Saturday, October 17, 2015

जनविरोध की तीव्रतम अभिव्यक्ति

-दिवाकर मुक्तिबोध

     देश की साहित्यिक बिरादरी में इन दिनों ऐसा वैचारिक द्वंद चल रहा है जो स्वतंत्र भारत में इसके पूर्व कभी नहीं देखा गया था। शुरुआत इसी वर्ष अगस्त माह में कन्नड़ के प्रतिष्ठित लेखक एवं साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित एम.एम. कलबुर्गी की दिनदहाड़े हत्या की घटना से हुई। इस घटना से समूचे कर्नाटक के लेखक, विचारक, रंगकर्मी एवं बुद्धिजीवी बुरी तरह आहत हुए और उन्होंने तथा अनेक लोकतांत्रिक संस्थाओं ने अपने-अपने ढंग से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने के षड़यंत्र के खिलाफ विरोध दर्ज किया। कन्नड़ लेखक की हत्या की घटना की अनुगूंज यद्यपि पूरे देश में सुनी गई किंतु छिटपुट आंदोलनों एवं वक्तव्यबाजी से ज्यादा कुछ नही हुआ। यह शायद इसलिए क्योंकि कलबुर्गी को क्षेत्रीयता की नजरों से देखा जा रहा था। हालांकि इसके पूर्व महाराष्ट्र में नरेंद्र दाभोलकर एवं गोंविद पानसरे की हत्या की घटना से देश का प्रबुद्ध वर्ग ज्यादा आंदोलित था तथा उसने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी।
   बहरहाल नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे एवं कलबुर्गी की हत्या की घटनाओं ने चिंता की जो चिंगारी पैदा की, वह दादरी हत्याकांड से लपटों के रुप में तब्दील होकर देश के साहित्य एवं कला जगत को झुलसा रही है जिसकी व्यापक प्रतिक्रिया साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटाने के रुप में सामने आ रही है। अब तक दो दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित लेखकों, कलाकारों ने अपने पुरस्कार एवं पुरस्कार स्वरुप नगद राशि लौटाने की घोषणा की है और यह क्रम अभी भी जारी है। देश की मौजूदा हालत से संतप्त जिन लेखकों ने पुरस्कार लौटाए हैं उनमें प्रमुख हैं सर्वश्री उदय प्रकाश, अशोक वाजपेयी, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, कृष्णा सोबती, नयनतारा सहगल, काशीनाथ सिंह, शशि देशपांडे आदि। साहित्य सम्मान वापसी की इस सूची में हिन्दी के अलावा अन्य भाषाओं के लेखक, कवि एवं कलाकार भी शामिल हैं। ये सभी बुद्धिजीवी पिछले कुछ समय से देश में घटी विभिन्न हिंसात्मक घटनाओं, धर्मान्ध ताकतों के अनियंत्रित उभार एवं धर्मनिरपेक्षता को खुरचने की कोशिशों से व्यथित हैं तथा उन्हें लगता है कि देश में असहिष्णुता तेजी से बढ़ रही है व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला जा रहा है। प्रख्यात कवि राजेश जोशी का मानना है कि देश में आपातकाल जैसे हालात है जबकि मंगलेश डबराल कहते हैं कि ऐसी शक्तियां खुलकर मैदान में आ गई है जो देश में साम्प्रदायिक सौहाद्र्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक मूल्यों एवं नागरिकों की आजादी पर हमले करने में लगी हुई है। अकादमी सम्मान लौटाने के पीछे तमाम लेखकों का यही तर्क है कि चूंकि अकादमी के सत्ताधीशों ने चुप्पी साध रखी है अत: उनके पास प्रतिरोध का यही औजार है और वे अब इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।
