ खांटी विरोध के चलते अजीत जोगी उन्हें मंजूर थे। बहरहाल कांग्रेस हाईकमान के फरमान पर जोगी कांग्रेस विधायक दल के नेता चुन लिए गए और वे प्रथम मुख्यमंत्री बने। नए प्रदेश के शासक के रुप में जब उनकी दूसरी राजनीतिक पारी प्रारंभ हुई तब उनके व्यक्तित्व की भीतरी परतें खुलनी शुरु हुई। वे सन 2003 तक मुख्यमंत्री रहे और इन तीन वर्षों में उनकी छवि एक ऐसे नेता की बनी जो निरंकुश, तानाशाह, तार्किक, दृढ़ इच्छाशक्ति सम्पन्न, कुशल प्रशासक एवं सर्वहारा वर्ग के हितों का रक्षक था। शासक के रुप में उनके कुछ फैसले निश्चय ही सकारात्मक एवं परिणाममूलक थे किन्तु आम जनता के बीच उनकी राजनीतिक छवि निर्मल, सहृदय एवं सरल इंसान की नहीं बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की बनी जो जातिगत राजनीति का कायल था तथा जिसे सवर्णो से दूरी बनाए रखना मंजूर था। सत्ता की राजनीति ने 36 महीनों के भीतर ही कुछ इस तरह कलाबाजियां दिखाई कि उनमें (जोगी) अधिनायकवाद का तत्व अधिक तेजी से उभरा और वह उनके व्यक्तित्व की अच्छाईयों को धुंधला करता चला गया। यही वजह है सन 2003 का राज्य विधानसभा का पहला चुनाव कांग्रेस नहीं जीत सकी हालांकि पार्टी की हार का एक प्रमुख कारण विद्याचरण शुक्ल की बगावत एवं उनके नेतृत्व में प्रदेश राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की चुनाव में मौजूदगी रही। तानाशाही की यह प्रवृत्ति राजनीतिक में जोगी को सर्वप्रिय नहीं बता सकी हालांकि अनुशासन के जिस डंडे से वे अपने समर्थकों को हांकते रहे, यह इसी का परिणाम है कि आज भी प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में उनका गुट ही सबसे बड़ा एवं ताकतवर है। यह कम अचरज की बात नहीं है कि वर्षों से व्हील चेयर पर बैठा इंसान जिसका आधा अंग करीब-करीब निर्जीव है, प्रदेश कांग्रेस का सर्वाधिक ताकतवार नेता बना हुआ है तथा जिसका कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में भी पूरा दखल है और जिसकी बात पार्टी हाईकमान में ध्यान से सुनी जाती है।
ऐसे बहुतेरे उदाहरण हंै कि जो यह साबित करते हैं कि जोगी के व्यक्तित्व में राजनीतिक सकारात्मकता का अभाव है। मिसाल के तौर पर उनके शासनकाल में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं पर वहशियाना लाठीचार्ज के मामले को लिया जा सकता है। इस घटना में भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं सांसद नंदकुमार साय गंभीर रुप से घायल हो गए। उनके घुटने पर जो लाठियां पड़ी उसका दर्द वे आजीवन नहीं भूल सकते। उनकी चाल में स्थायी लंगड़ाहट आ गई। इस घटना के बाद राजनीति इस कदर गरमाई कि इसकी जांच के लिए विधानसभा की एक समिति गठित की गई। समिति की रिपोर्ट विधानसभा में पेश की गई और इसे सर्वसम्मति स्वीकार भी कर लिया गया। रिपोर्ट में रायपुर के तत्कालीन कलेक्टर अभिताभ जैन एवं एसपी मुकेश गुप्ता को सदन में बुलाकर भर्त्सना की सजा तजवीज की गई थी तथा निर्णय लेने का अधिकार तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ला पर छोड़ दिया गया था। यह संयोग ही था कि विधानसभा पटल पर रिपोर्ट पेश करने के वक्त मुख्यमंत्री अजीत जोगी सदन में मौजूद नहीं थे। जब उन्हें पता चला तो वे बहुत भन्नाएं तथा उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष को आड़े हाथों लिया। बाद में उनके निर्देश पर सर्वसम्मति से पारित रिपोर्ट रद्द की गई और उनके स्थान पर नई रिपोर्ट तैयार करवाकर खानापूर्ति की गई। जाहिर है इस घटना पर विधानसभा में जोरदार हंगामा हुआ लेकिन विरोध को अनसुना कर दिया गया।
इस घटना के बाद जोगी विधानसभा अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल से इस कदर नाराज हो गए कि उन्होंने जान-बूझकर उनकी उपेक्षा शुरु कर दी। लंबे चौड़े और मजबूत कद काठी के राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल दबंग, मुंहफट एवं निर्भीक राजनेता के रुप में ख्यात थे। वे म.प्र. विधानसभा के भी अध्यक्ष रहे। अपनी बुलंद आवाज और ताबड़तोड़ जवाबी हमले के कारण उनकी छवि एक ऐसे राजनीतिक की थी जिससे पार पाना मुश्किल था लेकिन अजीम शख्सियत का यह नेता भी जोगी के आगे भीगी बिल्ली बना रहा। यह शायद उनकी मजबूरी भी थी क्योंकि उन्हें मालूम था कि विधानसभा चुनाव में उनकी टिकट जोगी की मर्जी पर निर्भर करेगी। लिहाजा वे जोगी को नाराज नहीं करना चाहते थे। इसे उनकी सहनशीलता कहें या कायरता, अंतिम दिनों में उन्हें अपने संवैधानिक अधिकारों का भी ध्यान नहीं रहा। विधानसभा सत्र बुलाने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष का होता है। उनकी स्वीकृति के बिना सत्र नहीं बुलाया जा सकता। लेकिन जोगी की नाराजगी का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि वे विधानसभा सत्र को बुलाने का निर्णय स्वयं करते थे और बगैर विधानसभा अध्यक्ष को सूचित किए नियम की औपचारिकता पूरी कर दी जाती थी। यानी विधानसभा सचिव को जानकारी दे दी जाती थी कि फलां-फलां तारीख को विधानसभा सत्र बुलाया जाए। विधानसभा अध्यक्ष को इसकी खबर बाद में मौखिक रुप से दे दी जाती थी। जोगी के इस अपमानजनक रवैये से आहत राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल खून के घूंट पीकर रह जाते थे क्योंकि उन्हें अपने लिए चुनाव की टिकट सुनिश्चित करनी थी। जोगी ने उन्हें सन 2003 विधानसभा चुनाव की टिकट उनके निर्वाचन क्षेत्र कोटा से दे तो दी पर तरसा-तरसा कर एवं एक तरह से नाक रगड़वाकर। किसी विधानसभा अध्यक्ष के इस तरह के अपमान का दूसरा उदाहरण शायद ही मिले। जोगी ऐसी किसी घटना से इंकार कर सकते हैं। ऐसी घटनाओं का कोई दस्तावेजी प्रमाण भी नहीं हुआ करता। आपबीती बताने के लिए स्वयं राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल भी इस दुनिया में नहीं है लेकिन विधानसभा कार्यालय के किसी कक्ष में आप बैठ जाएं तो चर्चाओं में यह बात स्वयंमेव निकल आती है।
मुख्यमंत्री के रुप में अजीत जोगी के इस रवैय्ये पर आप क्या टिप्पणी करेंगे? यही न कि विरोध को सहन करने की शक्ति नहीं तथा शासक होने के नाते अपनी मर्जी से शासन चलाने की सनक। अन्यथा सरकार के दो मामूली पुर्जों (सरकारी अधिकारी) को शर्मिदगी से बचाने के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था की ऐसी अवमानना नहीं की जा सकती। यह भी निश्चित है कि इस कदम से जोगी का कोई राजनीतिक हित नहीं सध रहा था और न ही ये दोनों अधिकारी उनके बहुत करीब थे। उनको बचाने का शायद यही एक मकसद था कि वे नौकरशाहों को यह संदेश देना चाहते थे कि वे केवल उनसे (जोगी) खौफ खाए बाकि कि उन्हें चिंता करने की जरुरत नहीं है। पक्ष या विपक्ष का कोई भी विधायक उनका बाल बांका नहीं कर सकता। निश्चिय ही पूरे शासनकाल में नौकरशाही उनसे घबराती रही तथा उनके इशारे पर नाचती रही। इसी संदर्भ में यहां यह कहना अप्रसांगिक नहीं होगा कि राज्य विधानसभाओं में विभिन्न मामलों में दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों को बुलाकर फटकार लगाना अनहोनी घटनाएं नहीं है। म.प्र. विधानसभा में मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के शासनकाल में उनके एक अतिप्रिय अधिकारी को किसी गलती के लिए सदन में तलब किया गया था तथा उनकी भर्त्सना की गई थी। सुंदरलाल पटवा ने जांच की प्रक्रिया के दौरान कोई हस्तक्षेप नहीं किया तथा भर्त्सना की सिफारिश को मान्य किया था। यह अलग बात है कि बाद में इस अधिकारी को पदोन्नति दे दी गई। इस उदाहरण से स्पष्ट है जोगी की प्रवृत्तियां व उनकी कार्यशैली अन्य से कितनी भिन्न है।

