Friday, February 10, 2017

बस्तर ने देखा अब तक का सर्वाधिक बुरा दौर

-दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. रमन सिंह का तीसरे कार्यकाल का उत्तरार्ध लोकप्रियता की अब तक की जमा-पूंजी पर पानी फेरता नजर आ रहा है। बीते एक-दो वर्षों में चंद घटनाएं ऐसी हुई हैं जो यह अहसास कराती हैं कि वे प्रसिद्धि के शिखर से नीचे उतर रहे हैं और अब एक थके हुए राजनेता हैं। ऐसे राजनेता जिसकी नौकरशाही पर पकड़ लगभग समाप्त हो चुकी है और उसकी मनमानी का खामियाजा जनता के साथ जनप्रतिनिधि के रूप में उन्हें भी भुगतना पड़ रहा है। मसलन बस्तर में नक्सल मोर्चे पर राज्य शासन की वर्ष 2014 से जनवरी 2017 तक अगुवाई करते रहे घोर विवादास्पद आईजी पुलिस एस.आर.पी. कल्लूरी को जबरिया छुट्टी पर भेजना, आनन-फानन में डीआईजी सुंदरराज पी को बस्तर आईजी का चार्ज देना, तीन-चार दिन के भीतर ही छुट्टियां रद्द करके कल्लूरी का काम पर लौटना, उनकी पुलिस मुख्यालय में बिना किसी प्रभार के पदस्थापना करना, केन्द्र के निर्देश पर भ्रष्ट आईपीएस राजकुमार देवांगन की बर्खास्तगी, बस्तर में दर्जनों पुलिस मुठभेड़, नक्सली होने के शक में एक मासूम बच्चे से अनेक निर्दोष आदिवासियों की हत्याएं, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार और उनके घर जलाने जैसी कई घटनाओं के अलावा मानवाधिकारवादियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं व पत्रकारों को प्रताडि़त करने, उनके खिलाफ केस दर्ज करने, उन्हें जेल में डालने तथा बस्तर छोडऩे का हुक्म सुनाने जैसे मामले आए दिन सुर्खियों में रहे। बस्तर संभाग में घटित ये घटनाएं जनसरोकारों के प्रति प्रतिबद्ध राज्य सरकार की मौजूदा कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह खड़े करते रही है और इसका सीधा असर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की प्रतिष्ठा, ख्याति व उनकी साफ-सुथरी राजनीतिक छवि पर पड़ता दिखाई दे रहा है। क्या यह माना जा सकता है कि इन्हीं वजहों से उत्तरप्रदेश के प्रतिष्ठापूर्ण चुनाव में भाजपा की प्रचारकों की सूची से रमन सिंह गायब हैं जबकि उन्हीं की तरह तीसरा कार्यकाल पूरा कर रहे म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान घोषित 40 प्रचारकों की सूची में स्थान पा गए हैं। यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या रमन सिंह तीसरा कार्यकाल पूरा कर पाएंगे? पार्टी की चौथी पारी के लिए राज्य विधानसभा का चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा जाएगा अथवा नहीं? क्या यह भाजपा की आंतरिक राजनीति में किसी बदलाव की सुगबुगाहट है?
देश के जिन राज्यों में भाजपा की सरकार है, रमन सिंह उनमें श्रेष्ठ माने जाते हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ को विकास के मामले में नई पहिचान दी है। विशेषकर पिछड़े इलाकों में, आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में सरकार के कामकाज को राष्ट्रव्यापी सराहना मिली है लेकिन हाल ही के वर्षों में बस्तर में नक्सल मोर्चे पर पुलिस की रणनीति लोकतांत्रिक दायरे से बाहर रही और जिसने मुख्यमंत्री को जनता के सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया जिसमें एक महत्वपूर्र्ण सवाल था एक सहृदय मुख्यमंत्री लंबे समय तक खामोशी के साथ बस्तर में पुलिस का तमाशा क्यों देखते रहे? यकीनन रमन सिंह स्वयं तानाशाह नहीं हैं पर सरकार में तानाशाही को पनपने का मौका देते रहे हैं। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है आईपीएस एसआरपी कल्लूरी जिन्हें बस्तर में नक्सलियों से निपटने के नाम पर कुछ भी करने की छूट दे दी गई थी। इस 'फ्री हैंडÓ की वजह से, जिससे इंकार करने का पूरा अधिकार राज्य सरकार के पास है और वह करती भी रही है, बस्तर में ऐसा तांडव मचा कि इसकी गूंज देश-विदेश तक पहुंच गई। छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या कोई आज की नहीं है, 40 वर्षों से राज्य इसका दंश झेल रहा है। इस दौरान सैकड़ों आदिवासी नक्सली हिंसा के शिकार हुए। इसके बावजूद पुलिस पर जनता का भरोसा कायम रहा हालांकि मानवाधिकारों के उल्लंघन की घटनाएं और दमनात्मक कार्रवाइयों की खबरें तब भी आती रहीं। लेकिन जब हिंसा का जवाब हिंसा से देने और विरोध के लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने की नीति अपनाई गई तो जाहिर है पुलिस में तानाशाही को जड़ें जमाने का अवसर मिल गया और बस्तर में आईपीएस कल्लूरी इसके पहले शिखर पुरुष बने जिन्हें अंतत: राज्य शासन को वहां से हटाना पड़ा। 
बस्तर में कल्लूरी के नेतृत्व में जो कारनामे हुए उनके सकारात्मक-नकारात्मक दोनों पहलू हैं। सकारात्मकता यह रही कि पुलिस व अद्र्ध सैनिक बलों के दबाव की वजह से माओवादी बैकफुट पर आ गए। कई बड़े नक्सली कमांडर मारे गए या छत्तीसगढ़ से पलायन करने बाध्य हुए। नक्सली वारदातों की कमी आई और सैकड़ों नक्सली समर्थकों, माओवादियों और उनके कतिपय बड़े सरगनाओं ने पुलिस के आगे हथियार डाल दिए। इससे पुलिस का मनोबल बढ़ा लेकिन इसके एवज में इतना जबरदस्त नुकसान हुआ कि बस्तर में लोकतंत्र की जड़ें हिल गईं। यह भीषण नकारात्मकता रही। फर्जी मुठभेड़ों में दर्जनों आदिवासी मारे गए, उनके घर जला दिए गए, महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ और इस सच को उजागर करने की कोशिश करने वालों पर पुलिस का कहर टूट पड़ा। मानवाधिकारवादी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकारों पर इतना जुल्म इसके पूर्व कभी नहीं ढाया गया था। उन्हें बस्तर छोडऩे का हुक्म नहीं सुनाया गया था, उन्हें बस्तर आने से रोका नहीं गया था। हद तो तब हो गई जब माओवादियों के प्रति सहानुभूति रखने के आरोप में, बस्तर का माहौल खराब करने के आरोप में, नक्सलियों को नैतिक समर्थन देने के आरोप में उनके खिलाफ समानांतर संगठन 'अग्निÓ को खड़ा किया गया जो अघोषित रूप से पुलिस के कार्यों को अंजाम देता रहा है। लगभग समूचे बस्तर में पुलिस के जवानों ने माओवादिओं को समर्थन देने के आरोप में सामाजिक कार्यकर्ताओं के पुतले जलाए, प्रदर्शन किया। ऐसी घटनाएं नक्सली हिंसाग्रस्त बस्तर में कभी नहीं देखी गई थी। सामाजिक कार्यकर्ताओं व मानवाधिकारवादियों के खिलाफ चलाए गए इस सुविचारित अभियान का व्यापक विरोध हुआ। और इस असफलता की छींटे जाहिर है, अंतत: मुख्यमंत्री रमन सिंह पर पड़ रहे हैं। हालांकि सरकार का अभी भी दावा है कि नक्सल समस्या दो-तीन वर्षों के भीतर समाप्त हो जाएगी। 
