Friday, December 23, 2016

चिकित्सा में पी. पी. पी. विचार करें सरकार

-दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं को निजी हाथों में सौंपने के राज्य सरकार के फैसले पर बहस की पर्याप्त गुंजाइश है, किंतु दुर्भाग्य से ऐसा कुछ होता नहीं है। जनकल्याणकारी योजनाएं चाहे केन्द्र की हों या राज्य सरकार की, वे वैसी ही होती हैं जैसा प्राय: सरकारें चाहती हैं, इसमें जनविचारों की भागीदारी कतई नहीं होती जबकि कहा जाता है सरकारें जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। यदि सभी नहीं, तो क्या कुछ योजनाओं पर प्रबुद्ध नागरिकों, विशेषज्ञों से विचार-विमर्श नहीं किया जा सकता? जाहिर है न नौकरशाही इसकी इजाजत देती हैं और न ही राजनीति क्योंकि यहां सवाल श्रेय का, श्रेष्ठता का एवं अहम् का होता है। बहरहाल पिछले दिनों की एक खबर के मुताबिक छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य के सभी 27 जिलों में बच्चों एवं माताओं के लिए अस्पताल बनाने एवं उन्हें पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी के तहत निजी हाथों में सौंपने का फैसला किया है। सरकारी खबर के अनुसार भवन एवं आवश्यक सभी सुविधाओं की व्यवस्था सरकार करेगी। बाद में उनके संचालन की जिम्मेदारी निजी उद्यमियों को सौंप दी जाएगी, ठीक वैसे ही जैसा कि राजधानी रायपुर में करीब 15 बरस पूर्व एस्काटर््स हार्ट सेंटर के मामले में हुआ। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के कार्यकाल में एस्काटर््स का रायपुर में पदार्पण हुआ और छत्तीसगढ़ को हृदय रोग से संबंधित पहला अस्पताल मिला जिसके लिए सरकार ने लगभग 300 करोड़ रुपए खर्च किए। यह अलग बात है कि गरीबों विशेषकर गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों की मुफ्त हृदय चिकित्सा की जिन शर्तों पर एस्कार्ट्स को अस्पताल सौंपा गया था, उसका सतत् उल्लंघन होता रहा और सरकार मूकदर्शक बनी रही। अब इस अस्पताल को अपने अधिकार में लेने सरकार प्रयत्न कर रही है। पता नहीं वह कब सफल होगी। 
    बहरहाल जोगी के जमाने के इस असफल प्रयोग पर अब भाजपा सरकार काम कर रही है। हालांकि घोषणा के बावजूद अभी इस दिशा में कुछ नहीं हुआ है। योजना के अनुसार सरकार अस्पतालों के लिए इमारतें बनाने, उसे वातानुकूलित करने, आवश्यक मशीनें एवं उपकरणों की व्यवस्था करने, पैथ लैब बनाने आदि पर करीब 300 करोड़ रुपए खर्च करेगी। अस्पताल तैयार होने के बाद इन्हें निजी संचालकों को सौंप दिया जाएगा। शर्तें क्या होंगी इसका खुलासा नहीं हुआ है पर यह तय है गरीबों के मुफ्त इलाज की शर्त अवश्य होगी। सरकार की तरफ से निगरानी की व्यवस्था क्या होगी? यह भी स्पष्ट नहीं है। क्या इन अस्पतालों की संचालन कमेटी में सरकार और जनता का कोई प्रतिनिधि होगा, इसका भी पता नहीं। अलबता इस योजना जो मुख्यत: गरीब तबके के लिए है, की सफलता ऐसे ही सवालों पर निर्भर है। 
छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सुविधाओं पर बात करें तो स्थिति निराशाजनक ही कही जाएगी। हालांकि शासन ने स्मार्ट कार्ड के जरिए 50 हजार रुपए तक की मुफ्त चिकित्सा की व्यवस्था कर रखी है। लेकिन यह नाकाफी है क्योंकि विभिन्न कारणों से जन स्वास्थ्य की समस्याएं ज्यादा विकराल हैं। शहरों, ग्रामीण अंचलों विशेषकर आदिवासी इलाकों में प्रत्येक वर्ष मलेरिया, डायरियां आदि बीमारियों से होने वाली मौतों में कोई कमी नहीं आई है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों का बुरा हाल है, वहां न तो डाक्टर होते हैं और न ही दवाइयां। मामूली बीमारियों के लिए भी लोगों को शहरों की ओर रुख करना पड़ता है जहां निजी अस्पतालों में महंगे इलाज की वजह से उन्हें जमीन-जायदाद तक बेचनी पड़ती है। 
     दरअसल सबसे बड़ा संकट विश्वास का है। वैसा ही संकट जो स्कूली शिक्षा और कानून व्यवस्था के मामले में नार आता है। सरकारी स्कूलों में गुणवत्ताविहीन शिक्षा अविश्वास की भावना पैदा करती है इसीलिए निजी स्कूल खूब पनप रहे हैं और लूट-पाट मचा रहे हैं। इसी तरह कानून-व्यवस्था के मामले में लोग पुलिस से दूर भागते हैं। वे उसके मित्र नहीं हैं जबकि आम लोगों को अपना मित्र बनाने पुलिस निरंतर प्रयास करती है पर उसका खौफ इस कदर है कि यह उक्ति यथावत है कि पुलिस से न दोस्ती भली, न दुश्मनी। स्वास्थ्य के मामले में संकट कुछ अलग है। यहां सवाल सिर्फ स्तर का नहीं, चिकित्सा की उपलब्धता का भी है। क्या कारण है कि दूर-दराज के ग्रामीण भी अपनी तमाम पूंजी के साथ निजी अस्पतालों की शरण लेते हैं। प्रायवेट अस्पतालों में विशेषकर सुविधा सम्पन्न बड़े अस्पतालों में ऐसे लोगों की भारी भीड़ इस बात की गवाह है कि वे इन्हें सरकारी अस्पतालों से बेहतर मानती है। जबकि चिकित्सा की श्रेष्ठता शासकीय चिकित्सालयों में भी कायम है। 
    ऐसा लगता है कि स्वास्थ्य के मामले में सरकार ने हार मान ली है। सभी 27 जिलों में अस्पताल बनाकर उन्हें निजी हाथों में सौंपने के पीछे यह दलील दी जा रही है कि सरकारी अस्पतालों के लिए डाक्टर नहीं मिलते। शहरी केन्द्रों में जब चिकित्सकों के पद रिक्त पड़े रहते हैं तो कस्बों के अस्पतालों की हालत का अंदाज लगाया जा सकता है। इसी तर्क के साथ स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजीकरण को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस विचार में कोई दिक्कत नहीं है बशर्तें पेशे के प्रतिबद्ध एवं इमानदार लोग चुने जाएं। क्या भ्रष्ट तंत्र के लिए यह संभव है? कतई नहीं। तब गरीबों को बेहतर एवं त्वरित चिकित्सा उपलब्ध कराने की जिस मकसद से यह योजना बनाई गई है, वह कैसे सफल होगी? यकीनन सरकारी खर्च से बने अस्पताल निजी संचालकों के लिए एक तरह से कमाई के वैसे ही स्रोत बनेंगे जैसे कि एस्काटर््स रायपुर है। यानी चिकित्सा के नाम पर लूट-खसोट के नए केन्द्र खुल जाएंगे। अत: सरकार को विचार करना होगा कि निजीकरण को प्रोत्साहित करने के बजाए क्या ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार के साथ-साथ मौजूदा उपायों को बेहतर नहीं बनाया जा सकता?

