Tuesday, December 22, 2015

''सुजाता"" के बहाने

- दिवाकर मुक्तिबोध

6 दिसंबर 2015, रविवार के दिन रायपुर टॉकीज का ''सरोकार का सिनेमा"" देखने मन ललचा गया। आमतौर अब टॉकीज जाकर पिक्चर देखने का दिल नहीं करता। वह भी अकेले। लेकिन इस रविवार की बात अलग थी। दरअसल ''सुजाता"" का प्रदर्शन था। बिमल राय की सन् 1959 में निर्मित ''सुजाता"' के साथ कुछ यादें जुड़ी हुई थीं। सन् 1960 में हमने यह पिक्चर राजनांदगांव के श्रीराम टॉकीज में माँ-पिताजी और बहन के साथ देखी। पिताजी जिन्हें हम बाबू साहेब कहते थे, कुछ देर के लिए हमारे साथ बैठे, फिर बाहर निकल गए। घंटे - आधे घंटे के बाद फिर लौट आए। कवि, लेखक और पत्रकार के रुप में श्री गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म शताब्दी वर्ष अगले वर्ष यानी 13 नवंबर 1916 से शुरु हो जाएगा। उनके व्यक्तित्व और कृतित्च के विभिन्न पहलुओं पर बीते 50 सालों में काफी कुछ लिखा जा चुका है। उनकी कविताएं - कहानियां, उपन्यास, डायरी, आलोचनाएं, निबंध व अन्य विविध विषयों पर किया गया लेखन हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर है जिस पर दृष्टि, पुनर्दृष्टि, पुनर्पाठ, बिंबों, प्रतिबिंबों के नए-नए रहस्यों को खोजने, देखने-परखने, उद्घाटित करने तथा सामाजिक सरोकारों के साथ कुछ और नया खोजने का सिलसिला शताब्दी वर्ष में अधिक तेज हो जाएगा। पिताजी की जिन विभिन्न विषयों में गहरी रुचि थी उनमें विज्ञान और सिनेमा भी शामिल थे। विज्ञान पर विशेष आसक्ति पर सिनमा भी देखते थे। हमें याद हैं - हमने उनके साथ नागपुर में ''झांसी की रानी"" फिल्म देखी थी। सन् 1958 में हम राजनांदगांव आए। समय मिलने पर कभी-कभी वे टॉकीज जाकर फिल्म देखते थे। दो फिल्मों की याद है - ''अपना हाथ जगन्नाथ"" और ''सुजाता""। उनका सिनेमा पर लेखन बहुत सीमित है किन्तु यह उनकी अभिरुचि को दर्शाता है। तत्कालीन सिने उद्योग पर उनकी टिप्पणी ''दृष्टिकोण का दीवाला"" शीर्षक से 5 जनवरी 1941 में श्री भगवती चरण वर्मा की पत्रिका ''विचार"" में प्रकाशित हुई। एक सिने पत्रिका ''चित्रलोक"" के बारे में टिप्पणी व इसी पत्रिका में 27 जुलाई 1941 में छपी। दो फिल्में ''नगीना"" और ''नौजवान"" की समीक्षा एवं फिल्म निर्माताओं की योजनाओं पर एक लेख ''प्रतीक"" में सितम्बर 1951 में प्रकाशित हुआ। ये सभी वर्ष 2009 में राजकमल से प्रकाशित उनकी किताब ''शेष-अशेष"" में संकलित हैं। रविवार को सरोकार का सिनेमा में ''सुजाता"" को देखते हुए रह-रहकर पिताजी का स्मरण हो आया। प्रसंगवश फिल्म ''नगीना"" और ''नौजवान"" की समीक्षा यहां प्रस्तुत है -


'श्रेय' की राजनीति में निपट गया रायपुर साहित्य महोत्सव

-दिवाकर मुक्तिबोध

कुछ तारीखें भुलाए नहीं भूलती। याद रहती हैं, किन्हीं न किन्हीं कारणों से। रायपुर साहित्य महोत्सव को ऐसी ही तारीखों में शुमार किया जाए तो शायद कुछ गलत नहीं होगा। इसकी चंद वजहें है - पहली - 12 से 14 दिसंबर 2014 को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आयोजित साहित्य महोत्सव बेजोड़ था, अद्भुत था। दूसरी वजह - उस सरकार द्वारा आयोजित था जो दक्षिण पंथी विचारधारा से अनुप्राणित है। तीसरी वजह - इस आयोजन में इतना खुलापन था कि माक्र्सवादी विचारधारा से प्रेरित लेखकों, कवियों, कलाकारों एवं अन्य क्षेत्रों के दिग्गज हस्तियों ने इसमें शिरकत की और वैचारिक विमर्श में सक्रिय भागीदारी निभाई। चौथी वजह - सरकारी आयोजन होने के बावजूद विमर्श में सरकार का कोई दखल नहीं रहा। पांचवीं वजह - मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने समारोह का उद्घाटन किया लेकिन वे स्वयं एवं संस्कृति मंत्री मंच पर नहीं, दर्शक दीर्घा में बैठे क्योंकि वामपंथी लेखक ऐसा चाहते थे जिन्होंने समारोह की तैयारियों के दौरान इस तरह की प्रतिक्रिया जाहिर की थी। छठवीं वजह - समारोह अपने उद्देश्य में, राजनीतिक और साहित्यिक दृष्टि से सफल रहा। सातवीं वजह - भाजपा की रमन सिंह सरकार देश भर में यह संदेश देने में कामयाब रही कि वह असहमति का भी सम्मान करती है। आठवीं और मेरे विचार से समारोह की तारीखों को याद रखने की अंतिम वजह है - असहमति के सम्मान का सिर्फ एक साल, 12 से 13 दिसंबर 2014। इस वर्ष यानी 2015 में यह आयोजन नहीं होगा। कारण प्रदेश में सूखा। इसलिए वर्ष 2014 की यें तारीखें जेहन में रहेंगी और याद रखी जाएंगी कि छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय स्तर का कोई साहित्य-संस्कृति का अपूर्व समागम हुआ था जिसमें वामपंथी एवं दक्षिणपंथी लेखक बिरादरी ने एक साथ एक ही मंच साझा किया।
दरअसल इस वर्ष अल्प वर्षा के कारण प्रदेश में भीषण सूखा पड़ा है। ऋण ग्रस्त किसानों द्वारा आत्महत्या की बढ़ती घटनाएं स्थिति की भयावहता की ओर इशारा करती है। लिहाजा किसी भी प्रकार का जश्न मनाने के लिए यह समय उचित नहीं है, ऐसा माना जाता है। पर समाराहों से कन्नी कैसे काटी जा सकती है? प्रदेश में वे तो हो रहे हंै और अच्छे स्तर पर हो रहे हैं। मिसाल के तौर पर 1 नवंबर 2015 को सिर्फ एक दिन के लिए पूरे राज्य में स्थापना दिवस समारोह मनाया गया। यह अलग बात है कि पूर्व की तरह इस बार ज्यादा तामझाम नहीं किया गया। करोड़ों तो खर्च हुए पर पहले ही तुलना में कम। राज्य स्तरीय अलंकरण भी बांटे गए। विजेताओं को पुरस्कृत किया गया। संगीत समारोह भी हुआ। यानी सूखे के बीच में जश्न मना। चलिए और उदाहरण देखें - राजधानी में पहली बार खेलों के अंतरराष्ट्रीय आयोजन हुए। विश्व कप हॉकी लीग फायनल एवं आई.पी.टी.एल. (इंडियन प्रीमियर टेनिस लीग) टेनिस जिसमें विदेशी टीमों एवं खिलाडि़यों ने भाग लिया। नवंबर 2015 में हफ्ते-दस दिन चलने वाले विश्व कप हॉकी लीग का आयोजन भव्य और गौरवपूर्ण रहा। दिसंबर में लॉन टेनिस ने भीअपनी चकाचौंध बिखेरी। यह भी भव्य और महत्वपूर्ण आयोजन हुआ, छत्तीसगढ़ सरकार की मेजबानी में। और भी उदाहरण है जो यह जाहिर करते हैं कि शोक अपनी जगह पर है और समारोह अपनी जगह पर। जब ऐसी स्थिति है तो सवाल उठता है - साहित्य-संस्कृति का राष्ट्रीय समारोह क्यों नहीं? वह भी जब देश में असहिष्णुता पर अच्छी खासी बहस चल रही हो तथा साहित्य-संस्कृति के मनीषी इस मुद्दे पर अपनी राय पक्ष या विरोध में व्यक्त कर रहे हो, तब राज्य में साहित्य समारोह के बहाने क्या इस विषय पर चिंतन नहीं किया जा सकता था? संसद में बहस हो सकती है तो राज्य के सार्वजनिक मंच पर क्यों नहीं? क्या सरकार ने तय कर लिया था कि साहित्यिक आयोजन सिर्फ एक वर्ष होगा, हर वर्ष नही। इसकी क्या वजह? यदि ऐसा है तो धार्मिक आयोजन राजिम कुंभ प्रतिवर्ष क्यों? क्यों इस आयोजन पर प्रतिवर्ष 2 से 3 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं?
       दरअसल पिछले वर्ष समारोह के समापन के बाद ही तय हो गया था यह साहित्य महोत्सव पहला और आखिरी है। आयोजन इसलिए हुआ क्योंकि नौकरशाहों में कुछ ऐसे प्रखर बुद्धिजीवी थे जो चाहते थे सरकार को राजनीति से उपर उठकर साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में कुछ ऐसे कार्य करने चाहिए जिससे जनता के बीच अच्छा संदेश जाए और मुख्यमंत्री की छवि भी निखरे। इसी वजह से समारोह में वामपंथी विचारधारा के दिग्गज लेखकों, विचारकों व कलाकारों को भी आमंत्रित किया गया जिन्होंने सरकार का आमंत्रण न केवल स्वीकार किया वरन बाद में आयोजन की भूरि-भूरि प्रशंसा भी की। ऐसे लेखकों में प्रख्यात कवि व आलोचक अशोक वाजपेयी भी शामिल है। लेकिन वामपंथी विचारकों का एक वर्ग इसके खिलाफ था तथा उसने निमंत्रण स्वीकार करने वाले अपने सहविचारकों की खूब लानत -मलानत की। ऐसे लेखकों में प्रमुख है वीरेंद्र यादव व मंगलेश डबराल। वीरेंद्र यादव की प्रतिक्रिया देखिए - ''साहित्य संसार में रायपुर प्रसंग के गहरे निहितार्थ है। इसमें शामिल होने वाले लेखक भाजपा की उस सरकार के जनतांत्रिक होने को वैधता प्रदान कर रहे थे जो माओवाद के उन्मूलन के नाम पर छत्तीसगढ़ राज्य में असहमति की आवाजों और आंदोलनों का क्रूर दमन कर रही है। आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन की कारपोरेट लूट का संगठित अभियान जितना तेज रमन सिंह की सरकार के शासन में है, उतना पहले कभी नहीं था।''
अब मंगलेश डबराल की टिप्पणी - ''यह भाजपा सरकार का आयोजन है। यह क्यों हो रहा है, समझना कठिन है। दरअसल छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड जो तीन नए राज्य बने हैं, उनकी कोई सांस्कृतिक नीति नहीं है। छत्तीसगढ़ भौतिक रुप से सक्षम है लेकिन सांस्कृतिक तौर पर विपन्न। ऐसे में इस आयोजन का मतलब समझना मुश्किल है।''
         साहित्य समारोह के आयोजन के समर्थन में अशोक वाजपेयी ने अपने चर्चित स्तंभ 'कभी-कभार' में लिखा - ''किसी अंचल के शहरों जैसे जयपुर, लखनऊ, आगरा, अजमेर, बनारस, पटना में ऐसे साहित्यिक महोत्सव होते रहे है। लेकिन अधिकांश सरकार की पहल पर नहीं। ऐसे में रायपुर महोत्सव का सरकारी पहल पर होना अनूठा है। लोकतंत्र में हर सरकार की संस्कृति के प्रति जिम्मेदारी होती है। पर सरकार को संस्कृति के मसले को विचारधारा के ऊपर रखना चाहिए और दृष्टियों, शैलियों की बहुलता का सम्मान करना चाहिए।''
रायपुर महोत्सव पर प्रख्यात कवि विनोद कुमार शुक्ल की टिप्पणी बहुत सहज और सरल थी। उन्होंने कहा - 'कुछ तो हो रहा है' को कहना चाहूंगा - कुछ तो अच्छा होना चाहिए।''
तीन दिन और 53 सत्रों में चले रायपुर साहित्य महोत्सव के आयोजन पर वामपंथी विचारधारा के लोग ही गरजे- बरसे किन्तु, आश्चर्यजनक रुप से दक्षिण मार्ग के समर्थक लेखकों व साहित्यकारों ने खामोशी अख्तियार की। उन्होंने वामपंथियों की बहस में हस्तक्षेप नहीं किया। कोई एतराज नहीं जताया। कोई विवाद में नहीं उलझा। आयोजन आशा से अधिक सफल रहा तथा देश में इसकी अच्छी चर्चा हुई। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह वैसे ही सीधे-सरल राजनेता हैं। समारोह में वे स्वयं होकर लेखकों से एक-एक करके मिले, उनका कुशल-क्षेम पूछा। और मंच साझा न करके उन्होंने वामपंथी लेखकों की भावनाओं का सम्मान किया व राज्य में एक नई मिसाल कायम की। उनकी वैचारिक उदारता की छवि तो निखरी किन्तु आयोजन की निरंतरता को बनाए रखने के लिए वे न तो कठोरता से पेश आए और न ही प्रतिबद्धता दिखाई। राज्य में सूखा तो एक बहाना है, दरअसल साहित्यिक आयोजन, राजनीति और नौकरशाही के द्वंद्व का शिकार हुआ। भाजपा के अंदरखाने में यह चर्चा जोरदार हुई कि बड़ी संख्या में वामपंथी लेखकों को बुलाने की क्या जरुरत थी, क्यों इसे विवादास्पद बनाया गया? विचारधारा के विपरीत क्यों चला गया? कांग्रेस ने सवाल उठाया कि जब राज्य में नक्सली घटनाओं में बड़ी संख्या में आदिवासी मारे जा रहे हों एवं बिलासपुर नसबंदी कांड में दर्जनों महिलाओं की मृत्यु जैसी घटनाएं घटित हुई हों, किसान आत्महत्या कर रहे हों और इस वजह से राज्य में शोक का माहौल हो, तो साहित्य उत्सव क्यों होना चाहिए? नौकरशाही में भी श्रेय को लेकर खींचतान मची। यह कहा गया कि जनसंपर्क विभाग को मेजबानी करने की क्या जरुरत थी? यह संस्कृति विभाग का काम था। मुख्यमंत्री के सामने अपने को बेहतर साबित करने की कोशिश में साहित्य समारोह का आयोजन जनसंपर्क विभाग के आला अफसरों ने किया। जाहिर सी बात है, नौकरशाही के एक बड़े तबके ने आयोजन को पसंद नहीं किया लिहाजा इसकी निरंतरता खटाई में पड़ गई।
       बहरहाल सूखे की मार झेल रहे प्रदेश में साहित्य-संस्कृति की धारा किस तरह बहेगी, फिलहाल कहना मुश्किल है किन्तु यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी वर्ष में राज्य सरकार का धार्मिक अनुष्ठान ''राजिम कुंभ'' होगा अथवा नहीं। करोड़ों के खर्च का यह समारोह विगत वर्षों से नियमित रुप से हो रहा है। यदि अगले वर्ष 2016 में इसका आयोजन स्थगित रखा गया तो मानना होगा सरकार की समदृष्टि है। वरना साहित्य उसी खूंटी में टंगा नजर आएगा जहां कभी-कभार ही उसे हिलाया-डुलाया जाता है। और यह सवाल फिर गूंजेगा - ''पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है।''

