Tuesday, December 31, 2013

‘आप’ की अग्निपरीक्षा शुरू

सामाजिक कार्यकर्ता से राजनीतिक बने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अग्निपरीक्षा शुरू हो गई है। चूंकि वे सिर्फ दिल्ली ही नहीं देश की जनता की आकांक्षाओं एवं अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं लिहाजा वे तलवार की धार पर हैं। अब दिल्ली की राजनीति में घटित होने वाली छोटी से छोटी घटनाओं पर भी देश की निगाहें रहेंगी तथा सवाल उठते रहेंगे। पहला सवाल है क्या अरविंद केजरीवाल जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति की अवधारणा को राजनीति में पुनर्स्थापित कर पाएंगे? इसका थोड़ा-बहुत जवाब अगले वर्ष मई-जून में होने वाले लोकसभा चुनाव से मिल सकेगा जब केजरीवाल की आम आदमी पार्टी मुम्बई, दिल्ली, एनसीआर और हरियाणा में जोर-आजमाईश करेगी। पूरा जवाब पाने के लिए हमें कुछ और लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनावों का इंतजार करना पड़ेगा। क्योंकि आप की राजनीतिक शक्ति का सही-सही आकलन तभी हो पाएगा लेकिन यदि दिल्ली राज्य विधानसभा के चुनावों को आधार मानकर कोई राय कायम करने की जरूरत महसूस होती हो तो यह निर्विवाद कहा जा सकता है कि आप ने देश में नई राजनीतिक क्रांति की आधारशिला रख दी है। दिल्ली चुनावों में चमत्कार की उम्मीद तो ‘आप’ को थी लेकिन चमत्कार इतना विराट होगा, उसकी कल्पना न तो पार्टी के प्रबुद्धजनों को थी और न ही देश की जनता को। लेकिन चमत्कार हुआ, जबर्दस्त हुआ। ‘आप’ ने बरसों से चली आ रही मठाधीशी राजनीति की चूलें हिला दीं। एक वर्ष के अल्प समय में कोई पार्टी एक राज्य की सत्ता पर काबिज हो जाए, देश के राजनीतिक इतिहास की अनहोनी और हैरतअंगेज घटना है। प्रादेशिक परिदृश्य से उभरने वाली अनेक राजनीतिक पार्टियां दशकों से अपने देशव्यापी अस्तित्व के लिए छटपटा रही हैं लेकिन अब तक किसी को भी यह मकाम हासिल नहीं हुआ। बीते तीन दशक को देखें तो केवल कांशीराम ही ऐसे नेता हैं जिन्होंने अपने दम पर बहुजन समाज पार्टी को खड़ा किया और उसे एक राज्य में सत्ता की दहलीज तक पहुंचाया लेकिन दिल्ली फिर भी दूर रही। कांशीराम की राजनीति और केजरीवाल की राजनीति में कोई तुलना नहीं हो सकती। कांशीराम ने जातीयता का विष फैलाकर अपनी राजनीतिक जड़ें कुछ राज्यों विशेषकर उ.प्र. में मजबूत की जबकि केजरीवाल ने जाति और धर्म से परे आम आदमी की पीड़ा को देखा-समझा और उनकी आवाज बनने की कोशिश की। उन्होंने कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों की तथाकथित लोकशक्ति को लोकतांत्रिक तरीके से चुनौती दी और साबित कर दिया कि उनकी राजनीति, जन-आकांक्षाओं पर खरी नहीं उतरती। स्वार्थपरक एवं आत्मकेन्द्रित राजनीति से जनता ऊब चुकी है और अब इन पाटिर्यों से उसका भरोसा टूटता जा रहा है। ‘आप’ ने जनता को इसी असंतोष को समर्थन और विश्वास का बाना पहनाकर अपने कंधे पर बैठा लिया है। दिल्ली के नतीजे इसका प्रमाण हैं।

आम आदमी पार्टी परंपरागत राजनीति के चरित्र और प्रकृति से हटकर है। वह अपने नए और अद्भुत राजनीतिक प्रयोगों के लिए मशहूर है। दिल्ली में सरकार बनाने के पूर्व उसने जनता से रायशुमारी की। यह अनूठी घटना है क्योंकि इसके पूर्व सरकार बनाने के लिए ऐसी पहल किसी पार्टी ने नहीं की और न ही इस बारे में कभी सोचा जबकि केन्द्र एवं राज्यों में अल्पसंख्यक सरकारें बनी-बिगड़ी हैं। ‘आप’ ने राजनीति में स्थापित मान्यताओं को न केवल ध्वस्त किया वरन् नई राह बनाई जो सीधे आम आदमी के दरवाजे तक जाती है। उसने आम आदमी की वे समस्याएं उठाई जिनसे उनका रोजाना साबका पड़ता है यानी सड़क, नाली, बिजली, पानी और स्थानीय प्रशासन से जुड़े अन्य काम। वस्तुत: ये समस्याएं समूचे देश की समस्याएं हैं तथा आमतौर पर इन्हें नगरीय संस्थाओं के चुनाव से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन यदि कोई राजनीतिक पार्टी इन्हीं मुद्दों पर राज्य विधानसभा का चुनाव जीत जाए तो यकीनन अनहोनी घटना है। हालांकि दिल्ली में आप की जीत के पीछे अन्य कई कारण हैं। राजनीति की विद्रूपताओं से तंगहाल जनता बदलाव चाहती थी, उसे बेहतर विकल्प की तलाश थी जो ‘आप’ के रूप में पूरी हुई। उसे ‘आप’ में अपना अक्स नज़र आया। ‘आप’ की सफलता का यही सबसे बड़ा कारण बना। चूंकि ‘आप’ ने अब लोकसभा चुनाव लड़ने का भी इरादा जाहिर कर लिया है तब यह सवाल उठता है कि क्या आम चुनाव में भी उसे ‘दिल्ली’ जैसी सफलता मिल पाएगी? लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में क्या स्थानीय मुद्दे इतने प्रभावी होंगे कि उसे चुनाव जीता दें? क्या राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक मुद्दे परिदृश्य से बाहर चले जाएंगे या गौण हो जाएंगे? देश की जनता क्या सोचकर ‘आप’ को वोट करेगी? इन सवालों का लोकसभा चुनावों में जवाब तो मिल जाएगा लेकिन क्या अभी इस बारे में कोई दावा किया जा सकता है कि ‘आप’ देश की राजनीति को पूरी तरह से बदल देगी? हां और ना के बीच देश की राजनीति में यह सवाल गूंजने लगा है।

बहरहाल ‘आप’ ने बड़ा कारनामा कर दिखाया है। उसके नेता आम बने रहने की कोशिश कर रहे हैं। केजरीवाल का सरकारी आवास एवं विशेष सुरक्षा को ठुकराना व अन्य सरकारी सुविधाएं लेने से इंकार करना एक आम आदमी की सोच को दर्शाता है। उनका सहज, सरल व्यक्तित्व तथा ईमानदार राजनीति पर चलने का संकल्प यद्यपि देश की जनता को लुभाता है लेकिन यह देखने की बात है कि ‘आप’ के प्रयासों से राजनीति का शुद्धिकरण कितना हो पाएगा? बड़े ओहदों पर रहने के बावजूद आमजनों के बीच घुल-मिलकर रहने वाले सादगी पसंद नेताओं की देश में कमी नहीं है। कई नाम गिनाए जा सकते हैं। मसलन त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार, प.बंगाल की ममता बेनर्जी, गोवा के मनोहर पर्रिकर, प.बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, केन्द्रीय मंत्री ए.के.एंटनी आदि। लेकिन ये नेता राजनीति की धारा को नहीं बदल पाए। गंदगी साफ नहीं कर पाए। अब केजरीवाल कितना कुछ कर पाते हैं, यह दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल से स्पष्ट हो जाएगा। 

Monday, December 16, 2013

कांग्रेस : अंधेरे में रोशनी की तलाश

अब क्या करे कांग्रेस? छत्तीसगढ़ राज्य विधानसभा चुनाव उसने बहुत उम्मीदों के साथ लड़ा था। बहुमत पाने का विश्वास था किंतु सारी उम्मीदें चकनाचूर हो गई। अब पार्टी बदहवास की स्थिति में है जिसे संभालना मौजूदा नेतृत्व के बस में नहीं। दरअसल इस बार चुनाव में मतदाताओं ने कांग्रेस को नहीं हराया, कांग्रेसियों ने खुद यह काम किया। आपसी खींचतान, बिखरा-बिखरा सा चुनाव प्रबंध तंत्र और टिकिट वितरण में राहुल फार्मूले से किनारा करना पार्टी को इतना महंगा पड़ा कि उसे लगातार तीसरी बार भाजपा के हाथों हार झेलनी पड़ी। 2008 के 38 में से 27 विधायकों की हार से यह प्रमाणित हुआ कि मतदाताओं को पुराने चेहरे पसंद नहीं आए लिहाजा उन्होंने उनके खिलाफ मतदान किया। पहले चरण की 18 सीटों के लिए जिस फार्मूले के तहत उम्मीदवारों का चयन किया गया था, वही फार्मूला यदि शेष 72 सीटों पर लागू किया गया होता तो संभवत: आज स्थिति कुछ और होती। पार्टी बहुमत के साथ सत्ता में होती तथा भाजपा विपक्ष में खड़ी नज़र आती। लेकिन चंद नेताओं का अतिआत्मविश्वास पार्टी को ऐसा ले डूबा कि अब उससे उबर पाना असंभव नहीं तो अत्यधिक कठिन जरूर प्रतीत होता है क्योंकि प्रदेश पार्टी का मनोबल खस्ता है तथा वह फिर आपसी सिर-फुटव्वल की दहलीज पर खड़ी हो गई है जैसे कि चुनाव के 6 माह पूर्व नज़र आ रही थी।

ऐसी स्थिति में निश्चय ही पार्टी को संजीवनी की जरूरत है। पर यह मिलेगी कब, कहां और कैसे? किसके पास है यह? राहुल या सोनिया गांधी के पास? यदि केन्द्रीय नेतृत्व दूरदर्शी और दृढ़ होता तो टिकिट वितरण में प्रादेशिक नेताओं के दबाव को खारिज करके राहुल फार्मूले को सख्ती से लागू करवाया जाता, लेकिन नेतृत्व दबाव में आ गया तथा राहुल ब्रिगेड की छत्तीसगढ़ में बहुत मेहनत से तैयार की गई जमीनी हकीकत की रिपोर्ट को नजरअंदाज करके टिकटें बांट दी गई, इस विश्वास साथ कि छत्तीसगढ़ में पार्टी को बहुमत मिलना तय है। लेकिन पांसें उल्टे पड़े। अतिआत्मविश्वास ले डूबा। कई कद्दावर नेता चुनाव हार गए तथा मैदानी इलाकों से कांग्रेस का सफाया हो गया।

छत्तीसगढ़ में पार्टी की लगातार तीसरी पराजय कई सवाल खड़े करती है। इस बड़े राजनीतिक हादसे से पार्टी तभी उबर पाएगी जब वह आगामी लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करेगी। अभी तो यह उम्मीद की जाती है कि पार्टी में आत्म-मंथन का दौर शुरू होगा। सारी शिकवे-शिकायतें भूला दी जाएंगी। आरोप-प्रत्यारोप से किनारा कर लिया जाएगा। एक-दूसरे पर लांछन लगाने के बजाए सही अर्थों में हार के कारणों का विश्लेषण किया जाएगा पर ऐसा कुछ होता नजर नहीं आ रहा है। हमेशा की तरह पार्टीजन वही रोना रो रहे हैं। टी.एस.सिंहदेव एवं नेता प्रतिपक्ष रह चुके रवीन्द्र चौबे जैसे नेता भितरघात को एक बड़ा कारण बता रहे हैं। यद्यपि उन्होंने किसी का सीधा नाम नहीं लिया लेकिन उनका इशारा मुख्यमंत्री अजीत जोगी की ओर है। लेकिन सच तो यह है कि 90 में से जो 51 कांग्रेसी प्रत्याशियों की पराजय की मूल वजह वे स्वयं हैं। पराजय के लिए पार्टी नहीं, वे जिम्मेदार हैं। चुनाव के ठीक पूर्व जागृत होने वाले ये नेता पूरे पांच साल तक जनता से कटे-कटे रहे। न तो उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं से जीवंत सम्पर्क रखा और न ही उनकी स्थानीय समस्याओं मसलन सड़क, बिजली, पानी और लोक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया। शासन-प्रशासन से जुड़े छोटे-मोटे कामों में भी उन्होंने जरूरतमंदों की मदद नहीं की। ऐसे नेताओं की अलोकप्रिय छवि हार का बड़ा कारण बनीं। भितरघात एवं निष्क्रियता भी एक वजह हो सकती है पर इससे चुनाव परिणाम प्रभावित नहीं हुआ है। इसलिए कुल मिलाकर प्रत्याशी की कमजोर छवि, कमजोर सांगठनिक-ढांचा, चुस्त प्रबंधन का अभाव जिनमें जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा भी शामिल है, हार के बड़े कारणों में शुमार है।

बहरहाल यदि वास्तविक आत्म-मंथन हुआ तो निष्कर्ष क्या निकलेगा? क्या संगठन जमीनी हकीकत को पहचान कर उसके अनुरूप कदम उठाएगा? या फिर वही ढाक के तीन पात जैसी स्थिति होगी जैसा कि अमूमन प्रत्येक चुनावी हार के वादे होती रही है। क्या इस बात पर दृढ़ता दिखाई जाएगी कि प्रदेश संगठन में युवा नेतृत्व पर भरोसा किया जाएगा? क्या वे चेहरे बदल दिए जाएंगे जो बरसों से कुर्सी पर जमे हुए हैं? क्या आगामी मई-जून में होने वाले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए जनता का विश्वास जीतने की कोशिश की जाएगी? इसके लिए क्या उपाय किए जाएंगे? कुल मिलाकर सवाल यह है कि क्या पार्टी आंतरिक व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए तैयार है? यदि ऐसा है तो लोकसभा चुनाव में कुछ उम्मीद की जा सकती है अन्यथा पार्टी का वही हश्र होगा जो 2009 के लोकसभा चुनावों में हुआ था।

