Saturday, May 12, 2018

पत्थलगड़ी पर सियासत

 

दिवाकर मुक्तिबोध

    छत्तीसगढ़ में रमन सरकार की तीसरी कार्यकाल जो आगामी नवंबर में पूरा हो जाएगा, राजनीतिक झंझवतों से घिरा रहा है। जिन चुनौतियों का सामना पार्टी एवं सरकार को इस बार करना पड़ रहा है। वैसी चुनौतियां पिछले चुनाव के दौरान भी मौजूद थी किन्तु वे इतनी उग्र नहीं थी। सत्ता विरोधी लहर के तेज प्रवाह के साथ-साथ प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस का पुर्नजीवित होना, उसके धारदार हमले, संगठन की सक्रियता, नेताओं व कार्यकर्ताओं की एकजुटता तो अपनी जगह है ही, बड़ी वजह है विभिन्न मोर्चों पर राज्य सरकार की नाकामी एवं जन असंतोष का विस्फोट। कम से कम गत दो वर्षों से सत्ता एवं संगठन को विभिन्न जनआंदोलनों का सामना करना पड़ा है जिन्हें ऐन-केन प्रकारेण दबाने में सरकार को सफलता जरुर मिली लेकिन राख के नीचे चिंगारियां धधकती रही है। चाहे आंदोलन लंबे समय से संविलियन के लिए संघर्ष कर रहे शिक्षा कर्मियों का हो या फिर किसानों, मजदूरों, बेरोजगार युवाओं एवं आदिवासियों का जिन्हें अपने हक के लिए शहरों एवं राजधानी की सड़कों पर बार-बार उतरना पड़ा है। समाधान किसी मोर्चे पर नहीं है। हालांकि आत्ममुग्धता की शिकार राज्य सरकार विकास के घर-घर पहुंचने का दावा करती है, जनकल्याणकारी नीतियों के सफल क्रियान्वयन का राग अलापती है तथा अपनी पीठ खुद ही थपथपाती है पर यह सच्चाई किसी से छिपी नहीं है कि सरकार बेअसर है, नौकरशाही बेलगाम है, जल, जंगल, जमीन की लूट बेधड़क जारी है, संगठित भ्रष्टाचार की कोई सीमा नहीं है तथा अधिकांश मंत्री अयोग्य, नाकारा व असंवेदनशील है जिन्हें न तो जनता से कोई मतलब है और न ही अपने कार्यकर्ताओं से। इसीलिए पार्टी कार्यकर्ताओं का असंतोष व आक्रोश भी चरम पर है जो सत्ता की बेरुखी, उपेक्षा एवं अपनी कोई निश्चित भूमिका न होने से मर्माहत है तथा जिसकी अभिव्यक्ति संगठन के बड़े नेताओं की मौजूदगी में हुई बैठकों में कई बार हो चुकी है। 
    सत्ता एवं संगठन दोनों चिंता में है। हालांकि दावा किया जा रहा है कि राज्य सरकार की कल्याणकारी नीतियों का यथेष्ट प्रभाव मतदाताओं पर है तथा वे नवंबर 2018 में होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव में पार्टी को सरकार बनाने फिर एक मौका देंगे जो कि निरंतरता के क्रम में चौथा होगा। लेकिन इस खुशफहमी के बावजूद भाजपा नेतृत्व बेहतर जानता है कि इस बार के चुनाव उसके लिए बेहद कठिन होंगे। एक तो कांग्रेस की चुनौती बड़ी है दूसरे इस बार राजनीतिक समीकरण भी बदले हुए हैं। अजीत जोगी के नेतृत्ववाली छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस तीसरी शक्ति के रुप में चुनाव में उतरने वाली है। भाजपा संगठन यह भलीभांति जानता है कि जोगी की मौजूदगी भले ही कांग्रेस के प्रतिबद्ध वोटों में सेंध लगाए पर यह भी सच है कि उससे भाजपा के वोट भी बंटेंगे। अनुसूचित जाति, जनजाति के मतदाताओं पर जोगी का खासा प्रभाव है। पार्टी इसी बात से चिंतित है कि मौजूदा समय में अनुसूचित जाति की सीटों पर वह अपने वर्चस्व को कैसे बचाए रखें। वर्तमान में इस वर्ग के लिए आरक्षित दस में से 9 सीटें भाजपा के कब्जे में है। इन 9 सीटों पर उसका पुन: चुनाव जीतना लगभग नामुमकिन है। यानी इस वर्ग से भाजपा की सीटें घटना तय है। यह इसलिए भी क्योंकि व्यवस्था के खिलाफ जनविरोध लगातार तेज होता जा रहा है। यदि इसे रोकने के प्रयत्न नहीं हुए तो जाहिर है उसे शिकस्त हाथ लगेगी। इसलिए सत्ता व संगठन का समूचा ध्यान सरकार के पक्ष में वातावरण बनाने, विकास कार्यों को तीव्र करने, जनता को उसका अहसास कराने तथा जन संगठनों की जायज मांगों पर त्वरित निर्णय लेने में है। इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि चुनाव आचार संहिता लागू होने से पूर्व सरकार कुछ ऐसे कदम उठा सकती है जो उसकी दृष्टि से सत्ता कायम रखने लाभकारी सिद्ध होंगे।
    लेकिन किस्सा कुछ और भी हो सकता है। दरअसल आदिवासी जमात के असंतोष को दबाए रखना सरकार एवं पार्टी के लिए मुश्किल हो रहा है। वैसे भी पिछले चुनाव में आदिवासी वोटरों ने भाजपा के पक्ष में मतदान नहीं किया था। राज्य की 90 सीटों में से 29 आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित है। वर्ष 2013 के चुनाव में भाजपा को इनमें से मात्र 11 सीटें मिली थी जबकि कांगे्रस को 18। बस्तर संभाग तो भाजपा से लगभग खाली हो गया था। इस क्षेत्र की  12 में से 8 सीटें कांग्रेस ने जीती थी। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए भाजपा का फोकस आदिवासी वोटरों पर है। उन्हें लुभाने हर तरह की कोशिशें की जा रही है। पार्टी एवं सरकार के जितने भी बड़े अभियान इस दौरान हुए हंै, उनकी शुरुआत बस्तर से हुई है। चाहे सरकार की योजनाओं के श्रीगणेश का मामला हो या लोक सुराज अभियान। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी कई बार बस्तर में आकर सभाएं कर चुके हैं। अभी हाल ही में, 14 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दंतेवाड़ा जिले के गांव जांगला में जनसभा ली तथा इसके साथ ही कई योजनाओं की शुरुआत भी की जिसमें आदिवासियों को चरण पादुका के वितरण का कार्यकम भी शामिल था। मंच पर विराजमान प्रधानमंत्री ने अपने स्थान से उठकर स्वयं आदिवासी महिला रत्नी बाई को चप्पल पहनाई। इसका यदि सकारात्मक अर्थ भी निकालें तो भी एक संदेश साफ है कि भाजपा आदिवासी मतदाताओं को हर सूरत में लुभाना चाहती है। यह अलग बात है कि जल, जंगल एवं जमीन के सवाल पर आदिवासियों का आक्रोश फूटता रहा है। उनके बड़े आंदोलनों में से भू-राजस्व संहिता कानून में संशोधन का मामला रहा है, जिसके खिलाफ आदिवासी लामबंद हुए थे तथा उनके संगठनों में इसका पुरजोर विरोध किया था। विवश होकर सरकार को अंतत: इससे संबंधित विधेयक वापस लेना पड़ा। इसके पूर्व भी आदिवासी नेतृत्व के सवाल पर भाजपा के अंदरुनी खानों में तेज हलचल होती रही है। सरकार की बागडोर, किसी आदिवासी नेता को सौंपने मांग भी समय समय पर तेज हुई पर अंतत: दबा दी गई। पूर्व मंत्री एवं वरिष्ठ आदिवासी नेता नंदकुमार साय असंतुष्टों का प्रतिनिधित्व करते हैं। फिलहाल वे शांत है तथा वर्तमान में राष्ट्रीय जनजाति आयोग के अध्यक्ष भी। वे काफी मुखर माने जाते हैं। स्पष्टवादी हैं तथा पार्टी के मामलों पर खुलकर अपनी राय व्यक्त करते रहे हैं। आदिवासियों की उस नई मुहिम पत्थलगड़ी आंदोलन का उन्होंने समर्थन किया है जो सरकार के एवं संगठन के लिए एक नया सिरदर्द बन गई है।
   वैचारिक धरातल पर भले ही वे कितने उथले ही क्यों न हो, शोषण के खिलाफ संघर्ष का ताजातरीन अभियान है पत्थलगड़ी आंदोलन। इसकी शुरुआत आदिवासी बाहुल्य सरगुजा संभाग के जशपुर जिले के कुछ दर्जन गांवों से हुई। 22 अप्रैल 2018 को बगीचा विकासखंड के बादलखोल अभ्यारण्य के जंगल क्षेत्र के गांव कालिया, बुटंगा और बच्छरांव में सीमा दर्शाने वाले मोड़ पर ग्रामीणों द्वारा पत्थर गाड़े गए जिसमें यह इबारत अंकित की गई कि इन गांवों में संविधान में उल्लेखित 5वीं अनुसूची की धाराएं लागू है लिहाजा न्यायिक फैसलों के लिए ग्राम सभा ही सर्वोच्च व अधिकार संपन्न है। चूंकि जल, जंगल व जमीन पर गांव के लोगों का ही अधिकार है अत: ग्राम सभा की अनुमति के बगैर कोई भी गांव के संसाधनों का उपयोग नहीं कर सकता। शिलालेख पर यह भी अंकित किया गया कि ग्रामसभा की अनुमति के बिना बाहर के व्यक्ति का गांव में प्रवेश वर्जित है। शिलालेख पर संबंधित कुछ प्रावधानों का गलत ढंग से भी व्याख्या किए जाने की बात कही गई है। बहरहाल इस आंदोलन से सरकार के कान खड़े हो गए। आनन-फानन में पत्थरों को गिरा दिया गया और एक नए राजनीतिक विवाद की शुरुआत हो गई। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह इस आंदोलन के पीछे धर्मांतरण को बढ़ावा देने वाले लोगों की साजिश करार देते हंै। संभवत: उनका संकेत राज्य में सक्रिय इसाई मिशनारियों की ओर हो सकता है। वैसे भी छत्तीसगढ़ में आदिवासियों का धर्मांतरण कोई नया मुद्दा नहीं है। धर्मांतरित आदिवासियों की हिन्दू धर्म में वापसी भी कोई नई बात नहीं है। पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं राज्य के ताकतवर भाजपा नेता स्वर्गीय दिलीप सिंह जूदेव हिन्दू धर्म में वापसी के प्रणेता रहे हैं। बहरहाल पत्थलगड़ी आंदोलन को सख्ती से रोका जाना तय है पर राजनीतिक दृष्टि से पार्टी को होने वाले नुकसान से इंकार नहीं किया जा सकता। इससे कांग्रेस की आक्रामकता को नई धार मिल गई है। सरकार एवं पार्टी को घेरने उसे चुनाव के पूर्व एक नया मुद्दा हाथ लग गया है। आरोप-प्रत्यारोप के साथ-साथ प्रशासिनक कार्रवाई का दौर भी शुरु है। पत्थलगड़ी मामले में एक पूर्व आईएएस एच.पी. किन्डो एवं ओ.एन.जी.सी. के पूर्व अधिकारी जोसेफ तिग्गा गिरफ्तारी के बाद पुलिस को इस मामले में करीब चार दर्जन लोगों की तलाश है। 
बहरहाल पत्थलगड़ी आंदोलन एकाएक क्यों उभरा, किसने इसे हवा दी, उसके पीछे कोई राजनीतिक साजिश तो नहीं आदि बहुतेरे प्रश्न खड़े हो गए हैं जिनका उत्तर समय के साथ मिलेगा ही पर इससे भाजपा की नींद हराम हो गई है। आदिवासियों का इस तरह एकजुट होना, उनका आंदोलन, व्यवस्था के खिलाफ जबर्दस्त आक्रोश, जंग का संकेत है जो चुनाव में भाजपा की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है। आदिवासी वोटों को साधने सरकार व संगठन के पुरजोर कोशिशों पर यह कड़ा प्रहार है। उसके लिए चिंता की बात यह भी है कि कांग्रेस ने भी आदिवासी क्षेत्रों में अपनी पैठ बढ़ा रखी है तथा वोटों के एक साझीदार के रुप में छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस भी मौजूद है जो अपने नेता अजीत जोगी के नेतृत्व में पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ने जा रही है। बस्तर तथा सरगुजा संभाग जोगी के भी फोकस में है। स्वयं के आदिवासी होने के टेग जिस पर बरसों से लंबा विवाद चला आ रहा है, के साथ वे भी आदिवासियों का विश्वास अर्जित करने घनघोर प्रयास कर रहे हंै। 
    बहरहाल अभी यह नहीं कहा जा सकता कि मुख्यमंत्री ने पत्थलगड़ी के पीछे धर्मांतरण को बढ़ावा देने वाली ताकतों की ओर इशारा करके इसाई समुदाय के लोगों को नाराज कर दिया है। राज्य में इस समुदाय के लोगों की संख्या करीब पांच लाख है। सरगुजा संभाग में कई सीटें ऐसी हैं जहां इनकी अच्छी खासी आबादी है। कुनकुरी, पत्थलगांव व लुंड्रा में इस समुदाय का दबदबा है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अजीत जोगी को मिशनरियों का पूरा समर्थन प्राप्त होता रहा है। चूंकि वे अब अलग पार्टी लेकर मैदान में है लिहाजा मिशनरियां उनके समर्थन में आदिवासी वोटों को प्रलोभित कर सकती है। उनकी इस संभावित मुहिम को भाजपा के प्रति नाराजगी के रुप में देखा जा सकता है। यानी पत्थलगड़ी आंदोलन छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के लिए राजनीतिक दृष्टि से लाभकारी सिद्ध हो सकता है। आदिवासी वोटों का यदि इस तरह धुवीकरण होगा तो उम्मीद की जा सकती है कि छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस का सरगुजा संभाग में खाता खुलेगा। वैसे कांगे्रस व छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस की जांच कमेटियों ने जो रिपोर्ट दी है उसके अनुसार मूलभूत सुविधाओं का अभाव पत्थलगड़ी आंदोलन का एक बड़ा कारण है। इसीलिए आदिवासियों का सरकार पर से भरोसा उठ गया है तथा वे अपना अधिकार चाहते हैं।

