Sunday, April 9, 2017

एक विचार का यों बदल जाना

-दिवाकर मुक्तिबोध
रामचन्द्र गुहा
यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का करिश्माई व्यक्तित्व, उनका भाषाई कौशल, लोकदृष्टि और सबका साथ सबका विकास जैसे लोकलुभावन नारे का कमाल है या समानांतर चलते उस खौफ का जो विचारों को रौंदता है, उन्हें बदलने को मजबूर कर देता है। इसे तय कर पाना बड़ा मुश्किल है। वस्तुस्थिति तो वही बता सकता है जो इस दौर से गुजरता है या गुजर रहा है और जो वैचारिक दृष्टि से प्रबल है, लोकतांत्रिक है। करीब दो वर्ष पूर्व देश में घटित विभिन्न घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में सहिष्णुता-असहिष्णुता पर लंबी बहस चली, तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई, साहित्यिक, सांस्कृतिक व कलावादी पुरस्कारों को लौटाने का लंबा चौड़ा सिलसिला शुरू हुआ, इतिहास को बदलने की कुचेष्टा की गई, सांस्कृतिक दुष्चक्र, साम्प्रदायिक भावनाओं का विस्तार, उनका पोषण और फासिस्ट ताकतों का उत्थान देश ने देखा और अभी भी देख रहा है। जनता खामोश है। जो नहीं हैं उन्हें चुप कराया जा रहा है या पक्ष में बोलने के लिए विवश किया जा रहा है। उन्हें हथियार दिखाए जा रहे हैं। शब्दों के हथियार। इसी वर्ष जनवरी 2017 को प्रख्यात लेखक जी. राजशेखर ने देश में बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में कर्नाटक साहित्य पुरस्कार को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। याद करें वर्ष 2015 में प्रख्यात कथाकार उदय प्रकाश ने ऐसी ही एक लौ जलाई थी। इसी मुद्दे पर साहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटा दिया था। उनके द्वारा जलाई गई छोटी सी लौ जो एक फूंक में बुझ सकती थी, ज्वाला बन गई। पूरा देश असहिष्णुता के सवाल पर उद्वेलित हो गया। देश की साहित्यिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक बिरादरी तीखी बहसों में उलझ गई, इसमें राजनीति भी कूद पड़ी। लेकिन शाब्दिक हमलों के बाद उम्मीदों से भरी लपटें शांत हो गई। उसे शांत करा दिया गया। यह शांतता ऐसी पसरी कि कर्नाटकी लेखक के विरोध को लेखक बिरादरी ने ही अनसुना कर दिया। कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। राजशेखर का पुरस्कार से इंकार पर एक छोटी सी खबर अखबारों में बनी और गुम हो गई। राजशेखर को उनकी प्रसिद्ध कृति 'बहुवचन-भारत' के लिए पुरस्कृत करने का निश्चय किया गया था। पुरस्कार ठुकराते हुए जी राजशेखर ने मीडिया को दिए गए बयान में कहा था कि दक्षिणपंथी ताकतें विरोध में उठ रही आवाजों का गला घोंट रही है। धर्मनिरपेक्षता की बात करने वालों को दरकिनार कर दिया गया है। वर्ष 2016 तो 2015 से भी ज्यादा बुरा गुजरा है। 
    असहिष्णुता एवं बढ़ती साम्प्रदायिकता के विरोध में राग अलापने वाले बुद्धिजीवी कर्नाटक के लेखक के फैसले पर क्यों चुप रहे, क्यों प्रतिक्रिया से बचते रहे, यह एक विचारणीय प्रश्न है। यह इत्तफाक ही है कि राजशेखर कर्नाटक से है और प्रख्यात इतिहासकार रामचंद्र गुहा भी इसी राज्य से हैं जिन्होंने हाल ही में उन्हें मिले धमकी भरे इमेल का खुलासा करते हुए उन्हें गंभीरता से नहीं लिया था। कोई महत्व नहीं दिया, क्योंकि ऐसी धमकियां उन्हें पहले भी कई बार मिल चुकी थी। असहिष्णुता पर वे पहले भी अनेक बार तीखी प्रतिक्रिया देते रहे, राजनीतिक व्यवस्था पर चोट करते रहे पर इतिहास के इस जाने-माने अध्येता और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के प्रशासक ने कुछ ऐसा कहा कि जो आश्चर्यचकित करता है। उनके नजरिए पर सवाल उठाता है।
पहले गुहाजी के बारे में कुछ विस्तार से जान लें। 58 वर्षीय रामचन्द्र गुहा देश के प्रसिद्ध इतिहास लेखक हैं। उनकी कई किताबें हैं जिनमें 'इंडिया आफ्टर गांधी', गांधी बिफोर इंडिया, मेक्स आफ माडर्न इंडिया, ए कार्नर ऑफ ए फारेन फील्ड : द इंडियन हिस्ट्री आफ ब्रिटिश स्पोर्ट बहुचर्चित हैं तथा उन्हें लेखक के रूप में विशिष्ट दर्जा देती है। रामचन्द्र गुहा क्रिकेट के भी खासे जानकार हैं। प्रथम श्रेणी के क्रिकेट पर वे लगातार लिखते रहे हैं। इस विषय पर उनके लेख देश-दुनिया के अखबारों में नियमित छपते हैं। क्रिकेट पर उनकी इसी विशेषज्ञता के चलते उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने इसी वर्ष 30 जनवरी को बीसीसीआई का प्रशासक नियुक्त किया है। इतिहास, क्रिकेट और समसामयिक विषयों पर उनकी टिप्पणियां गौर से पढ़ी जाती हैं। वे किसी खास राजनीतिक विचारधारा से बंधे हुए नहीं हैं। उनके कटाक्ष समान रूप से हर किसी राजनीतिक दल पर, व्यवस्था पर प्रहार करते हैं जिनमें भाजपा-कांग्रेस व कम्युनिस्ट पार्टियां भी शामिल हैं। 
    ऐसे निष्पक्ष और गंभीर विचारक यदि अकस्मात अपनी धारा बदल दे, अपने विचारों से उलट बातें कहें और किसी राजनेता का गुणगान करने लगे तो आश्चर्य होता है और झटका भी लगता है। सवाल खड़े होते हैं कि ऐसा वैचारिक बदलाव किस वजह से? क्या विवशतावश या भयातुर होकर या परिस्थितियों के दबाव से या फिर कमजोर नैतिक बल की वजह से? आखिर कारण क्या? 
    पिछले महीने 28 मार्च को देश के छोटे-बड़े अखबारों में रामचन्द्र गुहा के हवाले से खबर छपी जो उनके ट्वीट पर आधारित थी। उन्होंने कहा था बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना के चलते उन्हें दर्जनों धमकी भरे ई-मेल मिले हैं। ई-मेल के इन संदेशों में भाषा एक जैसी है जिसमें कहा गया है कि दिव्य महाकाल की ओर से मिलने वाली सजा के लिए वे तैयार रहें। उन्हें चेतावनी दी गई कि दुनिया को बदलने के लिए दिव्य महाकाल की ओर से चुने गए और उनसे आशीर्वाद प्राप्त नरेन्द्र मोदी व अमित शाह की आलोचना बंद करें। यह भी कहा गया था कि मोदी की तुलना इंदिरा गांधी व अमित शाह की तुलना संजय गांधी से न करे। उन्हें उनके बीच का अंतर समझना चाहिए। जाहिर है गुहा ने ऐसे संदेशों को गंभीरता से नहीं लिया और उन्हें इसलिए सार्वजनिक किया ताकि लोग जान लें कि देश में क्या चल रहा है। गुहा ने किसी का नाम नहीं लिया पर हाल ही में 'आधार' के मामले में उन्होंने एक खबर रीट्रीट की थी। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वे हर चीज में 'आधार' को जरूरी करने में केन्द्र सरकार की योजना के खिलाफ हैं।
गुहा ने केन्द्र सरकार की नीतियों की आलोचना कोई पहली बार नहीं की थी। समय-समय पर सरकारों के कामकाज पर उनकी टिप्पणियां आती रही हैं। याद करें 6 दिसम्बर 2015 को चौथे बेंगलूरू साहित्य महोत्सव में 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सामने आठ खतरे' विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा था ''प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार अब तक सबसे अधिक बुद्धिजीवी विरोधी सरकार है और विभिन्न शैक्षणिक व सांस्कृतिक संगठनों में उसके द्वारा की गई नियुक्तियों से यह स्पष्ट हो जाता है। पहलाजानी और गजेन्द्र चौहान की नियुक्तियों को देखिए। उनकी नियुक्तियां क्या दर्शाती हैं? यह विद्वानों, साहित्य व कला के प्रति पूर्ण अवमानना दर्शाती है। प्रधानमंत्री अपनी धारणा की वजह से नहीं मानते कि बुद्धिजीवी, लेखक और कलाकार समाज में कोई योगदान करते हैं। यह उनका अपना अनुभव है और यह बात नीचे तक है।''
     रामचन्द्र गुहा की इन टिप्पणियों से जाहिर है कि वे सरकार के कामकाज व उसकी नीतियों से संतुष्ट नहीं हैं। और उन्हें देखने का उनका अपना नजरिया है जो उनकी और निष्पक्षवादियों की दृष्टि से तर्कसंगत है। हालांकि इस विषय पर बहस की पर्याप्त गुंजाइश भी है। लेकिन धमकी भरे ईमेल के दो दिन बाद 30 मार्च 2017 को रामचन्द्र गुहा का जो बयान आया वह चौंकाने वाला रहा। नई दिल्ली में लंदन स्कूल आफ इकॉनामिक्स के इंडिया समिट को संबोधित करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शान में कसीदे काढ़े। उन्होंने कहा 'मोदी एक महान नेता हैं। मोदी का करिश्मा और अपील जाति व भाषा की सीमा से परे है। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू व इंदिरा गांधी के बाद वे देश के तीसरे सबसे सफल प्रधानमंत्री बनने के करीब हैं बल्कि बन चुके हैं। वे एक शानदार वक्ता और नेता हैं। वे इकलौते हैं जो अखिल भारतीय दृष्टिकोण अपनाने के मामले में नेहरू व इंदिरा गांधी के समकक्ष हैं।'
      इस बयान से क्या यह अर्थ निकाला जाए कि रामचन्द्र गुहा ने मोदी व केन्द्र के प्रति फिलहाल अपना दृष्टिकोण बदल दिया है। चंद माह पूर्व उनकी सरकार को बुद्धिजीव विरोधी कहने वाले गुहा को अब मोदी में वे तमाम खासियतें नजर आ रही हैं जो नेहरू व इंदिरा गांधी में थीं। विचारों में अकस्मात ऐसे बदलाव की वजहें क्या हो सकती हैं? जो व्यक्ति अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता व निष्पक्षता के लिए मशहूर है, उसने यकबयक अपना स्टैंड क्यों बदल दिया? क्या यह उन्हें ईमेल से मिली धमकियों का परिणाम था? क्या वे मोदी सरकार व भाजपा के अतिउत्साही व उग्रवाद समर्थकों के शाब्दिक हमले से घबरा गए? क्या फासिस्ट ताकतों से वे डर गए? क्या उन्हें लगने लगा कि मोदी और उनकी सत्ता का गुणगान करना ही समय और परिस्थिति की जरूरत है। क्या पांच-छह माह पूर्व केंद्र सरकार उन्हें घोर बुद्धिजीवी विरोधी नजर आ रही थी, वह दो-चार दिन में ही बुद्धिजीवी समर्थक बन गई जो समाज के उत्थान में कला, साहित्य और संस्कृति की भूमिका को अहम मानती है। मोदी के नीतिगत फैसलों से वे अब इतने प्रभावित हैं कि उन्हें वे देश के तीसरे सबसे सफल प्रधानमंत्री मानते हैं। उनकी नजर में मोदी श्रेष्ठ वक्ता हैं। वे नेहरू, इंदिरा के समकक्ष हैं। आखिरकार ऐसी क्या वजहें थी कि रामचन्द्र गुहा जैसे प्रखर बुद्धिजीवी को ऐसा कहना पड़ा। बड़ा गंभीर सवाल है और इसका जवाब गुहा ही दे सकते हैं या फिर आने वाले वक्त में उनकी लेखनी, उनके ट्वीट और महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनके बयान वस्तुस्थिति का खुलासा करेंगे। लेकिन फिलहाल क्या यह माना जाए - अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने कोई तैयार नहीं, कोई मठ और गढ़ तोडऩे तैयार नहीं, कोई दुर्गम पहाड़ों के उस पार जाने तैयार नहीं। क्या हर कोई अंधेरे में रहना चाहता है? नहीं ऐसा नहीं है। राजशेखर हैं। कला-साहित्य और संस्कृति को ईमानदारी से जीने वाले अनेकानेक हैं। आखिरकार उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है।