अब सवाल है कि क्या पार्टी में नेतृत्व की नई पौध तैयार हुई है? जवाब ना में है। दरअसल प्रदेश पार्टी में ऊर्जावान नेतृत्व का अभाव है। पहली पंक्ति में गिने-चुने नेता हैं जिनसे अब कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। द्वितीय पंक्ति में यद्यपि नेताओं की फौज है लेकिन उनमें एक भी ऐसा नहीं जो संगठन की कायापलट कर सके। तृतीय पंक्ति युवाओं की है जिनके नेतृत्व की परख अभी होनी बाकी है। कुछ उम्मीद इन्हीं से की जा सकती है बशर्ते पार्टी उन पर विश्वास जताए। पार्टी के हक में यह अच्छी बात है कि राज्य विधानसभा चुनाव में काफी संख्या में युवा जीतकर आए हैं। वे संगठन को दिशा दे सकते हैं।

यह स्पष्ट है कि मौजूदा नेतृत्व से बदलाव की अपेक्षा नहीं की जा सकती। चरणदास महंत, रविन्द्र चौबे तथा धनेन्द्र साहू जैसे वरिष्ठ नेता कसौटी पर कसे जा चुके हैं। वरिष्ठतम में अब दो ही नेता हैं मोतीलाल वोरा एवं अजीत जोगी। इनमें से अजीत जोगी सब पर भारी हैं। बड़ी संख्या में उनके समर्थक जीतकर आए हैं। संगठन में पहले भी उनका दबदबा था और अभी भी है। जाहिर है कोई भी नेतृत्व उनकी उपेक्षा करके चल नहीं सकता। इसलिए सांगठनिक एकता की कोशिशों में इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि तुष्टीकरण के बावजूद गुटीय संतुलन बना रहे। लेकिन पार्टी में ऐसे नेतृत्व को तलाशना आसान नहीं है। संगठन की इन आंतरिक चुनौतियों से केन्द्रीय नेतृत्व किस तरह निपटेगा और कैसे राह को सुगम बनाएगा, यह निकट भविष्य में स्पष्ट होना चाहिए। देखें क्या होता है।

Saturday, December 14, 2013

उम्मीदों के पहाड़ पर तीसरी पारी

राज्य विधानसभा चुनाव में सत्ता की हैट्रिक जमाने वाले मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह क्या अगले पांच साल तक निर्द्वंद्व होकर शासन कर सकते हैं? क्या जनता की अपेक्षाओं का बोझ वे बखूबी झेल पाएंगे? क्या वे फिर विपक्ष की धार को उसी तरह बोथरा बना देंगे जैसा कि सन् 2003 एवं 2008 के अपने शासनकाल में उन्होंने कर दिखाया था? क्या अगले पांच सालों में अपनी पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र पर शत-प्रतिशत अमल कर पाएंगे? क्या सरकार की चाल-ढाल एवं चेहरे में कोई रद्दोबदल होगा? सरकार पूर्वापेक्षा ज्यादा जनोन्मुखी तथा संवेदनशील होगी या तीसरा कार्यकाल उसे निरंकुशता की ओर ले जाएगा? क्या वे सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार को न्यूनतम स्तर पर ले जा सकेंगे? इस तरह के और भी कुछ सवाल हैं जो अब प्रबुद्घ जन-मानस में उमड़-घुमड़ रहे हैं। इसका बेहतर जवाब मुख्यमंत्री स्वयं तथा उनकी सरकार ही दे सकेगी पर इसमें जरा भी संशय नहीं कि उनके सामने अनेक चुनौतियां हैं जिनका सामना उन्हें तथा उनकी सरकार को करना है। विशेषकर जनअपेक्षाओं का दबाव पूर्व की तुलना में अधिक इसलिए होगा क्योंकि राज्य के मतदाताओं ने बड़ी उम्मीदों के साथ उन्हें तीसरी बार सत्ता सौंपी है।

जहां तक चुनौतियों का सवाल है, मुख्यमंत्री के सामने बड़ी समस्या है, भ्रष्टाचार से निपटने एवं शासन के कामकाज में पारदर्शिता की। भ्रष्टाचार ने सरकार की छवि को बहुत मलिन किया है। यह अलग बात है कि भाजपा चुनाव जीत गई लेकिन आमचर्चाओं में भ्रष्टाचार एवं उससे निपटने में सरकार की उदासीनता की जमकर आलोचना होती रही है। भ्रष्टाचार के आरोपों की गिरफ्त में आए उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को कथित अभयदान भी चर्चाओं के केन्द्र में रहा है। लोकप्रियता का दावा करने वाली किसी भी सरकार के लिए ऐसी चर्चाएं असहनीय होनी चाहिए लेकिन दुर्भाग्य यही है कि ये चर्चाएं पिछले दस सालों में सरकार के साथ-साथ चलती रही हैं। अब उम्मीद की जानी चाहिए सरकार ऐसी चर्चाओं पर विराम लगाने के लिए अपने कामकाज में सुधार के जरिए सकारात्मक संदेश देने की कोशिश करेगी। जाहिर है इसके लिए उसे प्रशासन से जुड़े प्रत्येक कार्य में पारदर्शिता लानी पड़ेगी।

सरकार को यह भी सोचना होगा कि बस्तर और सरगुजा में भरपूर ध्यान देने के बावजूद सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस से क्यों कमतर रही? चाहे मुख्यमंत्री रमन सिंह की विकास यात्रा हो या ग्राम सुराज अभियान, उसका श्रीगणेश दंतेवाड़ा से किया गया, बस्तर और सरगुजा में मुख्यमंत्री ने पिछले पांच सालों में अरबों के विकास कार्यों की सौगातें दीं लेकिन ऐसा क्या हुआ कि बस्तर में उसके हाथ से 7 सीटें निकल गई जबकि 2008 के चुनाव में उसे 12 में से 11 सीटें मिली थीं। क्या जीरम घाटी नक्सली हमले में दिग्गज कांग्रेसियों की मौत पार्टी पर कहर बनकर टूटा? क्या विकास कार्यों में हुआ भारी भ्रष्टाचार उसे ले डूबा अथवा नक्सली आतंक से उसके खिलाफ मतदान हुआ या फिर स्थानीय समस्याओं यथा सड़क, नाली, बिजली, पानी तथा खस्ताहाल लोक स्वास्थ्य ने उसका मार्ग रोका? दरअसल आजादी के 66 वर्षों के बावजूद बस्तर के घने जंगलों में बसे आदिवासियों तक प्रशासन की कोई पहुंच नहीं है तथा उनका जीवन भगवान भरोसे है। मतलब स्पष्ट है कि बस्तर में अरबों रुपए मुख्यत: ग्रामीण स्वास्थ्य, पेयजल, शिक्षा तथा सड़क और बिजली की व्यवस्था के नाम पर जो खर्च किए गए, वे बेमानी हैं, कागजों पर हैं। अन्यथा स्थानीय समस्याओं पर हुआ मतदान भाजपा के खिलाफ नहीं जाना चाहिए था। मुख्यमंत्री को अब अपने अगले पांच सालों में बस्तर में वास्तविक विकास पर ध्यान देना होगा। यदि वास्तविक विकास हुआ होता तो जाहिर है, नक्सली समस्या पर भी कुछ हद तक काबू पाया जा सकेगा।
अपने चुनावी घोषणापत्र में पार्टी ने जनता से जो वायदे किए हैं, उन पर अमल की शुरुआत मुख्यमंत्री ने अपनी तीसरी पारी के पहले दिन से ही कर दी है। इनमें प्रमुख हैं आगामी 1 जनवरी से 47 लाख परिवारों को एक रुपए किलो चावल तथा किसानों को धान पर प्रतिवर्ष 300 रु. प्रति क्विंटल बोनस। धान का समर्थन मूल्य 2100 रु. निर्धारित करने के लिए मुख्यमंत्री ने गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दी है। घोषणा पत्र के अन्य वायदों पर अमल इसलिए भी कठिन नहीं है क्योंकि सभी सामान्य है, भारी-भरकम  नहीं, लिहाजा उन पर अमल करने में सरकार को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।

मुख्यमंत्री के 2003 एवं 2008 के शासनकाल में जो सबसे बड़ी कमी महसूस की गई थी, वह थी प्रशासन पर उनकी कमजोर पकड़। मुख्यमंत्री ने अपनी छवि को साफ-सुथरी बनाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी किंतु प्रशासन को उन्होंने इतना ढीला छोड़ दिया कि वह स्वेच्छाधारी हो गया। इसलिए प्रशासनिक कसावट पहली जरूरत है। चूंकि डॉ.रमन सिंह को तीसरा कार्यकाल मिला है लिहाजा यह उम्मीद की जाती है कि वे अब प्रशासनिक ढिलाई बर्दाश्त नहीं करेंगे तथा उसमें भरपूर पारदर्शिता लाएंगे। शासन-प्रशासन के स्तर पर एक और बड़ी जरूरत है कामकाज पर सतत निगरानी की। जनहित की योजनाएं तो बहुतेरी हैं किंतु उन पर अमल का पक्ष उतना ही कमजोर। भ्रष्टाचार के फलने-फूलने की यह एक बड़ी वजह है। राज्य में विकास के अरबों रुपए के काम हो रहे हैं, और यह स्थापित सत्य है कि मंत्रियों, राजनेताओं, अफसरों से लेकर शासकीय सेवा के निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति तक कमीशनखोरी रोजाना के व्यवहार में शामिल है। कल्पना की जा सकती है कि राज्य में भ्रष्टाचार किस कदर भयानक है। इसे खत्म करना तो नामुमकिन है अलबत्ता इसे सीमित जरूर किया जा सकता है। शासन के सामने यह एक बड़ी चुनौती है।

मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह को यह भी ध्यान में रखना होगा कि प्रदेश में गरीबी बढ़ी है, कुपोषण के मामले में भी छत्तीसगढ़ देश के आंकड़ों में आगे है। यह ठीक है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली की सुगठित व्यवस्था को तारीफ मिली है किंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि दूरदराज के आदिवासियों को सस्ते राशन के लिए अभी भी मीलों पैदल चलना पड़ता है, नदी-नाले लांघने पड़ते हैं। एक रुपए किलो चावल या 4 रु. किलो चने से उनकी गरीबी दूर नहीं होगी, इसके लिए स्थायी रोजगार का सृजन करना होगा। भाजपा के घोषणापत्र में रोजगार की कोई गारंटी नहीं की गई है। कोई जिक्र नहीं है। यह अजीब सी बात है। राज्य में आईटी हब बनाने तथा नई औद्योगिक क्रांति लाने की पूर्व घोषणाएं भी थोथी साबित हुई हैं। राज्य को देश की ऊर्जा राजधानी बनाने का संकल्प तो वर्षों पुराना है? लेकिन हुआ क्या? ऐसे बहुत सारे सवाल हैं, चुनौतियां हैं, जिन्हें पूरा करने का दायित्व सरकार का है। राज्य की कायापलट करने के लिए 15 साल काफी होते हैं। 10 साल निकल चुके हैं, शेष पांच सालों मेंं उम्मीदों के पहाड़ को लांघना है। क्या डॉ.रमन सिंह ऐसा कर पाएंगे?

Tuesday, December 10, 2013

भरोसे की हैट्रिक

आखिरकार धुंध साफ हो गई। भाजपा और कांगे्रस के बीच चुनावी जंग में ऐसी कश्मकश की स्थिति बनी थी कि अंदाज लगाना मुश्किल था, बहुमत किसे मिलेगा। दोनो पार्टियों के अपने-अपने दावे थे। अपने-अपने तर्क थे। जीत का सेहरा दोनों अपने सिर पर देख रहे थे। राज्य में भारी मतदान से दो तरह की राय बन रही थी। एक अनुमान था सन् 2008 के चुनाव की तुलना में करीब 6 प्रतिशत अधिक मतदान सत्ता के पक्ष में लहर के रूप में है जबकि इसके ठीक विपरीत राय रखने वाले भी बहुतायत थे। उनका मानना था कि अधिक मतदान सत्ता के प्रति विक्षोभ का परिणाम है। इसीलिए इसका फायदा कांग्रेस को मिलेगा। वह सत्ता में लौटेगी। और तो और एक्जिट पोल भी अलग-अलग राय दे रहे थे। अधिकांश की राय थी कि भाजपा पुन: सरकार बनाने जा रही है। कांग्रेस के पक्ष में भी कुछ एक्जिट पोल थे। यानी कुल मिलाकर असमंजस की स्थिति थी। मतगणना के पूर्व तक विचारों का ऐसा धुंधलका छाया हुआ था, कि ठीक-ठीक अनुमान लगाना भी मुश्किल था। लेकिन अब मतगणना के साथ ही कुहासा छंट गया है। कयासों  को दौर खत्म हो गया है। और नतीजे जनता के सामने हैं। भाजपा ने हैट्रिक जमायी है। डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में पार्टी की यह बड़ी उपलब्धि है। यह उनके विकास परक सोच की जीत है।

दरअसल इस बार भाजपा को कांगे्रस से इतने बड़ी चुनौती की उम्मीद नहीं थी। हालांकि पार्टी और स्वयं मुख्यमंत्री रमन सिंह हैट्रिक सुनिश्चित मान रहे थे। उन्होंने मतदान के बाद जीत के दावे भी किए लेकिन आशंकाओं से पार्टी उबर नहीं पाई। जिस जीत को वे एकतरफा मान रहे थे, वह अंतिम दौर तक पहुंचते-पहुंचते काफी कठिन हो गई। लेकिन अंतत: भाजपा ने मैदान मार लिया।  और अच्छे से मारा।  उसकी हैट्रिक दरअसल रमन सिंह की हैट्रिक है क्योंकि रमन सिंह न केवल उसके स्टार प्रचारक थे बल्कि उनके नेतृत्व में सरकार ने जो जनकल्याणकारी नीतियां बनाई और उन पर अमल किया, उस पर मतदाताओं ने अपना भरोसा जताया। यह जनता के भरोसे की तीसरी जीत थी। निश्चय ही इस भरोसे को जीतने का श्रेय अकेले रमन सिंह को है।
   
छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांगे्रस के बीच हमेशा सीधी टक्कर रही है। चाहे वह 2003 के चुनाव हो या 2008 के। लेकिन 2013 के चुनाव में छत्त्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच की मौजूदगी से यह उम्मीद की जा रही थी कि इस बार उसका खाता खुलेगा। बसपा, स्वाभिमान मंच एवं कम्युनिस्ट पार्टी कम से कम 3-4 सीटें जरूर निकाल लेंगी। किन्तु ऐसा नहीं हो सका। सिर्फ बसपा का एक प्रत्याशी जीता और एक भाजपा के बागी उम्मीदवार ने निर्दलीय के रूप में अपनी धमक बनाई। इसका सीधा अर्थ है कि छत्तीसगढ़ के चुनावी समर में किसी तीसरे की अभी भी कोई गुंजाइश नही है। जहां तब कांगे्रस का सवाल है, उसने सन् 2008 चुनाव के मुकाबले इस दफे ज्यादा संगठित होकर चुनाव लड़ा तथा मुद्दों को भुनाने की कोशिश की।  शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं कुशासन के प्रमुख हथियार के साथ-साथ उसने जीरम घाटी सहानुभूति की लहर पर भी सवार होने की कोशिश की किन्तु पार्टी को इसका लाभ नहीं मिला। राज्य में भारी भरकम मतदान से उसे यह भी उम्मीद थी कि सत्ता विरोधी लहर का भी उसे फायदा मिलेगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। भारी मतदान सत्ता के विरोध में नहीं, सत्ता के पक्ष में गया।

यकीनन कांग्रेस को ऐसी करारी हार की उम्मीद नही थी। उसकी स्थिति लगभग 2008 जैसी ही रही। उसकी सीटों में कोई इजाफा नहीं हुआ। तमाम संभावनाओं के बावजूद पार्टी की हार क्यों हुई,  दिग्गज क्यों हारे, मैदानी इलाकों में पिछले चुनाव की तुलना में उसका प्रदर्शन क्यों खराब रहा, आदि प्रश्नों पर उसे विचार करना होगा। चुनाव में लगातार तीसरी हार उसके लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए। प्रारंभिक तौर पर यही कहा जा सकता है कि पार्टी गुटबाजी से उबर नही पाई हालांकि बाह्य रूप से वह एकता दिखाने की कोशिश जरूर करती रही। चुनाव के दौरान भितरघात और निष्क्रियता ने भी उसे कमजोर किया। जैसा कि अजीत जोगी ने स्वीकार किया है, पार्टी जीरमघाटी में दिग्गज कांग्रेसियों की शहादत के मुद्दे को भी जन सहानुभूति के रूप में तब्दील नही कर पाई। और सबसे बड़ी बात है कि विधानसभा के भीतर एवं बाहर विपक्ष के रूप में पूर कार्यकाल में उसकी भूमिका लचर रही। न तो इस दौरान वह जनहित के मसलों को ठीक से उठा पाई और न ही उसने जनता के साथ खड़े होने की कोशिश की। उसकी निष्क्रियता एवं जनता से उसकी दूरी का पूरा लाभ भाजपा ने उठाया। इसलिए भाजपा की हैट्रिक दरअसल सकारात्मक वोटों की हैट्रिक है।


            

Thursday, December 5, 2013

एक्जिट पोल का सच

स्पष्ट बहुमत के साथ तीसरी बार सरकार बनाने का मुख्यमंत्री रमन सिंह का दावा क्या सच साबित होगा? चुनाव पूर्व एवं चुनाव के बाद हुए सर्वेक्षणों पर गौर करें तो ऐसा संभव प्रतीत हो रहा है। राज्य में चुनाव आचार संहिता लागू होने के पहले कुछ न्यूज चैनलों के एवं भाजपा के अपने सर्वेक्षण तथा मतदान के बाद हुए सर्वेक्षणों से यह बात उभरकर सामने आई कि लगभग 50-53 सीटों के साथ भाजपा छत्तीसगढ़ में पुन: सत्तारूढ़ होने जा रही है। मुख्यमंत्री ने राज्य में 11 नवम्बर को हुए भारी भरकम मतदान को देखते हुए विश्वास व्यक्त किया था कि उनकी हैट्रिक तय है। लेकिन यही दावा पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी सहित राज्य के वरिष्ठ कांग्रेस नेता भी कर रहे हैं। एक्जिट पोल के नतीजे आने के बावजूद वे अपने दावे पर कायम हैं। जाहिर है किसके दावे में कितना दम है, यह दो दिन बाद, 8 दिसम्बर को होने वाली मतगणना से स्पष्ट हो जाएगा।

जहां तक चुनाव सर्वेक्षणों की बात है, वे केवल संकेत देते हैं। वे एकदम सच नहीं होते किंतु जिज्ञासुओं को सच के काफी करीब ले जाते हैं। इन सर्वेक्षणों से यह अनुमान तो लगाया ही जा सकता है कि किस पार्टी को बहुमत मिल रहा है तथा कौन सी पार्टी चुनाव हार रही है। हालांकि विभिन्न न्यूज चैनलों एवं सर्वेक्षण एजेंसियों के इस संयुक्त उपक्रम में आंकड़ों का भी काफी अंतर होता है। मसलन इंडिया-टुडे-ओआरजी सर्वे छत्तीसगढ़ में भाजपा को कुल 90 में से 53 सीटें दे रहा है यानी सरकार बनाने लायक बहुमत से 7 सीटें ज्यादा। यह आंकड़ा पिछले चुनाव से भी 3 अधिक है। एक और न्यूज चैनल न्यूज 24 टुडेज-चाणक्य भी इसी आंकड़े के करीब है। वे भाजपा को 51 सीटें दे रहे हैं और कांग्रेस को 39। लेकिन कुछ अन्य सर्वेक्षणों मसलन टाइम्स नाउ, इंडिया टीवी, आईबीएन-सीएसडीएस - द वीक आदि के नतीजों पर गौर करें तो भाजपा और कांग्रेस के बीच सीटों का बहुत ज्यादा फासला नहीं है। बल्कि पिछले चुनाव के मुकाबले यह अंतर घटा है। पिछले चुनाव में भाजपा को 50 एवं कांग्रेस को 38 सीटें मिली थीं। अब 2013 के एक्जिट पोल दोनों के बीच महज 4-5 सीटों का अंतर बता रहे हैं। यदि इन सर्वेेक्षणों को सच के नजदीक माने तो दोनों पार्टियों को सरकार बनाने लायक बहुमत यानी 46 सीटें नहीं मिल रही हैं। ये सर्वेक्षण बसपा और निर्दलियों को 3 से 5 सीटें दे रहे हैं। यदि ऐसा है तो इसका अर्थ यह हुआ कि दोनों पार्टियों को सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ का सहारा लेना पड़ेगा। जो पार्टी दो-तीन विधायकों का विश्वास जीत लेगी, वह सरकार बनाने में कामयाब हो जाएगी। चूंकि जोड़-तोड़ की राजनीति में भाजपा से कहीं ज्यादा कांग्रेस के खिलाड़ी माहिर हैं, इसलिए यदि ऐसी नौबत आई तो पार्टी की उम्मीदें पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी पर टिक जाएंगी जिन्होंने सन् 2000 से 2003 के अपने कार्यकाल में भाजपा के एक दर्जन विधायकों को तोड़कर तहलका मचा दिया था।

छत्तीसगढ़ में इस बार 77 प्रतिशत रिकार्ड मतदान हुआ है। यद्यपि भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर थी किंतु एक दर्जन से ज्यादा निर्वाचन क्षेत्रों में बसपा, छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने चुनाव समीकरणों को बिगाड़ रखा है। हालांकि चैनलों के चुनाव सर्वेक्षण इन पार्टियों को ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहे हैं किंतु इनकी उपस्थिति दोनों पार्टियों की संभावनाओं को क्षीण जरूर करती है। इसके बावजूद उम्मीद की जा रही है कि 2008 के चुनाव की तुलना में इस बार उनकी उपस्थिति कुछ ज्यादा होगी। यह 5-6 हो सकती है। पिछले चुनाव में एक भी निर्दलीय नहीं जीत पाया था जबकि दो सीटें बसपा को मिली थीं।

चुनाव सर्वेक्षणों के आंकड़ों पर यकीन करें तो यह बात भी सिद्घ होती है कि छत्तीसगढ़ में 77 प्रतिशत मतदान सत्ता के विरोध में नहीं, सत्ता के पक्ष में जा रहा है। इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि डॉ.रमन सिंह की उज्जवल छवि एवं उनकी जनकल्याणकारी नीतियां, विशेषकर गांव-देहातों में दो रुपए किलो चावल का जादू अभी भी चल रहा है। सन् 2008 के चुनावों में इसी जादू ने काम किया था तथा रमन सिंह को दूसरी बार सत्ता सौंप दी थी। उनकी राजनीतिक बाजीगरी का असर फीका नहीं पड़ा है। भाजपा को बहुमत मिलने की स्थिति में यह स्पष्ट हो जाएगा कि राज्य के मतदाताओं को विकास का मुद्दा भाया है तथा उन्होंने रमन के नेतृत्व पर विश्वास व्यक्त किया है। बहरहाल सर्वेक्षणों के नतीजों से भाजपा में उत्साह का माहौल है। होना भी चाहिए क्योंकि 5 में से 4 राज्य विधानसभा चुनावों में पार्टी को बढ़त मिलने का अनुमान है। फिर भी आशंकाओं से इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि आखिरकार सर्वे के नतीजे अनुमानित हैं। इसलिए इसके आधार पर यह माना जा सकता है कि राज्य में भाजपा या तो बहुमत हासिल कर लेगी या कुछ पीछे रह जाएगी। यानी मुख्यमंत्री रमन सिंह की हैट्रिक उम्मीद और नाउम्मीद के बीच झूल रही है। देखें क्या होता है, फैसले की घड़ी ज्यादा दूर नहीं है।

Wednesday, December 4, 2013

दिल्ली पर निगाहें

पांच राज्य विधानसभा के चुनावों में दिल्ली का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। देश की निगाहें इस चुनाव पर इसलिए टिकी हुई हैं क्योंकि पहली बार राजधानी में त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बनी है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी की पार्टी का मुकाबला दो स्थापित राष्ट्रीय दल कांग्रेस एवं भाजपा से है। 70 सीटों के इस चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा, कहा नहीं जा सकता अलबत्ता तीनों पार्टियां बहुमत का दावा कर रही हैं। नक्शा 8 दिसम्बर को साफ हो जाएगा जब मतपेटियों से जनता का फैसला बाहर आएगा। इसमें दो राय नहीं है कि चुनाव प्रचार के दौरान केजरीवाल की पार्टी ने बड़ा दम-खम दिखाया है। स्थानीय मुद्दों को लेकर वह दिल्ली की जनता को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करती करी है कि कांग्रेस अथवा भाजपा के राज में उसका भला नहीं होने वाला। इसमें भी दोय राय नहीं कि आम आदमी की पार्टी ने लोगों के दिलों को झंझोड़ा है और वे उसकी ओर आकर्षित हुए हैं। लेकिन यह आकर्षण उसे सत्ता तक पहुंचा पाएगा अथवा नहीं, कहना कठिन है पर यह भी स्पष्ट है कि उसने एक तीसरी ताकत के रूप में दिल्ली में अपनी धमक बनाई है। पार्टी ने चूंकि शून्य से शुरुआत की है इसलिए उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है अलबत्ता उसे चुनाव में जो कुछ भी हासिल होगा, वह उसे कम से कम दिल्ली की राजनीति में जरूर स्थापित करेगा। कहा जा सकता है कि वह भविष्य की पार्टी है जो कांग्रेस एवं भाजपा के साथ खड़ी नजर आएगी।  अभी तो उसने अपनी मौजूदगी से दोनों को हलाकार कर रखा है। दोनों चिंतित एवं सशंकित हैं। चूंकि दिल्ली में भारी मतदान हुआ है इसलिए नतीजे चौंकाने वाले आ सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो वह राजधानी की राजनीति में ने बदलाव का संकेत होगा।

Friday, November 29, 2013

कांग्रेस : उम्मीदें भी आशंकाएं भी

दिलों की धड़कनों को तेज करने वाली घड़ी नजदीक आते जा रही है। 8 दिसम्बर को मतगणना शुरू होगी और शाम होने के पहले नई विधानसभा की तस्वीर स्पष्ट हो जाएगी। जनता के बीच कयासों का दौर अभी भी जारी है तथा कांग्रेस एवं भाजपा दोनों सरकार बनाने के प्रति आश्वस्त हैं। क्या होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन यह निश्चित है कि इस दफे का चुनावी युद्घ दोनों पार्टियों खासकर कांग्रेस के लिए 'निर्णायक' साबित होगा। वर्ष 2000 में म.प्र. से अलग होकर छत्तीसगढ़ के नया राज्य बनने एवं उसके बाद कांग्रेस की सत्ता के तीन वर्ष छोड़ दें तो बीते 10 वर्षों में पार्टी की सेहत बेहद गिरी है। पार्टी ने सन् 2003 का चुनाव गंवाया, सन् 2008 में भी वह सत्ता के संघर्ष में पराजित हुई। संगठन का ग्राफ दिनोंदिन नीचे उतरता चला गया। सार्वजनिक हितों के लिए संघर्ष का रास्ता छोड़कर नेतागण व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं की पूर्ति में इतने मस्त रहे कि उन्होंने पार्टी को बौना बना दिया। इतना बौना कि वह जनता की नजरों से भी उतरती चली गई। संगठन की दुर्दशा का आलम यह था कि निजी आर्थिक एवं राजनीतिक स्वार्थों के लिए अनेक कांग्रेसियों ने भाजपा के साथ गुप्त गठजोड़ करने से भी गुरेज नहीं किया। रात के अंधेरे में मंत्रियों के बंगले में मुलाकातों का दौर चलता था। इस गठजोड़ का सबूत इस बात से मिलता है कि दस वर्ष के भाजपा शासन में किसी कांग्रेसी का काम नहीं रुका बल्कि उन्हें प्राथमिकता के साथ निपटाया गया। राजधानी में गुप्त गठजोड़ की यह चर्चा इतनी आम थी कि राजनीति में दिलचस्पी रखने वाला हर दूसरा आदमी इस विषय पर बातें करता नजर आता था।