Saturday, December 10, 2016

सत्ता के 13 वर्ष कम तो नहीं होते

-दिवाकर मुक्तिबोध
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को देखकर आपको, आम आदमी को क्या लगता है? क्या राय बनती है? अमूमन सभी का जवाब एक ही होगा- भले आदमी हैं, नेकदिल इंसान। सीधे, सरल। मुख्यमंत्री होने का दंभ नहीं। सबसे प्रेम से मिलते हैं। सबकी सुनते हैं। लेकिन शासन? जवाब यहां भी एक जैसा ही होगा - लचर है। नौकरशाहों पर लगाम नहीं है। उनकी मनमानी रोकने में असमर्थ है। धाक नहीं है। भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं है। सुस्त है। सरकार वे नहीं, नौकरशाह चला रहे हैं। सरकारी योजनाओं का लाभ निचले तबके तक नहीं पहुंच पा रहा है। सरकारी कामकाज में पारदर्शिता नहीं है। फाइलों के आगे बढऩे की रफ्तार बेहद सुस्त है और सर्वत्र कमीशनखोरी का जलवा है। और उनकी राजनीति? यहां भी प्राय: सभी का जवाब तकरीबन एक जैसा ही होगा- बहुत घाघ हैं। जबरदस्त कूटनीतिज्ञ। अपने विरोधियों को कैसे चुन-चुनकर ठिकाने लगाया। आदिवासी नेतृत्व की मांग करने वालों की हवा निकाल दी। उनकी कुर्सी की ओर आंखें उठाने वालों की बोलती बंद कर दी। शासन की आलोचना करने वाले सांसदों व पार्टी नेताओं को आईना दिखा दिया। कईयों के लिए मार्गदर्शक की भूमिका का इंतजाम कर दिया। संगठन के नेतृत्व को भी अपनी मुट्ठी में रखा। कोई हूं की चूं नहीं। सभी महत्वपूर्ण स्थानों, पदों पर अपने मोहरे फिट किए? गजब के राजनेता। मासूमियत भरी राजनीति। भाजपा शासित पहला प्रदेश जहां पार्टी में असंतोष पानी के बुलबुले की तरह है, फूंक मारते ही ध्वस्त। और अब पार्टीजनों, नेताओं के न•ारों में रमन सिंह? जवाब मिलेगा- पंगा लेने का मतलब नहीं। केन्द्र में जबरदस्त पकड़। पीएम तक तारीफ करते हैं। लेकिन यहां अभयदान। खूब कमाओ, खाओ। लिहाजा चौथी पारी भी मिलनी ही चाहिए।
    तो ये हैं, प्रदेश की जनता के प्रति बेहद संवेदनशील, उदारमना मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह जिनके शासन के 13 वर्ष 12 दिसम्बर 2016 को पूर्ण होने वाले हैं। मुख्यमंत्री के बतौर तीसरी पारी के अभी दो वर्ष और बाकी हैं। यानी दो जलसे इन्हीं तारीखों में और होंगे जैसे कि इस बार हो रहे हैं। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि हर सरकार को यह हक है कि वह अपनी उपलब्धियों का खूब ढिंढोरा पीटे भले ही वे कमतर क्यों न हो। फिर सत्ता के 13 वर्ष कम नहीं होते। मुख्यमंत्री के बतौर तीसरी पार्टी हर किसी राजनेता को नसीब नहीं होती। भाजपा शासित राज्यों में दो ही मुख्यमंत्री ऐसे हैं जो तीसरी पारी खेल रहे हैं- एक म.प्र. के शिवराज सिंह और दूसरे रमन सिंह। रमन सिंह के अब तक के कार्यकाल का असली लेखा-जोखा जनता के पास है, जो चुनाव वर्ष 2018 में वोटों के जरिए सामने आएगा। सरकार विकास के दावे भले ही कितने ही क्यों न करे लेकिन तय जनता को करना है। इसमें संदेह नहीं कि सरकार की लोककल्याणकारी नीतियों की वजह से राज्य में काफी कुछ बदला है। यह बदलाव हर मोर्चे पर न•ार भी आता है विशेषकर आधारभूत संरचनाओं के मामले में। शहरों में जीवनस्तर सुधरा है, कुशल, अकुशल हाथों के पास पर्याप्त काम है किंतु गांंव? वे अभी भी समस्याग्रस्त हैं। राज्य के 19 हजार गांवों में से कुछ दर्जन गांवों को छोड़ दें तो शेष नागरिक जीवन की सुविधाओं के लिए तरस गए हैं। जबकि सरकार दावा करती है कि उसकी प्राथमिकता गांवों का विकास है। अभी चंद दिन पूर्व राजधानी में आयोजित युवा सम्मान समारोह में