     साहित्य अकादमी स्वायत्यशासी संस्था है, सरकार द्वारा वित्त पोषित। देश की ऐसी संस्थाएँ कितनी स्वतंत्र होती हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। शायद कोई भी स्वायत्यशासी निकाय सरकारी हस्तक्षेप एवं अप्रत्यक्ष नियंत्रण से परे नहीं है। लेखक बिरादरी भी इसे बेहतर जानती है। इसके बावजूद कवि - लेखक सम्मान स्वीकार करते रहे है। यह सिलसिला 1955 इसे जारी है। इसका मतलब है पुरस्कार स्वीकार करते वक्त पूरा भरोसा रहा है कि संस्था विशुद्ध रुप से स्वायत्यशासी है। और देश में आपसी सद्भाव व साम्प्रादायिक सौहार्द्र बना हुआ है। अब यदि देश की मौजूदा राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों को देखें तो हर व्यक्ति इसका आकलन अपने-अपने ढंग से करने में स्वतंत्र है। इसमें शक नहीं कि पिछले दो दशकों में सामाजिक सद्भाव, समदर्शिता एवं सहनशीलता में कमी आई तथा समय-समय पर इसका विस्फोट दंगों के रुप में सामने आया है जिनमें व्यापक हिंसा हुई। गोधरा एवं मुजफ्फरपुर कांड सबसे बड़े उदाहरण है हालांकि साम्प्रदायिक दंगे वर्ष 2000 के पूर्व के दशकों में भी होते रहे हंै। लेकिन नई सदी के शुरुआत में ही नफरत की ऐसी निर्मम अभिव्यक्ति कम देखने में आई। विशेषकर इस दशक में व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं विचारों की आजादी को धिक्कारने और कुचलने का सुनियोजित षड़यंत्र चला हुआ है तथा वह बाज दफे हिंसक की घटनाओं के रुप में सामने आता रहा है। हेमंत दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम.एम. कलबुर्गी इसके नवीनतम उदाहरण है। चूंकि अब शब्दकार इसके शिकार हो रहे हंै इसलिए देश का लेखक समाज ज्यादा चिंतित, व्यथित एवं आक्रोषित है। इसीलिए विरोध स्वरुप चिंतनशील लेखकों ने अकादमी पुरस्कार लौटाने शुरु किए हैं। किसी गंभीर सवाल पर राष्ट्रीय स्तर पर लेखकों की ऐसी सामूहिकता कम ही देखने को आई है।
     बहरहाल पुरस्कार लौटाना या नहीं लौटाना यह विशुद्ध रुप से निजता का प्रश्न है। इस प्रश्न पर सहमति-असहमति स्वाभाविक है। जिन्होंने पुरस्कार लौटाए उन्हें धिक्कारने या जिन्होंने नहीं लौटाएँ या जिन्हें नहीं लौटाना है अथवा जो इस मुद्दे पर तटस्थतावादी हैं, उन्हें भी धिक्कारने की जरुरत नहीं है। लेखक समाज में असहमति इस बात पर नहीं है सामाजिक सद्भाव बिगड़ रहा है तथा सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा हैं बल्कि असहमति विरोध के स्वरुप को लेकर है। यानी लेखकों का एक वर्ग मानता है कि पुरस्कार लौटाने की क्या आवश्यकता? विरोध दर्ज करने के और भी तरीके हो सकते हंै। यह तर्क बिल्कुल ठीक हैं किंतु इस सवाल पर लेखकों का खेमों में बंटना भी स्वाभाविक है। प्रति-प्रतिक्रिया में जो विचार व्यक्त किए जा रहे हंै वह लेखक समुदाय की एकजुटता एवं आपसी समझ को खुरचती है। इस्तीफे के विरोध में सबसे बड़ा नाम है नामवर सिंह का, साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित। हिन्दी के प्रख्यात माक्र्सवादी आलोचक, नामवर सिंह की राय में लेखक अखबारों की सुर्खियाँ बटोरने के लिए पुरस्कार लौटा रहे हैं। अगर उन्हें कलबुर्गी की हत्या की घटना का विरोध करना है तो उन्हें राष्ट्रपति, संस्कृति मंत्री या मानव संसाधन मंत्री से मिलकर सरकार पर दबाव बनाया चाहिए तथा उनके परिवार की मदद के लिए आगे आना चाहिए। वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु खरे की टिप्पणी तो और भी तीखी है। बीबीसी से की गई एक बातचीत में उन्होंने साहित्य अकादमी को उधेड़ते हुए लेखकों को भी नहीं बख्शा। उन्होंने कहा - 'ईनाम लौटाकर क्या भाड़ फोड़ लेंगे?'
