Tuesday, March 25, 2014

झीरम: फिर वही कहानी



माओवादी हमला
नक्सल मोर्चे पर और कितने दावे? और कितने संकल्प? और कितनी जानें? क्या खोखले दावों और संकल्पों का सिलसिला यूं ही चलता रहेगा और निरपराध मारे जाते रहेंगें? राज्य बनने के बाद, पिछले 13 वर्षों में जब- जब नक्सलियों ने बड़ी वारदातें की, सत्ताधीश नक्सलियों से सख्ती से निपटने के संकल्पों को दोहराते रहे. चाहे वह प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी हों या वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह जिनके हाथों में तीसरी बार सत्ता की कमान है.
नक्सलियों से युद्ध स्तर पर निपटने की कथित सरकारी तैयारियों के बखान के बावजूद राज्य में न तो नक्सलियों का कहर कम हुआ, न ही घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई और न ही नक्सलियों के हौसले पस्त हुए. उनका सूचना तंत्र कितना जबरदस्त है उसकी मिसाल यद्यपि अनेक बार मिल चुकी है, लेकिन ताजा वाकया ऐसा है जो उनके रणनीतिक कौशल का इजहार करता है.
राज्य के पुलिस तंत्र में बडे- बड़े ओहदों पर बैठे अफसरों ने शायद ही कभी सोचा हो कि जीरम घाटी में कभी दोबारा हमला हो सकता है. पिछले वर्ष 25 मई को इसी घाटी में नक्सलियों ने कांग्रेसियों के काफिले पर हमला किया था जिसमे 31 लोग मारे गए थे. देश में किसी राजनीतिक पार्टी के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं पर यह सबसे बड़ा हमला था. इस हमले में कांग्रेस के दिग्गज नेता विद्याचरण शुक्ल, नेता प्रतिपक्ष रहे महेन्द्र कर्मा एवं प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष नंदकुमार पटेल मारे गए थे. उसी जीरम घाटी में एक बार फिर नक्सलियों ने योजनाबद्ध तरीके से सीआरपीएफ की सर्चिंग पार्टी पर हमला किया. इस हमले में 16 जवान शहीद हुए.
पिछले महीने ही नक्सलियों ने दो अलग अलग घटनाओं में सात सीआरपीएफ के जवानों को मौत के घाट उतारा था. पिछले वर्षों में पुलिस एवं अर्द्ध सैनिक बलों के गश्ती दलों पर दर्जनों छिटपुट हमले हुए हैं जिसमें कई जवानों की जाने गई हैं. 11 मार्च 2014 को संयुक्त गश्ती दल पर किया गया हमला इसी श्रृंखला की अगली कड़ी है.
पुलिस प्रशासन लगातार इस बात की दुहाई देता रहा है कि आपरेशन ग्रीन हंट, राज्य पुलिस बल एवं अर्द्धसैनिक बलों की बस्तर में मौजूदगी एवं उनकी सख्ती से नक्सलियों के पैर उखड़ते जा रहे हैं.
यह भी कहा गया बस्तर के आदिवासियों का विश्वास खोने एवं पुलिस बल की सक्रियता से नक्सली बौखला गए हैं. इसी बौखलाहट में वे जवानों पर हमले कर रहे हैं तथा मुखबिरी के शक में आदिवासियों की हत्याएं कर रहें है. पुलिस का यह भी दावा है कि नक्सलियों के शहरी नेटवर्क को ध्वस्त करने में उसे जबरदस्त कामयाबी मिली तथा नक्सलियों की तगड़े घेरेबंदी एवं मुठभेड़ों की वजह से उसके कई कमाण्डर या तो मारे गए या उन्होंने आत्मसर्मपण किया.
राज्य पुलिस के इस दावे को सच मायने में कोई बुराई नही है क्योंकि कुछ घटनाएं इसकी साक्षी हैं. लेकिन खुफिया तंत्र का क्या? क्या राज्य की पुलिस यह दावा कर सकती है कि उसका सूचना तंत्र, उसका खुफिया नेटवर्क नक्सलियों से ज्यादा मजबूत और विस्तारित है? यकीनन अगर ऐसा होता तो छत्तीसगढ़ में बड़ी तो कौन कहे, छोटी मोटी वारदातें भी नहीं होती और न ही नक्सलियों की जनअदालतें लग पातीं जिसका मूल उद्देश्य आदिवासियों के मन में खौफ पैदा करना है और वे इसमे कामयाब भी है.
दरअसल इसका सच क्या है, सामने है. पिछले वर्ष जीरम घाटी में मौत का तांडव पुलिस की खुफिया तंत्र की विफलता का परिणाम था. और अब पुन: इसी घाटी में सीआरपीएफ की सर्चिंग पार्टी पर हमले से पुन: यह सिद्ध होता है कि पुलिस के पास मुखबिरों का अकाल है, उसका सूचना तंत्र कमजोर है और उसमें दूरदृष्टि का भी अभाव है.
जाहिर है नक्सलियों ने पुलिस प्रशासन की इसी कमजोरी का फायदा उठाया. उन्हें अहसास था कि पुलिस यह कल्पना भी नहीं कर सकती कि जीरम घाटी में दोबारा हमला हो सकता है. इसलिए उन्हें अपनी योजना को मूर्त रूप देने में कोई कठिनाई नहीं हुई. यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि तीन सौ से अधिक नक्सली एक बड़े हमले में शामिल होने के लिए तेज गतिविधियां कर रहे हों और पुलिस को किसी छोर से इसकी कोई खबर न मिलती हो. नक्सली इत्मीनान से सड़कों पर बारूद सुरंगें बिछाते हों, पेड़ काटकर रास्ता रोकते हों और पुलिस को इसकी हवा तक न लगती हो. जबकि राज्य की पुलिस संचार के आधुनिक संसाधनों से लैस है.
स्पष्ट है, पुलिस लापरवाह है और नक्सल मोर्चे पर वह फिसड्डी है. यदि ये सब चीजें तंदुरूस्त होती तो जीरम घाटी कभी रक्तरंजित नही होती न ही बस्तर में नक्सली अपने इरादों में कामयाब होते. 11 मार्च को जीरम में ताजा हमले के बाद जैसा कि अमूमन होता है, सरकार फिर चैतन्य हो जाएगी, चिंता जाहिर करेगी, विचार विमर्श के लिए उच्च स्तरीय बैठकें होंगी, नक्सलियों से सख्ती से निपटने का संकल्प लिया जाएगा, जोश जोश में बस्तर में तेज कार्रवाई भी की जाएगी, नक्सलियों की धरपकड़ भी होगी लेकिन धीरे- धीरे जोश ठंडा पड़ता जाएगा और पुलिस फिर पहले जैसी पुलिस हो जाएगी, गाफिल और गैरजिम्मेदार.

