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किसानों से माफी क्यों माँगे

- दिवाकर मुक्तिबोध 
छत्तीसगढ भाजपा क्या अपने सबसे बुरे दिनों की ओर बढ़ रही है? 11 दिसंबर को विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद सन्नाटे में डूबी पार्टी पराजय के शोक से उबरने के बजाए जिस तरह 'गृहयुद्ध' में उलझ गई और दिनों दिन उलझती ही जा रही है, उसे देखते हुए यहीं प्रतीत होता है कि प्रादेशिक इकाई अपने इतिहास के सबसे खराब दौर से गुजर रही है। अब तक जिलेवार हुई समीक्षा बैठकों में जिला, मंडल व ब्लॉक स्तरीय नेताओं व कार्यकर्ताओं ने अनुशासन के नाम पर चलने वाली तानाशाही के चिथड़े उड़ाने में कोई कसर नहीं छोडी हैं। उनके निशाने पर रमन सरकार के मंत्री, विधायक, प्रादेशिक नेतृत्व, संगठन के राष्ट्रीय पदाधिकारी जिनका राज्य की राजनीति में दखल हैं तथा चुनिंदा अफसरों का वह गिरोह है जिसने पार्टी के मुख्यमंत्री को 15 साल तक घेर रखा था। अफसरशाही व राजनीतिक गिरोहबंदी की वजह से सरकार जनता से दूर होती गई और अंतत: उसे विधानसभा चुनाव में इस तरह उखाड़ फेंका कि वह रसातल में पहुँच गई। अपने लगातार, तीन कार्यकाल में 48-49 विधायकों पर टिकी पार्टी सिमटकर 15 की हो गई है। सत्ता से बेदखली के दो माह पूरे हो गए हैं प…
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बघेल सरकार का एक माह: आगे-आगे देखिए होता है क्या

- दिवाकर मुक्तिबोध

17 जनवरी को छत्तीसगढ़ में कांग्रेस-राज की स्थापना को एक माह पूरा हो गया। 17 दिसंबर 2018 को भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। फिलहाल उनकी सरकार को फटाफट काम करने वाली सरकार मानना चाहिए जिसका लक्ष्य स्पष्ट है। पार्टी का घोषणा-पत्र उसके सामने है जिसके सर्वाधिक महत्वपूर्ण वायदों पर सरकारी फऱमान जारी हो चुका है। लेकिन यह एक पहलू है जिसमें लोक-कल्याण की भावना प्रबल है। दूसरा पहलू है - राजनीतिक। लक्ष्य है, पूर्ववर्ती भाजपा शासन के दौरान सतह पर आई गड़बडिय़ों एवम् कुछ महाघोटालों की पुन: जाँच। नए सिरे से जाँच की आवश्यकता क्यों है, यह अलग प्रश्न है। इसका तार्किक आधार भी हो सकता है। यह भी संभव है, नई जाँच से नए तथ्य और छिपे हुए चेहरे भी सामने आएं जो जरूरी है पर इसके पीछे राजनीतिक मंशा को भी बखूबी महसूस किया जा सकता है। मंशा है, आगामी अप्रैल-मई में प्रस्तावित लोकसभा चुनाव के पूर्व घोटालों में कथित रूप से लिप्त भाजपा नेताओं, मंत्रियों व अफसरों पर फंदा कसना तथा उन्हें जनता की अदालत में खड़े करना। तीन-चार बड़े प्रकरणों, झीरम घाटी नरसंहार, करीब 36 हजार करोड़ का नागरिक आ…