      विरोध की मशाल थामने में हिन्दी की तुलना में अन्य भाषाई लेखकों का प्रतिरोध ज्यादा मजबूत नजर आ रहा है। विशेषकर प. बंगाल और कर्नाटक। गोवा के 14 साहित्य अकादमी विजेताओं ने देशव्यापी अभियान छेड़ने का निश्चय किया है। कोंकणी लेखक एन. शिवदास ने कहा कि हम लगातार विरोध जारी रखेंगे। गोवा के लेखकों ने यह भी तय किया है कि इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भी उठाएंगे। उनके सुर में सुर मिलाते हुए हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण, काशीनाथ सिंह, अरुण कमल एवं डा. विश्वनाथ त्रिपाठी ने देश में बढ़ती साम्प्रदायिकता, असहनशीलता तथा अभिव्यक्ति की आजादी पर बढ़ते खतरे के विरोध में लेखकों से आगे आने की अपील की है। इस अपील से विरोध को और बल मिलना स्वाभाविक है।
      पुरस्कार लौटाने के सिलसिले के बाद जैसा कि स्वाभाविक था, केंद्र में सत्तारूढ़ दल के मंत्रियों ने लेखकों के फैसले पर सवाल खड़े किए। वित्त मंत्री अरुण जेटली, संस्कृति मंत्री महेश शर्मा, संचार एवं प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद की प्रतिक्रिया का लब्बोलुआब यह था कि देश में सहिष्णुता का माहौल है। लेखकों का अवार्ड लौटाना वैचारिक असहिष्णुता है। लेखक, राजनीति कर रहे हंै। विरोध कागजी है। पुरस्कार लौटाने वाले ज्यादातर लेखक वामपंथी या नेहरु विचारधारा के समर्थक हंै तथा ऐसा करने वाले लेखकों की नीयत पर संदेह है। कुल मिलाकर मंत्रियों की प्रतिक्रिया केंद्र सरकार की तिलमिलाहट को दर्शाती है जो थोक में अकादमी अवार्ड लौटाने से उपजी है।
      हमेशा की तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुप है। दादरी के बिसाहड़ा गाँव में गौमांस के संदेह में इकलाख की हत्या की घटना पर देशव्यापी प्रतिक्रिया के बावजूद उनकी चुप्पी देर से टूटी। संभव है यदि साहित्यकारों के विरोध के तेवर और तीव्र हुए व पुरस्कार लौटाने का क्रम जारी रहा तो वे चुप्पी तोड़ेंगे, कुछ बोलेंगे। हालांकि वे यदि इस मुद्दे को संवेदनशील मानते हैं तो उन्हें प्रतीक्षा की जरुरत नहीं है।
      बहरहाल विरोध के स्वर कितने तेज होंगे, यह आगे की बात है। वैसे देश भर की अनेक संस्थाएं एवं सरकारी पुरस्कारों से नवाजे गए विजेता सामने आ रहे हंै। प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव अली जावेद ने भी देशभर के अपने सदस्यों से पुरस्कार लौटाने की अपील की है। आंदोलन, धरना-प्रदर्शन, रैलियां, ज्ञापन इत्यादि तो अपनी जगह पर है पर भविष्य की रणनीति के लिए ज्यादा मुफीद होगा सरकारी एवं सरकार द्वारा वित्त पोषित संस्थाओं के पुरस्कारों का बहिष्कार। केंद्र के साथ सभी राज्यों की सरकारें प्रतिवर्ष या समय - समय पर विभिन्न क्षेत्रों में अप्रतिम उपलब्धियों के लिए पुरस्कार स्वरुप अलंकरण एवं नगद राशि प्रदान करती है। इसमें साहित्य, कला एवं संस्कृति भी शामिल है। सरकार किसी भी पार्टी की हो, पुरस्कारों का बहिष्कार सबसे ताकतवर हथियार होगा, लौटाने से कहीं ज्यादा। यह सिलसिला तब तक जारी रहना चाहिए जब तक कि इस बात का यकीन न हो जाए कि देश में सामाजिकता, साहिष्णुता, धार्मिक समभाव और विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपने पूरे शबाब पर लौट आई है।

Friday, October 16, 2015

नक्सलवाद की विदाई! ऐसे कैसे?

- दिवाकर मुक्तिबोध
  छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने हाल ही में नई दिल्ली में मीडिया ये चर्चा करते हुए कहा था कि राज्य में नक्सली समस्या अब केवल तीन जिलों सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर तक सिमटकर रह गई है। मुख्यमंत्री 28 सितंबर से नई दिल्ली में थे और छत्तीसगढ़ सदन में वे कुछ पत्रकारों से मुखातिब थे। उन्होंने यह भी कहा कि नक्सलियों का विदेशों में नेटवर्क है और अब राज्य में केवल 400 हार्डकोर नक्सली शेष है। मुख्यमंत्री का दावा तो अपनी जगह पर है लेकिन यह भी सच है कि इन तीन जिलों से परे भी आए दिन नक्सली वारदातें