राजनेता के रुप में जोगी की निरंकुशता के और भी उदाहरण हैं। विश्व के देशों में जहां-जहां लोकतंत्र है और इस शासन व्यवस्था का सम्मान किया जाता है, ऐसी घटना देखने नहीं मिलेगी जैसा कि छत्तीसगढ़ विधानसभा में घटित हुई थी। 29 सितंबर 2002 को विपक्ष द्वारा रखे गए अविश्वास प्रस्ताव पर सदन में बहस के दौरान सत्ता पक्ष की ओर से केवल एक वरिष्ठ विधायक एवं मंत्री रवीन्द्र चौबे मौजूद थे, शेष सभी विधायक बाहर गलियारे में बैठे रहे। ऐसा मुख्यमंत्री के निर्देश पर सोची-समझी रणनीति के तहत किया गया। यह घोर अलोकतांत्रिक तरीका था। जब बहस पूरी हुई और अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान की घड़ी आ गई, सत्ता पक्ष के सभी विधायक अपनी-अपनी सीट पर पहुंच गए। विपक्ष की ऐसी अवहेलना का कोई और उदाहरण संसदीय विधान के इतिहास में देखने नहीं मिलता। अपने शासनकाल में अजीत जोगी ने सदन में एवं सदन के बाहर विपक्ष की आवाज को करीब-करीब खामोश कर दिया, उसे एकदम बौना बना दिया। भाजपा की जैसी दुर्गति उन्होंने की, वैसी पूर्व में कभी नहीं हुई थी। विपक्ष के एक दर्जन विधायकों को तोड़ने और उनका कांग्रेस प्रवेश कराने की घटना जोगी के कूटनीतिक कौशल की भले ही बानगी रही हो पर इससे उनकी लोकप्रियता के ग्राफ में कोई इजाफा नहीं हुआ बल्कि उनके करियर पर धब्बा ही माना गया क्योंकि जनता को यह बात समझाने की जरुरत नहीं थी कि विधायकों की खरीद फरोख्त नहीं हुई और वे बिना किसी दबाव एवं प्रलोभन के भाजपा छोड़ कांग्रेस में आए। भाजपा विधायक रामदयाल उइके से इस्तीफा दिलवाकर उनकी रिक्त सीट मरवाही से उपचुनाव लड़ना भी जोगी की शातिर राजनीति का एक और उदाहरण है। यद्यपि यह बात सिद्ध नहीं की जा सकी कि भाजपा विधायकों को खरीदा गया, उन्हें पद का प्रलोभन दिया गया अथवा रामदयाल उइके ने जोगी को विधानसभा में पहुंचाने स्वेच्छा से सीट खाली की।
चूंकि सत्ता की राजनीति में जोड़तोड़ को विशेष मान्यता है और इसके सिद्धहस्त खिलाड़ी को अघोषित रुप से विशेष दर्जा मिलता रहा है अत: केन्द्रीय नेतृत्व के सामने जोगी की छवि आला दर्ज के ऐसे राजनेता की बनी जिसे शासन करना खूब अच्छी तरह आता है और जो विपक्ष की कमर तोड़ने में माहिर है। लिहाजा दिल्ली की राजनीति में जोगी को अपनी जगह बनाने में कोई परेशानी नहीं हुई। वे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की नजरों में चढ़ गए, यह अलग बात है कि रास्ता बनाने का काम उनके (श्रीमती गांधी) सचिव विसेंट जार्ज ने किया।
इस बात का जिक्र किया जा चुका है कि प्रशासनिक कौशल के दम पर जोगी ने अपनी अलग छवि गढ़ ली। किसी आईएएस अफसर की मजाल नहीं थी कि वह उनके किसी निर्णय पर बहस करें। उनका काम जोगी के निर्णयों पर तुरंत अमल करना था। अत: फाइलें फटाफट निपटती थीं। जोगी यह जाहिर करने से नहीं चूकते थे, कि वे इस राज्य के बादशाह है। मंत्रियों और राजनेताओं को उन्होंने इस कदर बौना बना दिया था कि उनके कक्ष में मुलाकातियों के लिए कोई कुर्सी नहीं रहती थी। वे अकेले बैठते थे और उनसे मिलने आने वालों को कतार में खड़े रहना पड़ता था। चाहे वे मंत्री हों या विधायक। जोगी के राज में सुखी वहीं थे जिन्होंने उनका आधिपत्य स्वीकार कर लिया था। ऐसे नेताओं, अधिकारियों को उन्होंने अभयदान दिया और जिन लोगों ने सिर उठाने की जुर्रत की, उनका सिर उन्होंने बेरहमी से कुचल दिया।
राजनीति में विरोध को बर्दाश्त न करने एवं विरोधियों को ठिकाने लगाने की प्रवृत्ति जोगी के लिए घातक सिद्ध हुई। उनके तीन साल के शासनकाल के प्रारंभिक महीने यकीनन अच्छे बीते और वे पुराने जोगी ही नजर आए जो कभी कलेक्टर हुआ करते थे और हर वर्ग के लोगों की बातें धैर्य से सुनते थे। लेकिन अपनी सत्ता को बनाए रखने की लालसा जैसे-जैसे तीव्र होती गई, जोगी का चेहरा बदलता गया। हालांकि उन्हें यकीन था जब कभी चुनाव होंगे (जो सन 2003 नवम्बर-दिसंबर में तय थे।) वे आराम से वापसी करेंगे। इस विश्वास की बड़ी वजह थी प्रदेश भारतीय जनता पार्टी की अधमरी हालत जो उनकी बनाई हुई थी। लेकिन उन्हें इस बात का इल्म नहीं था कि उनके बदले हुए चेहरे को, बदले हुए रवैये को, निरंकुशवाद को जनता पसंद नहीं कर रही है। सवर्णों के प्रति उनका दुराग्रह भी छिपा नहीं। इसका स्पष्ट आभास हुआ कि वे जातिवादी हैं और जातीयता की भावना को कम करने के बजाए उसे बढ़ाने का वे कृत्य करते रहे। हीनता की मनोग्रंथि कैसे उनके व्यक्तित्व को कुतर रही थी यह इस बात से जाहिर है कि वे अपने साथ हेलीकाप्टर में निचले तबके के ऐसे लोगों को ले जाना पसंद करते थे जिनकी कोई राजनीतिक हैसियत नहीं थी। हीनता की यह ग्रंथि शायद इस वजह से विकसित हुई कि जोगी खुद नीचे से उपर उठे थे। गरीबी से लड़ते हुए, सर्वहारा होने के दर्द को झेलते हुए, उनके बीच रहते हुए वे बड़े हुए और उन्होंने अपनी कर्मठता से अपनी सामाजिक एवं राजनीतिक हैसियत बनाई। यही दर्द सत्ता के अंतिम वर्ष में बहुत तेजी से उभरा और उनसे ऐसे काम करवाता चला गया जिसकी कीमत उन्हें बाद में चुनाव में चुकानी पड़ी।
नवम्बर 2003 में छत्तीसगढ़ राज्य के पहले चुनाव में जोगी के नेतृत्व में कांग्रेस की पराजय का प्रमुख कारण विद्याचरण शुक्ल एवं उनकी तत्कालीन राष्ट्रवादी कांग्रेस (पवार) की मौजूदगी रही जिसने लगभग 7 प्रतिशत वोट कबाड़कर कांग्रेस की कब्र खोद दी हालांकि उसका (राकांपा) सिर्फ एक विधायक ही चुनकर आया। राकांपा की मौजूदगी और जोगी के प्रति आक्रोश का पूरा फायदा भाजपा को मिला। उस भाजपा को जो चुनाव के पूर्व बिखरी हालत में थी और जिसे कमजोर बनाने में जोगी ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यह कहना उचित ही होगा कि जोगी के प्रति जनआक्रोश नकारात्मक वोटों की शक्ल में भाजपा की झोली में गिरा और उसकी झोली ऐसी भरी कि वह बहुमत के साथ सत्ता में आ गई। जोगी का अतिरेक आत्मविश्वास एवं उनके राजनीतिक कृत्य उन्हें तथा कांग्रेस को ले डूबे। वे ऐसे डूबे कि नवम्बर 2008 में हुए राज्य विधानसभा के द्वितीय चुनाव के दौरान भी जोगी की वापसी का भय मतदाताओं को इस कदर सताया कि उन्होंने भाजपा को फिर सत्ता सौंप दी। चुनाव प्रचार के दौरान जोगी से यह गलती हो गई कि उन्होंने स्वयं को मुख्यमंत्री के रुप में प्रोजेक्ट किया जिसमें हाईकमान की कोई राय नहीं थी। उनका ऐसा करना कांग्रेस को पुन: भारी पड़ा।
यह निश्चित है कि छत्तीसगढ़ की जनता जोगी को मुख्यमंत्री के रूप में देखने अभी भी तैयार नहीं है। उनके तीन वर्ष के शासन को लोग कुशासन के रुप में याद करते हैं जबकि सच्चाई ठीक विपरीत है लेकिन तानाशाह का लेबल उन पर कुछ इस तरह चिपक गया है कि वह उन्हें सत्ता के करीब कभी नहीं आने देगा। यह लेबल तभी उतर सकता है जब पार्टी चुनाव के समय उन्हें कोई जिम्मेदारी न सौंपे और उन्हें स्वयं को मुख्यमंत्री के रुप में पेश करने की इच्छा पर कड़ाई से अंकुश लगाए। नवम्बर 2008 के चुनाव में यदि जोगी ने स्वयं को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित न किया होता तो आज तस्वीर शायद दूसरी होती। जोगी को यह समझ लेना चाहिए कि लोग उनकी बुद्धिमता, कार्यकुशलता, दूरदृष्टि एवं विकासपरक सोच के कायल जरुर हैं किन्तु उन्हें पुन: शासनाध्यक्ष के रुप में स्वीकार करने तैयार नहीं है।
अजीत जोगी के शासनकाल की चर्चा करें तो नि:संदेह उन्हें एक अच्छा शासक माना जाएगा जिसने एक नए राज्य के लिए सबसे बड़ा काम उसे मजबूत आर्थिक आधार देकर किया। यदि आज छत्तीसगढ़ खुशहाली और विकास की ओर तेजी से अग्रसर है तो उसकी बड़ी वजह उसकी आर्थिक नींव है जिस पर अब समृद्धता की इमारत बुलंद हो रही है। आज रमन सरकार को विभिन्न केन्द्रीय योजनाओं के लिए जितना पैसा केन्द्र सरकार से मिल रहा है वह जोगी के शासनकाल से कई गुना अधिक है। नए राज्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक स्रोतों को विकसित करने की होती है। जोगी ने यह काम खूब अच्छी तरह किया। उन्होंने इस राज्य को करमुक्त करने का सपना देखा था। यदि देवभोग की हीरा खदानों से हीरे निकालने का काम शुरु हो गया होता तो नि:संदेह छत्तीसगढ़ देश का पहला ‘कर मुक्त’ राज्य बन जाता लेकिन यह सपना हकीकत से काफी दूर है क्योंकि देवभोग के मामले में रमन सरकार कोई तरजीह नहीं दे रही है। जाहिर ऐसा राजनीतिक कारणों से है।
मुख्यमंत्री के रुप में जोगी के खाते में कई उजली लकीरें है। इस बात में शक नहीं कि गरीब किसानों, मजदूरों, आदिवासियों, हरिजनों तथा सर्वहारा वर्ग के इतर लोगों के प्रति उनके मन में बड़ा दर्द है। दर्द इतना है कि वह सवर्णों के प्रति आक्रोश में बदल गया है। वह उन्हें शोषक मानते हैं। उनके आक्रोश की अभिव्यक्ति उनके शासनकाल में दंडात्मक प्रतिक्रिया के रुप में स्पष्टत: प्रकट हुई। हालांकि वे यह दावा करते हैं कि उनके व्यक्तित्व के निर्माण में, उन्हें आई.ए.एस. से लेकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में सवर्ण नेताओं का प्रमुख योगदान रहा है। यह बात तो ठीक है कि विधान पुरुष स्व. मथुरा प्रसाद दुबे, अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, विद्याचरण शुक्ल, राजीव गांधी एवं अन्य कई सवर्ण नेताओं ने उनका मार्ग प्रशस्त किया किन्तु यह बात भी स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री के रुप में जिस सामाजिक सद्भाव के विस्तार की उनसे उम्मीद की जा रही थी वह पूरी नहीं हुई बल्कि जातीयता की भावना को उन्होंने उभारा एवं प्रश्रय दिया लेकिन सौभाग्य से छत्तीसगढ़ में अनेकानेक जातियों के बीच आपसी सद्भाव, विश्वास, स्नेह एवं सामंजस्य का तत्व इस कदर गहरा है कि कोई भी चोट उसे बिखेर नहीं सकती। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि यहां इक्का-दुक्का घटनाओं को छोड़ कभी जातीय दंगे नहीं हुए। भविष्य में इसकी कोई आशंका भी नहीं है।
शासक के रुप में जोगी ने बड़ा काम किसानों के हित में उनके धान की विपुल खरीदी के रुप में किया। समर्थन मूल्य पर राज्य के किसानों से धान खरीदी का मतलब था सरकार पर राजस्व का भारी बोझ। पर जोगी ने किसानों को शोषकों के पंजे से मुक्त करने एवं उन्हें आर्थिक सम्बल प्रदान करने खर्च की चिंता नहीं की। किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य प्रदान करने राज्य सरकार की इस अभिनव पहल को जोगी के बाद रमन सरकार को भी जारी रखना पड़ा। रमन सरकार ने दो कदम आगे बढ़ते हुए दो रुपए प्रति किलो की दर से गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को 35 किलो चावल उपलब्ध करने का जो फैसला लिया वह उनकी सत्ता में दोबारा वापसी का एक प्रमुख कारण बना। पिछले (2008) चुनाव में जोगी की ‘एकला चलो’ और भाजपा की दो रुपए किलो चावल नीति कांग्रेस की पराजय एवं भाजपा की सत्ता में पुन: वापसी की प्रमुख वजहें मानी जाती है।
बहरहाल सत्ताधीश के रुप में जोगी की कार्यशैली भले ही विवादास्पद रही हो पर इसमें संदेह नहीं कि उनके कुछ और फैसले भी अच्छी सोच के परिचायक थे। मसलन त्रिवर्षीय चिकित्सा पाठ्यक्रम, पीईटी,पीएमटी पद्धति को समाप्त कर प्रावीण्यता के आधार पर इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश, निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना, भिलाई में आईटी हब, सिंचाई के लिए जोगी डबरी जैसी योजनाएं, सड़कों का जाल, आधारभूत संरचनाएं जिसकी वजह से विभिन्न क्षेत्रों में विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ आदि-आदि। हालांकि निजी विश्वविद्यालय की सोच पर सही ढंग से अमल नहीं हुआ और पीएमटी, पीईटी, चिकित्सा पाठ्यक्रम जैसे फैसलों की भी आलोचना हुई पर उनके ये फैसले दूरगामी हितों के संवर्धन की दृष्टि से थे। छत्तीसगढ़ में ग्रामीण स्वास्थ्य की जैसी दुर्दशा है वह ठीक हो सकती थी बशर्ते त्रिवर्षीय चिकित्सा पाठ्यक्रम को जारी रखा जाता। इसी तरह पीईटी, पीएमटी प्रवेश परीक्षाएं समाप्त करने का फैसला, जिस पर अमल नहीं हो पाया यर्थाथपरक था। आज प्रदेश के 49 इंजीनियरिंग महाविद्यालयों में प्रवेश का यह आलम है कि सीटें रिक्त पड़ी हुई हैं और 12वीं बोर्ड की पूरक परीक्षाओं में उत्तीर्ण छात्रों को प्रवेश दिया जा रहा है। उच्च तकनीकी शिक्षा की ऐसी दुर्दशा इसीलिए है क्योंकि शैक्षणिक स्तर की चिंता नहीं की गई। अपने शासन में जोगी ने प्रवेश परीक्षाएं खत्म करने का फैसला आदिवासी छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए लिया था।
प्रशासनिक कसावट की चर्चा पर हम पहले कर चुके हैं। जवाबदेही तय होने  की वजह से सरकारी कामकाज की गति तीव्र हुई और मामलों को लंबित रखने की प्रवृत्ति घटी। इसका फायदा जनता को मिला। जोगी ने सरकारी खर्चे पर भी नियंत्रण रखा और उन्होंने सार्वजनिक उपक्रम, निगम एवं संस्थाओं के रुप में सफेद हाथी ज्यादा नहीं पाले। खेत और किसान, खेतीहर मजदूर एवं आदिवासियों की समृद्धि उनकी प्राथमिकताएं थी। उनके कार्यकाल में कृषि भी उन्नत हुई पर फसल के चक्रीय परिवर्तन का उनका फार्मूला नहीं चल पाया। वे चाहते थे, धान की फसल लेने के बाद 6 माह तक हाथ पर हाथ धरे बैठा किसान नगद फसलों की ओर प्रवृत्त हो ताकि उसकी आमदनी बढ़े लेकिन उनकी यह बात नहीं चल पाई क्योंकि परंपरागत कृषि से बंधे हुए किसान प्रयोग के लिए राजी नहीं हुए।
जोगी के बारे में यह कहा जाता है कि उन्होंने यदि अपनी कुछ कमजोरियों पर काबू पाया होता तो वे छत्तीसगढ़ में लंबे समय तक शासन करते और उनकी राजनीतिक दूरदर्शिता एवं विद्वता का लाभ राज्य की जनता को, राज्य के सर्वागीण विकास के  रुप में अधिक तेजी से मिलता। छत्तीसगढ़ को ऐसा प्रशासक चाहिए जो उसकी जरुरतों को समझते हुए कार्यों के निष्पादन में बला की तेजी दिखाए। राज्य की अपनी सम्पदा अकूत है और उसे विकास के लिए केन्द्र पर पूर्णत: निर्भर रहने की जरुरत नहीं है। बशर्ते उसकी प्राकृतिक संपदा का भरपूर दोहन हो। छत्तीसगढ़ के गर्भ में लोहा, कोयला, बाक्साइट, टिन, लाइम स्टोन जैसे खनिजों का भंडार है। अकेले देवभोग की हीरा खदानें ही इस राज्य को सर्वाधिक समृद्धशाली बना सकती है।
छत्तीसगढ़ के हितों के संदर्भ में ही जोगी के राज में कुछ ऐसी घटनाएं हुई हंै जो उनकी चिंता, उनका जुझारुपन एवं दृढ़ता को रेखांकित करती है। इसमें प्रमुख है सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बालको का निजीकरण। केन्द्र में सत्तारुढ़ तत्कालीन भाजपा सरकार के नीतिगत निर्णय के तहत भारत एल्यूमीनियम कंपनी (बालको) के 52 फीसदी शेयर स्टरलाइट को महज 550 करोड़ में बेच दिए गए। इस निर्णय का प्रबल विरोध करते हुए जोगी ने सड़क की लड़ाई लड़ी। यह अलग बात है, राजनीतिक कारणों से इस निर्णय को वे रोक नहीं सके। किन्तु इस मुद्दे पर उन्होंने जो दृढ़ता दिखाई, उसकी जमकर प्रशंसा हुई।
 