Wednesday, April 5, 2017

'कम सून, बाबा'

यादें - रश्मि

-दिवाकर मुक्तिबोध

जिंदगी में कुछ खास तिथियां होती हैं जो ताउम्र साथ चलती हैं - शोक व आल्हाद की तिथियां। अतीत में खो जाने की तिथियां, यादों को ताजा करके प्रफुल्लित होने की तिथियां या फिर गहरे शोक में डूब जाने की तिथियां। 11 सितंबर 1964, 08 जुलाई 2010, 29 जनवरी 2012, 7 अक्टूबर 2015 और अब 22 अक्टूबर 2016। ये मेरी शोक की तिथिया हैं। 1964 को पिताजी गए, 2010 में माँ नहीं रही, 2012 में बड़ी बहन चली गई, 2015 में भाभी नहीं रही और 22 अक्टूबर 2016 को बड़ी बेटी ने साथ छोड़ दिया। अब इनकी भौतिक उपस्थिति नहीं हैं लेकिन स्मृतियां तो हैं जो हर पल, दिलों दिमाग के दरवाजे को खटखटाती हैं, अदृश्य उपस्थिति का एहसास कराती है और जीने का सहारा भी बनती हैं। 
      बेटी रश्मि को याद करता हूं। जन्म तिथि 1 सितंबर 1979। स्थान रायपुर, छत्तीसगढ़। महामाया मंदिर के परिसर में बने मकान में रहते हुए कामना की थी कि पहली संतान बेटी ही हो। इच्छा पूरी हुई। रश्मि का जन्म हुआ। सीने से लगी उस नन्ही परी के बड़े होने का अहसास तब हुआ जब उसकी शादी हुई और बाद में वह दो प्यारे-प्यारे बच्चों की माँ बनी। लगने लगा था, बड़ी हो गई थी वह। लेकिन 37 साल की उम्र क्या दुनिया से रुखसत होने की होती है? वह हम सब के जीवन में विराट शून्य छोड़कर चली गई। अपने मासूम बच्चों की जुबान में वह तारा बन गई। उनका आसमान में किसी चमकते हुए तारे को देखना यानी अपनी माँ को देखना होता है, उससे संवाद करना होता है। 
     यह कितनी विडंबना हैं कि उसकी अंतिम इच्छा पूरी नहीं हो सकी। बल्कि यों कहें हम उसे पूरा नहीं कर पाए। मौत के चंद महीने पूर्व उसने कहा था - ''मेरे शरीर के अंग, जो भी काम के हो, दान कर दिए जाए। मैंने 'उनसे' कह दिया है, बाबा आपको भी बता रही हूं, याद रखना।''  वर्ष 2015 के पूर्वाद्ध में अस्पताल के बिस्तर पर मौत से आँख मिचौली खेलते हुए उसने बहुत शांति से ये बातें कहीं थी। चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। जबकि वह जानती थी कि मौत का साया मंडरा रहा हैं। लेकिन वह लड़ रही थी। निराश या उदास होना उसके स्वभाव में नहीं था। उसमें परोपकार की भावना इतनी प्रबल थी कि वह चाहती थी यदि मृत्यु हो भी जाए तो उसके शरीर के कुछ अंग जरुरतमंदों के काम आए। 
     उसने जब ये बातें कहीं, अपने पिता से यानी मुझसे तो समझ सकते हैं कि दु:ख का कैसा सैलाब उमड़ आया होगा। उससे आँखें चुराते हुए, आँखों से टपकने को आतुर अश्रुओं को रोकते हुए मैंने कहाँ - 'तुम ठीक हो जाओगी, बेटी चिंता मत करो।' किन्तु अकाट्य सत्य मैं भी जानता था और वह भी कि अब जिंदगी का ठिकाना नहीं। कैंसर का शायद हर मरीज जानता है कि यह बीमारी चैन से जीने नहीं देती। साल-दो साल, चार-पांच साल या कुछ और अधिक बशर्ते कैंसर को समय रहते चिन्हित कर लिया जाए। पर अक्सर ऐसा होता नहीं है। पता तब चलता है जब मौत दस्तक देने लगती है। रश्मि के साथ भी ऐसा ही हुआ। डॉक्टरों ने कहा, इसे बहुत खराब कैंसर हैं। अधिक से अधिक दो-ढाई साल या बहुत हुआ तो पांच साल। पर उसे मिले जिंदगी के सिर्फ दो साल। घनघोर पीड़ा के दो साल। वह चली गई। अफसोस है कि हम उसकी अंतिम इच्छा पूरी नहीं कर सकें। इस बात का भी अफसोस है कि हमने कोशिश भी नहीं की। रायपुर मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल जहां मृत शरीर दान में लिए जाते हैं, के अधिकारियों से विमर्श नहीं किया कि क्या कैंसर से पीडि़त मरीज के अंग निर्दोष होते हंै, नीरोग होते हैं? क्या वे किसी के काम आ सकते हैं? क्या जीवित शरीर में उनका प्रत्यारोपण हो सकता हैं? और क्या जरुरतमंद मरीज एवं उसके परिजन उसे स्वीकार करने तैयार होंगे? 
दरअसल उसकी अंतिम इच्छा को शेष घरवालों से छुपाकर रखा गया था। केवल उसके और हमारे परिवार के एक-दो लोग ही इस बात को जानते थे। सब उसकी बीमारी से इतने सदमें में थे कि बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। यह कल्पना से परे की बात थी। करीब दो साल से वह मौत से लड़ रही थी। कई बार अस्पताल में दाखिल हुई, पर हमेशा लौट आई। इसलिए विश्वास था, मौत अंतत: हार जाएगी। अंग दान की नौबत नहीं आएगी। वह ठीक हो जाएगी। रश्मि, मेरी बेटी। लेकिन उसकी अंतिम इच्छा को पूरी न कर पाने का एक और बड़ा कारण भी था। उसका शरीर बहुत कमजोर हो चुका था, आँखें कटोरियों से कुछ बाहर निकल आई थी, जबड़ा आगे आ गया, पेट में पानी भर हुआ था, उसका लीवर क्षतिग्रस्त था, कैंसर के सेल्स ने अपनी वहां खास जगह बनाई थी। वह काफी फैल गया था। शरीर हड्डियों का ढांचा मात्र रह गया था। इसलिए लगता नहीं था कि शरीर कोई भाग सुरक्षित बचा होगा? ऐसे में क्या कोई अंग किसी के काम आ सकता था? शायद नहीं। यद्यपि पूरा शरीर मेडिकल कॉलेज अस्पताल को अध्ययन की दृष्टि से सौंपा जा सकता था। पर क्या इसके लिए हम तैयार थे? उसके ससुराल वाले राजी होते? दो वर्ष तक उसने इतना दर्द सहन किया था कि मृत्यु के बाद उसे और तकलीफ नहीं दे सकते थे। लिहाजा मैंने यह सोचकर अपने आपको दिलासा देने की कोशिश की कि बेटी ने अंग दान की बात कही थी, शरीर दान की नहीं। 
     लेकिन खुद को दी गई इस झूठी तसल्ली से मन कैसे शांत रह सकता है। यह अफसोस तो ताउम्र रहेगा कि मैं अपनी बेटी की अंतिम इच्छा भी पूरी नहीं कर सका जबकि वह मुझे ताकीद करके गई थी 'बाबा मेरी बात याद रखना।Ó अंदाज लगा सकते हंै - उसका हृदय कितना विराट था। कितनी प्रबल थी परोपराकार की भावना। यदि वह जीवित रहती तो आगामी 1 सितंबर 2017 को 38 साल की हो जाती। जब वह पैदा हुई, मैं बहुत खुश था। मनोकामना पूरी हुई थी। वह इस दुनिया में आ गई पर इतनी कम उम्र लेकर? कैंसर से जूझते हुए जैसी पीड़ा उसने झेली, वह देखी नहीं जा सकती थी। उफ, इतना दर्द, इतनी तकलीफ! कौन कैसे बर्दाश्त कर सकता हैं। लेकिन वह बहुत जीवट थी। लड़ती रही, आखिरी सांस तक लड़ती रही। यकीनन नहीं होता कि वह इस दुनिया में नहीं है। घर की दीवारों पर टंगी उसकी तस्वीरों के कोलाज को देखता हूं तो लगता है वे बोल पड़ेंगी और मुझे सुनाई देगा - 'बाबा, क्या चल रहा है।' फोन पर बातचीत का यह उसका तकिया कलाम था।