Monday, January 22, 2018

कहते हैं मोह छूटा पर वास्तव में नहीं छूटा


जीते तो मैं ही बनूंगा मुख्यमंत्री - जोगी

-दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ राज्य विधानसभा के लिए इसी वर्ष नवंबर में होने वाले चुनाव के संदर्भ में आमतौर पर लोगों की दिलचस्पी यह जानने में नहीं है कि चुनाव भाजपा जीतेगी या कांग्रेस। उनकी दिलचस्पी के केंद्र में है अजीत जोगी व उनकी पार्टी छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस। जोगी प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हैं तथा अपनी राजनीतिक विद्वत्ता व कूटनीतिक चालों के लिए देश-प्रदेश में बेहतर जाने जाते हैं। वे अनुभवी, कद्दावर व अच्छी सूझबूझ वाले ऐसे नेता हैं जिनकी जीवटता बेमिसाल है और जो कभी हार नहीं मानते। कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने बहुतेरे आंतरिक संकटों का सामना किया तथा उससे उबर पाने में सफल रहे। अब वे कांग्रेस से अलग है तथा अपनी अलग राजनीति कर रहे हैं। वे छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के संयोजक व नेतृत्वकर्ता है। ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व वाले नेता के संबंध में यह दिलचस्पी स्वाभाविक है कि वे आगामी चुनाव में क्या गुल खिलाएंगे? किस पार्टी को कितना डेमैज करेंगे? किसकी संभावना को खारिज करेंगे और स्वयं कितनी ताकत बटोरेंगे? करीब डेढ़ वर्ष पूर्व अस्तित्व में आई उनकी पार्टी अपने पहले चुनाव में विधानसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाएगी अथवा नहीं? यदि हाँ तो संख्या बल क्या होगा? कितने प्रत्याशी चुनाव जीत पाएंगे? दिलचस्पी इस बात में भी है कि जोगी परिवार के कितने सदस्य चुनाव लड़ेंगे? जीतेंगे या हारेंगे? एक और बात, चुनाव के बाद इस पार्टी का राजनीतिक भविष्य क्या होगा? जोगी के रहते हुए भी या जोगी के बाद भी? ऐसे ही कुछ दिलचस्प सवालों के साथ बहुसंख्यक लोग अपनी-अपनी राजनीतिक समझ व गुणा-भाग के जरिए यह राय देते हैं कि छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस अधिक से अधिक 5 से 10 सीटों तक सीमित रहेगी। अगर ऐसा हुआ और कांग्रेस व भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो आगे का खेल खासा दिलचस्प रहेगा। यानी आम चर्चाओं में दिलचस्पी का प्रमुख सबब जोगी और उनकी पार्टी है हालांकि चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा, फिलहाल किसी के लिए भी कहना मुश्किल है। 
अब सवाल है कि क्या छत्तीसगढ़ जनता कांगे्रस राज्य में उभरती तीसरी शक्ति है? प्रदेश के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह इसे तीसरी शक्ति का दर्जा तो देते हैं पर उसे राजनीतिक विकल्प नहीं मानते। यह स्वाभाविक है। कोई भी राजनीतिक दल अपने प्रतिद्वंद्वी को विकल्प कैसे मान सकता है? फिर छत्तीसगढ़ जनता कांगे्रस कोई आम आदमी पार्टी तो हैं नहीं जिसने रातों रात भाजपा व कांगे्रस का राजनीतिक विकल्प पेश कर दिया और अनोखे बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो गई। लिहाजा यह माना जाता है कि जोगी की पार्टी भले ही बहुमत के लायक सीटें जीतने का दावा करें पर फिलहाल प्रदेश की जनता भी उसे विकल्प के रुप में नहीं देख रही है अलबत्त्ता वह तीसरी पार्टी जरुर है जो मतदाताओं को विचार करने का मौका देती है। 
    वैसे देखा जाए तो एक नवोदित राजनीतिक पार्टी के लिए लोगों के मन में इस तरह के विचार को ला पाना भी काफी है। इस मायने में यह उसकी सफलता है। यह दौर क्षेत्रीय पार्टियों का है और काफी पूर्व से इसकी नींव पड़ चुकी है। कई राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों की सरकारें हैं, जो सत्ता में नहीं है, वे ताकत बटोर रही है, लिहाजा छत्तीसगढ़ में भी इसकी संभावनाएं जीवित है पर यह निर्भर करता है कि वे जनता के कितने नजदीक जा पाएंगी, उनकी कठिनाईयों में उनका कितना साथ देंगी और उनके लिए कितने जन आंदोलन खड़ा करेंगी। मानव विकास और खुशहाली के मामले में राज्य पिछड़ा हुआ है तथा गरीबों के सामने जीवन यापन की समस्या भीषण है। विशेषकर आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र की कुल आबादी के लगभग 52 प्रतिशत आदिवासी गरीबी रेखा से नीचे है तथा बस्तर व सरगुजा के इन क्षेत्रों में तेजी से विकास कार्य करने की जरुरत है। इस दृष्टि से विपक्षी पार्टियों को जनता के बीच अपना ग्राफ बढ़ाने मौका का मौका है लेकिन राज्य में जोगी कांगे्रस के अलावा अन्य कोई ऐसी प्रादेशिक पार्टी नहीं है जो आम जनता की नजरों में चढ़ी हो हालांकि बसपा, सपा, माकपा व भाकपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों की स्थानीय इकाईयों ने बीते वर्षों में घनघोर प्रयास किए हंै पर राजनीतिक तौर पर सफलता उनसे कोसों दूर रही है। छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस ही एक मात्र ऐसी पार्टी है जिसने बहुत कम समय में अपना एक अलग स्थान बना लिया है। उसे तीसरी शक्ति, भले ही वह क्षीण क्यों न हो, मान लिया गया है। अपने राजनीतिक उद्देश्य के लिए आगे चलकर रमन सिंह उसे महाशक्ति भी कह सकते हैं क्योंकि उसका ताकतवर होगा, भाजपा के लिए संजीवनी जैसा है। भाजपा की धारणा यही है कि छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस जितनी ताकतवर होगी, वह कांग्रेस को ज्यादा नुकसान पहुंचाएगी। कांग्रेस के प्रतिबद्ध तथा छितरे हुए सामाजिक वोटों का विभाजन उसकी लगातार चौथी जीत का आधार बनेगा।
     डा. रमन सिंह की यह खामख्याली हो सकती है पर आसार वैसे नहीं है। भाजपा भी इस तथ्य को बखूबी जानती है कि राज्य में सत्ता विरोधी लहर अब अपने पूरे उफान पर है तथा वह पार्टी को बहा ले जा सकती है। इसीलिए भाजपा ने अपनी पूरी ताकत काफी पहले से झोंक रखी है। बस्तर की आदिवासी सीटों पर उसका विशेष ध्यान है जहां पिछले चुनाव में कांग्रेस ने 12 में से 8 सीटें जीतकर बाजी मारी थी। दरअसल बस्तर व सरगुजा संभाग की सीटें तीनों पार्टियों कांग्रेस, भाजपा व जोगी कांगे्रस के निशाने पर है। कहा जा सकता है यहाँ से जो जीता वही सिकंदर। भाजपा की तरह कांग्रेस भी उम्मीदों से भरपूर है तथा वह इस बार सरकार बनाने का नायाब अवसर मान रही है। गुजरात में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने जैसे चमत्कारिक परिणाम दिए थे, उसे दोहराने का अवसर छत्तीसगढ़ में भी है और मध्यप्रदेश में भी। प्रदेश कांगे्रस यह मानकर चल रही है कि अब उसे छत्तीसगढ़ में सरकार बनाने से कोई नहीं रोक सकता। अजीत जोगी भी नहीं।
      संघर्ष त्रिकोणीय होगा, यह तय है। पर घूम-फिरकर बात फिर इसी मुद्दे पर आ जाती है कि मतदाताओं पर छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस का प्रभाव कितना पड़ेगा तथा क्या वह वोटों में तब्दील होगा। इस बारे में अभी कोई अनुमान लगाना मुश्किल है क्योंकि अभी चुनाव के लिए 10 महीने शेष है। यह काफी लंबा वक्त होता है तथा समीकरणों के बनने-बिगडऩे की पूरी गुंजाइश बनी रहती है। जोगी क्या कर पाएगें कहना मुश्किल है पर वे अपनी पार्टी की राजनीतिक हैसियत बनाने घनघोर परिश्रम कर रहे हैं। नई सोच के साथ उनके नए उपाय भी खासी चर्चा में है। मसलन शपथ पत्र के साथ संकल्प पत्र जारी करना, खुद के चित्र के साथ चांदी के सिक्के, डिनर डिप्लोमेसी, करीब डेढ़ दर्जन प्रत्याशियों के नामों की घोषणा, वादे पूरे न करने पर जनता की अदालत में बतौर मुजरिम पेश होने का वचन देना तथा इसी तरह के कई अन्य तरकीबें जो मुख्यत: मतदाताओं को आकर्षित करने एवं पार्टी के प्रति उनका विश्वास अर्जित करने की कोशिश के रुप में है। लेकिन दर्जनों घोषणाओं व संकल्पों के साथ ही वे गलतियां भी करते जा रहे हंै। अपने आप को बतौर मुख्यमंत्री पेश करने की उनकी कोशिश उनके लिए घातक है। अखबारी खबरों के अनुसार उन्होंने धमतरी में 14 दिसंबर 2017 को दिए गए एक बयान में कहा था कि वे स्वयं मुख्यमंत्री का पद लेना नहीं चाहते लेकिन लाखों लोगों का विश्वास उनके साथ जुड़ा हुआ है अत: अपनी पार्टी से वे ही मुख्यमंत्री पद के दावेदार होंगे। दरअसल शहरी जनता अभी भी उनके तीन वर्ष के कार्यकाल के दौरान उनकी छवि को विस्मृत नहीं कर पाई है। लिहाजा यदि वोटर उनकी पार्टी को समर्थन देना भी चाहे तो इस घोषणा से उनके कदम ठिठक सकते हैं। जोगी ने वर्ष 2008 के चुनाव में भी ऐसी ही भूल की थी। उन्होंने जनसभाओं में अपने को भावी मुख्यमंत्री बताया था। नतीजा क्या रहा - सबके सामने है। इसलिए बेहतर होता वे स्वयं को पीछे रखते हुए अपनी पत्नी रेणु जोगी का नाम आगे बढ़ाते जिनकी छवि निर्मल और बेदाग है। इसी तरह उनका पुत्र प्रेम भी आड़े आ रहा है। दरअसल अजीत जोगी अपने पुत्र अमित जोगी को वर्चस्व की राजनीति में स्थापित करना चाहते हंै लेकिन जनता के बीच ऐसी उनकी स्वीकार्यता नहीं है। यह भी चर्चा है कि कांग्रेस जोगी की वापसी व उनकी पार्टी के विलय पर सहमत है पर अमित जोगी को छोड़कर। जाहिर है यह शर्त स्वीकार योग्य नहीं है फलत: चुनाव के पूर्व सीटों पर समझौता हो सकता है, विलय पर नहीं। लेकिन राजनीतिक भविष्य की दृष्टि से छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के लिए यह कदम भी आत्मघाती होगा। अब एक ही रास्ता शेष है, जोगी की पार्टी चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करते हुए वोटों को सीटों में तब्दील करें। यदि ऐसा करने में कामयाब होती है तो प्रदेश की भावी राजनीति में वह न केवल तीसरे विकल्प के रुप में पहचानी जाएगी वरन सत्ता में भागीदारी भी करेगी। क्या ऐसा हो पाएगा?

त्रिकोणीय संघर्ष हुआ तो बनेगी बात


क्या चौथी बार भी रमन?