होती रहती हैं। पर इसमें शक नहीं कि नक्सलियों के आतंक का दायरा सिमट रहा है। यह अद्र्धसैनिक बलों की भारी संख्या में नक्सली क्षेत्रों में तैनाती, मुठभेड़ों में दर्जनों हार्डकोर माओवादियों के मारे जाने एवं बड़ी संख्या में पुलिस के आगे आत्मसमर्पण की घटनाओं से संभव हुआ है। यह भी स्पष्ट है कि केंद्र व राज्य सरकार के बीच नक्सली मुद्दे पर बेहतर तालमेल है एवं उन्होंने पूरी ताकत झोंक रखी है। नक्सली बैकफुट पर है। उनमें बौखलाहट है। लेकिन वे राज्य से बिदा नहीं हुए है। फिर भी उम्मीद की जा रही हैं कि राज्य सरकार की नई पुनर्वास नीति एवं अत्याधुनिक शस्त्रों से लैस सुरक्षा बलों के दबाव की वजह से देर सबेर राज्य को नक्सली आतंक से छुटकारा मिलेगा। पर यह तभी संभव होगा जब बस्तर संभाग के सभी गाँव खुली हवा में सांस ले सकेंगे। जब गाँवों में विकास कार्य होंगे, सड़कें बनेंगी, शिक्षा और स्वास्थ्य की ओर ध्यान दिया जाएगा, इसके लिए माकूल व्यवस्थाएँ बनाई जाएंगी, ग्रामीणों को रोजगार मिलेगा और केंद्र व राज्य सरकार की तमाम योजनाओं पर ईमानदारी से कार्य होगा। आदिवासियों को हर तरह के शोषण से मुक्त करना नक्सलियों के खिलाफ संघर्ष की पहली जरुरत है इसलिए मूल चुनौती आतंक नहीं, विकास एवं शोषण से मुक्ति की है।
       दरअसल धुर नक्सली क्षेत्रों में विकास कार्य दुष्कर जरुर है किन्तु असंभव नहीं। इसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति चाहिए और जाहिर है सरकार के भीतर और बाहर इसे कुचलने का षड़यंत्र चलता रहता है। हालांकि दिखावे की कोशिशों में कोई कमी नहीं की जाती। बड़ी-बड़ी घोषणाएँ होती हैं, बड़ी-बड़ी बातें की जाती है, हर बड़ी घटना के बाद नक्सलियों को कायर कहा जाता है और जब किसी अफसर का अपहरण होता है तो सरकार शरणागत हो जाती है। छत्तीसगढ़ में ऐसे बहुतेरे उदाहरण हैं जब अपहृत ग्रामीणों को नक्सलियों के पंजे से मुक्त करने के लिए सरकार ने कोई गंभीर प्रयत्न नहीं किए और उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया। पुलिस की मदद करने वाले आदिवासियों के जीवन की सुरक्षा की चिंता नहीं की और उन्हें भी मरने छोड़ दिया। ऐसे मुखबिरों को नक्सलियों ने चुन-चुनकर मारा और उन्हें भी नहीं बख्शा जिन पर उन्हें जरा भी शक था। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष पहले 6 महीने में 11 मुखबिरों की नक्सलियों ने हत्या की।
        बहरहाल नक्सली हिंसा के गिरते ग्राफ से चिंता कुछ कम जरुर होती है और कहीं न कहीं राज्य शासन के प्रयासों की सराहना भी करनी पड़ती है। किन्तु यह तय है, जब तक नक्सल प्रभावित बस्तर का हर गाँव विकास की रोशनी से चकाचक नहीं होगा, नक्सलियों की मौजूदगी बनी रहेगी। सवाल है यह कैसे हो? जान छुड़ाने के लिए बहुत आसानी से कह दिया जाता है, माओवादी विकास कार्य करने नहीं देते, सड़कें उड़ा देते है, स्कूल भवन ध्वस्त करते हैं, वे प्रत्येक ऐसे कार्य में आड़े आते हैं जहां उन्हें आदिवासियों के उठ खड़े होने का अहसास होता हैं। सलवा जुडूम इसका सबसे बेहतर उदाहरण है। केंद्र में यूपीए सरकार के कार्यकाल में, पी. चिदम्बरम के गृहमंत्री रहते, घोषणाएँ की गई थी कि फोर्स की मदद से एक-एक क्षेत्र नक्सलियों से खाली करके वहां पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के बीच विकास कार्य कराए जाएंगें। फोर्स के दबाव से बीते दशक में कुछ क्षेत्र माओवादियों से खाली तो हुए पर गाँवों की बदहाली यथावत है। विकास के उपक्रम के तहत अब राज्य की रमन सिंह सरकार ने नक्सली क्षेत्रों में स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों एवं सामुदायिक अस्पतालों में डॉक्टरों की तैनाती के लिए विशेष पैकेज की घोषणा की है। सवाल है जब बस्तर के सबसे बड़े शहर जगदलपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल के लिए डॉक्टर नहीं मिलते, तब धुर नक्सल क्षेत्रों में विशेष पैकेज का फार्मूला कैसे काम आएगा? यदि कोई डॉक्टर हिम्मत करके, जान की परवाह