   स्वाभाविक रुप से हर पिता को अपनी बेटी बहुत प्यारी और मासूम लगती है। वे होती भी हैं। जीवन को खुशियों से भर देती है। रश्मि भी ऐसी ही बेटी थी। बहुत ही सीधी, सरल और शांत लेकिन पढ़ाई में उतनी ही तेज, खेलकूद में भी अव्वल। स्कूल और कॉलेज के दिनों में उसे अनेक पुरस्कार मिले। दर्जनों मेडल, ट्राफी और कप जो मेरी आलमारी में सजे हुए हंै और उसकी यादों को ताजा करते हैं। बैडमिंटन खेलती हुई रश्मि, वालीवाल खेलती रश्मि, 100-200 मीटर की दौड़ में अव्वल आती रश्मि। याद हैं - स्कूल के दिनों में एक एथलेटिक स्पर्धा में भाग लेते हुए वह 100 मीटर की रेस में अव्वल आई पर दौड़ खत्म होते ही पेट पकड़कर बैठ गई। मैं उसकी दौड़ देखने आया था। उसे संभाला। पूछने से पता चला कि वह सुबह से खाली पेट थी। कुछ भी नहीं खाया था। 13-14 साल की बेटी की तकलीफ देखकर में द्रवित हो गया। दरअसल अपने स्वास्थ्य के प्रति वह हर दर्जे तक लापरवाह थी। जब बच्ची थी, हम जोर जबरदस्ती करते थे किन्तु यह उसका स्वभाव था, अपनी नहीं अपनों की फिक्र करना, दूसरों की चिंता करना। हम उसे प्यार से डांटते, फटकारते भी थे। नसीहत देते - खाना खाते समय थाली छोड़कर उठना नहीं चाहिए। लेकिन वह कहां मानती नहीं थी। उसे तभी तसल्ली मिलती थी जब वह दूसरों को परोस देती। काम के लिए आवाज किसी और को देते थे, दौड़कर चली आती थी रश्मि।
    वह बहुत हंसती थी, बात-बात पर हंसी। कभी-कभी झुंझलाहट भी होती थी। जब उसका मजाक उड़ाते थे, तकलीफ हमें होती थी। 'रश्मि इतनी ज्यादा मत हंसा कर। पराए तो पराए अपने भी तुझ पर हंसते हैं। सामने भी और पीठ पीछे भी।' किन्तु वह अनसुनी करती। दरअसल हमेशा मुस्कराते रहना और सबकी मिजाज पुर्सी करना उसका स्वभाव था। इसीलिए अपने ससुराल में भी वह सबसे प्यारी और स्नेहिल बहू मानी जाती थी। वक्त-वक्त पर अपने विशाल परिवार के हर किसी सदस्य से बातचीत करना या टेलीफोन करके उनका हालचाल जानना उसकी दिनचर्या का एक हिस्सा था। कोई उसे फोन करें या न करें, वह जरुर हर किसी से संपर्क रखती थी। अपनी सखी-सहेलियों से, अपने कॉलेज के दोस्तों से, अपने पास-पड़ोस से और अपने परिजनों से। ऐसी थी रश्मि। 
रश्मि ने मास्टर ऑफ कम्युनिकेशन (एमसीए) में स्नातकोत्तर डिग्री ली थी। कुछ समय के लिए प्राध्यापकी की। फिर संविदा में सरकारी नौकरी उसे मिली। लेकिन जब उसकी पहली संतान होने की थी, उसने नौकरी छोड़ दी। बाकायदा नियमानुसार वेतन जमा करके इस्तीफा मंजूर करवाया। वह एक बच्चे की माँ बनी। करीब चार साल के अंतराल में उसने बेटी को जन्म दिया। अब 8 व 4 साल के दोनों बच्चे बहुत प्यारे और समझदार है। उन्होंने मान लिया है कि उनकी माँ तारा बन गई है। रात कैसी भी हो, अंधेरी या उजियारी, वह किसी चमकदार सितारे को देखकर कहते हैं - देखों, वह हमारी माँ। जब वे ऐसा कहते हैं तो कलेजा मुंह को आ जाता है। दर्द की लकीरें हम सुनने वालों को झंझोड़ती है। क्यों हमें छोड़कर गई रश्मि। क्यों?
     रश्मि ऐसा ही सवाल हमसे भी करती थी? कहती थी 'आई' - बाबा आखिर मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है? मैंने क्या किया? क्यों मैं ऐसी बीमार पड़ी? कैंसर मुझे क्यों?' हम क्या जवाब देते। दुहराते थे बेटा चिंता न करो ठीक हो जाओगी। हम हैं न तुम्हारे साथ। किन्तु हम स्वयं आशंकित थे। डरे हुए थे। हमने गुगल सर्च करकें 'कोलोंजियो कार्सिनोमा' के बारे में जानकारी हासिल की थी। इस बीमारी से ग्रस्त लोगों को बमुश्किल दो-ढाई साल या अधिक 5 की जिंदगी मिलती है। विश्व में इसके बहुत उदाहरण भी नहीं है। प्राय: उम्रदराजों को ही यह बीमारी पकड़ती है। लेकिन रश्मि तो युवा थी, वह कैसे और क्यों इसके गिरफ्त में आई? किसी के पास जवाब नहीं था। वर्ष 2014 के आखिरी महीनों में पेट दर्द, अपचन, पसली में दर्द से बीमारी की शुरुआत हुई। आराम न मिलने पर विशेषज्ञों से सलाह ली गई, फिर कुछ और टेस्ट हुए। कुछ आशंकाएं सामने आई। सीटी स्केन के बाद डॉक्टरों ने आगे के परीक्षण के लिए मुंबई, हैदराबाद या दिल्ली जाने की सलाह दी। मुंबई के बड़े अस्पताल में एमआरआई, सीटी स्केन, पेट स्केन आदि से पता चला लीवर का कैंसर हैं। मेडिकल शब्दावली में कोलोंजियो कार्सिनोमा, जिसने तीसरी स्टेज पार कर ली हैं। 
    कैंसर कन्फर्म हुआ और हम सब की जान सूख गई। लेकिन रश्मि अविचलित रही। कैंसर की भयावहता के बावजूद वह ज्यादा फिक्रमंद नहीं थी। उसका विश्वास था कि वह इस जानलेवा बीमारी से लड़ लेगी। बीमारी के बारे में उससे कुछ भी छुपाना मुश्किल था क्योंकि वह अपनी सारी मेडिकल रिपोर्ट खुद देखती थी, डॉक्टरों से खोद-खोदकर बीमारी के बारे में सवाल जवाब करती थी। हम बहुत चिंतित थे क्या किया जाए। टाटा मेमोरियल ने कैंसर हिस्ट्री देखकर हाथ खड़े कर दिए थे। उसके परिवार में विचार चल रहा था कि ऑपरेशन करवाया जाए अथवा नहीं। कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी अस्पताल के विशेषज्ञ डॉक्टरों की राय थी कि ऑपरेशन करना चाहिए। युवा है, ठीक होने की संभावना है। तय हुआ ऑपरेशन में जाएंगे। रश्मि का लगभग 7 घंटे ऑपरेशन चला। ऑपरेशन थियेटर में जाने के लिए पूर्व वह शांत और निर्भीक थी। आश्चर्य था इतनी घातक बीमारी के बावजूद वह कैसे एकदम सामान्य रह सकती हैं। किन्तु उसमें गजब का धैर्य था, जबरदस्त मनोबल था। वह घबराई नहीं। पर हम घबराए हुए थे। ऑपरेशन जटिल था। कामयाब रहा, हमारी तात्कालिक चिंता मिट गई। 
    उसके बाद अगले 6 महीने, मार्च से अगस्त तक बहुत तकलीफदायक थे। कीमो थेरेथी बड़ी कष्टकारी थेरेपी है। पर उसने सारी तकलीफें झेली। बहुत दर्द सहन किया। रातें बेचैनी में काटी किन्तु उसने आत्मविश्वास नहीं खोया। वह लड़ती रही। उसके संघर्ष को देखकर हमें भी भरोसा होने लगा। चमत्कार की हमारी उम्मीदें बढ़ गईं। कीमो के 6 चक्र पूर्ण होने के बाद धीरे-धीरे वह ठीक होती गई। सिर के झड़े हुए केश वापस आने लगे। चेहरा खिलने लगा, शरीर में ताकत लौट आई। स्वस्थ दिखाई देने लगी। उसकी नियमित दिनचर्या शुरु हो गई। घर का सारा काम, रसोई और फिर बच्चों की पढ़ाई। वह बाहर जाने लगी थी। अकेले ट्रेन का सफर करने लगी थी। उसे देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वह कैंसर जैसी घातक बीमारी से उठी है। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार दिसंबर 2015 में उसे स्वास्थ्य परीक्षण के लिए मुंबई जाना था। वह गई। जिस दिन उसे पेट स्केन की रिपोर्ट मिली, वह बेहद खुश थी। हंसते खिलखिलाते हुए उसने हमें फोन पर बताया - 'बाबा रिपोर्ट नार्मल आई है। मैं बिल्कुल ठीक हो गई हूं।' स्वाभाविक था हम भी बेहद खुश हुए। उसके संघर्ष को सलाम किया और ईश्वर को धन्यवाद दिया कि हमारी बेटी ने जिंदगी की जंग जीत ली है। 
    किन्तु ये खुशियां टिकाऊ साबित नहीं हुई। दो महीने बीते भी नहीं थे कि उसे पुन: पेट व पीठ दर्द शुरु हो गया। मन पुन: आशंकाग्रस्त हुआ। जब दर्द असहनीय होने लगा तब मुंबई से टेलीफोन पर डॉक्टर के परामर्श पर इलाज शुरु हुआ। हैवी पेनकिलर्स के डोज के बावजूद आराम नहीं हुआ तो फिर अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। तबियत कुछ संभली तो घर लौट आई। लेकिन चंद दिन बीते नहीं थे कि फिर वही कहानी। इस दौरान मैंने उससे बार-बार कहा - बेटी हमें मुंबई जाना चाहिए। किसी रात जब मैंने यही बात दुहराई तो उसका धैर्य जवाब दे गया। वह बेकाबू हो गई। फूट फूटकर रोने लगी। रोते हुए उसने कहा - ''बाबा मुझे कैंसर नहीं है। आप मानते क्यों नहीं कि मैं ठीक हो गई हूं। क्यों मुझे आप बार-बार मुंबई जाने कहते हैं।'' उस दिन वह मेरे अपने घर में थी। आंसू बहाते हुए अपने कमरे में चली गई। उसे रोते देखकर मैं स्तब्ध रह गया। उसकी पूरी जिंदगी में मैंने कभी उसे यूं रोते हुए नहीं देखा था। बचपन में भी नहीं। दरअसल वह कभी ऐसा काम नहीं करती थी कि डांट खानी पड़े। उसे देर तक रोता देखकर मुझे अपने आप पर गुस्सा आने लगा। बहुत पछतावा हुआ - ऐसा क्यों कहां मैंने उससे। पर उसकी हालत देखकर मैं आशंकाग्रस्त था और चाहता था डॉक्टरों से परामर्श के लिए तत्काल मुंबई रवाना होना चाहिए। मैं उसके शांत होने का इंतजार करता रहा। करीब आधे घंटे बाद वह सामान्य हुई। मेरे पास आई बोली - 'बाबा चिंता न करो, मुझे अब कैंसर नहीं है। मैं ठीक हूं। आप बहुत चिंता करते हैं। ठीक हैं, मैं चली जाऊंगी बाम्बे।'
