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नक्सल समस्या - डाॅ. रमन के पास जादू की छड़ी?

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- दिवाकर मुक्तिबोध छत्तीसगढ़ वर्षं 2022 तक नक्सल -मुक्त हो जाएगा? इस पर कोई कैसे भरोसा करे? लेकिन मुख्यमन्त्री डा. रमन सिंह आश्वस्त हैं। उनके विश्वास पर विश्वास करें तो अगले चार सालों में चार दशक से अधिक पुरानी इस राष्ट्रीय समस्या का कम से कम छत्तीसगढ से जरुर खात्मा हो जाएगा। यह अलग बात है कि मुख्यमंत्री अभी जनता की अदालत में है और उन्हें पूरा भरोसा है कि उनकी पार्टी इस बार रिकार्ड बहुमत के साथ लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी करेगी। चुनाव जीत लेगी। अगर ऐसा हुआ तो वे पुन: मुख्यमंत्री बनेंगे जिसकी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पहले ही घोषणा कर चुके है। यानी अगले चार वर्षों में नक्सलवाद को समूल नष्ट करने का उनका विश्वास विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी की जीत पर निर्भर है। नहीं जीत पाए तो उन्हें जनता के सामने किए गए संकल्प से बरी होने का मौका मिलेगा। वरना अगले चार साल अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा। पर उम्मीद करनी चाहिए उनकी सरकार रहे या न रहे, दो चक्कों के बीच पीस रहे आदिवासियों के खिलाफ हिंसा रूकनी ही चाहिए, किसी भी सरकार की यही प्राथमिकता होनी चाहिए जो नए छत्तीसगढ़ राज्य में सत्तारूढ़ रही कां…

अजीत जोगी का नया दाँव

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-दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस की कमान मूलत: किसके हाथ में है ? अध्यक्ष अजीत जोगी के या उनके विधायक बेटे अमित जोगी के हाथ में? यह सवाल इसलिए उठा है क्योंकि अजीत जोगी चुनाव लड़ेंगे या नहीं, लड़ेंगे तो कहाँ से लड़ेंगे, यह पिता के लिए बेटा तय कर रहा है। कम से कम हाल ही में घटित एक दो घटनाओं से तो यही प्रतीत होता है। वैसे भी पुत्र-प्रेम के आगे जोगी शरणागत है। इसकी चर्चा नई नहीं, उस समय से है जब जोगी वर्ष 2000 से 2003 तक कांग्रेस शासित प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। उनके उस दौर में अमित संविधानेत्तर सत्ता के केन्द्र बने हुए थे तथा उनका राजनीतिक व प्रशासनिक कामकाज में ख़ासा दख़ल रहता था। अब तो ख़ैर दोनों बाप-बेटे की राह कांग्रेस से जुदा है और दो वर्ष पूर्व गठित उनकी नई पार्टी ने छत्तीसगढ़ में अपनी जड़ें जमा ली है। यद्यपि कहने के लिए अजीत जोगी अपनी नई पार्टी के प्रमुख कर्ता-धर्ता हैं लेकिन कार्यकर्ता बेहतर जानते हैं कि अमित जोगी की हैसियत क्या है और संगठन में उनका कैसा दबदबा है। पिता-पुत्र के संयुक्त नेतृत्व में छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस अपना पहला चुनाव लड़ रही है। राज्य की 90 सीटों के ल…