मुख्यमंत्री एवं सरकार के अन्य नुमाइंदों की मौजूदगी में प्रतिभाशाली युवाओं ने कहा- वे गांवों में मूलभूत सुविधाएं चाहते हैं और इसके लिए वे आगे चलकर अपने स्तर पर प्रयत्न करेंगे। वे ऐसा छत्तीसगढ़ चाहते हैं जहां हर गांव में स्कूल व अस्पताल हो। जिला दंतेवाड़ा के ग्राम बुरगुम के किशोर वय के भारत कुमार ने कहा उनके गांव में सिर्फ कक्षा 8वीं तक स्कूल है। गांव में बिजली नहीं, सड़क कच्ची है और पानी के नाम पर केवल हैंडपम्प है। अपनी प्रतिभा के दम पर गांवों से उच्च शिक्षा के लिए निकले प्राय: सभी युवाओं का एक ही दर्द है- उनके गांवों की बदहाली। ग्रामीण युवाओं के विचारों से जाहिर है नया राज्य बनने के बावजूद 16 वर्षों में गांवों की हालत बदली नहीं है। अब राज्य सरकार 12 दिसम्बर को राजधानी में एक विराट सम्मेलन करके युवाओं से जानना चाहती है कि गांव की जरूरतें क्या हैं और उनके क्या सुझाव है। गोया सरकार के बड़े-बड़े अफसर, राज्य के विधायक,ं नेता और प्रदेश पार्टी का नेतृत्व नहीं जानता कि गांवों की समस्याएं क्या हैं और सरकार को क्या करना चाहिए। जाहिर है, 12 दिसम्बर का सम्मेलन राजनीतिक है और पार्टी की न•ार में वे 34 लाख युवा हैं जिनके वोट उसके लिए कीमती हैं। सरकार उनके मुख से अपनी उपलब्धियां भी सुनना चाहती है। इसलिए इस सम्मेलन का गांवों के विकास से कोई लेना-देना नहीं है। बहरहाल बात फिर घूम फिरकर वहीं आ जाती है कि सरकार ने इन 13 वर्षों में गांवों के लिए क्या किया? क्यों नहीं तस्वीर बदली? अरबों रुपए खर्च हो गए। कहां गए वे? मलेरिया, पीलिया जैसे रोगों से अभी भी ग्रामीण क्यों मरते हैं? किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य क्यों नहीं मिलता? क्यों लुडेग, पत्थलगांव के किसानों को अपने टनों टमाटर सड़कों पर फेंकने पड़ते हैं जबकि तीन दशक पूर्व म.प्र. के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने जशपुर, रायगढ़ क्षेत्र में टमाटर की भारी पैदावार को देखते हुए वहां फूड प्रोसेसिंग यूनिट की स्थापना करने की घोषणा की थी। छत्तीसगढ़ नया राज्य बन गया, 15 वर्ष बीत गए किंतु एक अदद प्लांट वहां स्थापित नहीं हो सका जबकि सरकार फुड प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने की बात करती रही है। बस्तर में नक्सल समस्या के चलते स्वीकृत डेढ़ सौ से अधिक सड़कें पिछले कई वर्षों से नहीं बन पा रही हैं। कल्पना की जा सकती है, वनांचलों के सैकड़ों गांवों की स्थिति क्या होगी जहां पहुंच मार्ग ही नहीं है। छत्तीसगढ़ के गांवों की और भी मूलभूत समस्याएं हैं जबकि प्रत्येक वर्ष मुख्यमंत्री दर्जनों गांवों का दौरा करते हैं, गांवों से जनप्रतिनिधि विधानसभा एवं पंचायतों के लिए निर्वाचित होते हैं, छोटी-बड़ी तमाम किस्म की योजनाएं बनती है किंतु गांवों की तस्वीर नहीं बदलती। भूखमरी, बेरोजगारी, प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य तथा जीवन की अन्य कठिनाइयां और दरिद्रगी छत्तीसगढ़ के गांवों की अभी भी मूल पहचान है। राज्य स्थापना दिवस पर हर वर्ष सरकारी उत्सवों के बीच यह पहचान गुम हो जाती है, गुम कर दी जाती है पर जाहिर है समाप्त नहीं होती।

Thursday, December 8, 2016

एनजीओ और मंत्री का दर्द

-दिवाकर मुक्तिबोध