सोचता हूं काश, उसका यह विश्वास कायम रहता। भारी मन से उसे मुंबई ले जाया गया। अम्बानी हॉस्पिटल में फिर उसका इलाज शुरु हुआ। एमआरआई, पेट स्केन और तमाम क्लीनिकल टेस्ट। हम रायपुर में बैठे-बैठे ईश्वर से प्रार्थना करते रहे, रिपोर्ट नार्मल आए। लेकिन इस बार ईश्वर के दरबार में हमारी प्रार्थना कबूल नहीं हुई। मुंबई से फोन आया - 'कैंसर के 3-4 ट्यूमर फिर डेवलप हो गए हैं। अब ऑपरेशन संभव नहीं। पुन: कीमो में जाना पड़ेगा। हम लौट रहे हैं।' पेट स्केन की रिपोर्ट रश्मि के विश्वास पर सबसे बड़ा झटका था। पहले दौर में कैंसर कनफर्म होने के बावजूद वह घबराई नहीं थी। उसने बड़े साहस और धैर्य के साथ पस्थितियों का मुकाबला किया था। कीमो, रेडियेशन, तरह-तरह की दवाइयां, भारी भरकम इंजेक्शन और असहनीय दर्द से मुकाबला करके वह ठीक हो गई थी। यह उसकी जिजीविषा थी, उसका नैतिक बल था, न घबराने की मनोवृत्ति थी और भरोसा था कैंसर के विरुद्ध जंग जीतने का। वह जीत गई थी, हम सभी जीत गए थे किन्तु यह जीतकर भी हारने वाली बात थी। उसका यह विश्वास तब खंडित हो गया था, जब उसे पता चला कैंसर ने पीछा नहीं छोड़ा है। वह टूट गई। उसे लगने लगा था अब जिंदगी चंद दिनों की, चंद महीनों की। लेकिन उसने शायद जिंदगी के साथ समझौता कर लिया था। उसने जाहिर नहीं किया कि वह विचलित हैं। जब वह रायपुर लौटी। हम विमानतल पर उसे लेने गए। वह थकी-थकी सी थी। फिर भी चेहरे पर मुस्कान लाते हुए उसने फिर कहा - 'चिंता न करो, बाबा मैं ठीक हो जाऊंगी।' वह बहुत दुबली हो गई थी। हमें डर लगने लगा था कि पुन: कीमो थेरेपी को कैसे झेल पाएगी। पर कमजोर शरीर के बावजूद कीमो के तीन चक्र उसने झेले, चौथा आधा कर पाई क्योंकि शक्ति इतनी क्षीण हो गई थी बर्दाश्त करना नामुमकिन था। डॉक्टरों ने मना कर दिया। कीमो बंद करना पड़ा।
    अब उसकी हालत देखी नहीं जाती थी। उसके दोनों हाथों की नसे सूख गई थी, सलाइन चढ़ाने वे बमुश्किल मिलती थी। डॉक्टर सुई चुभो-चुभो कर उसे ढूंढने की कोशिश करते। ऐसी कोशिशों के दौरान अतुलनीय पीड़ा उसे झेलनी पड़ती थी। बहुत त्रासद दौर था। अंतिम दो-तीन महीने तो बेहद कठिन थे। 6 महीने से वह सुबह-शाम दोनों वक्त एक ऐसा पेन किलर इंजेक्शन ले रही थी जो अधिक लेने पर नुकसानदेह था। लेकिन दर्द से छुटकारा पाने के लिए यही एक सहारा था। मार्फिन की स्ट्रांग गोलियों का डोज भी धीरे-धीरे बेअसर साबित हो रहा था। वह बेहद कमजोर हो गई थी। पैरों में सूजन की वजह से वे लकड़ी की बल्लियों जैसे ठोस हो गए थे। वह उन्हें उठा नहीं सकती थी। तबियत तब और खराब हो गई जब पेट में पानी भरना शुरु हुआ। दो बार सर्जरी से पानी निकाला गया। किन्तु ऐसा कब तक चलता लिहाजा कैथेड्रल लगा दिया गया। हालत इतनी खराब हो गई कि करवट लेना मुश्किल हो गया। अंतिम महीना तो बेहद दर्द भरा था। तो वह लेट भी नहीं पाती थी। बैठे-बैठे झपकियां लेती थी। 
    22 अक्टूबर 2016 की पूर्व रात्रि उसने मुझे अपने घर रुकने के लिए कहा। चूंकि पत्नी साथ में थी, मैंने कहा इन्हें छोड़ने जाना पड़ेगा। सुबह जल्दी आ जाऊंगा। अगले दिन सुबह 8 बजे मैं उसके घर पहुंच गया। उससे मिला। उसके चेहरे पर पूर्व जैसी मुस्कुराहट आई। मैंने भी मुस्कराने की कोशिश की। कुछ देर उसके पास बैठा रहा। उसने फिर कहा - 'बाबा बाहर बैठो स्पजिंग करनी है।Ó मैं बाहर आया। कुछ देर बैठा और फिर अपने एक मित्र से मिलने चला गया। करीब घंटे भर बाद लौटा तो नर्स ने बताया अभी तैयार नहीं हुई है। स्पजिंग चल रही है। मैं जल्दी लौटने की बात कहकर घर के लिए निकल गया। लेकिन 7 किलोमीटर दूर सड्डू स्थित अपने घर तक पहुंच भी नहीं पाया था कि उसके यहां से फोन आया - पेट में लगा पाइप निकल गया है, पानी बह रहा है। जल्दी आइए - अस्पताल ले जाना पड़ेगा। मैं अपने भाई के साथ उल्टे पांव लौटा। घर पहुंचा ही था कि एम्बुलेंस आ गई, हम उसे लेकर सरकारी अस्पताल पहुंच गए। 
    22 अक्टूबर को प्रात: 11 बजे वह अस्पताल में थी। होशो-हवास में। करीब एक घंटे बाद उसे ऑपरेशन थियेटर ले जाया गया। लगभग डेढ़ घंटे बाद जब उसे बाहर लाया गया तो वह अद्र्धचेतनावस्था में थी। मुंह पर आक्सीजन मास्क लगा हुआ था। पेट में फिर से पाइप लगा दिया गया था और कंधे पर सर्जरी के जरिए सेंट्रल लाइन। हालत बेहद खराब दिख रही थी। वह बार-बार मास्क हटाती थी। उसे रोकना पड़ता था। 
    गंभीर स्थिति के बावजूद हमने उम्मीद नहीं छोड़ी थी लेकिन मन फिर भी आशंकित था। जब उसके भाई का लखनऊ से फोन आया तो मेरे मुंह से अनायास निकला - '24 घंटे, 24 दिन या 24 महीने। कुछ भी कह पाना मुश्किल हैं। बेहतर है आ जाओ।Ó
डॉक्टरों ने कहा स्थिति गंभीर है पर मन मानने को तैयार नहीं था। विश्वास था कि वह संकट से उबर आएगी और घर लौटेगी, अपने बच्चों के पास। ऐसा नहीं हो सका। रात 11 बजे के आसपास वह चल बसी। मैं उस वक्त उसके पास नहीं था। मेरे साथ ऐसा तीसरी बार हुआ। पता नहीं यह कैसा दुर्योग है। वर्ष 2010 में जब माँ अंतिम सांसे गिन रही थी, मैं पल भर के लिए उसके पास से हटा और वह चली गई। बड़ी बहन के साथ भी ऐसा ही हुआ। और अब बेटी। रात में अस्पताल में रुकने की दृष्टि से मैं सामान लेने घर आया था और जब वापस अस्पताल पहुंचा तो 5 मिनट पूर्व ही उसकी सांसे थम गई थी। उसकी मृत काया देखकर अजीब सा खालीपन महसूस हुआ। आँखें भर आई - बरसने लगी। वह इतने जल्दी चली जाएगी, उम्मीद नहीं थी। हम जानते थे उसका कैंसर बहुत घातक है, कुछ भी हो सकता है लेकिन इसके बावजूद मन नहीं मानता था कि वह आखिरी सफर पर क्यों निकल जाएगी। जीने के लिए जैसा संघर्ष उसने किया, अपरिमित दर्द को बर्दाश्त किया, वह असाधारण था। 18 अक्टूबर को यानी प्राणांत के 3 दिन पहले मेरे मोबाइल पर उसका अंतिम संदेश था 'कम सून बाबा।' अब इस संदेश से रोज गुजरता हूं। प्राय: रोज पढ़ता हूं। ऐसा लगता है रश्मि अपने घर पर हैं और मुझे बुला रही है। हम जानते है कि अब उसकी दैहिक उपस्थिति नहीं है पर हमारे दिलोदिमाग में उसका बचपन, उसकी युवावस्था, उसका हंसता-मुस्कराता चेहरा बसा हुआ है। और फोन पर उसका प्रारंभिक संबोधन - 'क्या चल रहा है बाबा।' कानों में गूंजता हैं।