Monday, December 7, 2015

यादें : जब मुक्तिबोध ने ट्रेन की जंजीर खींची

 - दिवाकर मुक्तिबोध

नाम - श्री कन्हैयालाल अग्रवाल। उम्र 93 साल। मुकाम - राजनांदगांव, छत्तीसगढ़। पीढ़ी दर पीढ़ी। पिछले करीब डेढ़ सौ वर्ष से। व्यवसाय - व्यापार। संस्थान-भारती प्रिंटिंग प्रेस एवं बुक डिपो। स्थापना - 19 अगस्त 1948 स्वास्थ्य - एकदम फिट। चुस्त-दुरुस्त। अभी भी अपने रोममर्रा के काम के लिए किसी के सहारे की जरुरत नहीं, खुद करते हैं।
      यह संक्षिप्त परिचय एक ऐसे व्यक्ति का है जो कट्टर राष्ट्रवादी हैं, चिंतक हैं और जिसने अपने व्यवसाय के हित में कभी कोई अनैतिक कार्य नहीं किए। कोई समझौते नहीं किए। इसलिए सदर बाजार स्थित उनकी प्रिटिंग प्रेस एवं दुकान 66-67 साल पहले जिस हालत में थी, अभी भी उसी हालत में है।
     श्री कन्हैयालाल जी का एक और परिचय है जो साहित्यिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण  है। वे साहित्यिक नहीं है पर साहित्य और साहित्यकारों से उन्हें प्रेम है। विशेष लगाव है। साहित्यिक बिरादरी में प्राय: रोजाना उठना-बैठना होता रहा है और वे मेरे पिता स्व. गजानन माधव मुक्तिबोध के अनन्य मित्र रहे हैं। आज की तारीख में संभवत: पिताजी के एकमात्र जीवित मित्र।
     सन् 1958 में पिताजी नागपुर के ''नया खून''  से विदा लेकर राजनांदगांव दिग्विजय कॉलेज में प्रोफेसरी करने आए थे। इसके पूर्व नागपुर में श्री शरद कोठारी ने उनकी मुलाकात कन्हैयालालजी से करवाई थी। हम सब भाई-बहन छोटे-छोटे थे और राजनांदगांव आने के बाद केवल इतना जानते थे कि पिताजी की मित्र मंडली में कन्हैयालालजी भी है। वे अक्सर हमारे किलापारा स्थित घर में आया करते थे। पिताजी के साथ हम भी उनके यहां जाया करते थे। विशेषकर स्कूल खुलने के दिनों में, जब कापी-किताबों की जरुरत पड़ती थी। इसके अलावा भी दूसरे दिनों में जब मर्जी हो, हम उनके यहां पहुंच जाते थे, साथ में माँ भी हुआ करती थी। चूंकि उनके बेटे-बेटियां हमारी ही उम्र के थे इसलिए हमारी दोस्ती एक अलग रंग की हुआ करती थी। यह रंग कभी हमारे यहां बिखरता था तो कभी उनके यहां। उस जमाने की दोस्ती जिसे अब 50-55 वर्ष हो गए, अभी भी कायम है।
      11 सितंबर 1964 को पिताजी गुजरे और राजनांदगांव से रिश्ता करीब-करीब टूट सा गया। भिलाई नगर और रायपुर में पढ़ाई लिखाई और बाद में नौकरी। इस चक्कर में आधी सदी कब बीत गई पता ही नहीं चला। सालों-साल राजनांदगांव भी नहीं जा पाए अलबत्ता आत्मीय संबंधों की महक हृदय में बनी रही। शहर भले ही छूट जाए लेकिन मन के किसी कोने में वह हमेशा जीवित रहता है तथा एक अनोखे सुख का अहसास देता रहता है। इसलिए सिर्फ काम के सिलसिले में राजनांदगांव प्रवास और बिना किसी से मिले, रायपुर लौट आने के बावजूद उसी ताजगी का एहसास जीवित होता रहा जो बचपन में हुआ करता था। हमारे वास्तव में खूब मजे के दिन थे।
       राजनांदगांव में मेरे लिए ऐसा कुछ नहीं था कि व्यक्तिगत संबंधों पर कोई संस्मरण लिखूं। वहां हमारे कुल जमा वर्ष थे सन् 1958 से 1964 यानी महज 6 साल। वह भी बचपन के 6 वर्ष। इसलिए कभी ख्याल नहीं आया कि पिताजी के मित्रों से, घनिष्ठ मित्रों से जो गिनती के थे, कोई संस्मरणात्मक बातचीत करनी चाहिए। इसकी एक और वजह थी उनके (पिताजी) के साहित्यिक मित्रों ने जिनमें श्री शरद कोठारी एवं रमेश याग्निक (दोनों स्वर्गीय) प्रमुख थे, काफी कुछ लिखा था। इंटरव्यू दिए थे जो पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। इसलिए मेरे लिए कोई गुंजाइश नहीं थी। पर सच तो यही है कि पत्रकार होने के बावजूद मैं इस बारे में सोच नहीं सका और समय की रफ्तार के साथ पिताजी के ये दोनों घनिष्ठ दुनिया से विदा हो गए।
     एक दिन राजनांदगांव प्रवास के दौरान एकाएक ख्याल आया - कन्हैयालालजी से मिलना चाहिए। उनके बारे में, उनके स्वास्थ्य के बारे में रायपुर में सरकारी नौकरी कर रहे उनके बड़े बेटे भारत अग्रवाल से जानकारी मिल जाती थी। वे स्वस्थ्य हैं , अभी भी दुकान का कामकाज देखते हैं। इसलिए उनके स्वास्थ्य के प्रति निश्चितता थी। चूंकि मन उनसे मिलने के लिए उमड़ा जा रहा था, लिहाजा हम चारों भाई बड़े भैया रमेशजी, दिलीप, गिरीश और मैं एक दिन उनके घर-दुकान पहुंच गए। गोरे चिट्टे और दुबले-पतले कन्हैयालालजी के प्रभावशाली व्यक्तित्व पर उम्र की कोई खरोंचे नहीं आई थी। अभी भी वैसे ही थे, ताजा दम। हल्की-फुल्की बातें हुई, कुछ यादें उन्होंने ताजा की। उनका स्नेह भरा आशीर्वाद लेकर हम रायपुर के लिए लौटे तो इस इरादे के साथ कि शीघ्र दुबारा राजनांदगांव जाकर कन्हैयालालजी से पिताजी के संबंध में लंबी बातचीत करेंगे।
      उम्र भले ही कितनी भी क्यों न हो जाए, जिंदगी की भाग-दौड़ कभी कम नहीं होती। सो राजनांदगांव जाने का मामला टलता रहा। आखिरकार नवम्बर 2015 को फिर हम चारों कन्हैयालालजी से मिलने राजनांदगांव पहुंच गए। हमारे लिए यह आश्चर्य की बात थी कि इसके पूर्व कन्हैयालालजी से किसी ने कोई इंटरव्यू नहीं लिया और न ही कोई बातचीत की। जबकि पिताजी के राजनांदगांव के मित्रों का पत्र-पत्रिकाओं में जहां कहीं भी जिक्र हुआ, कन्हैयालालजी भी उसमें नामांकित रहे हंै। सिर्फ नामांकित। यह वंचना शायद इसलिए क्योंकि कन्हैयालालजी साहित्यिक चर्चाओं में केवल श्रोता के रुप में उपस्थित रहते थे। बहस-मुबाहसे में उनकी भागीदारी नहीं हुआ करती थी। खुद कन्हैयालालजी का मानना था कि मुक्तिबोध के साहित्य पर वे क्या बोल सकते थे। लेकिन राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मसलों पर चलने वाले विमर्श में उनकी खूब भागीदारी रहती थी। इसलिए किसी के साथ संस्मरणों को साक्ष करने जैसी बात कभी नहीं बनी अलबत्ता अनौपचारिक बातचीत में वे पिताजी के साथ बिताए गए दिनों का जिक्र अवश्य किया करते थे। बहरहाल हमारे उनके साथ बातचीत महज आधे घंटे चली। इस आधे घंटे में उन्होंने पिताजी से संबंधित कुछ घटनाओं का जिक्र किया जो पिताजी की प्रकृति का आभास कराती है। ये यादें अनोखी हैं, अद्भुत है। उन्हीं की जुबानी संस्मरण के कुछ किस्से सुनिए -
*        मुक्तिबोध सन् 1958 में नागपुर से परिवार एवं साजो सामान के साथ राजनांदगांव आ रहे थे। पैसेंजर से। ट्रेन का नांदगांव में स्टॉपेज महज 1-2 मिनट का था। इतने कम समय में घर-घर गृहस्थी के सामान को उतारना संभव नहीं था। और तो और मुक्तिबोध जी को नींद लग गई है। राजनांदगांव स्टेशन आने पर एक सहयात्री ने उन्हें उठाया। मुक्तिबोध जी घबरा गए। किसी ने उन्हें सलाह दी ट्रेन के शुरु होते ही चेन खींच दीजिए। मुक्तिबोध ने ऐसा ही किया। ट्रेन 5-6 मिनट तक रुकी रही और इस बीच सामान नीचे उतर गया। लेकिन कुछ दिनों बाद मुक्तिबोध के नाम कोर्ट का नोटिस आ गया। अदालत में हाजिरी देने के निर्देश। पेशियां अटेण्ड करते-करते मुक्तिबोध परेशान। एक दिन उन्होंने मुझे ये परेशानी बताई। मैंने कहा चिंता ना करें। मैंने पता लगा जज दामले थे। लाँजी वाले मेरे मित्र के बेटे। लेकिन मैं उनसे इस विषय पर सीधी बात नहीं कह सकता था। एक दिन व्यापारिक कार्य से मैं लाँजी गया और दामले के यहाँ भोजन के दौरान उन्हें परेशानी बताई। नतीजा यह निकाला कि अगली ही पेशी में मामला खत्म हो गया। मुक्तिबोधजी ने चैन की सांस ली। मुझे भी अच्छा लगा कि मैं उनके काम आया।
*         एक और घटना है। मुक्तिबोध बहुत स्वाभिमानी थे। आर्थिक संकट से घिरे रहते थे किन्तु किसी से कहते कुछ नहीं थे। उनकी मदद के लिए मुझे एक उपाय सूझा। मैंने उन्हें 500 रुपये दिए और कहा दुर्ग जिले के सामाजिक अध्ययन पर एक किताब लिख दीजिए। मैंने उन्हें संदर्भ देखने कुछ किताबें दे दी। मुक्तिबोधजी ने कहा किताब तो लिख दूंगा पर उसमें मेरा नाम नहीं जाएगा। मैंने कहा मंजूर है। उन्होंने किताब लिखी और वह हीरालाल सोनबोईर के नाम से छपी। अपने लिखे पर दूसरे का नाम देखना सहज नहीं है। पर पैसों की दिक्कत के चलते मुक्तिबोधजी ऐसा लेखन किया करते थे।
*       मुक्तिबोध से पहली मुलाकात नागपुर में हुई, शरद कोठारी के साथ। दिग्विजय कॉलेज नया-नया खुला था। शरद कोठारी चाहते थे, मुक्तिबोध यहां आए। उन्होंने मुझे उनके बारे में बताया। कोठारी के साथ मैं भी कॉलेज प्रबंधन कमेटी का सदस्य था। राजनांदगांव जिले के निर्माता और तत्कालीन मध्यप्रदेश के पूर्व मंत्री किशोरीलाल शुक्ल अध्यक्ष थे। कोठारी निंश्चित थे, मैं कहूंगा तो शुक्ल ना नहीं करेंगे। नागपुर में मुक्तिबोधजी से मुलाकात के बाद मैंने शुक्लजी से बात की। बात बन गई। शुक्लजी ने मंजूरी दी और मुक्तिबोध दिग्विजय कॉलेज में लेक्चरर की नौकरी पा गए। उनका यहां आना कितना सार्थक रहा, यह सभी को ज्ञात है। उनका महत्वपूर्ण लेखन राजनांदगांव में ही हुआ। क्योंकि उनके जीवन में कुछ निश्चिंतता आई थी। अर्थभाव कुछ कम हुआ था।
*     किशोरीलालजी के बारे में कुछ कहूं। वे उदारवादी, सरल व्यक्ति थे। मुक्तिबोधजी माक्र्सवादी थे। उनकी गतिविधियों पर शासन के लोग नजर रखते थे। किशोरीलालजी से पूछा गया कि मुक्तिबोध अपने माक्र्सवादी चिंतन को छात्रों पर थोपने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं? शुक्लजी से रिपोर्ट मांगी गई। उन्होंने शासन को जवाब दिया - मुक्तिबोधजी अध्यापन के दौरान विचारों का घालमेल नहीं कर रहे हैं। वे अपने कत्र्तव्य के प्रति बहुत सचेत और ईमानदार हैं।
*         मुक्तिबोधजी लेखक और कवि हैं, हम इतना ही जानते थे। लेकिन इतने महान थे, इसका अहसास उनकी मृत्यु के बाद हुआ। उन्हें गुजरे हुए 50 साल से ज्यादा हो गए है लेकिन उनकी ख्याति उत्तरोत्तर बढ़ रही है। मुझे गर्व है कि इतने बड़े साहित्यकार मेरे मित्र हैं। राजनांदगांव में रहते हुए उनका मुझे भरपूर स्नेह मिला जो मेरे लिए जीवनभर की पूंजी है।
पिताजी की यादों में खोए कन्हैयालाल अग्रवाल ज्यादा कुछ नहीं कह पाए। लेकिन उनकी ऑखों में यादों के झिलमिलाते अक्स को देखा-पढ़ा जा सकता था। 93 की उम्र में घटनाओं को याद रखना कम बड़ी बात नहीं है। यह हमारा सौभाग्य है कि उनके जैसे प्रखर राष्ट्रवादी एवं उनके स्नेहिल परिवार से हमारे घनिष्ठ संपर्क रहे हैं और वे आज भी हैं।

Friday, December 4, 2015

न जोगी खारिज, न वोरा

-दिवाकर मुक्तिबोध
कांग्रेस बैठे-ठाले मुसीबत मोल न ले तो वह कांग्रेस कैसी? अपनों पर ही शब्दों के तीर चलाने वाले नेता जब इच्छा होती है, शांत पानी में एक कंकड़ उछाल देते है और फिर लहरे गिनने लग जाते हैं। छत्तीसगढ़ कांग्रेस में पिछले चंद महीनों से काफी कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। तीसरे कार्यकाल के ढाई साल देख चुकी रमन सरकार के खिलाफ उसका ऐसा आक्रामक रुप इसके पहले कभी देखने में नहीं आया। विशेषकर भूपेश बघेल के हाथों में प्रदेश कांग्रेस की कमान आने के बाद कांग्रेस की राजनीति में एक स्पष्ट परिवर्तन लक्षित है। बरसों से चली आ रही खेमेबाजी तो अपनी जगह पर कायम है पर आतंरिक द्वंद्व और गुटीय राजनीति के तेवर कुछ ढीले पड़े हैं। ऐसा लगता है कि प्रदेश कांगे्रस ने तीन वर्ष बाद सन् 2018 में होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव के लिए अभी से कमर कस ली है और एक सुनियोजित अभियान के तहत राज्य सरकार की नीतियों, उसके कामकाज के तौर-तरीकों, जनता से किए गए उसके वायदे, नीतियों के क्रियान्वयन में हो रही घपलेबाजी तथा आधारभूत संरचनाओं के निर्माण में भारी भ्रष्टाचार से संबंधित मुद्दे खड़े किए जा रहे हैं एवं जनता को सही संदेश देने के लिए सिलसिलेवार धरना प्रदर्शन, रैलियां एवं सभाएं की जा रही हैं। कुल जमा प्रदेश कांग्रेस विधानसभा के भीतर एवं बाहर एक दमदार विपक्ष की भूमिका का निर्वहन कर रही हैं ।
     
प्रदेश कांग्रेस में ऊपरी तौर पर नजर आने वाले दो स्पष्ट खेमे है। संगठन खेमे का नेतृत्व भूपेश बघेल एवं टीएस सिंहदेव करते हैं जिन्हें वयोवृद्ध नेता एवं राष्ट्रीय कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा का आर्शीवाद प्राप्त है। दूसरा खेमा पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का है जो संगठन खेमे से पिछले एक दशक से लड़ रहे हैं। गुटीय प्रतिद्वंद्विता के अनियंत्रित उफान की वजह से ही कांग्रेस पिछले तीन चुनाव हार चुकी है लेकिन अब चौथे के लिए फिलहाल सबक लेती दिख रही है। राज्य विधानसभा के चुनाव में अभी तीन वर्ष पड़े हुए हैं। काफी लंबा वक्त है इसलिए टीएस सिंहदेव द्वारा उछाले गए कंकड़ से राजनीति के अंत:पुर में जो लहरे उठ रही हैं उससे कोई बहुत ज्यादा नुकसान होने की संभावना नहीं है। अलबत्ता निश्चय ही उनका बयान गैरजरुरी था और इससे बाहृय तौर पर कांगे्रस में जो एकता नजर आ रही थी, उसे इससे झटका लगा है और तनाव का फिर  एक नया मोर्चा खुल गया है।
      टीएस सिंहदेव ने हाल ही में एक न्यूज चैनल को दिए गए इंटरव्यू में कह दिया कि मोतीलाल वोरा और अजीत जोगी के दिन लद गए हैं और अगले चुनाव में उनका नाम मुख्यमंत्री के रुप में प्रोजेक्ट नहीं किया जा सकता। उन्होंने इस दौड़ में भूपेश बघेल, चरणदास महंत, रविंद्र चौबे और सत्यनारायण शर्मा के साथ स्वयं को भी शामिल होना बताया। उनके इस बयान के बाद अजीत जोगी की प्रतिक्रिया स्वाभाविक ही थी। कांग्रेस में माहौल गर्म हो गया। अजीत जोगी ने कहा - ''टीएस सिंहदेव अपने मुंह मियां मिट्ठू बन रहे हैं। वे किसी खुशफहमी न रहे। राजशाही का दौर खत्म हो गया है। लोकतंत्र में किसका समय कब खत्म होता है जनता तय करती है। टीएस सिंहदेव, भूपेश बघेल, अजीत जोगी या मोतीलाल वोरा का समय कब खत्म होगा, यह भी जनता तय करेगी।''
    