जोगी की दूर की कौड़ी

.
अजीत जोगी छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की पराजय के बाद प्रदेश के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की एक वर्ष के लिए राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा दरअसल उनकी कूटनीतिक चाल थी, जो अंतत: सफल रही. वे जानते थे, लोकसभा चुनाव में पार्टी को उनकी जरूरत पड़ेगी. इसलिए उन्होंने राजनीति की शतरंज की बिसात पर अपने मोहरे इस ढंग से आगे बढ़ाए कि बाजी जीती जा सके. ठीक ऐसा ही हुआ.
नवम्बर 2013 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की पराजय से खुद को बेहद दुखी एवं मायूस दिखाते हुए उन्होंने एक वर्ष के लिए सक्रिय राजनीति से दूर रहकर भजन-कीर्तन में व्यस्त रहने का एलान किया था. लेकिन इसके साथ ही उन्होंने अपने लिए एक पतली सी गली जरूर छोड़ दी ताकि वक्त आने पर उससे बाहर निकला जा सके. संन्यास की घोषणा करते हुए उन्होंने कहा था कि कांग्रेस की उच्च स्तरीय बैठकों में भाग लेते रहेंगे.
जाहिर है, राजनीति से उनका यह अर्धसंन्यास था, जिसका वक्त आने पर टूटना तय था. जैसी कि उन्हें उम्मीद थी, यह 4 माह के भीतर ही टूट गया. कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें महासमुंद संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लडऩे का फरमान सुना दिया है. जोगी की शतरंजी चालों का यह कमाल था. महासमुंद से ही वे लडऩा चाहते थे. उनकी मुराद पूरी हुई. उन्होंने एक तीर से कई निशाने साधे और सभी ठिकाने पर लगे.
राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस अभी संक्रमण के दौर से गुजर रही है. यह दौर गत दो वर्षों से अधिक तीव्र हुआ है. खासकर भाजपा की ओर से नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री पद के लिए नामांकित होने के बाद पार्टी लगातार हाशिये की ओर बढ़ रही है. ऐसे वक्त लोकसभा चुनाव ने मुसीबतें और भी बढ़ा दी हैं. आलाकमान के बड़े नेताओं की तमाम कोशिशों के बावजूद गिरता ग्राफ थम नहीं पा रहा है. इस स्थिति में कांग्रेस के लिए लोकसभा की एक-एक सीट कीमती है. इसलिए जीत सकने लायक सीटों एवं उम्मीदवारों को खोने का जोखिम वह कैसे उठा सकती है? जोगी ने इस स्थिति का फायदा उठाया.
छत्तीसगढ़ की 11 लोकसभा सीटों पर घोषित उम्मीदवारों की बात करें तो अजीत जोगी अकेले ऐसे प्रत्याशी हैं, जिनकी जीत का शत-प्रतिशत दावा किया जा सकता है, भले ही मुकाबले में भाजपा की ओर से कोई भी क्यों न हो. यानी राज्य की कम से कम एक सीट तो कांग्रेस के लिए सुनिश्चित मानी जा सकती है. पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी ने एक मात्र सीट कोरबा जीती थी, जहां से केन्द्रीय मंत्री चरणदास महंत विजयी हुए थे. इस बार भी वे कोरबा से ही लड़ रहे हैं. यदि उनकी जीत की संभावना भी शत-प्रतिशत मानें तो इस बार चुनाव में कांग्रेस की सीटों में इजाफा तय है. राज्य की कोरबा और महासमुंद के अलावा और भी सीटें हैं जहां जीत की क्षमता रखने वाले उम्मीदवारों को टिकिट दी गई है. यानी छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सीटों का बढऩा तय प्रतीत होता है.
बहरहाल, बात जोगी के सियासी गणित की है. चूंकि वे जानते थे कि पार्टी के लिए लोकसभा चुनाव बहुत अहंम् है इसलिए वे अपने लिए बेहतर सौदेबाजी कर सकते हैं. संन्यास की घोषणा इसी सौदेबाजी का एक हिस्सा थी. ऐसा करके उन्होंने हाईकमान को झुकने के लिए मजबूर कर दिया.
