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बघेल खींचेंगे नई लकीर ?

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- दिवाकर मुक्तिबोध
एक छोटी सी खबर है लेकिन है महत्वपूर्ण । चंद रोज़ पूर्व छत्तीसगढ विधान सभा के नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक के नेतृत्व में भाजपा के एक प्रतिनिधि मंडल ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से उनके सरकारी आवास में मुलाक़ात की। यह मुलाक़ात दंतेवाड़ा में नक्सली हिंसा में मारे गए भाजपा विधायक भीमा मंडावी के परिवार को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने व सुरक्षा देने से संबंधित थी। स्वाभाविकत: मुख्यमंत्री ने गर्मजोशी से उनका स्वागत कियाऔर बहुत सहज भाव से तुरंत कार्रवाई करने के निर्देश मुख्य सचिव को दिए।
भाजपा नेताओं ने स्वर्गीय भीमा मंडावी के परिवार के प्रति अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी निभाते हुए कांग्रेसी मुख्यमंत्री से निवेदन करने में कोई संकोच नहीं किया। ऐसा पहले भी होता रहा है। 15 वर्षों तक भाजपा शासनकाल में राज्य के मुख्यमंत्री रहे रमन सिंह ने अपने पूर्ववर्ती व अब छत्तीसगढ जनता कांग्रेस के संरक्षक अजीत जोगी को इलाज के लिए सरकारी आर्थिक मदद व अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मानवीय वव्यक्तिगत संबंधों के आधार पर राजनेता एक -दूसरे की सहायता करते रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं है लेक…

बस कुछ माह और

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- दिवाकरमुक्तिबोध तो यह तय है कि एमएस धोनी फिलहाल संन्यास नहीं लेंगे और कुछ समय के लिए एक नई भूमिका में नज़र आएँगे। उन्होंने वेस्टइंडीज़ दौरे के लिएअपनी अनउपलब्धता जाहिर कर दी है।बीसीसीआई ने इस पर विचार करते हुए उन्हें टीम के नए युवा विकेट कीपर ऋषभ पंत को ट्रेंड करने की ज़िम्मेदारी सौंपी है। यानी धोनी माक़ूल वक़्त का इंतज़ार कर रहे हैं। बहुत संभव है यह दो-तीन महीनों की बात हो। दरअसल आगामी सितंबर -अक्टूबर में दक्षिण अफ़्रीका कीटीम भारत आने वाली है। हो सकता है धोनी टीम इलेवन में चुने जाएं ताकि वे इस नायाब मौक़े पर अपने रिटायरमेंट की घोषणा कर सके।
बहरहाल विराट कोहली को इस बात का शायद ताउम्र अफ़सोस कहेगा कि वे अपने 'कप्तान' को तोहफ़े के रूप में वर्ल्ड कप जीत कर नहीं दे सके। महेन्द्रसिंह धोनी को वे अपना कप्तान मानते हैं और वे यह कई बार कह चुके हैं कि धोनी उनके कप्तान हैं और हमेशा रहेंगे।इंग्लैंड में कोहली के नेतृत्व में यदिभारत ने वर्ल्ड कप जीत लिया होता तो संभवत: धोनी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से विदाई ले चुके होते और देश-विदेश के तमाम अखबार, इलेक्ट्रानिक व सोशलमीडिया उनके श…