Friday, February 10, 2017

बस्तर ने देखा अब तक का सर्वाधिक बुरा दौर

-दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. रमन सिंह का तीसरे कार्यकाल का उत्तरार्ध लोकप्रियता की अब तक की जमा-पूंजी पर पानी फेरता नजर आ रहा है। बीते एक-दो वर्षों में चंद घटनाएं ऐसी हुई हैं जो यह अहसास कराती हैं कि वे प्रसिद्धि के शिखर से नीचे उतर रहे हैं और अब एक थके हुए राजनेता हैं। ऐसे राजनेता जिसकी नौकरशाही पर पकड़ लगभग समाप्त हो चुकी है और उसकी मनमानी का खामियाजा जनता के साथ जनप्रतिनिधि के रूप में उन्हें भी भुगतना पड़ रहा है। मसलन बस्तर में नक्सल मोर्चे पर राज्य शासन की वर्ष 2014 से जनवरी 2017 तक अगुवाई करते रहे घोर विवादास्पद आईजी पुलिस एस.आर.पी. कल्लूरी को जबरिया छुट्टी पर भेजना, आनन-फानन में डीआईजी सुंदरराज पी को बस्तर आईजी का चार्ज देना, तीन-चार दिन के भीतर ही छुट्टियां रद्द करके कल्लूरी का काम पर लौटना, उनकी पुलिस मुख्यालय में बिना किसी प्रभार के पदस्थापना करना, केन्द्र के निर्देश पर भ्रष्ट आईपीएस राजकुमार देवांगन की बर्खास्तगी, बस्तर में दर्जनों पुलिस मुठभेड़, नक्सली होने के शक में एक मासूम बच्चे से अनेक निर्दोष आदिवासियों की हत्याएं, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार और उनके घर जलाने जैसी कई घटनाओं के अलावा मानवाधिकारवादियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं व पत्रकारों को प्रताडि़त करने, उनके खिलाफ केस दर्ज करने, उन्हें जेल में डालने तथा बस्तर छोडऩे का हुक्म सुनाने जैसे मामले आए दिन सुर्खियों में रहे। बस्तर संभाग में घटित ये घटनाएं जनसरोकारों के प्रति प्रतिबद्ध राज्य सरकार की मौजूदा कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह खड़े करते रही है और इसका सीधा असर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की प्रतिष्ठा, ख्याति व उनकी साफ-सुथरी राजनीतिक छवि पर पड़ता दिखाई दे रहा है। क्या यह माना जा सकता है कि इन्हीं वजहों से उत्तरप्रदेश के प्रतिष्ठापूर्ण चुनाव में भाजपा की प्रचारकों की सूची से रमन सिंह गायब हैं जबकि उन्हीं की तरह तीसरा कार्यकाल पूरा कर रहे म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान घोषित 40 प्रचारकों की सूची में स्थान पा गए हैं। यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या रमन सिंह तीसरा कार्यकाल पूरा कर पाएंगे? पार्टी की चौथी पारी के लिए राज्य विधानसभा का चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा जाएगा अथवा नहीं? क्या यह भाजपा की आंतरिक राजनीति में किसी बदलाव की सुगबुगाहट है?
देश के जिन राज्यों में भाजपा की सरकार है, रमन सिंह उनमें श्रेष्ठ माने जाते हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ को विकास के मामले में नई पहिचान दी है। विशेषकर पिछड़े इलाकों में, आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में सरकार के कामकाज को राष्ट्रव्यापी सराहना मिली है लेकिन हाल ही के वर्षों में बस्तर में नक्सल मोर्चे पर पुलिस की रणनीति लोकतांत्रिक दायरे से बाहर रही और जिसने मुख्यमंत्री को जनता के सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया जिसमें एक महत्वपूर्र्ण सवाल था एक सहृदय मुख्यमंत्री लंबे समय तक खामोशी के साथ बस्तर में पुलिस का तमाशा क्यों देखते रहे? यकीनन रमन सिंह स्वयं तानाशाह नहीं हैं पर सरकार में तानाशाही को पनपने का मौका देते रहे हैं। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है आईपीएस एसआरपी कल्लूरी जिन्हें बस्तर में नक्सलियों से निपटने के नाम पर कुछ भी करने की छूट दे दी गई थी। इस 'फ्री हैंडÓ की वजह से, जिससे इंकार करने का पूरा अधिकार राज्य सरकार के पास है और वह करती भी रही है, बस्तर में ऐसा तांडव मचा कि इसकी गूंज देश-विदेश तक पहुंच गई। छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या कोई आज की नहीं है, 40 वर्षों से राज्य इसका दंश झेल रहा है। इस दौरान सैकड़ों आदिवासी नक्सली हिंसा के शिकार हुए। इसके बावजूद पुलिस पर जनता का भरोसा कायम रहा हालांकि मानवाधिकारों के उल्लंघन की घटनाएं और दमनात्मक कार्रवाइयों की खबरें तब भी आती रहीं। लेकिन जब हिंसा का जवाब हिंसा से देने और विरोध के लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने की नीति अपनाई गई तो जाहिर है पुलिस में तानाशाही को जड़ें जमाने का अवसर मिल गया और बस्तर में आईपीएस कल्लूरी इसके पहले शिखर पुरुष बने जिन्हें अंतत: राज्य शासन को वहां से हटाना पड़ा। 
बस्तर में कल्लूरी के नेतृत्व में जो कारनामे हुए उनके सकारात्मक-नकारात्मक दोनों पहलू हैं। सकारात्मकता यह रही कि पुलिस व अद्र्ध सैनिक बलों के दबाव की वजह से माओवादी बैकफुट पर आ गए। कई बड़े नक्सली कमांडर मारे गए या छत्तीसगढ़ से पलायन करने बाध्य हुए। नक्सली वारदातों की कमी आई और सैकड़ों नक्सली समर्थकों, माओवादियों और उनके कतिपय बड़े सरगनाओं ने पुलिस के आगे हथियार डाल दिए। इससे पुलिस का मनोबल बढ़ा लेकिन इसके एवज में इतना जबरदस्त नुकसान हुआ कि बस्तर में लोकतंत्र की जड़ें हिल गईं। यह भीषण नकारात्मकता रही। फर्जी मुठभेड़ों में दर्जनों आदिवासी मारे गए, उनके घर जला दिए गए, महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ और इस सच को उजागर करने की कोशिश करने वालों पर पुलिस का कहर टूट पड़ा। मानवाधिकारवादी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकारों पर इतना जुल्म इसके पूर्व कभी नहीं ढाया गया था। उन्हें बस्तर छोडऩे का हुक्म नहीं सुनाया गया था, उन्हें बस्तर आने से रोका नहीं गया था। हद तो तब हो गई जब माओवादियों के प्रति सहानुभूति रखने के आरोप में, बस्तर का माहौल खराब करने के आरोप में, नक्सलियों को नैतिक समर्थन देने के आरोप में उनके खिलाफ समानांतर संगठन 'अग्निÓ को खड़ा किया गया जो अघोषित रूप से पुलिस के कार्यों को अंजाम देता रहा है। लगभग समूचे बस्तर में पुलिस के जवानों ने माओवादिओं को समर्थन देने के आरोप में सामाजिक कार्यकर्ताओं के पुतले जलाए, प्रदर्शन किया। ऐसी घटनाएं नक्सली हिंसाग्रस्त बस्तर में कभी नहीं देखी गई थी। सामाजिक कार्यकर्ताओं व मानवाधिकारवादियों के खिलाफ चलाए गए इस सुविचारित अभियान का व्यापक विरोध हुआ। और इस असफलता की छींटे जाहिर है, अंतत: मुख्यमंत्री रमन सिंह पर पड़ रहे हैं। हालांकि सरकार का अभी भी दावा है कि नक्सल समस्या दो-तीन वर्षों के भीतर समाप्त हो जाएगी। 
याद करें वर्ष 2007 में ऐसी ही एक कोशिश डॉ. विनायक सेन को जनसुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार करके जेल भेजने के रूप में हुई थी। उन पर माओवादी समर्थक होने एवं उनके लिए कार्य करने का आरोप था। यानी पुलिस के अनुसार वे सफेदपोश माओवादी थे। सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय डॉ. सेन की अंतरराष्ट्रीय ख्याति थी। उनकी गिरफ्तारी की गूंज देश की सीमाएं पार कर गईं। भारत सहित विश्वभर के प्रखर बुद्धिजीवियों एवं कुछ नोबल पुरस्कार विजेताओं ने राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय मंचों से उनकी गिरफ्तारी की निंदा की। हाई कोर्ट से सजा प्राप्त डॉ. सेन लंबे समय तक जेल में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट से जमानत पर छूटे। उनका प्रकरण अभी खत्म नहीं हुआ है। दस वर्ष पूर्व घटित इस चर्चित मामले से कहीं अधिक गंभीर मामले पिछले दो-तीन वर्षों के भीतर उन लोगों के खिलाफ दर्ज किए गए जिन्होंने नक्सलवाद खत्म करने के सरकार के तथाकथित अभियान के दौरान पुलिस ज्यादतियों एवं उसकी दमनात्मक कार्रवाइयों का विरोध किया। बस्तर में स्थिति यह है कि पुलिस की आलोचना करने का अर्थ है माओवादियों का समर्थक होना, शांति भंग करना, पुलिस की कार्रवाई में बाधा डालना और लोगों को भड़काना। इस सबके बीच सर्वाधिक दयनीय स्थिति उन मीडियाकर्मियों की हैं जो वहां तलवार की धार पर काम कर रहे हैं और सच को सच कहने की हिम्मत जुटा रहे हैं। 
पिछली चंद घटनाओं को लें। राज्य सरकार को पहला धक्का तब लगा जब सुकमा जिले के ताड़मेटला, तिम्मापुर व मोरपल्ली गांव में 11 से 16 मार्च 2011 के दौरान घटित आगजनी, बलात्कार व हत्या के मामले में सीबीआई ने सुरक्षा बलों को जिम्मेदार ठहराया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई को यह मामला सौंपा गया था जिसकी रिपोर्ट 2016 में पेश की गई। इस घटना में इन गांवों के 252 झोपडिय़ों को जलाया गया, आदिवासियों से मारपीट की गई, 3 महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ और तीन की हत्या कर दी गई। घटना के बाद कल्लूरी इसमें फोर्स का हाथ होने से इंकार करते रहे लेकिन सीबीआई की रिपोर्ट में उनका झूठ सामने आ गया। नक्सल मोर्चे पर अप्रतिम सफलता का दावा करने वाली राज्य सरकार पर आफत तब और टूट पड़ी जब 7 जनवरी 2017 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने उसे परोक्ष रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए नोटिस जारी किया। इस नोटिस के बाद मानवाधिकार पर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सुर बदल गए वरना वे हिंसा की प्राय: प्रत्येक घटना के बाद मानवाधिकारवादियों के हस्तक्षेप पर तंज कसते थे और उनसे अपील करते थे कि उन्हें बस्तर में आकर वस्तुस्थिति का जायजा लेना चाहिए।
बहरहाल पिछले डेढ़-दो वर्षों में कल्लूरी की कार्यप्रणाली पर हथौड़े चलने के बावजूद राज्य सरकार आश्वस्त थी कि जिस तरह उन्होंने सरगुजा से नक्सलवाद को खत्म किया उसी तरह वे बस्तर से भी नक्सलियों का सफाया कर देंगे। फिर कल्लूरी ने 1 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रायपुर विमानतल पर अगुवाई करते हुए उनसे कहा था कि वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के पूर्व बस्तर संभाग नक्सलमुक्त हो जाएगा। राजनीतिक दृष्टि से यह सरकार को गद्गद् करने वाली बात थी। तमाम विरोध के बावजूद सरकार बस्तर में पुलिस के अभियान से वैसे भी संतुष्ट थी लिहाजा कल्लूरी को अभयदान मिला हुआ था लेकिन बेला भाटिया प्रकरण ने सरकार को हिला दिया। जगदलपुर में रहने वाली सामाजिक कार्यकर्ता बेला को 23 जनवरी 2017 को 24 घंटे के अंदर बस्तर छोडऩे की धमकी दी गई। बस इस घटना के बाद कल्लूरी की उल्टी गिनती शुरू हो गई। इस घटना का देशव्यापी विरोध हुआ। घटना की गंभीरता का अहसास होते ही राज्य सरकार के मुख्य सचिव, डीजीपी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को जगदलपुर जाकर बेला भाटिया से मिलना पड़ा। सरकार ने उन्हें पूर्ण सुरक्षा का आश्वासन दिया। 31 जनवरी 2017 को देश के 125 प्रख्यात पत्रकारों-संपादकों, अर्थशास्त्रियों, फिल्मकारों एवं सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकीलों ने एक संयुक्त बयान जारी करके बस्तर में कानून के राज की मांग की। बस्तर किस कदर गर्म था इसकी झलक उनकी इस अपील से मिलती है जिसमें कहा गया था कि दबंगई पर उतारू कानून व मानवाधिकार का सम्मान न करने वाले किसी भी समूह को राज्य की ओर से समर्थन न दिया जाए तथा सुरक्षा बल व राज्य की अन्य संस्थाएं कानून व संविधान के दायरे में रहकर काम करें। इशारा स्पष्टत: कल्लूरी, उनकी पुलिस व उनके द्वारा घोषित संगठन 'अग्निÓ की ओर था। अपील जारी करने वाली इस विज्ञप्ति पर हस्ताक्षर करने वाले सभी अपने-अपने क्षेत्र में प्रख्यात हैं जैसे- अरुंधती राय, इंदिरा जयसिंह, जावेद अख्तर, मृणाल पांडे, नंदिता दास, रामचन्द्र गुहा, शबाना आजमी, शर्मिला टैगोर, सुनीता नारायण आदि। 
मुख्यमंत्री रमन सिंह चिंतित है। पिछले कार्यकाल में इतनी निर्मम स्थितियों का उन्हें कभी सामना नहीं करना पड़ा था। सवाल अगले चुनाव का है, भाजपा के निरंतर चौथे कार्यकाल का है। बस्तर की घटनाओं पर देशव्यापी तीखी प्रतिक्रिया से चिंता स्वाभाविक है। यह प्रतिक्रियाओं का ही परिणाम है कि उन्हें बस्तर में मानवाधिकार संरक्षण के लिए राज्य स्तरीय एवं जिलेवार समितियां गठित करने का फैसला लेना पड़ा। लेकिन सवाल किसी की जीत, किसकी हार का नहीं है। सवाल है बस्तर में आदिवासियों की सुरक्षा का, उनके अधिकारों के संरक्षण का, उनके स्वास्थ्य का, शिक्षा का, उनके जीवन को सुगम बनाने का, उन्हें हर तरह के शोषण से मुक्त करने का और जीवन निर्वाह के लिए यथोचित बंदोबस्त का यानी सर्वांगीण विकास व मुख्यधारा से जोडऩे का और जागरुकता का। यह भी देखना होगा कि बस्तर में कोई दूसरा कल्लूरी पैदा न किया जाए और जहां तक मानवाधिकार की बात है, जिंदाबाद कहने का हक सभी को है पर इसके लिए वातावरण बनाने की जिम्मेदारी सामाजिक कार्यकर्ताओं व मानवाधिकारवादियों की भी है, केवल सरकार की नहीं।
(लेखक पायनियर रायपुर के सलाहकार संपादक हैं)

