Monday, June 20, 2016

प्रेरक भूमिका में मुख्यमंत्री

 संजयनगर (टिकरापारा) शासकीय हायर सेकेण्डरी स्कूल में बच्चों के बीच कभी शिक्षक की तरह तो कभी उनके अभिभावकों की भूमिका में नजर आए मुख्यमंत्री.


-दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की नौकरशाही पर पकड़ भले ही ढीली हो पर इसमें दो राय नही कि राजनीति की तंग गलियों से गुजरने के बावजूद संवेदनशीलता एवं सामाजिक दायित्व के मामले में वे अद्वितीय हंै। उन्हें स्कूली बच्चों को पढ़ाते हुए देखना-सुनना बहुत सुखद है। देश में शायद ही ऐसा कोई मुख्यमंत्री होगा जो अपने व्यस्ततम समय में से कुछ पल, कुछ घंटे स्कूली बच्चों के बीच बिताता हो, उन्हें पढ़ाता हो, उन्हें सीखाता हो, उनकी सुनता हो तथा उनकी जिज्ञासाओं का शमन करता हो और उनकी पीठ थपथपाता हो। रमन सिंह ऐसा करते हैं। यकीन ऐसा करना उनके सरकारी कामकाज का हिस्सा नही है, पर शिक्षा के प्रति उनका प्रेम तथा उनकी सामाजिकता उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित करती है। इसके पीछे राज्य में खूली शिक्षा की दयनीय हालत भी एक प्रमुख कारण है। लेकिन कोई मुख्यमंत्री अपने प्रवास के दौरान अचानक किसी सरकारी स्कूल की ओर रुख करें तो अचंभा स्वाभाविक है, प्रशंसनीय है, प्रेरक है।

मुख्यमंत्री ने नक्सल पीडि़त इलाकों से आए स्कूली बच्चों को दिखाया सीएम हाउस
मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ को पृथक राज्य बने 15 वर्ष हो गए हंै, 16वां चल रहा है यानी वह जवानी की दहलीज पर कदम रख चुका है। पर प्राथमिक शिक्षा के मामले में अभी भी बच्चा ही है, ऐसा बच्चा जो दुर्भाग्य से पैदाशयी विकलांग है। राज्य में 27 जिले हंै जिनमें 11 से अधिक नक्सल प्रभावित है। इन जिलों में जिनमें बस्तर संभाग शामिल है, शिक्षा बेहद दयनीय हालत में है। बस्तर ने वर्ष 2007 से 2010 के दौरान नक्सली आतंक का चरम देखा है जब 210 से अधिक स्कूल भवनों को बम से उड़ा दिया गया था और सरकार ने शालाएं बंद कर दी थी। दो साल तक पढ़ाई - लिखाई ठप रही। बाद में जैसे-तैसे शुरु हुई। वर्ष 2010 के तुलनात्मक दृष्टि से हिंसात्मक घटनाएं भले ही कम हुई हो पर स्कूली शिक्षा उसी बदतर हालत में है। वर्षों से कानून एवं व्यवस्था की समस्या से जूझ रहे इस इलाके को छोड़ भी दिया जाए तो शेष छत्तीसगढ़ में स्थिति क्या है? उसी हालत में। 19-20 का फर्क। हालांकि सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा गुणवत्ता अभियान, विद्यांजलि कार्यक्रम जैसे कार्यक्रमों के बावजूद स्थिति में कोई खास अंतर नहीं आया है। सरकारी स्कूलों में अध्ययन-अध्यापन का कैसा बुरा हाल है इसकी झलक खुद मुख्यमंत्री ने पेश की है।