याद करें वर्ष 2007 में ऐसी ही एक कोशिश डॉ. विनायक सेन को जनसुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार करके जेल भेजने के रूप में हुई थी। उन पर माओवादी समर्थक होने एवं उनके लिए कार्य करने का आरोप था। यानी पुलिस के अनुसार वे सफेदपोश माओवादी थे। सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय डॉ. सेन की अंतरराष्ट्रीय ख्याति थी। उनकी गिरफ्तारी की गूंज देश की सीमाएं पार कर गईं। भारत सहित विश्वभर के प्रखर बुद्धिजीवियों एवं कुछ नोबल पुरस्कार विजेताओं ने राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय मंचों से उनकी गिरफ्तारी की निंदा की। हाई कोर्ट से सजा प्राप्त डॉ. सेन लंबे समय तक जेल में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट से जमानत पर छूटे। उनका प्रकरण अभी खत्म नहीं हुआ है। दस वर्ष पूर्व घटित इस चर्चित मामले से कहीं अधिक गंभीर मामले पिछले दो-तीन वर्षों के भीतर उन लोगों के खिलाफ दर्ज किए गए जिन्होंने नक्सलवाद खत्म करने के सरकार के तथाकथित अभियान के दौरान पुलिस ज्यादतियों एवं उसकी दमनात्मक कार्रवाइयों का विरोध किया। बस्तर में स्थिति यह है कि पुलिस की आलोचना करने का अर्थ है माओवादियों का समर्थक होना, शांति भंग करना, पुलिस की कार्रवाई में बाधा डालना और लोगों को भड़काना। इस सबके बीच सर्वाधिक दयनीय स्थिति उन मीडियाकर्मियों की हैं जो वहां तलवार की धार पर काम कर रहे हैं और सच को सच कहने की हिम्मत जुटा रहे हैं। 
पिछली चंद घटनाओं को लें। राज्य सरकार को पहला धक्का तब लगा जब सुकमा जिले के ताड़मेटला, तिम्मापुर व मोरपल्ली गांव में 11 से 16 मार्च 2011 के दौरान घटित आगजनी, बलात्कार व हत्या के मामले में सीबीआई ने सुरक्षा बलों को जिम्मेदार ठहराया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई को यह मामला सौंपा गया था जिसकी रिपोर्ट 2016 में पेश की गई। इस घटना में इन गांवों के 252 झोपडिय़ों को जलाया गया, आदिवासियों से मारपीट की गई, 3 महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ और तीन की हत्या कर दी गई। घटना के बाद कल्लूरी इसमें फोर्स का हाथ होने से इंकार करते रहे लेकिन सीबीआई की रिपोर्ट में उनका झूठ सामने आ गया। नक्सल मोर्चे पर अप्रतिम सफलता का दावा करने वाली राज्य सरकार पर आफत तब और टूट पड़ी जब 7 जनवरी 2017 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने उसे परोक्ष रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए नोटिस जारी किया। इस नोटिस के बाद मानवाधिकार पर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सुर बदल गए वरना वे हिंसा की प्राय: प्रत्येक घटना के बाद मानवाधिकारवादियों के हस्तक्षेप पर तंज कसते थे और उनसे अपील करते थे कि उन्हें बस्तर में आकर वस्तुस्थिति का जायजा लेना चाहिए।
बहरहाल पिछले डेढ़-दो वर्षों में कल्लूरी की कार्यप्रणाली पर हथौड़े चलने के बावजूद राज्य सरकार आश्वस्त थी कि जिस तरह उन्होंने सरगुजा से नक्सलवाद को खत्म किया उसी तरह वे बस्तर से भी नक्सलियों का सफाया कर देंगे। फिर कल्लूरी ने 1 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रायपुर विमानतल पर अगुवाई करते हुए उनसे कहा था कि वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के पूर्व बस्तर संभाग नक्सलमुक्त हो जाएगा। राजनीतिक दृष्टि से यह सरकार को गद्गद् करने वाली बात थी। तमाम विरोध के बावजूद सरकार बस्तर में पुलिस के अभियान से वैसे भी संतुष्ट थी लिहाजा कल्लूरी को अभयदान मिला हुआ था लेकिन बेला भाटिया प्रकरण ने सरकार को हिला दिया। जगदलपुर में रहने वाली सामाजिक कार्यकर्ता बेला को 23 जनवरी 2017 को 24 घंटे के अंदर बस्तर छोडऩे की धमकी दी गई। बस इस घटना के बाद कल्लूरी की उल्टी गिनती शुरू हो गई। इस घटना का देशव्यापी विरोध हुआ। घटना की गंभीरता का अहसास होते ही राज्य सरकार के मुख्य सचिव, डीजीपी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को जगदलपुर जाकर बेला भाटिया से मिलना पड़ा। सरकार ने उन्हें पूर्ण सुरक्षा का आश्वासन दिया। 31 जनवरी 2017 को देश के 125 प्रख्यात पत्रकारों-संपादकों, अर्थशास्त्रियों, फिल्मकारों एवं सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकीलों ने एक संयुक्त बयान जारी करके बस्तर में कानून के राज की मांग की। बस्तर किस कदर गर्म था इसकी झलक उनकी इस अपील से मिलती है जिसमें कहा गया था कि दबंगई पर उतारू कानून व मानवाधिकार का सम्मान न करने वाले किसी भी समूह को राज्य की ओर से समर्थन न दिया जाए तथा सुरक्षा बल व राज्य की अन्य संस्थाएं कानून व संविधान के दायरे में रहकर काम करें। इशारा स्पष्टत: कल्लूरी, उनकी पुलिस व उनके द्वारा घोषित संगठन 'अग्निÓ की ओर था। अपील जारी करने वाली इस विज्ञप्ति पर हस्ताक्षर करने वाले सभी अपने-अपने क्षेत्र में प्रख्यात हैं जैसे- अरुंधती राय, इंदिरा जयसिंह, जावेद अख्तर, मृणाल पांडे, नंदिता दास, रामचन्द्र गुहा, शबाना आजमी, शर्मिला टैगोर, सुनीता नारायण आदि। 
मुख्यमंत्री रमन सिंह चिंतित है। पिछले कार्यकाल में इतनी निर्मम स्थितियों का उन्हें कभी सामना नहीं करना पड़ा था। सवाल अगले चुनाव का है, भाजपा के निरंतर चौथे कार्यकाल का है। बस्तर की घटनाओं पर देशव्यापी तीखी प्रतिक्रिया से चिंता स्वाभाविक है। यह प्रतिक्रियाओं का ही परिणाम है कि उन्हें बस्तर में मानवाधिकार संरक्षण के लिए राज्य स्तरीय एवं जिलेवार समितियां गठित करने का फैसला लेना पड़ा। लेकिन सवाल किसी की जीत, किसकी हार का नहीं है। सवाल है बस्तर में आदिवासियों की सुरक्षा का, उनके अधिकारों के संरक्षण का, उनके स्वास्थ्य का, शिक्षा का, उनके जीवन को सुगम बनाने का, उन्हें हर तरह के शोषण से मुक्त करने का और जीवन निर्वाह के लिए यथोचित बंदोबस्त का यानी सर्वांगीण विकास व मुख्यधारा से जोडऩे का और जागरुकता का। यह भी देखना होगा कि बस्तर में कोई दूसरा कल्लूरी पैदा न किया जाए और जहां तक मानवाधिकार की बात है, जिंदाबाद कहने का हक सभी को है पर इसके लिए वातावरण बनाने की जिम्मेदारी सामाजिक कार्यकर्ताओं व मानवाधिकारवादियों की भी है, केवल सरकार की नहीं।
(लेखक पायनियर रायपुर के सलाहकार संपादक हैं)