-दिवाकर मुक्तिबोध        गुजरात लगातार 6वीं बार फतह के बाद भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व भले ही संतोष का अनुभव करें लेकिन यह बात स्पष्ट है कि अगले वर्ष छत्तीसगढ़ सहित 4 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी की राज्य इकाइयों पर दबाव कुछ और बढ़ गया है। यदि पार्टी गुजरात चुनाव हार जाती तो मुंह छिपाने के लिए क्षेत्रीय प्रक्षपों को जगह मिल जाती। पर गुजरात में 22 साल की परिपक्व सत्ता विरोधी लहर का बखूबी सामना करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी ने चुनाव जीत लिया तथा कांग्रेस मुक्त भारत के अपने अभियान की ओर एक कदम और आगे बढ़ाया। अब आगे की जिम्मेदारी उन राज्यों पर हैं जहां अगले वर्ष चुनाव होने है। इनमें प्रमुख हैं छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान व कर्नाटक। तीन राज्यों छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश व राजस्थान में भाजपा की सरकारें है जिसमें छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश में क्रमश: डा. रमन सिंह व शिवराज सिंह चौहान अपना लगातार तीसरा कार्यकाल पूरा करने जा रहे हैं। लोकसभा के चुनाव वर्ष 2019 में होने हैं और इस बात की जमकर चर्चा है कि पूरे देश में लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा के चुनाव करा लिए जाएं। इसके लिए एक विधेयक संसद में पेश होने की संभावना जताई जा रही है। यदि ऐसा होता है तो कुछ विधानसभाओं के अगले वर्ष प्रस्तावित चुनाव टल जाएंगे जिसमें छत्तीसगढ़ भी होगा जहां वर्ष 2018 के नवंबर में चुनाव तय है। जाहिर है मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को अपना साम्राज्य बचाने समय की कुछ और मोहलत मिल जाएगी। 
     भाजपा के केद्रीय नेतृत्व की मंशा एकदम साफ है। पार्टी पिछले तीन वर्षों से नरेंद्र मोदी के जादुई व्यक्तित्व की तूफानी लहरों पर सवार है तथा पूरे देश से कांगे्रस सफाए के लिए इसका पूरा-पूरा लाभ उठाना चाहती है। कांगे्रस सहित समूचा विपक्ष लगभग बिखरी हालत में है तथा उस पर आखिरी चोट करने का मौका लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ-साथ करने से मिल सकता है। वैसे भी गुजरात व हिमाचल प्रदेश हारने के बाद कांग्रेस सिर्फ 5 राज्यों तक सिमट कर रह गई है। जबकि भाजपा का 19 राज्यों में फैलाव है।
बहरहाल लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा चुनाव एक संभावना है। यह खारिज भी हो सकती है। ऐसी स्थिति में जाहिर है छत्तीसगढ़ विधानसभा के चुनाव नियत समय पर ही होंगे। यानी विगत 14 वर्षों से शासन कर रहे मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के पास अपना मुख्यमंत्री पद बचाने, बशर्ते वह बच जाए तथा लगातार चौथी बार भाजपा को सत्ता में लाने के लिए महज 11 महीने शेष हैं। इन 11 महीनों में उन्हें कुछ ऐसा करिश्मा कर दिखाना है जिससे सत्ता विरोधी लहर जो जोर-शोर से चली आ रही है, दब जाए तथा राज्य के मतदाता एक बार फिर भाजपा के पक्ष में फैसला करें। लेकिन सवाल है गुजरात में नरेंद्र मोदी व अमित शाह की जोड़ी ने 22 वर्षीय सत्ताविरोधी लहर को शांत कर दिया था जो मुख्यत: मोदी के चमत्कारिक नेतृत्व व लोक-लुभावन भाषणों की वजह से संभव हुआ था पर रमन सिंह नरेंद्र मोदी नहीं है अलबत्ता उनका व्यक्तित्व भी बेजोड़ है और सार्वजनिक सभाओं में खासकर ग्रामीण अंचलों में उनकी बतकही भी लोगों को लुभाती है। पर यह पर्याप्त नहीं है क्योंकि गुजरात में नरेंद्र मोदी के अलावा विकास का अपना मॉडल है जिसकी पूरे देश में लगभग दो दशकों से चर्चा होती रही है, जबकि छत्तीसगढ़ में पीडीएस सिस्टम के अलावा ऐसा कुछ नहीं है जो देश भर में चर्चित हो, बल्कि राज्य में विकास मूलत: शहर केन्द्रित है। शहरी विकास का यह मॉडल राज्य की गरीबी दूर नहीं कर सका है। राज्य के लगभग 52 फीसदी आदिवासी लोग गरीबी रेखा के नीचे है जबकि कुल बीपीएल 40 प्रतिशत हैं। नीति आयोग की राजधानी रायपुर में 17 नवंबर 2017 को हुई बैठक में इस बात पर चिंता व्यक्त की गई कि छत्तीसगढ़ में शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार व पोषण के क्षेत्रों में विशेष ध्यान देने की जरुरत है। आयोग के अध्यक्ष राजीव कुमार का कहना था कि बस्तर में बहुत ज्यादा काम करने की जरुरत है। स्पष्ट है नीति आयोग रमन सरकार के कामकाज से संतुष्ट नहीं है। 
     खैर, यह तो एक बात हुई। गरीबी और गरीब एक शाश्वस्त सत्य है जिसका चुनाव की राजनीति से कोई सरोकार नही। इंदिरा गांधी ने जरुर गरीबी हटाओ नारा दिया था जिसे दुहराने की जरुरत वर्तमान राजनीति में नहीं है। विकास योजनाओं से गरीबी यदि घट भी रही है तो उसकी रफ्तार बहुत ही सुस्त है। छत्तीसगढ़ भी इससे परे नहीं है। बहरहाल मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के सामने आगामी चुनाव जीतने ढेरों चुनौतियां हंै। पहली चुनौती है कांगे्रस से जो पिछले कुछ महीनों से विशेषकर भूपेश बघेल के नेतृत्व सम्हालने के बाद आक्रामक है और जोर-शोर से जनहित एवं जनसमस्याओं से संबंधित मुद्दे उठाते रही है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि तमाम अंतर विरोधों, भयंकर गुटबाजी, प्रत्याशियों का गलत चयन एवं भीतरघात के बावजूद पिछले तीन विधानसभा चुनावों में कांगे्रस ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी तथा मुकाबला कभी एक तरफा नहीं होने दिया। दोनों के बीच वोटों का अंतर भी 1 प्रतिशत से भी कम रहा तथा भाजपा साधारण बहुमत से केवल 4-5 सीटें ही अधिक जीत पाई। 90 सीटों की विधानसभा में बहुमत के लिए 46 सीट जीतनी जरुरी होती हैं। विधानसभा में सत्तारूढ़ दल की सदस्य संख्या 49 है। यह अंतर ऐसा नहीं है कि पाटा न जा सकें। अगले वर्ष के चुनाव में यह अंतर पट जाए और कांगे्रस जीत जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
     इस संभावना के पीछे कुछ तर्क दिए जा सकते हैं हालांकि भाजपा के पक्ष में भी कुछ बातें है। एकजुटता में कमी के बावजूद कांगे्रस मुद्दे तो उठाती रही है। और आगे भी बहुत तेजी से उठाएगी। राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने का बड़ा प्रभाव पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं और नेताओं पर पड़ा है। प्रदेश की राजनीति में वे अपना बेहतर भविष्य देख रहे हैं। लेकिन कांग्रेस को सबसे ज्यादा नकारात्मक वोटों का सहारा है जिसे सत्ता विरोधी लहर कह सकते हैं। प्रदेश की जनता रमन सिंह को लगातार 14 वर्ष से बतौर मुख्यमंत्री देख रही है। उनके कामकाज पर सवाल नहीं है पर उनकी सरकार, उनके मंत्री, उनकी नौकरशाही लगातार सवालों के घेरे में रही है। आम चर्चा में यह कहा जाता है -  'बहुत हो चुका, अब बदलाव चाहिए।' यह नकारात्मकता या जनता की सोच पार्टी पर भारी पड़ सकती है। प्रदेश कांग्रेस को इस सोच का बड़ा सहारा है बशर्ते वह अंत तक यानी मतदान तक कायम रहे।
    अंतु-परंतु के बीच कुछ राजनीतिक परिस्थितियां भाजपा के भी अनुकूल है। इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण है पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के नेतृत्व में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ की मौजूदगी। यह कांगे्रस की ही बी पार्टी है जिसे मुख्यमंत्री रमन सिंह तीसरी शक्ति मानते हैं तथा चुनाव में त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बताते हैं। यह स्थिति उनके लिए मुफीद है। चुनाव में इस पार्टी की उपस्थिति से भाजपा विरोधी वोटों का विभाजन होगा जिससे पार्टी की राह आसान हो जाएगी। यानी वर्ष 2003 फिर अपने आप को दुहराएगा। उस चुनावी वर्ष में जो नए राज्य के रुप में छत्तीसगढ़ का पहला विधानसभा चुनाव था, विद्याचरण शुक्ल के नेतृत्व में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने कांग्रेस के प्रतिबद्ध वोटों का ऐसा विभाजन किया कि भाजपा सत्ता में आ गई। एनसीपी प्रदेश में कांग्रेस की बी पार्टी थी जो भाजपा की जीत का कारण बनी। इस समय भी यह बी पार्टी जिसका नेतृत्व अजीत जोगी कर रहे हैं, कांगे्रस की संभावना को कमतर करती है बशर्ते दोनों पार्टियां एक न हो जाए यानी जोगी पुन: कांग्रेस में ले लिए जाएं या फिर दोनों के बीच सीटों का तालमेल हो जाए। चूंकि गुजरात हाथ से फिसल गया हैं लिहाजा कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व नहीं चाहेगा कि छत्तीसगढ़ में इसका दुहराव हो जहां पार्टी की जीत की प्रबल संभावनाएं है। इसलिए केंद्रीय नेतृत्व की पहल पर यह संभव है कि दोनों पार्टियों के बीच सम्मानजनक शर्तों पर तालमेल हो जाए। भूपेश बघेल जिनके खिलाफ बहुचर्चित सीडी सेक्स कांड में सीबीआई ने अपराध दर्ज किया है यदि हटा दिए जाते हैं तो विलय की संभावना और भी प्रबल हो जाएगी। यह बात बहुत स्पष्ट है कि भूपेश बघेल ने ही अजीत जोगी व उनके विधायक पुत्र अमित जोगी को बाहर का रास्ता दिखाया तथा नई पार्टी बनाने मजबूर किया। चर्चा है कि कांग्रेस का एक वर्ग तालमेल के लिए प्रत्यनशील है। और यदि ऐसा कोई गठजोड़ होता है तो यकीनन भाजपा का चौथी बार सत्ता पर काबिज होने का सपना ध्वस्त हो जाएगा। भाजपा के लिए कांगे्रस का एक होना चिंता का विषय है। इसी संदर्भ में अजीत जोगी की पार्टी को तीसरी शक्ति का दर्जा देना, उसकी पीठ थपथपाने जैसा है जिसके राजनीतिक निहितार्थ हैं। इससे यह ध्वनि निकलती है कि डटे रहो - 'हम तुम्हारी हर तरह से मदद करेंगे'। अब बिना भारी भरकम फंड के कोई चुनाव तो लड़ा नहीं जा सकता और नई पार्टी के लिए अपने दम पर पर्याप्त धन का जुगाड़ करना बहुत संभव भी नहीं है। जोगी कांग्रेस को फंड की जरुरत है और यदि कहीं से इसकी आपूर्ति होती है तो उसे स्वीकार करने में दिक्कत क्या है? 
     तो, भाजपा चाहेगी अगला चुनाव त्रिकोणीय हो ताकि उसकी संभावनाएं जीवंत रहे। यह इसलिए भी जरुरी है क्योंकि इसके आधार पर मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह का राजनीतिक भविष्य भी टिका हुआ है। मोदी-शाह की नाराजगी का खतरा वे मोल नहीं ले सकते लिहाजा हर सूरत में चुनाव जीतना चाहेंगे। वे मोदी लहर पर सवार तो रहेंगे पर उनकी नैया गुजरात की तरह छत्तीसगढ़ में भी पार लग जाएगी, फिलहाल कहना जरा मुश्किल हैं।