सत्ताधीश के रुप में जोगी के राजनीतिक जीवन में भूचाल लाने वाली घटनाओं में प्रमुख है राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेता रामअवतार जग्गी की सन 2003 के चुनाव के चंद माह पूर्व हत्या। इस घटना से जोगी का कोई सरोकार नहीं था, यह बात अदालत में सिद्ध हो चुकी है पर इसने जनता के बीच आक्रोश की वह लहर पैदा की जो अंतत: जोगी की सत्ता को तिरोहित कर गई। जोगी को इसका आजीवन मलाल रहेगा कि वे अपने बेटे की राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर अंकुश नहीं लगा सके और न ही प्रशासनिक कामकाज में उसके अप्रत्यक्ष दखल को रोक सके। जग्गी हत्याकांड में आरोपों के छींटे अमित जोगी पर भी उड़े हालांकि वे भी अदालत में आरोप मुक्त हो गए पर पुत्र मोह में फंसे जोगी अपयश से अपने दामन को नहीं बचा सके। कूटनीति के महारथी जोगी से उस समय भी गलती हुई जब 31 मार्च 2003 को उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि केन्द्र सरकार का गृह मंत्रालय कांग्रेस शासित राज्यों में चुनावी तैयारियों पर गुप्त निगाह रख रहा है। इंटेलीजेंस ब्यूरो के दुरुपयोग के इस आरोप को अटल बिहारी सरकार ने बहुत गंभीरता से लिया और जांच के आदेश दिए। ‘आॅपरेशन ब्लेक सी’ के नाम से मशहूर इस कांड के संदर्भ में बाद में सीबीआई ने 7 अक्टूबर 2003 को श्री एमसी गुप्ता की अदालत में जोगी के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया। जांच में यह पाया गया कि जोगी ने अपने पत्र के साथ जो दस्तावेजी सबूत पेश किए थे, वे जाली थे। लिहाजा उन पर धोखाधड़ी और जालसाजी की धाराएं लगाई गई। प्रकरण अभी भी अदालत में विचाराधीन है पर चुनाव के ठीक पूर्व उठे इस प्रकरण ने भी जोगी को राजनीतिक रुप से क्षति पहुंचाई।
जोगी ने अपने शासन के दौर में विपक्ष को एकदम बौना तो बना ही दिया था, सार्वजनिक हितों के सवाल पर अहम फैसले लेने के पूर्व कभी उन्होंने विपक्षी दलों से विचार-विमर्श की जरुरत नहीं समझी। ऐसी कोई बैठक कभी नहीं बुलाई गई। और तो और भाजपा कार्यकर्ताओं पर लाठी चार्ज के विरोध में मुख्यमंत्री कक्ष में सांसद नंदकुमार साय के नेतृत्व में रात भर भाजपा विधायकों द्वारा दिए गए धरने का भी मुख्यमंत्री की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा। एक तरफ विपक्ष के साथ इतना निर्मम व्यवहार और दूसरी तरफ विकास के सवाल पर प्रदेश के स्कूली छात्रों को भी विश्वास में लेने की इच्छा। जोगी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते ही 22 दिसंबर 2000 को राज्य के 16 जिलों के 80 मेधावी छात्रों को राजधानी में बैठक बुलाई और उनसे यह जानने की कोशिश की कि अगले एक दशक तक यानी सन 2010 में राज्य की शक्ल किस तरह की होनी चाहिए। यह एक अभिनव प्रयोग था क्योंकि युवा किस तरह का छत्तीसगढ़ बनाना चाहते हैं, यह उनके विचारों से प्रकट हुआ। इससे यह भी प्रतीत हुआ कि जोगी राज्य के विकास के प्रति बहुत गंभीर है और सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं पर राजनीतिक निर्ममता अपनी जगह पर थी इसलिए उन्होंने विपक्ष को कभी विश्वास में लेने की जरुरत नहीं समझी बल्कि उसकी कमर तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
बहरहाल तमाम विसंगतियों के बावजूद इसमें दो राय नहीं कि जोगी बेहद जीवट है। ऐसी जीवटता उनके समकालीन किसी भी राजनेता में देखने नहीं मिलती। आधे शरीर से लाचार होने के बावजूद उन्होंने अपनी राजनीति को मरने नहीं दिया। सन 2004 में लोकसभा चुनाव के पूर्व जब एक दुर्घटना में उनका आधा अंग जवाब दे गया था, तब यह कहा जाने लगा था कि अब जोगी की राजनीति खत्म। व्हील चेयर पर बैठा आदमी कैसे प्रदेश राजनीति के शीर्ष पर बना रह सकता है? पर इन आशंकाओं को खारिज करते हुए जोगी ने अपना वर्चस्व बनाए रखा। प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में वे अभी भी महत्वपूर्ण बने हुए हैं। कांग्रेस विधायक दल के अधिकांश सदस्य उन्हें अपना नेता मानते हैं और उन्हीं के निर्देश पर अपनी राजनीति करते हैं। प्रदेश कांग्रेस में उनका गुट ही सबसे बड़ा और सर्वाधिक शक्तिशाली है। स्थिति यह है कि एक तरफ विद्याचरण शुक्ल, मोतीलाल वोरा, चरणदास महंत और धनेन्द्र साहू जैसे दिग्गज तो दूसरी ओर अकेले अजीत जोगी जो इन सब पर भारी। व्हील चेयर पर बैठे-बैठे जोगी ने दो चुनाव लड़े एक लोकसभा 2004 और विधानसभा 2008। दोनों चुनावों में उन्होंने अपने गुट का संचालन किया और बड़ी संख्या में चुनावी सभाएं की। यदि शरीर लाचार हो तो मन भी कमजोर पड़ने लगता है लेकिन जोगी में गजब का आत्मबल है। उन्होंने अपनी राजनीतिक हैसियत को कम नहीं होने दिया। निश्चय ही राजनीति में ऐसे लोग बिरले ही होते हंै।
निष्कर्ष के तौर पर, जिसकी चर्चा आमजनों में भी होती है, यह कहा जा सकता है कि यदि जोगी में सकारात्मक शक्तियां प्रबल होती और यदि उन्होंने अपनी कमजोरियों को परख कर उन पर काबू पाया होता तो वे लंबे समय तक छत्तीसगढ़ पर शासन करते। अगरचे ऐसा होता आज शायद छत्तीसगढ़ की विकासपरक छवि अधिक उजली और प्रेरणास्पद होती।