Monday, January 9, 2017

उत्पाद लुटाने की नौबत दुबारा न आए

-दिवाकर मुक्तिबोध
यह कितनी विचित्र बात है कि छत्तीसगढ़ में कृषि के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्यों के लिए राज्य सरकार राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजी जाती रही है लेकिन राज्य के किसान एक तो ऋणग्रस्तता की वजह से आत्महत्या करते रहे हैं या फिर अपनी उपज मुफ्त में या औने-पौने दामों में बेचने के लिए मजबूर हैं। किसानों की यह पुरानी मांग है कि उत्पादन लागत को देखते हुए धान का समर्थन मूल्य बढऩा चाहिए। भाजपा सरकार ने अपनी तीसरी पारी शुरू करने के पूर्व, अपने चुनावी घोषणापत्र में किसान जनता से वायदा भी किया था कि समर्थन मूल्य 2१00 रु. प्रति क्विंटल कर दिया जाएगा तथा किसानों को 300 रुपए प्रति क्विंटल की दर से बोनस भी दिया जाएगा। किंतु अब तक ऐसा नहीं हो सका और अब इसकी गुंजाइश भी खत्म हो गई है। हालांकि इस मुद्दे को कांग्रेस अभी भी गर्म रखने की कोशिश कर रही है। बहरहाल यह तो धान की बात हुई लेकिन अब साग-सब्जी उत्पादक भी उत्पादन और खपत के बीच असंतुलन की वजह से परेशान हैं। परेशानी की वजह लागत मूल्य में वृद्धि, महंगा परिवहन, बिचौलियों की मनमानी, उत्पादन में बढ़ोतरी और फिलहाल एक हद तक नोटबंदी रही है। पिछले दशक से टमाटर उत्पादन का रकबा काफी बढ़ा है किंतु ऐसी नौबत कभी नहीं आई कि किसानों को टनों टमाटर बीच सड़क पर फेंकने पड़े हों या टनों सब्जियां राजधानी रायपुर में मुफ्त बांटनी पड़ी हों। जशपुर के लुडेग में और दुर्ग जिले के धमधा में जब किसानों से बिचौलियों ने 25-30 पैसे प्रति किलो से अधिक दाम देने से इंकार कर दिया तब उत्पादकों ने अपना रोष टमाटर नष्ट करके जाहिर किया। इसी तरह राजधानी रायपुर में लाखों की सब्जियां मुफ्त में बांट दी। ऐसा दृश्य राज्य में पहले कभी देखने में नहीं आया था। हालांकि दो-ढाई दशक पूर्व टमाटर की कीमत को लेकर कुछ ऐसी स्थिति बनी थी जब कांग्रेस के नेता एवं तत्कालीन विधायक तरुण चटर्जी ने नगरघड़ी चौक में ट्राली में खड़े होकर मुफ्त में टमाटर बांटे थे हालांकि यह किसानों के प्रति उनकी हमदर्दी कम राजनीतिक नौटंकी ज्यादा थी। यकीनन राज्य में टमाटर के विपुल उत्पादन व बाजार की अर्थव्यवस्था के कारण यह समस्या दशकों पुरानी है जिसका कोई इलाज अब तक नहीं हो सका है।
       दरअसल पुरस्कार हासिल करना अलग बात है और जमीनी हकीकत से रुबरु होना अलग है। सरकार की नींद तब खुलती है जब पानी सिर के उपर से गुजरने को होता है। किसानों के साथ ऐसा ही हो रहा है। कहने के लिए कृषि का अलग बजट बनता है, कृषि एवं इससे संबंधित कार्यों के लिए भारीभरकम राशि का प्रावधान रहता है, सरकार किसानों की हमदर्द बनने का दावा करती है किंतु उनकी समस्याएं कम होने के बजाए और कठिनतर हो जाती है, हो गई है वरना बड़ी संख्या में आत्महत्या की घटनाएं नहीं होती। राज्य बनने के पूर्व ऐसा कभी नहीं सुना नहीं गया था कि किसान ऋण के बोझ की वजह से खुदकुशी कर रहे हो या भुखमरी के शिकार हो रहे हों। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ में एक वर्ष में 954 किसानों ने जान दी। औसत निकालें तो प्रतिदिन दो से अधिक किसानों ने आत्महत्या की। आत्महत्या के कारण और भी हो सकते हैं लेकिन भूलना नहीं चाहिए कि मरने वाले पेशे से किसान थे। मौतों का यह आंकड़ा चौकाने वाला है लिहाजा कृषि एवं कृषकों से संबंधित समस्याओं के तेजी से निपटारे की जरूरत है।
सब्जी उत्पादकों की कठिनाइयों की ओर राज्य सरकार का ध्यान तब गया जब उत्पादकों ने सड़कों पर टमाटरों की परत बिछा दी और मुफ्त में सब्जियां बांटी। कैबिनेट की 3 जनवरी 2017 की हुई बैठक में मुख्यत: किसानों की बदहाली का मुद्दा छाया रहा। नौकरशाहों की ओर से यह कहा गया कि खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों की स्थापना से ही कृषि संकट से निपटा जा सकता है। मुख्यमंत्री ने किसानों के लिए नई नीति बनाने के निर्देश दिए और यह तय किया गया कि कृषि, उद्यानिकी व उद्योग विभाग संयुक्त रूप से इसे तैयार करेंगे। नई नीति क्या होगी यह कैबिनेट की अगली बैठक में स्पष्ट होगा और जाहिर है राज्य के प्रस्तावित बजट में इसे शामिल किया जाएगा। फौरी तौर पर सब्जी उत्पादकों को राहत देने की दृष्टि से सरकार ने सौ कोल्ड स्टोरेज की स्थापना की घोषणा की है पर जाहिर है यह समस्या का हल नहीं है। लघु उत्पादकों को इससे कोई राहत नहीं मिलेगी क्योंकि यह प्राय: निश्चित है सरकारी सुविधाओं का दोहन वे ही करते हैं जो आर्थिक दृष्टि से सक्षम रहते हैं।
    राहत उपायों के सन्दर्भ में सहकारिता पर भी विचार किया जाना चाहिए। सब्जी उत्पादकों को सही मूल्य मिले और वे बिचौलियों के चंगुल से आजाद हो, इसके लिए काफी पहले, कोई दो-ढाई दशक पूर्व जिला प्रशासन की ओर से एक व्यवस्था की गई थी। व्यवस्था थी सहकारिता के माध्यम से किसानों से उनके उपज की खरीदी की। इसके लिए एक सहकारी समिति बनाई गई थी जिसका कार्यालय राजधानी के शास्त्री मार्केट में खोला गया था। प्रारंभ सुखद था किंतु धीरे-धीरे इसका कामकाज ठंडा पड़ता गया। जबकि सहकारिता आंदोलन से किस तरह समृद्धता आती है, उसका सबसे बेहतर उदाहरण गुजरात व महाराष्ट्र है। क्या छत्तीसगढ़ में ऐसा कुछ नहीं हो सकता? विशेषकर लघु उत्पादकों के लिए सहकारिता को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता? साग सब्जियां नगदी फसल होने की वजह से किसान ज्यादा आकर्षित हैं लेकिन जब बाजार मूल्य नियंत्रित नहीं होता तो सर्वाधिक नुकसान भी उन्हीं को होता है। जैसा कि इस बार हुआ है। उम्मीद की जानी चाहिए उत्पाद लुटाने की नौबत दुबारा नहीं आएगी और नई कृषि में ऐसे किसानो ंके लिए माकूल व्यवस्था होगी।