राहुल के बाद कौन

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-दिवाकर मुक्तिबोध मई में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिलने की शायद उसकी उतनी चर्चा नहीं हुई जितनी कांग्रेस की अप्रत्याशित घनघोर पराजय और अब उसके भीतरखाने में चल रही क़वायद को लेकर हो रही है। राहुल गांधी के इस्तीफ़े के बाद पार्टी संगठन परिवर्तन की राह पर है और देश की निगाहें इस बात पर लगी हुई है कि कमान किसके हाथों में आने वाली है। सवाल है कि क्या कांग्रेस को वैसा ही सबल नेतृत्व मिल पाएगा जो अब तक नेहरू-गांधी परिवार से मिलता रहा है ? या क्या वह इस परिवार के आभामंडल से मुक्त होकर नए सिरे से खड़ी हो पाएगी? और क्या पार्टी में वैसा नेतृत्व मौजूद है ?     इतिहास के कुछ पन्ने पलटकर देखें। 12 नवंबर 1969 को जब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए इंदिरा गांधी को पार्टी से निष्कासित कर दिया तो विभाजित दोनों धड़ों में नेतृत्व का कोई संकट नहीं था । उस दौर में कांग्रेस में एक से बढ़कर एक दिग्गज नेता थे। यह अलग बात है कि इंदिरा गांधी को बाहर का रास्ता दिखाने वाली सिंडीकेट कांग्रेस समय के साथ खुद राजनीतिक परिदृश्य से लुप्त हो गई और इंदिरा के नेतृत्व में …

चुनौती बाहर से नहीं भीतर से

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- दिवाकर मुक्तिबोध  इसी  17 को भूपेश बघेल सरकार के छ: माह पूरे हो गए। स्वाभाविक था वह बीते महीनों का हिसाब -किताब जनता के सामने रखती। वह रखा। सरकार के मंत्रियों ने राज्य के अलग-अलग स्थानों पर मीडिया से मुख़ातिब होते हुए सरकार के कामकाज का ब्योरा पेश किया। यह कोई रोमांचकारी नवीनतम लेखा-जोखा नहीं था जिससे प्रदेश की जनता अनभिज्ञ हो। उसके सारे काम आँखों के सामने हैं।जब सरकार के दिन पूरे होने को होते हैं , कार्यकाल समाप्ति के निकट होता है तो जनता को याद दिलाना जरूरी होता है कि उसने बीते सालों में उनके लिए क्या कुछ नहीँ किया । बघेल सरकार की अभी यह स्थिति नहीं है। उसके छ:महीनों में से तीन तो लोकसभा चुनाव व उसकी तैयारियों मे निकल गए और बचे हुए तीन महीनों में उसने जो काम किए हैं , वे यह उम्मीद "जगाते हैं कि यह सरकार काम करने वाली सरकार है, बेवजह ढिंढोरा पिटने वाली नहीं। इसलिए उसके कामकाज का समग्र आकलन करने के लिए कुछ इंतज़ार करना चाहिए, पाँच साल न सही, ढाई साल ही सही। तब नतीजे खुद-ब-खुद  बोलने लग जाएँगे।

बीते दिसंबर में विधान सभा चुनाव में बंपर जीत के तुरन्त बाद जैसा कि मतदाताओं से कहा गया …

मोहब्बत नहीं नफ़रत को ढोती राजनीति

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- दिवाकर मुक्तिबोध
2019 का लोकसभा चुनाव अब अंतिम दौर में है। 19 मई को अंतिम चरण के मतदान के बाद 23 मई का इंतज़ार। इस दिन स्पष्ट हो जाएगा कि किस पार्टी की सरकार बनेगी। लोकसभा चुनाव के इतिहास में व्यक्तिगत आक्षेपों व अपमानजनक टिप्पणियों के लिए कुख्यात यह चुनाव और भी कई मायनों में यादरखा जाएगा। नतीजों को लेकर भी और व्यक्तित्व की दृष्टि से भी। इस चुनाव में बहुचर्चित नाम- कन्हैया कुमार। जेएनयू दिल्ली छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष।
बेगूसराय से सीपीआई के युवा प्रत्याशी। अपने धारदार भाषणों व सत्ता विरोधी तेवरों से कन्हैया ने देश के पढ़े -लिखे मतदाताओं का ध्यान ठीक उसी तरहसे आकर्षित किया जैसा वर्ष 2012-13 में अरविंद केजरीवाल ने किया था। अन्ना आंदोलन से उपजे केजरीवाल दिल्ली ही नहीं , दिल्ली से बाहर भी राष्ट्रीयराजनीति में एक संभावना बनकर उभरे थे। बेहतर कल की संभावना।
इसे आधार दिया था दिल्ली प्रदेश के मतदाताओं ने जिन्होंने फ़रवरी 2015 में विधानसभा के दुबारा हुए चुनाव में केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को ऐसा प्रचंड बहुमत दिया जो भारतीय राजनीति में एक मिसाल बन गया। दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीटें…