मई 2016 में लोक सुराज अभियान के समापन के बाद मुख्यमंत्री ने मीडिया के सामने अपने अनुभव बांटते हुए कहा था कि गांव के स्कूलों में बच्चे तो बच्चे, शिक्षकों तक को पहाड़ा नहीं आता। शिक्षा गुणवत्ता अभियान में शिक्षा अधिकारियों द्वारा स्कूलों के निरीक्षण के दौरान जो तथ्य सामने आए हैं उसके अनुसार कई शिक्षकों को हिन्दी वर्णमाला का सही ज्ञान नही है। दिनों की स्पेलिंग और अंग्रेजी महीनों के क्रम का भी पता नही। बालोद जिले के गुण्डरदेही ब्लॉक के प्रायमरी स्कूल के शिक्षा कर्मी को ब्लेक बोर्ड पर स्पेलिंग गलत लिखते पाया गया था। राजधानी रायपुर के धरसींवा ब्लॉक के एक प्रायमरी स्कूल में एक शिक्षक अंग्रेजी की किताब में 'राम इज ए बॉयÓ का उच्चारण नहीं कर पाया। राज्य के स्कूलों में तीन हजार से अधिक शिक्षक ऐसे हंै जो डीएड की परीक्षा में 6 बार फेल हो चुके हैं। इन घटनाओं से अंदाजा लगाया जा सकता है राज्य में प्राथमिक शिक्षा का स्तर कैसा है। जब शहरी क्षेत्रों के स्कूलों का यह हाल है तो आदिवासी इलाकों के स्कूलों की स्थिति की कल्पना की जा सकती है।
            पिछले वर्ष 7 अक्टूबर 2015 को डा. रमन सिंह ने डा. एपीजे अब्दुल कलाम शिक्षा गुणवत्ता अभियान की शुरुआत की थी। विशेषकर रविशंकर विश्वविद्यालय में आयोजित समारोह में उन्होंने जनप्रतिनिधियों एवं सरकारी अधिकारियों से अपील की थी कि शिक्षा के स्तर को दुुरुस्त करने वे समय निकालकर स्कूलों में जाएं एवं बच्चों की क्लास लें। उनकी अपील के बाद 8 अक्टूबर से 15 अक्टूबर तक राज्य के मंत्री, विधायक, सांसद तथा लगभग 8 हजार अधिकारियों ने 15 हजार 866 प्राथमिक माध्यमिक शालाओं का निरीक्षण किया। कक्षाओं में गए। मुख्य सचिव विवेक ढांढ यह अनुभव लेर लौटे कि 6वीं के विद्यार्थी को तीसरी कक्षा का ज्ञान नही है और 8वीं का छात्र 5वीं की किताब नहीं पढ़ सकता। अब सरकार एपीजे अब्दुल कलाम शिक्षा गुणवत्ता अभियान के दूसरे चरण में इस वर्ष स्कूलों में शिक्षकों के अध्यापन एवं छात्रों पर उसके असर का आकलन करेगी। यानी छात्रों के परफार्मेंस के आधार पर शिक्षकों की जवाबदेही तय की जाएगी। जिन स्कूलों में 75 प्रतिशत छात्रों का परफार्मेंस ठीक होगा, वहां के शिक्षक बेहतर माने जाएंगे। इससे कम नतीजे देने वाले शिक्षकों का ज्ञानवर्धन किया जाएगा। लेकिन सवाल है ऐसे शिक्षक जिनके ज्ञान का स्तर बेहद निम्न है, के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी? क्या उन्हें नौकरी से निकाला जाएगा? स्कूली शिक्षा विभाग इस सवाल पर खामोश है।
       बहरहाल सरकार प्रयत्न कर रही है। खुद डा. रमन सिंह समय निकालकर स्कूलों का निरीक्षण कर रहे हैं। अभी हाल ही में 11 जून को वे राजधानी के संजयनगर, टिकरापारा स्थित प्राथमिक शाला गए तथा बच्चों की क्लास ली। उन्होंने प्रेरक कहानियां सुनाई, बच्चों को योग का महत्व बताया। उनसे सवाल पूछे, जवाब लिए। दरअसल राज्य में विद्यांजलि कार्यक्रम की तैयारी की जा रही है। केंद्र सरकार ने सरकारी स्कूलों में जनभागीदारी बढ़ाने के लिए पूरे देश में इस कार्यक्रम को शुरु करने का निर्णय लिया है। इसके तहत 19 राज्यों के 2000 स्कूलों का चयन किया गया है। छत्तीसगढ़ के 27 में से 8 जिलों के 200 स्कूलों में यह अभियान चलेगा। जनभागीदारी बशर्ते वह हो, कितनी प्रभावी सिद्ध होगी, यह आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन शिक्षा में राजनीति एवं व्यवस्था के अन्य दोषों को दूर किए बिना सरकारी स्कूलों की दशा सुधरेगी, प्राथमिक, माध्यमिक व उच्च माध्यमिक शिक्षा के स्तर में कोई गुणनात्मक परिवर्तन आएगा, सोचना मुश्किल है। फिर भी एक राजनेता के रुप में मुख्यमंत्री को शिक्षक की भूमिका में देखना अच्छा लगता है। उम्मीद की एक लौ जलती हुई तो दिखती है।