Friday, December 23, 2016

चिकित्सा में पी. पी. पी. विचार करें सरकार

-दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं को निजी हाथों में सौंपने के राज्य सरकार के फैसले पर बहस की पर्याप्त गुंजाइश है, किंतु दुर्भाग्य से ऐसा कुछ होता नहीं है। जनकल्याणकारी योजनाएं चाहे केन्द्र की हों या राज्य सरकार की, वे वैसी ही होती हैं जैसा प्राय: सरकारें चाहती हैं, इसमें जनविचारों की भागीदारी कतई नहीं होती जबकि कहा जाता है सरकारें जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। यदि सभी नहीं, तो क्या कुछ योजनाओं पर प्रबुद्ध नागरिकों, विशेषज्ञों से विचार-विमर्श नहीं किया जा सकता? जाहिर है न नौकरशाही इसकी इजाजत देती हैं और न ही राजनीति क्योंकि यहां सवाल श्रेय का, श्रेष्ठता का एवं अहम् का होता है। बहरहाल पिछले दिनों की एक खबर के मुताबिक छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य के सभी 27 जिलों में बच्चों एवं माताओं के लिए अस्पताल बनाने एवं उन्हें पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी के तहत निजी हाथों में सौंपने का फैसला किया है। सरकारी खबर के अनुसार भवन एवं आवश्यक सभी सुविधाओं की व्यवस्था सरकार करेगी। बाद में उनके संचालन की जिम्मेदारी निजी उद्यमियों को सौंप दी जाएगी, ठीक वैसे ही जैसा कि राजधानी रायपुर में करीब 15 बरस पूर्व एस्काटर््स हार्ट सेंटर के मामले में हुआ। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के कार्यकाल में एस्काटर््स का रायपुर में पदार्पण हुआ और छत्तीसगढ़ को हृदय रोग से संबंधित पहला अस्पताल मिला जिसके लिए सरकार ने लगभग 300 करोड़ रुपए खर्च किए। यह अलग बात है कि गरीबों विशेषकर गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों की मुफ्त हृदय चिकित्सा की जिन शर्तों पर एस्कार्ट्स को अस्पताल सौंपा गया था, उसका सतत् उल्लंघन होता रहा और सरकार मूकदर्शक बनी रही। अब इस अस्पताल को अपने अधिकार में लेने सरकार प्रयत्न कर रही है। पता नहीं वह कब सफल होगी। 
    बहरहाल जोगी के जमाने के इस असफल प्रयोग पर अब भाजपा सरकार काम कर रही है। हालांकि घोषणा के बावजूद अभी इस दिशा में कुछ नहीं हुआ है। योजना के अनुसार सरकार अस्पतालों के लिए इमारतें बनाने, उसे वातानुकूलित करने, आवश्यक मशीनें एवं उपकरणों की व्यवस्था करने, पैथ लैब बनाने आदि पर करीब 300 करोड़ रुपए खर्च करेगी। अस्पताल तैयार होने के बाद इन्हें निजी संचालकों को सौंप दिया जाएगा। शर्तें क्या होंगी इसका खुलासा नहीं हुआ है पर यह तय है गरीबों के मुफ्त इलाज की शर्त अवश्य होगी। सरकार की तरफ से निगरानी की व्यवस्था क्या होगी? यह भी स्पष्ट नहीं है। क्या इन अस्पतालों की संचालन कमेटी में सरकार और जनता का कोई प्रतिनिधि होगा, इसका भी पता नहीं। अलबता इस योजना जो मुख्यत: गरीब तबके के लिए है, की सफलता ऐसे ही सवालों पर निर्भर है। 
छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सुविधाओं पर बात करें तो स्थिति निराशाजनक ही कही जाएगी। हालांकि शासन ने स्मार्ट कार्ड के जरिए 50 हजार रुपए तक की मुफ्त चिकित्सा की व्यवस्था कर रखी है। लेकिन यह नाकाफी है क्योंकि विभिन्न कारणों से जन स्वास्थ्य की समस्याएं ज्यादा विकराल हैं। शहरों, ग्रामीण अंचलों विशेषकर आदिवासी इलाकों में प्रत्येक वर्ष मलेरिया, डायरियां आदि बीमारियों से होने वाली मौतों में कोई कमी नहीं आई है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों का बुरा हाल है, वहां न तो डाक्टर होते हैं और न ही दवाइयां। मामूली बीमारियों के लिए भी लोगों को शहरों की ओर रुख करना पड़ता है जहां निजी अस्पतालों में महंगे इलाज की वजह से उन्हें जमीन-जायदाद तक बेचनी पड़ती है। 
     दरअसल सबसे बड़ा संकट विश्वास का है। वैसा ही संकट जो स्कूली शिक्षा और कानून व्यवस्था के मामले में नार आता है। सरकारी स्कूलों में गुणवत्ताविहीन शिक्षा अविश्वास की भावना पैदा करती है इसीलिए निजी स्कूल खूब पनप रहे हैं और लूट-पाट मचा रहे हैं। इसी तरह कानून-व्यवस्था के मामले में लोग पुलिस से दूर भागते हैं। वे उसके मित्र नहीं हैं जबकि आम लोगों को अपना मित्र बनाने पुलिस निरंतर प्रयास करती है पर उसका खौफ इस कदर है कि यह उक्ति यथावत है कि पुलिस से न दोस्ती भली, न दुश्मनी। स्वास्थ्य के मामले में संकट कुछ अलग है। यहां सवाल सिर्फ स्तर का नहीं, चिकित्सा की उपलब्धता का भी है। क्या कारण है कि दूर-दराज के ग्रामीण भी अपनी तमाम पूंजी के साथ निजी अस्पतालों की शरण लेते हैं। प्रायवेट अस्पतालों में विशेषकर सुविधा सम्पन्न बड़े अस्पतालों में ऐसे लोगों की भारी भीड़ इस बात की गवाह है कि वे इन्हें सरकारी अस्पतालों से बेहतर मानती है। जबकि चिकित्सा की श्रेष्ठता शासकीय चिकित्सालयों में भी कायम है। 
    ऐसा लगता है कि स्वास्थ्य के मामले में सरकार ने हार मान ली है। सभी 27 जिलों में अस्पताल बनाकर उन्हें निजी हाथों में सौंपने के पीछे यह दलील दी जा रही है कि सरकारी अस्पतालों के लिए डाक्टर नहीं मिलते। शहरी केन्द्रों में जब चिकित्सकों के पद रिक्त पड़े रहते हैं तो कस्बों के अस्पतालों की हालत का अंदाज लगाया जा सकता है। इसी तर्क के साथ स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजीकरण को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस विचार में कोई दिक्कत नहीं है बशर्तें पेशे के प्रतिबद्ध एवं इमानदार लोग चुने जाएं। क्या भ्रष्ट तंत्र के लिए यह संभव है? कतई नहीं। तब गरीबों को बेहतर एवं त्वरित चिकित्सा उपलब्ध कराने की जिस मकसद से यह योजना बनाई गई है, वह कैसे सफल होगी? यकीनन सरकारी खर्च से बने अस्पताल निजी संचालकों के लिए एक तरह से कमाई के वैसे ही स्रोत बनेंगे जैसे कि एस्काटर््स रायपुर है। यानी चिकित्सा के नाम पर लूट-खसोट के नए केन्द्र खुल जाएंगे। अत: सरकार को विचार करना होगा कि निजीकरण को प्रोत्साहित करने के बजाए क्या ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार के साथ-साथ मौजूदा उपायों को बेहतर नहीं बनाया जा सकता?