Sunday, September 10, 2017

स्मरण मुक्तिबोध: उनके वे सबसे अच्छे दिन

11 सितंबर को पुण्यतिथि पर विशेष

-दिवाकर मुक्तिबोध
मुक्तिबोध जन्मशताब्दी वर्ष की शुरुआत 13 नवंबर 2016 से हो चुकी है। एक बेटे के तौर पर बचपन एवं किशोर वय की ओर बढ़ते हुए हमें उनके सान्निध्य के करीब 10-12 वर्ष ही मिले। जन्म के बाद शुरु के 5-6 साल आप छोड़ दीजिए क्योंकि यादों के कुछ पल, कुछ घटनाएँ ही आपके जेहन में रहती है जो जीवन भर साथ चलती हैं। ऐसे ही चंद प्रसंगों पर आधारित संस्मरण की यह दूसरी किस्त।
प्रथम किस्त नई दिल्ली से प्रकाशित ""दुनिया इन दिनों'' में 15-30 सितंबर 2016 के अंक में छप चुकी है।
""पता नहीं कब कौन कहां, किस ओर मिले,
किस सांझ मिले, किस सुबह मिले,
यह राह जिंदगी की, जिससे जिस जगह मिले।''
कविता की ये वे पंक्तियां हैं जिन्हें मैं बचपन में अक्सर सुना करता था, पाठ करते हुए मुक्तिबोधजी से। स्व. श्री गजानन माधव मुक्तिबोध मेरे पिता, जिन्हें हम सभी, घरवाले दादा-दादी भी बाबू साहेब के नाम से संबोधित करते थे। मैं उनका श्रोता उस दौर में बना जब मुझे अस्थमा हुआ। दमे के शिकार बेटे को गोद में लेकर हालांकि वह इतना बड़ा हो गया था कि गोद में नहीं समा सकता था, थपकियां देकर वे जो कविताएं सुनाया करते थे, उनमें ""पता नहीं''  शीर्षक की इस कविता की प्रारंभिक लाइनें मेरे दिमाग में अभी भी कौधंती हैं। वह शायद इसलिए कि मैंने उसे उनके स्वर में बार-बार सुना है। जिस लयबद्ध तरीके से वे इसे सुनाया करते थे, कि मुझे थोड़ी ही देर में नींद आ जाती थी। अस्थमा एक ऐसा रोग है जो आदमी को चैन से सोने भी नहीं देता। धाैंकनी की तरह बेचैनी होती सांसें ऊपर-नीचे होती रहती हैं जिसकी वजह से सीधा लेटा नहीं जा सकता। दो-तीन तकियों के सहारे आधा धड़ ऊपर रखकर-एक तरह से बैठे-बैठे राते काटनी पड़ती हैं। 10-11 साल की उम्र में मुझे दमे ने कब कब पकड़ा, याद नहीं, अलबत्ता पिताजी की बड़ी चिंता मुझे लेकर थी। इसलिए जब अधलेटे बेटे की हालत उनसे देखी नहीं जाती थी, तब वे उसे गोद में लेकर सस्वर कविताओं का पाठ करते थे, आगे पीछे अपने शरीर को झुलाते हुए ताकि मुझे नींद आ जाए और वह आ भी जाती थी।
बाबू साहेब की उर्दू शायरी में भी गहरी दिलचस्पी थी। उस दौर के प्रख्यात उर्दू शायरों की किताबें उनकी लायब्रेरी में थी, जिन्हें वे बार-बार पढ़ा करते थे। जिन पंक्तियों को मैने अक्सर उन्हें गुनगुनाते हुए सुना है वह है - ""अभी तो मैं जवान हूँ, अभी तो मैं जवान हूँ, अभी तो मैं जवान हूँ।'' मुझे पता नहीं था कि वे किस शायर की लिखी कविता हैं पर मैं देखता था, उन्हें गुनगुनाते समय पिताजी बहुत प्रसन्न मुद्रा में रहते थे। चक्करदार सीढ़़ी वाले हालनुमा कमरे में चक्कर लगाते हुए वे इन पंक्तियों को बार-बार दोहराते थे। मैं समझता हूँ संतोष और खुशी के जितने भी लम्हें उनकी जिंदगी में थे, कविताएँ उन्हें ताकत देती थीं। उनकी उम्र कुछ भी नहीं थी, युवा थे, महज 40-42 के लेकिन "अभी तो मैं जवान हूं' गुनगुना कर वे बढ़ती उम्र के अहसास को शायद कम करने की कोशिश करते थे। संभवत: आशंकाग्रस्त थे। फिर भी इन पंक्तियों को गाकर उनके चेहरे पर जो खुशी झलकती थी, वह उन्हें संतुष्टि देती थी, आशंकाओं से मुक्त करती थी। लेकिन हकीकतन ऐसा हुआ कहाँ? वे अपने जीवन के प्रति कितने आशंकाग्रस्त थे, इसकी झलक 5 फरवरी 1964 (मुक्तिबोध रचनावली खंड-6 - पृष्ठ 368) को श्री श्रीकांत वर्मा को लिखे गए पत्र से मिलती है। एक स्थान पर उन्होंने लिखा है - "जबलपुर से लौटने पर मैं बहुत बीमार पड़ गया। चलने में, सोने में, यहाँ तक कि लिखने में भी चक्कर आते रहते हैं, खूब चक्कर आते हैं। इस कारण छोटी-मोटी दुर्घटनाओं का भी शिकार होता रहा। अपने स्वास्थ्य के संबंध में भयानक और विकृत सपने आते रहते हैं। बहुत दुभाग्र्यपूर्ण अपने को महसूस करता हूं।' दुर्भाग्य ने वाकई उनका पीछा नहीं छोड़ा। 47 की उम्र वे इस दुनिया से चले गए। 11 सितंबर 1964। आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस, नई दिल्ली। समय रात्रि लगभग 8 बजे।
अपनी याद में पिताजी को बीमार पड़ते मैंने कभी नहीं देखा। बचपन की यादें यानी नागपुर में सन् 1954 -55, राजनांदगांव में 1964, उनकी मृत्यु पर्यन्त तक। जनवरी 1964 में पक्षाघात के बाद वे कभी नहीं उठ पाए। ऊंचे-पूरे, अच्छी पर्सनालिटी के मालिक थे। उन्हें देखकर ऐसा नहीं लगता था कि कोई बीमारी उन्हें तोड़ सकती है। लेकिन हाथ-पैर उनके दर्द देते थे। कॉलेज से लौटने के बाद या निरंतर लेखन से आई शारीरिक शिथिलता दूर करने के लिए वे हमें हाथ-पैर दबाने के लिए कहते थे। यह काम मालिश जैसा नहीं था यानी यहाँ हाथों की उंगलियों का कोई काम नहीं था। वे पेट के बल लेट जाते थे और हमें ऊपर से नीचे तक, पैरों से लेकर गर्दन तक पांव से दबाने कहते थे। हम दीवार के सहारे एक तरह से उनकी पीठ व कमर पर नाचते थे। यह हमारे लिए खेल था किन्तु उन्हें इससे आराम मिलता था। कभी-कभी वे पेट भी इसी तरह हमसे दबाया करते थे। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि उन्हें कितनी तकलीफ थी पर न तो वे डॉक्टर के पास जाते थे और न दवाई लेते थे। इसलिए उनकी शारीरिक पीड़ाओं का हमें अहसास नहीं था।
बाबू साहेब को हमने गुस्से में कभी नहीं देखा। दिन-रात व्यस्तता के चलते हमारी पढ़ाई के बारे में पूछताछ करने या हमें पढ़ाने के लिए वक्त निकालना उनके लिए बहुत कठिन था। लेकिन वसंतपुर के मकान में रात्रि में कंदील की रोशनी में जब कभी वे हमें किताब कापी लेकर आने के लिए कहते थे, तो हमारी रूह कांप जाती थी। हालांकि वे हम पर कभी नाराज नहीं होते थे और न ही डांटते-फटकारते थे। हम पढ़ते कम थे पर उन्हें एतराज नहीं था। मैं और मेरी बड़ी बहन उषा नगर पालिका की प्राथमिक शाला के विद्यार्थी थे। पढ़ाई लिखाई में मैं सामान्य था लेकिन उषा से कुछ बेहतर। इसलिए पिताजी के सवालों का टूटा-फूटा सा जवाब मैं दे देता था। इससे उन्हें संतोष हो जाता था किन्तु उषा मूक बनी रहती थी इसलिए वह उनके गुस्से का शिकार बन जाती थी। उनका रौद्र रुप देखकर हम दोनों सहम जाते थे। यद्यपि गुस्सा शांत हो जाने के बाद वे हमें दुलारते भी थे। यह अच्छा था कि पढ़ाई-लिखाई का वह दौर न ज्यादा समय के लिए चलता था और न ज्यादा दिन चलता था। दिग्विजय कॉलेज परिसर वाले मकान में रहने के लिए आने के बाद वह खत्म हो गया। वक्त ने उन्हें वक्त नहीं दिया। वे बीमार पड़ गए।
राजनांदगाँव के दिग्विजय कॉलेज जो अब शासकीय है, में आप जाएं तो उसके सौंदर्य को देखकर आप अभिभूत हो जाएंगे। पिछले सिंह द्वार का हमारा वह मकान, दोनों तरफ बड़े तालाब, रानी सागर, बूढ़ासागर, पिताजी की मृत्यु के बाद उनकी कीर्ति का यशोगान करते हुए नजर आएंगे। इसमें संदेह नहीं कि राज्य सरकार ने उसके सौंदर्य को निखारा है, समूचे परिसर को स्मारक में तब्दील किया है, प्रतिमाएं स्थापित की हैं, परिसर को हरा-भरा कर दिया है, एक नया भवन भी बनाया है, इस सोच के साथ कि देश-प्रदेश के लेखक, विचारक इस भवन में सरकार के मेहमान बनकर रहेंगे और रचनात्मक कार्य करेंगे। सिंह द्वार के ऊपर मंजिल पर जहाँ हम रहते थे, पिताजी की स्मृतियों को संजोया गया है, उनकी लेखन सामग्री, उनकी कुछ किताबें, उनके कुछ वस्त्र, कुछ पांडुलिपियां प्रदर्शित की गई हैं। दीवारों पर दुलर्भ फोटोग्राफ थे जो उनकी जीवन यात्रा के कुछ पलों के साक्षी थे। किन्तु सीलन आने की वजह से वे निकाल दिए गए। स्मृतियों का यह झरोखा उस हाल तक सीमित हैं जहाँ वे चक्करदार सीढ़ियां हैं जो उनकी प्रख्यात कविता "अंधेरे में' जीवन की रहस्यात्मकता की प्रतीक बनी है। बगल के दो अन्य कमरों में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी है और डा. बलदेव प्रसाद मिश्र। इसलिए हमारे उस मकान को राज्य सरकार द्वारा त्रिवेणी नाम दिया गया है। कभी खंडहर रहे इस भवन में जिसे कॉलेज के प्राचार्य स्व. किशोरीलाल शुक्ल के निर्देश पर रहने लायक बना दिया गया था, हम रहते थे। बख्शीजी या मिश्रजी नहीं। यह कोई कीर्ति की प्रतिस्पर्धा नहीं थी पर ज्यादा अच्छा होता यदि इस मकान एवं परिसर में सिर्फ पिताजी की स्मृतियों को संजोया जाता। यह अलग बात है कि हिन्दी साहित्य जगत में इस "त्रिवेणी' को मुक्तिबोध स्मारक के रुप में ही जाना जाता है। बहरहाल राज्य सरकार ने एक दशक पूर्व परिसर की कायाकल्प करके साहित्य जगत में बड़ी वाहवाही लूट ली थी, बड़ी सराहना मिली थी, किन्तु उसके बाद उसने पलटकर नहीं देखा। साहित्य - सृजन के लिए बना भवन लगभग एक दशक से सृजनात्मकता की बाट जोह रहा है। अब तक उसे एक भी लेखक नहीं मिला जो उसकी उदासी दूर कर सकें। सरकार ने अपने कारणों से जिसे राजनीतिक भी कह सकते हैं और सांस्कृतिक सोच का अभाव भी, इससे पल्ला झाड़ लिया है। राज्य की भाजपा सरकार के साथ ऐसा होना अस्वाभाविक नहीं। लेकिन इसी सरकार ने वर्ष 2014 में राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव का आयोजन करके देशव्यापी सराहना अर्जित की थी। फिर उसे इसकी दुबारा जरुरत नहीं पड़ी। राजनांदगाँव में मुक्तिबोध स्मारक के साथ भी कुछ ऐसा ही है।
बहरहाल सन् 1960 में जब हम वसंतपुर से दिग्विजय कॉलेज में एरिया में रहने गए थे, तब भी उसका सौंदर्य अद्भुत था, हालांकि वह खुरदुरा था। शहर में रहते हुए गाँव जैसा अहसास। सिंह द्वार, आम रास्ता था। सुबह-शाम खुलता-बंद होता। दरवाजों पर बड़ी-बड़ी कीलें ठुकी हुई थीं जो राजशाही की प्रतीक थीं। वे अभी भी वैसी ही हैं। इस द्वार से सबसे ज्यादा आते-जाते थे वे धोबी जिनके लिए दोनों तालाबों के घाट ज्यादा मुफीद थे। धोबीघाट पर कपड़े पटकने की ध्वनि में भी एक अलग तरह की मिठास थी। मकान की बड़ी-बड़ी खिड़कियों से टकराती ध्वनियां मधुर संगीत का अहसास कराती थी। पिताजी के जीवन के ये सबसे अच्छे दिन थे। राजनांदगाँव का वसंतपुर व दिग्विजय कॉलेज का हमारा किराए का मकान।
जहाँ तक मुझे स्मरण है, बाबू साहेब ने नागपुर आकाशवाणी की नौकरी छोडऩे के बाद, "नया खून' में काम किया। यह उनकी पत्रकारिता का दौर था जिसमें उन्होंने सम-सामयिक विषयों जिसमें राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दे भी शामिल है, काफी कुछ लिखा। उन दिनों के नागपुर का भी उन्होंने बड़ा भावनात्मक चित्र खींचा। माँ से मैंने सुना था "नया खून' में रहते हुए उनके लिए दो नौकरियों की व्यवस्था हुई थी। दिल्ली श्री श्रीकांत वर्मा ने प्रयत्न किए थे और राजनांदगाँव से श्री शरद कोठारी ने। अब समस्या दो शहरों में से एक को चुनने की थी। अंतत: बाबू साहेब ने महानगर की बजाए कस्बाई राजनांदगाँव को चुना। दिग्विजय कॉलेज जो उन दिनों निजी था, में उन्हें प्राध्यापकी मिली। यह एकदम सही निर्णय था क्योंकि जो शांतता और सौहाद्र्रता इस शहर थी, वह उन्हें संभवत: दिल्ली में नहीं मिल सकती थी। राजनांदगाँव उनके लेखन एवं जीवन की दृष्टि से इसीलिए महत्वपूर्ण रहा।
वे कितने पारिवारिक थे, कितने संवेदनशील यह बहुतेरी घटनाओं से जाहिर है। एक प्रसंग है - वसंतपुर में हमारे मकान के सामने आगे बड़ा था मैदान था जहां हम प्राय: रोज पतंग उड़ाया करते थे। एक दिन पतंग उड़ाते- उड़ाते मैं पीछे हटता गया और अंत में मेरा पैर एक बड़े पत्थर से जा टकराया। हड्डी में चोट आई। कुछ दिनों में वह बहुत सूज गया और उसमें मवाद आ गया। सरकारी अस्पताल में डॉक्टर ने कहा - चीरा लगाना पड़ेगा। दर्द के उन दिनों में पिताजी हर पल मेरे साथ रहे। अस्पताल लाना-ले-जाना, पास में बैठना, पुचकारना और आखिर में सरकारी अस्पताल में चीरा लगाते समय मुझे पकड़कर रखना। उन दिनों ऐसी छोटी-मोटी सर्जरी पर एनेस्थिया नहीं दिया जाता था। छोटे बच्चे इंजेक्शन से वैसे भी घबराते है और ऊपर से चीरा। भयानक क्षण थे। मेरी दर्द भरी चीखें और मजबूती से मेरे पैर पकड़े हुए घबराए से पिताजी। उनका कांपता चेहरा, वह दृश्य अभी भी आँखों के सामने हैं।
मुझे अस्थमा था। जब यह महसूस हुआ कि घर के दोनों तरफ के तालाब और उमस भरा वातावरण इसकी एक वजह है तो मेरे रहने की अलग व्यवस्था की गई। माँ के साथ एवं बड़े भैय्या के साथ। गर्मी के दिन थे। शहर से बाहर जैन स्कूल में छुट्टियां थी इसलिए स्कूल के एक कमरे में मैं माँ के साथ रहा। इसके बाद मेरे लिए शहर के नजदीक लेबर कॉलोनी में एक कमरे का मकान किराये पर लिया गया जहाँ मैं भैया के साथ रहने लगा। पिताजी रोज शाम को पैदल मिलने आया करते थे, किसी नजदीकी मित्र के साथ। मेरे लिए उनकी चिंता गहन थी। अभावों के बावजूद उन्होंने हमें किसी बात की कमी नहीं होने दी। समय के साथ मैं तो ठीक हो गया पर वे बीमार पड़ गए। ऐसे पड़ गए कि फिर बिस्तर से उठ नहीं पाए।
यकीनन राजनांदगाँव उनकी सृजनात्मकता का स्वर्णिम काल था। जीवन में कुछ निश्चिंतता थी, कुछ सुख थे पर दुर्भाग्य से यह समय अत्यल्प रहा। लेकिन मात्र 6-7 साल। इस अवधि में उनका सर्वाधिक महत्वपूर्ण लेखन यही हुआ। वे छत्तीसगढ़ के प्रति कितने कृतज्ञ थे, इसका प्रमाण श्री श्रीकांत वर्मा को लिखे गए उनके पत्र से मिलता है - 14 नवंबर 1963 के पत्र में उन्होंने लिखा है -""उस छत्तीसगढ़ का मैं ऋणी हूँ जिसने मुझे और मेरे बाल बच्चों को शांतिपूर्वक जीने का क्षेत्र दिया। उस छत्तीसगढ़ में जहाँ मुझे मेरे प्यारे छोटे-छोटे लोग मिले, जिन्होंने मुझे बाहों में समेट लिया और बड़े भी मिले, जिन्होंने मुझे सम्मान और सत्कार प्रदान करके, संकटों से बचाया''।