Monday, October 6, 2014

कुछ यादें

‘‘जीवन में ऐसी बहुतेरी घटनाएं घटती हैं जो यादें बनकर रह जाती हैं, कुछ कड़वी, कुछ मीठी और कुछ अवसाद भरी। वे कैसी भी हों, पीछा नहीं छोड़ती। जब आप तनिक फुर्सत में होते हैं, जिंदगी के पन्ने पलटने लगते हैं तो चलचित्र की तरह उनका अक्स आंखों के सामने उभरने लगता है और आप अतीत में खो जाते हैं। ऐसे ही कुछ संस्मरण हैं जो मैने फुर्सत के क्षणों में सन 2010 के प्रारंभ में लिखे थे। उनमें से तीन अजीम शख्सियतों से सोचा आपकी मुलाकात करा दूं। स्वर्गीय हो चुके ये तीन मित्र व छोटे-बड़े भाई हैं सर्वश्री सुशील त्रिपाठी, निर्भीक वर्मा एवं श्री रम्मू श्रीवास्तव।’’
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सुशील त्रिपाठी-
बात कहां से शुरू करें ? कोई सिरा पकड़ में नहीं आ रहा। बहुत सोचा काफी माथापच्ची की। अतीत में कई डुबकियां लगाई। कई सिरे तलाशे। लेकिन हर सिरे को दूसरा खारिज करता चला गया। थक हार कर सोचा दिमाग खपाने से मतलब नही। कागज कलम एक तरफ रखें और चुपचाप आराम फरमाएं।
       लेकिन क्या ऐसा संभव है? मन में कहां शांति? किस कदर बेचैनी होती है इसे हर शब्दकार बेहतर जानता-समझता है। सो शांति तभी  मिलेगी, जब किसी एक सिरे को जबरिया पकड़कर लिखना शुरू कर दें। किन्तु यह भी  क्या कम मुश्किल है। बात फिर घूम फिरकर वहीं आ जाती है, शुरूआत बढ़िया होनी चाहिए, तसल्लीबख्श होनी चाहिए। लिहाजा दिमाग के घोडेÞ पूर्ववत दौड़ते रहे और उस पर सवार सैनिक गर्दन से लिपटा पड़ा रहा, सोच में डूबा हुआ, थका हारा। एक दिन एकाएक ख्याल आया सुशील त्रिपाठी से शुरूआत की जाए। उत्तर प्रदेश के इस प्रतिभाशाली पत्रकार की मौत की खबर स्तब्धकारी थी। कुल जमा लगभग 30 वर्षों के परिचय में मेरी उनसे केवल दो बार मुलाकात हुई थी। 1980 में उस समय जब मैं देशबंधु की ओर से एडवांस जर्नलिज्म का वर्कशाप अटैंड करने बनारस गया था। 15 दिन बीएचयू के गेस्ट हाऊस में रहा और इस दौरान तीन या चार दफा सुशील से मुलाकात हुई। पहली मुलाकात हुई काशीनाथ जी के यहां। काशीनाथ सिंह प्रख्यात कथाकार। उनसे मिलने अस्सी स्थित उनके घर गया था। वे अभिभूत  हुए, बेहद खुश। उन्होने प्रस्ताव रखा मैं दुबारा आऊ तथा छात्रों से पिताजी के संस्मरण सुनाऊं। मै गया और वहीं कईयों से परिचय हुआ, मित्रता हुई। सुशील उन्हीं में से एक थे।
         बनारस की मीठी यादें लेकर रायपुर लौटा। सुशील से कुछ समय तक चिट्टी पत्री हुई। इस बीच उन्होंने बहुत सारे रेखा चित्र इस उम्मीद के साथ भिजवाएं कि साहित्य विशेषांक  में उनका इस्तेमाल करूं। वे रेखाचित्र ज्यों के त्यों पडेÞ रह गए। दुर्भाग्य से उनका कहीं उपयोग नहीं किया जा सका। जैसा कि अमूमन होता है चिट्ठियां दूरियां घटाती जरूर हैं पर उनकी निरंतरता बनाए रखना प्राय: कठिन होता है। फिर यह टू वे प्रोसेस है। यदि दोनों पहिए ठीक से घुमते रहे तो सफर तय होता रहता है। पर एक की भी गति धीमी हुई या थम गई तो संबंधों पर पूर्ण विराम लगते देर नहीं लगती अलबत्ता उसकी उष्मा जिंदगी भर कायम रहती है। सुशील के साथ ऐसा ही हुआ। पत्र बंद हो गए। मेरा भी  बनारस जाना कभी  नहीं हुआ। सुशील की खोज खबर नहीं मिली। अलबत्ता यादें तरोताजा रहीं। आत्मीयता के धागे टूटते नहीं हैं क्यों कि वे भावनाओं के रिश्ते में गुथे हुए रहते हैं। शायद अक्टूबर 2008 की बात है सुशील का फोन आया ‘रायपुर में हूं मिलने आ रहा हूं’। दैनिक भास्कर के दफ्तर में वे आए। करीब 27 बरस बाद उन्हे देख रहा था। डील डौल एकदम बदल गया। आते ही गले मिले। यादों को बांटने का सिलसिला शुरू हो गया। सुशील ने बताया नामवर जी रायपुर आए थे, ‘इस राह से गुजरते हुए’ का विमोचन करने। उन्होने कहा था रायपुर में मिलना और उससे किताब ले लेना।
मैंने अपनी किताब उन्हें भेंट  की। पन्ने पलटते हुए उन्होंने बताया नामवर जी एवं काशीनाथ जी से मुलाकातें होती रहती है। बनारस-बनारस है। उस जैसा शहर कहां? उस जैसे लोग कहां? सारी मित्र मंडली रोज इकट्ठी होती है। वामपंथ की दुर्दशा को लेकर दुनिया जहान की बातें। खूब मजा।
इस छोटी सी मुलाकात में सुशील ने अपनी निजी जिंदगी के बारे में कुछ नहीं बताया। अलबत्ता कॉफी हाउस से लौटते हुए उन्होने कहा- भास्कर में या कहीं और नौकरी की अच्छी गुंजाइश बने तो जरूर इत्तला करें, कोशिश करें। उन्होने बताया बनारस में वे दैनिक हिन्दुस्तान के लिए काम कर रहे हैं। साहित्य एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को कव्हर करते हैं। जिंदगी चल रही है। परिवार में जिम्मेदारियां अभी  कम नहीं हुई है।
करीब डेढ़ दो घंटे साथ बिताने के बाद सुशील चले गए। दूसरे दिन मिलने के वादा करके। पर नहीं आए। अलबत्ता काशी के लिए रवाना होने के पूर्व उन्होने फोन किया। आश्वासन दिया दुबारा रायपुर समय लेकर आएंगे। पर वह समय नहीं आया। हालांकि इस बीच उनका फोन आया, बातें हुई। मैं निश्चिंत था। सुशील मजे में होंगे। उनकी बात याद थी। उनके लिए बेहतर जगह तलाशने की पर आजकल अखबारों में प्राय: गुंजाइशें उन्हीं के लिए बनती हैं जो सबंधों को भुनाना जानते हैं तथा इसके लिए सायास प्रयास करते हैं। मैं इसमें कच्चा हूं, सुशील भी निश्चय ही कच्चे होंगे। वरना उनके जैसे प्रतिभाशाली पत्रकार एवं चित्रकार के लिए अच्छी नौकरी मुश्किल नहीं होनी चाहिए थी।
          सुशील को गए तीन चार महीने हो गए। सन 2008 बीता। जनवरी 2009 में इप्टा के अभा. मुक्तिबोध नाट्य समारोह में काशीनाथ जी से मुलाकात हुई। उनसे सहज पूछा- सुशील कैसे हैं?
-मर गए। रिपोर्टिंग के लिए किसी पहाड़ पर चढ गए थे। पैर फिसला, गिर गए। तीन चार दिन अस्पताल में बेहोश पड़े रहे। नहीं न बच पाए।
         काशीनाथ जी से उनके निधन की खबर सुनकार स्तब्ध रह गया। फिर मन नहीं लगा। बीच कार्यक्रम से लौट आया। सारी रात सुशील सपने में आए और बातें करते रहे।
         एक पत्रकार मित्र का इतना कारूणिक अंत! मन अभी भी  उदास है। उनके रेखाचित्र मैंने सहेजकर अलग रख दिए हैं। मैं नहीं जानता था कि उनके चित्र याद बनकर रह जाएंगे। उन्हें देखता हूं तो मन भर आता है।
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सुशील त्रिपाठी के रेखाचित्र -





