Saturday, December 10, 2016

सत्ता के 13 वर्ष कम तो नहीं होते

-दिवाकर मुक्तिबोध
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को देखकर आपको, आम आदमी को क्या लगता है? क्या राय बनती है? अमूमन सभी का जवाब एक ही होगा- भले आदमी हैं, नेकदिल इंसान। सीधे, सरल। मुख्यमंत्री होने का दंभ नहीं। सबसे प्रेम से मिलते हैं। सबकी सुनते हैं। लेकिन शासन? जवाब यहां भी एक जैसा ही होगा - लचर है। नौकरशाहों पर लगाम नहीं है। उनकी मनमानी रोकने में असमर्थ है। धाक नहीं है। भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं है। सुस्त है। सरकार वे नहीं, नौकरशाह चला रहे हैं। सरकारी योजनाओं का लाभ निचले तबके तक नहीं पहुंच पा रहा है। सरकारी कामकाज में पारदर्शिता नहीं है। फाइलों के आगे बढऩे की रफ्तार बेहद सुस्त है और सर्वत्र कमीशनखोरी का जलवा है। और उनकी राजनीति? यहां भी प्राय: सभी का जवाब तकरीबन एक जैसा ही होगा- बहुत घाघ हैं। जबरदस्त कूटनीतिज्ञ। अपने विरोधियों को कैसे चुन-चुनकर ठिकाने लगाया। आदिवासी नेतृत्व की मांग करने वालों की हवा निकाल दी। उनकी कुर्सी की ओर आंखें उठाने वालों की बोलती बंद कर दी। शासन की आलोचना करने वाले सांसदों व पार्टी नेताओं को आईना दिखा दिया। कईयों के लिए मार्गदर्शक की भूमिका का इंतजाम कर दिया। संगठन के नेतृत्व को भी अपनी मुट्ठी में रखा। कोई हूं की चूं नहीं। सभी महत्वपूर्ण स्थानों, पदों पर अपने मोहरे फिट किए? गजब के राजनेता। मासूमियत भरी राजनीति। भाजपा शासित पहला प्रदेश जहां पार्टी में असंतोष पानी के बुलबुले की तरह है, फूंक मारते ही ध्वस्त। और अब पार्टीजनों, नेताओं के न•ारों में रमन सिंह? जवाब मिलेगा- पंगा लेने का मतलब नहीं। केन्द्र में जबरदस्त पकड़। पीएम तक तारीफ करते हैं। लेकिन यहां अभयदान। खूब कमाओ, खाओ। लिहाजा चौथी पारी भी मिलनी ही चाहिए।
    तो ये हैं, प्रदेश की जनता के प्रति बेहद संवेदनशील, उदारमना मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह जिनके शासन के 13 वर्ष 12 दिसम्बर 2016 को पूर्ण होने वाले हैं। मुख्यमंत्री के बतौर तीसरी पारी के अभी दो वर्ष और बाकी हैं। यानी दो जलसे इन्हीं तारीखों में और होंगे जैसे कि इस बार हो रहे हैं। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि हर सरकार को यह हक है कि वह अपनी उपलब्धियों का खूब ढिंढोरा पीटे भले ही वे कमतर क्यों न हो। फिर सत्ता के 13 वर्ष कम नहीं होते। मुख्यमंत्री के बतौर तीसरी पार्टी हर किसी राजनेता को नसीब नहीं होती। भाजपा शासित राज्यों में दो ही मुख्यमंत्री ऐसे हैं जो तीसरी पारी खेल रहे हैं- एक म.प्र. के शिवराज सिंह और दूसरे रमन सिंह। रमन सिंह के अब तक के कार्यकाल का असली लेखा-जोखा जनता के पास है, जो चुनाव वर्ष 2018 में वोटों के जरिए सामने आएगा। सरकार विकास के दावे भले ही कितने ही क्यों न करे लेकिन तय जनता को करना है। इसमें संदेह नहीं कि सरकार की लोककल्याणकारी नीतियों की वजह से राज्य में काफी कुछ बदला है। यह बदलाव हर मोर्चे पर न•ार भी आता है विशेषकर आधारभूत संरचनाओं के मामले में। शहरों में जीवनस्तर सुधरा है, कुशल, अकुशल हाथों के पास पर्याप्त काम है किंतु गांंव? वे अभी भी समस्याग्रस्त हैं। राज्य के 19 हजार गांवों में से कुछ दर्जन गांवों को छोड़ दें तो शेष नागरिक जीवन की सुविधाओं के लिए तरस गए हैं। जबकि सरकार दावा करती है कि उसकी प्राथमिकता गांवों का विकास है। अभी चंद दिन पूर्व राजधानी में आयोजित युवा सम्मान समारोह में मुख्यमंत्री एवं सरकार के अन्य नुमाइंदों की मौजूदगी में प्रतिभाशाली युवाओं ने कहा- वे गांवों में मूलभूत सुविधाएं चाहते हैं और इसके लिए वे आगे चलकर अपने स्तर पर प्रयत्न करेंगे। वे ऐसा छत्तीसगढ़ चाहते हैं जहां हर गांव में स्कूल व अस्पताल हो। जिला दंतेवाड़ा के ग्राम बुरगुम के किशोर वय के भारत कुमार ने कहा उनके गांव में सिर्फ कक्षा 8वीं तक स्कूल है। गांव में बिजली नहीं, सड़क कच्ची है और पानी के नाम पर केवल हैंडपम्प है। अपनी प्रतिभा के दम पर गांवों से उच्च शिक्षा के लिए निकले प्राय: सभी युवाओं का एक ही दर्द है- उनके गांवों की बदहाली। ग्रामीण युवाओं के विचारों से जाहिर है नया राज्य बनने के बावजूद 16 वर्षों में गांवों की हालत बदली नहीं है। अब राज्य सरकार 12 दिसम्बर को राजधानी में एक विराट सम्मेलन करके युवाओं से जानना चाहती है कि गांव की जरूरतें क्या हैं और उनके क्या सुझाव है। गोया सरकार के बड़े-बड़े अफसर, राज्य के विधायक,ं नेता और प्रदेश पार्टी का नेतृत्व नहीं जानता कि गांवों की समस्याएं क्या हैं और सरकार को क्या करना चाहिए। जाहिर है, 12 दिसम्बर का सम्मेलन राजनीतिक है और पार्टी की न•ार में वे 34 लाख युवा हैं जिनके वोट उसके लिए कीमती हैं। सरकार उनके मुख से अपनी उपलब्धियां भी सुनना चाहती है। इसलिए इस सम्मेलन का गांवों के विकास से कोई लेना-देना नहीं है। बहरहाल बात फिर घूम फिरकर वहीं आ जाती है कि सरकार ने इन 13 वर्षों में गांवों के लिए क्या किया? क्यों नहीं तस्वीर बदली? अरबों रुपए खर्च हो गए। कहां गए वे? मलेरिया, पीलिया जैसे रोगों से अभी भी ग्रामीण क्यों मरते हैं? किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य क्यों नहीं मिलता? क्यों लुडेग, पत्थलगांव के किसानों को अपने टनों टमाटर सड़कों पर फेंकने पड़ते हैं जबकि तीन दशक पूर्व म.प्र. के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने जशपुर, रायगढ़ क्षेत्र में टमाटर की भारी पैदावार को देखते हुए वहां फूड प्रोसेसिंग यूनिट की स्थापना करने की घोषणा की थी। छत्तीसगढ़ नया राज्य बन गया, 15 वर्ष बीत गए किंतु एक अदद प्लांट वहां स्थापित नहीं हो सका जबकि सरकार फुड प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने की बात करती रही है। बस्तर में नक्सल समस्या के चलते स्वीकृत डेढ़ सौ से अधिक सड़कें पिछले कई वर्षों से नहीं बन पा रही हैं। कल्पना की जा सकती है, वनांचलों के सैकड़ों गांवों की स्थिति क्या होगी जहां पहुंच मार्ग ही नहीं है। छत्तीसगढ़ के गांवों की और भी मूलभूत समस्याएं हैं जबकि प्रत्येक वर्ष मुख्यमंत्री दर्जनों गांवों का दौरा करते हैं, गांवों से जनप्रतिनिधि विधानसभा एवं पंचायतों के लिए निर्वाचित होते हैं, छोटी-बड़ी तमाम किस्म की योजनाएं बनती है किंतु गांवों की तस्वीर नहीं बदलती। भूखमरी, बेरोजगारी, प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य तथा जीवन की अन्य कठिनाइयां और दरिद्रगी छत्तीसगढ़ के गांवों की अभी भी मूल पहचान है। राज्य स्थापना दिवस पर हर वर्ष सरकारी उत्सवों के बीच यह पहचान गुम हो जाती है, गुम कर दी जाती है पर जाहिर है समाप्त नहीं होती।