कांग्रेस की राजनीति में यह वाकयुद्ध जारी है। पर यह अभी दोनों के ही बीच में है। कोई तीसरा, चौथा या पांचवां और दोनों खेमों के कांग्रेसी फिलहाल इस विवाद से दूर है। मोतीलाल वोरा ने भी सिंहदेव के विचारों पर कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं दी है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह विवाद ज्यादा तूल नहीं पकड़ेगा और शीघ्र शांत हो जाएगा लेकिन इसने प्रदेश कांग्रेस में एक नई बहस की शुरुआत तो कर दी है। सवाल है कि क्या कांग्रेस भी अपनी नीतियों में परिवर्तन करते हुए राज्य विधानसभा के आगामी चुनावों में मुख्यमंत्री के रुप में किसी को प्रोजेक्ट करेगी? पार्टी की मान्य परपंरा इसके खिलाफ है। कांग्रेस का अब तक का इतिहास रहा है कि आम चुनाव अथवा राज्य के चुनाव में वह किसी नाम को प्रोजेक्ट नहीं करती। चुनाव के बाद आलाकमान के निर्देश पर रायशुमारी की जाती है तथा बहुमत के आधार पर नेता का चयन किया जाता है। अगले वर्ष पश्चिम बंगाल सहित 5 राज्यों में चुनाव होने वाले है और उसके अगले वर्ष यानी 2017 में उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण चुनाव है। यानी अगले दो वर्ष पार्टी के लिए संभावनाओं से भरे हुए है।
     दरअसल बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों से कांग्रेस उत्साहित है। उसकी दृष्टि से परिणाम उसके लिए बेहतर रहे हैं जबकि सत्ता की प्रमुख दावेदारी रही भाजपा को पराजय के बाद अहसास हो रहा है कि मुख्यमंत्री का नाम प्रोजेक्ट न करके उसने गलती की। भाजपा अब पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों के चुनाव के संदर्भ में इस मसले पर विचार कर रही है। कांग्रेस में इस पर कोई गंभीर विचार-विमर्श नहीं है क्योंकि पश्चिम बंगाल में वह प्रमुख प्रतिपक्ष नहीं है। इसलिए उन राज्यों में जहां उसकी द्वितीय हैसियत नहीं है, उसे ऐसा करने की जरुरत नहीं है। उसे वहां बिहार की तरह अपना प्रदर्शन सुधारना है। लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में वह प्रमुख विपक्ष की भूमिका में है इसलिए नाम प्रोजेक्ट करना तार्किक कहा जा सकता है।
      लेकिन ऐसा करने से कांगे्रस के लिए खतरे ज्यादा है। क्योंकि वह पार्टी अनुशासन में भाजपा से बेहतर नहीं है। मिसाल के तौर पर देखें - सिंहदेव ने बयान क्या दिया विवाद का छोटा-मोटा ही सही, तूफान खड़ा हो गया। कल्पना कीजिए यदि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने वास्तव में किसी का नाम मुख्यमंत्री के बतौर प्रोजेक्ट किया तो क्या होगा? जब चुनाव की गंभीर तैयारियों के दौरान ही टिकट वितरण से लेकर चुनाव प्रचार तक आपस में तलवारें चलती हैं और सिपहसलार और प्यादें नापसंदगी व राजनीतिक दुश्मनी की वजह से एक-दूसरे को हराने की जुगत करते हैं, तब सोचा जा सकता है कि मुख्यमंत्री का नाम प्रोजेक्ट होने के बाद भीतरघात की शक्ल कितनी भयावह होगी? इसलिए वर्ष 2018 के राज्य विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस ऐसा कुछ नहीं करेगी जिससे उसकी संभावनाओं पर विराम लगे। अब सवाल है, टीएस सिंहदेव ने ऐसा विवादित बयान क्यों दिया? क्या इसके पीछे कोई खास वजह थी? स्थितियों को भांपने क्या हाईकमान की ओर से कोई संकेत था? या यों ही, बेखयाली में कह दिया ताकि जनता को पता चलें कि भावी मुख्यमंत्री की दौड़ में वे भी शामिल हैं। अंतिम बात ज्यादा सटीक नजर आती हैं।
     अब टीएस सिंहदेव के बयान का दूसरा पक्ष देखें। उन्होंने कहा मोतीलाल वोरा और अजीत जोगी के दिन अब लद गए। यानी अपनी निजी राय में उन्होंने इन दोनों को मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर कर दिया। मोतीलाल वोरा 85 के घेरे में है और चाल-ढाल से काफी अशक्त दिखते हैं किन्तु कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में उनके पैर अभी भी गहराई से जमे हुए हैं। इसलिए ऐन वक्त पर वे छत्तीसगढ़ में टपक पड़े तो हैरानी नहीं होनी चाहिए क्योंकि वे राज्य के कांग्रेसियों के सर्वमान्य है। उनका नाम आने पर सभी दावे-प्रतिदावे पस्त हो जाएंगे। इसलिए यह कहना है कि उनका समय बीत गया है, उचित प्रतीत नही होता। और जहाँ तक अजीत जोगी का सवाल है, वे सन् 2003 के चुनाव से ही दोबारा मुख्यमंत्री बनने की ख्याहिश पाले हुए हैं। सन् 2008 के चुनाव में तो उन्होंने अपनी सभाओं में स्वयं को मुख्यमंत्री के बतौर पेश भी किया। शारीरिक रुप से अशक्त होने के बावजूद उनके तेज में कमी नही आई है तथा उन्होंने अपने गुट को एकजुट और मजबूत रखा है। उन्हें सन् 2018 के चुनाव की प्रतीक्षा है। उनका प्रयास रहेगा, वे नहीं तो उनकी विधायक पत्नी मुख्यमंत्री बने। इसलिए उनके बारे में भी यह कहना कि उनके दिन समाप्त हो चुके है, ठीक नहीं है। फिर यह नहीं भूलना चाहिए कि कांगे्रस एक विस्मृत और मुख्यधारा से हट चुके नेता को भी अप्रतिम सौगात देकर जिंदा कर देती है। पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव इसके सर्वोत्तम उदाहरण है। इसलिए दोनों की भी संभावनाएँ जीवित हैं। कुल मिलाकर सिंहदेव विवाद का पटाक्षेप एक अप्रिय बहस के साथ समाप्त होने वाला है।

Monday, November 30, 2015

मंत्रियों की पीड़ा, ये कैसे नौकरशाह

- दिवाकर मुक्तिबोध
किसी राज्य के मंत्री यदि यह गुहार लगाए कि अधिकारी उनकी सुनते नहीं, उनकी परवाह नहीं करते, उनका काम नहीं करते तो इसे क्या कहा जाए? जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि होने और सत्ताधिकार के बावजूद उनकी अपनी कमजोरी, भलमनसाहत, नेतृत्व की अक्षमता या और कुछ? नौकरशाही के अनियंत्रित होने की और क्या वजह हो सकती है? जाहिर सी बात है जब राजनीतिक नेतृत्व कमजोर होगा तो प्रशासनिक पकड़ भी कमजोर होगी और ऐसी स्थिति में स्वाभाविक है नौकरशाही बेलगाम होगी तथा मंत्री अपनी कमजोरियों के चलते मुख्यमंत्री के सामने उसकी निरंकुषता का रोना रोते रहेंगे। छत्तीसगढ़ में यही हो रहा है, यदि ऐसा कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। राज्य में सन् 2003 से डा. रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा का शासन है। इस दौरान राज्य के अनेक मंत्री मुख्यमंत्री एवं संगठन की बैठकों में प्रशासनिक अधिकारियों के कामकाज और उनके द्वारा की जा रही उपेक्षा की शिकायतें करते रहे हैं। अभी हाल ही में 24 नवंबर 2015 को मुख्यमंत्री निवास में केबिनेट मीटिंग में, अफसरों को विदा करने के बाद मंत्रियों ने जमकर नौकरशाही पर अपनी भड़ास निकाली। उनका आरोप था कि अफसर जान बूझकर मंत्रियों को बदनाम करने के लिए पुराने मामलों को हवा दे रहे हंै। जिस काम के लिए उन्हें निर्देशित किया जाता हंै, वे या तो करते नहीं या किसी न किसी बहाने से अटका देते हंै। अधिकारियों का एक ही धंधा है, पैसा बनाओ तथा मंत्रियों को बदनाम करो। अधिकारी इतने सयाने है कि अपना काम सुनियोजित तरीके से करवा लेते हंै और जिस मामलों में उनका हित नहीं सधता, उन्हें तरह-तरह के बहानों से लटका देते हंै। अपनी मंत्रियों की व्यथा सुनने के बाद मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने आश्वस्त किया कि वे इस मामले को देखेंगे और जहाँ आवश्यकता होगी जांच करवाकर उचित कदम उठाए जाएंगे।
    केबिनेट में हुई इन चर्चाओं से समझा जा सकता है कि राज्य में शासन-प्रशासन किस तरह चल रहा है और प्रशासनिक टकराव के कैसे-कैसे चेहरे हैं। वैसे भी नौकरशाही की निरंकुशता और राजनीतिक नेतृत्व के ढिलेपन का सवाल कोई नया नहीं हैं। पिछले दशक से जब से राज्य में डा. रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा की सत्ता हैं, नौकरशाही के बेलगाम होने, मंत्रियों, विधायकों को समुचित महत्व न देने और उनकी उपेक्षा की चर्चाएँ राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ जनसामान्य के बीच भी होती रही हैं। अफसरों के नाम लेकर सरेआम आरोप-प्रत्यारोप के उदाहरण यद्यपि कम ही हैं लेकिन मंत्रियों एवं प्रशासनिक अधिकारियों के बीच टकराव अनेक बार सार्वजनिक हुआ है। मिसाल के तौर पर लंबे समय तक प्रदेश के गृहमंत्री रहे ननकीराम कंवर एवं तत्कालीन राज्य पुलिस के मुखिया विश्वरंजन के बीच कार्यशैली को लेकर विवाद और अप्रिय संबंधों की खबरें अखबारों की सुॢखयां रही हंै। और तो और राज्य के पूर्व मुख्य सचिव सुनील कुमार और वरिष्ठ व कद्दावर मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के बीच कतिपय मामलों में रस्साकशी की काफी चर्चा रही।
      दोनों के बीच तनाव इस कदर बढ़ा कि बात मुख्यमंत्री तक पहुंची। बृजमोहन मुख्यमंत्री से मिले तथा उन्होंने मुख्य सचिव सुनील कुमार को हटाने की मांग की। ये दो उदाहरण यह दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि नौकरशाही और सत्ताधारियों के बीच अपेक्षित सामंजस्य नहीं है। नतीजन दोनों के अपने-अपने राग है, चीजों को देखने का अलग-अलग नजरिया है। यह नजरिया मुख्यत: योग्यता, कार्यक्षमता और बौद्धिक कौशल पर केंद्रित है। ऐसी स्थिति दोनों तरफ है। कई मंत्री अपने प्रशासनिक अफसरों को तुच्छ और नाकारा समझते हैं और कुछ मंत्रियों को लेकर ऐसी ही राय प्रशासनिक अफसर भी रखते हैं। ऐसा प्राय: उन मंत्रियों के साथ है जो स्वभाव और प्रकृति से सरल है तथा अपने अधिकारियों से भी ऊंचे स्वरों में बात नहीं कर सकते। किंतु 24 नवंबर को मंत्रिमंडल की बैठक में नौकरशाहों पर जो टीका-टिप्पणियां की गई, वे उन मंत्रियों के मुखारविन्द से भी निकली जिन्हें दबंग होने का सेहरा हासिल है। राज्य मंत्रिमंडल में राजनीतिक चतुराई में माहिर और तेज तर्रार समझे जाने वाले चंद मंत्रियों में सर्वश्री बृजमोहन अग्रवाल, राजेश मूणत, अजय चंद्राकर, केदार कश्यप, आदि का नाम लिया जाता है। यदि ऐसे मंत्री भी यदि अपने अधिकारियों से तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं और नौकरशाहों के सामने लाचार है तो चिंता का विषय हैं।
     दरअसल मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह कठोर नहीं है। वे सीधे सरल है किंतु राजनीतिक सूझ-बूझ और कूटनीति में माहिर। सरलता, सहजता और सर्वउपलब्धता की वजह से उनकी छवि एक भले आदमी की है। लेकिन यह भला आदमी किस कदर होशियार है यह उनकी कार्यशैली से जाहिर है। अब तक उनका शासन निद्र्वंद रहा है। हालांकि उन्हें अनेक बार असहज स्थितियों से गुजरना पड़ा किन्तु उन पर कोई दाग नहीं लगा, न व्यवहार का और न भ्रष्टाचार का। जबकि सरकार के बहुत से नुमाइंदों के भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे रहने की चर्चा सरेआम है। स्वभाव से ऐसे सहज-सरल मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह से दबंग नौकरशाही से कैसे दब सकती हैं? ऐसी स्थिति में मंत्रियों की क्या बिसात? मुख्यमंत्री के सामने बोलकर वे अपना दु:ख हल्का तो कर लेते हैं किन्तु उन्हें मालूम है कि होना जाना कुछ नहीं है। क्योंकि पहले भी कुछ नहीं हुआ है। सत्ता और संगठन के बीच तालमेल और नौकरशाही के व्यवहार पर पहले भी भाजपा की बैठकों में विचार-विमर्श होता रहा है। लेकिन शासन-प्रशासन के स्तर पर स्थितियां सुधरी हो, ऐसा नजर नहीं आता।

Saturday, November 21, 2015

असहिष्णुता, बहस और सत्ता का अहंकार

- दिवाकर मुक्तिबोध
      देश में बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में नामचीन साहित्यकारों, फिल्मकारों, संस्कृतिकर्मियों और वैज्ञानिकों द्वारा राष्ट्रीय सम्मान लौटाने की घटनाओं पर राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी की प्रतिक्रिया के बाद कुछ सवाल सहजत खड़े होते हैं। लेकिन इन पर चर्चा के पूर्व राष्ट्रपतिजी के विचारों पर गौर करना होगा जो उन्होंने नई दिल्ली में 16 नवंबर को राष्ट्रीय प्रेस दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय प्रेस परिषद द्वारा आयोजित कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए। उन्होंने कहा- ''प्रतिष्ठित पुरस्कार व्यक्ति की प्रतिभा, योग्यता और कड़ी मेहनत के सम्मान में दिए जाते हैं। ये राष्ट्रीय आदर के प्रतीक होते हैं। अत: पुरस्कार लेने वालों को इनका महत्व समझते हुए इन पुरस्कारों का सम्मान करना चाहिए। समाज में कुछ घटनाओं के कारण संवेदनशील व्यक्ति कभी-कभी विचलित हो जाते हैं किन्तु भावनाओं को तर्क पर हावी होने नहीं देना चाहिए और असहमति को बहस तथा चर्चा से व्यक्त किया जाना चाहिए।''
       राष्ट्रपति के इन विचारों से स्पष्ट है कि राष्ट्रीय सम्मान लौटाने की घटनाओं को वे ठीक नहीं मानते और विरोध के इस तरीके से असहमत हैं। उन्होंने उन पुरस्कार विजेताओं को नसीहत देने की कोशिश की है जिन्होंने देश में बढ़ती धार्मिक असहिष्णुता, उन्माद एवं इससे उपजे तमाम तरह के अपराध जिनमें विचारकों, लेखकों की हत्या, हत्या की धमकियां तथा सरकार की मूकदर्शक के रुप में भूमिका भी शामिल है, के विरोध में अपने राष्ट्रीय अलंकरण, सम्मान एवं पुरस्कार स्वरुप प्राप्त राशि लौटाई है। एक-एक करके लगभग 80 विख्यात विद्वानों द्वारा लौटाए गए सम्मान की वजह से असहमति की तेज आवाज देश-दुनिया में गूंजी और इससे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं को बल मिला। विरोध की इन चर्चाओं की धमक अब धीमी पड़ गई है और नई आवाजें जुड़ने का सिलसिला भी थम सा गया है। यह इसलिए नहीं कि एक सम्मानजनक मंच पर बुलाकर विरोधियों से बातचीत की गई हो, (याद रहे ऐसी कोई पहल नहीं हुई) बल्कि इसलिए क्योंकि बिहार चुनाव और समय की रफ्तार ने हवा की दिशा बदल दी और साहित्यकारों, कलाकारों, लेखकों एवं विचारकों के विरोध का तूफान एक जगह आकर ठहर गया लेकिन उसका अस्तित्व कायम है।
       बहरहाल चर्चा राष्ट्रपतिजी के द्वारा व्यक्त विचारों पर है। देश में बढ़़ती असहिष्णुता पर वे कई बार अपने चिंता व्यक्त कर चुके हैं। उनकी चिंता और लेखकों की चिंता में कोई अंतर नहीं है। फर्क केवल प्रतिक्रिया का है। अब सवाल हंै कि एक-एक करके जब इस्तीफे आ रहे थे, पुरस्कार लौटाए जा रहे थे, तो क्या तब केंद्र सरकार ने अपनी ओर से कोई संवेदनशीलता दिखाई? केंद्र सरकार के मंत्री पुरस्कार लौटाने की घटनाओं को अनुचित तो बताते रहे किन्तु, किसी ने भी किसी लेखक से भेंट करने की जरुरत नहीं समझी। किसी ने भी लेखकों, विचारकों, कलाकारों को बहस के लिए एक मंच पर लाने की कोशिश नहीं की। और तो और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पूरे घटनाक्रम पर मौन रहे। यह कैसी संवेदनशीलता जिसका दावा किया जाता है? प्रधानमंत्री चाहते तो प्रारंभ में ही जब पुरस्कार लौटाने का दौर शुरु हुआ था, प्रतिक्रिया देते, अपील करते तथा प्रधानमंत्री कार्यालय में लेखकों को सम्मानजनक ढंग से आमंत्रित करते और देश में बढ़ती धार्मिक असहनशीलता व तनाव पर सरकार की चिंता तथा उसके प्रयत्नों से अवगत कराते और भरोसा देने की कोशिश करते। राष्ट्रपति वैचारिक बहस चाहते हैं, यह हो सकती थी बशर्ते वैसी सरकार के स्तर पर संवेदनशीलता दिखाई जाती, वैसी पहल की जाती। यह समझ से परे है कि हमारे देश में उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे हुए व्यक्ति पद के आतंक में इस कदर क्यों गिरफ्त हो जाते हैं और उनके सोचने, समझने व व्यवहार का तौर-तरीका क्यों बदल जाता है। यह कोई तुलना नहीं है पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की कार्यशैली को एक उदाहरण के बतौर ले सकते हैं। हाल ही में मनीला में एशियाई पैसिफिक इकनॉमिक कोऑपरेशन सम्मेलन के एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने अलीबाबा डॉट कॉम के मालिक जैक मा को मंच पर बुलाया और वे खुद उनका इंटरव्यू लेने लगे। जैक मा आर्थिक दुनिया की बहुत बड़ी हस्ती है तथा वे 13 लाख करोड़ रुपये की कंपनी के मालिक हैं। यहां सवाल तरीके का है। राष्ट्रपति के लबादे को किनारे रखते हुए ओबामा ने एक सामान्य व्यक्ति, एक सामान्य इंटरव्यूकर्ता के रुप में खुद को सामने रखा तथा जैक मा से उनकी उपलब्धियों एवं भविष्य की योजनाओं पर बातचीत की। क्या बातचीत के लिए इसी तरह की पहल या व्यवहार हमारे प्रधानमंत्री या मंत्री देश में घट रही घटनाओं से आहत लेखक बिरादरी से नहीं कर सकते थे? क्यों सत्ता के मठाधीश समस्याओं के नासूर बन जाने तक इंतजार करते हैं? क्यों तुरंत राहत का मरहम नहीं लगाते? मनुष्यता को तार-तार करने वाले दादरी जैसे कांड में भी लंबी चुप्पी किसलिए? यह संभव था कि कर्नाटक के लेखक, विचारक एमएम कालबुर्गी की हत्या की घटना की केंद्र शासन के स्तर पर अविलंब भत्र्सना की जाती। लेखक की हत्या यानी विचारों को कुचलने की कोशिश। एक लोकतांत्रिक देश में ऐसा कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है। जब असहनशीलता के विरोध में पुरस्कार लौटाने का दौर शुरु हुआ तब भी सत्ता का जमीर नहीं जागा। क्या यह तानाशाही प्रवृत्ति का संकेत नहीं है?
        यह तय है कि राष्ट्रपति के विचारों एवं साहित्य अकादमी की पूर्व में की गई अपील के बावजूद अकादमी एवं अन्य राष्ट्रीय अलंकरण लौटाने वाले विद्वान अपने कदम पीछे नहीं लेंगे। और उन्हें लेना भी क्यों चाहिए। जिन वजहों से उन्होंने यह कदम उठाया है वे आज भी यथावत हैं। दरअसल हर समस्या का हल बातचीत है, तार्किकता के साथ बहस है। पर सवाल है इसके लिए माहौल बनाने की पहली जिम्मेदारी किसकी है? क्या सत्तापक्ष यह जिम्मेदारी नहीं ले सकता? देश चलाने के लिए देश की जनता ने उन्हें यह अधिकार सौंप रखा है, लिहाजा वह जवाबदेह भी है तथा जिम्मेदार भी। इसलिए बहस के लिए पहल की अपेक्षा भी उसी से की जाती है। सत्ता का अहंकार बस यही नहीं होने देता। बड़ी दिक्कत यही है।