Tuesday, June 7, 2016

रमन सिंह के लिए बजी खतरे की घंटी

-दिवाकर मुक्तिबोध
भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के लिए छत्तीसगढ़ अब विशेष दिलचस्पी का सबब बन गया है जिसमें नई चिंता भी है और राज्यीय सत्ता को चौथे कार्यकाल के लिए कायम रखने की उजली संभावनाएं भी। ऐसा इसलिए क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजीत जोगी ने कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया है। यदि वे सार्वजनिक रुप से घोषित अपने इरादे पर कायम है तो राज्य में तीसरी शक्ति का उदय होना तय है। जाहिर है कांग्रेस में होने वाली टूट-फूट से भाजपा को फायदा भी है और नुकसान भी। जोगी राजनीतिक के माहिर खिलाड़ी हैं। तमाम झंझावतों के बावजूद व्हील चेयर पर बैठे हुए इस शख्स की राजनीतिक हैसियम में कभी कोई फर्क नही पड़ा। उनकी सक्रियता पूर्ववत कायम रही। लिहाजा नवंबर-दिसंबर 2018 में होने वाले चुनाव के पूर्व वे अपनी पार्टी को इतनी ताकत तो दे देंगे ताकि उसका हाल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जैसा न हो। स्व. विद्याचरण शुक्ल ने कांगे्रस से बगावत करके राष्ट्रवादी कांगे्रस पार्टी का दामन थामा था। उनके नेतृत्व में पार्टी ने सन् 2003 का विधानसभा चुनाव लड़ा लेकिन सत्ता विरोधी तेज लहर के बावजूद जनता ने उन्हें नकार दिया। एनसीपी को केवल एक सीट मिली अलबत्ता उसे हासिल हुए 6.75 प्रतिशत वोटों की वजह से कांगे्रस सत्ता से बेदखल हो गई। एनसीपी ने कम से कम 20 सीटों पर कांग्र्रेस को हराने का काम किया। कांग्रेस के वोटों के इस विभाजन से भाजपा को फायदा हुआ। राज्य में रमन सिंह के नेतृत्व में वह सरकार बनाने में कामयाब रही। आंतरिक संघर्ष एवं अन्य कारणों के कारण कांग्रेस अगले दो चुनाव भी हार गई। हालांकि दोनों पार्टियों के बीच फासला एक प्रतिशत के आसपास ही था। बहरहाल जोगी की बात कुछ अलग हंै। वे जमीनी नेता हैं तथा अनुसूचित जाति-जनजाति की लगभग 45 प्रतिशत आबादी पर उनकी खाली पकड़ है। इसलिए यह तय प्रतीत होता है कि वे अपनी पार्टी को कम से कम इतनी शक्ति तो देंगे जो कांग्रेस का भी समीकरण बिगड़े और भाजपा का भी। प्रदेश भाजपा की मूल चिंता यही है कि उसके प्रतिबद्ध वोटों के अलावा यदि जोगी ने अनुसूचित जाति के 12 प्रतिशत वोटों पर सेंध लगाई तो नुकसान उसे भी होगा। इस वर्ग के लिए आरक्षित 10 सीटों में से 9 सीटें अभी भाजपा के पास है। मुश्किल यह है कि भाजपा के पास अनुसूचित जाति से कोई ऐसा सर्वमान्य नेता नही है जो अपनी बिरादरी के वोटों पर पकड़ रखता हो। जबकि जोगी इसके मान्य नेता हैं। भाजपा की यह कमजोर कड़ी है। अब यदि जोगी ने न्यूनतम दहाई का आंकड़ा ही पार कर लिया तो वे सौदेबाजी की स्थिति में आ जाएंगे। राज्य विधानसभा में 90 सीटें हैं। अब तक भाजपा व कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होता रहा है। त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति में तीसरी