Thursday, December 8, 2016

एनजीओ और मंत्री का दर्द

-दिवाकर मुक्तिबोध
     कहते हैं देश बदल रहा है, शहर बदल रहे हैं, गांव बदल रहे हैं लेकिन क्या वे बदल रहे हैं जिन्हें वास्तव में बदलना चाहिए, देश हित में, समाज हित में, लोक हित में? जवाब है - बिलकुल नहीं। न बदलने वालों की अनेक श्रेणियां हैं- भ्रष्ट राजनेता हैं, भ्रष्ट मंत्री हैं, भ्रष्ट अफसर हैं और इनके द्वारा पोषित वे संस्थाएं हैं, संगठन हैं जिन्होंने समाज सेवा का नकाब पहन रखा है। गैर सरकारी संगठन यानी एन.जी.ओ. भी इसी तरह की अमर बेल है जो सरकार के महकमों से लिपटी हुई है और जिनके कामकाज को लेकर लंबी बहसें होती रहती हैं। निष्कर्ष के रूप में यह माना जाता है कि देश-प्रदेश में कार्यरत बहुसंख्य एन.जी.ओ. अपनी भूमिका के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। वे सरकारी नुमाइंदों के साथ गठजोड़ करके बेतहाशा पैसा पीट रहे हैं। सामाजिक क्षेत्र में इनके द्वारा किए जाने वाले कथित कामकाज काफी हद तक कागजों तक सिमटे हुए हैं। इनके भौतिक सत्यापन की न तो कभी जरूरत महसूस की जाती है और न ही कभी जांच बैठायी जाती है। एक तरह से ये सरकार के नियंत्रण से मुक्त है। बेखौफ हैं। भ्रष्टाचार का माध्यम बने हुए हैं। 
    विचार करें, दशकों से कार्यरत इन संस्थाओं के जरिए कितना बदलाव आया? क्या वह संतोषजनक है? विशेषकर वनांचलों में, बेहद पिछड़े इलाकों में, आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में जन चेतना कितनी विकसित हुई है? लोग अपने अधिकारों के प्रति कितने जागरुक हुए हैं? शिक्षा व स्वास्थ्य के महत्व को कितनों ने पहचाना व स्वीकार किया है? जबकि सरकारें अपने तई व इनके माध्यम से भी अब तक बेतहाशा धन खर्च कर चुकी हैं। तो फिर ये संस्थाएं कर क्या रही हैं? 
    दरअसल इसमें शक नहीं कि सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के विकास एवं कुरीतियों से निजात पाने की दिशा में गैर सरकारी संगठनों की भूमिका अहम हो सकती है और है भी लेकिन कुछ दर्जन एनजीओ को छोड़ दें तो शेष सफेद हाथी बने हुए हैं जो सरकार के पालतू हैं। देश को छोड़ दें तो छत्तीसगढ़ में ही 173 एनजीओ पंजीकृत हैं जिन्हें केंद्र व राज्य सरकार से फंड मिलता है। अभी हाल ही में राज्य की महिला, बाल विकास व समाज कल्याण मंत्री श्रीमती रमशीला साहू ने विभागीय सचिव को निर्देशित किया कि सभी एनजीओ को नोटिस जारी कर उनसे कामकाज का हिसाब मांगा जाए। आंकड़ों के मुताबिक राज्य के 59 एनजीओ ऐसे हैं जिन्हें वर्ष 1986-87 से केंद्र सरकार से सहायता मिल रही है। इन संस्थाओं को अभी तक 86 करोड़ रुपए दिए जा चुके हैं। कतिपय खास संस्थाओं को विभिन्न प्रोजेक्ट्स के तहत राज्य सरकार ने भी लाखों रुपए दिए हैं। विभागीय मंत्री का दर्द यह है कि रायपुर की एक संस्था को दो-तीन सालों में 60 लाख रुपए जारी किए गए किंतु उन्हें इसकी भनक तक नहीं लगी और जब बात सामने आई तो शिकायतों का पुलिंदा जो कचरे में पड़ा हुआ था, उसे खोला गया और उसके आधार पर सभी एनजीओ से उनके कामकाज की जानकारी मांगी गई, खर्चों का ब्यौरा देने के लिए कहा गया। 
    लेकिन इस चिट्ठी-पत्री से होने-जाने वाला कुछ नहीं है। थोड़े समय के लिए कुछ हलचल मचेगी और फिर सब कुछ शांत हो जाएगा और व्यवस्था फिर पहले जैसे चलती रहेगी। दरअसल सामाजिकता के नाम पर आर्थिक षडय़ंत्र रचने वाले रैकेट बरसों से सरकारी विभागों में अपनी पैठ जमाए हुए हैं। जाहिर है उनका उद्देश्य पैसा बनाना है और ये पैसा बना रहे हैं। प्रमुख रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक जनजागरण के क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों के कामकाज का कभी भौतिक सत्यापन नहीं होता, न इनके कामकाज पर कभी निगरानी रखी जाती है। समाज कल्याण विभाग में ऐसी कोई व्यवस्था भी नहीं है कि इतने कामकाज की पड़ताल की जाए कि वास्तव में राज्य के दूरस्थ अंचलों में विशेषकर आदिवासी इलाकों में ये संस्थाएं कैसा काम कर रही हैं। क्या इनके कामकाज से कोई जागृति आई है? क्या आदिवासियों को शिक्षा का महत्व समझ में आ रहा है? क्या कभी किसी मंत्री ने या विभाग के अफसरों ने गांव, देहातों में जाकर आकस्मिक निरीक्षण किया है? क्या कभी अपने माध्यमों से पता लगाने की कोशिश की है कि वित्त पोषित ये संस्थाएं ठीक से काम कर रही हैं अथवा नहीं। क्या कभी इनके द्वारा पेश वित्तीय बिलों की असलियत जांचने की कोशिश की गई है? क्या कभी यह देखा गया है कि इनके संचालकों की माली हालत पहले क्या थी और अब क्या है? क्या इनके बैंक एकाउंट खंगालने की कोशिश की गई? क्या कभी यह जांचने की कोशिश की गई कि इनके तथा परिवार के सदस्यों के नाम पर चल-अचल सम्पत्ति कितनी है और वह कब अर्जित की गई है? वस्तुत: ऐसा कुछ करना इसलिए संभव नहीं है क्योंकि यह सरासर मिलीभगत का मामला है, शेयरिंग का मामला है। जिस व्यवस्था में सरकारी कामकाज देने के एवज में चैक जारी करने के पूर्व कमीशन की नगद राशि पहले ही रखवा ली जाती है, उससे बदलाव की उम्मीद भी क्या की जा सकती है? इसलिए एनजीओ को नोटिस जारी करने से कुछ नहीं होगा। यह तो केवल दबाव बनाने की कसरत है जो बीच-बीच में मामला सधते न देखकर होती रहती है। इसलिए भौतिक संरचनाओं की दृष्टि से गांव-शहर बदल सकते हैं पर व्यवस्था नहीं, क्योंकि वह सरासर भ्रष्टाचार की नींव पर टिकी हुई है।