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निर्भीक  वर्मा-
जिस एक और दिवंगत पत्रकार मित्र की छवि मन से नहीं उतरी है, वह है निर्भीक वर्मा। अपने किसी प्रियजन जिसे आप हमेशा प्रफुल्लित देखते रहे हो, प्राय: रोज मिलते रहे हो, यदि किसी दिन उसकी मृत्यु की सूचना  मिले तो जाहिर है आप संज्ञा शून्य हो जाएंगे। जिंदगी भर शोक को ढोने के कुछ प्रसंग हर व्यक्ति के जीवन में आते ही हैं।
        सुशील की तरह निर्भीक वर्मा के निधन की सूचना एक सुबह मिली और फिर कई दिन वह दिलो-दिमाग के दरवाजे खटखटाता रहा। वह कब गया, तारीख अब ठीक से याद नहीं। अलबत्ता वह साल 1987 का था।
खिंलदड स्वाभाव  के निर्भीक ने जिंदगी को संवारने बहुत पापड़ बेले थे। लेकिन ठीक से संवार नहीं पाए। भोपाल से आए इस युवा पत्रकार से मेरी पहली मुलाकात सन 1978 में देशबंधु कार्यालय में हुई थी। श्री गंगाप्रसाद ठाकुर एवं निर्भीक वर्मा दोनो भोपाल से देशबंधु का प्रकाशन स्थगित होने के बाद प्रबंधन की ओर से रायपुर भेजे गए थे। मुझसे कहा गया था, निर्भीक से बात  करूं, और पुछूं वे किस डेस्क पर कार्य करना पसंद करेंगे। मैने पूछा- गोरे चिट्टे निर्भीक ने बेपरवाही से कंधे उछाल दिए और कहा प्रिंटर और सिटी डेस्क को छोड़कर कहीं भी काम कर सकते हैं। जाहिर सी बात थी आखिरी डेस्क रीजनल ही बचती थी। अपनी पंसद की डेस्क पर कार्य करने के लिए अवसर तलाशने का यह उनका अपना तरीका था। मृत्यु पर्यंत वे इसी डेस्क पर कार्य करते रहे।
        निर्भीक का साथ शायद 7-8 वर्षों तक ही रहा। उसके व्यक्तित्व में विविधताएं थी। हास-परिहास प्रिय शगल था और कम्पोजिंग रूम में ठुमके लगाना रोजमर्रा की बात थी। जिंदादिल आदमी जहां भी रहे, खुशनुमा माहौल बनाए रखता है। कभी  वातावरण में तनाव नहीं आने देता। निर्भीक की जिंदादिली अद्भुत थी किन्तु विचार-परक पत्रकारिता के भी  वे पक्के खिलाड़ी थे। राष्ट्रीय, प्रादेशिक और स्थानीय विषयों पर उनकी कलम खूब चलती थी। उनकी लेखन शैली इतनी रसदार थी कि एक-एक शब्द जबान पर मिठास घोल देता था। जैसा उनका व्यक्तित्व था, वे व्यंग्य के उस्ताद थे। देशबंधु में प्रकाशित उनका साप्ताहित कालम ‘‘हम बिहार से बोल रहे हैं’’ भ्रष्ट  राजनीतिक व्यवस्था एवं उसके पोषक राजनेताओं पर करारा प्रहार करता था। लेकिन उनके लेखन में निरंतरता नहीं थी। उनका कालम लंबा नहीं खींचा। शायद 6-8 महीने ही चला। देशबंधु के बाद ‘अमृत संदेश’ में मेरा उनका पुन: साथ हुआ। सन् 1983 के प्रारंभ  में अखबार की स्थापना के पूर्व से ही मैं इससे जुड़ गया था। निर्भीक एक दो साल बाद आए।
         निर्भीक में साहित्यिक प्रतिभा गजब की थी। भोपाल की साहित्यिक बिरादरी में उनका खूब उठना बैठना था। सभी  छोटे बडे साहित्यकार, लेखक, कवि उनके मित्र। उस समय के युवा एवं प्रख्यात कवि राजेश जोशी के साथ उन्होंने ‘इसलिए’ निकाली। इस साहित्यिक पत्रिका की कुछ पुरानी प्रतियां उन्होंने मुझे भेंट  की। भोपाल छूटा तो पत्रिका भी  करीब-करीब बंद हो गई। लेकिन ‘इसलिए’ की अपनी छाप साहित्य की दुनिया में अभी  भी  कायम है।
       निर्भीक की स्वभावगत विशेषताओं में कई बातें शामिल हैं- मनमौजी और फक्कड़ प्रकृति लेकिन मन निर्मल एवं संवेदनशील। छोटी-छोटी लेकिन सुई जैसी चुभने वाली बातें भी  उनकी आंखों में पानी ला देती थी। ऐसा लगता था मानों आंखों में दर्द का समुंदर लहरा रहा है और वह फूटने-फूटने को है। दूसरों के दु:ख से दु:खी होने वाले निर्भीक नौकरी दांव पर लगाकर चलते थे। वे बड़ी शान से बताते- उन्होने 33 नौकरियां की। जबलपुर में होटल में वेटर का काम किया। कप-प्लेट धोयी। वे गर्व के साथ बताते- हरिशंकर परसाई उन विशेष स्नेह रखते थे। रोज रात को परसाईजी के यहां जाना और चुपचाप साहित्यिक महफिल की बातें सुनना उन्हें बहुत आनंद देता था। राजेश जोशी और परसाई दोनों का अपने जीवन पर गहरा प्रभाव वे मानते थे।
निर्भीक में जैसी संवेदनाशीलता रही, उसका दूसरा उदाहरण मिलना शायद मुश्किल है। देशबंधु के एक कर्मचारी को प्रबंध संपादक ललितजी ने गुस्से में आकर चांटा जड़ दिया। अपमानित कर्मचारी ने नौकरी तो नही छोड़ी लेकिन निर्भीक बेहद गुस्से में आ गए और नौकरी छोड़कर चले गए। यह अलग बात है कि भोपाल में जब उन्हें और कोई ठौर नहीं मिला तो अपनी उसी संवेदनशीलता को जीते हुए उन्होने ललित जी से पुन: नौकरी मांगी। और नहीं मिलने पर भोपाल के ताल में कूदकर जान देने की चेतावनी दी। ललितजी को पिघलना ही था। सो वो पिघले। निर्भीक की देशबंधु में वापसी तय थी। करीब महीने भर भटकने के बाद वे लौटकर रायपुर आ गए। देशबंधु फिर उनके लिए तीर्थ स्थल बन गया। वे इसे तीर्थस्थल ही कहते थे क्योंकि देशबंधु के संस्थापक संपादक श्री मायाराम सुरजन के सान्निध्य में उन्होने भोपाल में काम किया था। मायाराम जी उनके आदर्श थे और अप्रतिम श्रद्धा के पात्र भी ।
       निर्भीक ने जितना कुछ लिखा, उनके समकालीन पत्रकारों को छोड़कर कोई क्या जानता है? यह दु:खद है।  लेकिन बहुतेरों को शायद यह नियति भी है। मृत्यु के बाद उनका व उनके लेखन का न कोई मूल्यांकन होता है और न ही कोई उन्हे याद करता है। पुराने मित्र जब कभी  मिलते हैं और चर्चाओं का दौर चलता है तब उनकी कमी को, उनके न रहने से उपजी शून्यता को, महसूस किया जाता है। निर्भीक के मामले में भी  ऐसा ही है।
निर्भीक को याद करते हुए अंतिम दो बातें। उसके जैसा खिलंदड़ी शराब में सल्फास की गोलियां खाकर आत्महत्या नहीं कर सकता। उसकी मौत निश्चय ही स्वाभाविक नहीं थी। किन्तु इस रहस्य से कभी  पर्दा नहीं उठा। शायद उठाया नहीं गया।
        दूसरी बात निर्भीक का असली नाम रामनारायण वर्मा था। हस्ताक्षर भी वे आरएन वर्मा के नाम से करते थे किन्तु कप्पू कहना उन्हे ज्यादा पसंद था। उनकी संवेदनशीलता की एक और मिसाल देखिए। रामसागरपारा के जिस मोहल्ले में वे किराए के मकान में रहते थे, पड़ोस में एक जवान लड़की मां के साथ रहती थी। गरीबी और ऊपर से जवानी, जाहिर था शोहदों की भीड़ घर के आस-पास मंडराया करती थी। कुछ दिन तक निर्भीक यह तमाशा देखते रहे। अकस्मात एक दिन उन्होने लड़की का हाथ थाम लिया। फटाफट आर्य समाज मंदिर गए और शादी कर ली। जीवन संघर्ष में डूबी हुई एक अबला को सहारा देने का साहस निर्भीक की संवेदनशीलता का अप्रतिम उदाहरण है। निर्भीक की विचित्रताओं को याद करते हुए एक और प्रसंग का उल्लेख बेमानी नहीं होगा। वो पक्के यारवाश थे तथा अपने दोस्तों के घरों के किचन तक उनकी घुसपैठ रहती थी। मुझे याद है, महामाया मंदिर और बाद में  देवेन्द्र नगर के  मेरे मकान में अक्सर उनकी आमद रहती थी। आते ही बच्चों के साथ खेलकूद और हास परिहास शुरू। मर्जी हुई तो रसोई से स्वयं थाली निकाल ले आए और भोजन करने बैठ गए। इतनी आत्मीयता से लबालब कोई दोस्त तय है आपके खिलाफ नहीं जा सकता। लेकिन निर्भीक के साथ ऐसा नहीं था। प्रेस क्लब के चुनाव में मेरी उम्मीदवारी के खिलाफ वह ताल ठोककर मैदान में आ गए। उन्होने चुनाव नहीं लड़ा किन्तु प्रत्येक अखबार के दफ्तर जाकर उसने दमखम के साथ अपील की- मुझे वोट नही करना है। यह अलग बात है उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद चुनाव में मैं जीता और अध्यक्ष बन गया। मुझे आज तक यह समझ में नहीं आया प्रेस क्लब के चुनाव में वह मुझे क्यों नहीं देखना चाहते थे। उन्होने खुलासा नहीं किया पर मुझे समझाते रहे कि चुनाव के पचडे में मुझे नही पड़ना चाहिए। मैंने बात नही मानी इसलिए खुल्लम खुला विरोध शुरू किया। लेकिन यह विरोध केवल चुनाव तक सीमित रहा। ऐसे थे निर्भीक।