शक्ति भाजपा को सत्ता से बाहर कर सकती है या सौदेबाजी के लिए मजबूर कर सकती है। कांग्रेस के सपने को भी तोड़ सकती है जिसे भूपेश बघेल के नेतृत्व में चौथे चुनाव में जीत दर्ज करने का विश्वास है। किन्तु जोगी के दोनों हाथों में लड्डू है और वे संख्या बल के आधार पर भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस को भी सौदेबाजी के लिए विवश कर सकते है। दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को अब यही चिंता है कि जोगी के प्रभाव को कैसे कम किया जाए। हालांकि कुशंकाओं के बीच भाजपा यह सोचकर प्रफुल्लित भी है कि जोगी कांग्रेस को ज्यादा नुकसान पहुंचाएंगे।
        प्रदेश में तेजी से घट रहे राजनीतिक घटनाक्रम को देखते हुए भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व राज्य में नेतृत्व परिवर्तन पर भी विचार कर सकता है। बहुत संभव है, चुनाव के कछ समय पूर्व डा. रमन सिंह की गद्दी छिन जाए और किसी आदिवासी चेहरे को मुख्यमंत्री बना दिया जाए जिसकी मांग राज्य का आदिवासी समाज लंबे समय से कर रहा है। यों भी अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 29 सीटों में से केवल 11 सीटें भाजपा के पास है। जोगी विवादित आदिवासी चेहरा है लिहाजा इस समाज के वोटों को संतुष्ट करने के लिए पार्टी में किसी आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाने का विचार जोर पकड़ सकता है। इस सोच के पीछे और भी राजनीति कारण हैं। यह बात साफ हो चुकी है कि मुख्यमंत्री के रुप में तीसरी पारी खेल रहे डा. रमन सिंह शासकीय प्रबंधन में माहिर नही है। नौकरशाही ऐसी बेलगाम है कि विधायक तो विधायक मंत्रियों की भी औकात नही है कि वे उससे मनचाहा काम ले सकें। केबिनेट की बैठकों में मंत्रियों ने एवं पार्टी बैठकों में कार्यकर्ताओं ने नौकरशाही के खिलाफ जमकर गुस्सा निकाला। सरकार भले ही जनोन्मुख होने का दावा करें किन्तु नौकरशाही का जाल ऐसा है कि बिना पैसों के लेन-देन के कोई काम नहीं होता। भ्रष्ट अफसरों ने रिश्वतखोरी में नए कीर्तिमान स्थापित कर रखें हैं। यह एंटी करप्शन ब्यूरो के लगातार पड़ रहे छापों एवं करोड़ों की चल-अचल अनुपातहीन संपत्ति के उजागर होने की घटनाओं से जाहिर है। राज्य में चार दर्जन से अधिक प्रशासनिक अधिकारियों एवं लगभग इतने राज्य संवर्ग के अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ मामले चल रहे है। और तो और खुद रमन सिंह की साफ-सुथरी छवि भी तीसरी पारी में दागदार हुई है। चाहे वह अगुस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर खरीदी में कमीशन देने का आरोप हो या 36 हजार करोड़ का तथाकथित पीडीएस चावल घोटाला। सांसद बेटे अभिषेक सिंह पर विदेशी बैंकों में संपत्ति रखने के आरोप जैसे कुछ और आरोपों ने मुख्यमंत्री को परेशान किया है। हालांकि मुख्यमंत्री के रुप में उनका पहला और दूसरा कार्यकाल निष्कलंक रहा। उन पर व्यक्तिगत तौर पर कोई आरोप नहीं लगे, विपक्ष ने भी उन्हें कटघरे में खड़ा नहीं किया लेकिन तब भी सरकार की नाकामी और नौकरशाही की आलोचना होती रही और भ्रष्टाचार खूब फलता-फूलता रहा। किन्तु तीसरे कार्यकाल की आधी अवधि बीतते-बीतते रमन सिंह पर छीटें पड़ने शुरु हो गए। विपक्ष ने उन्हें घेरा, कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने उन पर सवाल खड़े किए। यद्यपि रमन सिंह ने तमाम आरोपों को नकारा किन्तु एक संदेह का वातावरण तो बना। आगे कभी भाजपा हाईकमान राजनीतिक दृष्टि से नेतृत्व में बदलाव के बारे में विचार करेगा तो वह इस पहलू की भी अनदेखी नहीं करेगा।