न करके, सेवा भावना से अभिभूत होकर वहां जाना भी चाहेगा तो क्या उसे उन तथाकथित स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सा से संबंधित समुचित सुविधाएं एवं सुरक्षा उपलब्ध रहेगी? राज्य में स्वास्थ्य संस्थाओं, अस्पतालों का वैसे ही बुरा हाल है। प्रतिवर्ष सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण दूषित पानी के सेवन से, चिकित्सा के अभाव में डायरिया और मलेरिया से दम तोड़ देते हंै। ऐसी स्थिति में सुरक्षा की गारंटी के साथ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक अस्पतालों को चिकित्सा की आधुनिक सुविधाओं एवं दक्ष पैरा मेडिकल स्टॉफ से लैस करना पहली जरुरत है। हालत यह हैं कि मशीनें हैं तो दक्ष तकनीशियन नहीं और दक्ष तकनीशियन है तो मशीन नहीं।
       स्वास्थ्य का ही नहीं प्राथमिक शिक्षा का भी नक्सल प्रभावित बस्तर, सरगुजा में यही हाल है। राज्य सरकार के स्कूली शिक्षा मंत्री केदार कश्यप एवं ग्रामीण विकास मंत्री अजय चंद्राकर ने स्वीकार किया है कि वामपंथी उग्रवाद के कारण 12 जिलों में पिछले 15 वर्षों से करीब दस हजार शिक्षकों की कमी है। इनमें 2300 से अधिक केवल साइंस शिक्षकों के पद रिक्त है इसलिए दोनों संभागों के 64 विकासखण्डों में आउट सोर्सिंग के जरिए शिक्षकों की भर्ती के प्रयत्न किए जा रहे हैं। कांग्रेस ने स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का मुद्दा उठाते हुए सरकार के इस फैसले का जोरदार विरोधर किया है। यह विरोध अब भी जारी है। अब सवाल है, सरकार क्या करें? सरकार के इन नुमाइंदों के अनुसार शिक्षकों की भर्ती के लिए 13 बार विज्ञापन जारी किए गए किन्तु योग्य उम्मीदवार नहीं मिले। इसलिए आउट सोर्सिंग यानी राज्य के बाहर के उम्मीदवारों को मौका देने का निश्चय किया गया। क्या इससे समस्या का समाधान हो पाएगा? शिक्षा के स्तर की तो बात ही छोड़ दें। प्रदेश के मुख्य सचिव विवेक ढांढ ने मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की मौजूदगी में एक कार्यक्रम में कहा कि 6वीं में पढ़ रहे लड़के को तीसरी कक्षा का भी ज्ञान नहीं। और 8वीं का विद्यार्थी पांचवीं की किताब भी नहीं पढ़ सकता। उच्च शिक्षा में भी लगभग यही स्थिति है। इससे पता चलता है कि राज्य में शिक्षा का कैसा बुरा हाल है।
      बहरहाल सरकार के सामने विकास की बड़ी चुनौतियां हैं। राज्य में पिछले 12 वर्षों से भाजपा की सरकार है अत: समय की आड़ लेकर सवालों से बचा नहीं जा सकता। नक्सली आतंक का दायरा यदि सिमट रहा है तो जाहिर है इसका श्रेय सरकार को है किन्तु प्रभावित क्षेत्रों में डॉक्टरों की नियुक्ति का मामला हो अथवा शिक्षा कर्मियों की भर्ती का, बात तब तक नहीं बनेगी जब तक कि न्यूनतम जरुरतें, सुरक्षा और विश्वास के साथ पूरी नहीं होगी। कहा जा सकता है कि अलग राज्य बनने के बाद बीतें 15 वर्षों में आदिवासियों का कुछ भी भला नहीं हुआ है इसलिए प्रदेश में नक्सलवाद की जड़ें कायम है।

Saturday, October 3, 2015

स्मार्ट विलेज, पता नहीं कब स्मार्ट बनेंगे

- दिवाकर मुक्तिबोध
      प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल ही में अमेरिका यात्रा के दौरान भारत के डिजिटल भविष्य पर लंबी चौड़ी बातें हुईं। कुछ वायदे हुए, कतिपय घोषणाएँ हुईं। मसलन गूगल भारत में 500 रेलवे स्टेशनों को वाईफाई से लैस करने में मदद करेगा, एपल की सबसे बड़ी निर्माण कंपनी फॉक्सकान भारत में प्लांट लगाएगा, आईफोन 6 एस व 6 एस प्लस भारत में जल्द लॉच होंगे। एक ओर महत्वपूर्ण घोषणा हुई, माइक्रोसाफ्ट भारत के 5 लाख गांवों में कम कीमत पर ब्रांडबैंड कनेक्टिविटी उपलब्ध कराएगा।
      डिजिटल इंडिया के स्वप्नद्रष्टा नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा इस मामले में सफल कहीं जाएगी कि विश्व आईटी सेक्टर के दिग्गजों यथा सुंदर पिचई सीईओ गूगूल, जॉन चैम्बर्स सीईओ सिस्को, सत्य नड़ेला सीईओ माइक्रोसाफ्ट तथा पॉल जैकब्स प्रेसीडेंट क्वॉलकॉन ने डिजिटल क्षेत्र में भारत की प्रगति को शानदार बताते हुए मुक्तकंठ से मोदी की प्रशंसा की। इन आईटी प्रशासकों के विचारों का लब्बोलुआब यह था कि पीएम मोदी दुनिया बदल देंगे, उनके पास ग्लोबल विजन है और भारत इनोवेशन की धरती है। मोदी की प्रशंसा में काढ़े गए इन कसीदों की हकीकत कब सामने आएगी, यह समय बताएगा।