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रम्मू श्रीवास्तव-
मुझे संवारने, काम के लायक बनाने में यकीनन अनेक वरिष्ठजनों  यथा सर्वश्री ललित सुरजन, राजनारायण मिश्र, सत्येन्द्र गुमास्ता, स्व. रामाश्रय उपाध्याय, गोविंदलाल वोरा का बड़ा योगदान रहा है। इन सभी  के साथ मैंने अलग-अलग समय में काम किया लेकिन मुझे इस पेशे में लाने का श्रेय स्व. रम्मू श्रीवास्तव को है। रम्मू श्रीवास्तव यानी रामनारायण श्रीवास्तव। रायपुर व जबलपुर के अखबारों में कार्य करते करते रामनारायण कब रम्मू हो गए मुझे याद नहीं लेकिन सन् 1967 में मैं जब रायपुर पढ़ने आया, उन्हें रामनारायण के रूप में ही जानता था। रायपुर में अकेले वे हमारे परिवार के निकटतम थे बाकी पूरा शहर अजनबी। मैं उन्हे इस रूप में जानता था कि उन्होंने नागपुर में साप्ताहिक ‘नया खून’ में पिता जी के सहयोगी के बतौर काम किया था। पिता जी तब इस अखबार के संपादक थे और स्वामी कृष्णानंद सोख्ता संचालक। पिताजी के साथ उन्होने कितने महीने काम किया पता नहीं अलबत्ता यह याद जरूर है कि वे गुमसुम से, बेहद दुबले पतले सांवले से युवक थे। जिनसे कभी -कभी  ‘नया खून’ के दफ्तर में मुलाकात होती थी। और हम उनके हाथ काली श्याही से रंगे हुए देखते थे। कम्पोजिटर से वे पत्रकार कैसे बने, इसकी भी जानकारी नहीं किन्तु यह बिलकुल स्पष्ट है जिस व्यक्ति ने पिताजी यानी स्व. श्री गजानन माधव मुक्तिबोध के मातहत काम किया हो, उसका भाषा एवं विचार से संस्कारित होकर सफल पत्रकार बनना तय शुदा बात थी। इसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि रम्मू श्रीवास्तव दैनिक भास्कर जबलपुर, ज्ञानयुग प्रभात जबलपुर तथा दैनिक भास्कर रायपुर के संपादक रहे। इसके अलावा उन्होंने रायपुर से प्रकाशित आंग्ल दैनिक हितवाद, नई दुनिया (देशबंधु) नवभारत  सहित अनेक अखबारों में विभिन्न पदों पर काम किया। हिन्दी में तो उनकी मास्टरी थी ही अंग्रेजी में भी  वे उस्ताद थे और रायपुर से हितवाद भोपाल तथा अन्य अखबारों के लिए हिन्दी, अंगे्रजी में खबरें लिखते थे।
    रामनारायण श्रीवास्तव, रम्मू श्रीवास्तव हो गए हैं, यह मैंने जाना सन् 1967 में जब मै पहली बार उनसे मिलने नई दुनिया (अब देशबंधु) के दफ्तर गया। इन दिनों अखबार का दफ्तर बूढ़ापारा में सद्दानी चौक से बूढ़ा तालाब जाने वाली सड़क पर हुआ करता था। रायपुर में वहीं मेरी पहली मुलाकात उनसे हुई। उन्होने मेरा परिचय ललित जी से कराया। वे युवा थे और कालेज के छात्र। रम्मू भैया ने बताया वे दफ्तर का कामकाज भी देखते हैं।
रम्मू भैया से मिलने नई दुनिया जाने लगा। हप्ते में कम से कम एक चक्कर कॉलेज से लौटने के बाद। नई दुनिया के दफ्तर पहुंचकर चुपचाप उनके सामने बैठ जाता। वे या तो पेपर पढ़ते मिलते या लिखते। सिगरेट के कश खींचते और धुंआ उगलते हुए उन्हे देखना अजीब सा लगता था। धुआं कभी  छंटता नहीं था और न चाहते हुए भी  धुएं को हलक में जगह देनी पड़ती थी। रम्मू भैया मंद-मंद मुस्कराते हुए यद्यपि अपने काम में लीन रहते थे और आपकी बातों का हां हूं में जवाब देते थे पर उन्हे अहसास था, धुएं से सामने वाले को तकलीफ हो रही है। पर वे मजबूर थे। सिगरेट छूट नहीं सकती थी और आप भी  उन्हें छोड़ नहीं सकते थे।
     पत्रकारिता को पेशे के रूप में अपनाने के बारे में मैंने कभी सोचा नहीं था। बल्कि मैं डरता था। मन में डर था कि अखबार में काम करने के लिए भाषा और विचार पर अच्छी पकड़ बहुत जरूरी है। मैं समझता था चूंकि मेरी हिन्दी अच्छी नहीं है इसलिए मैं इस पेशे में फिट नहीं हो सकता। भय तब कुछ कम हुआ जब मैंने हॉकी पर एक टिप्पणी लिखी और रम्मू भैया को दे आया। दूसरे दिन वह मेरे नाम से नई दुनिया के पिछले पन्ने पर छपी। सन् 1967 की ही यह बात है। मेरा हौसला बढ़ा क्योंकि रम्मू भैया ने पीठ थपथपाई थी। मै आश्वस्त हुआ , मै भी लिख सकता हूं। यह एक तरह से टर्निंग पाइंट था। चंद महीनों बाद ही नई दुनिया का बूढ़ापारा स्थित दफ्तर स्टेशन रोड स्थानांतरित हो गया और मैं भी बतौर प्रूफ रीडर श्री राजनारायण मिश्र के सहायक के रूप में प्रतिदिन हाजिरी देने लग गया। रम्मू भैया ,श्री राजनारायण, श्री सत्येन्द्र गुमारता एवं संपादक श्री रामाश्रय उपाध्याय अग्रज थे और सभी का भरपूर स्नेह मुझ पर बरसता रहा।
        रम्मू भैया जीवट थे। अपार सहनशील। बेहद हंसमुख एवं मिलनसार। मुझे हमेशा उन्होने छोटे भाई का स्नेह दिया। जब मैं अखबार में नहीं था, पुरानी बस्ती, महामाया मंदिर स्थित उनके निवास में प्राय: प्रतिदिन जाया करता था। घर में वे कभी खाली नहीं मिले। कोई न कोई बैठा रहता था। और बातों की जुगाली के बीच रम्मू भैया अपना काम करते रहते थे। यानी या तो अखबार हाथ में रहता था या कलम। उनके एवं सत्येन्द्र गुमारता जी के साथ मैंने टेली प्रिंटर डेस्क पर काम किया। खबरों का अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद। पहले वे एजेंसी की छोटी-छोटी खबरें पकड़ाते थे और जब उन्हे विश्वास हुआ मैने खबरें ठीक से अनूदित कर रहा हूँ  तो उन्होने जिम्मेदारियां बढ़ा दीं। ऐसे अद्भुत प्रशिक्षण का वह दौर अब खत्म सा हो गया है। प्रतिभा  को तराशने वाले वैसे लोग पत्रकारिता में क्वचित ही रह गए है। देशबंधु की इस त्रिमूर्ति सर्वश्री रम्मू भैया , राजनारायण, सत्येन्द्र का स्पर्श जिन्हें भी मिला वे स्वर्णिम हो गए। पत्रकारिता में सोने जैसे चमक उठे।
      पत्रकारिता में स्वाभिमान, धैर्य और आत्मचिन्तन का अद्भुत मिश्रण बहुत कम लोगों में देखने मिलता है। इस त्रिमूर्ति में ये विशेषताएं मौजूद थी। स्वाभिमान के पक्के लेकिन धैर्य भी  अपार। मजबूरियां उन्हे तोड़ सकती थी। झुका नहीं पाती। बात-बात पर नौकरी पर लात मारने की परम्परा उस समय भी  कायम थी। किन्तु धैर्य पूर्वक बर्दाश्त करने का माद्दा भी  था। खासकर अपने  स्वाभिमान के खातिर सामने वाले की इज्जत उतारने का पाप नहीं ही हो सकता था। मुझे अच्छी तरह याद है, एक अवसर पर किसी खबर को लेकर स्व. मायाराम सुरजन रम्मू भैया पर बेहद आगबबूला हुए और उन्होने भरी मीटिंग में, जिसमें मुझ जैसा एक दम नया मुलाजिम भी मौजूद था, उन्हें हाथ पकड़कर कमरे से बाहर कर दिया। उन्होने हुकुम दनदना दिया, बिल्डिंग से बाहर हो जाएं। दफ्तर उन दिनों नहरपारा में हुआ करता था। मायाराम जी को गुस्से में देखकर रम्मू भैया चुपचाप उठे। एक शब्द नहीं कहा। उनकी शान में कोई गुस्ताखी नहीं की और सम्पादकीय कक्ष में आ गए। लेकिन जैसे ही मायाराम जी को पता चला वे भवन से बाहर नहीं गए हैं,वे तमतमाते हुए आये और उनका हाथ पकड़कर उन्हें सीढ़ी का रास्ता दिखाया। ऐसे घनघोर अपमान के बावजूद रम्मू भैया ने आपा नहीं खोया, बल्कि हल्की सी मुस्कान के साथ सीढ़ियां उतर गए। यह अलग बात है, मायाराम जी का गुस्सा जब शांत हुआ, रम्मू भैया फिर सम्पादकीय विभाग में काम करते नजर आए। इस वाकये का उल्लेख आज इसलिए क्योंकि यह धैर्य की पराकाष्ठा को स्पर्श करता है। अपने अग्रज के सम्मान की रक्षा के लिए अपने स्वाभिमान को हौले-हौले थपकियां देकर शांत रखने की जीवटता निश्चय  ही लाजवाब है। इसे हम भीरूता या नौकरी को जिंदा रखने की मजबूरी या कायरता नही कह सकते। यह खालिस संबंधों के निर्वहन की बात थी। वैसे ही संबंध जैसे पिता पुत्र में या भाई-भाई में होते हैं। देशबंधु चूंकि एक मिशन के रूप में था, जिसमें पत्रकारिता के मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांतों का पोषण होता था, इसलिए वहां कार्यरत सभी  कर्मचारी अखबार के मालिक भी  थे और कर्मचारी भी । नौकर और मालिक में भेद नहीं था। लिहाजा मायाराम जी की भूमिका एक पिता के समान थी और वे सभी  को पुत्रवत मानते थे। यह सभी  जानते थे, गुस्सा उनकी नाक पर रहता है,लेकिन मक्खी को उड़ाने में जितना वक्त लगता है उससे भी  कम समय गुस्सा शांत होने में लगता था। फिर भी  रम्मू भैया ने जो सहनशीलता दिखायी थी, वह बेमिसाल है क्योंकि देशबंधु के इतिहास में ऐसा कोई और उदाहरण नहीं है।
          सहनशीलता की बात आई तो मायारामजी का उदाहरण भी बेमिसाल है। वे गुस्से को फटाफट उगल देते थे। लेकिन समय और परिस्थितियों को देखते हुए उसे जज्ब करने का भी अद्भुत सामर्थ्य उनमें था। मुझे याद है स्व. रामाश्रय उपाध्याय जो रिटायर होने तक रायपुर नई दुनिया, देशबंधु के संपादक रहे, ने अपने प्रसिद्ध कालम ‘एक दिन की बात’ में मायारामजी पर अप्रत्यक्ष रूप से कटाक्ष किया। अगले दिन मिटिंग में जिसमें यह नाचीज भी मौजूद था, उन्होंने बगैर हल्ला-गुल्ला किए शांत भाव से रामाश्रयजी से सिर्फ इतना कहा वे दूसरी नौकरी का इंतजाम कर लें। रामाश्रयजी ने लगभग गिड़गिड़ाने वाले अंदाज में अनुरोध किया, उन्हें 6 माह का वक्त दिया जाए। मायारामजी कुछ पल खामोश रहे फिर कहा ठीक है आप काम करते रहें, कहीं जाने की जरूरत नहीं। सिर्फ इतना ध्यान रखिए लेखन में ऐसी पुनरावृत्ति न हो।
        रामाश्रयजी, राजनारायणजी, रम्मू भैया एवं श्री सत्येन्द्र गुमारता के व्यक्तित्व, प्रकृति एवं कार्यशैली में भिन्नता थी किन्तु सभी  में एक गुण समान रूप से मौजूद था, जूनियर लड़कों को प्रोत्साहित करना, उन्हे मार्गदर्शन देना एवं उनकी गलतियों को बताना। इसलिए देशबंधु को आदर्श, सैद्धांतिक एवं मूल्यपरक पत्रकारिता का स्कूल कहा जाता था। इस स्कूल से निकले तमाम युवजनों ने पत्रकारिता में अच्छा नाम कमाया।
      हमारी बात रम्मू भाई पर केन्द्रित थी। उन पर फिर लौटते हैं। रम्मू भैया की एक विशेषता यह थी कि वे अखबार रद्दी में बेचते नही थे। पुराने अखबार फेंकते नहीं थे। अखबारों को सहेजकर रखना उनकी आदत थी। पुरानी बस्ती, महामाया पारा का ‘वोरा निवास’ जहां कि वे किराए के मकान में रहते थे, अखबारों के गट्ठरों से अटा पड़ा रहता था। अखबारों के दिल से वही लगा सकता है जिसकी इस पेशे के प्रति गहन आस्था, श्रद्धा एवं विश्वास हो लेकिन इस प्रेरणादायक प्रवृत्ति के बावजूद रम्मू भाई ने अपने लिए कभी  कुछ नही गढ़ा जबकि दीर्घ पत्रकारिता में उनके पास अनुभव का जो विराट खजाना था, उसमें से कुछ मोती यदि वे चाहते तो बाहर आ ही सकते थे। और तो और पिताजी के सान्निध्य में ‘नया खून’ में उनकी पत्रकारिता यद्यपि शुरूआती दौर में थी, किंतु स्मृतियों का दिलचस्प रेखांकन हो सकता था। जब जब रम्मू भैया से मैंने लिखने का अनुरोध किया, वे मुस्कुराकर रह जाते और लिखने का वादा करते। नौकरी करते हुए विभिन्न अखबारों में प्रकाशित लेख, राजनीतिक विश्लेषण एवं सामाजिक प्रश्नों पर टिप्पणयों के रूप उनके विचार एक नहीं, कई पुस्तकों के रूप में संकलित किए जा सकते थे, जो समय काल के परिदृश्य को देखने-परखने एवं समझने में सहायक होते किंतु रम्मू जी ने शायद इसकी जरूरत नहीं समझी। उनके आसपास भी कोई ऐसा नहीं था जो लट्ठ लेकर पीछे पड़ता। उनके निधन के बाद पता चला उन्होने जो कुछ संग्रहित कर रखा था उन्हें रद्दी में बेच दिया गया। यानी अब रम्मू भैया को पढ़ना अत्यंत दुष्कर। अब कोई धैर्यवान ही समाचार पत्रों के कार्यालय में धुनी रमाकर, लायबे्ररी से फाइलें निकालकर देख पढ़ सकता है। किन्तु जरूरत किसे? कितने लोग उन्हें जानने वाले रह गए हैं? अलबत्ता पत्रकारिता के गंभीर शोध छात्र यह जहमत जरूर उठा सकते हैं। बशर्ते अतीत के पत्रकारों एवं उनकी पत्रकारिता को जानने, समझने-बूझने की उनमें ललक हो।
         बहरहाल रम्मू भैया भी  दिवंगतों की उसी श्रेणी में हैं जिनकी स्मृतियों को समय की लकीरें धुंधला करते जाती हैं। वैसे यह फलसफा बहुत आम है कि कौन किसे याद रखता है। जीवन और मृत्यु का यह सबसे बड़ा सत्य है अलबत्ता कोई याद जेहन से मिटती नहीं। इसलिए रम्मू भैया एक श्रेष्ठ पत्रकार के रूप में, एक दोस्त के रूप में, बडे भाई के रूप में और एक सहृदय, उदार व्यक्ति के रूप में हमेशा याद आते रहेंगे भले ही उनके लिखे और छपे अक्षर इतिहास की बंद फाइलों मे क्यों न कैद हो गए हों।