         बहरहाल राज्य के सत्ता शिखर में परिवर्तन के अभी कोई संकेत नहीं है। कोई सुगबुगाहट नही है। मुख्यमंत्री को प्रशासनिक क्षमता भले ही कमजोर हो पर वे कूटनीति में माहिर है। बीते 12 वर्षों में उन्होंने अपनी राह के उन सभी कांटों को चुन-चुनकर अलग किया है जो उनके नेतृत्व को चुनौती दे सकते थे, चाहे वह आदिवासी नेता हो या गैरआदिवासी। उन्हें सबसे ज्यादा खतरा था राज्य के अनुभवी, युवा एवं कद्दावर मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, पिछड़े वर्ग के नेता एवं 7 बार रायपुर लोकसभा के सांसद रमेश बैस एवं पूर्व सांसद व प्रबुद्ध आदिवासी नेता नंदकुमार साय से। अहिस्ते-अहिस्ते इनके कद छांट दिए गए। अब स्थिति यह है कि डा. रमन सिंह का दूर-दूर तक कोई विकल्प नजर नही आ रहा है। मुख्यमंत्री के लिए यह निश्चिंतता की बात है किन्तु यह तय है कि नए घटनाक्रम के बाद हाईकमान की प्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियों पर नजर रहेगी और यदि सचमुच तीसरा विकल्प तैयार हुआ, जोगी की पार्टी खड़ी हो गई, जनता का रुख बदलता नजर आया, सरकारी कामकाज के ढर्रे में कोई सुधार नहीं हुआ और लोक कल्याणकारी कार्यक्रमों में ढिलाई जारी रही तो केंद्र के पास यकीनन नेतृत्व परिवर्तन के अलावा कोई चारा नही रहेगा। अभी विकल्प नहीं है लेकिन समय और परिस्थितियां खुद ब खुद विकल्प तैयार कर देती है। तब इस बात पर विशेष गौर किया जाएगा कि नया मुख्यमंत्री सवर्ण वर्ग से नहीं, आदिवासी या पिछड़े वर्ग से हो ताकि नई ऊर्जा के साथ चुनाव मैदान में उतरा जा सकें। नेतृत्व परिवर्तन के संदर्भ में इस तथ्य को भी ध्यान में रखा जाएगा कि सन् 2003 एवं 2008 चुनाव के मुकाबले 2013 में हुए चुनाव में भाजपा के वोटों का प्रतिशत गिरा है। भाजपा-कांग्रेस के बीच फासला केवल 0.75 प्रतिशत रहा। हालांकि सीटों का अंतर बढ़ा। भाजपा 41.04 प्रतिशत वोट और 51 सीटें जीतकर पुन: सरकार बनाने में सफल रही जबकि कांगे्रस को 40.29 प्रतिशत वोट और 38 सीटें मिली। राज्य विधानसभा के अब तक हुए तीनों चुनाव में हार-जीत के बीच महीन अंतर रहा है। ऐसी स्थिति में यदि जोगी के नेतृत्व में नई पार्टी बनी और उसने दम दिखाया तो भाजपा-कांग्रेस दोनों के मतों का एक हद तक विभाजन होगा। और यह विभाजन ही छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक नई इबारत लिखेगा।

Saturday, June 4, 2016

जोगी का दांव, उल्टा या सीधा

-दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने प्रदेश कांग्रेस के लिए नई मुसीबत खड़ी कर दी है। उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया है। प्रदेश कांग्रेस में संगठन खेमे और जोगी खेमे के बीच पिछले कई महीनों से चली आ रही रस्साकशी एवं शाब्दिक विष-वमन का परिणाम अंतत: यही होना था। जोगी की प्रादेशिक पार्टी का अस्तित्व बकौल जोगी बहुत जल्द सामने आ जाएगा। इस नई राजनीतिक पार्टी के गठन की स्थिति में जाहिर है वर्ष 2018 में प्रस्तावित राज्य विधानसभा के चुनावों में त्रिकोणीय संघर्ष देखने को मिलेगा, ठीक वैसे ही जैसा कि सन् 2003 में नजर आया था। तब स्व. विद्याचरण शुक्ल ने कांग्रेस से अलग होकर शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की बागडोर सम्हाली थी। उस चुनाव में परस्पर विरोधी दो समानांतर कांग्रेस की मौजूदगी की वजह से भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस के प्रतिबद्ध वोटों के बंटवारे का लाभ मिला  और वह सत्ता में आ गई। उसे सत्ता से कांग्रेस फिर कभी बेदखल नहीं कर सकी तथा उसके बाद वह लगातार 2008 तथा 2013 के चुनाव हारती रही। यद्यपि ये चुनाव मुख्यत: कांग्रेस व भाजपा के बीच लड़े गए थे किन्तु कांग्रेस की हार के मूल कारण थे उसका आंतरिक कलह, गुटबाजी, घात-प्रतिघात, भीतरघात और चुनाव के पूर्व ही हार की इबारत लिखने वाले प्रत्याशियों पर दांव। दरअसल सन् 2000 में छत्तीसगढ़ के नए राज्य बनने के बाद जो सांगठनिक एकता जोगी के सत्ता में रहते हुए वर्ष 2003 तक कायम रही वह चुनाव में पार्टी की पराजय के बाद छिन्न-भिन्न हो गई। वह खेमे में बंटी और प्रदेश पार्टी का नेतृत्व हथियाने के चक्कर में शीर्ष नेताओं के बीच जो घमासान छिड़ा वह पिछले 13 वर्षों से निरंतर जारी है। उसके विकृततम रुप की परिणति आखिरकार कांग्रेस के एक और विघटन के रुप में सामने आ रही है।
     छत्तीसगढ़ में कोई तीसरी राजनीतिक शक्ति नहीं है। कहने के लिए राज्य में कुछ राष्ट्रीय पार्टियों की प्रादेशिक इकाइयां मौजूद जरुर हंै किन्तु राज्य विधानसभा या इतर चुनावों में उनकी कोई चुनौती नहीं है। केवल बसपा ही कुछ क्षेत्रों में थोड़ा बहुत दम दिखाती है, अनुसूचित वोटों को इधर से उधर करती है और ऐसा करके दोनों पार्टियों, विशेषकर कांग्रेस के चुनाव गणित को बिगाड़ती है। उसके इक्का-दुक्का प्रतिनिधि 90 सीटों की विधानसभा में पहुंच जाते है। लेकिन अब अजीत जोगी के नेतृत्व में नई पार्टी के गठन के साथ यह कहा जा सकता है कि राज्य में एक तीसरी शक्ति का उजाला फैलने वाला है। यह तीसरी शक्ति कैसी शक्ल लेगी, उसका चेहरा-मोहरा कैसा होगा, उसका एजेंडा क्या होगा, रीति-नीति क्या होगी, क्या यह कांग्रेस की बी पार्टी होगी? उसका चुनावी गणित किस करवट बैठेगा, क्या गैर भाजपा या गैर कांग्रेस पार्टियों से उसका चुनावी गठबंधन होगा या फिर एनसीपी की तरह वह अपने दम पर वर्ष 2018 के चुनाव मैदान में उतरेगी, यह सब आगामी कल की बातें हंै। फिलहाल कोई अनुमान लगाना मुश्किल है किन्तु इतना जरुर कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास में तीसरी शक्ति का अभ्युदय एक महत्वपूर्ण घटना होगी और उसकी उपस्थिति से राज्य में एक नया राजनीतिक विकल्प सामने आएगा बशर्ते जोगी नई पार्टी बनाने की अपनी जिद पर अड़े रहे और कांग्रेस हाईकमान उन्हें मनाने का विचार त्याग दें।