Sunday, November 15, 2015

यादों में बबनजी

- दिवाकर मुक्तिबोध
       पहले सर्वश्री मायाराम सुरजन फिर रामाश्रय उपाध्याय, मधुकर खेर, सत्येंद्र गुमाश्ता, रम्मू श्रीवास्तव, राजनारायण मिश्र, कमल ठाकुर और अब श्री बबन प्रसाद मिश्र। छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता के ये शीर्ष पुरुष एक - एक करके दुनिया से विदा हो गए और अपने पीछे ऐसा शून्य छोड़ गए जिसकी भरपाई मुश्किल नजर आ रही है। यह मेरा सौभाग्य रहा है कि मुझे इनका सानिंध्य प्राप्त हुआ। अलग - अलग समय में मैंने इनके साथ काम किया, मुझे इनका आर्शीवाद मिला, पत्रकारिता की समझ विकसित हुई, विशेषकर मूल्यपरक एवं ईमानदार पत्रकारिता को आत्मसात करने की प्रेरणा मिली। इन श्रेष्ठ संपादकों में से बबन प्रसाद मिश्र ही ऐसे थे जिनके साथ मैंने सबसे कम अवधि एवं सबसे आखिर में काम किया। वर्ष था सन् 2010 एवं अवधि 8-10 महीने। हालांकि इसके पूर्व सन् 2000 से 2003 तक मेरा उनका साथ रहा लेकिन संस्करण अलग थे, भूमिकाएं अलग थीं और शहर भी अलग। बहरहाल वर्ष 2010 पत्रकारिता में उनका उत्तरार्ध था और कुछ-कुछ मेरा भी। लेकिन इसके बावजूद उनके साथ मेरा संपर्क लगभग 40 वर्षों तक बना रहा। यानी ''युगधर्म'' के दिनों से, जब वे इस अखबार के संपादक थे और मैं दैनिक देशबंधु में नवजात उपसंपादक। वर्ष शायद 1976-77। चंूकि उनके साथ बिताई गई अवधि बहुत कम थी लिहाजा यादगार लम्हों का कोई लंबा चौड़ा इंद्रधनुष मेरे पास नहीं है अलबत्ता उनका व्यक्तित्व, उनकी कार्यशैली, उनका लेखन, उनकी दृष्टि और सबको साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति पर जरुर कुछ बातें, निजी प्रसंगों के तौर पर की जा सकती है।
      श्री बबन प्रसाद मिश्र उदार हिन्दुत्ववादी विचारधारा के थे। जाहिर सी बात है राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से उनका रिश्ता था जिसे उन्होंने कभी छिपाया नहीं और वैचारिक स्तर पर इसका प्रकटीकरण उनके लेखन में भी होता रहा। विशेषकर राजनीतिक टिप्पणियों में। लेकिन खास विचारधारा से बंधे रहने के बावजूद खबरों के मामले में उन्होंने निष्पक्षता की हदें नहीं लांघी और समय-समय पर संघ और भाजपा के कामकाज पर भी कटाक्ष करते रहे। वे दरअसल मार्गदर्शक की भूमिका में थे जिन्हें राज्य में पार्टी के सत्तारुढ़ होने के बावजूद पर्याप्त महत्व नहीं मिला अलबत्ता श्री मिश्र निष्पक्ष भाव से पत्रकारिता में अपनी भूमिका के साथ न्याय करते रहे।
      मैं सन् 1976 में अपने एक पत्रकार मित्र से मिलने पंडरी स्थित दैनिक 'युगधर्म' कार्यालय गया था वहां उनसे पहली मुलाकात हुई, पहला परिचय हुआ। उन्हें इस बात का इल्म नहीं था कि मैं किसी अखबार की नौकरी में हूं। उन्होंने अंग्रेजी दैनिक हिन्दुतान टाइम्स की दो खबरें मुझे अनुवाद करने के लिए दे दी। मैं अचकचा गया। उन्हें बताया मैं देशबन्धु में हूँ। ओह कहते हुए उन्होंने अखबार वापस ले लिया। मैं समझ गया कि वे 'युगधर्म' के लिए ऑफर दे रहे थे। मेरी कोई इच्छा नहीं थी। यह अलग बात है 10 साल बाद जब सन् 1986 में 'युगधर्म' का प्रबंधन बदला तो मैं इसी अखबार का संपादक नियुक्त हुआ। तब तक बबनजी यहां से विदा हो चुके थे। इस छोटी सी घटना में खास कुछ नहीं है किन्तु इससे बबनजी की एक सद्य परिचित के प्रति स्नेह की अभिव्यक्ति होती है। ऐसे निर्मल स्वभाव के थे वे। बाद में पत्रकारवार्ताओं में या कभी-कभी कार्यक्रमों में उनसे मुलाकात हुआ करती थी लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि उनसे लंबी बातचीत हुई हो अलबत्ता 'युगधर्म' जहां वे सन् 1972 से 1986 तक रहे, उनके लेखन से रुबरु होता रहा। खास विचारशैली की वजह से कई बार मुद्दों पर मेरी असहमति भी रही लेकिन मैंने जाहिर नहीं किया केवल यह सोचकर कि ऐसा करना वरिष्ठ के प्रति अशिष्टता होती वैसे भी विचारधारा से बंधे हुए लेखन में ऐसा होना स्वाभाविक था।
      बबनजी बहुत अच्छे वक्ता थे। समां बांध देते थे। विषयों का गहरा ज्ञान था जो उनकी अध्ययनशीलता को दर्शाता था। गजब के मिलनसार थे। उनके सम्पर्कों का भी दायरा बहुत विशाल था। पेशेवराना ईमानदार के कायल थे, उसे जीते भी थे किन्तु कभी-कभी इसे हल्के से खुरचते भी थे। यहां मेरी उनसे असहमति थी। मुझे यह कभी समझने में नहीं आया कि किसी मंत्री या विधायक के जन्मदिन के अवसर पर ''नवभारतÓÓ जैसे बड़े अखबार के संपादकीय पृष्ठ पर प्रशस्तिपूर्ण लेख छापने का क्या तुक है। विशेषकर विचारों और टिप्पणियों के लिए सुरक्षित पृष्ठ पर। छत्तीसगढ़ के तत्कालीन कांग्रेसी मंत्री और विधायक सत्यनारायण शर्मा के जन्मदिन पर ऐसा चित्र देखने में आता था। बबनजी इसके संपादक थे। जाहिर है कि यह संबंधों के निर्वाह की बात थी या प्रबंधकीय विवशता थी। पत्रकार और व्यक्ति के रुप में उनके संबंधों की झलक 7 नवंबर 2015 को उनकी अंतिम यात्रा में देखने मिली जिसमें भारी संख्या में विभिन्न वर्गों के लोग शामिल हुए। रायपुर शहर एवं दूरदराज के लोगों की उपस्थिति एक पत्रकार के रुप में उनकी लोकप्रियता एवं स्वीकार्यता को दर्शाती है।
      नौकरी की दृष्टि से बबनजी मेरा अधिकाधिक संवाद वर्ष 2000 में स्थापित हुआ। 'नवभारत' के बिलासपुर संस्करण के लिए संपादक की जरुरत थी और मुझे नौकरी बदलनी थी। बबनजी ने मेरा नाम आगे बढ़ाया और नागपुर से 'नवभारत' समूहके संचालक श्री प्रकाश माहेश्वरीजी से सहमति मिल गई। संयुक्त संपादक के रुप में माहेश्वरीजी के हस्ताक्षर का नियुक्ति पत्र मुझे बाद में मिला। बबनजी ने औपचारिक पत्र जारी करते हुए बिलासपुर से 1 मई 2000 को मेरी ज्वाईनिंग कराई और फिर रायपुर-बिलासपुर संस्करण के बीच बेहतर तालमेल की शुरुआत हुई। आमतौर पर देखा गया है कि किसी अखबार समूह के संपादकों के बीच तालमेल में कई बार अहम् आड़े आता है। अखबारी दुनिया के लिए यह सामान्य बात है। बबनजी चूंकि वरिष्ठ थे, अनुभव और पद में बड़े थे, इसलिए हमारे बीच कोई समस्या नहीं थी। फिर बबनजी का स्वभाव ऐसा था कि वह सबको भाता था, विश्वास जगाता था। यह अहसास रहता था कि यदि अखबार में कुछ गलत हो जाए तो प्रबंधन का कोप झेलने के लिए सरपरस्त के रुप में बबनजी मौजूद है। इसलिए मैं भी कुछ निश्चिंतता का अनुभव करता था।
       'नवभारत' बिलासपुर में मैं महज डेढ़-दो साल रहा। इस दौरान बबनजी का आना-जाना लगा रहा। इस दौर की कोई विशेष घटना नहीं है अलबत्ता एक बात मुझे हमेशा याद रहेगी बल्कि सालती रहेगी कि बिना किसी वजह के केवल न्यायिक प्रक्रिया से खौफ खाते हुए एक मामले में मुझे खेद प्रकट के लिए विवश होना पड़ा था। दरअसल मेरे अपने नियमित साप्ताहिक कॉलम में जिसकी प्रकृति व्यंग्यात्मक थी, मैंने एक टिप्पणी लिखी थी जिसके केंद्र में बिलासपुर उच्च न्यायालय के तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश श्री रमेश चंद्र गर्ग थे। इसे लेकर भारी बवाल मचा और बात नागपुर तक गई। बबनजी परेशान थे और इस संदर्भ में संचालक प्रकाश माहेश्वरी से उनकी बातचीत होती थी। हाईकोर्ट प्रबंधन ने अप्रत्यक्ष रुप से संकेत दे दिया था कि अवमानना का केस होगा और कोर्ट में हाजिरी देनी पड़ेगी। हालांकि अखबारों के साथ यह सामान्य सी बात थी। मानहानि के मुदकमें तो चलते रहते हैं लेकिन इस मामले में न जाने क्यों खौफ कुछ ज्यादा गहराया हुआ था। नागपुर में श्री प्रकाश माहेश्वरी ने वकीलों से विचार-विमर्श किया और इस नतीजे पर पहुंचा गया कि मैटर में आपित्तजनक और अवमानना जैसा कुछ नहीं है किन्तु शीर्षक गड़बड़ है। यह तय हुआ कि अखबार में खेद प्रकट किया जाए। मुझे इसकी उम्मीद नही थी। बबनजी के रहते तो बिल्कुल नहीं। लेकिन रायपुर से मैटर बनकर आया और हमें उसे अपने नाम के साथ छापना पड़ा। यह बेहद दु:खद था। दुख इस बात का भी था कि सारे फैसले नागपुर और रायपुर में लिए गए।
       बहरहाल इस दौर की एक और बात खटकती थी कि बिलासपुर संस्करण में व्यवस्था के खिलाफ विचारों को रायपुर में पसंद नहीं किया जाता था। विशेषकर मेरे साप्ताहिक कॉलम एवं एडिट पेज पर प्रकाशित टिप्पणियों को। ऐसा हमेशा नहीं होता था किन्तु गाहे-बगाहे मिश्राजी का फोन आ जाया करता था। वे कहते थे नाहक क्यों मोर्चा खोल रहे हो, अखाड़े में कुश्ती लड़ना छोड़ दो। मैं समझ रहा था कि चूंकि वे राजधानी में रहते हैं अत: प्रतिरोध का सामना उन्हें करना पड़ता है। अत: यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी हालांकि नागपुर से इसे लेकर कभी कोई चिट्ठी पत्र नहीं आई। 'नवभारत' में विचारों का खुलापन था। यह इस बात से भी जाहिर है कि बबनजी की वैचारिक प्रतिबद्धताओं से भिज्ञ होने के बावजूद राष्ट्रवादी विचारों के लिए ख्यात 'नवभारत' के प्रबंधन ने उनके हाथों में अखबार की कमान दे रखी थी।
      'नवभारत' के बाद बबनजी दैनिक भास्कर रायपुर-बिलासपुर में प्रबंधकीय सलाहकार की भूमिका में आ गए। प्रबंधकीय कार्यों से बिलासपुर में भी उनका आना-जाना बना रहा। मैं उन दिनों दैनिक भास्कर बिलासपुर में संपादक था। सो उनसे मुलाकात और बातचीत होती रही। मुझे याद है, 2003 के विधानसभा चुनाव के दौरान दैनिक भास्कर बिलासपुर ही एकमात्र ऐसा प्रमुख अखबार था जो श्री विद्याचरण शुक्ल के प्रादेशिक नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की चुनाव संबंधी गतिविधियों को भी यथोचित स्थान देता था जबकि राजधानी रायपुर सहित प्रदेश के प्राय: सभी अखबारों में एनसीपी की खबरों को ब्लेकआउट करने या दबाकर देने के निर्देश थे। अजीत जोगी कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री थे तथा उनका दबाव अखबारों के प्रबंधकों पर था। किन्तु बिलासपुर भास्कर ने अलग राह पकड़ रखी थी जो पार्टी और सरकार के स्तर पर बर्दाश्त नहीं की जा सकती थी। लिहाजा भोपाल भास्कर प्रबंधन की ओर से मुझसे संबंधित एक कड़ी चिट्ठी बबनजी के पास आई। भोपाल से फोन पर मुझे फटकारा गया। बबनजी बिलासपुर आए और काफी देर तक मुझे प्रबंधन के व्यावसायिक हितों को समझाते रहे। उन्होंने चिट्ठी मुझे नहीं दिखाई, यह सोचकर कि मैं आहत न हो जाऊँ। यहां भी वे ढाल बनकर खड़े रहे। इलेक्शन खत्म हुआ और बात आई-गई, हो गई। पर यादों में एक और घटना जुड़ गई जो बबनजी के व्यवहार की विशिष्टता को दर्शाती है।
      फिर आया वर्ष 2010। मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के एक न्यूज चैनल की नौकरी से मैं ताजा-ताजा मुक्त हुआ था। बबनजी का फोन आया - 'आज की जनधारा में काम करना है। संसाधन सीमित है इसलिए पैसा कम मिलेगा। मैं साथ में हूं। मैंने हामी भरी। 1 मई 2010 को मैंने बतौर संपादक ज्वाइनिंग दी। बबनजी थे प्रधान संपादक। वे इस अखबार में 8-10 महीने ही रहे किन्तु इस बीच कभी ऐसा मौका नहीं आया कि उन्होंने अखबार में खबरों से लेकर विचारों की अभिव्यक्ति तक कोई टोका-टाकी की हो। काम करने की पूरी आजादी दी और कभी अपने विचारों को थोपने की कोशिश नहीं की। उनका अपना लेखन था, मेरा अपना। वैचारिक सहिष्णुता के वे कायल थे और इसे जीते भी थे। कुछ समय बाद 'आज की जनधारा' से मैं भी मुक्त हुआ। इसके बाद बीते 4 वर्षों में उनसे यदा-कदा ही मुलाकातें हुईं। अकस्मात एक दिन (7 नवंबर 2015) उनके निधन की खबर मिली। मैं कुछ क्षण के लिए स्तब्ध रह गया। एक शून्य सा महसूस हुआ फिर ऑखों के सामने उनकी यादों के सितारे झिलमिलाने लग गए।
      बबनजी मूलत: पत्रकार थे, सात्यिकार नहीं। यह अलग बात है कि छत्तीसगढ़ सरकार का राज्य स्तरीय सुंदरलाल शर्मा साहित्य पुरस्कार उन्हें उनके साहित्यिक योगदान के लिए मिला। यह शायद इसलिए कि हिन्दी साहित्य में उनकी गहरी दिलचस्पी थी और वे अनेक साहित्यिक संस्थाओं के अध्यक्ष थे। बहरहाल छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में बबनजी का स्थान निश्चित रुप से विशिष्ट रहेगा। इसलिए क्योंकि वैचारिक असहमति का भी वे सम्मान करते थे और उसे अखबार में यथोचित स्थान देते थे। अर्थात उनकी पत्रकारीय दृष्टि निष्पक्ष थी जो वर्तमान समय की सबसे बड़ी जरुरत है।