लगभग मुर्दा हो चले संगठन में जान तब पड़ी जब नंदकुमार पटेल को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी गई। पटेल ने पार्टी में नई ऊर्जा भरने की कोशिश की तथा वे अपने मकसद में कामयाब भी रहे। उन्होंने संगठन को फिर से खड़ा कर दिया। यदि जीरम घाटी नक्सली हमले में उनकी तथा उनके साथ तीन और शीर्ष नेताओं की जान नहीं जाती तो छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की उम्मीदों को और पंख लगते। आज आम चर्चाओं में कांग्रेसी जीत का दावा तो करते हैं परंतु सशंकित भी नजर आते हैं। यकीनन यदि जीरम घाटी हादसा न हुआ होता तो चुनाव में कांग्रेस अपने आप को और बेहतर स्थिति में पाती।

यह बात भी स्पष्ट है कि जीरम घाटी हादसे के बाद प्रदेश पार्टी ने केन्द्रीय नेतृत्व के निर्देश पर अपने आप को संभाला तथा जिस एकजुटता का परिचय दिया, उसकी वजह से छत्तीसगढ़ राज्य विधानसभा चुनाव में वह भाजपा के साथ बराबरी स्थिति में खड़ी दिखती है। लेकिन अब चुनाव के नतीजों पर उसकी सांसें अटकी हुई हैं। यदि कांग्रेस सरकार बनाने लायक सीटें जीत लेती है तो बल्ले-बल्ले और यदि ऐसा नहीं हो पाया तो संगठन की मनोदशा का अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है। जाहिर है वह तीसरी हार झेलने की स्थिति में नहीं है। यह कहना ज्यादा उचित होगा कि रमन की हैट्रिक कांग्रेस को ध्वस्त करने की हैट्रिक होगी। यद्यपि 2018 के राज्य विधानसभा चुनाव पांच वर्ष बाद होंगे किंतु संगठन की दृष्टि से कांग्रेस के लिए ये वर्ष इतने भारी रहेंगे कि टूटे हुए मनोबल से पार्टी को उबार पाना उसके लिए अत्यंत दुष्कर होगा। यानी सन् 2013 के ये चुनाव कांग्रेस के लिए आक्सीजन की तरह है। यदि जीत की आक्सीजन उसे नहीं मिल पाई तो छत्तीसगढ़ से कांग्रेस की उम्मीदें लगभग खत्म हो जाएंगी क्योंकि प्रदेश में उसके पास कोई ऐसा जादुई नेतृत्व नहीं है जो उसके बिखराव को रोकने का सामथ्र्य रखता हो। फिर वही दृश्य नज़र आने लगेंगे जो बीते दशक के दौरान दिखते रहे हैं यानी जनहित के मुद्दों से किनारा, सत्ता पक्ष के साथ गुप्त समझौते, आपसी कलह, अनुशासनहीन आचरण, घृणा की हदों को स्पर्श करने वाली गुटबाजी तथा एक-दूसरे के खिलाफ सार्वजनिक रूप से टीका-टिप्पणियां। चुनाव के आईने में प्रदेश कांग्रेस का आज और कल स्पष्टत: महसूस किया जा सकता है।


Wednesday, November 27, 2013

सवालों के घेरे में चुनाव आयोग

छत्तीसगढ़ में राज्य विधानसभा के चुनाव अमूमन शांतिपूर्ण ढंग से निपटने के बावजूद निर्वाचन आयोग सवालों के घेरे में है। प्रदेश सरकार के मंत्री एवं रायपुर दक्षिण से भाजपा प्रत्याशी बृजमोहन अग्रवाल आयोग की कार्यप्रणाली से बेहद खफा हैं। उन्होने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग ने अम्पायर नहीं, खिलाड़ी की भूमिका निभाई। उन क्षेत्रों से बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से गायब कर दिए गए जहां से उन्होने पिछले चुनाव में लीड ली थी। बृजमोहन ने यह संख्या लगभग 15 हजार बताई है। उनका यह भी कहना है कि केवल उनके क्षेत्र से नहीं पूरे प्रदेश में नाम गायब होने की वजह से हजारों मतदाता मतदान से वंचित हो गए। बृजमोहन इस पूरे मामले को कोर्ट में ले जाने की तैयारी में है।
क्या चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर इस तरह के प्रश्र चिन्ह खड़े किए जा सकते हैं? लेकिन बृजमोहन एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि हंै इसलिए उनकी बातों को अनदेखा कैसे किया जा सकता है? यह सच है कि वे इसलिए ज्यादा नाराज हैं क्योंकि उनके निर्वाचन क्षेत्र के सैकड़ों मतदाताओं के नाम आयोग की सूची में नही आ पाए, वरना वे शायद ऐसी बात नहीं कहते। लेकिन यह भी सच है कि इस बार की मतदाता सूचियों में काफी गड़बडिय़ां थीं। हजारों की संख्या में नाम छूट गए जबकि अनेकों के पास पूर्व में जारी किए गए मतदाता परिचय पत्र भी उपलब्ध थे। चूंकि राज्य निर्वाचन आयोग की मतदाता सूची में उनका नाम नहीं था, इसलिए उन्हे वोट नहीं डालने दिया गया। इसलिए बृजमोहन की शिकायत वाजिब है। दरअसल प्रदेश के सभी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण एवं संशोधन की जरूरत है। जबकि होता यह है कि इस कार्य में पर्याप्त सावधानियां नहीं बरती जाती और गड़बड़ी का खुलासा तभी होता है जब चुनाव एकदम सिर पर आ जाता है। खासकर मतदान के दिन शिकायतें गरजने-बरसने लगती हैं।
बृजमोहन अग्रवाल की शिकायतों को राज्य चुनाव आयोग कितनी गंभीरता से लेगा और सुधार की दिशा में कैसे प्रयत्न करेगा, आगे की बात है लेकिन आयोग की समूची कार्यशैली को आरोपित करके यह कहना कि उसने अम्पायर नहीं, खिलाड़ी की भूमिका निभायी, अतिशयोक्तिपूर्ण और दु:खद है। इसमें क्या संदेह है कि निर्वाचन आयोग की सख्ती एवं कार्यकुशलता की वजह से इस घोर नक्सल प्रभावित राज्य में चुनाव शांतिपूर्ण सम्पन्न कराए जा सके और वह भी 75 प्रतिशत रिकार्ड मतदान के साथ। इस बात के लिए यकीनन आयोग की तारीफ की जानी चाहिए। पर यह तथ्य अभी भी अपनी जगह पर कायम है कि आयोग के निर्देशन में चुनाव सम्पन्न कराने वाली एजेंसियां अपनी भूमिका के साथ पूर्णत: न्याय नहीं कर पा रही है। विशेषकर सुरक्षा व्यवस्था पर और ध्यान देने की जरूरत है। साजा निर्वाचन क्षेत्र में गोली चालन की घटना और एक व्यक्ति की मौत व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाती है।
सवालिया निशान मतदान की तिथि यानी 18-19 नवम्बर की रात की गतिविधियों पर भी है । इस रात शहर की दर्जनों झुग्गी बस्तियों में सरेआम पांच-पांच सौ रूपए के नोट बांटे गए और शराब की बोतलें उपहार में दी गई। यद्यपि श्रमिक बस्तियों में मतदाताओं से प्रलोभित करने के लिए पैसे, शराब, या साडिय़ां-कंबल बांटना कोई नई बात नहीं है। प्रत्येक विधानसभा एवं नगरीय संस्थाओं के चुनावों में राजनीतिक पार्टियां इन हथकंड़ों का इस्तेमाल करती रहीं हैं। लेकिन जब देश में चुनाव सुधार की प्रक्रिया तेजी से चल रही हो तथा व्यापक सुधार परिलक्षित भी हो रहा हो, तब पैसे बांटने जैसी बीमारियों पर भी काबू पाया जा सकता है। लेकिन ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा है? क्या कारण है कि आचार संहिता लागू होने के बाद तथा मतदान के एक दिन पूर्व तक तो सुरक्षा व्यवस्था जबरदस्त रहती है किन्तु मतदान की पूर्व संध्या इतनी ढ़ीली पड़ जाती है कि बहुत आसानी से वोटों की खरीद-फरोख्त होने लगती है।  ऐसा क्यों? विशेषकर झुग्गी बस्तियों में जहां के वोटर चुनाव को सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं।
यकीनन यही कहानी सभी शहरों-गांवों एवं कस्बों की है। राजधानी रायपुर की बात करें तो शहर की चार विधानसभा सीटों के अन्तर्गत आने वाली दर्जनों बस्तियां चुनाव की रात गुलजार रहीं। कारें आराम से बस्तियों तक पहुंच रही थीं। कहीं कोई चेकिंग नहीं। कोई पूछताछ नहीं। रविशंकर शुक्ल वि.वि. के पीछे स्थित कुकुरबेड़ा बस्ती, राजातालाब, श्याम नगर, पी एडं टी कालोनी, हनुमान नगर, बैरन बाजार, सुभाष नगर, नेहरू नगर, टिकरापारा, जैसी कई झुग्गी बस्तियों में कांग्रेस एवं भाजपा कार्यकर्ता दमखम के साथ आवाजाही करते रहे। उन्होने रूपए बांटें, शराब की बोतलें दी और सबसे वोट देने का कौल ले लिया। सवाल है जब आयोग इस तथ्य से परिचित है कि मतदान के पूर्व की रात इस तरह की गतिविधियां बेखौफ चलती है, तो उसे रोकने व्यापक बंदोबस्त क्यों नहीं किए गए? झुग्गी बस्तियों में पुलिस क्यों नहीं तैनात की गई? क्यों नही उन्हे निगरानी में रखा गया?  सुरक्षा बल को ढ़ील क्यों दी गई? क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक कारण थे? या किसी राजनीतिक दबाव में आकर आंखें फेर ली गई? चुनाव प्रक्रिया के शुरू होने के बाद पुलिस ने जैसी स्फूर्ति दिखाई थी, वह आखिरी और निर्णायक वक्त पर हवा क्यों हो गई?  निश्चय ही जागरूक जनता इसका जवाब चाहेगी। 
दरअसल राज्य निर्वाचन आयोग को दो मुद्दों पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। एक मतदाता सूचियों का दुरूस्तीकरण और दूसरा प्रलोभनों की रोकथाम। पहला काम थोड़ा जटिल जरूर है लेकिन इसे फुलप्रूफ बनाने की जरूरत है। दूसरा काम तनिक आसान है बशर्ते आयोग इसे अभियान के तौर पर लें।  मतदान के पूर्व क्या झुग्गी बस्तियों की पहरेदारी नहीं की जा सकती? पुलिस यदि चौकस रहे तो वोट खरीदने का सिलसिला थम सकता है। 6 माह बाद लोकसभा चुनाव है।  उम्मीद की जानी चाहिए उस समय ऐसे दृश्य देखने नही मिलेंगे। हालांकि लेन-देन को रोक पाना काफी मुश्किल है फिर भी कुछ तो अंकुश लग ही सकता है। 

जो जीतेगा वही सिकंदर


कोई गगनभेदी धमाके नहीं। चीखते-चिल्लाते लाउडस्पीकर से कान के परदे फट जाए ऐसी आवाजें भी नहीं। छोटा-मोटा बैंड-बाजा और समर्थकों की छोटी-मोटी बारात, गली-मोहल्लों में रेंगती सी। लेकिन प्रचार धुआंधार। घर-घर जनसंपर्क। चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में ऐसे दृश्य छत्तीसगढ़ के हर शहर और गांव में देखने मिल जाएंगे क्योंकि मतदान की तिथि एकदम करीब आ गई है। 19 नवंबर को दूसरे एवं अंतिम चरण में राज्य की शेष 72 सीटें के लिए मत डाले जाएंगे। कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला कड़ा है। मुद्दे गौण हो चुके हैं। मतदाताओं ने अपना मानस बना लिया है। उन्होंने भाजपा शासन के 10 साल देखे हैं। उसके सकारात्मक, नकारात्मक पहलुओं को अपने हिसाब से तौल लिया है। यही स्थिति कांग्रेस के साथ में भी है। बीते दशक में नेताओं के क्रियाकलापों को, नीतियों और कार्यक्रमों को भी देख-परख लिया है। लिहाजा अब दोनों प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दलों का प्रचार अभियान उनके लिए एक तरह से बेमानी है। वोट उसी पार्टी को देंगे, उसी प्रत्याशी को देंगे जिन्होंने उनका विश्वास जीता है, दिल जीता है। बहुमत किसे? कांग्रेस या भाजपा के पक्ष में? जल्द तय हो जाएगा। 19 नवंबर को अब चंद दिन ही शेष हैं। मतगणना 8 दिसंबर को है, समूची स्थिति इस दिन स्पष्ट हो जाएगी।