     किन्तु यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री देश की जनता को सुहाने सपने दिखा रहे हैं। 16 माह में 27 देशों की यात्रा करने वाले मोदी दूरसंचार के क्षेत्र में देश को विकसित देशों के समकक्ष ला खड़ा करेंगे? बड़ा सवाल है। लेकिन क्या इससे देश एवं जनता की बुनियादी जरुरतें पूरी हो सकेंगी? माइक्रोसाफ्ट ने कम कीमत पर 5 लाख गाँवों में ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने की बात मोदी से कही हैं पर क्या भूख, बेकारी एवं गरीबी से कलप रहे गाँवों की पहली जरुरत ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी है? प्रधानमंत्री ने न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा की 70वीं वर्षगांठ पर कहा कि हमारे निर्धारित लक्ष्यों में गरीबी उन्मूलन सबसे ऊपर है। उन्होंने कहा कि सबके लिए आवास, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता हमारी प्राथमिकता है। हमारी सरकार ने नेटवर्क की जरुरत और मोबाइल फोन के इस्तेमाल से गरीबी पर जोरदार प्रहार किया है? क्या सचमुच? क्या गरीब इसे जानते हैं? दरअसल प्रधानमंत्री के इन दावों के बावजूद जमीनी हकीकत क्या है, किसी से छिपा नहीं हैं। यह ठीक है कि देश में मोबाइल क्रांति की वजह से बहुत सी चीजें आसान हुई हैं, सुविधाएं बढ़ी हैं लेकिन क्या देश के बहुसंख्य नागरिकों विशेषकर करोड़ों गरीबों के जीवन स्तर में कोई क्रांतिकारी बदलाव आया हैं? देश में गाँवों की संख्या 6 लाख से अधिक हैं। गरीबी पर ऑकड़ों की बात करें तो बीते दशक में गरीबी का स्तर कुछ घटा जरुर है। आंकड़े बताते है कि वर्ष 2004 - 2005 में देश की कुल आबादी के 37.21 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे थे। तत्कालीन केंद्र सरकार की योजनाओं की बदौलत वर्ष 2009-10 में गरीबी घटकर 29.8 प्रतिशत रह गई। योजना आयोग द्वारा जारी वर्ष 2013 के आंकड़े देखें तो 25.7 प्रतिशत ग्रामीण तथा 13.7 प्रतिशत शहरी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। वर्ष जून 2014 में जारी रंगराजन कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार 36 करोड़ 30 लाख यानी 29.5 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। इन आंकड़ों से जाहिर हैं गरीबी का प्रतिशत घट अवश्य रहा है लेकिन इसकी गति बहुत धीमी हैं। अब जरा गरीबी के संदर्भ में मोदी सरकार की प्राथमिकताओं पर गौर करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि 6 लाख गाँवों में बुनियादी नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के संकल्प को पूरा करने के लिए कई दशक लग जाएंगे बशर्ते योजनाएँ भ्रष्टाचार के दंश से बची रहें। और जाहिर है मौजूदा व्यवस्था में यह नामुमकिन हैं। व्यवस्था पूरी तरह भ्रष्ट हैं।
      यकीनन बातें बड़ी-बड़ी हो रही हैं। डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत, स्किल भारत जैसे  राष्ट्रीय अभियानों से जनता की उम्मीदों को पंख दिए जा रहे हैं। वैश्विक मंदी के बावजूद आर्थिक मोर्चे पर देश की सुदृढ़ता की दुहाई दी जा रही हैं, लेकिन यह स्थापित सत्य है कि अमीरी- गरीबी के बीच खाई बढ़ती ही जा रही हैं। अमीरों का भारत बहुत छोटा सा हैं, गरीबों का भारत बहुत विशाल। पूंजी के केंद्रीयकरण की स्थिति यह है कि आज सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और तो और सांस्कृतिक क्षेत्रों में कारर्पोरेट हावी है। ऐसी स्थिति में बुनियादी समस्या यानी देश की गरीबी पर बतर्ज मोदी, मोबाइल अटैक कितना कारगर साबित होगा? क्या मोबाइल या दूरसंचार क्षेत्र में अत्याधुनिक तकनीकी से गरीबों की गरीबी मिट जाएगी? क्या उनका जीवन