उन्होंने कहा था कि यदि सोनिया गांधी उन्हें चुनाव लडऩे के लिए कहेंगी तो वे ना नहीं कर पाएंगे. लोकसभा की टिकिट लेकर रायपुर लौटे जोगी ने मीडिया से कहा वे सोनिया गांधी के निर्देश पर चुनाव लड़ रहे हैं. यानी यह जताना चाहते थे कि वे अपने संन्यास के फैसले पर अटल थे लेकिन चूंकि सोनिया गांधी का निर्देश है, इसलिए ‘मजबूरी’ में वे उनकी पेशकश को स्वीकार कर रहे हैं. ऐसा आभास होकर उन्होंने कांग्रेसाध्यक्ष से अपनी नजदीकियों का इजहार तो किया ही, लगे हाथ यह भी साबित कर दिया कि प्रदेश की राजनीति में उनकी अहमियत के क्या मायने हैं और केन्द्रीय स्तर पर उनकी पूछ परख क्यों होती है.
प्रदेश की 11 सीटों पर उम्मीदवारों के चयन में प्रत्यक्ष रूप से जोगी की कोई भूमिका नहीं रही. अलबत्ता पर्दे के पीछे वे जरूर सक्रिय रहे. उम्मीदवारों का चयन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल, नेता प्रतिपक्ष टी एस सिंहदेव, पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष एवं राज्य के वरिष्ठतम नेता मोतीलाल वोरा तथा केन्द्रीय मंत्री चरणदास महंत की सिफारिशों पर आधारित था. लेकिन रायपुर टिकट प्रकरण में जोगी के हस्तक्षेप से इंकार नही किया जा सकता.
पहले छाया वर्मा की उम्मीदवारी की अधिकृत घोषणा और दो दिन के भीतर ही उन्हें हटाकर सत्यनारायण शर्मा के नाम का एलान आकस्मिक नहीं था. दरअसल इस परिवर्तन के पीछे योजनाकार जोगी थे जिसमें उन्हें मोतीलाल वोरा का भी समर्थन मिला. यह अलग बात है कि प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल ने इस चाल को नाकाम करते हुए छाया वर्मा को पुन: टिकिट दिला दी.
नि:संदेह अजीत जोगी ने हाईकमान से अनुकूल निर्णय करवा लिए. संगठन खेमे की कोशिश थी, जोगी बिलासपुर से चुनाव लड़े किन्तु जोगी महासमुंद या कांकेर अपने लिए अधिक उपयुक्त मानते थे. करूणा शुक्ला का कांग्रेस प्रवेश एवं बिलासपुर से उन्हें टिकिट मिलना सायास था. करूणा शुक्ला की वजह से बिलासपुर से जोगी को छुटटी मिल गई. अब उनका मिशन था महासमुंद से स्व. विद्याचरण शुक्ल की बेटी प्रतिभा पांडे की दावेदारी को खत्म करना.
प्रतिभा पांडे जीत की क्षमता रखने वाली उम्मीदवार नहीं थी. केवल विद्याचरण शुक्ल की शहादत से उन्हें इतने सहानुभूति वोट नहीं मिल सकते थे, जो जीत की नींव रख सके. यही तर्क जोगी के काम आया. हाईकमान ने प्रतिभा पांडे के नाम को अंतत: खारिज कर दिया गया. इससे जोगी की राह आसान हो गई.
अजीत जोगी ने सन् 2004 का लोकसभा चुनाव महासमुंद से ही लड़ा था. उन्होंने विद्याचरण शुक्ल को एक लाख अठारह हजार से अधिक वोटों से हराया जो भाजपा की टिकिट पर लड़ रहे थे. भारी भरकम वोटों से जीते गए इस चुनाव ने जोगी को अजेय बना दिया. हालांकि 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के चंदूलाल साहू ने 1 लाख 8 हजार के अंतर को न केवल पाटा बल्कि कांग्रेस के प्रत्याशी मोतीलाल साहू के खिलाफ 50 हजार से अधिक वोटों से लीड ले ली. अब जोगी के सामने बड़ी चुनौती इस सीट को कांग्रेस की झोली में वोटों के उतने ही बडे अंतर से डालना है जैसा कि सन् 2004 में उन्होंने कर दिखाया था.
अपनी राजनीतिक कलाबाजियों के चलते जोगी ने बहुत सफाई से अपने लिए रास्ता बना लिया है. विधानसभा का चुनाव न लडक़र उन्होंने अपने बेटे अमित की राजनीति में नए रंग भर दिए. उनकी पत्नी विधायक हैं ही और अब वे खुद संसद में पहुंचना चाहते हैं. परिवार को प्रदेश की राजनीति में स्थापित करने का कम से कम एक मकसद तो उनका पूरा हो गया है. अगर वे जीत गए, जिसकी संभावना प्रबल है तो यह उनके लिए अपार संतोष की बात होगी.