Wednesday, July 5, 2017

अभी मैं 30 साल और जिंदा रहूंगा - जोगी

छत्तीसगढ़़ जनता कांग्रेस का एक वर्ष

 -दिवाकर मुक्तिबोध
पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के नेतृत्व में गठित प्रादेशिक राजनीतिक पार्टी छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस ने अभी हाल ही में अपना पहला स्थापना दिवस मनाया। गत वर्ष मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के गृह गाँव ठाठापुर में 21 जून को उन्होंने विशाल सम्मेलन में अपनी पार्टी को विधिवत नाम देते हुए घोषणा पत्र जारी किया था। तब से लेकर आज तक, इस पूरे एक वर्ष के दौरान अजीत जोगी चुप नहीं बैठे और निरंतर सभाएं, जनसंपर्क व जनआंदोलन के साथ-साथ घोषणाओं का पिटारा खोलते रहे। पार्टी का दावा है कि उसकी सदस्य संख्या दस लाख पार कर गई है जो कांग्रेस से कहीं अधिक है। भाजपा व कांग्रेस को छोड़कर छत्तीसगढ़ में जितनी भी राज्य स्तरीय अथवा राष्ट्रीय पार्टियों की शाखाएं है उन्हें जोगी कांगे्रस ने सार्थक जनदखल के मामले में पीछे छोड़ दिया है। वह राज्य में तीसरी शक्ति बनकर उभरी है जिसने प्रदेश के मतदाताओं के सामने सत्तारूढ़ भाजपा पर व कांग्रेस के अलावा नया राजनीतिक विकल्प पेश किया है। महज एक वर्ष के भीतर यह उपलब्धि असाधारण ही कही जाएगी। लेकिन राज्य विधानसभा के अगले चुनावों में अथवा नगरीय निकायों के चुनाव में उसे कितनी सफलता मिलेगी इसका फिलहाल अनुमान लगाना भी मुश्किल है। आम सभाओं में उमड़ने वाली भीड़ अथवा मुद्दों को लेकर जनआंदोलनों में उपस्थित लोगों की संख्या को देखकर ऐसा कोई दावा नहीं किया जा सकता कि वे पार्टी के वोटर हैं तथा चुनाव में उसे वोट भी देंगे। वर्ष 2003 में राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में स्व. विद्याचरण शुक्ल के रहते राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के परिणाम एक मिसाल के रुप में सामने है। इस चुनाव में शरद पवार के राष्ट्रीय नेतृत्व वाली इस पार्टी की प्रदेश में तेज आंधी के बावजूद उसे सिर्फ एक सीट हासिल हुई थी हालांकि उसने लगभग 7 प्रतिशत वोट प्राप्त करके कांगे्रस को सत्ता से बाहर कर दिया था। उस समय चुनाव पूर्व अनुमान लगाया जा रहा था कि सत्ता की चाबी विद्याचरण जी के हाथ में होगी पर तमाम अनुमान ध्वस्त हो गए। वर्ष 2003 के चुनाव में सत्ता से बेदखल हुए जोगी अब कांग्रेस व भाजपा को चुनौती पेश कर रहे हैं। वे चतुराई के साथ अपनी पार्टी में ताकत भरने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने पिछले निकाय चुनावों में भाग न लेकर अपनी मुट्ठी बंद रखी ताकि यह संदेश जाए कि वह लाख की हैं, वरना वे जानते हैं तो ऐसे मौकों पर खुली तो वह खाक की भी हो सकती है। ठीक वैसे ही, राष्ट्रवादी कांग्रेस जैसी जिसका अब राज्य में अस्तित्व न के बराबर है। 
जोगी कांगे्रस का एक वर्ष का हिसाब लगाया जाए, उसके कामकाज को तौला जाए तो यह निर्विवाद है कि उसने जनता को अपने अस्तित्व का अहसास करा दिया है। उसे सोचने के लिए बाध्य कर दिया है। हालांकि विश्वसनीयता एवं साख के मामले में संकट कायम है। अभी भी आम लोगों के जेहन से सन् 2000 से 2003 के बीच के जोगी की छवि उतरी नहीं है। वे राज्य के पहले मुख्यमंत्री थे और बेहतर, चुस्त व जनोन्मुखी प्रशासन के बावजूद वर्ष 2003 के चुनाव में मतदाताओं द्वारा नकार दिए थे हालांकि उनके जनकल्याणकारी कार्यक्रम व नीतिगत फैसले उनके दूरगामी सोच के प्रतीक थे। मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी अधिनायकवादी छवि का अक्स अभी भी प्रदेश की जनता के दिलो-दिमाग में कायम है और इस एक बड़ी वजह से अपने दम पर आगामी चुनावों में फिलहाल उनकी पार्टी की संभावनाएं उज्ज्वल नजर नहीं आ रही है।
   लेकिन जोगी कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। शारीरिक दृष्टि से वे ठीक रहते तो अब तक न जाने कितने राजनीतिक हंगामे खड़े कर देते। एक कोशिश उन्होंने अंतागढ़ उपचुनाव में की थी किन्तु वह उन्हीं पर भारी पड़ गई। कांग्रेस में रहते हुए पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी को ऐन मौके पर चुनाव मैदान से हटाने में उनकी भूमिका की चर्चा अभी भी थमी नहीं है और उनका पीछा कर रही है। जोगी बेहतर जानते हैं कि उन्हें किस वजह से सत्ता खोनी पड़ी थी। निश्चय ही एक बड़ा कारण विद्याचरणजी की चुनाव में उपस्थिति थी। यदि राष्ट्रवादी कांगे्रस ने कांगे्रस के परंपरागत वोटों का बंटवारा न किया होता तो भाजपा कभी सत्ता में नहीं आ पाती। इस बार मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के भाग्य से फिर वैसी ही राजनीतिक परिस्थितियां मौजूद हैं। लेकिन अब तीसरा कोण अजीत जोगी बना रहे है जो दिवंगत विद्याचरण शुक्ल से कई मायनों में अलग है तथा वे वैसी गलतियां नहीं करेंगे जो राष्ट्रवादी कांग्रेस ने की थी। अति आत्मविश्वास शुक्ल व उनकी पार्टी को ले डूबा था। जोगी इससे बच रहे हैं। वे इस कोशिश में हैं कि कम से कम इतनी सीटें जरुर हासिल की जाए ताकि डूबने की नौबत न आए। शुक्ल अपनी गलतियों से सत्ता की चाबी जनता से हासिल नहीं कर पाए थे, जोगी ऐसा कर सकते हैं। क्योंकि अतीत में झांककर अपना अक्स देखते एवं उसे दुरुस्त करने की कूवत उनमें हैं और वे इस मामले में सतर्क भी हैं। 
कहा जा सकता है कि जोगी कांगे्रस का अब तक का सफर ठीक-ठाक रहा है। उसे चुनाव तक लगभग डेढ़ वर्ष और निकालने हैं। राज्य विधानसभा के चौथे चुनाव नवंबर-दिसंबर 2018 में होंगे। तैयारी के लिहाज से पार्टी के पास वक्त काफी है। जोगी जिस तरह मेहनत कर रहे हैं वह कांग्रेस व भाजपा दोनों के लिए चिंता का विषय हैं। भाजपा को उम्मीद हैं कि चुनाव में छत्तीसगढ़ जनता ़कांग्रेस की उपस्थिति की वजह से उसकी राह आसान हो जाएगी लेकिन फिर भी वह जी-जान से लगी हुई है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का लगातार दौरा एवं पार्टी पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद इस बात का संकेत है कि पार्टी कोई जोखिम उठाने तैयार नहीं। कांगेस भी चुनौती में पीछे नहीं है। भूपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस अपने पिछले डेढ़ दशक की तुलना में ज्यादा प्रभावी एवं आक्रामक है।    
   लेकिन अजीत जोगी मतदाताओं को लुभाने के लिए जिस तरह नये-नये प्रयोग कर रहे है, वे उद्यपि नाटकीयता से भरपूर हैं, वे सर्वथा भिन्न एवं अद्भुत है। पर वे कुछ तो असर छोड़ रहे हैं। मसलन वे मतदाताओं को पार्टी का शपथ-पत्र दे रहे हैं जिसमें उनके प्रमुख वायदों का उल्लेख है और कहा गया है कि इनमें से एक भी वादा पूरा नहीं हुआ तो जनता अदालत में मुकदमा दायर करने स्वतंत्र है। क्या ऐसा कभी किसी पार्टी या नेता ने किया था? उन्होंने स्टाम्प पेपर पर शपथ-पत्र 14 जून 2017 को तैयार करवाया था। 17 जून 2017 को वे अपने समर्थकों व किसानों के साथ मंदिरहसौद चंद्राखुरी पहुंचे। किसानों के साथ खेत में उतरे, खेती के उपकरणों के साथ बैलों की पूजा की। तथा मिट्टी हाथ में लेकर किसानों के सामने शपथ-पत्र पढ़ा कि यदि उनकी पार्टी सत्ता में आई तो किसानों का कर्ज माफ कर दिया जाएगा तथा धान का समर्थन मूल्य 2500 रुपये किया जाएगा। और तो और बस्तर के लिए उन्होंने अलग घोषणा पत्र जारी किया। यह भी कहा कि यदि पार्टी सत्ता में आती है तो उपमुख्यमंत्री बस्तर से होगा। अजीत जोगी ने एक और दांव चलाते हुए वादा किया कि यदि वे मुख्यमंत्री बन गए तो जगदलपुर को राजधानी बनाएंगे और बस्तर से सरकार चलाएंगे। बस्तर संभाग की आदिवासी बाहुल्य एक दर्जन सीटें उनके लिए किस कदर महत्वपूर्ण हैं, यह ऐसी घोषणाओं व वायदों से जाहिर है।
     वैसे जोगी ने घोषणाओं का पिटारा पार्टी की स्थापना के दिन ही खोल दिया था। 21 जून 2016 को उनके पहले घोषणा पत्र में कहा गया था - प्रदेश के हर किसान का कर्जा माफ, प्रत्येक थाने के सामने 20 गज चांदी का सड़क (जिसका आम लोगों को मतलब समझ में नहीं आया), मनरेगा मजदूर का हर सप्ताह भुगतान, सत्ता में आने पर एक लाख करोड़ का बजट, आउट सोर्सिंग बंद, स्थानीय को रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं में छत्तीसगढ़ी पर एक प्रश्न पत्र, साक्षात्कार भी छत्तीसगढ़ी में व किसानों को मुफ्त बिजली। इन घोषणाओं के अलावा जोगी ने कहा उनकी प्राथमिकताओं में हैं किसान, महिला और युवा। फंड इकट्‌ठा करने के लिए भी उन्होंने भावनात्मक तरीका अपनाया। उन्होंने 4 अप्रैल 2017 को 50 किलो चांदी से बने 5 हजार सिक्के जारी किए जिनमें उनका फोटो है। एक सिक्के की कीमत 2 हजार रुपये रखी गई। इस तरह पहेली खेप में डेढ़ करोड़ रुपये इकट्‌ठा करने का लक्ष्य रखा गया। 
जोगी ने घोषणाएं तो की किन्तु यह नहीं बताया कि वे उन्हें कैसे पूर्ण करेंगे। उसके लिए फंड कहां से आएगा। भाजपा सरकार चुनावी वायदे के बावजूद किसानों को धान का बोनस नहीं दे पा रही है और न ही समर्थक मूल्य बढ़ा पा रही है। जोगी कहां से लाएंगे पैसा? मुख्यमंत्री के रुप में अपने कार्यकाल में उन्होंने राज्यों को करमुक्त बनाने का वादा किया था। इस वायदे को उन्होंने अभी भी जिंदा रखा है। वह कैसे पूरा होगा। क्या मतदाताओं को लुभाने वे उन्हें दिवास्वप्न दिखा रहे हैं? यदि नहीं तो बेहतर होता अपने संकल्प पत्र में इसका खुलासा करते कि वादे कैसे पूरे किए जाएंगे और उनके लिए धन की व्यवस्था किस तरह होगी। इस तरह वे ज्यादा विश्वसनीय और ज्यादा भरोसेमंद बनते। 