Tuesday, September 30, 2014

आलोक तोमर के बहाने

alok-tomar-media-दिवाकर मुक्तिबोध 
आलोक तोमर को मैं व्यक्तिगत रुप से नहीं जानता. औपचारिक परिचय का सिलसिला भी कभी नहीं बना. हालांकि वे एकाधिक बार रायपुर आए पर खुद का परिचय देने के अजीब से संकोच की वजह से उनसे कभी नहीं मिल पाया किंतु बतौर पत्रकार मैं भावनात्मक रुप से उनसे काफी करीब रहा. पता नहीं इस दृष्टि से वे मुझे कितना जानते थे, किंतु मैं यह मानकर चलता हूं कि वे मुझे इतना तो जानते होंगे कि मैं उन्हीं की बिरादरी का हूं, हमपेशा हूं.

बहरहाल इस बात का अफसोस बना रहेगा कि मैं एक प्रखर व तेजस्वी पत्रकार से रुबरु नहीं हो पाया. मैं उनकी प्रतिभा का उस समय से कायल था जब उन्होंने जनसत्ता, नई दिल्ली में कदम रखा था. निश्चय ही अपनी रिपोर्टिंग एवं विश्लेषणात्मक लेखों के जरिए जिन पत्रकारों ने अत्यल्प समय में अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाई उनमें आलोक तोमर महत्वूपर्ण थे.

प्रभाष जोशी ने न केवल उनकी प्रतिभा को पहचाना बल्कि उन्हें उडऩे के लिए पूरा आकाश भी दिया. आलोक तोमर ने उनके विश्वास का कायम रखा लेकिन बतौर प्रभाष जोशी वे और भी आगे बढ़ सकते थे. जनसत्ता में अपने विख्यात स्तंभ 'कागद कारे’ में उन्होंने एक बार अपने उन सहयोगियों का जिक्र किया हैं जिनमें अटूट संभावनाएं थी किंतु उन संभावनाओं को 'पॉलिटिक्स एंड ब्यूरोक्रेसी’ का ग्रहण लग गया. आलोक तोमर भी इनमें से एक थे.