        बहरहाल अजीत जोगी के कांग्रेस से अलग होने एवं नई प्रादेशिक पार्टी के गठन का फैसला अप्रत्याशित नही है। इसकी नींव तो उसी दिन पड़ गई थी जब 6 जनवरी 2016 को उनके बेटे और विधायक अमित जोगी को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया गया था। इसकी पृष्ठभूमि में अंतागढ़ टेप कांड ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अखिल भारतीय कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्य अजीत जोगी पर भी अनुशासन की गाज गिरी। प्रदेश कांग्रेस ने उन्हें भी पार्टी से निष्कासित करने की सिफारिश केंद्र को भेजी। केंद्रीय अनुशासन समिति अब तक इस पर कोई फैसला नहीं ले सकी है। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों का आकलन करते हुए अजीत जोगी ने कांग्रेस से नाता तोड़ना बेहतर समझा है। इसके पीछे उनकी सुविचारित रणनीति है। राज्यों का राजनीतिक भविष्य अब प्रादेशिक पार्टियों के हाथ में है और वे और कुछ नहीं तो राष्ट्रीय पार्टियों की चुनावी संभावनाओं को जरुर प्रभावित कर सकती हैं। देश के आम चुनाव या राज्य विधानसभा के चुनाव में ऐसा होता रहा है। इस समय 15 राज्यों में प्रदेश पार्टियों का सत्ता पर काबिज रहना इसका उदाहरण है। ऐसी स्थिति में यदि अजीत जोगी अपने लिए भी ऐसी संभावना देखते हैं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। इसलिए नई पार्टी के गठन का फैसला उन्होंने ऐसे समय लिया जब चुनाव तैयारियों के लिए उनके पास काफी वक्त पड़ा हुआ है।
         छत्तीसगढ़ राज्य विधानसभा के चुनाव नवंबर-दिसंबर 2018 में होंगे। यानी अजीत जोगी को नई पार्टी का सांगठनिक ढांचा खड़ा करने एवं चुनाव तैयारियों के लिए करीब ढाई साल का वक्त मिलेगा। यह अवधि काफी होती है, बशर्ते जनता के बीच आपकी जडं़े मजबूत हो, आपके पास कार्यकर्ताओं की फौज हो और आप जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने का माद्दा रखते हो। अजीत जोगी प्रदेश के सर्वाधिक चर्चित, विवादित लेकिन लोकप्रिय नेता हैं जिनकी अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के बीच खासी पकड़ है और वे जनता की नब्ज को खूब पहचानते हैं। उन्हें शब्दों के जरिए, वाकपटुता के जरिए लुभाने की जबरदस्त कला उनके पास है और वे इसके जरिए अनोखा मायाजाल बुनते रहे हैं। उनकी सक्रियता उनकी ताकत है इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि वे एक सबल विकल्प देंगे। बशर्ते वे और उनके चिरंजीव अपनी अधिनायकवादी प्रवृत्तियों से पीछा छुड़ाए। अब ऐसा वे इसलिए भी करेंगे क्योंकि फिलहाल उन्हें सत्ता के नजदीक पहुंचने की जुगत भिड़ानी है, लोगों को विश्वास दिलाना है कि रमन राज का खात्मा वे ही कर सकते हंै, कांग्रेस नही। ऐसा उनका दावा भी हैं।