Tuesday, November 10, 2015

मुठभेड़ के नाम पर बंद हो सरकारी हिंसा



- दिवाकर मुक्तिबोध
       आत्मसमर्पित नक्सलियों को छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा नौकरी में लेने की पेशकश क्या राज्य में हिंसात्मक नक्सलवाद के ताबूत पर आखिरी कील साबित होगी? शायद हां, पर इसकी पुष्टि के लिए कुछ वक्त लगेगा जब राज्य सरकार की इस योजना पर पूरी गंभीरता एवं ईमानदारी से अमल शुरु होगा। दरअसल बस्तर और सरगुजा संभाग के आदिवासी बाहुल्य गाँवों में युवाओं के पास कोई काम नहीं है। पढ़ाई-लिखाई से भी उनका रिश्ता टूटता -जुड़ता रहा है। साक्षर, असाक्षर, शिक्षित और अशिक्षित या अर्धशिक्षित युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में सरकार तो विफल थी ही, निजी क्षेत्रों में भी उनके लिए कोई काम नहीं था अत: उन्होंने एक सुविधाजनक रास्ता चुन लिया जो नक्सलवाद की ओर जाता था। यहाँ रोजगार था, एवज में खर्चे के लिए पैसे मिलते थे, दो जून की रोटी की व्यवस्था थी, गोलियों से भरी हुई बंदूकें हाथ में थी, शिकार की भी स्पष्टता थी, पुलिस के जवानों पर अचानक आक्रमण करने एवं घेरकर गोली मारने के अपने अलग मजे थे और थी जंगल की स्वच्छंदता तथा ऐशो आराम। सजा केवल इतनी थी कि उनका आकाश केवल जंगलों और गाँवों तक सीमित था। शहर व कस्बे की सरहदें वे छू सकते थे लेकिन लौटना जंगल की ओर ही था। इसे मामूली सजा मानकर ऐसे युवाओं ने पिछले दो दशकों में छत्तीसगढ़ में हिंसा का जो तांडव पेश किया उससे पूरा देश कांप उठा। नक्सलवाद सबसे बड़ी राष्ट्रीय समस्या घोषित हुई तथा मरने - मारने का खेल शुरु हो गया। इस खूनी खेल में बस्तर-सरगुजा के जंगलों में जीवन-यापन कर रहे वे आदिवासी पिसते चले गए जिनका कसूर सिर्फ इतना था कि वे निरीह थे, बहकावे में आ जाते थे, पुलिस के भी और माओवादियों के भी। इसका फल उन्हें जान देकर भोगना पड़ता था। आंकडं़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में 2005 से अब तक 700 से अधिक आदिवासी मारे गए हैं। फर्जी मुठभेड़ों, अपहृत आदिवासियों एवं माओवादियों द्वारा मुखबिरों को जनअदालत लगाकर हत्या करने की घटनाएँ अलग हैं जो इस संख्या में भारी इजाफा करती हैं।
      बीते 5 वर्षों में नक्सली मोर्चे पर सरकार एवं विचारकों की दृष्टि से काफी कुछ बेहतर घटा है। घोर नक्सल प्रभावित 7 राज्यों में समस्या की तीव्रता कुछ कम हुई है जिसमें छत्तीसगढ़ भी शामिल है। यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि केंद्र एवं राज्य सरकारों की पुलिस व अद्धसैनिक बलों के दबाव की वजह से माओवादियों के कार्यक्षेत्र का दायरा सिमटता जा रहा है और अब छत्तीसगढ़ ही उनकी प्रमुख पनाहगार है जहां वे स्वयं को बेहद सुरक्षित समझते हैं। लेकिन अब उनका यह सुरक्षित गढ़ भी दरक रहा है। विकास, आत्मसमर्पण, मुठभेड़, नई पुर्नवास नीति, नक्सल पीडि़त परिवार के बच्चों की शिक्षा-दीक्षा और अब आत्मसमर्पितों को सरकारी नौकरी देने का फैसला नक्सल मोर्चे पर सरकार की रणनीति का हिस्सा है जिसे वांछित सफलता मिलती दिख रही है। लेकिन यहाँ कुछ सवाल खड़े होते हैं। नक्सलवाद के खात्मे के नाम पर क्या पुलिस को यह छूट दे दी गई है कि शक के आधार पर किसी को भी गोली मार दें? बीती घटनाएँ इस बात की साक्षी हैं जिसमें चौपाल में इकट्‌ठा हुए ग्रामीणों, खेतों में भेड़-बकरी चराने वालों तथा पुलिस को देखकर डर कर भागने वाले लोगों को पुलिस ने भून दिया। उदाहरण के तौर पर दो वर्ष पूर्व की घटना याद आती है। 7 मई 2013 को बीजापुर जिले के एड्समेटा में पूजा के लिए एक स्थल पर इकट्‌ठा हुए आदिवासियों को पुलिस एवं कोबरा बटालियन के जवानों ने घेर लिया और गोलियां बरसाईं। इस गोलीबारी में 3 बच्चों सहित 8 ग्रामीण मारे गए। पुलिस को जब अपनी गलती का एहसास हुआ तो इस घटना को उसने मुठभेड़ की शक्ल दे दी। इसके पूर्व घटित मीना खलको कांड को कौन भूल सकता है? 6 जुलाई 2011 को बलरामपुर जिले के चांदो थाना क्षेत्र के अंतर्गत लांगर टोला में 17 वर्षीय मीना खलको को पुलिस ने माआवोदी बताकर उस समय मार गिराया जब वह भेड़ों को चरा रही थी। अनीता झा न्यायिक आयोग की हाल ही पेश रिपोर्ट में उसकी हत्या एवं बलात्कार की पुष्टि हुई तथा इसके आधार पर तत्कालीन थाना प्रभारी सहित 25 पुलिस जवानों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया। इस तरह की अनेक ऐसी घटनाएँ हैं जिनमें निर्दोष नागरिकों की जाने पुलिस की गोली से गई और महिलाएँ सामूहिक अनाचार की शिकार हुई। सुकमा क्षेत्र की आदिवासी महिलाओं का आरोप था कि पिछले महीने (अक्टूबर 2015) बड़ागुड़ा थाना क्षेत्र के चित्रागेलूर, पेदागेलूर, गोदेम और मुर्गीचेरु समेत कई गाँवों में सीआरपीएफ और पुलिस के जवान माओवादियों को तलाशने के नाम पर जबरिया घरों में घुसे, लूटपाट की, मारापीटा और महिलाओं के साथ बलात्कार किया। कांग्रेस ने इस घटना की जांच के लिए सुकमा विधायक कवासी लखमा के नेतृत्व में 11 सदस्यीय जांच दल गठित किया है। पुलिस विभाग ने भी एएसपी इंदिरा कल्याण के नेतृत्व में 4 सदस्यीय टीम बनाई है। इस वाकये के बाद इसी माह 4 नवंबर को सुकमा थाना क्षेत्र के अदलमपल्ली जंगल में पुलिस ने तीन नक्सलियों को मुठभेड़ में मारने का दावा किया है किन्तु दोरनापाल थाने को घेरकर ग्रामीणों ने दावा किया कि मारे गए तीनों आदिवासी किसान थे, नक्सली नहीं।
      ये कुछ उदाहरण हैं जो इस सत्य को स्थापित करते हैं कि केंद्र और राज्य सरकारों के संयुक्त नक्सल विरोधी अभियान में निर्दोष आदिवासियों की भी जाने जा रही हैं। पूर्व के दर्जनों उदाहरणों एवं ताजा घटनाओं से यह भी स्पष्ट होता है कि नक्सली मामले में पुलिस की नीति है - शक है तो गोली मारो, पड़ताल मत करो, गिरफ्तार मत करो। तो क्या एक लोकतांत्रिक देश में नक्सल समस्या के उन्मूलन के नाम पर निर्दोष नागरिकों की बलि मंजूर है? कानून की भाषा में कहा जाता है कि भले ही 99 अपराधी छूट जाए पर एक निरपराध को फांसी नहीं होनी चाहिए। लेकिन यहाँ, बस्तर एवं सरगुजा में क्या हो रहा है? पुलिस के वहशियाना तौर-तरीके से बेकसूर गरीब आदिवासी मारे जा रहे हैं। जब मानवाधिकारवादी उनके पक्ष में खड़े होते है, पीडि़त परिवारों से मिलते हैं, घटनाओं की समीक्षा करते हैं और सही तथ्य जनता के सामने लाते हैं तो सरकार को परेशानी होती है और प्रत्युत्तर में वह नक्सलियों द्वारा आदिवासियों के अपहरण और उनके कत्लेआम पर मानवाधिकारवादियों की चुप्पी पर कटाक्ष करती है, चुनौती देती है। यह दलील तर्कसंगत नहीं है अलबत्ता इसमें शक नहीं कि नक्सली हिंसा पर मानवाधिकारवादी ऐसा करते रहे है लेकिन सवाल सरकारी बंदूक की नली से निकली गोली का है जो सीधे निर्दोष आदिवासियों के सीने में धसती है। इस सरकारी हिंसा को जायज कैसे ठहराया जा सकता है? इसलिए जब सरकारी अत्याचार होते हैं तो मानवाधिकारों की आवाज बुलंद होती है और होती रहेगी।
      बहरहाल बिना गोली चलाए आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित करना, आत्मसमर्पितों को नई जिंदगी देने की व्यवस्था के अंतर्गत उन्हें योग्यतानुसार सरकारी नौकरी में लेने का फैसला व नक्सल हिंसा से प्रभावित परिवार के बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का प्रबंध दशकों से चली आ रही नक्सल समस्या के समाधान की दिशा में बेहतर कदम है किन्तु मुठभेड़ का नाम देकर निर्दोष ग्रामीणों की हत्या का सिलसिला बंद होना चाहिए। अन्यथा इसके लिए न तो पुलिस को माफ किया जा सकता है और न ही सरकार को।

Tuesday, November 3, 2015

भ्रष्टाचार का भयावह चेहरा, जान का सौदा

- दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के सवाल पर राज्य सरकार की जीरो टाललेंस की नीति है। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह एवं सरकार के अन्य नुमाइंदे सरकारी एवं गैरी सरकारी कार्यक्रमों में जीरो टॉलरेंस की नीति का एलान भी करते रहे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐलान-ए-जंग का खुद नौकरशाही पर कितना क्या असर हुआ है, यह राज्य में घटित अलग- अलग किस्म की घटनाओं से जाहिर है। कही-कहीं रिश्वतखोरों को सरेआम पीटा जा रहा है तो कहीं भ्रष्ट अफसरशाही से त्रस्त होकर आदमी अपनी जान दे रहा है। हाल ही में दो घटनाएँ ऐसी हुई हैं जो इस बात का अहसास कराती है कि भ्रष्ट नौकरशाही पर सरकार का कोई अंकुश नहीं है तथा जीरो टॉलरेंस की सरकारी घोषणा के बावजूद वह बेखौफ है तथा बिना रिश्वत लिए कोई कागज आगे न बढ़ाने या फाइलों को लटकाए रखने की उसकी नीति यथावत है। यानी जीरो टॉलरेंस केवल घोषणाओं तक सीमित है। लिहाजा आम आदमी को कोई राहत नहीं है। किंतु अब पीडि़तों का मरने-मारने पर उतारु होना इस बात का संकेत है कि यदि सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कानूनों का सख्ती से पालन नहीं किया, नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगा, भ्रष्ट अफसरों एवं कर्मचारियों के खिलाफ दर्ज मामलों में तत्काल दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई, धरपकड़ के अभियान को तेज नहीं किया गया और यदि आम आदमी के लिए प्रशासन को सरल एवं सुगम नहीं बनाया गया तो लोगों को कानून हाथ में लेने से रोका नहीं जा सकेगा। और ऐसी स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए अच्छी नहीं होगी।
       दो घटनाएं मिसाल के रुप में दी जा सकती हैं। हालांकि ऐसे वाकये पहले भी हुए हैं लेकिन इस हद तक नहीं। पूर्व में कई दफे मुख्यमंत्री निवास के सामने आत्महत्या करने की चेतावनी दी गई, कोशिशें भी हुई लेकिन वे कामयाब नहीं होने दी गई। अतीत में हुई ऐसी घटनाएँ इस बात की साक्षी थी कि प्रशासन असंवेदनशील था तथा आम आदमी के दु:ख-दर्द से उसका कोई वास्ता नहीं था जबकि उसकी संवेदनशीलता, पारदर्शिता तथा कामकाज तेजी से निपटाने के संकल्प की दुहाई दी जाती थी। यह स्थिति आज भी नहीं बदली है बल्कि भ्रष्टाचार चरम पर है। भ्रष्ट व्यवस्था का जीता - जागता सबूत और क्या चाहिए कि आम आदमी अपनी जान की भी परवाह न करें। इसी माह की 26 तारीख को राज्य के दूसरे बड़े शहर बिलासपुर से सटे बिल्हा में एसडीएम कार्यालय के सामने युवक कांग्रेस के नेता राजेंद्र तिवारी ने स्वयं पर पेट्रोल छिड़कर आत्मदाह कर लिया। उसका आरोप था कि उसके खिलाफ की गई प्रतिबंधात्मक कार्रवाई में उसे जमानत देने के एवज में एसडीएम अर्जुन सिंह सिसोदिया ने 40 हजार रुपये की मांग की और न देने पर जेल भेजने की धमकी दी। व्यथित 24 वर्षीय राजेंद्र ने एसडीएम दफ्तर के बाहर खुद को आग के हवाले कर दिया। बुरी तरह झुलसे युवा नेता को बचाया नहीं जा सका और कुछ ही घंटों बाद रायपुर के एक अस्पताल में उसकी मौत हो गई। इस घटना से बिल्हा में तनाव फैलना स्वाभाविक था। गुस्साए लोग सड़क पर उतर आए। अगले दिन यानी 27 अक्टूबर को नगर बंद रहा तथा शव के साथ 5 घंटे तक नेशनल हाईवे जाम रखा गया। इस घटना से प्रशासन के होश उड़ गए। प्रशासन ने फौरन कार्रवाई करते हुए एसडीएम अर्जुन सिंह सिसोदिया को हटा दिया और बाद में पूरे मामले की दंडाधिकारी जांच के आदेश दिए। मुख्यमंत्री रमन सिंह ने भी घटना पर दुख व्यक्त किया तथा शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की। उन्होंने इस घटना के साथ ही जीवन लाल मनहर प्रकरण में भी जांच के आदेश दिए। 15 दिन पूर्व ग्राम सेवती निवासी मनहर को प्रतिबंधात्मक धारा 107-16 के मामले में जेल भेज दिया गया था जहां उसकी मौत हो गई। उसके बेटे का आरोप था कि अनुविभागीय दंडाधिकारी सिसोदिया ने जमानत देने के एवज में उससे 50 हजार रुपये की मांग की थी।
      राजेंद्र तिवारी आत्महत्या प्रकरण शासन - प्रशासन के लिए ङ्क्षचता का सबब होना चाहिए। क्योंकि यह एक व्यक्ति की प्रशासन से उपजी हताशा की पराकाष्ठा है। जान की बाजी लगाना सहज नहीं है। चिंता इसलिए भी होनी चाहिए क्योंकि भ्रष्टाचार की वजह से परेशान आम आदमी की प्रतिक्रिया विभिन्न रुपों में सामने आ रही है। मिसाल के तौर पर इसी अक्टूबर की 19 तारीख को इस्पात नगरी भिलाई के निकट जामुल नगर पालिका की व्यवस्था और विकास कार्यों की गुणवत्ता से खिन्न एक युवक मोहित देवांगन ने नगर पालिका अध्यक्ष रेखराम बंछोर से पहले सवाल जवाब किया और बाद में उन पर हंसिये से हमला कर दिया। पालिका दफ्तर में पहुंचे इस युवक ने बंछोर से पूछा आपकी तनख्वाह सिर्फ 30 हजार रुपये महीना है तो आपने दस वर्षों में लाखों की संपत्ति कैसे बनाई? दो चुनावों में आपने 50 लाख से अधिक खर्च किए, कहाँ से आया ये पैसा? अध्यक्ष पर प्राणघातक हमले के बाद हमलावर घटनास्थल से भागा नहीं बल्कि चिल्ला-चिल्लाकर पालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं अव्यवस्था पर रोष प्रकट करता रहा। यह घटना भी इस बात का संकेत है कि प्रशासन के कामकाज एवं भ्रष्टाचार से असंतुष्ट लोगों का धैर्य जवाब देने लगा है तथा वे अब अपने - अपने तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे है।
        छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक भ्रष्टाचार के मामले कोई नई बात नहीं है। दरअसल नक्सली समस्या के बाद यह राज्य की दूसरी सबसे बड़ी समस्या है जो आम आदमी को सीधे प्रभावित करती है। हालांकि समय-समय पर शासन-प्रशासन भ्रष्ट अफसरों, कर्मचारियों के खिलाफ छापे की कार्रवाई करता रहा है किन्तु इन अभियानों का खास असर इसलिए नहीं पड़ता क्योंकि लोकप्रतिष्ठा पर धनपशुता हावी है। अफसरों, कर्मचारियों को इसलिए न तो दण्ड का भय और न ही कानून का, सोने पर सुहाना यह कि न्याय के अत्यधिक विलंब से मामलों को रफा-दफा करने में या स्थितियों को अपने वश में करने में, सबूतों को नष्ट करने में अथवा केस को ढीला करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। सिर्फ पिछले पांच वर्षों की बात करें तो एंटी करप्शन ब्यूरो ने भ्रष्टाचार के दर्जनों मामले पकड़े। ये बड़े मामले थे जिनमें न केवल लाखों की नगद राशि एवं करोड़ों की बेनामी संपत्ति बरामद हुई वरन इनमें प्रशासनिक अधिकारियों एवं कर्मचारियों की संलिप्तता के भी ठोस प्रमाण मिले किन्तु, सजा के नाम पर निलंबन, अथवा जमानत के मिलते तक कुछ दिनों की जेल से अधिक कुछ नहीं हुआ। इस दौरान शायद ही किसी की नौकरी गई हो या कठोर दण्ड मिला हो। दरअसल राज्य में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का मतलब है कुछ दिनों की सनसनी। बाद में सबकुछ पहले जैसा, यथावत। ऐसी स्थिति में स्पष्ट है-संस्थागत भ्रष्टाचार खूब फल-फूल रहा है और रिश्वतखोरों को कानून का कोई भय नहीं है।
        इन दिनों राज्य की रमन सिंह सरकार चौतरफा समस्याओं से घिरी हुई है। संरक्षित जनजाति के पहाड़ी कोरवा लंबूराम की भूख से हुई मौत का मामला हो या फिर कर्ज में डूबे एवं गरीबी की मार से त्रस्त किसानों की आत्महत्याओं के प्रकरण हो या फिर राज्य में सूखे की स्थिति हो या फिर सूखाग्रस्त इलाकों के किसानों का जंगी प्रदर्शन हो, प्राय: सभी मोर्चांे पर सरकार के लिए अप्रिय परिस्थितियां है। राजनीति स्तर पर भी स्थितियां दु:खदायी हंै क्योंकि प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को कई मुद्दे हाथ लगे हंै जिन्हें लेकर वह जनता के बीच में हैं, सड़क पर है। इन विपरीत स्थितियों में प्रशासनिक भ्रष्टाचार की वजह से जान देने अथवा कानून हाथ में लेने की घटनाएं, भले ही वह अभी सीमित संख्या में हो, चिंताजनक है। जिस तरह भूख से हुई मौत के लिए सरकार को जवाबदेह माना जाता है और उसे सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकारी नहीं होता, उसी तरह रिश्वत देने के बजाए जान देने जैसी घटनाओं के लिए भी सरकार को जवाबदेही होना चाहिए। मौत की ऐसी घटनाओं में राज्य की भाजपा सरकार केवल मुआवजा देकर छुट्टी नहीं पा सकती, उसे यह दिखाना होगा कि अपनी जनोन्मुख नीतियों जिनमें भ्रष्टाचार का मुद्दे भी शामिल है, पर वह गंभीर है तथा नौकरशाही उसके वैसे ही नियंत्रण में है जैसे सन् 2000 से 2003 तक अजीत जोगी के नेतृत्व में कांग्रेस शासन के समय में थी।