Saturday, March 22, 2014

किसे चुने, किसे छोड़ें?

कांग्रेस में टिकिट के लिए घमासान कोई नई बात नहीं है। लोकसभा एवं राज्य विधानसभा के प्रत्येक चुनाव में ऐसा होता ही रहा है। छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नहीं है। लेकिन ऐसा पहली बार है जब किसी संसदीय सीट पर प्रत्याशी के अंतिम चयन में कांग्रेस हाईकमान कोई निर्णय नहीं ले पा रहा हो। रायपुर लोकसभा सीट ऐसी ही सीट है जहां घोषित प्रत्याशी बदला गया, नया चुना गया, फिर नए को भी बदलकर पुराने पर मोहर लगाई गई और चंद घंटों के भीतर पुराने पर भी तलवार लटका दी गई। छाया वर्मा, सत्यनारायण शर्मा और फिर छाया वर्मा लेकिन अब छाया वर्मा का बी फार्म रोके जाने से इस संभावना को बल मिला है कि उनके मामले में पुनर्विचार किया जा रहा है और बहुत संभव है उनके स्थान पर किसी और को टिकट दे दी जाए। मोहम्मद अकबर और प्रतिभा पांडे वे दावेदार हैं जिनके नाम पर नई दिल्ली में विचार-मंथन किया जा रहा है।