        जरा पीछे लौटते हैं। वर्ष 2003 के छत्तीसगढ़ के पहले चुनाव की ओर। सन् 2000 से 2003 तक अजीत जोगी के शासन की भले ही बेशुमार उपलब्धियां रही हो, विकास की नई कहानियां उसने गढ़ी हो किन्तु इसमें दो राय नही कि अतिवाद की वजह से, अधिनायकवाद की वजह से एक बड़ी आबादी को उसने नाराज कर दिया। यह नाराजगी गाँवों में कम शहरों में ज्यादा नजर आई। स्वयं अजीत जोगी की छवि एक ऐसे खलनायक की बनी जो अपने इच्छित लक्ष्य के लिए कुछ भी कर सकता था, किसी भी हद तक जा सकता था। इस नकारात्मक छवि को और तेज करने का काम मूलत: स्व. विद्याचरण शुक्ल के नेतृत्व में एनसीपी ने किया। चुनाव के पूर्व यदि उन्होंने विद्याचरण शुक्ल को साध लिया होता तो इस छवि के बावजूद सत्ता पुन: कांग्रेस के हाथों में होती। तब जोगी विरोधी तेवर की वजह से लोकप्रियता के शिखर पर विराजमान विद्याचरण शुक्ल ने भी बहुत जल्दबाजी से काम लिया। वे इस भ्रम के शिकार रहे कि उनकी पार्टी ने जनता को तीसरा विकल्प दे दिया है। वे अप्रैल 2003 में कांग्रेस से अलग हुए थे, शरद पवार ने उन्हें प्रदेश पार्टी की बागडोर सौप दी। लेकिन राज्य विधानसभा के पहले चुनाव की तैयारियों के लिए उनके पास केवल 8 महीने थे। इन 8 महीनों में संगठन में जान फूंककर उसे चुनाव में उतारना आसान नहीं था। वक्त काफी कम था। शुक्ल को विश्वास था कि यदि 20-25 सीटें भी वे जीत गए तो सत्ता की चाबी उनके पास होगी। किन्तु उन्होंने सभी 90 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े करने की गलती की। यदि वे इससे आधी सीटों पर फोकस करते तो शायद कुछ बेहतर नतीजे प्राप्त कर सकते थे। बहरहाल अतिरेक आत्मविश्वास एवं कमजोर चुनाव प्रबंध ने उनकी हसरतों पर पानी फेर दिया और वे केवल एक सीट जीत पाए अलबत्ता लगभग 6.50 प्रतिशत वोट लेकर उन्होंने कांग्रेस को सत्ता से जरुर बेदखल कर दिया। जोगी हारे और विद्याचरण शुक्ल भी। सत्ता की कमान भाजपा को अनायास हाथ लग गई जिसे रमन सिंह अभी तक मजबूती से थामे हुए हैं। यह उनकी तीसरी पारी है।
        निश्चय ही जोगी की नई पार्टी का भविष्य क्या होगा, अभी कहना नामुमकिन है। यदि दो-ढाई साल तक वे अपने संगठन को बनाने, उसे जिंदा रखने, उसे विस्तारित करने एवं आम जनता की आवाज बनाने में सफल रहे तो माना जा सकता है कि वे बेहतर विकल्प देंगे लेकिन यह कोई आसान काम नही है। इसमें अपार धैर्य एवं धन-जन की जरुरत पड़ती है। वे यह जानते हैं कि कांग्रेस से अलग होने के बाद बड़े-बड़े सूरमा ढेर हो गए और फिर पार्टी में मुंह लटकाकर लौट आए। अनेकों राजनीति में वीरगति को भी प्राप्त हुए। कांग्रेस का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। जोगी इस तथ्य को जानते हैं। फिर भी वे ऐसा दांव राजनीति में प्रादेशिक पार्टियों के बढ़ते वर्चस्व को देखकर ही खेल रहे हैं। उन्हें जो संभावना नजर आ रही है वह उजली है किन्तु उसके स्याह पक्ष की वे अनदेखी करेंगे तो उनकी पार्टी तीसरी शक्ति नहीं, चौथी, पांचवीं, छठवीं बनकर रह जाएगी जिन्हें जनता वोटों के जरिए नकारती है। चूंकि वे कुशल प्रशासक, अच्छे संगठनकर्ता व दूरदर्शी है और उनके विधायक बेटे ने युवाओं की फौज तैयार कर रखी है इसलिए उन्हें उम्मीद है कि चुनाव के नतीजे आने के बाद सत्ता का गणित उनके इशारे पर नाचेगा और पार्टी का हश्र स्व. शुक्ल की एनसीपी जैसा नहीं होगा। यदि ऐसा हुआ तो जाहिर है तब छत्तीसगढ़ की राजनीतिक दशा और दिशा कुछ और होगी। प्रदेश राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात होगा। पर यह अभी काल्पनिक ही है। देखें आगे क्या होता है।