जोगी के लिए आगे का सफर मुश्किल भरा

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-दिवाकर मुक्तिबोध छत्तीसगढ़ की राजनीति में तीसरी शक्ति का दावा करने वाली छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस बुरे दौर से गुजर रही है। विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद प्राय: छोटे-बड़े कई सेनापति जिनमें चुनाव में पराजित प्रत्याशी भी शामिल है, एक-एक करके पार्टी छोड़ चुके हैं तथा अपनी मातृ संस्था कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। दो वर्ष पूर्व, 23 जून 2016 को अजीत जोगी के नेतृत्व में जब इस प्रदेश पार्टी का गठन हुआ था, तब कांग्रेस से असंतुष्ट व मुख्य धारा से छिटके हुए नेताओं को नया ठौर मिल गया था जो उनके लिए उम्मीद भरा था लिहाजा ऐसे नेताओं व कार्यकर्ताओं की एक तैयारशुदा फौज जनता कांग्रेस को मिल गई थी। चुनाव के पहले आगाज जबरदस्त था अत: अंत भी शानदार होगा, इस उम्मीद के साथ यह फौज जोगी पिता-पुत्र के नेतृत्व में चुनावी रण में उतरी थी, लेकिन तमाम उम्मीदों पर ऐसा पानी फिरा कि हताशा में डूबे नेता पुन: कांग्रेस की ओर रूख करने लगे हैं। अब नेतृत्व के सामने पार्टी के अस्तित्व का प्रश्न खड़ा हो गया है। संगठन में भगदड़ मची हुई है। कई पदाधिकारी इस्तीफा दे चुके हैं और खुद को कांग्रेस व भाजपा के विकल्प के रूप में पेश…

छत्तीसगढ़ के साहू गुजरात के मोदी?

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- दिवाकर मुक्तिबोध छत्तीसगढ़ के बस्तर में चुनाव राज्य विधानसभा का हो या लोकसभा का, वह नक्सली हिंसा के साये से जरूर गुजरता है। लेकिन यहाँ के मतदाता अपने वोटों के जरिए हिंसा व आतंक का करारा जवाब भी देते है। पूर्व में सम्पन्न हुए सभी चुनाव इसके उदाहरण है। यानी बस्तर में चुनाव के दौरान हिंसा कोई नई बात नहीं है पर इस बार महत्वपूर्ण यह है कि हमेशा की तरह बहिष्कार की चेतावनी के साथ हाथ-पैर काट डालने की नक्सली धमकी के बावजूद आदिवासी महिलाओं, पुरूषों एवं युवाओं ने मतदान ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया व रिकार्ड मतदान किया वह भी तब जब मतदान के दो दिन पहले नक्सलियों ने बारूदी विस्फोट में दंतेवाड़ा के विधायक भीमा मंडावी की हत्या कर दी थी। बस्तर लोकसभा सीट के लिए 11 अप्रैल को मतदान था। जाहिर था, नक्सलियों द्वारा की गई हिंसा से समूचे इलाके में दहशत फैल गई किंतु जब मतदान का दिन आया, मतदाता घर से निकल पड़े और बिना किसी भय के मतदान केन्द्रों के सामने उन्होंने लंबी-लंबी कतार लगाई। एक लाइन में भीमा मंडावी की शोकाकुल पत्नी, बच्चे व परिवार के अन्य सदस्य भी शामिल थे। उन्होंने अपना सारा दुख भूलकर मतदान किया। यह लोकत…