रायपुर में प्रत्याशी के चयन को लेकर ऐसी स्थिति पहले कभी निर्मित नहीं हुई। पार्टी में गुटबाजी इसकी प्रमुख वजह है। कांग्रेस की पहली सूची में जब छाया वर्मा का नाम आया तो यह हैरान करने वाली बात थी क्योंकि उन्हें भाजपा प्रत्याशी रमेश बैस के मुकाबले बेहद कमजोर माना जा रहा था और यह वास्तविकता भी थी क्योंकि बैस का यह 7वां चुनाव है। वे रायपुर लोकसभा सीट से लगातार जीत दर्ज करते रहे हैं। ऐसे अनुभवी एवं वरिष्ठ नेता के खिलाफ दमदार प्रत्याशी उतारने के बजाए कांग्रेस ने उस छाया वर्मा पर विश्वास जताया जिनके पास उपलब्धियों के नाम पर केवल जिला पंचायत के अध्यक्ष पद रहा है। उनकी सक्रियता पर भी प्रश्नचिन्ह है। लेकिन इसके बावजूद उन्हें टिकिट प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल की सिफारिश पर दे दी गई और इस तर्क के आधार पर दी गई कि वे जातीय समीकरण में फिट बैठती हैं। यह तथ्यपरक है कि उन्हें टिकिट देने से भाजपा और कांग्रेस के बीच कुर्मी समाज के वोट विभाजित होंगे लेकिन इससे भी बड़ा सवाल था कि यदि वोटों का विभाजन हुआ तो वह किस अनुपात में होगा? छाया वर्मा की राजनीतिक हैसियत देखते हुए संशय है कि वे समाज के वोट बैंक में तगड़ी सेंध लगा पाएंगी?

बहरहाल उनकी उम्मीदवारी के बाद प्रदेश पार्टी में खलबली मची और तीव्र विरोध के बाद उनकी टिकिट काटकर विधायक सत्यनारायण शर्मा को टिकिट दे दी गई जो अपेक्षाकृत बेहतर उम्मीदवार थे। लेकिन दो दिन के भीतर ही उनकी टिकिट कट गई और दुबारा छाया वर्मा का नाम हाईकमान की ओर से घोषित किया गया। इसके विरोध में कांग्रेस भवन में जोरदार हंगामा हुआ, कुर्सियां तोड़ी गई तथा शर्मा समर्थकों ने जमकर आक्रोश व्यक्त किया। इस घटना की खबर हाईकमान तक पहुंचने के बाद रायपुर के मामले पर फिर विचार मंथन का दौर शुरू हुआ लिहाजा छाया वर्मा की उम्मीदवारी पर दुबारा संशय के बादल छा गए हैं। बकौल भूपेश बघेल उनका बी फार्म रोक दिया गया है। इसमें इस चर्चा को बल मिल रहा है कि हाईकमान रायपुर के लिए नए नामों पर विचार कर रहा है जिनमें पूर्व विधायक मोहम्मद अकबर एवंं स्व.विद्याचरण शुक्ल की बेटी प्रतिभा पांडे प्रमुख हैं।

सवाल है, रायपुर के मामले में ऐसा क्यों हो रहा है? क्या योग्य प्रत्याशी का चयन इतना कठिन है कि हाईकमान निर्णय नहीं ले पा रहा है? क्या जीत की क्षमता रखने वाले प्रत्याशियों की भारी भरकम फौज है जिसमें से किसी एक को चुनना मुश्किल हो रहा है? या रायपुर लोकसभा क्षेत्र के राजनीतिक एवं सामाजिक समीकरण में प्राथमिकता किसे दी जाए, तय नहीं हो पा रहा है? या फिर पिछले 30 वर्षों से भारतीय जनता पार्टी के कब्जे वाली राज्य की सबसे महत्वपूर्ण सीट को कांग्रेस हर हालत में जीतना चाहती है इसलिए वह प्रत्याशी चयन के मामले में फूंक-फूंक कर कदम रख रही है और प्रयोग पर प्रयोग कर रही है। दरअसल रायपुर लोकसभा के लिए प्रदेश कांग्रेस में कोई ऐसा बड़ा नेता नहीं है जो 6 बार के सांसद बैस को पराजित कर सके। विद्याचरण शुक्ल और श्यामाचरण शुक्ल जैसे दिग्गज उनके आगे टिक नहीं सके तो बाकी की बिसात क्या? लेकिन शुक्ल बंधुओं की पराजय के वक्त स्थितियां अलग थीं और अब अलग हैं। अब रमेश बैस के पक्ष में वह माहौल नहीं है जैसा पहले था। लोकसभा में उनका कमजोर प्रदर्शन तो एक वजह है ही, दूसरी बड़ी वजह है सांसद के रूप में उनकी भूमिका। 30 साल के अपने संसदीय कार्यकाल में उन्होंने ऐसा क्या किया जो लोग उन्हें याद रखें? उन पर आरोप है कि उन्होंने अपने भाई-बंधुओं को स्थापित करने के अलावा क्षेत्र के लिए कुछ नहीं किया। न तो किसानों की समस्याएं सुलझीं और न ही उन्होंने उनके लिए लड़ाई लड़ी। राज्य में पार्टी की सरकार होने के बावजूद वे सरकार पर विकास कार्यों के लिए दबाव नहीं बना सके। इसी वजह से उनकी न केवल लोकप्रियता का ग्राफ गिरा है बल्कि पार्टी कार्यकर्ताओं का एक वर्ग भी उनसे बेहद खफा है। इस स्थिति की वजह से यदि कांग्रेस आक्रामक तरीके से और संगठित होकर चुनाव लड़ेगी तो वह रमेश बैस के लिए भारी मुसीबत का सबब बनेगी। लेकिन प्रदेश कांग्रेस में दमखम रखने वाले नेताओं का अभाव है इसीलिए टिकिट के मामले में अनिर्णय की स्थिति बनी हुई है। यह देखकर रमेश बैस का खुश होना स्वाभाविक है।