दरअसल प्रभाष जोशी जी ने जो बात संकेतों के रुप में कही, उसका आशय यही था कि आलोक एवं जनसत्ता के कुछ अन्य युवा पत्रकार अंतत: व्यवस्था का दबाव बर्दाश्त नहीं कर सके. यदि वे और अधिक दृढ़ता दिखाते और दिग्भ्रमित न होते हुए तो यकीनन बहुत ऊंचे जाते. इतने ऊंचे कि लंबे समय तक कोई उन्हें छू भी नहीं पाता. फिर भी यह तो मानना पड़ेगा कि आलोक तोमर ने बहुत यश कमाया. उनके असामयिक निधन से निश्चित ही हिन्दी पत्रकारिता में एक विराट शून्य घिर आया है.

चूंकि आलोक से मेरा सीधा परिचय नहीं था अत: उनके व्यक्तित्व एवं सामाजिक सरोकारों पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा किंतु यह जरुर कह सकता हूं कि पत्रकारों की बिरादरी में वे बिरले थे. उनकी कलम में गज़ब का ओज़ एवं समदृष्टि थी जिसके बल पर वे बेबाकी से घटनाओं की चीरफाड़ किया करते थे. वे भूसे में से भी सुई ढूंढ निकालने की कूव्वत रखते थे. जनसत्ता सहित यत्र-तत्र प्रकाशित उनकी रिपोर्टस इस बात की गवाह है कि ऐसी कई सुइयां उन्होंने ढूंढ़ निकाली और खोजी पत्रकारिता में नये आयाम स्थापित किए. निश्चय ही उनके न रहने से प्रिंट मीडिया में ऐसी स्तब्धता छा गई है कि इससे उबरने में वक्त लगेगा. जब कभी मीडिया के सौंदर्यशास्त्र पर चर्चा होगी, आलोक तोमर सम्मान के साथ याद किए जाएंगे.

यहां आलोक तोमर के बहाने मीडिया के सामाजिक दायित्व एवं मीडिया के प्रति समाज के दृष्टिकोण पर केंद्रित कुछ मूलभूत बातों पर चर्चा करना जरुरी प्रतीत होता है.

यह भयानक त्रासदी है कि शब्दों के साथ जीने-मरने वाले बहुत जल्द भुला दिए जाते हैं. यह कहा जाता है, और इसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी है कि व्यक्तिश: कीर्ति मौत के बाद हासिल होती है. वे लोग सचमुच भाग्यवान है कि जिनके जीते जी उनके कार्यों का मूल्यांकन हो जाता है और वे इतिहास पुरुष का दर्जा पा लेते हैं. यद्यपि ऐसे लोग काफी कम होते हैं और पर होते जरुर हैं.

साहित्य, कला और संस्कृति सहित विभिन्न विधाओं में तकरीबन एक जैसी स्थिति है. सिर्फ मीडिया ही एक मात्र विधा है जहां बीते हुए कल को याद नहीं किया जाता. न लेखन को, न व्यक्ति को. जबकि साहित्य की तरह पत्रकारिता में भी स्थायी भाव होता है. यानी छपे हुए शब्दों की दुनिया का एक ऐसा हिस्सा जो सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों एवं घटनाक्रमों से हमें परिचित कराता है तथा भविष्य का संकेत भी देता है.

प्रख्यात कवि विनोद कुमार शुक्ल कहते हैं ''अखबार का सब कुछ लिखा हुआ, दूसरे दिन रद्दी नहीं होता और अखबार का कुछ लिखा हुआ ऐसा जरुर होता है जो कभी रद्दी नहीं होता”. मीडिया के महत्व को रेखांकित करने वाले विनोद कुमार शुक्ला अकेले नहीं है. समूचा समाज मीडिया को लोकतंत्र के संवाहक के रुप में सम्मान की दृष्टि से देखता है लेकिन समाज में मीडिया की इतनी महत्वपूर्ण उपस्थिति के बावजूद आमतौर पर मीडिया अध्येताओं को वह स्थान हासिल नहीं है जो साहित्य, कला, संस्कृति एवं सामाजिक सरोकारों से जुड़े मनीषियों को हासिल है. क्या वजह है इसकी? क्या महज इसलिए कि अखबारों में छपे शब्द अगले दिन बासी हो जाते है? किंतु बासी का भी तो अपना महत्व है. 

छत्तीसगढ़ में ग्रामीणों का मुख्य आहार है बासी भात. स्वाद के साथ-साथ पौष्टिकता से भरपूर. खैर, यह तो क्षेत्र विशेष की बात हुई पर मूल कारण है पत्रकारिता पर तात्कालिकता का प्रभाव. लेकिन जैसा कि विनोद जी ने लिखा है 'समय का इतिहास हमेशा होता है चाहे वह इतिहास में दर्ज हो या नहीं. अवशेष या खंडहर के रुप में उसकी उपस्थिति हो जाती है. समाचार पत्र तत्काल एवं त्वरित होकर एक दिनांक में दर्ज होता है, यह घटना एक दिन की दिनचर्या है या दिनचर्चा की घटना है. और इसके साथ ही विशेष जुड़ाव होता है. लेकिन इस विशेष जुड़ाव के बावजूद यह हैरत की बात है कि कार्यक्षमता की उम्र खो चुके अथवा जिंदगी से ही विदा हो चुके कलम के ये सिपाही गुमनामी के अंधेरे में पड़े रहते हैं.

करीब पौने दो सौ साल के भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में कितने ऐसे पत्रकार हैं, जिनके योगदान की चर्चा होती है? पत्रकारिता दिवस पर याद किए जाने वाले पत्रकार इने-गिने है, वे भी प्राचीन. मसलन गणेशशंकर विद्यार्थी, बाबूराव विष्णु पराड़कर, माखनलाल चतुर्वेदी, माधवराव सप्रे सहित कुछ और. आधुनिक पत्रकारिता के शीषस्थ भूले से भी याद नहीं किए जाते.

इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक ने अपनी मौत की खबर जीवित रहते ही लिख ली, पीछे एक ही काम छोड़ा तारीख भरने का. दरअसल वे इस आशंका से ग्रस्त थे कि उनकी मौत की खबर भी अखबारों में ठीक से छपेगी अथवा नहीं. इसलिए सारा इंतजाम उन्होंने खुद किया. यह है मीडिया की आंतरिक निष्ठुरता जिसमें किसी अखबार नवीश से संबंधित खबर को छापना गैर जरुरी और फालतू समझा जाता है. इसलिए यह माना जाना चाहिए कि मीडिया कर्मियों का केवल वर्तमान होता है, इतिहास नहीं.

लेकिन समाज इस बात को बेहतर समझता है कि मीडिया केवल बंद कमरे की खिड़कियों को नहीं खोलता बल्कि अंधेरे बंद कमरे में ऐसी रोशनी भी बिखेरता है जो जिसके माध्यम से समग्र विकास की राह आसान हो जाती है. लिहाजा रोशनी की मशाल थामने वाले पत्रकारों की कृतियों को भी उसी शिद्दत के साथ याद किया जाना चाहिए जैसा नामचीन कलाविदों, साहित्यकारों, संस्कृति कर्मियों, इतिहासविदों तथा अन्य विधाओं के पारंगतों को याद किया जाता है.

क्या देश-प्रदेश के मीडिया शिक्षा संस्थानों, पत्रकारिता विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में प्रखर पत्रकारों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित सामग्री शामिल है? क्या प्रभाष जोशी पाठ्क्रमों में है? क्या राजेंद्र माथुर या मायाराम सुरजन रायपुर व भोपाल के पत्रकारिता विश्वविद्यालय में पढ़ाए जाते हैं?

हिन्दी, अंग्रेजी व अन्य प्रादेशिक भाषाओं के और भी अनेक ऐसे पत्रकार हैं जिन्होंने समाज को नई दिशा दी है. क्या वे इस लायक नहीं है कि उन्हें पाठ्यक्रमों से शामिल किया जाए? क्या पत्रकारिता के छात्र इनसे प्रेरणा नहीं ले सकते? उन्हें इस अधिकार से वंचित क्यों किया जा रहा है?

आलोक तोमर ने अपनी दीर्घ पत्रकारिता के दौरान क्या ऐसा कुछ नहीं लिखा जिससे मील का पत्थर माना जाए और जो पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हो? जनसत्ता में सन् 1984 के दंगों की उनकी रिपोर्टिंग एवं पीडि़तों के दर्द का जैसा दृश्य उन्होंने खींचा क्या वह हृदयविदारक नहीं है और क्या उससे कुछ सीखा नहीं जा सकता? पत्रकारिता पाठ्क्रमों में पत्रकारिता के उद्भव एवं विकास के नाम पर क्या पढ़ाया जाता? केवल कुछ नामों का उल्लेख, थोड़ा बहुत परिचय. लेकिन उनके रचनाकर्म पर अध्यापन की जरुरत नहीं समझी जाती. जबकि सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचनाकर्म ही है जो समय, काल एवं परिस्थितियों का दस्तावेज होता है. अत: क्या नामों के उल्लेख मात्र से इतिहास के साथ न्याय हो पाता है?

दरअसल आज के वैचारिक अकाल की वजह से ऐसा है. मीडिया के शिक्षा संस्थान या ऐसे निजी संस्थाओं में जहां पत्रकारिता के प्रशिक्षण की व्यवस्था है, एक विषय के तौर पर राजेंद्र माथुर, मायाराम सुरजन, प्रभाष जोशी, पी. साईनाथ, आलोक तोमर सरीखे तेजस्वी पत्रकारों को शामिल किया जाना चाहिए. इससे पत्रकारिता के छात्रों को न केवल अपने पूर्ववर्तियों को जानने-समझने का मौका मिलेगा वरन उनके लेखन से भी वे कुछ न कुछ ग्रहण करेंगे. जाहिर है पत्रकारिता विश्वविद्यालय भी इस आक्षेप से बाहर निकालेंगे कि वे केवल डिग्रियां बांटते है, पत्रकार तैयार नहीं करते.
 

                                                             : ( मैंने यह लेख तीन वर्ष पूर्व लिखा था )