Saturday, October 17, 2015

जनविरोध की तीव्रतम अभिव्यक्ति

-दिवाकर मुक्तिबोध

     देश की साहित्यिक बिरादरी में इन दिनों ऐसा वैचारिक द्वंद चल रहा है जो स्वतंत्र भारत में इसके पूर्व कभी नहीं देखा गया था। शुरुआत इसी वर्ष अगस्त माह में कन्नड़ के प्रतिष्ठित लेखक एवं साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित एम.एम. कलबुर्गी की दिनदहाड़े हत्या की घटना से हुई। इस घटना से समूचे कर्नाटक के लेखक, विचारक, रंगकर्मी एवं बुद्धिजीवी बुरी तरह आहत हुए और उन्होंने तथा अनेक लोकतांत्रिक संस्थाओं ने अपने-अपने ढंग से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने के षड़यंत्र के खिलाफ विरोध दर्ज किया। कन्नड़ लेखक की हत्या की घटना की अनुगूंज यद्यपि पूरे देश में सुनी गई किंतु छिटपुट आंदोलनों एवं वक्तव्यबाजी से ज्यादा कुछ नही हुआ। यह शायद इसलिए क्योंकि कलबुर्गी को क्षेत्रीयता की नजरों से देखा जा रहा था। हालांकि इसके पूर्व महाराष्ट्र में नरेंद्र दाभोलकर एवं गोंविद पानसरे की हत्या की घटना से देश का प्रबुद्ध वर्ग ज्यादा आंदोलित था तथा उसने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी।
   बहरहाल नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे एवं कलबुर्गी की हत्या की घटनाओं ने चिंता की जो चिंगारी पैदा की, वह दादरी हत्याकांड से लपटों के रुप में तब्दील होकर देश के साहित्य एवं कला जगत को झुलसा रही है जिसकी व्यापक प्रतिक्रिया साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटाने के रुप में सामने आ रही है। अब तक दो दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित लेखकों, कलाकारों ने अपने पुरस्कार एवं पुरस्कार स्वरुप नगद राशि लौटाने की घोषणा की है और यह क्रम अभी भी जारी है। देश की मौजूदा हालत से संतप्त जिन लेखकों ने पुरस्कार लौटाए हैं उनमें प्रमुख हैं सर्वश्री उदय प्रकाश, अशोक वाजपेयी, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, कृष्णा सोबती, नयनतारा सहगल, काशीनाथ सिंह, शशि देशपांडे आदि। साहित्य सम्मान वापसी की इस सूची में हिन्दी के अलावा अन्य भाषाओं के लेखक, कवि एवं कलाकार भी शामिल हैं। ये सभी बुद्धिजीवी पिछले कुछ समय से देश में घटी विभिन्न हिंसात्मक घटनाओं, धर्मान्ध ताकतों के अनियंत्रित उभार एवं धर्मनिरपेक्षता को खुरचने की कोशिशों से व्यथित हैं तथा उन्हें लगता है कि देश में असहिष्णुता तेजी से बढ़ रही है व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला जा रहा है। प्रख्यात कवि राजेश जोशी का मानना है कि देश में आपातकाल जैसे हालात है जबकि मंगलेश डबराल कहते हैं कि ऐसी शक्तियां खुलकर मैदान में आ गई है जो देश में साम्प्रदायिक सौहाद्र्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक मूल्यों एवं नागरिकों की आजादी पर हमले करने में लगी हुई है। अकादमी सम्मान लौटाने के पीछे तमाम लेखकों का यही तर्क है कि चूंकि अकादमी के सत्ताधीशों ने चुप्पी साध रखी है अत: उनके पास प्रतिरोध का यही औजार है और वे अब इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।
     साहित्य अकादमी स्वायत्यशासी संस्था है, सरकार द्वारा वित्त पोषित। देश की ऐसी संस्थाएँ कितनी स्वतंत्र होती हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। शायद कोई भी स्वायत्यशासी निकाय सरकारी हस्तक्षेप एवं अप्रत्यक्ष नियंत्रण से परे नहीं है। लेखक बिरादरी भी इसे बेहतर जानती है। इसके बावजूद कवि - लेखक सम्मान स्वीकार करते रहे है। यह सिलसिला 1955 इसे जारी है। इसका मतलब है पुरस्कार स्वीकार करते वक्त पूरा भरोसा रहा है कि संस्था विशुद्ध रुप से स्वायत्यशासी है। और देश में आपसी सद्भाव व साम्प्रादायिक सौहार्द्र बना हुआ है। अब यदि देश की मौजूदा राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों को देखें तो हर व्यक्ति इसका आकलन अपने-अपने ढंग से करने में स्वतंत्र है। इसमें शक नहीं कि पिछले दो दशकों में सामाजिक सद्भाव, समदर्शिता एवं सहनशीलता में कमी आई तथा समय-समय पर इसका विस्फोट दंगों के रुप में सामने आया है जिनमें व्यापक हिंसा हुई। गोधरा एवं मुजफ्फरपुर कांड सबसे बड़े उदाहरण है हालांकि साम्प्रदायिक दंगे वर्ष 2000 के पूर्व के दशकों में भी होते रहे हंै। लेकिन नई सदी के शुरुआत में ही नफरत की ऐसी निर्मम अभिव्यक्ति कम देखने में आई। विशेषकर इस दशक में व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं विचारों की आजादी को धिक्कारने और कुचलने का सुनियोजित षड़यंत्र चला हुआ है तथा वह बाज दफे हिंसक की घटनाओं के रुप में सामने आता रहा है। हेमंत दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम.एम. कलबुर्गी इसके नवीनतम उदाहरण है। चूंकि अब शब्दकार इसके शिकार हो रहे हंै इसलिए देश का लेखक समाज ज्यादा चिंतित, व्यथित एवं आक्रोषित है। इसीलिए विरोध स्वरुप चिंतनशील लेखकों ने अकादमी पुरस्कार लौटाने शुरु किए हैं। किसी गंभीर सवाल पर राष्ट्रीय स्तर पर लेखकों की ऐसी सामूहिकता कम ही देखने को आई है।
     बहरहाल पुरस्कार लौटाना या नहीं लौटाना यह विशुद्ध रुप से निजता का प्रश्न है। इस प्रश्न पर सहमति-असहमति स्वाभाविक है। जिन्होंने पुरस्कार लौटाए उन्हें धिक्कारने या जिन्होंने नहीं लौटाएँ या जिन्हें नहीं लौटाना है अथवा जो इस मुद्दे पर तटस्थतावादी हैं, उन्हें भी धिक्कारने की जरुरत नहीं है। लेखक समाज में असहमति इस बात पर नहीं है सामाजिक सद्भाव बिगड़ रहा है तथा सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा हैं बल्कि असहमति विरोध के स्वरुप को लेकर है। यानी लेखकों का एक वर्ग मानता है कि पुरस्कार लौटाने की क्या आवश्यकता? विरोध दर्ज करने के और भी तरीके हो सकते हंै। यह तर्क बिल्कुल ठीक हैं किंतु इस सवाल पर लेखकों का खेमों में बंटना भी स्वाभाविक है। प्रति-प्रतिक्रिया में जो विचार व्यक्त किए जा रहे हंै वह लेखक समुदाय की एकजुटता एवं आपसी समझ को खुरचती है। इस्तीफे के विरोध में सबसे बड़ा नाम है नामवर सिंह का, साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित। हिन्दी के प्रख्यात माक्र्सवादी आलोचक, नामवर सिंह की राय में लेखक अखबारों की सुर्खियाँ बटोरने के लिए पुरस्कार लौटा रहे हैं। अगर उन्हें कलबुर्गी की हत्या की घटना का विरोध करना है तो उन्हें राष्ट्रपति, संस्कृति मंत्री या मानव संसाधन मंत्री से मिलकर सरकार पर दबाव बनाया चाहिए तथा उनके परिवार की मदद के लिए आगे आना चाहिए। वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु खरे की टिप्पणी तो और भी तीखी है। बीबीसी से की गई एक बातचीत में उन्होंने साहित्य अकादमी को उधेड़ते हुए लेखकों को भी नहीं बख्शा। उन्होंने कहा - 'ईनाम लौटाकर क्या भाड़ फोड़ लेंगे?'
      विरोध की मशाल थामने में हिन्दी की तुलना में अन्य भाषाई लेखकों का प्रतिरोध ज्यादा मजबूत नजर आ रहा है। विशेषकर प. बंगाल और कर्नाटक। गोवा के 14 साहित्य अकादमी विजेताओं ने देशव्यापी अभियान छेड़ने का निश्चय किया है। कोंकणी लेखक एन. शिवदास ने कहा कि हम लगातार विरोध जारी रखेंगे। गोवा के लेखकों ने यह भी तय किया है कि इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भी उठाएंगे। उनके सुर में सुर मिलाते हुए हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण, काशीनाथ सिंह, अरुण कमल एवं डा. विश्वनाथ त्रिपाठी ने देश में बढ़ती साम्प्रदायिकता, असहनशीलता तथा अभिव्यक्ति की आजादी पर बढ़ते खतरे के विरोध में लेखकों से आगे आने की अपील की है। इस अपील से विरोध को और बल मिलना स्वाभाविक है।
      पुरस्कार लौटाने के सिलसिले के बाद जैसा कि स्वाभाविक था, केंद्र में सत्तारूढ़ दल के मंत्रियों ने लेखकों के फैसले पर सवाल खड़े किए। वित्त मंत्री अरुण जेटली, संस्कृति मंत्री महेश शर्मा, संचार एवं प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद की प्रतिक्रिया का लब्बोलुआब यह था कि देश में सहिष्णुता का माहौल है। लेखकों का अवार्ड लौटाना वैचारिक असहिष्णुता है। लेखक, राजनीति कर रहे हंै। विरोध कागजी है। पुरस्कार लौटाने वाले ज्यादातर लेखक वामपंथी या नेहरु विचारधारा के समर्थक हंै तथा ऐसा करने वाले लेखकों की नीयत पर संदेह है। कुल मिलाकर मंत्रियों की प्रतिक्रिया केंद्र सरकार की तिलमिलाहट को दर्शाती है जो थोक में अकादमी अवार्ड लौटाने से उपजी है।
      हमेशा की तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुप है। दादरी के बिसाहड़ा गाँव में गौमांस के संदेह में इकलाख की हत्या की घटना पर देशव्यापी प्रतिक्रिया के बावजूद उनकी चुप्पी देर से टूटी। संभव है यदि साहित्यकारों के विरोध के तेवर और तीव्र हुए व पुरस्कार लौटाने का क्रम जारी रहा तो वे चुप्पी तोड़ेंगे, कुछ बोलेंगे। हालांकि वे यदि इस मुद्दे को संवेदनशील मानते हैं तो उन्हें प्रतीक्षा की जरुरत नहीं है।
      बहरहाल विरोध के स्वर कितने तेज होंगे, यह आगे की बात है। वैसे देश भर की अनेक संस्थाएं एवं सरकारी पुरस्कारों से नवाजे गए विजेता सामने आ रहे हंै। प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव अली जावेद ने भी देशभर के अपने सदस्यों से पुरस्कार लौटाने की अपील की है। आंदोलन, धरना-प्रदर्शन, रैलियां, ज्ञापन इत्यादि तो अपनी जगह पर है पर भविष्य की रणनीति के लिए ज्यादा मुफीद होगा सरकारी एवं सरकार द्वारा वित्त पोषित संस्थाओं के पुरस्कारों का बहिष्कार। केंद्र के साथ सभी राज्यों की सरकारें प्रतिवर्ष या समय - समय पर विभिन्न क्षेत्रों में अप्रतिम उपलब्धियों के लिए पुरस्कार स्वरुप अलंकरण एवं नगद राशि प्रदान करती है। इसमें साहित्य, कला एवं संस्कृति भी शामिल है। सरकार किसी भी पार्टी की हो, पुरस्कारों का बहिष्कार सबसे ताकतवर हथियार होगा, लौटाने से कहीं ज्यादा। यह सिलसिला तब तक जारी रहना चाहिए जब तक कि इस बात का यकीन न हो जाए कि देश में सामाजिकता, साहिष्णुता, धार्मिक समभाव और विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपने पूरे शबाब पर लौट आई है।

Friday, October 16, 2015

नक्सलवाद की विदाई! ऐसे कैसे?

- दिवाकर मुक्तिबोध
  छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने हाल ही में नई दिल्ली में मीडिया ये चर्चा करते हुए कहा था कि राज्य में नक्सली समस्या अब केवल तीन जिलों सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर तक सिमटकर रह गई है। मुख्यमंत्री 28 सितंबर से नई दिल्ली में थे और छत्तीसगढ़ सदन में वे कुछ पत्रकारों से मुखातिब थे। उन्होंने यह भी कहा कि नक्सलियों का विदेशों में नेटवर्क है और अब राज्य में केवल 400 हार्डकोर नक्सली शेष है। मुख्यमंत्री का दावा तो अपनी जगह पर है लेकिन यह भी सच है कि इन तीन जिलों से परे भी आए दिन नक्सली वारदातें होती रहती हैं। पर इसमें शक नहीं कि नक्सलियों के आतंक का दायरा सिमट रहा है। यह अद्र्धसैनिक बलों की भारी संख्या में नक्सली क्षेत्रों में तैनाती, मुठभेड़ों में दर्जनों हार्डकोर माओवादियों के मारे जाने एवं बड़ी संख्या में पुलिस के आगे आत्मसमर्पण की घटनाओं से संभव हुआ है। यह भी स्पष्ट है कि केंद्र व राज्य सरकार के बीच नक्सली मुद्दे पर बेहतर तालमेल है एवं उन्होंने पूरी ताकत झोंक रखी है। नक्सली बैकफुट पर है। उनमें बौखलाहट है। लेकिन वे राज्य से बिदा नहीं हुए है। फिर भी उम्मीद की जा रही हैं कि राज्य सरकार की नई पुनर्वास नीति एवं अत्याधुनिक शस्त्रों से लैस सुरक्षा बलों के दबाव की वजह से देर सबेर राज्य को नक्सली आतंक से छुटकारा मिलेगा। पर यह तभी संभव होगा जब बस्तर संभाग के सभी गाँव खुली हवा में सांस ले सकेंगे। जब गाँवों में विकास कार्य होंगे, सड़कें बनेंगी, शिक्षा और स्वास्थ्य की ओर ध्यान दिया जाएगा, इसके लिए माकूल व्यवस्थाएँ बनाई जाएंगी, ग्रामीणों को रोजगार मिलेगा और केंद्र व राज्य सरकार की तमाम योजनाओं पर ईमानदारी से कार्य होगा। आदिवासियों को हर तरह के शोषण से मुक्त करना नक्सलियों के खिलाफ संघर्ष की पहली जरुरत है इसलिए मूल चुनौती आतंक नहीं, विकास एवं शोषण से मुक्ति की है।
       दरअसल धुर नक्सली क्षेत्रों में विकास कार्य दुष्कर जरुर है किन्तु असंभव नहीं। इसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति चाहिए और जाहिर है सरकार के भीतर और बाहर इसे कुचलने का षड़यंत्र चलता रहता है। हालांकि दिखावे की कोशिशों में कोई कमी नहीं की जाती। बड़ी-बड़ी घोषणाएँ होती हैं, बड़ी-बड़ी बातें की जाती है, हर बड़ी घटना के बाद नक्सलियों को कायर कहा जाता है और जब किसी अफसर का अपहरण होता है तो सरकार शरणागत हो जाती है। छत्तीसगढ़ में ऐसे बहुतेरे उदाहरण हैं जब अपहृत ग्रामीणों को नक्सलियों के पंजे से मुक्त करने के लिए सरकार ने कोई गंभीर प्रयत्न नहीं किए और उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया। पुलिस की मदद करने वाले आदिवासियों के जीवन की सुरक्षा की चिंता नहीं की और उन्हें भी मरने छोड़ दिया। ऐसे मुखबिरों को नक्सलियों ने चुन-चुनकर मारा और उन्हें भी नहीं बख्शा जिन पर उन्हें जरा भी शक था। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष पहले 6 महीने में 11 मुखबिरों की नक्सलियों ने हत्या की।
        बहरहाल नक्सली हिंसा के गिरते ग्राफ से चिंता कुछ कम जरुर होती है और कहीं न कहीं राज्य शासन के प्रयासों की सराहना भी करनी पड़ती है। किन्तु यह तय है, जब तक नक्सल प्रभावित बस्तर का हर गाँव विकास की रोशनी से चकाचक नहीं होगा, नक्सलियों की मौजूदगी बनी रहेगी। सवाल है यह कैसे हो? जान छुड़ाने के लिए बहुत आसानी से कह दिया जाता है, माओवादी विकास कार्य करने नहीं देते, सड़कें उड़ा देते है, स्कूल भवन ध्वस्त करते हैं, वे प्रत्येक ऐसे कार्य में आड़े आते हैं जहां उन्हें आदिवासियों के उठ खड़े होने का अहसास होता हैं। सलवा जुडूम इसका सबसे बेहतर उदाहरण है। केंद्र में यूपीए सरकार के कार्यकाल में, पी. चिदम्बरम के गृहमंत्री रहते, घोषणाएँ की गई थी कि फोर्स की मदद से एक-एक क्षेत्र नक्सलियों से खाली करके वहां पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के बीच विकास कार्य कराए जाएंगें। फोर्स के दबाव से बीते दशक में कुछ क्षेत्र माओवादियों से खाली तो हुए पर गाँवों की बदहाली यथावत है। विकास के उपक्रम के तहत अब राज्य की रमन सिंह सरकार ने नक्सली क्षेत्रों में स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों एवं सामुदायिक अस्पतालों में डॉक्टरों की तैनाती के लिए विशेष पैकेज की घोषणा की है। सवाल है जब बस्तर के सबसे बड़े शहर जगदलपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल के लिए डॉक्टर नहीं मिलते, तब धुर नक्सल क्षेत्रों में विशेष पैकेज का फार्मूला कैसे काम आएगा? यदि कोई डॉक्टर हिम्मत करके, जान की परवाह न करके, सेवा भावना से अभिभूत होकर वहां जाना भी चाहेगा तो क्या उसे उन तथाकथित स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सा से संबंधित समुचित सुविधाएं एवं सुरक्षा उपलब्ध रहेगी? राज्य में स्वास्थ्य संस्थाओं, अस्पतालों का वैसे ही बुरा हाल है। प्रतिवर्ष सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण दूषित पानी के सेवन से, चिकित्सा के अभाव में डायरिया और मलेरिया से दम तोड़ देते हंै। ऐसी स्थिति में सुरक्षा की गारंटी के साथ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक अस्पतालों को चिकित्सा की आधुनिक सुविधाओं एवं दक्ष पैरा मेडिकल स्टॉफ से लैस करना पहली जरुरत है। हालत यह हैं कि मशीनें हैं तो दक्ष तकनीशियन नहीं और दक्ष तकनीशियन है तो मशीन नहीं।
       स्वास्थ्य का ही नहीं प्राथमिक शिक्षा का भी नक्सल प्रभावित बस्तर, सरगुजा में यही हाल है। राज्य सरकार के स्कूली शिक्षा मंत्री केदार कश्यप एवं ग्रामीण विकास मंत्री अजय चंद्राकर ने स्वीकार किया है कि वामपंथी उग्रवाद के कारण 12 जिलों में पिछले 15 वर्षों से करीब दस हजार शिक्षकों की कमी है। इनमें 2300 से अधिक केवल साइंस शिक्षकों के पद रिक्त है इसलिए दोनों संभागों के 64 विकासखण्डों में आउट सोर्सिंग के जरिए शिक्षकों की भर्ती के प्रयत्न किए जा रहे हैं। कांग्रेस ने स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का मुद्दा उठाते हुए सरकार के इस फैसले का जोरदार विरोधर किया है। यह विरोध अब भी जारी है। अब सवाल है, सरकार क्या करें? सरकार के इन नुमाइंदों के अनुसार शिक्षकों की भर्ती के लिए 13 बार विज्ञापन जारी किए गए किन्तु योग्य उम्मीदवार नहीं मिले। इसलिए आउट सोर्सिंग यानी राज्य के बाहर के उम्मीदवारों को मौका देने का निश्चय किया गया। क्या इससे समस्या का समाधान हो पाएगा? शिक्षा के स्तर की तो बात ही छोड़ दें। प्रदेश के मुख्य सचिव विवेक ढांढ ने मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की मौजूदगी में एक कार्यक्रम में कहा कि 6वीं में पढ़ रहे लड़के को तीसरी कक्षा का भी ज्ञान नहीं। और 8वीं का विद्यार्थी पांचवीं की किताब भी नहीं पढ़ सकता। उच्च शिक्षा में भी लगभग यही स्थिति है। इससे पता चलता है कि राज्य में शिक्षा का कैसा बुरा हाल है।
      बहरहाल सरकार के सामने विकास की बड़ी चुनौतियां हैं। राज्य में पिछले 12 वर्षों से भाजपा की सरकार है अत: समय की आड़ लेकर सवालों से बचा नहीं जा सकता। नक्सली आतंक का दायरा यदि सिमट रहा है तो जाहिर है इसका श्रेय सरकार को है किन्तु प्रभावित क्षेत्रों में डॉक्टरों की नियुक्ति का मामला हो अथवा शिक्षा कर्मियों की भर्ती का, बात तब तक नहीं बनेगी जब तक कि न्यूनतम जरुरतें, सुरक्षा और विश्वास के साथ पूरी नहीं होगी। कहा जा सकता है कि अलग राज्य बनने के बाद बीतें 15 वर्षों में आदिवासियों का कुछ भी भला नहीं हुआ है इसलिए प्रदेश में नक्सलवाद की जड़ें कायम है।