किसके हाथ में कमान

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- दिवाकर मुक्तिबोध 
छत्तीसगढ़ में चुनाव के पूर्व की तस्वीर बहुत साफ़ सुथरी व स्वस्थ नज़र नहीं आ रही है। राज्य विधानसभा चुनाव के लिए तारीख़ों का एलान हो चुका है। 12 एवं 20 नवम्बर को 90 सीटों के लिए मतदान होगा। चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के साथ ही आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है। यानी अब मतदाताओं को प्रभावित करने वाली सरकारी घोषणाएँ नहीं होंगी। लेकिन राजनीतिक माहौल में जिस तरह गरमाहट व तनाव है, उसे देखते हुए सवाल है कि क्या राज्य में शांतिपूर्ण चुनाव की परम्परा पर आघात पहुँचने वाला है? नक्सली समस्या से जूझ रहे छत्तीसगढ़ ने बीते वर्षों मे ख़ूब हिंसा देखी है, ख़ूब ख़ून बहा है पर आमतौर पर चुनाव शांति से निबटे हैं। किन्तु इस बार परिस्थितियां कुछ अलग दिखाई दे रही है। कम से कम वह अभी बेहतर तो नहीं ही है। नक्सलियों ने अलग फ़रमान जारी कर दिया है। यह समस्या ख़ैर अपनी जगह तो है ही, सत्तारूढ़ भाजपा व  प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के बीच जो तनाव व राजनीतिक विद्वेष घिरता हुआ नज़र आ रहा है वह चुनाव के दौरान हिंसक झड़प की आशंकाओं को घनीभूत करता है। 2003 में राज्य के पहले चुनाव के ठीक पूर्व ऐसा ही नज़ारा पे…

अटल, भाजपा व चुनाव

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- दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ मे क़रीब 15 वर्षों से सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकार को ऐन चुनाव के पूर्व मतदाताओं को भावनात्मक रूप से आकर्षित करने के लिए एक नया हथियार हाथ लग गया है - अटल - स्मृति हथियार। देश के पूर्व प्रधानमंत्री व भाजपा के शीर्षस्थ स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी की यादों को चिरस्थायी बनाने की दिशा में रमन सरकार ने अन्य भाजपा शासित राज्यों से बाज़ी मारी है। रमन कैबिनेट की 21 अगस्त को हुई बैठक में केवल राज्य के नाम के आगे अटल जोड़ने के अलावा कोई ऐसा कोना नहीं छोड़ा गया जिसमें अटल -सुगन्ध न हो, अटलजी की याद न हो। अटलजी के नाम पर दर्जनों नामकरण। शैक्षणिक संस्थाओं, सड़कों, बाग़ बगीचों को अटलजी का नाम। और तो और 5 सितंबर से शुरू होने वाली दूसरे चरण की विकास यात्रा का नाम-भी अब अटल विकास यात्रा होगा जो राज्य में आदर्श आचार संहिता लागू होने के पूर्व ख़त्म होगी। यानी यह माना जा रहा है कि भाजपा के चुनावी एजेंडे में प्रमुख रूप से अटल बिहारी वाजपेयी रहेंगे जिन्हें तीन नये राज्यों छत्तीसगढ़, झारखंड व उत्तराखंड का जनक माना जाता है।
रमन मंत्रिमंडल की बैठक में लिए गए फ़ैसलों के…

मुक्तिबोध:प्रतिदिन (भाग-22)

दृष्टिकोण का दीवाला-1
सिनेमा व्यवसाय एक सामूहिक व्यवसाय है-ऐसा दृष्टिकोण हमारे निर्माताओं में पैदा होना चाहिये। व्यक्ति की जगह अब उसमें समाज और समस्त हिन्दुस्तान की आत्मा की  पूजा होनी चाहिए। जहाँ एक व्यक्ति के नाम पर हज़ारों- लाखों की होली खेली जाती है- वहाँ हित चिंतन किसी ख़ास निश्चित पैमाने पर ज़रूर होना  चाहिए।  (पत्रिका, विचार, 5-01-1941, में प्रकाशित, शेष-अशेष में संकलित)   --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
दृष्टिकोण का दीवाला-2 फि़ल्म-व्यवसाय कुछ चंद भारतीय पूँजीपतियों के हाथ में हैं । वे जो चाहते हैं, करते हैं । उनकी इच्छाओं पर किसी अन्य सुयोग्य बौद्धिक व्यक्तियों के सुझावों का नियंत्रण एवं सहयोग नहीं है । इससे हुआ यह है कि सिनेमा व्यवसाय कुछ चंद निर्माताओं के डायरेक्टरों की कठपुतली बनकर रह गया है । उसमें प्राण नहीं है। इसलिये उनके चित्रों मे भी प्राण  नहीं होते हैं। यहां तो जहाँ तक मेरा अनुमान है -कुछ दो- एक निर्माताओं को छोड़कर किसी को भी मुल्क के श…