सन् 2008 के चुनाव के मुकाबले इस चुनाव में बड़ा फर्क है। इनमें सबसे प्रमुख है चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली। आयोग इस बार कुछ ज्यादा ही सतर्क और सख्त है। इस सख्ती का ही परिणाम है कि समूचा चुनाव परिदृश्य नियंत्रित एवं संयमित है। दूसरी महत्वपूर्ण बात है इस बार मतदाता मौन जरूर हैं पर आपसी बातचीत में वे अपनी राय जाहिर करने में संकोच नहीं कर रहे हैं। तीसरी बात है- इस चुनाव में स्थानीय समस्याएं मुद्दों पर भारी हैं। यद्यपि अलग-अलग जगहों की अलग-अलग समस्याएं हैं लेकिन प्राय: सभी एक जैसी है यानी सड़क, बिजली, सफाई, प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य एवं शुद्घ पेयजल। ये समस्याएं मतदाताओं को विचार करने बाध्य कर रही हैं। इस बार भी प्रमुख मुद्दे वही हैं जो पिछले चुनावों में भी थे। अर्थात विकास, भ्रष्टाचार और कुशासन। दरअसल द्वंद्व इन्हीं तीनों प्रमुख मुद्दों के बीच में है। सत्तारूढ़ भाजपा, पिछले चुनाव की तरह विकास के मुद्दे को भुनाने की कोशिश कर रही है तो कांग्रेस ने कुशासन एवं भ्रष्टाचार को अपना हथियार बना रखा है।

पिछले चुनाव और इस चुनाव में समानता की बात करें तो मतदान की स्थिति सबसे पहले आती है। 2008 के चुनाव में भी भारी मतदान हुआ था और इस बार भी अच्छी संभावना है क्योंकि बस्तर एवं राजनांदगांव में औसतन 72 प्रतिशत मत पड़े हैं। उम्मीद की जा रही है 72 सीटों पर भी यह ट्रेंड कायम रहेगा। मतदान के अलावा एक और समानता, लहर की है। सन् 2008 में अंडरकरंट था, इस दफे भी है। पिछले चुनाव में अदृश्य लहर भाजपा के पक्ष में बह रही थी, इस बार यद्यपि अंदाज लगाना मुश्किल है पर आमचर्चा कांग्रेस के पक्ष में है। यदि दूसरे चरण में भी भारी-भरकम मतदान हुआ तो यह माना जाएगा कि अन्य मुद्दों के साथ-साथ एंटी इनकम्बेसी फैक्टर भी प्रबल है जो नतीजों को प्रभावित करेगा।

चुनाव प्रचार की बात करें तो दोनों पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व ने छत्तीसगढ़ में पूरी ताकत झोंक रखी है। कांग्रेस की ओर से स्टार केम्पेनर सोनिया गांधी, राहुल गांधी, दिग्विजय सिंह तथा अन्य तो भाजपा की ओर से नरेन्द्र मोदी, आडवाणी, राजनाथ सिंह तथा कई और। राज्य में नरेन्द्र मोदी की 11 सभाएं, हैरत करने वाली है। उनकी इतनी ज्यादा सभाओं का क्या अर्थ है? क्या यह घबराहट की निशानी है या फिर जंग एकतरफा जीतने का संकल्प? यह सोचने वाली बात है। दूसरी ओर कांग्रेस के लिए यह चुनाव जीवन-मरण का प्रश्न है। अपनी जिंदगी के लिए डॉ.रमन सिंह को हैट्रिक से रोकना उसके लिए बेहद जरूरी है क्योंकि दस साल से पार्टी सन्नाटे में हैं, बिखरी हुई है, मनोदशा पतली है और मनोबल टूटा हुआ है। इस चुनाव के कुछ समय पूर्व सांसें लौटी हैं लिहाजा वह पूरी एकजुटता से मुकाबला करने की कोशिश कर रही है। मुकाबला बराबरी का चल रहा है किंतु यह काफी नहीं है। मौजूदा चुनावी माहौल से दोनों पार्टियां आशंकित हैं हालांकि निश्चिंतता दिखाने का प्रयास जरूर कर रही हैं।

पिछले चुनाव के मुकाबले इस चुनाव की एक और खासियत है- कुछ राष्ट्रीय के साथ-साथ क्षेत्रीय दलों की उपस्थिति। यद्यपि बसपा सहित कुछ दल पिछले चुनावों में भी जोर-आजमाइश करते रहे हैं पर सफलता केवल बसपा एवं एनसीपी के खाते में आई। 2008 में बसपा के दो एवं एनसीपी का एक विधायक चुना गया। ल्ेकिन इस बार क्षेत्रीय दल के रूप में छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच मौजूद है जिसने राज्य में अपने 55 प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। उसने दुर्ग जिले में अपनी खासी पकड़ बना रखी है। यह लगभग तय है इस दफे उसका भी खाता खुलेगा। यदि भाजपा या कांग्रेस सामान्य बहुमत के लायक सीटें नहीं निकाल पाईं तो विधानसभा में इन दलों की संभावित उपस्थित निर्णायक हो जाएगी। इसलिए इस चुनाव के बाद नए राजनीतिक समीकरणों की भी संभावना बनी हुई है। 

कुल मिलाकर इस बार का चुनाव आशाओं और आशंकाओं के बीच झूल रहा है। ऐसी स्थिति पहले कभी नजर नहीं आई थी। इसलिए अब इस चुनाव को लेकर यही कहा जा सकता है- 'जो जीतेगा वही सिकंदर।'

मतदाता मौन लेकिन फैसले के लिए तैयार

मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह ने 8 नवंबर को खैरागढ़ विधानसभा क्षेत्र के विभिन्न गांवों में जनसभाओं में भाषण करते हुए स्वीकार किया कि कड़ी परीक्षा है लेकिन हम हैट्रिक लगाएंगे। अब तक के चुनाव प्रचार के दौरान यह पहली बार है जब सत्ता के शीर्ष पर बैठा हुआ व्यक्ति स्वीकार कर रहा है कि मुकाबला आसान नहीं है और पार्टी को कांग्रेस से कड़ी टक्कर मिल रही है। इस कथन से यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि भाजपा किंचित घबराई हुई है और वह जीत के प्रति बेफिक्र नहीं है। उसे कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। 11 नवंबर को बस्तर संभाग एवं राजनांदगांव जिले की कुल 18 विधानसभा सीटों के लिए मत डाले जाएंगे। यही 18 सीटें कांग्रेस एवं भाजपा दोनों का भाग्य तय करेगी। इन 18 सीटों में से 13 सीटें आरक्षित हैं जबकि सामान्य सीटें सिर्फ 5 हैं। यानी 13 सीटों के भाग्यविधाता आदिवासी एवं अनुसूचित जाति के मतदाता हैं। इसमें बस्तर महत्वपूर्ण है जिसने पिछले चुनाव में 12 में से भाजपा के लिए 11 सीटें जीतकर सत्ता के द्वार खोले थे। लेकिन इस बार स्थितियां बदली हुई नजर आ रही हैं। मुकाबला एकतरफ नहीं है। बस्तर और राजनांदगांव में कांग्रेस ने इतने कांटे बिछा दिए हैं कि उनका चुभना तय है। कहां और कितने चुभेंगे, अनुमान लगाना कठिन है किंतु स्थितियां 8 दिसंबर को मतगणना के बाद स्पष्ट हो जाएंगी।

दरअसल इस बार मुद्दे उतने प्रभावी नहीं हैं जिनकी कि उम्मीद की जाती थी। फिर भी उनका असर तो है। भाजपा विकास के मुद्दे को जनता के सामने रख रही है पर बस्तर में वह प्रभावी नहीं है क्योंकि गांव तो गांव शहरों की भी हालत खराब है। इसलिए विकास का मुद्दा यहां नहीं चल रहा है। बल्कि भाजपा को सत्ता विरोधी लहर का जरूर सामना करना पड़ रहा है जो शहरों में ज्यादा प्रभावी है। बस्तर के ग्रामीण अंचलों में चेहरे भी प्रभावी नहीं हैं। उम्मीदवारों से कहीं ज्यादा अहमियत पार्टी के चुनाव चिन्हों की है। गरीब और अपढ़ आदिवासी, उम्मीदवारों को भले ही नाम से न पहचाने लेकिन पार्टी के चुनाव चिन्हों से वे अच्छी तरह परिचित हैं। वे कमल को भी जानते हैं और पंजे को भी। इसलिए इन इलाकों में वोट न नाम पर पड़ेंगे न काम पर, पड़ेंगे तो चुनाव चिन्ह पर। बस्तर में भाजपा यदि ताकतवर है तो केवल एक चावल के मुद्दे पर। मतदाता को सरकार की कोई योजना आकर्षित कर रही है तो वह है दो रुपए किलो चावल। जबकि कांग्रेस के भ्रष्टाचार या कुशासन जैसे मुद्दे गौण हैं, निष्प्रभावी हैं। लेकिन शहरों की ऐसी स्थिति नहीं है। शहरी मतदाता बदलाव की मानसिकता में है इसलिए सरकार के विकास का मुद्दा यहां ढेर है। लेकिन कुशासन का प्रश्न हावी है।

चूंकि मतदान की तिथि निकट है इसलिए समझा जा सकता है कि मतदाताओं ने तय कर लिया होगा कि उन्हें किसके पक्ष में वोट करना है, हालांकि वे मौन हैं। सन् 1977 के लोकसभा चुनाव में बस्तर के आदिवासी मतदाताओं ने कांग्रेस का सफाया कर दिया था। लेकिन सन् 80 के चुनाव में उसे फिर सिर आंखों पर बैठा लिया। यही स्थिति बाद में हुए विधानसभा चुनावों में हुई। यानी यह कहना कि बस्तर के आदिवासियों को भेड़ की चाल की तरह हांका जा सकता है, गलत है। मतदान के मामले में वे उतने ही जागरुक हैं जितने की शहरी। इसलिए न तो उन्हें बरगलाया जा सकता है, न ही प्रलोभित किया जा सकता है। बस्तर के सन्दर्भ में ही एक बात और महत्वपूर्ण है- चुनाव बहिष्कार का नक्सली फरमान और वोटों का प्रतिशत। चुनाव बहिष्कार का नक्सली फरमान और उंगलियां काट देने की धमकी नई नहीं है। सन् 2003 एवं 2008 में भी वे ऐसा कर चुके हैं। उन्होंने हिंसा भी की लेकिन इसके बावजूद वोट अच्छे पड़े खासकर 2008 के चुनाव में आश्चर्यजनक रूप से वोटों का प्रतिशत बढ़ा। सिर्फ नक्सल प्रभावित बीजापुर को छोड़कर शेष 11 सीटों पर भारी-भरकम वोटिंग हुई। यह कैसे संभव हुआ, यह अलग विषय है किंतु इस बार चुनाव आयोग की सख्ती और तगड़े चुनाव प्रबंध को देखकर ऐसा नहीं लगता कि पिछले प्रतिशत की पुनरावृत्ति होगी। यदि वोट कम गिरेंगे तो जाहिर है भाजपा को नुकसान होगा। 


इधर राजनांदगांव जिले में चुनाव समीकरण कुछ अलग तरह की तस्वीर पेश कर रहे हैं। यहां विकास, भ्रष्टाचार व कुशासन के बीच द्वंद्व है। जिले की 6 में से 4 सीटें सामान्य हैं जहां चेहरे महत्वपूर्ण है। चूंकि मुख्यमंत्री गृह जिले राजनांदगांव से चुनाव लड़ रहे हैं इसलिए भाजपा को उनकी छवि का अतिरिक्त लाभ है। जबकि कांग्रेस जीरम घाटी की घटना एवं भाजपा सरकार के दस साल को कुशासन बताकर मतदाताओं का मन बदलने की कोशिश कर रही है। कहना मुश्किल है कि उसे इसका कितना लाभ मिलेगा किंतु सत्ता-विरोधी लहर से वह कुछ ज्यादा ही आशान्वित है। पिछले चुनाव में कांग्रेस को 6 में से 2 सीटें मिली थीं। इस दफे आंकड़े निश्चितत: बदलेंगे। कुल मिलाकर पहले चरण की 18 सीटें दरअसल सत्ता की दहलीज है। यह देखना दिलचस्प होगा कि कड़ी चुनौती का सफलतापूर्वक सामना करते हुए पहला कदम कौन रखेगा- भाजपा या कांग्रेस।

लोकप्रियता की जंग


छत्तीसगढ़ राज्य विधानसभा के चुनाव में यद्यपि सीधा मुकाबला सत्तारूढ़ भाजपा एवं कांग्रेस के बीच है लेकिन यदि लोकप्रियता की जंग की बात करें तो निस्संदेह मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह एवं पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी आमने-सामने हैं। दोनों लोकप्रियता के शिखर पर हैं तथा दोनों के समक्ष अपनी अपनी पार्टी को जिताने की चुनौती है। चुनाव में भाजपा संगठन का नेतृत्व रमन सिंह कर रहे हैं और पार्टी को उन्हीं की साफ-सुथरी छवि पर सत्ता की हैट्रिक का भरोसा है। रमन के अलावा कोई दूसरा नाम नहीं है। यद्यपि विधानसभा क्षेत्रों के क्षत्रपों का अपना-अपना आभामंडल है लेकिन इस आभामंडल को ऊर्जा रमन सिंह की लोकप्रियता से मिल रही है। दूसरी ओर कांग्रेस के पास अजीत जोगी है। एक ऐसा नाम जो विवादित भी है लेकिन दबंग भी। छत्तीसगढ़ , मुख्यमंत्री के रूप में अजीत जोगी की प्रशासनिक क्षमता, सूझ-बूझ, दूरदृष्टि और राजनीतिक कौशल की झलक सन् 2000 से 2003 के बीच देख चुका है। राज्य की जनता उनकी विकासपरक सोच की कायल भी है। उनकी जिजीविषा भी बेमिसाल है। शारीरिक रूप से अस्वस्थ होने के बावजूद वे वर्षों से कुर्सी पर बैठे-बैठे अपने राजनीतिक साम्राज्य का पूरी मुस्तैदी के साथ संचालन कर रहे हैं तथा उन्होंने अपने गढ़ को पार्टी के भीतरी दबावों से सुरक्षित रखा है। उनकी गुटीय ताकत का मुजाहिरा समय-समय पर होता रहा है। राज्य विधानसभा चुनाव के इस दौर में प्रदेश कांग्रेस पर उनकी पकड़ की मिसाल चुनाव संचालन समिति के संयोजक के पद पर नियुक्ति से मिलती है। चुनाव की कमान यद्यपि वरिष्ठ नेता एवं अ.भा कांग्रेस के कोषाध्यक्ष  मोतीलाल वोरा के हाथ में है किंतु पार्टी की असली ताकत जोगी बने हुए हैं। जननेता के रूप में उनकी जमीनी पकड़ मजबूत है।