   बहरहाल कुल मिलाकर अजीत जोगी अगले विधानसभा चुनाव में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने दिन-रात एक कर रहे हैं। वे राज्य सरकार की नीतियों की आलोचना तो कर रहे हंै पर यह बात किसी से किसी से छिपी हुई नहीं है कि मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के प्रति उनका रुख नरम है। राजनीति के गलियारों में यह भी चर्चा है कि भाजपा और जोगी कांग्रेस के बीच नूरा कुश्ती चल रही है जिसका अंतिम मकसद कांगे्रस को सत्ता में नहीं आने देना है। लेकिन जोगी नहीं चाहेंगे इस चक्कर में उनकी राजनीतिक साख दांव पर लगे लिहाजा उन्होंने विकल्प खुले रखे हंै। बीच में यह चर्चा जोरों पर थी कि यदि प्रदेश कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन होता है और यदि भूपेश बघेल हटा दिए जाते हैं तो जोगी को कांग्रेस में वापसी में कोई दिक्कत नहीं है हालांकि जोगी ने इसका खंडन किया। चूंकि गठबंधन की राजनीति में क्षेत्रीय पार्टियों का महत्व काफी बढ़ा हुआ है फलत: जोगी की कोशिश पार्टी को जिंदा रखने और मौका परस्त राजनीति में अपने फायदे के लिए हर तरह के समझौतों के लिए तैयार रहने की है।
   जोगी चुनाव के पूर्व पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र जारी नहीं करेंगे। उनका संकल्प पत्र ही चुनावी घोषणा पत्र है, जो चुनाव के डेढ़ वर्ष पूर्व ही जारी कर दिया गया। उनका यह फैसला भी लीक से हटकर है। अंत में उनकी एक बात और सुन ले -यह उनकी दृढ़ इव्छा शक्ति एवं संकल्प का प्रतीक हैं। 15-16 फरवरी 2016 को, अपनी पार्टी के गठन के पूर्व, उन्होंने खरोरा में आयोजित सर्वधर्म सम्मेलन में कहा था 'जो लोग मुझे बुजुर्ग और बेकार समझते हैं वे समझ लें कि छत्तीसगढ़ के हक की लड़ाई लड़ने के लिए मैं अभी 30 साल तक और जिंदा रहूंगा जोगी इस समय 71 के हैं।

जोगी का घोषणा पत्र
मैं अजीत जोगी पिता प्रमोद जोगी निवासी सिविल लाइन्स रायपुर (छग) ये शपथ लेता हूँ कि, मैं अगले वर्ष दिसंबर 2018 में, मैं, मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के दिन ही तत्काल निम्न निर्णयों पर हस्ताक्षर कर इन्हें तत्काल प्रभाव से लागू करूँगा।
किसान
मैं शपथ लेता हूँ कि, मैं, मेरे छत्तीसगढ़ के किसान भाइयों को 2500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से धान का समर्थन मूल्य दूंगा। मैं अजीत जोगी ये शपथ लेता हूँ कि, मैं, मेरे छत्तीसगढ़ के अधिकांश किसान भाइयों को पूर्णत: ऋण मुक्त कर दूंगा। इन किसान भाइयों द्वारा बैंकों से पूर्व में लिए गए ऋण की अदायगी मेरी सरकार करेगी।
युवा
मैं अजीत जोगी ये शपथ लेता हूँ कि, मैं, मेरे छत्तीसगढ़ के सभी स्थानीय युवाओं को रोजगार दूँगा। प्रत्येक बेरोजगार युवा के लिए उसके योग्यता अनुसार रोजगार व स्वरोजगार का प्रबंध करूँगा। मेरे छत्तीसगढ़ में संचालित सभी निजी, शासकीय एवं अर्ध शासकीय संस्थानों में 90 प्रतिशत पदों पर छत्तीसगढ़ के योग्य युवाओं को रोजगार देने का कड़ा नियम बनाऊंगा। प्रदेश में रोजगार पाने के लिए छत्तीसगढ़ी भाषा का ज्ञान अनिवार्य होगा।
महिला
मैं अजीत जोगी ये शपथ लेता हूँ कि, मैं, छत्तीसगढ़ में पूर्ण शराबबंदी कड़ाई से लागू करूँगा। मेरे छत्तीसगढ़ की माताओं, बहनों और बेटियों को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा देने के लिए, मेरी सरकार, कन्या के जन्म होते ही उसके नाम से 1 लाख रुपये की एफडी करेगी। इस जमा राशि का उपयोग लाभार्थी कन्या भविष्य में अपने उच्च शिक्षा व इलाज के लिए कर सकेगी। महिलाओं को शिक्षा, सम्मान एवं समानता के बल पर आत्मनिर्भर बनाने, सभी क्षेत्रों में 33 प्रतिशत आरक्षण का नियम लागू करूँगा।
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जोगी को झटका, जाति प्रमाण पत्र निरस्त

आगामी विधानसभा चुनाव के संदर्भ में अजीत जोगी एवं उनकी पार्टी को बड़ी चुनौती मानने वाले मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह जोगी की जाति संबंधी नए घटनाक्रम से जरुर खुश होंगे। हाई पॉवर कमेटी की अनुशंसा पर 3 जुलाई 2017 को बिलासपुर कलेक्टर ने जोगी का जाति प्रमाण निरस्त कर दिया है। जोगी आदिवासी है या नहीं यह सवाल लगभग तीन दशक से विवाद का विषय बना हुआ है। राजनीतिक आरोप - प्रत्यारोप, सामाजिक फैसले और अदालतों में दायर याचिकाओं ने इस मुद्दे को कभी ठंडा नही होने दिया। जब अजीत जोगी 21 जून 2017 को अपनी पार्टी की पहली साल गिराह मनाने के बाद तनिक संतोष की सांस ले रहे थे कि एकाएक उनकी जाति पर पड़ा हुआ 'रहस्य'  का पर्दा हट गया। राज्य सरकार द्वारा गठित उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने 28 जून को फैसला सुना दिया कि जोगी आदिवासी जमात से नहीं है। आईएएस रीना बाबा साहेब कंगाले की अध्यक्षता वाली समिति सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के निर्देश पर गठित की गई थी जिसे दो माह के भीतर निष्कर्ष पर पहुंचना था पर उसने जोगी की जाति संबंध स्थिति तय करने में लगभग 6 वर्ष लगा दिए। इससे जाहिर है कि इसे लटकाए रखने को पूरी कोशिश की गई जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 13 अक्टूबर 2011 को माधुरी पाटिल वर्सेज एडिशनल कलेक्टर आंध्रप्रदेश सरकार के मामले की सुनवाई करते हुए हाईपावर कमेटी बनाने का निर्देश राज्य सरकारों को दिया था जो आरक्षित जाति वर्ग की पहचान करेगी। छत्तीसगढ़ सरकार के सामाजिक, सांस्कृतिक संरक्षण अधिनियम 2013 के मुताबिक धारा 8 के तहत किसी का जाति प्रमाण पत्र नकली पाया गया तो उसे जप्त कर निरस्त कर दिया जाएगा और धारा 10 का दोषी पाए जाने पर उसके खिलाफ फर्जीवाड़ा का अपराध दर्ज किया जाएगा।
    जोगी की जाति पर न जाने कितनी बार पेंच आते रहे। राजनीतिक फायदे के लिए परिस्थितियों के अनुसार यह मामला जोर शोर से उठाया जाता रहा। कभी जोगी विरोधी कांग्रेसजनों ने इसे हवा दी तो कभी भाजपा ने राज्य की सत्ता पर काबिज होने के पूर्व इसे अपना प्रमुख राजनीतिक हथियार बना कर रखा। जोगी आदिवासी नहीं है, इसकी सबसे पहली शिकायत 1986-87 में संतकुमार नेताम ने भाजपा नेता दिलीप सिंह भूरिया की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग से की थी। संतकुमार नेताम भूरिया के कर्मचारी थे। स्पष्ट है कि शिकायत राजनीति प्रेरित थी। आयोग ने फैसला सुना दिया था कि जोगी आदिवासी नहीं है। जोगी ने आयोग के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिका-पुर्नयाचिकाएं लगाती रही। इस वजह से यह मामला एक बार इंदौर, हाईकोर्ट, 2 बार जबलपुर हाईकोर्ट व एक बार बिलासपुर हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा। बिलासपुर हाईकोर्ट के भूरिया के फैसले को यह कहकर खारिज कर दिया था कि आयोग को किसी की जाति तय करने का अधिकार नहीं है। लिहाजा भूरिया सुप्रीम कोर्ट गए थे। 
अब हाई पॉवर कमेटी के फैसले से यह मामला पुन: गर्मा गया है। जोगी ने निर्णय पर तीव्र प्रतिरोध जाहिर करते हुए हाईकोर्ट में चुनौती देने का मन बनाया है जबकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने जोगी के खिलाफ एक अपराध दर्ज करने की मांग मुख्यमंत्री से की है। यानी भाजपा व कांग्रेस दोनों इस मुद्दे को राजनीतिक हथियार के रुप में इस्तेमाल करना चाहती है। इसके पीछे मूल कारण है छत्तीसगढ़  जनता कांग्रेस पार्टी का बढ़ता जनाधार व इससे घनीभूत होती आशंकाए। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि जोगी की जाति पर संदेह का कुहासा होने के कारण छत्तीसगढ़ की आदिवासी जमात के वे सर्वमान्य नेता नहीं है। हालांकि इस वर्ग के साथ-साथ अनुसूचित जाति भी उनका प्रभावी वोट बैंक है जिनकी आबादी लगभग 12 प्रतिशत है जबकि आदिवासी करीब करीब 32 प्रतिशत। इसका अर्थ है सरकार बताने में ये दोनों जातियां निर्णायक भूमिका निभाती है। ऐसी स्थिति में यदि जोगी की जाति पर कोर्ट से कोई निर्णायक फैसला आता है और वह जोगी के खिलाफ जाता है तो जाहिर है आगामी चुनाव में जोगी विरोधियों का प्रमुख मुद्दा बनेगा। इससे निश्चित ही नए राजनीतिक समीकरण बनेंगे जो चुनाव के दौरान कितने प्रभावी होंगे फिलहाल कहना मुश्किल है।
   लेकिन यह भी तय है यह मामला अभी और लंबा खींचेगा तथा अदालतों के गलियारों में घूमता रहेगा। संभव है अगले वर्ष नवंबर - दिसंबर में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव के पूर्व फैसला आ जाए, क्योंकि ऐसी कोशिशें होंगीं किन्तु तब तक जोगी को इतना समय मिल जाएगा कि वे इससे होने वाले राजनीतिक नुकसान की भरपाई कर सकें। हालांकि उच्चाधिकार कमेटी का फैसला जोगी परिवार के लिए किसी सदमे से कम नहीं है और मरवाही से जोगी-पुत्र अमित जोगी की विधायकी खतरे में पड़ गई है। मरवाही अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी पहले यहां से निर्वाचित हुए है। 

जाति के मुद्दे पर ही केंद्रित है जोगी की राजनीति - नेताम

पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ आदिवासी नेता अरविंद नेताम का मानना है कि जोगी की जाति संबंधी मुद्दा जिंदा रहेगा, जिंदा रखा जाएगा क्योंकि जोगी की समूचा राजनीति इसी मुद्दे पर टिकी हुई है। आदिवासी समाज एवं विधानसभा चुनाव में इसके असर पर नेताम का कहना था कि आदिवासी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे तत्काल प्रतिक्रिया नहीं देते। अत्याचार सहन कर लेते है पर प्रतिरोध वक्त आने पर ही दर्ज करते है। चुनाव वोट के माध्यम से प्रतिक्रिया व्यक्त करने का अवसर होता है। पिछले चुनाव इसका प्रमाण है। अनुसूचित जनजाति बहुत इलाकों में कांग्रेस का ग्राफ गिरा है। यह उनकी खामोश प्रतिक्रिया है। इसकी शुरुआत 2003 से हुई थी जब कांग्रेस ने चुनाव अजीत जोगी के नेतृत्व में लड़ा था। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस कभी पराजित नहीं होती बशर्ते वर्ष 2000 में नवगठित राज्य में कांग्रेस सरकार की बागडोर जोगी के बजाए किसी कांग्रेस संस्कृति वाले नेता को सौंपी जाती। यदि हाईकमान को विद्याचरण शुक्ल मंजूर नहीं थे तो अन्य विकल्प खुले हुए थे। मोतीलाल वोरा थे, श्यामाचरण शुक्ल थे। लेकिन कमान जोगी को दी गई। परिणाम सामने है। नेताम ने कहा कि जाति को लेकर आदिवासी समाज बहुत संवेदनशील है और इस मुद्दे पर कोई भी गड़बड़ बर्दाश्त नहीं करता।