स्तर सुधरेगा? क्या उन्हें दो जून की रोटी आसानी से मयस्सर होगी? क्या हर हाथ को काम मिलेगा? क्या दूरस्थ आदिम क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, सड़क, बिजली, पानी जैसी बुनियादी आवश्यकताएँ संभव हो सकेंगी? आजादी के 68 वर्षों के बाद भी हजारों की संख्या में ऐसे गाँव हैं जहाँ न बिजली हैं, न पानी, न सड़क, न स्कूल और न ही प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र। बरसात में टापू बनने वाले इन गाँवों में यदि मनुष्य जिंदा हैं तो केवल प्रकृति की मेहरबानी से। जीवन के अंधेरे से लड़ रहें इन गाँवों में बदलाव की बयार क्या मोबाइल क्रांति से आएगी? यकीनन दिल्ली बहुत दूर है।
      दरअसल आजादी के बाद ग्रामीण विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के बावजूद, पंचवर्षीय योजनाओं के अंतर्गत अरबों-खरबों रुपये खर्च करने के बावजूद अधिसंख्य गाँवों की सूरत नहीं बदली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि यदि विदेशी बैंकों में जमा काला धन देश में वापस आएगा तो प्रत्येक नागरिक के खाते में 15-15 लाख रुपये जमा हो जाएंगे। अब तक एक भी पैसा भारत नहीं आया और बयान की लीपापोती कर दी गई। यह राजनीतिक हवाबाजी थी। जबकि बीते 68 वर्षों में गाँवों के उत्थान के नाम पर केंद्र व राज्य सरकारों के खजाने से निकले सफेद धन का अधिकांश हिस्सा काली कमाई के रुप में नेताओं, व्यापारियों, कारखानेदारों, पूंजी के दलालों, अधिकारियों व ठेकेदारों के बेनामी खातों में, बेनामी संपत्तियों के रुप में जमा हुआ और अभी भी होता जा रहा है। इस पर कोई नियंत्रण नहीं हैं इसलिए गाँवों का विकास अवरुद्ध है तथा वे अभी भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। ऋणग्रस्त किसानों, खेतिहर मजदूरों का जीवन कितना कष्टमय है इसका कारुणिक उदाहरण निरंतर बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं से मिलता है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की एक गणना के अनुसार सन् 1995 से अब तक 3 लाख से अधिक किसानों ने अपनी जान दी। सन् 2014 में 5650 किसान ऋण ग्रस्तता की वजह से अपनी जान गंवा बैठे। छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा 1510 है जिसमें खेतिहर मजदूर भी शामिल है। इसी वर्ष हाल ही में ऋण के बोझ एवं फसल चौपट होने की वजह से राज्य में करीब एक दर्जन आत्महत्या के मामले सामने आए हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की राज्यों की सूची के अनुसार किसानों की आत्महत्या के सर्वाधिक प्रकरण आंध्रप्रदेश में दर्ज हुए जबकि इस सूची में छत्तीसगढ़ पांचवें स्थान पर है। इन आंकड़ों की विश्वसनीयता को भले ही चुनौती दी जाए पर यह स्पष्ट हैं, कि किसानों, खेती पर आश्रित परिवारों, मजदूरों की जीना दुभर हो गया है। भौतिक-संसाधनों के विस्तार से शहर धीरे-धीरे भले ही अमीर होते जा रहे हो पर गाँवों का कायाकल्प नहीं हो रहा है। देश के हजारों गाँव अभी भी आदिम अवस्था में है।
अब केंद्र सरकार ने स्मार्ट सिटी की तर्ज पर स्मार्ट विलेज की परिकल्पना की है। केंद्रीय बजट में 100 स्मार्ट सिटी के लिए 7016 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया गया है। वर्ष 2015-16 में इस परियोजना पर 143 करोड़ रुपये खर्च होंगे। शहरों को हाईटेक सुविधाओं से लैस करने के संकल्प के बाद केंद्र को गाँवों का ख्याल आया है और उसने अगले तीन वर्षों में 300 स्मार्ट विलेज कलस्टर बनाने की घोषणा की है। केंद्रीय केबिनेट ने 16 सितंबर 2015 को इस अभियान को मंजूरी दी। इसके लिए 5,14.08 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इस मिशन का लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक, सामाजिक और अधोसंरचना संबंधी गतिविधियों में तेजी लाना है। गाँवों को ऐसे समूह के रुप में विकसित करना है जहां लोगों में कार्यकुशलता आए और स्थानीय उद्यम को बढ़ावा मिले। कोशिश गाँवों को शहरों जैसा रुप देने की है। कहा गया है कि इस मिशन में राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी क्योंकि गाँवों का चयन उन्हें करना होगा और पैसों का इंतजाम भी।