लोकप्रियता की दृष्टि से डॉ.रमन सिंह और अजीत जोगी में कौन कितना भारी है, ठीक-ठीक अंदाज लगाना मुश्किल है। दरअसल लोकप्रियता को आंकने के अलग-अलग पैमाने, अलग-अलग आधार होते हैं। इनमें प्रमुख हैं व्यक्तित्व, राजनीतिक कौशल, बौद्घिक ताकत, सामाजिक व्यवहार, स्वभाव और कामकाज। व्यक्तित्व की दृष्टि से दोनों नेता प्रभावशाली हैं। राजनीतिक कौशल में भी दोनों जबर्दस्त हैं। अपने सीधे, सरल स्वभाव एवं सुदर्शन व्यक्तित्व को एक अस्त्र बनाकर रमन सिंह ने जनता के बीच अपनी पैठ बनाई है। उनके मुकाबले जोड़-तोड़ की राजनीति में माहिर अजीत जोगी की राजनीतिक सूझबूझ असंदिग्ध है। अपने विरोधियों को कभी माफ न करो की नीति पर चलने वाले अजीत जोगी विध्वंस की राजनीति के हिमायती हैं। रमन सिंह स्वभाव से सहज-सरल हैं तो जोगी भी विनम्र हैं। किंतु उनमें गज़ब की दृढ़ता है जो किसी को हावी होने की इजाजत नहीं देती। बौद्घिक चातुर्य की बात करें तो रमन सिंह की तुलना में अजीत जोगी लाजवाब हैं। कुल मिलाकर रमन सिंह का व्यक्तित्व आकर्षित तो करता है पर एक ढीलेपन का भी अहसास कराता है। ऐसा व्यक्ति कुशल प्रशासक नहीं हो सकता। दूसरी ओर जोगी के व्यक्तित्व में सादगी के बावजूद एक अजीब सी कठोरता है जिसे न तो झुकना मंजूर है और न ही टूटना। मुख्यमंत्री के रूप में तीन साल के अपने कार्यकाल में जोगी ने साबित किया था शासन  कैसे चलाया जाता है। नौकरशाही को कैसे साधा जाता है। दोनों का व्यक्तित्व जुदा है, कामकाज का ढंग अलग है पर प्रदेश में दोनों लोकप्रियता के रथ पर सवार हैं। चुनावी राजनीति में उनकी जनप्रियता का पार्टी को कितना लाभ मिलेगा, यह भविष्य की बात है किंतु इसमें संदेह नहीं है कि दोनों का भविष्य दांव पर हैं। दोनों यदि अपनी पार्टी को जीता नहीं पाए तो यह उनकी व्यक्तिगत हार होगी तथा वे राजनीतिक परिदृश्य से लगभग बाहर हो जाएंगे। यानी विधानसभा चुनाव दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण है। दोनों की लोकप्रियता दांव पर है। 

डॉ.रमन सिंह की प्रसिद्घि का मूल आधार है मुख्यमंत्री के रूप में उनके दस साल के कार्य। सत्ता प्रमुख होने का लाभ। एक दशक के शासन में मुख्यमंत्री ने न केवल छत्तीसगढ़ को विकास के अग्रणी राज्य के रूप में देश के नक्शे में स्थापित किया वरन आधारभूत संरचनाओं के विकास को भी तेज गति दी। सार्वजनिक वितरण प्रणाली सहित कई जनकल्याणकारी योजनाओं की देशभर में चर्चा हुई और उन्हें सराहा गया। इसमें दो राय नहीं कि राज्य में गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार की निरंतर तेज चीख-पुकार के बावजूद उन्होंने विकास के नए आयाम गढ़े। उनकी लोकप्रियता उनकी दस साल की उपलब्धियों का परिणाम है वरना दस साल पूर्व केन्द्रीय मंत्री के रूप में, सांसद के रूप में अथवा प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष के रूप में उनकी लोकप्रियता निचले पायदान पर थी।

पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की लोकप्रियता में नए पंख तब लगे जब वे कलेक्टरी छोड़कर राजनीति में आए।  आई.ए.एस अधिकारी के रूप में वे अविभाजित म.प्र. में खासे लोकप्रिय थे। उनकी लोकप्रियता के तीन दशक इस मायने में अद्भुत है क्योंकि वे कई झंझावतों से होकर गुजरे हैं। कई बार उनका पराभव भी हुआ पर जमीन से वे बेदखल नहीं किए जा सके। जड़ों का साथ नहीं छूटा। राज्य में कांग्रेस के सत्ता से बाहर रहने के बावजूद जोगी की सक्रियता यथावत बनी रही तथा जनता से उनका सम्पर्क नहीं टूटा। यानी लोकप्रियता के मामले में प्रदेश की राजनीति में वे भी बेजोड़ हैं।  


अब सवाल है लोकप्रियता की जंग दोनों में से कौन जीतेगा? फिलहाल इसका कोई जवाब नहीं है। क्योंकि जो भी पार्टी चुनाव जीतेगी, उसके लिए और भी कई कारक जिम्मेदार होंगे। नतीजों से केवल यह तय होगा नेतृत्व को बहुमत का जनसमर्थन मिला अथवा नहीं। तब दोनों की लोकप्रियता को भी इसी तराजू से तौला जा सकेगा।

किसकी शह, किसकी मात

पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी अपने पत्ते फेंटने में माहिर हैं। पिछले डेढ़-दो महीनों के घटनाक्रम को देखें तो उनकी कूटनीतिक विद्वता का अहसास हो जाता है। एक वह समय था, जब वे बगावत की मुद्रा में आ गए थे और अब वे पुन: प्रदेश कांग्रेस की राजनीति की धुरी बन गए हैं। संगठन में अपनी उपेक्षा से आहत अजीत जोगी ने अपने विरोधियों पर काबू पाने बहुत संयत चालें चलीं। प्रारंभ में संगठन खेमे ने कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह के मौन समर्थन से शह और मात का खेल शुरू किया। खेमे ने अजीत जोगी एवं उनके समर्थकों को अपनी कार्रवाइयों एवं बयानों के जरिए इतना उत्तेजित किया कि उनका गुट अलग-थलग पड़ गया और स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगा। लेकिन अजीत जोगी बौखलाए नहीं बल्कि सोची समझी रणनीति के तहत उन्होंने ईंट का जवाब पत्थर से देना शुरू किया। संगठन खेमा भी यही चाहता था कि जोगी गलतियां करें ताकि हाईकमान के सामने उनके अनुशासनहीन आचरण की दुहाई दी जा सके। संगठन खेमे ने ऐसा किया भी क्योंकि अजीत जोगी विभिन्न सार्वजनिक कार्यक्रमों में अपनी भड़ास निकाल रहे थे तथा संगठन खेमे के नेताओं पर अप्रत्यक्ष हमले कर रहे थे। घटनाएं इस तेजी से शक्ल बदल रही थी कि यह अहसास होने लगा कि अजीत जोगी बगावत करेंगे तथा नई पार्टी खड़ी करेंगे। हालांकि वे इसका लगातार खंडन करते रहे लेकिन इसके बावजूद संगठन खेमे के प्रति उनके रवैये में कोई फर्क नहीं आया तथा ऐसा लगने लगा कि वे या तो पार्टी छोड़ेंगे या पार्टी ही उन्हें बाहर का रास्ता दिखाएगी। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। ज्वालामुखी के फूटने के पूर्व ही उसे शांत कर दिया गया। वे ज्वालामुखी बने हुए थे पर फटना उन्हें मंजूर नहीं था। अब जोगी के मन की मुराद पूरी हुई।

दरअसल जोगी एक सोची-समझी रणनीति के तहत माहौल बना रहे थे। उन्हें अहसास था कि पार्टी छोडऩे से उनका राजनीतिक भविष्य चौपट हो सकता है। अतीत में ऐसे बहुतेरे उदाहरण हैं जो यह बताते हैं कि पार्टी छोडऩे अथवा नई पार्टी बनाने से राजनीतिक हैसियत में कितना बड़ा फर्क आ जाता है। इसलिए जोगी ऐसी गलती नहीं कर सकते थे। वे चाह रहे थे लोहा इतना गर्म हो जाए कि चोट करने में आसानी हो इसलिए एक तरफ वे पार्टी अनुशासन की सीमाएं लांघ रहे थे तो दूसरी ओर कांग्रेस नेतृत्व यानी सोनिया गांधी के प्रति अपनी निष्ठा भी व्यक्त करते थे। यह दोहरी चाल थी। कांग्रेस हाईकमान के सामने भी विकट स्थिति थी क्योंकि जोगी को खोने का अर्थ क्या हो सकता है, यह उनके सामने बहुत स्पष्ट था। इसीलिए जोगी को मनाने, उन्हें संतुष्ट करने ेकी कोशिशें शुरू हुईं। जोगी यही चाहते थे। जैसे-जैसे बात आगे बढ़ी, जोगी अपने तेवर ढीले करते चले गए और अंतत: वे यह संदेश देने में सफल रहे कि उनके पार्टी छोडऩे या बगावत करने की बातें मात्र अफवाह थी। वे पार्टी अनुशासन से बंधे हुए हैं तथा पार्टी नेतृत्व के प्रति उनकी अटूट निष्ठा है।

यह जोगी की रणनीति की बड़ी सफलता थी। प्रदेश कांग्रेस में उनकी हैसियत को प्रदेश का कोई नेता चुनौती नहीं दे सकता, उन्होंने साबित कर दिया। उनकी ताकत का अंदाजा इस बात से भी लगता है कि विधानसभा  चुनाव के टिकटों के वितरण में भी उन्होंने बड़ी संख्या में अपने समर्थकों को टिकिटें दिलवाईं। और तो और वे अपने बेटे अमित जोगी को भी मरवाही से प्रत्याशी बनाने में सफल रहे। ऐसा करके उन्होंने आगामी लोकसभा चुनाव में स्वयं की उम्मीदवारी भी सुरक्षित कर ली। राजनीति में उनका यह गणितीय कौशल अद्भुत ही कहा जाएगा क्योंकि पार्टी में परिवार के वर्चस्व को बनाए रखने में वे कामयाब हैं।

 वर्चस्व की राजनीति में जोगी के दबदबे की झलक चुनाव प्रचार अभियान समिति के गठन से भी मिलती है। संगठन के साथ तनानती के दौर में यह कहा जा रहा था कि उन्हें प्रचार अभियान समिति से दूर रखा जाएगा जबकि जोगी इसके अध्यक्ष बनना चाहते थे। खेमे की ओर से यह तर्क दिया था कि सन् 2003 एवं सन् 2008 के चुनाव में प्रचार की कमान जोगी के हाथों में थी किंतु नतीजा क्या निकला? कांग्रेस चुनाव हार गई लिहाजा 2013 के चुनाव में प्रचार की बागडोर उन्हें कैसे सौंपी जा सकती है? तर्क अपनी जगह ठीक था किंतु इसके बावजूद हाईकमान ने उन्हीं पर भरोसा किया। यद्यपि औपचारिक रूप से कमान वयोवृद्घ नेता मोतीलाल वोरा को सौंपी गई है लेकिन संयोजक जोगी को बना दिया गया है। यानी सूत्र एक तरह से जोगी के हाथ में ही रहेंगे। इस घटना से भी जाहिर है प्रदेश कांग्रेस की असली ताकत जोगी में निहित है। यद्यपि 2013 के विधानसभा चुनाव के परिणामों को लेकर कोई अभी राय व्यक्त नहीं की जा सकती किंतु यदि पार्टी जीतती है तो अनुमान लगाया जा सकता है कि सत्ता के संघर्ष में जोगी परिवार की भूमिका कितनी अहम रहेगी।

चुनौतियों से निपटना आसान नहीं


पिछले कुछ दिनों से यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि इस बार राज्य विधानसभा के चुनाव भाजपा के लिए आसान नहीं होंगे। 2008 के चुनाव में बात कुछ और थी। तब मुख्यमंत्री के रूप में डॉ.रमन सिंह की लोकप्रियता चरम पर थी। विशेषकर दो रुपए किलो चावल ने छत्तीसगढ़ के गरीब आदिवासियों एवं हरिजनों के मन में उनके प्रति कृतज्ञता का भाव पैदा किया था जिसका प्रदर्शन उन्होंने भाजपा के पक्ष में वोट देकर किया। यही वजह थी कि भाजपा और कांग्रेस के बीच एक दर्जन सीटों का फासला रहा। भाजपा को 90 में से 50 सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस को 38 सीटों से संतोष करना पड़ा। भाजपा के दुबारा सत्ता में लौटने का श्रेय बहुत कुछ चाऊंर वाले बाबा के रूप में विख्यात मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह की साफ-सुथरी छवि को था। अब यद्यपि रमन सिंह की छवि पूर्ववत ही है लेकिन उसकी चमक कुछ फीकी पड़ गई है। जिन मुद्दों ने रमन सिंह को जिताया था, वे मुद्दे भी आकर्षण खो चुके हैं। इनमें प्रमुख हैं, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत बीपीएल परिवारों को बहुत सस्ते दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना। यानी दो रुपए प्रति किलो की दर से 35 किलो चावल अब कोई सनसनी नहीं है। नागरिक सुविधाओं के लिहाज से यह एक सामान्य घटना है। यद्यपि शासन ने इसमें नया रंग भरने के लिए राज्य खाद्य सुरक्षा कानून को लागू किया है पर केन्द्र सरकार के खाद्य सुरक्षा अधिनियम ने इसे फीका कर दिया है। अब दो रुपए किलो चावल मतदाताओं को लुभाने का कोई मुद्दा नहीं है। लिहाजा सन् 2008 में जिस मुद्दे ने रमन सिंह की राह आसान की ती, वह 2013 के चुनाव में बैरंग होता नजर आ रहा है। यानी भाजपा एक प्रभावशाली हथियार से वंचित होती दिख रही है।