Thursday, November 24, 2016

अब इस हवा का क्या करें

-दिवाकर मुक्तिबोध 
 स्मार्ट सिटी, स्मार्ट विलेज, मेक इन इंडिया, स्टैंडअप इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसे लुभावने नारों  के बीच गौर करें शहरों, गांवों में वस्तुस्थिति क्या है? ढाई वर्ष पूर्व केन्द्र में भाजपा सरकार के सत्तारुढ़ होने के बाद क्या वाकई देश बदल रहा है? लंबी बहस का विषय है। तर्क-कुतर्क अंतहीन क्योंकि बहुत कुछ राजनीतिक चश्मे से देखा जाना है। बहरहाल केवल राज्य की बात करते हैं। अपने राज्य की, छत्तीसगढ़ की, राजधानी रायपुर की। और बात भी केवल हवा की, वायुमंडल की जो दिनों दिन इतना विषाक्त हो रहा है कि सांस लेना भी मुश्किल। इस विषय पर आगे बढऩे के पूर्व हाल ही में मीडिया में आई दो खबरों पर गौर करेंगे। पहली खबर थी ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजिज की उस रिपोर्ट की जिसके अनुसार वर्ष 2015 में वायुप्रदूषण से सबसे अधिक मौतें भारत में हुई हैं जो चीन से भी अधिक है। आंकड़ों में कहा गया है कि 2015 में भारत में रोजाना 1640 लोगों की असामयिक मौतें हुई जबकि इसकी तुलना में चीन में 1620 जानें गई। चीन दुनिया का सबसे अधिक प्रदूषित देश माना जाता है। अब दूसरी खबर देखें, रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार आस्ट्रेलिया के मुकाबले रायपुर शहर के औधोगिक इलाकों में वायुमंडल में धूल के कणों की मात्रा 18 हजार गुना अधिक है। कुछ तर्कों के साथ आप इस अध्ययन को आराम से खारिज भी कर सकते हैं लेकिन अलग-अलग अध्ययन में ऐसी रिपोर्ट कई बार आई हैं कि रायपुर देश-विदेश के 10 सबसे गंदे शहरों में शुमार है।
       लेकिन यह तो हकीकत है कि शहर बदल रहे हैं। भौतिक संरचनाओं की प्रगति साफ नज़र आती है। किन्तु हवा का क्या? वायु मंडल निरंतर जहरीला क्यों हो रहा हैं? लोगों का स्वास्थ्य क्यों बिगड़ रहा है? दमा, अस्थमा, ब्रांकाइटिस जैसी वायुजनित बीमारियां क्यों बढ़ रही हैं? क्यों लोग मर रहे हैं? क्यों सब जगह धूल ही धूल है? सड़कें ऐसी क्यों बनाई जाती हैं कि सीमेंट की परत उखडऩे  के साथ ही बजरी का गुबार दो पहियों पर सवार लोगों एवं पदयात्रियों को धूल धूसरित कर देता है? क्यों ? क्यों ?
       दरअसल अनियोजित विकास, दृष्टि का अभाव एवं सरकार में इच्छाशक्ति की कमी इसका मूल कारण है। एक बड़ा कारण जनता का विद्रोही स्वभाव का न होना भी है जो हर कठिनाई को बर्दाश्त करती  है, गुस्से को पी जाती है। शांत रहते हुए ज्यादतियों को सहन करती हैं। आम तौर पर लोकतांत्रिक देश की जनता ऐसी ही होती है। और यह स्थिति प्रत्येक शासन के लिए मुफीद है, सरकारें चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हो। छत्तीसगढ़ में बीतें 12 वर्षों से भाजपा की सरकार है। इन वर्षों में उसने कई अच्छे काम किए हैं, किंतु कुछ चुनौतियां ऐसी भी हैं जिससे निपटने में उसकी कोई रूचि नजर नहीं आती। औद्योगिक प्रदूषण ऐसी ही एक चुनौती है जिसका जनस्वास्थ्य से सीधा संबंध है। इस मुददे को लेकर बहुत बाते होती रही हैं पर हुआ क्या? वायुमंडल में काली धूल के बारीक कणों की मात्रा निरंतर बढ़ती जा रही है। राजधानी के किसी भी घर की छत पर आप जाइए, पैरों के पंजों की छाप बनती चली जाएगी। शहर से सटे औद्योगिक इलाकों के संयंत्र औद्योगिक सुरक्षा व वायु प्रदूषण नियंत्रण इकाइयों के सारे सरकारी नियम कायदों को चुनौती देते नज़र आएंगे। किसी पर कोई नियंत्रण नहीं। और यह सब इस वजह से क्योंकि सारा कुछ सधा-बधा है। मंत्री, नेता, उद्योगपति और इनके बीच की कड़ी अधिकारी-कर्मचारी। रिश्वत में ताकत ही कुछ ऐसी होती है कि जनता एवं उसकी तकलीफों की परवाह करने की जरूरत नहीं।
        ऐसा नहीं कि विषाक्त होते वातावरण और इसके लिए जिम्मेदार उद्योग व उद्योगपतियों के खिलाफ आवा•ा न उठी हो, आंदोलन न हुए हों। कभी भाजपा के वरिष्ठ विधायक और अब राज्य शासन के एक महत्वपूर्ण ओहदे पर सवार देवजी पटेल ने आंदोलन की कमान संभाली थी। उद्योगपतियों के घरों के सामने प्रदर्शन किया गया था। और तो और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता स्व. विद्याचरण शुक्ल ने भी जन-आंदोलन खड़ा किया था। पर चंद दिनों की गहमागहमी के बाद सब कुछ शांत हो गया। स्पंज आयरन व इतर संयंत्र यथावत जहर उगलते रहे और अभी भी उगल रहे हैं। वर्षों से यह सिलसिला चला आ रहा है। 
       सरकार दावे बहुत करती है। हाल ही में दावा किया गया कि वायु प्रदूषण के नियंत्रण के उपाय न करने पर 42 रोलिंग मिलों  में उत्पादन रोक दिया गया है। एक और दावा जो बड़ा महत्वपूर्ण है, राज्य सरकार के अपर मुख्य सचिव आईएएस एन. बैजेन्द्र कुमार ने कुछ माह पूर्व किया था। उन्होंने मीडिया से कहा था कि 5 साल के भीतर आबादी से कहीं दूर नई औद्योगिक बस्ती बसायी जाएगी और उरला, सिलतरा, सोनडोंगरी, भनपुरी आदि क्षेत्रों के उद्योग वहां शिफ्ट कर दिए जाएंगे। क्या यह दिवास्वप्न है जो जनता को दिखाया जा रहा है? क्या सरकार ऐसा कर पाएगी? क्या उसमें ऐसी इच्छा शक्ति है? जिन उद्योगों से उसे राजस्व मिलता है, जिनसे हजारों श्रमिकों की रोजी-रोटी भी चल रही है, और जिनके पास अथाह दौलत और राजनीतिक ताकत है, ऐसे उद्योगपतियों को क्या वह झुका पाएगी? फिर आगे चुनाव है, पार्टी को पैसा भी चाहिए। फिर? जाहिर है सब कुछ ऐसा ही चलता रहेगा। स्वच्छ भारत मिशन, स्वच्छ रायपुर मिशन, स्वच्छ छत्तीसगढ़ मिशन कागजों में एकदम स्वच्छ न•ार आएंगे लेकिन जनता धूल फांकती रहेगी, उसके चेहरे काले पड़ते जाएंगे। वर्षों से जारी यह क्रम पता नहीं कब तक जारी रहेगा। दरअसल सरकार की आत्मा को झकझोरने वाला कोई जन नेता नहीं है। क्या शंकर गुहा नियोगी के बाद जनता को कोई ऐसा नेता मिला है? नहीं तो फिर बर्दाश्त करते रहिए।