Saturday, October 3, 2015

स्मार्ट विलेज, पता नहीं कब स्मार्ट बनेंगे

- दिवाकर मुक्तिबोध
      प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल ही में अमेरिका यात्रा के दौरान भारत के डिजिटल भविष्य पर लंबी चौड़ी बातें हुईं। कुछ वायदे हुए, कतिपय घोषणाएँ हुईं। मसलन गूगल भारत में 500 रेलवे स्टेशनों को वाईफाई से लैस करने में मदद करेगा, एपल की सबसे बड़ी निर्माण कंपनी फॉक्सकान भारत में प्लांट लगाएगा, आईफोन 6 एस व 6 एस प्लस भारत में जल्द लॉच होंगे। एक ओर महत्वपूर्ण घोषणा हुई, माइक्रोसाफ्ट भारत के 5 लाख गांवों में कम कीमत पर ब्रांडबैंड कनेक्टिविटी उपलब्ध कराएगा।
      डिजिटल इंडिया के स्वप्नद्रष्टा नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा इस मामले में सफल कहीं जाएगी कि विश्व आईटी सेक्टर के दिग्गजों यथा सुंदर पिचई सीईओ गूगूल, जॉन चैम्बर्स सीईओ सिस्को, सत्य नड़ेला सीईओ माइक्रोसाफ्ट तथा पॉल जैकब्स प्रेसीडेंट क्वॉलकॉन ने डिजिटल क्षेत्र में भारत की प्रगति को शानदार बताते हुए मुक्तकंठ से मोदी की प्रशंसा की। इन आईटी प्रशासकों के विचारों का लब्बोलुआब यह था कि पीएम मोदी दुनिया बदल देंगे, उनके पास ग्लोबल विजन है और भारत इनोवेशन की धरती है। मोदी की प्रशंसा में काढ़े गए इन कसीदों की हकीकत कब सामने आएगी, यह समय बताएगा।
     किन्तु यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री देश की जनता को सुहाने सपने दिखा रहे हैं। 16 माह में 27 देशों की यात्रा करने वाले मोदी दूरसंचार के क्षेत्र में देश को विकसित देशों के समकक्ष ला खड़ा करेंगे? बड़ा सवाल है। लेकिन क्या इससे देश एवं जनता की बुनियादी जरुरतें पूरी हो सकेंगी? माइक्रोसाफ्ट ने कम कीमत पर 5 लाख गाँवों में ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने की बात मोदी से कही हैं पर क्या भूख, बेकारी एवं गरीबी से कलप रहे गाँवों की पहली जरुरत ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी है? प्रधानमंत्री ने न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा की 70वीं वर्षगांठ पर कहा कि हमारे निर्धारित लक्ष्यों में गरीबी उन्मूलन सबसे ऊपर है। उन्होंने कहा कि सबके लिए आवास, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता हमारी प्राथमिकता है। हमारी सरकार ने नेटवर्क की जरुरत और मोबाइल फोन के इस्तेमाल से गरीबी पर जोरदार प्रहार किया है? क्या सचमुच? क्या गरीब इसे जानते हैं? दरअसल प्रधानमंत्री के इन दावों के बावजूद जमीनी हकीकत क्या है, किसी से छिपा नहीं हैं। यह ठीक है कि देश में मोबाइल क्रांति की वजह से बहुत सी चीजें आसान हुई हैं, सुविधाएं बढ़ी हैं लेकिन क्या देश के बहुसंख्य नागरिकों विशेषकर करोड़ों गरीबों के जीवन स्तर में कोई क्रांतिकारी बदलाव आया हैं? देश में गाँवों की संख्या 6 लाख से अधिक हैं। गरीबी पर ऑकड़ों की बात करें तो बीते दशक में गरीबी का स्तर कुछ घटा जरुर है। आंकड़े बताते है कि वर्ष 2004 - 2005 में देश की कुल आबादी के 37.21 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे थे। तत्कालीन केंद्र सरकार की योजनाओं की बदौलत वर्ष 2009-10 में गरीबी घटकर 29.8 प्रतिशत रह गई। योजना आयोग द्वारा जारी वर्ष 2013 के आंकड़े देखें तो 25.7 प्रतिशत ग्रामीण तथा 13.7 प्रतिशत शहरी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। वर्ष जून 2014 में जारी रंगराजन कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार 36 करोड़ 30 लाख यानी 29.5 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। इन आंकड़ों से जाहिर हैं गरीबी का प्रतिशत घट अवश्य रहा है लेकिन इसकी गति बहुत धीमी हैं। अब जरा गरीबी के संदर्भ में मोदी सरकार की प्राथमिकताओं पर गौर करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि 6 लाख गाँवों में बुनियादी नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के संकल्प को पूरा करने के लिए कई दशक लग जाएंगे बशर्ते योजनाएँ भ्रष्टाचार के दंश से बची रहें। और जाहिर है मौजूदा व्यवस्था में यह नामुमकिन हैं। व्यवस्था पूरी तरह भ्रष्ट हैं।
      यकीनन बातें बड़ी-बड़ी हो रही हैं। डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत, स्किल भारत जैसे  राष्ट्रीय अभियानों से जनता की उम्मीदों को पंख दिए जा रहे हैं। वैश्विक मंदी के बावजूद आर्थिक मोर्चे पर देश की सुदृढ़ता की दुहाई दी जा रही हैं, लेकिन यह स्थापित सत्य है कि अमीरी- गरीबी के बीच खाई बढ़ती ही जा रही हैं। अमीरों का भारत बहुत छोटा सा हैं, गरीबों का भारत बहुत विशाल। पूंजी के केंद्रीयकरण की स्थिति यह है कि आज सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और तो और सांस्कृतिक क्षेत्रों में कारर्पोरेट हावी है। ऐसी स्थिति में बुनियादी समस्या यानी देश की गरीबी पर बतर्ज मोदी, मोबाइल अटैक कितना कारगर साबित होगा? क्या मोबाइल या दूरसंचार क्षेत्र में अत्याधुनिक तकनीकी से गरीबों की गरीबी मिट जाएगी? क्या उनका जीवन स्तर सुधरेगा? क्या उन्हें दो जून की रोटी आसानी से मयस्सर होगी? क्या हर हाथ को काम मिलेगा? क्या दूरस्थ आदिम क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, सड़क, बिजली, पानी जैसी बुनियादी आवश्यकताएँ संभव हो सकेंगी? आजादी के 68 वर्षों के बाद भी हजारों की संख्या में ऐसे गाँव हैं जहाँ न बिजली हैं, न पानी, न सड़क, न स्कूल और न ही प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र। बरसात में टापू बनने वाले इन गाँवों में यदि मनुष्य जिंदा हैं तो केवल प्रकृति की मेहरबानी से। जीवन के अंधेरे से लड़ रहें इन गाँवों में बदलाव की बयार क्या मोबाइल क्रांति से आएगी? यकीनन दिल्ली बहुत दूर है।
      दरअसल आजादी के बाद ग्रामीण विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के बावजूद, पंचवर्षीय योजनाओं के अंतर्गत अरबों-खरबों रुपये खर्च करने के बावजूद अधिसंख्य गाँवों की सूरत नहीं बदली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि यदि विदेशी बैंकों में जमा काला धन देश में वापस आएगा तो प्रत्येक नागरिक के खाते में 15-15 लाख रुपये जमा हो जाएंगे। अब तक एक भी पैसा भारत नहीं आया और बयान की लीपापोती कर दी गई। यह राजनीतिक हवाबाजी थी। जबकि बीते 68 वर्षों में गाँवों के उत्थान के नाम पर केंद्र व राज्य सरकारों के खजाने से निकले सफेद धन का अधिकांश हिस्सा काली कमाई के रुप में नेताओं, व्यापारियों, कारखानेदारों, पूंजी के दलालों, अधिकारियों व ठेकेदारों के बेनामी खातों में, बेनामी संपत्तियों के रुप में जमा हुआ और अभी भी होता जा रहा है। इस पर कोई नियंत्रण नहीं हैं इसलिए गाँवों का विकास अवरुद्ध है तथा वे अभी भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। ऋणग्रस्त किसानों, खेतिहर मजदूरों का जीवन कितना कष्टमय है इसका कारुणिक उदाहरण निरंतर बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं से मिलता है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की एक गणना के अनुसार सन् 1995 से अब तक 3 लाख से अधिक किसानों ने अपनी जान दी। सन् 2014 में 5650 किसान ऋण ग्रस्तता की वजह से अपनी जान गंवा बैठे। छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा 1510 है जिसमें खेतिहर मजदूर भी शामिल है। इसी वर्ष हाल ही में ऋण के बोझ एवं फसल चौपट होने की वजह से राज्य में करीब एक दर्जन आत्महत्या के मामले सामने आए हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की राज्यों की सूची के अनुसार किसानों की आत्महत्या के सर्वाधिक प्रकरण आंध्रप्रदेश में दर्ज हुए जबकि इस सूची में छत्तीसगढ़ पांचवें स्थान पर है। इन आंकड़ों की विश्वसनीयता को भले ही चुनौती दी जाए पर यह स्पष्ट हैं, कि किसानों, खेती पर आश्रित परिवारों, मजदूरों की जीना दुभर हो गया है। भौतिक-संसाधनों के विस्तार से शहर धीरे-धीरे भले ही अमीर होते जा रहे हो पर गाँवों का कायाकल्प नहीं हो रहा है। देश के हजारों गाँव अभी भी आदिम अवस्था में है।
अब केंद्र सरकार ने स्मार्ट सिटी की तर्ज पर स्मार्ट विलेज की परिकल्पना की है। केंद्रीय बजट में 100 स्मार्ट सिटी के लिए 7016 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया गया है। वर्ष 2015-16 में इस परियोजना पर 143 करोड़ रुपये खर्च होंगे। शहरों को हाईटेक सुविधाओं से लैस करने के संकल्प के बाद केंद्र को गाँवों का ख्याल आया है और उसने अगले तीन वर्षों में 300 स्मार्ट विलेज कलस्टर बनाने की घोषणा की है। केंद्रीय केबिनेट ने 16 सितंबर 2015 को इस अभियान को मंजूरी दी। इसके लिए 5,14.08 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इस मिशन का लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक, सामाजिक और अधोसंरचना संबंधी गतिविधियों में तेजी लाना है। गाँवों को ऐसे समूह के रुप में विकसित करना है जहां लोगों में कार्यकुशलता आए और स्थानीय उद्यम को बढ़ावा मिले। कोशिश गाँवों को शहरों जैसा रुप देने की है। कहा गया है कि इस मिशन में राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी क्योंकि गाँवों का चयन उन्हें करना होगा और पैसों का इंतजाम भी।
     केंद्र सरकार के स्मार्ट विलेज मिशन को श्यामाप्रसाद मुखर्जी रर्बन का नाम दिया है। दरअसल यह कोई नई परिकल्पना नही है। पूर्व राष्ट्रपति स्व. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने सबसे पहले यह विचार दिया था कि गाँवों का संकुल बनाकर, उन्हें सड़क संपर्क के जरिए एक-दूसरे से जोड़कर वहां शहरों जैसी सुविधाएँ मसलन सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाएँ प्रायवेट पब्लिक पार्टनरशिप (पीपीपी) के जरिए उपलब्ध कराई जाए। उन्होंने अपनी किताब 'टारगेट - 3 बिलियन' में इसका विस्तार से उल्लेख किया है। इस योजना को प्रॉविजन ऑफ अर्बन एमिनेटिस टू रुलर एरिया ('पुरा') का नाम दिया। इस किताब में उनके सहलेखक थे सृजनपाल सिंह। ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के राष्ट्रपति रहते हुए यूपीए सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 'पुराÓ को 11वीं पंचवर्षीय योजना के शेष कार्यकाल में इसे भारत सरकार की योजना के रुप में शामिल किया। और इसके लिए अलग फंड की व्यवस्था की। पर जल्द ही योजना राजनीति के भंवरजाल में उलझ कर रह गई। नतीजतन तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की 'पुरा' योजना को असफल बताते हुए 24 फरवरी 2012 को संशोधित 'पुरा' योजना को लॉच किया जिसमें आर्थिक स्त्रोतों के विकास एवं सुदृढ़ीकरण के साथ ही ग्रामीण अधोसंरचना के विकास पर जोर दिया गया। उनका दावा था कि हमारी नई पुरा योजना सफल होगी। नई 'पुरा' योजना में जल आपूर्ति, स्वच्छता व भौतिक संरचना पर ज्यादा जोर दिया गया है। जाहिर है कलाम साहब की 'पुरा' योजना राजनीति की शिकार हुई तथा बाद में नई योजना पर भी विशेष कुछ काम नहीं हुआ। वर्ष 2014 में तो यूपीए सरकार विदा हो गई और भाजपा राज आया। अब मोदी सरकार ने यूपीए की उसी संशोधित 'पुरा' योजना को नया जामा पहनाते हुए श्यामाप्रसाद मुखर्जी का नाम दिया है। यानी श्यामाप्रसाद मुखर्जी रर्बन मिशन (एस.पी.एम.आर.एम.)। बेहतर होता यदि नई दिल्ली की औरंगजेब से नामांकित कुछ किलोमीटर सड़क तक ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की स्मृति को सीमित रखने के बजाए राष्ट्रीय 'पुरा' योजना को उनका नाम दिया जाता। जबकि मोदी सरकार ने 27 जुलाई 2015 को पूर्व राष्ट्रपति के निधन के बाद उनका खूब गुणगान किया था लेकिन जब राष्ट्रीय स्तर पर ग्रामीण विकास योजना के नामकरण की बात सामने आई तो पार्टी के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी को याद किया गया। जबकि देश जानता है कि 'पुरा' की मूल कल्पना कलाम जी की है।
       बहरहाल अगले तीन वर्षों में पता चल जाएगा कि तथाकथित स्मार्ट विलेज कितने स्मार्ट हुए। योजना के गतिशील होने के बाद 300 रर्बन समूह सुविधाओं के मामले में शहर की शक्ल ले लेंगे। पर योजना की सफलता राज्य सरकारों के कामकाज पर निर्भर है। यहाँ फिर वहीं सवाल खड़े हो जाता है कि छत्तीसगढ़ सहित लगभग सभी राज्य सरकारों के मुख्यमंत्री साल में एक बार कुछ दिनों के लिए गाँवों का दौरा करते हैं, वर्षों से कर रहे हैं, जनदर्शन देते हैं, लोगों की समस्याएँ सुनते हैं, उन्हें नजदीक से देखते हैं, आदेश पारित करते हैं, फंड की व्यवस्था करते हैं पर गाँवों और गाँववालों की हालत नहीं बदलती। ज्यादा दूर क्यों जाएँ छत्तीसगढ़ में बस्तर को ले लें, अबूझमाड़ को ले लें, सरगुजा के आदिवासी वन ग्रामों को देखें, विलुप्त होती पहाड़ी कोरवा जैसी जनजातियों को देखें, जो स्थिति आजादी के पूर्व थी तकरीबन वही स्थिति अभी भी कायम है बल्कि अंधेरा कुछ और गहरा हुआ है। स्मार्ट विलेज इस अंधेरे में कब और कैसे उजाला फैलाएगा, भ्रष्ट व्यवस्था के चलते कहना मुश्किल है। पर यह स्पष्ट इन गाँवों को फिलहाल मोबाइल कनेक्टिविटी की नहीं, जीवन के लिए जरुरी प्राथमिक सुविधाओं की कनेक्टिविटी चाहिए।

