Posts

डिप्टी बनने क्यों राजी हुए सिंहदेव

Image
- दिवाकर मुक्तिबोध छत्तीसगढ़ कांग्रेस की राजनीति में हाल ही में हुए बदलाव पर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी ने भले ही आलोचना की हो लेकिन मुद्दे की बात यह है कि वह पुनः हताशा की शिकार हो गई है। दरअसल कांग्रेस संगठन व सत्ता के बीच पिछले कुछ समय से जो अंदरूनी खींचतान चल रही थी, उसे देखते हुए पार्टी को अपने लिए कुछ संभावनाएं नज़र आने लगी थी। कांग्रेस में त्रिकोण बन गया था जिसके एक छोर पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, दूसरे पर प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम व तीसरे छोर पर केबिनेट मंत्री टी एस सिंहदेव थे। पार्टी में गुटबाजी सतह पर थी और आंतरिक सर्वे में करीब पचास फीसदी विधायकों का प्रदर्शन निराशाजनक माना गया था। केंद्रीय नेतृत्व के लिए यह चिंता की बात थी। यदि यही स्थिति आगे भी कायम रहती तो इसका फायदा चार महीने बाद होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव में भाजपा को किसी न किसी रूप में मिल सकता था। प्रदेश भाजपा इसी खुशफहमी में थी। लेकिन हालातों को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस हाई कमान ने 28 जून को जो निर्णय लिया वह उसका मास्टर स्ट्रोक था और उसने भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। वरिष्ठ मंत्री टी एस सिंहदेव को उप म

घट गया राज्य पुरस्कारों का महत्व

Image
- दिवाकर मुक्तिबोध आगामी एक नवंबर को नये राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ के 22 वर्ष पूर्ण हो जाएंगे। प्रत्येक वर्ष राज्योत्सव में सांस्कृतिक आयोजनों के अलावा किसी न किसी रूप में राज्य के विकास में विशेष योगदान देने वाले विद्वानों को राज्य अलंकरण से पुरस्कृत किया जाता है। प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी के कार्यकाल में 16 पुरस्कार दिए जाते थे जो भाजपा के पंद्रह वर्षों के शासन में बढकर बाइस हुए और अब कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार में इनकी संख्या बढाकर 36 कर दी गई हैं। यानी छत्तीसगढ़ के 36 पुरस्कार। राज्य पुरस्कारों के मामले में जैसी राजनीति व दखलंदाजी प्रायः हर जगह चलती है, उससे छत्तीसगढ़ भी मुक्त नहीं है। इसीलिए दो दशक से अधिक वर्ष बितने के बावजूद इन पुरस्कारों की जो अहमियत, जो गरिमा स्थापित होनी चाहिए थी वह नहीं हुई। एक तरह से ये पुरस्कार सरकार की नजऱ में भी औपचारिक बन कर रह गए हैं और रेवडी की तरह बांटे जाते हैं। इसीलिए बहुत से ऐसे लोग पुरस्कृत होते रहे हैं जो उन पुरस्कारों के योग्य नहीं थे। लिहाजा अपने ही राज्य में इन पुरस्कारों की महत्ता लगभग खत्म हो गई है। राष्ट्रीय स्तर पर भी जो एक दो