भाजपा को दूसरा धक्का कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों की एकजुटता से है। महीने भर पूर्व कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के तेवर से भाजपा प्रसन्न थी क्योंकि आंतरिक कलह और जबर्दस्त गुटीय प्रतिद्वंद्विता से कांग्रेस के बिखरने की आशंका थी। कांग्रेस की ऐसी कमजोर दशा से भाजपा को अतिरिक्त लाभ मिल रहा था लेकिन जोगी के तीखे तेवर ढीले पड़े, पार्टी में बिखराव का संकट खत्म हो गया और अब गुटीय नेता जिस एकजुटता का परिचय दे रहे हैं, वह भाजपा के लिए किसी आघात से कम नहीं है। प्रमुख विपक्ष के रूप में कांग्रेस की मजबूती, उसकी संभावनाओं को घटाती है। और तो और 5 दलों के संयुक्त मोर्चा का अभ्युदय भी उसकी उम्मीदों को धक्का पहुंचा रहा है। यानी संयुक्त गठबंधन के रूप में भाजपा के सामने एक नया फ्रंट खुल गया है जो चुनाव में वोटों की साझेदारी करने तैयार है। अब यह अलग सवाल है कि संयुक्त मोर्चा अपने प्रभाव क्षेत्रों में किसे ज्यादा नुकसान पहुंचाएगा- भाजपा को या कांग्रेस को। लेकिन इतना तय है कि उसकी मौजूदगी सन् 2008 के समीकरणों को तहस-नहस करते नजर आ रही है।

भाजपा के सामने एक और मुश्किल सत्ता विरोधी लहर है। प्रत्येक चुनाव में सत्तारूढ़ दलों के खिलाफ ऐसी लहर स्वाभाविक रूप से बनती है लेकिन जब यह तेज चलने लगती है तो पांसे पलट जाते हैं। चुनाव से यद्यपि अभी एक माह का वक्त है लेकिन 'अंडर करंटÓ की पदचाप सुनाई देने लगी है। कोई आश्चर्य नहीं, मतदान तिथि के नजदीक आते-आते यह बड़ी लहर बन जाए और बड़ा उलटफेर कर दे ठीक 1977 की जनता लहर की तरह जिसका अहसास चुनाव विशेषज्ञों को भी चुनाव के बाद हुआ। देशव्यापी उस लहर ने कांग्रेस को केन्द्र की सत्ता से बेदखल कर दिया था। 
भाजपा के सामने एक और चुनौती है बेलगाम नौकरशाही और भ्रष्टाचार। मुसीबत यह है कि इसकी चर्चा इतनी सघन है कि हर दूसरा आदमी इस पर भड़ास निकालते नजर आता है। संवेदनशील और जनोन्मुखी प्रशासन का दावा करने वाली राज्य सरकार के सामने यह बड़ा संकट है। स्वाभाविक रूप से कांग्रेस ने अपने चुनावी अभियान में इसे प्रमुख हथियार बना रखा है। यद्यपि भ्रष्टाचार सार्वभौम है फिर भी यह बीमारी मतदाताओं के मन में वितृष्णा का भाव पैदा तो करती ही है। जाहिर है, यह सवाल किसी न किसी रूप में मतदाताओं खासकर शहरी मतदाताओं को सोचने पर मजबूर करता है। छत्तीसगढ़ में जो बड़े-बड़े घोटाले सतह पर आए हैं, उसने किसी न किसी रूप में शासन की छवि को प्रभावित किया है। विशेषकर भ्रष्टाचार से निपटने एवं घोटालेबाजों के खिलाफ कार्रवाई में सरकार की उदासीनता उसके खिलाफ जा रही है। यही बात नौकरशाही को लेकर है। रमन सिंह की छवि एक दबंग प्रशासक की नहीं है जैसी कि अजीत जोगी की थी। अजीत जोगी ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में प्रशासन को अपनी मुट्ठी में रखा था। नौकरशाही पर उनका प्रभावी नियंत्रण था जबकि मुख्यमंत्री की सरलता एवं सहजता ने नौकरशाही को मनमानी करने की छूट दे रखी है। इसका असर प्रशासनिक कामकाज में देखने मिल रहा है जिसमें पारदर्शिता का भी अभाव है। मुख्यमंत्री की यह कमजोरी भी पार्टी की संभावनाओं को ठेस पहुंचाती है।

अब सवाल है, क्या पार्टी ने इन स्थितियों पर विचार किया है? क्या भाजपा को लगता है कि विकास का मुद्दा इन सब पर भारी पड़ेगा और मतदाता इसी मुद्दे पर वोट करके उसे लगातार तीसरी बार सत्ता से नवाजेंगे। अगर पार्टी की यही सोच है तो यकीनन वह गफलत में है। दरअसल विकास का अर्थ बहुत व्यापक है। विकास! किस तरह का विकास? किसका विकास? केवल आधारभूत संरचनाओं की बाढ़ से यह सोच लेना कि जनता गद्गद् है, बेमानी है। विकास के संदर्भ में यह देखा जाना जरूरी है कि राज्य की जनकल्याणकारी नीतियों से सबसे निचली पायदान पर रहने वाले लाभान्वित हो रहे हैं अथवा नहीं। छत्तीसगढ़ में आदर्श स्थिति नहीं है। लालफीताशाही के कारण योजनाओं का समुचित लाभ लोगों को नहीं मिल पा रहा है। फिर वह केन्द्र सरकार की मनरेगा ही क्यों न हो। दरअसल हर सरकार के पास विकास का झुनझुना हुआ करता है जो चुनाव के वक्त  जोर-शोर से बजता है। भाजपा भी इसे बजा रही है किंतु एकमात्र इसी मुद्दे से उसकी नैया पार लग जाएगी, कहना मुश्किल है क्योंकि चुनाव में हार-जीत के लिए और भी कारण जिम्मेदार होते हैं। फिर भी पार्टी को उम्मीद है कि विकास का मुद्दा उसका प्रमुख हथियार है जो विपक्ष के तमाम मुद्दों पर भारी पड़ेगा। उसे यह भी उम्मीद है कि निम्न, अतिनिम्न एवं मध्यम वर्ग के हितों के लिए बनी करीब दो दर्जन योजनाएं मतदाताओं को आकर्षित करने एवं भाजपा के पक्ष में वोट करने के लिए पर्याप्त हैं। 


लेकिन इस विश्वास के बावजूद भाजपा नेतृत्व आशंकित भी है। क्योंकि इस बार कांग्रेस तमाम अन्तरविरोध के बावजूद पूरी तैयारी के साथ मैदान में है। हालांकि उसके पास कोई तुरुप का पत्ता नहीं है। भ्रष्टाचार, कुशासन और व्यवस्था के खिलाफ रूझान पर उसकी उम्मीदें टिकी हुई हैं। प्रत्याशियों के चयन में भी वह बहुत सावधानी बरत रही है। पहले चरण की 18 सीटों पर उसने 8 नए चेहरों को टिकिट देकर मतदाताओं की मानसिकता को समझने की कोशिश की है। यानी कांग्रेस फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। ऐसी स्थिति में भाजपा के लिए चुनौती और भी बढ़ जाती है। इसे देखते हुए उसे अपनी रणनीति में बदलाव करने होंगे क्योंकि अब मुकाबला लगभग बराबरी का है। कौन जीतेगा क्या कहा जा सकता है?

फिर भटक गए पवन दीवान

संत कवि पवन दीवान राजनीति के ऐसे खिलाड़ी हैं जो अपने ही गोल पोस्ट में गोल करते हैं। अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने ऐसे कई गोल किए हैं, जिसका उन्हें तात्कालिक लाभ भले ही मिला हो पर दीर्घकालीन लाभ से वे वंचित रहे हैं। वे कांग्रेस और भाजपा के मैदान में खेलते रहे हैं। कभी कांग्रेस की ओर से तो कभी भाजपा की तरफ से। अब वे भाजपा टीम के खिलाड़ी बन गए हैं, इस उम्मीद के साथ कि उन्हें राजिम से विधानसभा की टिकिट मिल जाएगी। लेकिन क्या उन्हें टिकिट मिल पाएगी?

यह पवन दीवान की राजनीतिक छटपटाहट ही है जो उन्हें कहीं टिकने नहीं देती। जब मन ऊबने लगता है तो वे पाला बदल लेते हैं। वे कांग्रेस में घुटन महसूस करने लगे थे, उपेक्षा के दंश से छटपटा रहे थे लिहाजा उन्होंने पार्टी से कूच करना बेहतर समझा। किंतु वे इतनी बार दलबदल कर चुके हैं कि उसकी अहमियत खत्म हो गई है। अब हालत यह है कि वे राजनीतिक नेताओं की उस जमात में शामिल हो गए हैं जिनकी गतिविधियों को कोई गंभीरता से नहीं लेता। इसलिए हाल ही में जब उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने का ऐलान किया, तो वह चौंकानेवाली घटना नहीं बनी। कांग्रेस या भाजपा दोनों के राजनीतिक गलियारों में कोई हलचल नहीं मची और बात आई-गई हो गई। एक राजनयिक के लिए यह बड़ी दु:खद स्थिति है। खासकर ऐसे नेता के लिए जो बेहद संवेदनशील होने के साथ जनकवि भी हैं और भागवताचार्य भी।

पवन दीवान क्या चाहते हैं? सवाल स्वाभाविक है क्योंकि एक राजनीतिक व्यक्ति के रूप में उन्होंने अच्छा खासा सम्मान हासिल किया है। वे विधायक रहे, सांसद भी, अविभाजित मध्यप्रदेश में जेल मंत्री का भी पद उन्होंने संभाला। सन् 2000 में छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के बाद सियासतदारों के बीच उनकी कद्र कम नहीं हुई। भाजपा शासन में वे छत्तीसगढ़ गौसेवा आयोग के अध्यक्ष बनाए गए जो मंत्री स्तर का पद था। यानी वे कांग्रेस में रहे हों या भाजपा में, संगठन में अथवा संगठन के बाहर उन्हें सम्मान के साथ-साथ वक्त-वक्त पर सम्मानजनक पद भी मिलता रहा है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि एक व्यक्ति एवं नेता के रूप में उनकी उपलब्धियां गौरवपूर्ण रही हैं। फिर क्या कारण हैं कि उन्हें राजनीति से तो वितृष्णा नहीं होती पर राजनीतिक पार्टी से उनका मन भर जाता है। ऐसी छटपटाहट क्यों? क्या वे चाहते हैं कि राजनीति में उनकी व$कत बनी रहनी चाहिए, उपेक्षा नहीं होनी चाहिए, पूछ-परख घटनी नहीं चाहिए? क्या हमेशा यह संभव है? क्या राजनीति में छोटी-मोटी भूलें भी व्यक्ति को हाशिए पर नहीं डाल देती? मिसाल के तौर पर स्वर्गीय विद्याचरण शुक्ल को याद करें। एक जमाने में उनकी तूती बोलती थी। इंदिरा गांधी सरकार के वे दबंग और तेजतर्रार मंत्री माने जाते थे। अविभाजित म.प्र. में राज्य विधानसभा चुनाव की टिकिटें वे फायनल करते थे। वे राष्ट्रीय नेता थे लेकिन एक बड़ी राजनीतिक भूल से वे कैसे हाशिए पर चले गए? कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने की गलती उन्हें भारी पड़ी। यद्यपि वे कांग्रेस में लौट आए पर शीर्ष पीछे छूट गया। शुक्ल ही नहीं राजनीति में सूर्यास्त होने के और भी उदाहरण हैं। जाहिर है राजनीति में धूप-छांव बहुत स्वाभाविक है। लिहाजा पवन दीवान को यह मान लेना चाहिए कि उनका श्रेष्ठ समय बीत चुका है और वर्तमान में जो कुछ है, उससे संतोष करने की जरूरत है। वे यह सोचकर मन को तसल्ली दे सकते हैं कि उन्होंने राजनीति में भी बहुत कुछ पाया। वे यह याद करके भी संतोष का अनुभव कर सकते हैं कि सन् 1977 की जनता लहर में उन्हें छत्तीसगढ़ के गांधी की उपमा दी गई थी। उनके बारे में यह नारा बहुत प्रसिद्घ हुआ था- ''पवन नहीं, आंधी है, छत्तीसगढ़ का गांधी है।

दरअसल पवन दीवान बहुत भावुक किस्म के राजनेता हैं। फक्कड़ हैं। धर्म-संस्कृति के गहरे अध्येता हैं। भागवत पर बहुत अच्छे प्रवचनकर्ता भी। पूरे छत्तीसगढ़ में उनका मान है। संवेदनशील इतने कि हर छोटी बात दिल को छू जाती है। वे राज्य के यशस्वी कवि भी हैं। हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में उनकी कविताओं ने अच्छी प्रसिद्घि पाई है। ऐसा व्यक्ति मौजूदा राजनीति के रंग-ढंग में कैसे रच-बच सकता है? बस यही तकलीफ है। इसीलिए थोड़ी सी भी उपेक्षा सहन नहीं होती। जीरम घाटी शहीदों की श्रद्घांजलि सभा में उन्हें नहीं बुलाया गया, मन आहत हो गया। कांग्रेस में ऐसी उपेक्षा उन्हें सहन नहीं हुई। इसलिए वे भाजपा में शामिल हो गए। शामिल होने के पूर्व उन्होंने भी दल-बदल पर मान्य नीति का निर्वाह किया और मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह की शान में कसीदे काढ़े। उन्हें विकास पुरुष बताया। एकाएक भाजपा में उन्हें सबकुछ अच्छा-अच्छा दिखने लगा और कांग्रेस में बुरा। दलबदल करने वाले सामान्य नेता में और उनमें कोई फर्क नहीं रहा। ऐसे में कौन उन्हें गंभीरता से लेता? किसी ने नहीं लिया, न नेताओं ने, न जनता ने। 