Saturday, February 14, 2015

असंभव सी लगने वाली विशालकाय जीत

- दिवाकर मुक्तिबोध

      एग्जिट पोल के तमाम परिणामों को पीछे धकेलते हुए आम आदमी पार्टी ने दिल्ली राज्य विधानसभा के चुनावों में अप्रतिम सफलता हासिल की है। यह इस बात का संकेत है कि राजनीति में बदलाव की बयार जो लोकसभा चुनावों के बाद ठहरी सी लग रही थी, वह दरअसल भीतर ही भीतर तेज रफ्तार से दौड़ रही थी जिसे न तो एग्जिट पोल ठीक से भांप पाए और न ही दिल्ली के बाहर के लोग, देश के लोग सोच पाए। यद्यपि चुनाव पूर्वानुमानों ने इतना संकेत तो जरुर दे दिया था कि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पाटीज़् इस बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौट रही है लेकिन नतीजे एक तरफ होंगे, कल्पनातीत था। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की 70 सीटों में से 67 सीटें जीतकर एक ऐसा कीर्तिमान रचा है जो भविष्य में शायद ही कभी टूट पाए।
       प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की जुगलबंदी से आल्हादित भाजपा चुनाव के पूर्व आश्वस्त थी कि जिस तरह हरियाणा, महाराष्ट्र एवं जम्मू कश्मीर में पार्टी ने झंडे गाड़े, उससे कही बेहतर कामयाबी उसे दिल्ली में मिलेगी क्योंकि वह अब पाटीज़् का एक ऐसा गढ़ है जिसे भेदना न तो आम आदमी पार्टी के बस में होगा और न ही कांग्रेस के। इस सोच के पीछे कारण था दिल्ली की सभी लोकसभा सीटें भाजपा के कब्जे में है और कैंट चुनावों में भी उसे आशातीत सफलता मिली थी। पार्टी को भरोसा था, मोदी लहर फिर अपना चमत्कार दिखाएगी। चमत्कार की प्रत्याशा में पार्टी के तमाम प्रभावशाली नेताओं, कार्यकर्ताओं एवं स्वयं प्रधानमंत्री मोदी एवं अमित शाह ने प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ी। एक तरह से उन्होंने पूरी दिल्ली को मत डाला और जब लोगों ने बढ़-चढक़र मतदान में हिस्सा लिया, प्रतिशत का रिकार्ड कायम किया तो भाजपा की बांछे खिल गई। पार्टी भारी बहुमत के साथ सत्तासीन होने के ख्वाब को हकीकत में बदलते देखने बेताब थी लेकिन जब नतीजे सामने आए, वे बौखलाने के लिए काफी थे। मोदी-अमित का जादू केजरीवाल के सामने इस तरह बिखर जाएगा, सोचना भी कठिन था। पार्टी ने सन 2013 के विधानसभा चुनाव में 33 सीटें जीती थीं जो घटकर सिर्फ 3 रह गई। इतना बड़ा झटका! इतना बड़ा उलटफेर! पार्टी का हैरान होना, मायूस होना, एक बुरे सपने की तरह स्वाभाविक है। दिल्ली के चुनाव ने भाजपा को ऐसा सबक दिया है जो शायद इसके लिए जरुरी भी था क्योंकि लोकसभा एवं बाद में कुछ राज्य विधानसभा के चुनाव परिणामों ने पार्टी को अहंकार के ऐसे रथ पर सवार कर दिया था जो बिना आगे-पीछे देख सरपट भागता है और किसी एक मौके पर एक हल्की सी ठोकर से धड़ाम से गिर जाता है। दिल्ली चुनावों ने भाजपा के साथ यही सलूक किया है।
दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी के जीतने के कई कारण है। पहला बड़ा कारण है भाजपा का नकारात्मक प्रचार अभियान। ‘आप’ और केजरीवाल के खिलाफ जितना जहर उगला जा सकता था, नेताओं ने उगला लेकिन राज्य के मतदाताओं को ऐसा करना पसंद नहीं आया। दूसरा बड़ा कारण था अरविंद केजरीवाल की साफगोई। सन 2013 में मात्र 49 दिनों में दिल्ली की सत्ता छोडऩे एवं बाद में लोकसभा चुनावों में बढ़-चढक़र किए गए दावों के ध्वस्त होने से ऐसा आभास होने लगा था कि ‘आप’ की राजनीतिक हैसियत खत्म होने के कगार पर है किन्तु दिल्ली चुनावों की तिथि की घोषणा होने के पूर्व से ही, लोकसभा चुनाव में फीके प्रदर्शम के बावजूद, केजरीवाल की पार्टी ने दिल्ली की जनता से नाता नहीं तोड़ा और अपनी गलतियां स्वीकार करते हुए उन कारणों का खुलासा किया जिनकी वजह से पार्टी को दिल्ली की सत्ता छोडऩी पड़ी थी। केजरीवाल और पार्टी नेताओं की यह साफगोई जाहिर है जनता को लुभा गई।
      ‘आप’ की भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापसी के और भी कारण हंै किन्तु नतीजों को देखने के बाद यह स्पष्ट है कि दिल्ली के मतदाताओं ने पहले से ही अपना मानस बना लिया था कि उसे किसे वोट करना है। जब मतदाता ऐसा विचार करते हैं तो स्वाभाविक है कि विचार धीरे-धीरे निर्णायक रुप से ऐसी लहर में तब्दील हो जाता है, जो तमाम अवरोधों को कुचल देता है। दिल्ली की जनता-लहर ने भाजपा और कांग्रेस को ऐसा पटका कि वह उफ तक नहीं कर पाई। कांग्रेस की हार फिर भी समझ में आती है। उसे पिछले चुनाव में सिर्फ 8 सीटें मिली थीं और इस बार तो उसका खाता भी नहीं खुला। यानी उसे 8 सीटों का सीधा नुकसान हुआ किन्तु बीजेपी का पिछली 33 सीटों की तुलना में सिर्फ तीन तक सिमट जाना, कांग्रेस से कही ज्यादा भयावह है। पार्टी इस हार को आसानी से इसलिए भी नहीं पचा पाएगी क्योंकि दिल्ली में अब मोदी नहीं केजरीवाल का सिक्का चलेगा। पार्टी नेतृत्व के लिए जाहिर है यह बेहद कष्टप्रद होगा।
        बहरहाल इस असंभव से लगने वाले बहुमत के साथ आम आदमी पार्टी अब निश्चिंत होकर वे तमाम वायदे पूरे कर सकती है जो उसने जनता से कर रखे हैं। अब कोई अड़चन नहीं। अलबत्ता विकास के मुद्दे पर केन्द्र के साथ उसका तालमेल काफी मायने रखेगा। यदि टकराव की राजनीति चली तो मुद्दे पीछे छूटते जाएंगे हालांकि इसकी संभावना न्यून है क्योंकि ‘आप’ को आखिरकार अपने राजनीतिक भविष्य के लिए जनता को जवाब देना है। दरअसल दिल्ली चुनावों ने आम आदमी पार्टी को बड़ा सम्बल दिया है। उसे वहीं मंच पुन: मिल गया है जहां से वर्ष 2013 में कभी उसकी गर्जना को देश की जनता ध्यान से सुन रही थी और एक वैकल्पिक राजनीति का स्वागत करने आतुर थी किन्तु सांगठनिक ढांचे की कमजोरियों एवं कुछ राजनीतिक भूलों के चलते ऐसा नहीं हो पाया। अब आम आदमी पार्टी को भाजपा और कांग्रेस का राष्ट्रीय विकल्प बनना है तो उसे सबसे अधिक अपने संगठन के विस्तार और उसकी मजबूती पर ध्यान देना होगा। दिल्ली को छोडक़र देश के अन्य राज्यों में संगठन या तो है ही नहीं या लचर है। इसी वर्ष अक्टूबर-नवंबर में बिहार में विधानसभा चुनाव होने है और उसके बाद अगले वर्ष के मध्य में प. बंगाल, केरल, पांडिचेरी और असम में चुनाव होंगे। ‘आप’ के लिए ये चुनाव एक अवसर की तरह है। अब यह देखने की बात है कि पार्टी दिल्ली में ही खुश रहेगी या उसका विस्तार चाहेगी।

Monday, January 5, 2015

अब न इस्तीफा होगा और न ही विभाग बदलेगा....

 दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ निकाय चुनावों में कांग्रेस को यकीनन अप्रत्याशित सफलता मिली लेकिन यदि किसी बड़े उलटफेर की बात की जाए तो वह बिलासपुर को लेकर है। बिलासपुर नसबंदी कांड एवं स्वास्थ्य विभाग से संबंधित अन्य बहुचर्चित प्रकरणों के कारण पूरे प्रदेश की आंखों की किरकिरी बने स्वास्थ्य मंत्री अग्रवाल ने चुनाव में करिश्मा कर दिखाया। वे बिलासपुर नगर निगम चुनाव के संचालक थे। यह आशंका थी कि नसबंदी प्रकरण की वजह से पार्टी कम से कम संस्कारधानी में जबर्दस्त घाटे में रहेगी किन्तु ठीक उलट हुआ। भाजपा ने न केवल महापौर का चुनाव जीता वरन निगम में भी बहुत स्थापित किया। इस एक वजह से अमर अग्रवाल को नई संजीवनी मिल गई। अब नसबंदी सहित तमाम प्रकरणों का चाहे जो हश्र हो, उनसे न तो इस्तीफा मांगा जाएगा और न ही विभाग बदलेगा।

रायपुर। छत्तीसगढ़ में नगर निकाय चुनाव के नतीजे चौंकाने वाले रहे। अंतरकलह और गुटीय राजनीति में बुरी तरह उलझी कांग्रेस सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी का जोरदार मुकाबला करेगी तथा नगर पंचायतों में अपना परचम लहराएगी, ऐसी उम्मीद राजनीतिक विश्लेषकों को भी नहीं थी लेकिन इन चुनावों में कांग्रेस ने वह कर दिखाया जो किसी जमाने में, कम से कम एकीकृत मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ इलाके में उसके लिए सामान्य सी बात थी। छत्तीसगढ़ कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था। यद्यपि उस गढ़ में पिछले दस वर्षों में भारी टूट-फूट जरुर हुई है पर वह गढ़ पूर्णत: ध्वस्त नहीं हुआ है, यह नगर निगम, नगर पालिका एवं नगर पंचायतों के चुनाव के नतीजों ने साबित कर दिया है। राज्य की कुल 12 नगर निगमों में से 10 के चुनाव हुए जिनमें कांग्रेस व भाजपा को 4-4 में विजय मिली, पालिकाओं में भी दोनों ने 16-16 की बराबरी की हिस्सेदारी की तथा नगर पंचायतों में कांग्रेस ने भाजपा को पीछे छोड़ते हुए 50 पर कब्जा किया और बढ़त हासिल की। आगामी त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव, जिसकी प्रक्रिया शुरु हो चुकी है, पर फिलहाल उन पर कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती लेकिन स्थानीय स्तर पर कांग्रेस ने जो मुद्दे उठाए हैं, बहुत संभव है वे वहां भी काम कर जाए। यदि ऐसा हुआ तो फिर न तो नतीजे अप्रत्याशित रहेंगे और न ही चौंकाने वाले।
       इन चुनावों में भाजपा के लिए थोड़े संतोष की बात वार्डों में चुनकर आए पार्षदों की संख्या से हैं जिसके बल पर 10 में से 8 नगर निगमों के सभापति पार्टी के विजयी प्रत्याशी होंगे यानी निगम प्रशासन पर उनका लगभग बराबरी का कब्जा होगा। जाहिर है ऐसी स्थिति में कांग्रेस के महापौर के साथ राजनीतिक टकराव स्वाभाविक है जिसका परिणाम पहले भी नगर विकास कार्यों में देखने में आता रहा है लेकिन भाजपा के लिए कुल मिलाकर ये चुनाव भविष्य के लिए खतरे की घंटी है। यह उसके लिए चिंता का सबब है कि आखिरकार इतने जल्दी मतदाताओं का रुख कैसे बदल गया। दिसंबर 13 में हुए विधानसभा चुनाव और उसके बाद लोकसभा चुनावों में उसने अपना वर्चस्व बनाएं रखा था। पिछले दस वर्षों के तमाम चुनाव परिणामों को देंखे तो प्राय: प्रत्येक चुनावों में भाजपा को कांग्रेस के मुकाबले वोटों के प्रतिशत में बढ़त मिली किन्तु इस बार नगर संस्थाओं के चुनाव के नतीजे उसकी उम्मीदों के अनुकूल नहीं रहे। चूक कहां हुई, कैसी हुई और क्यों हुई इस पर पार्टी को विचार करना है। परिणामों से निराश मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने समीक्षा की बात कही है। उन्हें इस बात से ज्यादा धक्का लगा होगा कि पड़ोसी राज्य म.प्र. नगर निकाय चुनावों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का जादू चला तथा कुल 14 में से 10 निगमों में पार्टी के महापौर बैठ गए। राज्य में शेष 4 नगर निगमों का चुनाव अभी होना है यदि ये चुनाव भी पार्टी जीत लेती है तो यह व्यक्तिगत तौर पर शिवराज सिंह की राजनीतिक जीत होगी। यानी केन्द्रीय नेतृत्व की नजर में शिवराज सिंह का ग्राफ और भी बढ़ेगा हालांकि केन्द्र डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व का भी कायल रहा है। लेकिन इन चुनावों में किरकिरी हो गई। जिस मोदी लहर पर सवार होकर प्रदेश नेतृत्व ने विधानसभा और लोकसभा चुनाव जीता था और उसी लहर के सहारे रमन सिंह ने निकाय चुनावों में रैलियां की थी, पसीना बहाया था, लेकिन वह अपेक्षा के अनुरूप परिणाम नहीं दे पाया।
बहरहाल इन चुनावों से भाजपा को सबक मिला है तो कांग्रेस को नई संजीवनी मिल गई है। चुनाव के पूर्व कांग्रेस में उम्मीदवारों के चयन पर जो घमासान मचा था, जिस तरह ऐन वक्त पर अजीत जोगी ने चुनावों से कन्नी काट ली थी तथा प्रचार से इंकार कर दिया था, वह पार्टी कार्यकर्ताओं एवं संगठन के लिए किसी झटके से कम नहीं था। गुटीय राजनीति के घात-प्रतिघात के नजÞारों से ऐसा लगने लगा था कि इसकी कीमत पार्टी को चुनाव में चुकानी पड़ेगी किन्तु अप्रत्याशित परिणामों ने इन आशंकाओं को निर्मूल साबित कर दिया। इस सफलता के पीछे एक बड़ा कारण संगठन द्वारा जोर-शोर से जनता के मुद्दे उठाने का रहा है। राशन कार्ड, धान का समर्थन मूल्य, धान खरीदी, नसबंदी कांड, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर पार्टी ने सरकार को कटघरे में खड़े किया। जनता ने इसे देखा, महसूस किया और इन्ही सवालों पर सरकार एवं प्रदेश भाजपा को नए सिरे से विचार करने का आदेश सुना दिया।
      भाजपा के सामने अब बड़ी चुनौती त्रिस्तरीय पंचायतों के चुनावों में अपना वर्चस्व बनाए रखने की है। यद्यपि पंचायत चुनाव दलीय आधार पर नहीं लड़े जाएंगे। फिर भी ये चुनाव जीतना उसके लिए महत्वपूर्ण है। विशेषकर कांग्रेस के पुन: उद्भव को रोकना जरुरी है। इसके लिए जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं में व्याप्त असंतोष को दूर करने के साथ-साथ उन्हें पर्याप्त महत्व देना होगा। दरअसल पंचायत के चुनाव अग्नि परीक्षा की तरह होते है जो यह बताते है कि आपकी जड़ें कितनी गहरी हैं।
         नगर निकाय चुनावों के परिणामों ने यदि कही विस्मित किया है तो वह है रायगढ़ एवं बिलासपुर। रायगढ़ के महापौर चुनाव में मधु किन्नर का जीतना भाजपा एवं कांग्रेस दोनों के प्रति जनता के विश्वास को खारिज करता है। इसी तरह भाजपा का बिलासपुर नगर निगम में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आना स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल की व्यक्तिगत सफलता है। विशेषकर ऐसी परिस्थतियों में जब बहुचर्चित नसबंदी कांड की वजह से उनकी साख बेहद गिरी हुई थी। कांग्रेस ने उनके इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदेश में बड़ा आंदोलन खड़ा किया था। भाजपा संगठन में भी उनसे स्वास्थ्य मंत्रालय छीनने अथवा इस्तीफे लेने के सवाल पर विचार-मंथन शुरु हुआ था लेकिन अंतत: उन्हें बख्श दिया गया। राजनीतिक भंवर से किसी तरह उबरने के बाद अमर अग्र्रवाल के लिए बिलासपुर नगर निगम का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण था। विशेषकर मेयर का चुनाव और वार्डों में बहुमत की स्थापना जरुरी थी। जाहिर है कि स्वास्थ्य मंत्री ने पूरी ताकत झोंक दी। कहा जाता है कि पैसा पानी की तरह बहाया। भाजपा के किशोर राय मेयर का चुनाव भारी भरकम वोटों से जीत गए तथा पार्टी को वार्डों में भी बहुमत मिल गया। यह आश्चर्यजनक है कि समूचे प्रदेश में नसबंदी प्रकरण के कारण हुई किरकरी के बावजूद बिलासपुर के मतदाताओं ने चुनाव संचालक अमर अग्रवाल पर विश्वास व्यक्त किया जबकि शेष स्थानों में विशेषकर रायपुर में नेत्र कांड, नसबंदी प्रकरण, गर्भाशय प्रकरण, स्वास्थ्य उपकरणों, मशीनों की खरीदी में करोड़ों का गोलमाल आदि मामलों ने स्वास्थ्य मंत्री की छवि धूमिल की और किसी न किसी रुप में भाजपा के खिलाफ वातावरण बनाया। इसका प्रकटीकरण निकाय चुनावों में हुआ।
       बिलासपुर में जीत के साथ ही यह तय माना चाहिए कि अब अमर अग्रवाल पर संकट के बादल छंट गए हैं। वैसे भी कांग्रेस का आंदोलन व इस्तीफे की मांग कमजोर पड़ चुकी है लिहाजा अब नसबंदी प्रकरण के संदर्भ में अमर अग्रवाल किसी राजनीतिक नुकसान में नहीं रहेंगे। मंत्रिमंडल के अगले फेरबदल में संभव है उनका विभाग भी न बदला जाए। यानी ये चुनाव भाजपा के लिए भले ही नुकसानदेह साबित हुए हो पर अमर अग्रवाल के लिए फायदेमंद रहे। निकाय चुनावों में इसे ही सबसे बड़ा उलटफेर माना जाना चाहिए।