Monday, October 31, 2016

इस उत्सव में जन कहां

-दिवाकर मुक्तिबोध
     इस वर्ष का राज्योत्सव छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार के लिए खास महत्व का है। यह गंभीर चुनौतियों की दृष्टि से भी है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति की वजह से भी। मोदी राज्योत्सव का उद्घाटन करेंगे तथा काफी वक्त बिताएंगे। जाहिर है उनकी उपस्थिति को देखते हुए राज्य सरकार विकास की झलक दिखाने और बहिष्कार पर आमादा कांग्रेस व अन्य पार्टियों से राजनीतिक स्तर पर निपटने में कोई कोर कसर नहीं छोडऩी चाहती। प्रधानमंत्री को यह दिखाना जरूरी है कि राज्य में सब कुछ ठीक-ठाक है, अमन-चैन है, सरकार की योजनाएं दुत गति से चल रही हैं और विकास छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में पसरा नजर आ रहा है। राजनीतिक चुनौतियों से निपटने में भी सरकार और पार्टी सफल है तथा सन् 2018 के राज्य विधानसभा चुनाव व उसके अगले वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव के संदर्भ में प्रधानमंत्री को फिकर करने की जरूरत नहीं है। इसके लिए सब कुछ युद्ध स्तर पर चल रहा है, राजनीतिक मोर्चे के साथ ही सामाजिक व आर्थिक मोर्चे पर भी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह संदेश देने, उन्हें आश्वस्त करने सरकार और पार्टी जीतोड़ मेहनत कर रही है।
    राज्य जवान हो चुका है। 16 वर्ष का। दसवीं वर्षगांठ के बाद यह विचार चल पड़ा था कि राजधानी में राज्योत्सव के दिनों को कम करके, तामझाम को सीमित रखा जाए, खर्च भी कम किया जाए। अब सलमान खान या करीना कपूर जैसी फिल्मी हस्तियों को भी बुलाने की जरूरत नहीं जिन्होंने चंद घंटों के लिए लाखों रुपए सरकार से वसूले थे। इस वर्ष भी यह सोचा गया कि राज्योत्सव सिर्फ एक दिन का हो। हवाला सूखे का दिया गया पर वर्षा औसत से कहीं अधिक हो गई। खैर सूखे की चिंता जाती रही। चूंकि घोषणा एक दिन के राज्योत्सव की थी, लेकिन जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुख्य अतिथि के रूप में राज्य सरकार के आमंत्रण को स्वीकार कर लिया तो यह पांच दिन का हो गया। अब 1 नवम्बर से 5 नवम्बर तक राज्य की जनता छत्तीसगढ़ में दनादन विकास के कथित प्रवाह से अभिभूत होगी और अपना मनोरंजन करेगी।
     प्रधानमंत्री के प्रवास के मद्देनजर, तैयारियों के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने पार्टी के नेताओं को निर्देशित किया था कि मुख्य समारोह में कम से कम एक लाख की भीड़ आनी चाहिए। जब मुख्यमंत्री स्वयं ऐसा कहे तो जाहिर है केन्द्र की परीक्षा में पास होने की उन्हें कितनी चिंता है। यह पहली बार है जब मुख्यमंत्री ने संख्या में बात कही। बहरहाल तैयारियां अंतिम दौर में है किंतु इसकी वजह से सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों की दिवाली चौपट हो गई। बहरहाल इसमें कोई शक नहीं कि प्रधानमंत्री संतुष्ट होकर जाएंगे क्योंकि राजधानी गुल•ाार है, शहर गुल•ाार है। लेकिन क्या वास्तव में राज्य के हालात काबू में है? संतोषजनक है? जनहित के मुद्दों पर खूब शोर-शराबा मचा रही कांग्रेस और नई नवेली जोगी कांग्रेस के तेवरों, राजनीतिक विवादों और आरोप-प्रत्यारोप को छोड़ दें तो क्या आम आदमी विशेषकर गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों तक राज्य एवं केन्द्र सरकार की योजनाओं का समुचित लाभ पहुंच पा रहा है? जनकल्याणकारी योजनाएं दर्जनों हैं पर क्या वे वास्तव में फलदायी हैं? क्या लोगों का कल्याण हो पा रहा है? आंकड़े बताते हैं कि राज्य में गरीबी व बेरोजगारी बढ़ी है। यह अलग बात है कि इसके बावजूद छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कारों में अव्वल है। विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियों के लिए उसे वर्ष 2015-16 के दौरान ही एक दर्जन से अधिक पुस्कार मिल चुके हैं। यदि इन पुरस्कारों की विश्वसनीयता पर संदेह न किया जाए तो यह मानना होगा राज्य में सर्वत्र खुशहाली है और विकास द्वार-द्वार तक पहुंच रहा है। पर क्या यह सच है?
आधारभूत संरचनाओं की दृष्टि से देखें तो क्रांतिकारी परिवर्तन नजर आएंगे। पिछले डेढ़ दशक में राजधानी सहित प्राय: सभी बड़े शहरों की तस्वीर बदल गई है, बदल रही है। सोलह साल के पहले के छत्तीसगढ़ और आज के छत्तीसगढ़ में जमीन आसमान का अंतर है। यह अंतर प्राय: सभी स्तरों पर दिखाई पड़ता है। पर यह सब कुछ शहरियों के लिए है। लेकिन क्या चमचमाती सड़कों, सुंदर-सुंदर इमारतों, रोशनी बिखरते सोडियम लैम्पों या मेट्रो का अहसास कराने विमानतल को राज्य के सर्वांगीण विकास का पैमाना माना जा सकता है? इसमें गरीब कहां है, खेत-खलिहान कहां है, गांव कहां हैं, शिक्षा की नींव मजबूत करने वाली प्राथमिक शिक्षा कहां है, शिक्षित युवाओं को नौकरियां कहां हैं, उच्च गुणवत्ता वाली उच्च शिक्षा कहां है, स्वस्थ रहने के लिए शुद्ध हवा कहां है, दर्द से तड़पते गांव के गरीबों के लिए सर्वसुविधायुक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र कहां है और कहां है शुद्ध पेयजल जिसके अभाव में आदिवासी बहुल गांवों में डायरिया जैसी बीमारी से प्रतिवर्ष सैकड़ों मरते हैं। वर्षों से मर रहे हैं।
दरअसल विकास के तमाम दावों के बावजूद गरीब किसानों, खेतिहर मजदूरों, निम्न व अति निम्न के दायरे में आने वाले लोगों का जीवन कठिन है। भ्रष्टाचार, महंगाई, नौकरशाही की असंवेदनशीलता और नौकरी के लगातार घट रहे अवसरों के कारण यह वर्ग खुशहाली से कोसों दूर है। सरकार चुनौतियों का सामना तो कर रही है पर विश्वास के साथ नहीं। फैसलों में विलंब सरकार की दुविधापूर्ण स्थिति का प्रतीक है। नक्सल मोर्चे पर हाल ही में घटित घटनाओं जिसमें आला अफसरों का व्यवहार भी शामिल है, से सरकार की किरकिरी हो रही है। भौतिक संरचनाओं पर यदि अरबों रुपए खर्च किए जा सकते हैं तो किसानों को बोनस भी दिया जा सकता है जिससे सरकार मुकर रही है। जबकि यह उसका चुनावी वायदा रहा है। राजनीतिक मोर्चे पर भी सरकार और पार्टी हैरान-परेशान है। जबकि चौथी पारी के लिए उसकी राजनीतिक कवायद अरसे से तेज है। दिनों दिन तेज होती सत्ता विरोधी लहर उसकी सबसे बड़ी चिंता है। इसमें भी कोई शुबहा नहीं कि पिछले दो कार्यकालों की तुलना में उसका तीसरा कार्यकाल ज्यादा कठिन और चुनौती भरा है।
     चुनावी वर्ष 2018 तक सरकार को दो और राज्योत्सव देखने हैं। यानी सरकार के पास अभी दो वर्ष है। अब इन दो वर्षों में विकास के केंद्र में सिर्फ और सिर्फ गांव और ग्रामीण रहेंगे तथा शासन-प्रशासन शतप्रतिशत जनोन्मुखी रहेगा तो एक नई तस्वीर उभरेगी जो गौरवपूर्ण होगी और तब राज्योत्सव सही अर्थों में राज्योत्सव होगा, जन उत्सव होगा।