Saturday, May 6, 2017

बस्तर : बंदूक नहीं विश्वास की जीत होनी चाहिए

-दिवाकर मुक्तिबोध
28 अप्रैल को राज्य विधानसभा के विशेष सत्र में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा- नक्सलियों से अब आर-पार की लड़ाई है। जब तक उनका सफाया नहीं हो जाता, वे चैन से नहीं बैठेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि अब नक्सलियों से कोई बातचीत नहीं होगी। बस्तर में नक्सली हिंसा पर मुख्यमंत्री की चिंता, बेचैनी और नाराजगी स्वाभाविक है। वर्ष 2003 से उनके नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और राज्य की इस भीषणतम समस्या जो राष्ट्रीय भी है, पर अब तक काबू नहीं पाया जा सका है। और तो और मुख्यमंत्री के रूप में वर्ष 2013 से जारी उनके तीसरे कार्यकाल में नक्सली घटनाएं बढ़ी हैं तथा हिंसा का ग्राफ और उपर चढ़ा है। राज्य के नक्सल इतिहास में सर्वाधिक स्तब्धकारी घटना अप्रैल 2010 में बस्तर के ताड़मेटला में घटित नक्सल हमला था जिसमें केन्द्रीय सुरक्षा बल के 75 जवान मारे गए थे। तब केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी। इस नरसंहार से पूरे देश में शोक और गुस्से की जबरदस्त अभिव्यक्ति हुई। सरकार ने नक्सलियों से निपटने कमर कसी, व्यूहरचनाएं बनाई गई, बड़ी-बड़ी बातें की गई, छत्तीसगढ़ में संयुक्त अभियान चलाया गया और देश की जनता को यह भरोसा देने की कोशिश की गई कि धुआंधार विकास और बंदूक के जरिए नक्सलियों को खत्म किया जाएगा तथा छत्तीसगढ़ सहित नक्सल प्रभावित अन्य राज्यों में अमन चैन लौटेगा, शांति कायम होगी, हिंसा थमेगी। लेकिन 6 वर्ष बीत गए इस भरोसे का क्या हुआ? कम से कम छत्तीसगढ़ में यह तो टूटा ही। बस्तर में विकास का यह आलम है कि धूर नक्सली क्षेत्र दोरनापाल से जगरगुंड़ा तक 56 कि.मी. सड़क 40 वर्षों से नहीं बन पाई है। राज्य सरकार के लिए बस्तर में सड़कों और गांवों तक पहुंच मार्गों का निर्माण किस कदर महत्वपूर्ण और जोखिम भरा है, यह हाल ही में 24 अप्रैल को सुकमा जिले के बुर्कापाल में घटित घटना से जाहिर है। सड़क निर्माण कार्य में सुरक्षा की दृष्टि से क्षेत्र में तैनात सीआरपीएफ के 25 जवान आतंकी हमले के शिकार हुए और जान गंवा बैठे। दो माह के भीतर सीआरपीएफ पर यह दूसरा बड़ा हमला था, पहले से बड़ा। पिछले महीने 11 मार्च को इसी जिले के दुर्कापाल में सीआरपीएफ कैम्प के निकट नक्सलियों ने हमला बोला था जिसमें 11 जवान शहीद हो गए। दो माह के भीतर 36 जवानों की शहादत से एक बार फिर वैसा ही माहौल बना है जैसा कि ताड़मेटला कांड के बाद बना था। यानी मातम भरी स्तब्धता, विशेष कुछ न कर पाने की विवशता और नक्सलियों के प्रति नफरत और गुस्सा। नक्सलियों को नेस्तनाबूत करने का सरकार का संकल्प, आर-पार की लड़ाई का संकल्प, विकास की बयार बहाने का संकल्प व नक्सलियों से अब किसी भी तरह की वार्ता न करने का संकल्प जो अभी तक कभी हुई ही नहीं। हालांकि इस बार एक विशिष्टता यह है कि प्रधानमंत्री कार्यालय का नक्सलियों के खिलाफ चलाई जाने वाली मुहिम में सीधा दखल होगा तथा नक्सली कमांडरों को बिलों से बाहर निकालने पूरी ताकत झोंकी जाएगी। राज्य सरकार के सहयोग से आपरेशन का ब्लूप्रिंट तैयार किया जा रहा है। इसे केन्द्रीय गृह मंत्रालय से हरी झंडी मिलते ही बस्तर में अभियान की शुरुआत हो जाएगी। सवाल है क्या अब वास्तव में आर-पार की लड़ाई होगी, क्या वांछित नक्सली नेता मारे जाएंगे या गिरफ्तार होंगे और क्या बस्तर के सैकड़ों गांवों को नक्सल मुक्त किया जा सकेगा? बस्तर की भौगोलिक दृष्टि को देखते हुए क्या यह एक झटके में संभव है? क्या आदिवासियों को नक्सली आतंक से छुटकारा मिल सकेगा? क्या उन्हें पूरी सुरक्षा मिलेगी। और क्या सरकार के प्रति उनका विश्वास लौटेगा? नजरिया बदलेगा! 
      इस बारे में दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता। आखिरकार देश में नक्सल हिंसा की लहर पिछले लगभग पांच दशक से चली आ रही है। पिछले दो दशक की बात करें तो नक्सली घटनाओं में अब तक १४ हजार से अधिक लोगों की जाने गईं जिसमें लगभग 8  हजार नागरिक हैं। इन आंकड़ों से समस्या की गहराई को समझा जा सकता है। लिहाजा बुर्कापाल घटना के बाद केंद्र व राज्य सरकार का आर-पार की लड़ाई का संकल्प यानी बस्तर को नक्सलमुक्त करने का संकल्प कामयाब हो पाएगा, कहना मुश्किल है। दरअसल जन हिंसा की लगभग प्रत्येक बड़ी घटना के बाद सरकार ऐसे ही संकल्प दोहराते रही है लिहाजा यह खंडित विश्वसनीयता के दायरे में है। जाहिर है इस पर भरोसा कम होता है। 
    यह आश्चर्य की बात है कि सरकार सिर्फ बंदूक पर क्यों विश्वास करती है। क्या हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा है और क्या इससे समस्या का समाधान, उसका अंत संभव है? अगर ऐसा होता तो जम्मू-कश्मीर भी यूं न जलता रहता हालांकि वहां की परिस्थितियां अलग हैं और वे राजनीतिक भी हैं। बस्तर भी जल रहा है तो इस वजह से क्योंकि सरकार आदिवासियों की विश्वासपात्र नहीं बन सकी है, उन्हें पूंजीवादी शोषण से मुक्त नहीं कर सकी है, अपने शोषक अफसरों व पुलिस की प्रताडऩा से बचा नहीं सकी है और उन्हें जल, जंगल और जमीन से बेदखल करने के सुनियोजित अभियान को भी रोक नहीं सकी है बल्कि इसमें उसकी सहभागिता रही है। ऐसी स्थिति में बस्तर का आदिवासी अलग-थलग पड़ गया है इसलिए नक्सली आतंक को झेलना और नक्सलियों को शरण देना उसकी मजबूरी है। सरकार उनकी इस मजबूरी को समझती है लेकिन इस दिशा में क्या कभी कोई सार्थक पहल हुई है? क्या कभी उनका दिल जीतने ईमानदार कोशिश हुई है? अगर हुई होती तो ऐसी नौबत न आती। 
     अब केन्द्र व छत्तीसगढ़ सरकार निर्णायक लड़ाई चाहती है। किंतु इसके पहले कि सशस्त्र अभियान शुरू हो, क्या उन आदिवासियों के बारे में सोचा गया है जो सरकारी प्रतिहिंसा के शिकार हो सकते हैं। बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर व दंतेवाड़ा जिले में गांवों के आसपास नक्सलियों के शिविरों पर हमला करने के पूर्व क्या इस बात की गारंटी होगी कि गांव महफूज रहेंगे? कोई ग्रामीण नहीं मारा जाएगा? यह नहीं भूलना चाहिए कि नक्सली पुलिस से मुठभेड़ की स्थिति में आदिवासी युवकों, युवतियों व बच्चों को ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं यानी ऐसी मुठभेड़ हुई तो निहत्थे आदिवासी ही पहले मारे जाएंगे। नक्सली कमांडरों को मार गिराना तो खैर जायज होगा लेकिन बरगलाए गए, भटके हुए विवशता में बंदूक थामने वाले, आदिवासी युवा व युवतियों को गोलियों का निशाना बनाना न्यायोचित होगा? नहीं तो फिर बेहतर उपाय यही है कि बातचीत के दरवाजे बंद न किए जाए। समस्या इसलिए विकराल होती चली जा रही है क्योंकि राज्य अथवा केन्द्र सरकार के स्तर पर सार्थक पहल नहीं हुई। केवल बातें होती रही। सवाल है क्यों नहीं माओवाद समर्थक जाने-माने साम्यवादी नेताओं, बुद्धिजीवियों को एक मंच पर लाकर उनके माध्यम से, उनकी मध्यस्थता में नक्सल नेताओं को वार्ता के लिए राजी करने की कोशिश की गई। क्यों नहीं ऐसा अभियान चलाया गया। श्री श्री रविशंकर जैसे आध्यात्मिक गुरू राज्य सरकार से बीजापुर में जमीन तो मांग सकते हैं पर स्वयं नक्सली इलाकों में जाकर उन्हें आध्यात्मिकता का पाठ पढ़ाने का साहस नहीं दिखा सकते, उनका मन नहीं जीत सकते। और भी  महात्मा संत हैं, धर्मगुरु हैं जो नक्सल मुद्दे पर बेबाकी से अपनी राय रखते रहे हैं, मानवाधिकार की हिमायत करने वाले प्रखर बुद्धिजीवी हैं, समाजशास्त्री हंै, सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जनप्रतिनिधि हैं। क्यों नहीं जगदलपुर को राज्य की उपराजधानी बनाने सरकार पर दबाव बनाया गया? क्या ही अच्छा होता यदि वे नक्सल इलाकों में डेरा-डालते, उनसे वार्ता के लिए आगे आने का आग्रह करते। सरकार उन्हें भरोसा देती कि वह बदले की भावना से कार्रवाई नहीं करेगी। उनके प्रति सहानुभूति का रुख अपनाएगी, उनके पुनर्वास की व्यवस्था करेगी और उन्हें सुरक्षित जीवन जीने का मौका देगी बशर्ते वे हथियार डाल दें तथा हिंसा से तौबा करे। दरअसल यह बंदूक का नहीं अविश्वास पर विश्वास की जीत का अभियान होना चाहिए। सचमुच यदि ऐसी कोई पहल होती तो नक्सल समस्या से निजात की उम्मीद बंधती। इसी संदर्भ में यहां एक सवाल है- नक्सल मोर्चे पर केन्द्र व राज्य सरकार की चाक-चौबंद व्यवस्था व प्रत्येक पहलू पर विचार के बाद बनाई गई कार्ययोजना यदि असफल होती है, यदि इस बार आर-पार की लड़ाई में नक्सलियों से पार नहीं पाया जा सका तो क्या सरकार बस्तर में पांचवीं व छठवीं अनुसूची लागू करने पर गंभीरतापूर्वक विचार करेगी? बस्तर के वरिष्ठ आदिवासी नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम, सीमा सुरक्षा बल के पूर्व महानिदेशक ई.एन. राममोहन, डॉ. ब्रम्हदेव शर्मा सरीखे अनेक विद्वानों व आदिवासी नेताओं ने समय-समय पर राय व्यक्त की है कि बस्तर में आदिवासियों को स्वशासन का अधिकार दिया जाए जो संविधान सम्मत है। संविधान में आदिवासी बहुल इलाकों में आदिवासी विकास परिषद के जरिए राज्यपाल को शासन करने का अधिकार है। राममोहन का कहना है कि आज तक कभी भी किसी भी राज्यपाल ने संविधान के इस हक का पालन नहीं किया। यदि ऐसा किया गया होता, आदिवासी विकास परिषद के माध्यम से सत्ता चलायी जाती तो आज स्थितियां दूसरी होती। जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों का हक होता। और नक्सलवाद को पनपने का मौका नहीं मिलता। 
     यकीनन बस्तर में शांति लौटाने का यह बहुत सीधा व सरल तरीका है पर राज्यपाल कोई जोखिम उठाने इसलिए तैयार नहीं है क्योंकि उनकी नियुक्तियां राजनीतिक हैं जो सत्ता प्रतिष्ठान से किसी तरह का टकराव नहीं चाहती। जाहिर है यदि आदिवासी विकास परिषदों को सत्ता सौंपी गई और राज्यपाल का शासन लागू हुआ तो राज्य में सत्ता के दो केंद्र बनेंगे। कोई राजनीतिक पार्टी अपने हितों की रक्षा के लिए इस फार्मूले को मंजूर नहीं कर सकती, भले ही मासूमों, निरपराधों का खून निरंतर क्यों न बहता रहे। लेकिन राज्य के दीर्घकालीन हितों को देखते हुए क्या छत्तीसगढ़ सरकार इस बारे में विचार करेगी? बस्तर में शांति लौटाने के लिए क्या अपने राजनीतिक स्वार्थ की बलि चढ़ाने सत्तारुढ़ पार्टी तैयार है? शायद नहीं। यकीनन नहीं। लेकिन एक समाधान तो यह है ही जिस पर विचार किया जाना चाहिए।   

Monday, May 1, 2017

खास से आम बनने की कवायद

 -दिवाकर मुक्तिबोध

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह पिछले कुछ समय से बदले-बदले से नजर आ रहे हैं। बातचीत का उनका तौर-तरीका और व्यवहार में फर्क महसूस होने लगा है। वे कठोर बनने की कोशिश कर रहे हैं। सरकारी मुलाजिमों को यह जताने का प्रयास कर रहे हैं कि उन्हें ढीला-ढाला और सीधा-साधा शासनाध्यक्ष न समझा जाए जो भयानक से भयानक गलतियों पर भी 'भूल गया, माफ किया' नीति पर चलता है। उनकी बातचीत का टोन बदल गया है। वे अब भरी सभा में, सरकारी बैठकों में लापरवाह, कामचोर व भ्रष्ट अफसरों पर फटकार बरसाने लगे हैं। चेतावनी देने लगे हैं कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सरकार को जनता से दूर करने की कोशिशें कामयाब नहीं होने दी जाएंगी। हर सूरत में प्रदेश के गरीब-बेसहारों को प्रसन्न रखना, उनके दु:ख दर्द को दूर करना, उनकी समस्याओं का समाधान करना व राज्य में विकास की गंगा बहाना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। प्रदेश की गायों को लेकर वे अब इतने ज्यादा संवेदनशील हो गए हैं कि उन्होंने यहां तक कह दिया है कि जो गायों का वध करेगा उसे लटका दिया जाएगा। गायों के प्रति आस्था के देशव्यापी उबाल के बाद इतनी सख्त बात तो भाजपा शासित किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री ने नहीं की। और वह भी दो-दो बार। अपने सालाना कार्यक्रम लोक सुराज अभियान बनाम समाधान शिविर का तीसरा चरण प्रारंभ होने के पूर्व 1 अप्रैल 2017 को उन्होंने जगदलपुर में मीडिया से कहा गोवध कानून पहले से ही राज्य में लागू है और यदि कोई गाय का वध करते पकड़ा गया तो उसे लटका दिया जाएगा यानी फांसी दे दी जाएगी। गोरक्षा के साथ-साथ मुख्यमंत्री राज्य में फिलहाल शराब बंदी लागू न करने के फैसले पर भी अडिग हैं। हालांकि आश्वासन पर आश्वासन दे रहे हैं कि राज्य में शराबबंदी होकर रहेगी, लेकिन कब? फिलहाल सरकार का लक्ष्य है शराब बिक्री से प्राप्त होने वाले राजस्व में करीब 700 करोड़ की वृद्धि करना। अब तक 3300 करोड़ मिलते थे जो 4000 करोड़ होने चाहिए। इसलिए जरूरी है इसकी अवैध बिक्री रोकी जाए। जाहिर है इसके लिए सख्ती जरूरी है। लिहाजा वे अवैध शराब का धंधा करने वाले कोचियों के प्रति भी बहुत सख्त हैं। 6 अप्रैल को अपनी समाधान यात्रा के एक पड़ाव कोरबा में उन्होंने कोचियों को सलाह दी कि वे दूध बेचना शुरू करें। यदि ऐसा करेंगे तो सरकार उन्हें सहायता देगी अन्यथा पकड़े जाने पर लटका दिए जाएंगे। यानी लटका दिए जाएंगे यह मुख्यमंत्री का तकिया कलाम जैसा हो गया है।
  