Monday, January 9, 2017

उत्पाद लुटाने की नौबत दुबारा न आए

-दिवाकर मुक्तिबोध
यह कितनी विचित्र बात है कि छत्तीसगढ़ में कृषि के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्यों के लिए राज्य सरकार राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजी जाती रही है लेकिन राज्य के किसान एक तो ऋणग्रस्तता की वजह से आत्महत्या करते रहे हैं या फिर अपनी उपज मुफ्त में या औने-पौने दामों में बेचने के लिए मजबूर हैं। किसानों की यह पुरानी मांग है कि उत्पादन लागत को देखते हुए धान का समर्थन मूल्य बढऩा चाहिए। भाजपा सरकार ने अपनी तीसरी पारी शुरू करने के पूर्व, अपने चुनावी घोषणापत्र में किसान जनता से वायदा भी किया था कि समर्थन मूल्य 2१00 रु. प्रति क्विंटल कर दिया जाएगा तथा किसानों को 300 रुपए प्रति क्विंटल की दर से बोनस भी दिया जाएगा। किंतु अब तक ऐसा नहीं हो सका और अब इसकी गुंजाइश भी खत्म हो गई है। हालांकि इस मुद्दे को कांग्रेस अभी भी गर्म रखने की कोशिश कर रही है। बहरहाल यह तो धान की बात हुई लेकिन अब साग-सब्जी उत्पादक भी उत्पादन और खपत के बीच असंतुलन की वजह से परेशान हैं। परेशानी की वजह लागत मूल्य में वृद्धि, महंगा परिवहन, बिचौलियों की मनमानी, उत्पादन में बढ़ोतरी और फिलहाल एक हद तक नोटबंदी रही है। पिछले दशक से टमाटर उत्पादन का रकबा काफी बढ़ा है किंतु ऐसी नौबत कभी नहीं आई कि किसानों को टनों टमाटर बीच सड़क पर फेंकने पड़े हों या टनों सब्जियां राजधानी रायपुर में मुफ्त बांटनी पड़ी हों। जशपुर के लुडेग में और दुर्ग जिले के धमधा में जब किसानों से बिचौलियों ने 25-30 पैसे प्रति किलो से अधिक दाम देने से इंकार कर दिया तब उत्पादकों ने अपना रोष टमाटर नष्ट करके जाहिर किया। इसी तरह राजधानी रायपुर में लाखों की सब्जियां मुफ्त में बांट दी। ऐसा दृश्य राज्य में पहले कभी देखने में नहीं आया था। हालांकि दो-ढाई दशक पूर्व टमाटर की कीमत को लेकर कुछ ऐसी स्थिति बनी थी जब कांग्रेस के नेता एवं तत्कालीन विधायक तरुण चटर्जी ने नगरघड़ी चौक में ट्राली में खड़े होकर मुफ्त में टमाटर बांटे थे हालांकि यह किसानों के प्रति उनकी हमदर्दी कम राजनीतिक नौटंकी ज्यादा थी। यकीनन राज्य में टमाटर के विपुल उत्पादन व बाजार की अर्थव्यवस्था के कारण यह समस्या दशकों पुरानी है जिसका कोई इलाज अब तक नहीं हो सका है।
       दरअसल पुरस्कार हासिल करना अलग बात है और जमीनी हकीकत से रुबरु होना अलग है। सरकार की नींद तब खुलती है जब पानी सिर के उपर से गुजरने को होता है। किसानों के साथ ऐसा ही हो रहा है। कहने के लिए कृषि का अलग बजट बनता है, कृषि एवं इससे संबंधित कार्यों के लिए भारीभरकम राशि का प्रावधान रहता है, सरकार किसानों की हमदर्द बनने का दावा करती है किंतु उनकी समस्याएं कम होने के बजाए और कठिनतर हो जाती है, हो गई है वरना बड़ी संख्या में आत्महत्या की घटनाएं नहीं होती। राज्य बनने के पूर्व ऐसा कभी नहीं सुना नहीं गया था कि किसान ऋण के बोझ की वजह से खुदकुशी कर रहे हो या भुखमरी के शिकार हो रहे हों। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ में एक वर्ष में 954 किसानों ने जान दी। औसत निकालें तो प्रतिदिन दो से अधिक किसानों ने आत्महत्या की। आत्महत्या के कारण और भी हो सकते हैं लेकिन भूलना नहीं चाहिए कि मरने वाले पेशे से किसान थे। मौतों का यह आंकड़ा चौकाने वाला है लिहाजा कृषि एवं कृषकों से संबंधित समस्याओं के तेजी से निपटारे की जरूरत है।
सब्जी उत्पादकों की कठिनाइयों की ओर राज्य सरकार का ध्यान तब गया जब उत्पादकों ने सड़कों पर टमाटरों की परत बिछा दी और मुफ्त में सब्जियां बांटी। कैबिनेट की 3 जनवरी 2017 की हुई बैठक में मुख्यत: किसानों की बदहाली का मुद्दा छाया रहा। नौकरशाहों की ओर से यह कहा गया कि खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों की स्थापना से ही कृषि संकट से निपटा जा सकता है। मुख्यमंत्री ने किसानों के लिए नई नीति बनाने के निर्देश दिए और यह तय किया गया कि कृषि, उद्यानिकी व उद्योग विभाग संयुक्त रूप से इसे तैयार करेंगे। नई नीति क्या होगी यह कैबिनेट की अगली बैठक में स्पष्ट होगा और जाहिर है राज्य के प्रस्तावित बजट में इसे शामिल किया जाएगा। फौरी तौर पर सब्जी उत्पादकों को राहत देने की दृष्टि से सरकार ने सौ कोल्ड स्टोरेज की स्थापना की घोषणा की है पर जाहिर है यह समस्या का हल नहीं है। लघु उत्पादकों को इससे कोई राहत नहीं मिलेगी क्योंकि यह प्राय: निश्चित है सरकारी सुविधाओं का दोहन वे ही करते हैं जो आर्थिक दृष्टि से सक्षम रहते हैं।
    राहत उपायों के सन्दर्भ में सहकारिता पर भी विचार किया जाना चाहिए। सब्जी उत्पादकों को सही मूल्य मिले और वे बिचौलियों के चंगुल से आजाद हो, इसके लिए काफी पहले, कोई दो-ढाई दशक पूर्व जिला प्रशासन की ओर से एक व्यवस्था की गई थी। व्यवस्था थी सहकारिता के माध्यम से किसानों से उनके उपज की खरीदी की। इसके लिए एक सहकारी समिति बनाई गई थी जिसका कार्यालय राजधानी के शास्त्री मार्केट में खोला गया था। प्रारंभ सुखद था किंतु धीरे-धीरे इसका कामकाज ठंडा पड़ता गया। जबकि सहकारिता आंदोलन से किस तरह समृद्धता आती है, उसका सबसे बेहतर उदाहरण गुजरात व महाराष्ट्र है। क्या छत्तीसगढ़ में ऐसा कुछ नहीं हो सकता? विशेषकर लघु उत्पादकों के लिए सहकारिता को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता? साग सब्जियां नगदी फसल होने की वजह से किसान ज्यादा आकर्षित हैं लेकिन जब बाजार मूल्य नियंत्रित नहीं होता तो सर्वाधिक नुकसान भी उन्हीं को होता है। जैसा कि इस बार हुआ है। उम्मीद की जानी चाहिए उत्पाद लुटाने की नौबत दुबारा नहीं आएगी और नई कृषि में ऐसे किसानो ंके लिए माकूल व्यवस्था होगी।