जसम सम्मेलन के बहाने कुछ बातें

Image
- दिवाकर मुक्तिबोध बस्तर के आदिवासियों के हितों के लिए वर्षों से संघर्षरत सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय सम्मेलन में जो विचार व्यक्त किए हैं, वे फासीवाद के मुद्दे पर बौद्धिक तबके की कथित सक्रियता पर सवाल खडे करते हैं। उन्होंने कहा-फासीवाद का सबसे पहले हमला आदिवासियों पर होता है। वे उसका सामना करते हैं। बाद में किसान व मजदूर मुकाबला करते हैं। गरीब व निम्न वर्ग पर जब हमला होता है तो वह अपने तरीक़े से उसके खिलाफ संघर्ष करता है लेकिन हम और आप यानी मध्यम व निम्न मध्यम वर्ग के लोग फासीवाद के खिलाफ अभियान को समर्थन तो देते हैं पर सक्रिय हस्तक्षेप नहीं करते। उनकी लडाई में शामिल नहीं होते। हिमांशु कुमार के ये विचार लोकतांत्रिक संगठनों व संस्थाओं को अपनी गतिविधियों तथा कार्यक्रमों पर नये सिरे से विचार करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण व जरूरी मुद्दा देते हैं। देश में बढती अराजकता, असहिष्णुता, लोकतांत्रिक अधिकारों का अपहरण, व्यवस्था के खिलाफ बोलने की आजादी पर प्रहार, फासिस्ट ताकतों का उभार व साम्प्रदायिकता के नाद पर गंभीर विमर्श के लिए जन संस्कृति मंच ने छत्तीसगढ़ की राज

कुछ यादें, कुछ बातें - 27

- दिवाकर मुक्तिबोध ----------------------- #गिरिजाशंकर देशबंधु में राजनारायण मिश्र ,रम्मू श्रीवास्तव व सत्येन्द्र गुमाश्ताजी की एक पहचान सिटी रिपोर्टर की भी रही है। दरअसल यह वह समय था जब 10-12 पृष्ठों के अखबार में सीनियर पत्रकार डेस्क के काम के साथ ही इक्कादुक्का सिटी की खबरें भी कर दिया करते थे। लेकिन बाद के समय में नगर की खबरों के लिए अलग डेस्क व रिपोर्टरों की टीम बनी। इस डेस्क के प्रमुख थे गिरिजाशंकर। क्वालिटी रिपोर्टिंग में नंबर वन। सबसे आगे, अव्वल। 70 के दशक में मेरी उनसे मुलाकात नयी दुनिया ( बाद में देशबन्धु ) में हुई। मैं उन्हें रंग कर्मी के बतौर जानता था जो उन दिनों जीवन बीमा निगम में कार्यरत थे तथा नहर पारा स्थित अखबार के दफ्तर में अक्सर आया जाया करते थे। प्रायः उनकी बैठक ललित जी तथा राजनारायण जी के साथ हुआ करती थी। हालांकि उनका औपचारिक परिचय तो संपादकीय विभाग के सभी साथियों से हो गया था जिसमें मैं भी था। मुलाकात व बातचीत का सिलसिला तब चल निकला जब उन्होंने एलआइसी की नौकरी छोड़ दी व पूर्णतः देशबंधु में आ गए। गिरिजा बहुमुखी प्रतिभा के धनी है। उनकी सबसे बड़ी खूबी है उनकी वाचालता। ख

कुछ यादें, कुछ बातें - 26

- दिवाकर मुक्तिबोध ----------------------- मेरे समकालीन व बाद की पीढी के छत्तीसगढ़ के अनेक ऐसे पत्रकार हैं जिन्होंने पत्रकारिता इस प्रदेश में रहते हुए प्रारंभ की लेकिन बाद में राज्य से बाहर चले गए व ख्यातनाम हुए। जो नाम मुझे याद आते हैं और जिनके साथ मेरा अनियमित सम्पर्क रहा है, उनमें प्रमुख हैं दीपक पाचपोर, निधीश त्यागी, सुदीप ठाकुर ,विनोद वर्मा, विजय कांत दीक्षित , शुभ्रांशु चौधरी ,महेश परिमल आदि आदि। संयोगवश ये सभी अलग-अलग समय में ललित सुरजन जी की पत्रकारिता पाठशाला यानी देशबंधु से निकले छात्र हैं। देशबंधु में कुछ महीने या कुछ वर्ष काम करने के बाद वे नये आकाश की तलाश में राज्य से बाहर निकले तथा जिन-जिन राष्ट्रीय अखबारों व मीडिया संस्थानों में रहे ,उन्होंने पत्रकारिता में अपना व छत्तीसगढ़ का मान बढाया। एक नाम और है, मेरे समकालीन जगदीश उपासने का। जहां तक मैं जानता हूं, उन्होंने रायपुर से प्रकाशित हिंदुत्ववादी विचारधारा के अखबार दैनिक युगधर्म से पत्रकारिता की शुरुआत की। बतौर पत्रकार मैं उन्हें जानता था पर कोई खास मुलाकात नहीं थी। आत्मिक परिचय का दायरा इसलिए भी आगे नहीं बढ पाया क्योंकि जगद