मुक्तिबोध:प्रतिदिन (भाग-21)

जलना
और अकस्मात् उसे भान हुआ कि मनुष्य अपने इतिहास से जुदा नहीं है, वह कभी भी अपने इतिहास से जुदा नहीं हो सकता। न अपने बाह्य जीवन के इतिहास से, न अपने अंतर्जीवन के इतिहास से। उसका अंतर्जीवन अपने स्वप्नों में, अपने तर्कों और विश्लेषणों में, डूबता आ रहा है। उसे अधिकार है कि वह उसमें डूबता रहे, अपने से बाहर निकलने की उसे ज़रूरत नहीं है। अपने से बाहर वे निकलें जिनका बाह्य से कोई विरोध हो।
(कहानी, संभावित रचनाकाल 1960 के आसपास, धर्मयुग, अप्रैल 1968 मे प्रकाशित, रचनावली खंड 3 में संकलित)
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सतह से उठता आदमी
कन्हैया गऱीबी को , उसकी विद्रूपताओं को, और उसकी पशु -तुल्य नग्नता को जानता है। साथ ही उसके धर्म और दर्शन को भी जानता है। गांधीवादी दर्शन गऱीबों के लिए बड़े काम का है। वैराग्य भाव, अनासक्ति और कर्मयोग सचमुच एक लौह-कवच है, जिसको धारण करके मनुष्य आधा नंगापन और आधा भूखापन सह सकता है। सिर्फ सहने की ही बात नहीं, वह उसके आधार पर आत्मगौर…

मुक्तिबोध:प्रतिदिन (भाग-20)

आत्म -वक्तव्य : एक
उन दिनों भी एक मानसिक संघर्ष था। एक ओर, हिन्दी का यह नवीन सौंदर्य -काव्य था, तो दूसरी ओर मेरे बाल-मन पर मराठी साहित्य के अधिक मानवतामय उपन्यास-लोक का भी सुकुमार परंतु तीव्र प्रभाव था। तॉलसतॉय के मानवीय समस्या संबंधी उपन्यास या  महादेवी वर्मा? समय का प्रभाव कहिए या वय की माँग, या दोनों, मैंने हिंदी के सौंदर्य -लोक को ही अपना क्षेत्र चुना, और मन की दूसरी माँग वैसे ही पीछे रह गयी जैसे अपने आत्मीय राह में पीछे रहकर भी साथ चलते हैं।  मेरे बाल-मन की पहली भूख सौंदर्य, और दूसरी विश्व मानव का सुख-दुख-इन दोनों का संघर्ष मेरे साहित्यिक जीवन की पहली उलझन थी। इसका स्पष्ट वैज्ञानिक समाधान मुझे किसी से न मिला। परिणाम था कि इन अनेक आंतरिक द्वन्दों के कारण एक ही काव्य विषय नहीं रह सका। जीवन के एक ही बाज़ू को लेकर मैं कोई सर्वाश्लेष दर्शन की मीनार खड़ी न कर सका। साथ ही जिज्ञासा के विस्तार के कारण कथा की ओर मेरी प्रवृत्ति बढ़ गयी। इसका द्वन्द मन में पहले से ही था। कहानी लेखन आरंभ  करते ही मुझे अनुभव हुआ कि कथा-तत्व मेरे उतना ही समीप है जितना काव्य। परंतु कहानियाँ मैं बहुत ही थोड़ी लिख…