Friday, December 23, 2016

चिकित्सा में पी. पी. पी. विचार करें सरकार

-दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं को निजी हाथों में सौंपने के राज्य सरकार के फैसले पर बहस की पर्याप्त गुंजाइश है, किंतु दुर्भाग्य से ऐसा कुछ होता नहीं है। जनकल्याणकारी योजनाएं चाहे केन्द्र की हों या राज्य सरकार की, वे वैसी ही होती हैं जैसा प्राय: सरकारें चाहती हैं, इसमें जनविचारों की भागीदारी कतई नहीं होती जबकि कहा जाता है सरकारें जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। यदि सभी नहीं, तो क्या कुछ योजनाओं पर प्रबुद्ध नागरिकों, विशेषज्ञों से विचार-विमर्श नहीं किया जा सकता? जाहिर है न नौकरशाही इसकी इजाजत देती हैं और न ही राजनीति क्योंकि यहां सवाल श्रेय का, श्रेष्ठता का एवं अहम् का होता है। बहरहाल पिछले दिनों की एक खबर के मुताबिक छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य के सभी 27 जिलों में बच्चों एवं माताओं के लिए अस्पताल बनाने एवं उन्हें पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी के तहत निजी हाथों में सौंपने का फैसला किया है। सरकारी खबर के अनुसार भवन एवं आवश्यक सभी सुविधाओं की व्यवस्था सरकार करेगी। बाद में उनके संचालन की जिम्मेदारी निजी उद्यमियों को सौंप दी जाएगी, ठीक वैसे ही जैसा कि राजधानी रायपुर में करीब 15 बरस पूर्व एस्काटर््स हार्ट सेंटर के मामले में हुआ। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के कार्यकाल में एस्काटर््स का रायपुर में पदार्पण हुआ और छत्तीसगढ़ को हृदय रोग से संबंधित पहला अस्पताल मिला जिसके लिए सरकार ने लगभग 300 करोड़ रुपए खर्च किए। यह अलग बात है कि गरीबों विशेषकर गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों की मुफ्त हृदय चिकित्सा की जिन शर्तों पर एस्कार्ट्स को अस्पताल सौंपा गया था, उसका सतत् उल्लंघन होता रहा और सरकार मूकदर्शक बनी रही। अब इस अस्पताल को अपने अधिकार में लेने सरकार प्रयत्न कर रही है। पता नहीं वह कब सफल होगी। 
    बहरहाल जोगी के जमाने के इस असफल प्रयोग पर अब भाजपा सरकार काम कर रही है। हालांकि घोषणा के बावजूद अभी इस दिशा में कुछ नहीं हुआ है। योजना के अनुसार सरकार अस्पतालों के लिए इमारतें बनाने, उसे वातानुकूलित करने, आवश्यक मशीनें एवं उपकरणों की व्यवस्था करने, पैथ लैब बनाने आदि पर करीब 300 करोड़ रुपए खर्च करेगी। अस्पताल तैयार होने के बाद इन्हें निजी संचालकों को सौंप दिया जाएगा। शर्तें क्या होंगी इसका खुलासा नहीं हुआ है पर यह तय है गरीबों के मुफ्त इलाज की शर्त अवश्य होगी। सरकार की तरफ से निगरानी की व्यवस्था क्या होगी? यह भी स्पष्ट नहीं है। क्या इन अस्पतालों की संचालन कमेटी में सरकार और जनता का कोई प्रतिनिधि होगा, इसका भी पता नहीं। अलबता इस योजना जो मुख्यत: गरीब तबके के लिए है, की सफलता ऐसे ही सवालों पर निर्भर है। 
छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सुविधाओं पर बात करें तो स्थिति निराशाजनक ही कही जाएगी। हालांकि शासन ने स्मार्ट कार्ड के जरिए 50 हजार रुपए तक की मुफ्त चिकित्सा की व्यवस्था कर रखी है। लेकिन यह नाकाफी है क्योंकि विभिन्न कारणों से जन स्वास्थ्य की समस्याएं ज्यादा विकराल हैं। शहरों, ग्रामीण अंचलों विशेषकर आदिवासी इलाकों में प्रत्येक वर्ष मलेरिया, डायरियां आदि बीमारियों से होने वाली मौतों में कोई कमी नहीं आई है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों का बुरा हाल है, वहां न तो डाक्टर होते हैं और न ही दवाइयां। मामूली बीमारियों के लिए भी लोगों को शहरों की ओर रुख करना पड़ता है जहां निजी अस्पतालों में महंगे इलाज की वजह से उन्हें जमीन-जायदाद तक बेचनी पड़ती है। 
     दरअसल सबसे बड़ा संकट विश्वास का है। वैसा ही संकट जो स्कूली शिक्षा और कानून व्यवस्था के मामले में नार आता है। सरकारी स्कूलों में गुणवत्ताविहीन शिक्षा अविश्वास की भावना पैदा करती है इसीलिए निजी स्कूल खूब पनप रहे हैं और लूट-पाट मचा रहे हैं। इसी तरह कानून-व्यवस्था के मामले में लोग पुलिस से दूर भागते हैं। वे उसके मित्र नहीं हैं जबकि आम लोगों को अपना मित्र बनाने पुलिस निरंतर प्रयास करती है पर उसका खौफ इस कदर है कि यह उक्ति यथावत है कि पुलिस से न दोस्ती भली, न दुश्मनी। स्वास्थ्य के मामले में संकट कुछ अलग है। यहां सवाल सिर्फ स्तर का नहीं, चिकित्सा की उपलब्धता का भी है। क्या कारण है कि दूर-दराज के ग्रामीण भी अपनी तमाम पूंजी के साथ निजी अस्पतालों की शरण लेते हैं। प्रायवेट अस्पतालों में विशेषकर सुविधा सम्पन्न बड़े अस्पतालों में ऐसे लोगों की भारी भीड़ इस बात की गवाह है कि वे इन्हें सरकारी अस्पतालों से बेहतर मानती है। जबकि चिकित्सा की श्रेष्ठता शासकीय चिकित्सालयों में भी कायम है। 
    ऐसा लगता है कि स्वास्थ्य के मामले में सरकार ने हार मान ली है। सभी 27 जिलों में अस्पताल बनाकर उन्हें निजी हाथों में सौंपने के पीछे यह दलील दी जा रही है कि सरकारी अस्पतालों के लिए डाक्टर नहीं मिलते। शहरी केन्द्रों में जब चिकित्सकों के पद रिक्त पड़े रहते हैं तो कस्बों के अस्पतालों की हालत का अंदाज लगाया जा सकता है। इसी तर्क के साथ स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजीकरण को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस विचार में कोई दिक्कत नहीं है बशर्तें पेशे के प्रतिबद्ध एवं इमानदार लोग चुने जाएं। क्या भ्रष्ट तंत्र के लिए यह संभव है? कतई नहीं। तब गरीबों को बेहतर एवं त्वरित चिकित्सा उपलब्ध कराने की जिस मकसद से यह योजना बनाई गई है, वह कैसे सफल होगी? यकीनन सरकारी खर्च से बने अस्पताल निजी संचालकों के लिए एक तरह से कमाई के वैसे ही स्रोत बनेंगे जैसे कि एस्काटर््स रायपुर है। यानी चिकित्सा के नाम पर लूट-खसोट के नए केन्द्र खुल जाएंगे। अत: सरकार को विचार करना होगा कि निजीकरण को प्रोत्साहित करने के बजाए क्या ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार के साथ-साथ मौजूदा उपायों को बेहतर नहीं बनाया जा सकता?

Saturday, December 10, 2016

सत्ता के 13 वर्ष कम तो नहीं होते

-दिवाकर मुक्तिबोध
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को देखकर आपको, आम आदमी को क्या लगता है? क्या राय बनती है? अमूमन सभी का जवाब एक ही होगा- भले आदमी हैं, नेकदिल इंसान। सीधे, सरल। मुख्यमंत्री होने का दंभ नहीं। सबसे प्रेम से मिलते हैं। सबकी सुनते हैं। लेकिन शासन? जवाब यहां भी एक जैसा ही होगा - लचर है। नौकरशाहों पर लगाम नहीं है। उनकी मनमानी रोकने में असमर्थ है। धाक नहीं है। भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं है। सुस्त है। सरकार वे नहीं, नौकरशाह चला रहे हैं। सरकारी योजनाओं का लाभ निचले तबके तक नहीं पहुंच पा रहा है। सरकारी कामकाज में पारदर्शिता नहीं है। फाइलों के आगे बढऩे की रफ्तार बेहद सुस्त है और सर्वत्र कमीशनखोरी का जलवा है। और उनकी राजनीति? यहां भी प्राय: सभी का जवाब तकरीबन एक जैसा ही होगा- बहुत घाघ हैं। जबरदस्त कूटनीतिज्ञ। अपने विरोधियों को कैसे चुन-चुनकर ठिकाने लगाया। आदिवासी नेतृत्व की मांग करने वालों की हवा निकाल दी। उनकी कुर्सी की ओर आंखें उठाने वालों की बोलती बंद कर दी। शासन की आलोचना करने वाले सांसदों व पार्टी नेताओं को आईना दिखा दिया। कईयों के लिए मार्गदर्शक की भूमिका का इंतजाम कर दिया। संगठन के नेतृत्व को भी अपनी मुट्ठी में रखा। कोई हूं की चूं नहीं। सभी महत्वपूर्ण स्थानों, पदों पर अपने मोहरे फिट किए? गजब के राजनेता। मासूमियत भरी राजनीति। भाजपा शासित पहला प्रदेश जहां पार्टी में असंतोष पानी के बुलबुले की तरह है, फूंक मारते ही ध्वस्त। और अब पार्टीजनों, नेताओं के न•ारों में रमन सिंह? जवाब मिलेगा- पंगा लेने का मतलब नहीं। केन्द्र में जबरदस्त पकड़। पीएम तक तारीफ करते हैं। लेकिन यहां अभयदान। खूब कमाओ, खाओ। लिहाजा चौथी पारी भी मिलनी ही चाहिए।
    तो ये हैं, प्रदेश की जनता के प्रति बेहद संवेदनशील, उदारमना मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह जिनके शासन के 13 वर्ष 12 दिसम्बर 2016 को पूर्ण होने वाले हैं। मुख्यमंत्री के बतौर तीसरी पारी के अभी दो वर्ष और बाकी हैं। यानी दो जलसे इन्हीं तारीखों में और होंगे जैसे कि इस बार हो रहे हैं। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि हर सरकार को यह हक है कि वह अपनी उपलब्धियों का खूब ढिंढोरा पीटे भले ही वे कमतर क्यों न हो। फिर सत्ता के 13 वर्ष कम नहीं होते। मुख्यमंत्री के बतौर तीसरी पार्टी हर किसी राजनेता को नसीब नहीं होती। भाजपा शासित राज्यों में दो ही मुख्यमंत्री ऐसे हैं जो तीसरी पारी खेल रहे हैं- एक म.प्र. के शिवराज सिंह और दूसरे रमन सिंह। रमन सिंह के अब तक के कार्यकाल का असली लेखा-जोखा जनता के पास है, जो चुनाव वर्ष 2018 में वोटों के जरिए सामने आएगा। सरकार विकास के दावे भले ही कितने ही क्यों न करे लेकिन तय जनता को करना है। इसमें संदेह नहीं कि सरकार की लोककल्याणकारी नीतियों की वजह से राज्य में काफी कुछ बदला है। यह बदलाव हर मोर्चे पर न•ार भी आता है विशेषकर आधारभूत संरचनाओं के मामले में। शहरों में जीवनस्तर सुधरा है, कुशल, अकुशल हाथों के पास पर्याप्त काम है किंतु गांंव? वे अभी भी समस्याग्रस्त हैं। राज्य के 19 हजार गांवों में से कुछ दर्जन गांवों को छोड़ दें तो शेष नागरिक जीवन की सुविधाओं के लिए तरस गए हैं। जबकि सरकार दावा करती है कि उसकी प्राथमिकता गांवों का विकास है। अभी चंद दिन पूर्व राजधानी में आयोजित युवा सम्मान समारोह में मुख्यमंत्री एवं सरकार के अन्य नुमाइंदों की मौजूदगी में प्रतिभाशाली युवाओं ने कहा- वे गांवों में मूलभूत सुविधाएं चाहते हैं और इसके लिए वे आगे चलकर अपने स्तर पर प्रयत्न करेंगे। वे ऐसा छत्तीसगढ़ चाहते हैं जहां हर गांव में स्कूल व अस्पताल हो। जिला दंतेवाड़ा के ग्राम बुरगुम के किशोर वय के भारत कुमार ने कहा उनके गांव में सिर्फ कक्षा 8वीं तक स्कूल है। गांव में बिजली नहीं, सड़क कच्ची है और पानी के नाम पर केवल हैंडपम्प है। अपनी प्रतिभा के दम पर गांवों से उच्च शिक्षा के लिए निकले प्राय: सभी युवाओं का एक ही दर्द है- उनके गांवों की बदहाली। ग्रामीण युवाओं के विचारों से जाहिर है नया राज्य बनने के बावजूद 16 वर्षों में गांवों की हालत बदली नहीं है। अब राज्य सरकार 12 दिसम्बर को राजधानी में एक विराट सम्मेलन करके युवाओं से जानना चाहती है कि गांव की जरूरतें क्या हैं और उनके क्या सुझाव है। गोया सरकार के बड़े-बड़े अफसर, राज्य के विधायक,ं नेता और प्रदेश पार्टी का नेतृत्व नहीं जानता कि गांवों की समस्याएं क्या हैं और सरकार को क्या करना चाहिए। जाहिर है, 12 दिसम्बर का सम्मेलन राजनीतिक है और पार्टी की न•ार में वे 34 लाख युवा हैं जिनके वोट उसके लिए कीमती हैं। सरकार उनके मुख से अपनी उपलब्धियां भी सुनना चाहती है। इसलिए इस सम्मेलन का गांवों के विकास से कोई लेना-देना नहीं है। बहरहाल बात फिर घूम फिरकर वहीं आ जाती है कि सरकार ने इन 13 वर्षों में गांवों के लिए क्या किया? क्यों नहीं तस्वीर बदली? अरबों रुपए खर्च हो गए। कहां गए वे? मलेरिया, पीलिया जैसे रोगों से अभी भी ग्रामीण क्यों मरते हैं? किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य क्यों नहीं मिलता? क्यों लुडेग, पत्थलगांव के किसानों को अपने टनों टमाटर सड़कों पर फेंकने पड़ते हैं जबकि तीन दशक पूर्व म.प्र. के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने जशपुर, रायगढ़ क्षेत्र में टमाटर की भारी पैदावार को देखते हुए वहां फूड प्रोसेसिंग यूनिट की स्थापना करने की घोषणा की थी। छत्तीसगढ़ नया राज्य बन गया, 15 वर्ष बीत गए किंतु एक अदद प्लांट वहां स्थापित नहीं हो सका जबकि सरकार फुड प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने की बात करती रही है। बस्तर में नक्सल समस्या के चलते स्वीकृत डेढ़ सौ से अधिक सड़कें पिछले कई वर्षों से नहीं बन पा रही हैं। कल्पना की जा सकती है, वनांचलों के सैकड़ों गांवों की स्थिति क्या होगी जहां पहुंच मार्ग ही नहीं है। छत्तीसगढ़ के गांवों की और भी मूलभूत समस्याएं हैं जबकि प्रत्येक वर्ष मुख्यमंत्री दर्जनों गांवों का दौरा करते हैं, गांवों से जनप्रतिनिधि विधानसभा एवं पंचायतों के लिए निर्वाचित होते हैं, छोटी-बड़ी तमाम किस्म की योजनाएं बनती है किंतु गांवों की तस्वीर नहीं बदलती। भूखमरी, बेरोजगारी, प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य तथा जीवन की अन्य कठिनाइयां और दरिद्रगी छत्तीसगढ़ के गांवों की अभी भी मूल पहचान है। राज्य स्थापना दिवस पर हर वर्ष सरकारी उत्सवों के बीच यह पहचान गुम हो जाती है, गुम कर दी जाती है पर जाहिर है समाप्त नहीं होती।