टिकिट का मसला नेताओं के अहम् के टकराव का भी परिणाम है। छत्तीसगढ़ की राजनीति में जातीय समीकरण कभी इतने प्रभावी नहीं हुए कि वे एकतरफा फैसला कर सके अलबत्ता उसका महत्व जरूर रहा है। रायपुर के मामले में भी ऐसा ही है। इस लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में कुर्मियों का बाहुल्य है और वे चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। भाजपा के रमेश बैस चूंकि इसी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं लिहाजा उनका उन्हें अच्छा समर्थन मिलता रहा है। छाया वर्मा को टिकिट देने के पीछे यही बात प्रमुख रही है। लेकिन जाति के आधार पर टिकिट फायनल करने के पूर्व यह देखा जाना जरूरी है कि प्रत्याशी की राजनीतिक हैसियत एवं जमीनी पकड़ कैसी है? ज्यादा महत्वपूर्ण जमीनी पकड़ है। चूंकि छाया वर्मा इस दृष्टि से कमजोर हैं अत: वे योग्य प्रत्याशी नहीं हो सकती। सत्यनारायण शर्मा ब्राह्मण समाज से हैं और उनकी राजनीतिक एवं सामाजिक हैसियत भी बड़ी है। वे रमेश बैस को अच्छी टक्कर दे सकते थे। इसी क्रम में मोहम्मद अकबर भी हैं जो कुशल रणनीतिकार हैं। अलबत्ता प्रतिभा पांडे कमजोर हैं। उनकी केवल एक ही पहचान है कि वे पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व.विद्याचरण शुक्ल की बेटी हैं। वे राजनीति में कभी नहीं रहीं और न ही छत्तीसगढ़ में उनकी कोई सामाजिक हैसियत है। नक्सली हमले में शुक्ल की शहादत से उपजी सहानुभूति की लहर भी अब कमजोर पड़ चुकी है। यानी बैस के खिलाफ वे कमजोर हैं। ऐसी स्थिति में केवल मोहम्मद अकबर ही ऐसे हैं जो बैस को कड़ी टक्कर दे सकते हैं। संभव है हाईमान उनके नाम पर मोहर लगाए। अगर ऐसा हुआ तो रायपुर में ऐसा पहली बार होगा जब कांग्रेस का टिकिट कट-पिटकर किसी तीसरे को मिलेगी। लेकिन यह भी संभावना बनी हुई है टिकिट के साथ अब कोई छेड़छाड़ न की जाए। क्योंकि बार-बार परिवर्तन से रायपुर की टिकिट एक तमाशा बनकर रह गई है। लिहाजा छाया वर्मा की उम्मीदवारी कायम रहने की भी संभावना है।

लेकिन टिकिट के मामले में इतनी जद्दोजहद प्रदेश कांग्रेस के हक में नहीं है। यह पार्टी के भीतर चल रही रस्साकशी को रेखांकित करती हैं। इससे संगठन की कमजोरियां और अंतर्कलह उजागर होती हैं। जब चुनाव के पूर्व ऐसी स्थिति हो पार्टी भाजपा का कैसे मुकाबला कर पाएगी? वैसे भी गुटीय प्रतिद्वंद्विता की वजह से पिछले एक दशक से कांग्रेस हाशिये पर है। इस लोकसभा चुनाव में उसके पास अपनी स्थिति सुधारने का मौका है। रायपुर को छोड़ राज्य की शेष 10 सीटों पर प्रत्याशी का चयन भी ठीक हुआ है। इस दृष्टि से रायपुर में टिकिट के मामले में बार-बार परिवर्तन शायद बेहतर की तलाश के लिए है।