  दरअसल डॉ. रमन सिंह बहुत नर्म दिल एवं रहमदिल इंसान हैं। मुख्यमंत्री के रूप में वे तीसरी पारी खेल रहे हैं। बीते 13 वर्षों में उनके राजकाज के तौर-तरीके भले ही प्रभावित करने वाले न रहे हों किंतु एक व्यक्ति के रूप में, एक नेता के रूप में और एक राज्य के मुखिया के रूप में उनकी पर्याप्त ख्याति है, लोकप्रियता है और उन्हें ईमानदार और सच्चा मुख्यमंत्री माना जाता है जो किसी से भी ऊंचे स्वरों में बात नहीं कर सकता। और कभी आपा भी नहीं खोता।  लेकिन इस तीसरी पारी के उत्तरार्ध में उनमें कुछ बदलाव न•ार आने लगा है। वे अब कठोर और सख्त प्रशासक के रूप में अपनी छवि बनाना चाहते हैं। अफसरों के साथ सख्ती से पेश आ रहे हैं। उनसे उनके कार्यों का हिसाब मांगा जा रहा है। शासन को गतिशील व जनोन्मुखी बनाने के लिए वे जोर-शोर से प्रयास कर रहे हैं। ऐसी कोशिशों के दौरान उनके सख्त बोल जहां एक ओर आश्चर्यचकित करते हैं वहीं दूसरी ओर भविष्य में कुछ बेहतर घटने की उम्मीद भी जगाते हैं।
    डॉ. रमन सिंह वर्ष 2003 से भाजपा शासित छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री हैं। वे जनता से सीधा संवाद करने अपने आवास में सप्ताह में एक बार जन-दर्शन कार्यक्रम तो करते ही हैं, प्रतिवर्ष हफ्ते-दस दिन 'सुराज यात्राÓ पर भी निकल पड़ते हैं। हर वर्ष गर्मियों में उनकी लोक सुराज यात्रा गांवों की किस्मत बदलने के लिए होती है। वर्ष 2004 से अब तक 13 वर्षों में वे अपने सरकारी अमले के साथ राज्य के दूर-दराज के आदिवासी गांवों, नक्सल हिंसा से प्रभावित गांवों, अत्यंत पिछड़े गांवों व सभ्यता की रौशनी से कोसों दूर जिंदगी बसर करने वाले गांवों व ग्रामीणों से रुबरु हुए हैं और उनकी मिजाजपुर्सी करते रहे हैं। इन वर्षों में उनके इस उपक्रम से कितना कुछ बदला, कैसा परिवर्तन आया, गांव में विकास की रौशनी फैली या नहीं, ग्रामीणों की शिक्षा, पेयजल व स्वास्थ्य तथा अन्य मूलभूत समस्याएं दूर हुई अथवा नहीं, नक्सली हिंसा में इजाफा हुआ अथवा हिंसा घटी आदि सवालों का जवाब ढंूढना बेहद कठिन है अलबत्ता इस बात में दो राय नहीं कि मुख्यमंत्री ने ईमानदार कोशिश की जो अभी भी जारी है। यह अलग बात है कि जनकल्याणकारी योजनाओं पर अमल व ग्रामीण समस्याओं के निदान में नौकरशाही लापरवाह बनी रही इसलिए जन सुराज या ग्राम सुराज अभियान या समाधान शिविर अब तक सार्थक नतीजे नहीं दे पाया है। लिहाजा समस्याओं का पहाड़ जहां के तहां खड़ा है।
    
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ठेठ छत्तीसगढिय़ा हैं इसलिए गांवों की यात्रा के दौरान चौपाल लगाना, ग्रामीणों से छत्तीसगढ़ी भाषा में बातचीत करना, उनके दु:ख-दर्द के बारे में पूछताछ करना, उनके कंधे पर हाथ रखना और उन्हें स्थितियों के बेहतर होने का भरोसा दिलाना अपनत्व का अहसास कराता है। ग्रामीण जनता को लगता है कि वे उन्हीं के जमात के आदमी हैं जो उनकी जिंदगी के संघर्ष को आसान बनाने आए हैं। इसलिए वे उन पर भरोसा करते हैं। मुख्यमंत्री ने उनके इस विश्वास को टूटने नहीं दिया है बल्कि उसे और पुख्ता करने प्रयासरत है। मसलन इस बार का उनका लोक सुराज अभियान तब्दीलियां लिए हुए है। अब मुख्यमंत्री न केवल गांव वालों से मिलते हैं वरन उनके यहां खाना भी खाते हैं, काम में हाथ भी बंटाने लगते हैं। स्कूलों का निरीक्षण करते हैं, बच्चों की क्लास लेते हैं।  उनके साथ भोजन करते हैं। ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं की जानकारी देते हैं और पीठ थपथपाते हैं। 6-7 अप्रैल के दौरे में वे बलरामपुर के जोकापार गांव में सोबरन नाग के यहां गए और सिर पर गमछा बांधकर ईंटे जोडऩे में उसकी मदद करने लगे। उन्होंने सोबरन की पत्नी उर्मिला से खाने के लिए गुड़ और बिस्किट मांगा। फिर देवसाय नाग के कुएं पर गए और कुएं का पानी पीया। गौरेला के गौरीखेड़ी में मनरेगा श्रमिक उर्मिला कोर्राम के यहां उन्होंने भोजन किया। यहीं उनके मन में विचार आया कि श्रमिकों को स्टील के टिफिन दिए जाएं। अम्बिकापुर में उनका अंदाज और भी निराला था। अपने लाव-लश्कर के साथ सरकारी गाड़ी पर सवार रमन सिंह सर्किट हाउस से कलेक्टोरेट जाते हुए अकस्मात गांधी चौक में अपने वाहन से उतर गए व एक ऑटो रिक्शा में बैठ गए। वे इसी ऑटो में कलेक्टोरेट गए।  सफर के दौरान महिला आटो चालक गीता से वे बातचीत करते रहे और उसे 500 रु. दिए जबकि भाड़ा 20 रु. होता है। 12 अप्रैल को सरायपाली के ग्राम जम्हारी में उन्होंने स्कूली बच्चों के साथ मध्यान्ह भोजन किया, उनकी पढ़ाई के बारे में पूछताछ की, कुछ प्रश्न किये, बच्चों को टाफियां बांटी, अच्छे भोजन के लिए रसोइयों को पुरस्कृत किया। इसी मौके पर उन्होंने कठोर कार्रवाई भी की। ड्यूटी से गायब रहने वाले एसडीओ को उन्होंने सस्पेंड कर दिया। ऐसे अनेक प्रसंग हैं जो ये दर्शाते हैं कि मुख्यमंत्री राजनेता से आम आदमी बनने की कोशिश कर रहे हैं। उनमें यह एक बदलाव है जिसे फौरी तौर पर सार्थक कह सकते हैं पर सवाल है ऐसा किसलिए? परिवर्तन किस वजह से? गांवों व ग्रामीणों की इस कदर चिंता क्यों सताने लगी? अचानक ऐसा क्या हुआ कि शासन-प्रशासन पर मुख्यमंत्री सख्त हो गए। तथा नौकरशाहों को चेतावनी पर चेतावनी देने लगे। इन सभी का जवाब बहुत साफ है। अगले वर्ष विधानसभा चुनाव है। नवम्बर, दिसम्बर 2018 में चौथी विधानसभा के लिए वोट डाले जाएंगे। यानी अब मात्र 18-19 महीने शेष हैं। लेकिन इससे बड़ी चिंता 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव की है। सन् 2014 के चुनाव में मुख्यमंत्री ने राज्य की 11 में से 10 सीटें पार्टी की झोली में डाली थी। अब इससे कम का सवाल ही नहीं है। क्योंकि केंद्र में सख्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं जिन्हेें शतप्रतिशत नतीजे चाहिए। अब वे 2019 का नहीं 2024 के लोकसभा चुनाव को टारगेट कर रहे हैं। यानी 2019 में उन्हें हर हालत में छत्तीसगढ़ से बेहतर नतीजे चाहिए। यह गंभीर चिंता है क्योंकि राज्य की राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। 2019 में मुख्यमंत्री के नेतृत्व में भाजपा छत्तीसगढ़ की सभी 11 सीटें जीतने के अत्यंत दुष्कर लक्ष्य का पीछा करेगी किंतु इसके पहले जरूरी है राज्य विधानसभा के चुनाव जीते जाएं। जब पार्टी चौथी पारी के लिए पुन: सत्ता प्राप्त करेगी तब 2019 का लोकसभा चुनाव ज्यादा दमदारी से लड़ा जा सकेगा। इसलिए अगले दो वर्ष मुख्यमंत्री व प्रदेश पार्टी के लिए चिंता भरे वर्ष हैं। लिहाजा पार्टी व सरकार ने कमर कस ली है। दरअसल यह मोदी का खौफ है जो सरकार और पार्टी को आम आदमी के अधिक से अधिक नजदीक जाने विवश कर रहा है। तो क्या यह माना जाए कि मुख्यमंत्री के रुख में बदलाव के पीछे मोदी का आतंक है? व्यवहार के स्तर पर बदलाव के पीछे एक खास मंशा है, एक उद्देश्य है? क्या मिजाज में परिवर्तन का यह अस्थायी दौर है? लक्ष्य के हासिल होते ही क्या रमन सिंह पहले जैसे रमन सिंह हो जाएंगे जिन्हें नौकरशाही कोई भाव नहीं देती थी?
     राजनीति में आम कार्यकर्ता से मुख्यमंत्री बनने और मुख्यमंत्री बनने के बाद भी आम आदमी बने रहने के बहुतेरे उदाहरण हैं। कई नाम लिए जा सकते हैं, मसलन त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार पं. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, इसी राज्य के पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी, केंद्र में मंत्री व राज्य में मुख्यमंत्री रह चुके ए.के. एंटोनी आदि आदि। शासनाध्यक्ष होने के बावजूद उन्होंने सादगी की मिसाल पेश की। सरकारी सुविधाओं का त्याग किया, अपना बैंक बैलेंस नहीं बढ़ाया। अपने उपर कोई लांछन नहीं लगने दिया। यकीनन मुख्यमंत्री रमन सिंह इस श्रेणी में नहीं हैं पर आ सकते हैं बशर्ते शहर के रमन सिंह अलग और गांव के रमन सिंह अलग-अलग न हो। सरकारी सुविधाओं का त्याग करने की हिम्मत यदि वे जुटाते हैं, मन बनाते हैं तो वे आम आदमी के मुख्यमंत्री कहलाएंगे जो अभावों में जीते हैं। संघर्ष करते हैं। उनके सामने सबसे अच्छा उदाहरण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भी है जो प्रोटोकाल को ताक पर रखकर आम आदमी बन जाते हैं। हाल ही में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री का दिल्ली विमानतल पर स्वागत करने वे बिना किसी लाव-लश्कर के अकेले ही पहुंच गए। यही नहीं नई दिल्ली में भारत प्रवास पर आए ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री मैलकल टर्नबुल के साथ उन्होंने मेट्रो में सफर किया। अक्षरधाम मंदिर पहुंचे, साथ-साथ पूजा-अर्चना की और बाद में मंदिर की सीढिय़ों पर बैठकर दोनों काफी देर तक बातचीत करते रहे। ऐसा उदाहरण अब तक किसी प्रधानमंत्री ने पेश नहीं किया था। राजनीति के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। किसी ने भी लीक से हटकर चलने की कोशिश नहीं की। किंतु मोदी ऐसा करते हैं लिहाजा उनके मुख्यमंत्रियों के लिए यह एक मिसाल है। अब प्रश्न यह है कि मुख्यमंत्री रमन सिंह इस नीति पर चलने की इच्छा रखते हैं? क्या वे शहर में आम नागरिक की तरह घूमते हुए मिल जाएंगे, क्या अकेले बाजार में दिखेंगे? गांव में स्कूली बच्चों के साथ जमीन पर बैठकर उन्होंने भोजन तो किया, तो क्या शहरों में भी ऐसा कुछ करेंगे? क्या कभी स्लम बस्तियों का दौरा करेंगे? क्या बेइंतिहा तकलीफों को झेल रहे शहरी गरीबों के बीच कुछ वक्त बिताएंगे? क्या सायरन बजाकर उनके काफिले के लिए रास्ता बनाने की सामंती पद्धति से तौबा करेंगे? ऐसे बहुत से सवाल हैं जिनके जवाब तय करेंगे कि मुख्यमंत्री वाकई अपने राजनीतिक जीवन व्यवहार में तब्दीलियां ला रहे हैं वरना हर जागरूक नागरिक यह समझता है कि व्यवहार में नाटकीय बदलाव की असली वजह क्या है?