दरअसल पकी उम्र के पवन दीवान को अब अपनी राजनीतिक इच्छाओं को तिलांजलि दे देनी चाहिए। बेहतर तो यही है कि वे अपने भीतर के कलाकार को ज्यादा अहमियत दें और राजनीति को अलविदा कहें। राजनीतिक से कहीं ज्यादा उनकी कीर्ति कवि, लेखक एवं प्रवचनकर्ता के रूप में है। क्या उन्हें इसका अहसास नहीं है? उम्मीद है, वे खुद को पहचानने की कोशिश करेंगे।

नुकसान में रहे बृजमोहन

छत्तीसगढ़ सरकार में ऐसा नज़ारा कभी देखने में  नहीं आया जब मुख्य सचिव और मंत्रियों के बीच टकराव इस हद तक बढ़ जाए कि मुख्यमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़े। डॉ.रमन सिंह ने विवादित पक्षों के बीच मध्यस्थता करते हुए यह दावा किया है कि मामला सुलझ गया है लिहाजा न तो मुख्य सचिव हटाए जाएंगे और न ही कथित फर्नीचर घोटाले की जांच होगी। लेकिन मुख्यमंत्री के कहने मात्र से यह समझा जाए कि सब कुछ दुरुस्त हो गया है तथा उभय पक्षों के बीच अब कोई विवाद नहीं है? सही नहीं है। यकीनन इस दावे पर पूरी तरह एतबार नहीं किया जा सकता क्योंकि यह अंतत: अहम् के टकराव का मामला है। मुख्यमंत्री के समझाने-बुझाने से अंगारों पर भले ही राख पड़ गई हो किंतु भीतर ही भीतर शोले दहकते रहेंगे और इसकी तपिश प्रशासनिक गलियारों में महसूस की जाती रहेगी।

निश्चय ही, मुख्य सचिव सुनील कुमार की ईमानदारी पर शक नहीं किया जा सकता। वे कर्तव्यनिष्ठ होने के साथ-साथ सख्त भी हैं और गलत बर्दाश्त नहीं कर सकते भले ही सामने कोई भी क्यों न हो। लेकिन व्यवस्था इतनी लचर हो चुकी है कि उनके जैसे अफसर के लिए घुटन महसूस करना स्वाभाविक है। मुख्य सचिव शायद ऐसा ही महसूस करते हैं। इसलिए वे यहां से जाना चाहते थे। एक बार वे ऐसी कोशिस कर भी चुके हैं। पर चूंकि अब उनके रिटायरमेंट में कुछ ही महीने शेष हैं, और अगले तीन महीनो में राज्य विधानसभा के चुनाव भी होने हैं अत: न तो उनकी नई पदस्थापना का प्रश्न है न ही उन्हें केन्द्र में जाने की इजाजत दी जानी है। यानी वे यहां बने रहेंगे। लेकिन इस बीच मंत्रियों खासकर राज्य के कद्दावर मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के साथ उनकी पटरी बैठ पाएगी या नहीं, कहना मुश्किल है। ऐसा लगता है कि अब दोनों सिर्फ संबंधों की औपचारिकता निभाएंगे।
दरअसल दोनों के बीच विवाद पुराना है और जड़ें काफी गहरी। चूंकि मुख्य सचिव स्वच्छ एवं ईमानदार प्रशासन के हिमायती हैं लिहाजा वे अनियमितताओं को सख्ती से रोकने की कोशिश करते हैं। इस कोशिश में उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए जो कतिपय मंत्रियों को पसंद नहीं आए। संयोग से लोक निर्माण विभाग, स्कूली शिक्षा एवं पर्यटन से जुड़े मामले इस दायरे में आए जो बृजमोहन अग्रवाल के विभाग हैं। चाहे वह स्कूली बच्चों के लिए सायकिल खरीदी का मामला हो अथवा पाठ्यपुस्तक निगम द्वारा कागज खरीदी में घपले की कोशिश का, मुख्य सचिव ने सार्थक हस्तक्षेप किया। गरियाबंद जिले की तेल नदी के पुल के बह जाने के लिए जिम्मेदार इंजीनियरों की बहाली भी दोनों के बीच टकराव का एक कारण बनी। बृजमोहन इस हस्तक्षेप से अप्रसन्न थे। अपनी नाराजगी व्यक्त करने उन्हें तब मौका मिला जब मुख्य सचिव ने एक आरटीआई कार्यकर्ता की शिकायत को गंभीरता से लेते हुए अपने ही खिलाफ सीबीआई जांच बैठाने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया। आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा केन्द्रीय सतर्कता आयोग को भेजी गई शिकायत में आरोप लगाया गया था कि स्कूलों के लिए फर्नीचर की खरीदी में धांधली हुई है। सुनील कुमार इन दिनों शिक्षा विभाग में अपर मुख्य सचिव  थे। अंतत: नैतिकता के नाते उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर सीबीआई जांच के लिए अनुरोध करना बेहतर समझा। चूंकि मुख्य सचिव का पत्र सार्वजनिक हो गया इसलिए बृजमोहन अग्रवाल को यह कहने का मौका मिल गया कि सुनील कुमार ने पत्र लीक करके अनुशासनहीनता की है अत: उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। मुख्य सचिव के पत्र से जो खलबली मची थी, उसकी परिणति विस्फोट के रूप में बृजमोहन के उस पत्र से हुई जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री से सुनील कुमार को हटाने की अपील की थी।

इस समूचे घटनाक्रम से यदि कोई सबसे ज्यादा परेशान हुए होंगे, तो वह रमन सिंह हैं क्योंकि यह राज्य शासन की छवि का सवाल है, विशेषकर ऐसे मौके पर जब चुनाव नजदीक हों तथा शासन जनता को यह समझाने की कोशिश कर रहा हो कि वह पारदर्शी है तथा जनोन्मुखी भी। विवाद से शासन की छवि को धक्का लगना स्वाभाविक है। फिर भी मुख्यमंत्री ने अपनी ओर से पहल करके मरहम-पट्टी करने की कोशिश की है। उनका नरम-गरम संदेश यानी न तो मुख्य सचिव हटाए जाएंगे और न ही फर्नीचर घोटाले की सीबीआई जांच होगी, यह दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि मुख्यमंत्री रहमदिल होने के बावजूद कड़े फैसले लेने में भी सक्षम हैं। उन्होंने बृजमोहन अग्रवाल को आईना दिखाने में संकोच नहीं किया जो उनकी कैबिनेट के सबसे ताकतवर मंत्री माने जाते हैं। सुनील कुमार की अर्जी नामंजूर करके उन्होंने नौकरशाही में आत्मविश्वास जगाने के साथ-साथ आत्मसंयम बरतने का भी संदेश दिया है। यानी उन्होंने अपने मंत्री एवं मुख्य सचिव को यह समझाने की कोशिश की है कि आपसी विवाद के इस तरह उछलने से अंतत: शासन के बारे में लोगों की धारणाएं प्रभावित होती हैं।
इस समूचे घटनाक्रम से बृजमोहन अग्रवाल राजनीतिक दृष्टि से नुकसान में रहे। उन्होंने मुख्यमंत्री पर दबाव बनाने की हर चंद कोशिश की। और तो और उन्होंने कुछ मंत्रियों को भी इस मुद्दे पर सहमत करने का यत्न किया। उन्हें उम्मीद थी कि सामूहिक दबाव काम आएगा तथा मुख्यमंत्री उनके पत्र को संज्ञान में लेंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। कैबिनेट में नम्बर दो कहे जाने वाले मंत्री के राजनीतिक जीवन की यह सबसे बड़ी भूल थी। उन्होंने पत्र लिखकर अपने पक्ष को सार्वजनिक कर दिया। वे मुख्यमंत्री को विश्वास में लेकर अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकते थे। तत्संबंध में भले ही मुख्यमंत्री का निर्णय अपरिवर्तनीय रहता लेकिन कम से कम बृजमोहन की इतनी किरकिरी नहीं होती। राजनीतिक एवं प्रशासनिक दृष्टि से उनके लिए अब बेहतर यही है कि वे अपने गिले-शिकवे दूर रखकर मुख्य सचिव के साथ सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश करें। क्योंकि यह अटूट सत्य है कि समय के साथ गहरे से गहरे घाव भी भरने लगते हैं। मुख्यमंत्री भी तो यही चाहते हैं।

Saturday, November 23, 2013

अद्भुत है सचिन का संकल्प



व्यक्ति अपने कर्मों के साथ-साथ विचारों से भी महान होता है। सचिन तेंदुलकर ऐसी ही शख्सियत हैं जिन्होंने मुंबई के वानखेडे स्टेडियम में क्रिकेट से अपनी विदाई के दौरान बहुत ही मार्मिक, दिल को छूने वाला लेकिन संयमित भाषण दिया। ऐसे क्षण बेहद भावुक होते हैं। उन पर काबू रखकर विचारों को व्यक्त करना हर किसी के बस में नहीं है। बिरले ही ऐसे होते हैं। सचिन ने रिटायरमेंट के बाद अपनी पहली पत्रकार वार्ता में यद्यपि अपनी भावी योजनाओं का खुलासा नहीं किया लेकिन संकेत दिए हैं वे क्या करना चाहते हैं। बीबीसी को दी गई भेंट में उन्होंने कहा कि वे गांवों में रोशनी फैलाना चाहते हैं। देश में कई ऐसे दूर-दराज के इलाके हैं जहां सूरज डूबने के बाद रोशनी का इंतजाम नहीं है। सचिन तेंदुलकर सौर ऊर्जा के जरिए ऐसे गांवों को रौशन करना चाहते हैं। वे वहां स्कूल भी बनाना चाहते हैं ताकि बच्चे पढ़ लिख सकें। सचिन ने कहा कि यह काम उनके दिल के बहुत करीब है।

इन विचारों से सचिन ने भावी कार्यक्रमों की झलक तो मिलती ही है, साथ में इस बात का भी पता चलता है कि वे बेहद संवेदनशील हैं तथा सर्वहारा वर्ग के प्रति उनके मन में श्रद्घा एवं सम्मान का भाव है। वे उनकी दारूण स्थिति से भी वाकिफ हैं। वे नए भारत का भविष्य बुनना चाहते हैं। गरीब बच्चों के भविष्य को संवारना उनका लक्ष्य है। यह उस महान क्रिकेटर की सोच है जिसकी दुनिया क्रिकेट तक सीमित नहीं है। यह सच्ची इंसानियत है। वे कहते हैं- ''यह कार्य सिर्फ मुझ तक सीमित नहीं है, पूरा देश इसमें शामिल हो सकता है। मैं यह नहीं कहता कि सरकार ये नहीं कर सकती। दरअसल पहल हम सभी को करनी चाहिए।''

सचिन राज्यसभा सदस्य भी हैं। उन्होंने खेलों को जनकल्याण की अपनी योजनाओं से दूर रखा है। एक सांसद के रूप में उन्होंने अगले 20 सालों में खेलों के विकास के सवाल पर केन्द्र सरकार को अपने विचारों  से अवगत कराया है। इससे पता चलता है कि उनके लिए खेलों का विकास एवं सर्वहारा वर्ग की उन्नति के मायने अलग-अलग हैं। वे इसमें कोई घालमेल नहीं करना चाहते। यह उनके परिपक्व दृष्टिकोण को दर्शाता है। एक क्रिकेटर का यह संकल्प इस मायने में अद्भुत है क्योंकि उसके सामाजिक सरोकारों पर खेल हावी नहीं है। सचिन ने स्पष्ट किया है कि वे खेलना छोड़ रहे हैं, क्रिकेट नहीं। यानी क्रिकेट की दुनिया में रमे रहेंगे पर अपने सामाजिक सरोकारों को नहीं भूलेंगे।

देश के दूरस्थ इलाकों के हजारों गांवों में जो पानी, सड़क, स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे हैं, रोशनी की किरणें बिखेरना आसान नहीं। जैसा कि सचिन ने कहा कि यह अकेले उनके बस का भी नहीं है, इसमें पूरे देश को शामिल होने की जरूरत है, एकदम व्यवहारिक है। सचिन अपने प्रयत्नों में कितने सफल हो पाते हैं, भविष्य की बात है किंतु यदि इसे वे एक राष्ट्रीय अभियान की शक्ल दे पाए तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी। वे अपने अभियान की शुरुआत किस तरह करेंगे, इसे अभी उन्होंने जाहिर नहीं किया है पर सौर ऊर्जा उन गांवों को रौशन करने का सबसे अच्छा, सरल एवं सस्ता उपाय है जो अंधेरे में डूबे हुए हैं और जहां विकास की कोई किरणें नहीं पहुंची हैं।

देश में गरीबी, संसाधनों की कमी, राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव, विद्युत चोरी तथा कमजोर प्लानिंग की वजह से ग्रामीण विद्युतीकरण को जबर्दस्त धक्का पहुंचा है। सन् 1990 तक केवल 43 प्रतिशत गांव विद्युतीकृत थे। यह आंकड़ा सन् 2012 यानी 22 सालों में बढ़कर सिर्फ 60 प्रतिशत हो पाया है। सरकार का सन् 2025 तक देश के हर गांव में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य है। इसके लिए बायो गैस, सौर ऊर्जा तथा पवन ऊर्जा जैसे पारम्परिक माध्यमों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। चूंकि अभी भी 40 प्रतिशत गांवों अंधेरे से लड़ रहे हैं लिहाजा बच्चों की शिक्षा पर सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है। इस अंधेरे को दूर करने सरकारी प्रयत्नों के साथ-साथ निजी संस्थाओं एवं व्यक्तियों को भी आगे आने की जरूरत है। एक व्यक्ति के रूप में सचिन शुरूआत कर रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए अलख जगाने की उनकी कोशिश जरूर रंग लाएगी। छत्तीसगढ़ में भी यदि उनके कदम पड़ते हैं तो यह और भी अच्छी बात होगी। राज्य ने यद्यपि ग्रामीण विद्युतीकरण की दिशा में अच्छी प्रगति की है पर अभी भी सैंकड़ों गांव खासकर बस्तर के घने जंगलों में बसे गांव अभी भी रोशनी से वंचित है।