अजीत जोगी : न किंग बने न किंगमेकर

-दिवाकर मुक्तिबोध 

छत्तीसगढ़ राज्य विधानसभा की 90 सीटों के लिए हुए चुनाव के परिणामों से स्पष्ट है कि प्रदेश की नई-नवेली छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस ने तीसरे विकल्प के रूप में स्वयं को जिंदा रखा है। अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों जिनमें कुछ उच्च सरकारी अधिकारी भी शामिल हैं, का ख्याल था कि इस पार्टी का खाता भी नहीं खुलेगा और यदि बहुत हुआ तो एकाध सीट से उसे संतोष करना होगा। अलबत्ता यह आम राय थी कि चुनाव में इस पार्टी की मौजूदगी से भाजपा को कम, कांग्रेस को ज्यादा नुकसान होगा। लेकिन जब परिणाम आए तो वे कांग्रेस के मामले में चौंकाने वाले तो थे ही, जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के सन्दर्भ में भी संभावना के प्रतिकूल थे। नया प्रांत बनने के 18 साल बाद यह पहली बार हुआ है कि किसी तीसरी पार्टी ने राजनीति में अपनी कुछ दमदार हैसियत दर्ज कराई हो। बसपा के साथ हुए उसके चुनावी गठबंधन में उसके सात उम्मीदवारों का विधानसभा के लिए चुनकर आना मायने रखता है। इसके पूर्व हुए तीन चुनावों में केवल बसपा के ही इक्के-दुक्के विधायक निर्वाचित होते रहे हैं । हालाँकि 2003 के पहले चुनाव में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) का केवल …

मुक्तिबोध:प्रतिदिन (भाग-23)

पीले पत्तों के जग में

मेरे जीवन की फिलॉसफी उस सुख को स्थान नहीं था।
विष में थी पहिचान पुरानी मधु में तू अनजान नहीं था।
पतझर की कोकिल नीरव थी अंधकार में बंधन पाये,
पीले पत्तों के इस जग में जब झंझा से तुम बन आये।

जब तुझको समझा न सकी थी मेरे अंतस की ये आहें,
आँखों ने तब प्यार सम्हाला दे दुख को कितनी ही राहें।
करूणा की जीवन-झोली में मैंने किस सुख के कण पाये?
पीले पत्तों के इस जग में जब झंझा-से तुम बन आये।
(रचनाकाल 3 फरवरी, 1936। उज्जैन। रचनावली खंड 1 में संकलित)

                                  मरण-रमणी

(मैने मरण को एक विलासिनी सुन्दरी माना है। और वह एक ऐसी सुन्दरी है जो कठोर नहीं है किन्तु हमारे अरमान पूर्ण करना ही मानों उसने  धैर्य बना रखा है। पर एक शर्त पर, जो उससे विलास करने को राजी हो। मैंने उसे 'प्रेयसी', 'ममता-परी', 'सखी', 'आली', इत्यादि शब्दों से संबोधित किया है क्योंकि वह वैसी है भी। मरण -सुन्दरी हमें आकर्षण द्वारा खींचकर ले जाएगी, न कि यमदूतों के समान। वह हमें अपने अंचल से बाँधकर ले जाएगी। कहाँ ले जाएगी? …

घर बैठ जाएँगे टी एस सिंहदेव?

- दिवाकर मुक्तिबोध 

छत्तीसगढ़ राज्य विधान सभा चुनाव के नतीजों के लिए अब कुछ ही दिन शेष हैं। मतदाताओं के रुझान को भाँपते हुए कांग्रेस का ख्याल है कि वह 15 वर्षों बाद सत्ता में वापसी कर रही है। इसलिए प्रदेश कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने अपने -अपने पत्ते खोलने शुरू कर दिए हैं। चूँकि उन्हें पूर्ण बहुमत मिलने का विश्वास है, लिहाजा अजीत जोगी के नेतृत्व वाली छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के सहयोग की उन्हें कोई जरूरत नहीं है। पार्टी नेताओं का मानना है कि कांग्रेस को कुल 90 मे से 50 से अधिक सीटें मिलेंगी। सरकार बनाने के लिए 46 सीटें चाहिए। बहुत संभव है कांग्रेस का अनुमान सही साबित हो लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ और दो - चार सीटें कम पड़ गई तो क्या होगा? क्या कर्नाटक का इतिहास दोहराया जाएगा जहाँ कांग्रेस की अधिक सीटें होते हुए भी मुख्यमंत्री उसका नहीं है? अजीत जोगी बार - बार कह रहे हैं कि सत्ता की चाबी उनके हाथ में होगी और वे ही मुख्यमंत्री बनेंगे। क्या वे हवा में उड़ रहे हैं या इस कथन के पीछे कोई तार्किक आधार है? जाहिर है, चुनाव के पूर्व या चुनाव के बाद ऐसे दावों का कोई ठोस आधार नहीं होता और प्रत्येक राजनीतिक प…