कुछ यादें, कुछ बातें - 25

- दिवाकर मुक्तिबोध -------------------------- #विजय_शंकर_मेहता रायपुर में पोस्टिंग के पूर्व विजय शंकर मेहता जी कौन है, मैं नहीं जानता था। बाद में मैंने जाना कि वे स्टेट बैंक आफ इंडिया उज्जैन में अधिकारी हैं तथा वहाँ दैनिक भास्कर ब्यूरो का अप्रत्यक्ष रूप से कामकाज देखते है। यह भी सुना कि दैनिक भास्कर के मालिकों से उनके अच्छे संबंध है तथा समूह संपादक श्रवण गर्ग को वे अपना गुरू मानते हैं। शायद उन्होंने बैंक की नौकरी छोडऩे का मन बना लिया था और अब पूर्णकालिक पत्रकारिता करना चाहते थे। लिहाजा इसकी शुरूआत रायपुर से की जा रही थी। वे रायपुर आए व संपादक का पदभार ग्रहण किया। दुर्योग से इस अवसर पर मैं उपस्थित नहीं था। दरअसल मैं बीमार था। घुटने में बार-बार पानी भरने की वजह से चलने-फिरने से लाचार था फलत: लंबी छुट्टी पर था। लेकिन मेरी अनुपस्थिति का गलत अर्थ निकाला गया व मेहता को कुछ विघ्नसंतोषियों द्वारा यह बताने की कोशिश की गई कि मैं बीमारी का बहाना बना रहा हूँ क्योंकि मैं अपना तबादला भिलाई नहीं चाहता। संभवत: यह बात उपर तक पहुँचाई गई। बहरहाल जब मेरी स्थिति कुछ ठीक हुई तो मैं दफ़्तर पहुँचा व मेहता जी

कुछ यादें कुछ बातें-24

- दिवाकर मुक्तिबोध ------------------------ कमल ठाकुर कमल ठाकुर जी से पहली मुलाकात कब और कहां हुई याद नहीं। मैं अखबारी दुनिया में नया नया था लिहाजा इतना जरुर जानता था कि वे नवभारत के संपादकीय विभाग में हैं और काफी सीनियर है। पता चला था कि सरकारी नौकरी मेंं थे पर वहां मन रमा नहीं इसलिए इस्तीफा देकर रायपुर लौट आए। पर मेरी उनसे पहली मुलाकात नवभारत नहीं, महाकोशल में हुई। श्यामाचरण शुक्ल के स्वामित्व वाले छत्तीसगढ़ के इस सबसे पुराने समाचार पत्र का प्रबंधन श्यामाचरण जी ने नवभारत के संपादक गोविंद लाल वोरा जी को सौंप दिया था। कमल ठाकुर महाकोशल मेंं भेज दिए गए थे। ऐसे ही किसी दिन महाकोशल में उनसे औपचारिक बातचीत हुई पर बात आगे नहीं बढ़ी। परिचय व आत्मीयता का दायरा तब बढा जब हम अमृत संदेश में साथ साथ काम करने लगे। 1983 के प्रारंभ में गोविंद लाल वोरा जी ने अपने अखबार अमृत संदेश के प्रकाशन की तैयारी शुरू की। नवभारत की नौकरी छोड़कर हम तीन सहयोगी नरेंद्र पारख, रत्ना वर्मा व मैं वोरा जी के साथ हो लिए थे। अमृत संदेश की लान्चिग के लिए कम से कम तीन महीने का वक्त था। इस बीच तैयारियां पूरी करनी थी। बाद में