     केंद्र सरकार के स्मार्ट विलेज मिशन को श्यामाप्रसाद मुखर्जी रर्बन का नाम दिया है। दरअसल यह कोई नई परिकल्पना नही है। पूर्व राष्ट्रपति स्व. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने सबसे पहले यह विचार दिया था कि गाँवों का संकुल बनाकर, उन्हें सड़क संपर्क के जरिए एक-दूसरे से जोड़कर वहां शहरों जैसी सुविधाएँ मसलन सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाएँ प्रायवेट पब्लिक पार्टनरशिप (पीपीपी) के जरिए उपलब्ध कराई जाए। उन्होंने अपनी किताब 'टारगेट - 3 बिलियन' में इसका विस्तार से उल्लेख किया है। इस योजना को प्रॉविजन ऑफ अर्बन एमिनेटिस टू रुलर एरिया ('पुरा') का नाम दिया। इस किताब में उनके सहलेखक थे सृजनपाल सिंह। ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के राष्ट्रपति रहते हुए यूपीए सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 'पुराÓ को 11वीं पंचवर्षीय योजना के शेष कार्यकाल में इसे भारत सरकार की योजना के रुप में शामिल किया। और इसके लिए अलग फंड की व्यवस्था की। पर जल्द ही योजना राजनीति के भंवरजाल में उलझ कर रह गई। नतीजतन तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की 'पुरा' योजना को असफल बताते हुए 24 फरवरी 2012 को संशोधित 'पुरा' योजना को लॉच किया जिसमें आर्थिक स्त्रोतों के विकास एवं सुदृढ़ीकरण के साथ ही ग्रामीण अधोसंरचना के विकास पर जोर दिया गया। उनका दावा था कि हमारी नई पुरा योजना सफल होगी। नई 'पुरा' योजना में जल आपूर्ति, स्वच्छता व भौतिक संरचना पर ज्यादा जोर दिया गया है। जाहिर है कलाम साहब की 'पुरा' योजना राजनीति की शिकार हुई तथा बाद में नई योजना पर भी विशेष कुछ काम नहीं हुआ। वर्ष 2014 में तो यूपीए सरकार विदा हो गई और भाजपा राज आया। अब मोदी सरकार ने यूपीए की उसी संशोधित 'पुरा' योजना को नया जामा पहनाते हुए श्यामाप्रसाद मुखर्जी का नाम दिया है। यानी श्यामाप्रसाद मुखर्जी रर्बन मिशन (एस.पी.एम.आर.एम.)। बेहतर होता यदि नई दिल्ली की औरंगजेब से नामांकित कुछ किलोमीटर सड़क तक ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की स्मृति को सीमित रखने के बजाए राष्ट्रीय 'पुरा' योजना को उनका नाम दिया जाता। जबकि मोदी सरकार ने 27 जुलाई 2015 को पूर्व राष्ट्रपति के निधन के बाद उनका खूब गुणगान किया था लेकिन जब राष्ट्रीय स्तर पर ग्रामीण विकास योजना के नामकरण की बात सामने आई तो पार्टी के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी को याद किया गया। जबकि देश जानता है कि 'पुरा' की मूल कल्पना कलाम जी की है।
       बहरहाल अगले तीन वर्षों में पता चल जाएगा कि तथाकथित स्मार्ट विलेज कितने स्मार्ट हुए। योजना के गतिशील होने के बाद 300 रर्बन समूह सुविधाओं के मामले में शहर की शक्ल ले लेंगे। पर योजना की सफलता राज्य सरकारों के कामकाज पर निर्भर है। यहाँ फिर वहीं सवाल खड़े हो जाता है कि छत्तीसगढ़ सहित लगभग सभी राज्य सरकारों के मुख्यमंत्री साल में एक बार कुछ दिनों के लिए गाँवों का दौरा करते हैं, वर्षों से कर रहे हैं, जनदर्शन देते हैं, लोगों की समस्याएँ सुनते हैं, उन्हें नजदीक से देखते हैं, आदेश पारित करते हैं, फंड की व्यवस्था करते हैं पर गाँवों और गाँववालों की हालत नहीं बदलती। ज्यादा दूर क्यों जाएँ छत्तीसगढ़ में बस्तर को ले लें, अबूझमाड़ को ले लें, सरगुजा के आदिवासी वन ग्रामों को देखें, विलुप्त होती पहाड़ी कोरवा जैसी जनजातियों को देखें, जो स्थिति आजादी के पूर्व थी तकरीबन वही स्थिति अभी भी कायम है बल्कि अंधेरा कुछ और गहरा हुआ है। स्मार्ट विलेज इस अंधेरे में कब और कैसे उजाला फैलाएगा, भ्रष्ट व्यवस्था के चलते कहना मुश्किल है। पर यह स्पष्ट इन गाँवों को फिलहाल मोबाइल कनेक्टिविटी की नहीं, जीवन के लिए जरुरी प्राथमिक सुविधाओं की कनेक्टिविटी चाहिए।