मिशन 65 प्लस क्या फ्लाॅप ?

छत्तीसगढ - चुनाव 2018 - दिवाकर मुक्तिबोध 
छत्तीसगढ़ में किसकी सरकार बनेगी? भाजपा की या कांग्रेस की? दस दिसंबर तक न थमने वाली इन चर्चाओं के बीच केवल एक ही बात दावे के साथ कही जा सकती है कि भाजपा के राष्ट्रीय अधयक्ष अमित शाह का मिशन 65 प्लस औंधे मुँह गिरने वाला है। उन्होंने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष व राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह को विधान सभा चुनाव में कुल 90 में से 65 से अधिक सीटें जीतकर लाने का लक्ष्य दिया था जो किसी भी सूरत में पूरा होते नहीं दिख रहा है। 11 दिसंबर को मतों की गिनती होगी और नई सरकार का चेहरा स्पष्ट हो जाएगा। अभी लोगों की जिज्ञासा तीन सवालों पर केन्द्रित है - सरकार किसकी बनेगी? बीजेपी की या कांग्रेस की? जोगी कांग्रेस - बसपा गठबंधन क्या गुल खिलाएगा? या त्रिशंकु की स्थिति में क्या होगा? 12 व 20 नवंबर को मतदान की प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद बहुसंख्य लोगों का मानना है कि इस बार परिवर्तन की आहट है और मतदाताओं ने इसके पक्ष में वोट किया है। यानी  कांग्रेस एक मजबूत संभावना है। अनुमानों के इस सैलाब पर यकीन करें तो भाजपा सत्ता गँवाते दिख रही और यदि ऐसा घटित हुआ तो छत्तीसगढ़ की राजनीति …

नक्सल समस्या - डाॅ. रमन के पास जादू की छड़ी?

- दिवाकर मुक्तिबोध छत्तीसगढ़ वर्षं 2022 तक नक्सल -मुक्त हो जाएगा? इस पर कोई कैसे भरोसा करे? लेकिन मुख्यमन्त्री डा. रमन सिंह आश्वस्त हैं। उनके विश्वास पर विश्वास करें तो अगले चार सालों में चार दशक से अधिक पुरानी इस राष्ट्रीय समस्या का कम से कम छत्तीसगढ से जरुर खात्मा हो जाएगा। यह अलग बात है कि मुख्यमंत्री अभी जनता की अदालत में है और उन्हें पूरा भरोसा है कि उनकी पार्टी इस बार रिकार्ड बहुमत के साथ लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी करेगी। चुनाव जीत लेगी। अगर ऐसा हुआ तो वे पुन: मुख्यमंत्री बनेंगे जिसकी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पहले ही घोषणा कर चुके है। यानी अगले चार वर्षों में नक्सलवाद को समूल नष्ट करने का उनका विश्वास विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी की जीत पर निर्भर है। नहीं जीत पाए तो उन्हें जनता के सामने किए गए संकल्प से बरी होने का मौका मिलेगा। वरना अगले चार साल अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा। पर उम्मीद करनी चाहिए उनकी सरकार रहे या न रहे, दो चक्कों के बीच पीस रहे आदिवासियों के खिलाफ हिंसा रूकनी ही चाहिए, किसी भी सरकार की यही प्राथमिकता होनी चाहिए जो नए छत्तीसगढ़ राज्य में सत्तारूढ़ रही कां…