Thursday, December 8, 2016

एनजीओ और मंत्री का दर्द

-दिवाकर मुक्तिबोध
     कहते हैं देश बदल रहा है, शहर बदल रहे हैं, गांव बदल रहे हैं लेकिन क्या वे बदल रहे हैं जिन्हें वास्तव में बदलना चाहिए, देश हित में, समाज हित में, लोक हित में? जवाब है - बिलकुल नहीं। न बदलने वालों की अनेक श्रेणियां हैं- भ्रष्ट राजनेता हैं, भ्रष्ट मंत्री हैं, भ्रष्ट अफसर हैं और इनके द्वारा पोषित वे संस्थाएं हैं, संगठन हैं जिन्होंने समाज सेवा का नकाब पहन रखा है। गैर सरकारी संगठन यानी एन.जी.ओ. भी इसी तरह की अमर बेल है जो सरकार के महकमों से लिपटी हुई है और जिनके कामकाज को लेकर लंबी बहसें होती रहती हैं। निष्कर्ष के रूप में यह माना जाता है कि देश-प्रदेश में कार्यरत बहुसंख्य एन.जी.ओ. अपनी भूमिका के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। वे सरकारी नुमाइंदों के साथ गठजोड़ करके बेतहाशा पैसा पीट रहे हैं। सामाजिक क्षेत्र में इनके द्वारा किए जाने वाले कथित कामकाज काफी हद तक कागजों तक सिमटे हुए हैं। इनके भौतिक सत्यापन की न तो कभी जरूरत महसूस की जाती है और न ही कभी जांच बैठायी जाती है। एक तरह से ये सरकार के नियंत्रण से मुक्त है। बेखौफ हैं। भ्रष्टाचार का माध्यम बने हुए हैं। 
    विचार करें, दशकों से कार्यरत इन संस्थाओं के जरिए कितना बदलाव आया? क्या वह संतोषजनक है? विशेषकर वनांचलों में, बेहद पिछड़े इलाकों में, आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में जन चेतना कितनी विकसित हुई है? लोग अपने अधिकारों के प्रति कितने जागरुक हुए हैं? शिक्षा व स्वास्थ्य के महत्व को कितनों ने पहचाना व स्वीकार किया है? जबकि सरकारें अपने तई व इनके माध्यम से भी अब तक बेतहाशा धन खर्च कर चुकी हैं। तो फिर ये संस्थाएं कर क्या रही हैं? 
    दरअसल इसमें शक नहीं कि सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के विकास एवं कुरीतियों से निजात पाने की दिशा में गैर सरकारी संगठनों की भूमिका अहम हो सकती है और है भी लेकिन कुछ दर्जन एनजीओ को छोड़ दें तो शेष सफेद हाथी बने हुए हैं जो सरकार के पालतू हैं। देश को छोड़ दें तो छत्तीसगढ़ में ही 173 एनजीओ पंजीकृत हैं जिन्हें केंद्र व राज्य सरकार से फंड मिलता है। अभी हाल ही में राज्य की महिला, बाल विकास व समाज कल्याण मंत्री श्रीमती रमशीला साहू ने विभागीय सचिव को निर्देशित किया कि सभी एनजीओ को नोटिस जारी कर उनसे कामकाज का हिसाब मांगा जाए। आंकड़ों के मुताबिक राज्य के 59 एनजीओ ऐसे हैं जिन्हें वर्ष 1986-87 से केंद्र सरकार से सहायता मिल रही है। इन संस्थाओं को अभी तक 86 करोड़ रुपए दिए जा चुके हैं। कतिपय खास संस्थाओं को विभिन्न प्रोजेक्ट्स के तहत राज्य सरकार ने भी लाखों रुपए दिए हैं। विभागीय मंत्री का दर्द यह है कि रायपुर की एक संस्था को दो-तीन सालों में 60 लाख रुपए जारी किए गए किंतु उन्हें इसकी भनक तक नहीं लगी और जब बात सामने आई तो शिकायतों का पुलिंदा जो कचरे में पड़ा हुआ था, उसे खोला गया और उसके आधार पर सभी एनजीओ से उनके कामकाज की जानकारी मांगी गई, खर्चों का ब्यौरा देने के लिए कहा गया। 
    लेकिन इस चिट्ठी-पत्री से होने-जाने वाला कुछ नहीं है। थोड़े समय के लिए कुछ हलचल मचेगी और फिर सब कुछ शांत हो जाएगा और व्यवस्था फिर पहले जैसे चलती रहेगी। दरअसल सामाजिकता के नाम पर आर्थिक षडय़ंत्र रचने वाले रैकेट बरसों से सरकारी विभागों में अपनी पैठ जमाए हुए हैं। जाहिर है उनका उद्देश्य पैसा बनाना है और ये पैसा बना रहे हैं। प्रमुख रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक जनजागरण के क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों के कामकाज का कभी भौतिक सत्यापन नहीं होता, न इनके कामकाज पर कभी निगरानी रखी जाती है। समाज कल्याण विभाग में ऐसी कोई व्यवस्था भी नहीं है कि इतने कामकाज की पड़ताल की जाए कि वास्तव में राज्य के दूरस्थ अंचलों में विशेषकर आदिवासी इलाकों में ये संस्थाएं कैसा काम कर रही हैं। क्या इनके कामकाज से कोई जागृति आई है? क्या आदिवासियों को शिक्षा का महत्व समझ में आ रहा है? क्या कभी किसी मंत्री ने या विभाग के अफसरों ने गांव, देहातों में जाकर आकस्मिक निरीक्षण किया है? क्या कभी अपने माध्यमों से पता लगाने की कोशिश की है कि वित्त पोषित ये संस्थाएं ठीक से काम कर रही हैं अथवा नहीं। क्या कभी इनके द्वारा पेश वित्तीय बिलों की असलियत जांचने की कोशिश की गई है? क्या कभी यह देखा गया है कि इनके संचालकों की माली हालत पहले क्या थी और अब क्या है? क्या इनके बैंक एकाउंट खंगालने की कोशिश की गई? क्या कभी यह जांचने की कोशिश की गई कि इनके तथा परिवार के सदस्यों के नाम पर चल-अचल सम्पत्ति कितनी है और वह कब अर्जित की गई है? वस्तुत: ऐसा कुछ करना इसलिए संभव नहीं है क्योंकि यह सरासर मिलीभगत का मामला है, शेयरिंग का मामला है। जिस व्यवस्था में सरकारी कामकाज देने के एवज में चैक जारी करने के पूर्व कमीशन की नगद राशि पहले ही रखवा ली जाती है, उससे बदलाव की उम्मीद भी क्या की जा सकती है? इसलिए एनजीओ को नोटिस जारी करने से कुछ नहीं होगा। यह तो केवल दबाव बनाने की कसरत है जो बीच-बीच में मामला सधते न देखकर होती रहती है। इसलिए भौतिक संरचनाओं की दृष्टि से गांव-शहर बदल सकते हैं पर व्यवस्था नहीं, क्योंकि वह सरासर भ्रष्टाचार की नींव पर टिकी हुई है।