     कहते हैं देश बदल रहा है, शहर बदल रहे हैं, गांव बदल रहे हैं लेकिन क्या वे बदल रहे हैं जिन्हें वास्तव में बदलना चाहिए, देश हित में, समाज हित में, लोक हित में? जवाब है - बिलकुल नहीं। न बदलने वालों की अनेक श्रेणियां हैं- भ्रष्ट राजनेता हैं, भ्रष्ट मंत्री हैं, भ्रष्ट अफसर हैं और इनके द्वारा पोषित वे संस्थाएं हैं, संगठन हैं जिन्होंने समाज सेवा का नकाब पहन रखा है। गैर सरकारी संगठन यानी एन.जी.ओ. भी इसी तरह की अमर बेल है जो सरकार के महकमों से लिपटी हुई है और जिनके कामकाज को लेकर लंबी बहसें होती रहती हैं। निष्कर्ष के रूप में यह माना जाता है कि देश-प्रदेश में कार्यरत बहुसंख्य एन.जी.ओ. अपनी भूमिका के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। वे सरकारी नुमाइंदों के साथ गठजोड़ करके बेतहाशा पैसा पीट रहे हैं। सामाजिक क्षेत्र में इनके द्वारा किए जाने वाले कथित कामकाज काफी हद तक कागजों तक सिमटे हुए हैं। इनके भौतिक सत्यापन की न तो कभी जरूरत महसूस की जाती है और न ही कभी जांच बैठायी जाती है। एक तरह से ये सरकार के नियंत्रण से मुक्त है। बेखौफ हैं। भ्रष्टाचार का माध्यम बने हुए हैं। 
    विचार करें, दशकों से कार्यरत इन संस्थाओं के जरिए कितना बदलाव आया? क्या वह संतोषजनक है? विशेषकर वनांचलों में, बेहद पिछड़े इलाकों में, आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में जन चेतना कितनी विकसित हुई है? लोग अपने अधिकारों के प्रति कितने जागरुक हुए हैं? शिक्षा व स्वास्थ्य के महत्व को कितनों ने पहचाना व स्वीकार किया है? जबकि सरकारें अपने तई व इनके माध्यम से भी अब तक बेतहाशा धन खर्च कर चुकी हैं। तो फिर ये संस्थाएं कर क्या रही हैं? 
    दरअसल इसमें शक नहीं कि सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के विकास एवं कुरीतियों से निजात पाने की दिशा में गैर सरकारी संगठनों की भूमिका अहम हो सकती है और है भी लेकिन कुछ दर्जन एनजीओ को छोड़ दें तो शेष सफेद हाथी बने हुए हैं जो सरकार के पालतू हैं। देश को छोड़ दें तो छत्तीसगढ़ में ही 173 एनजीओ पंजीकृत हैं जिन्हें केंद्र व राज्य सरकार से फंड मिलता है। अभी हाल ही में राज्य की महिला, बाल विकास व समाज कल्याण मंत्री श्रीमती रमशीला साहू ने विभागीय सचिव को निर्देशित किया कि सभी एनजीओ को नोटिस जारी कर उनसे कामकाज का हिसाब मांगा जाए। आंकड़ों के मुताबिक राज्य के 59 एनजीओ ऐसे हैं जिन्हें वर्ष 1986-87 से केंद्र सरकार से सहायता मिल रही है। इन संस्थाओं को अभी तक 86 करोड़ रुपए दिए जा चुके हैं। कतिपय खास संस्थाओं को विभिन्न प्रोजेक्ट्स के तहत राज्य सरकार ने भी लाखों रुपए दिए हैं। विभागीय मंत्री का दर्द यह है कि रायपुर की एक संस्था को दो-तीन सालों में 60 लाख रुपए जारी किए गए किंतु उन्हें इसकी भनक तक नहीं लगी और जब बात सामने आई तो शिकायतों का पुलिंदा जो कचरे में पड़ा हुआ था, उसे खोला गया और उसके आधार पर सभी एनजीओ से उनके कामकाज की जानकारी मांगी गई, खर्चों का ब्यौरा देने के लिए कहा गया। 
    लेकिन इस चिट्ठी-पत्री से होने-जाने वाला कुछ नहीं है। थोड़े समय के लिए कुछ हलचल मचेगी और फिर सब कुछ शांत हो जाएगा और व्यवस्था फिर पहले जैसे चलती रहेगी। दरअसल सामाजिकता के नाम पर आर्थिक षडय़ंत्र रचने वाले रैकेट बरसों से सरकारी विभागों में अपनी पैठ जमाए हुए हैं। जाहिर है उनका उद्देश्य पैसा बनाना है और ये पैसा बना रहे हैं। प्रमुख रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक जनजागरण के क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों के कामकाज का कभी भौतिक सत्यापन नहीं होता, न इनके कामकाज पर कभी निगरानी रखी जाती है। समाज कल्याण विभाग में ऐसी कोई व्यवस्था भी नहीं है कि इतने कामकाज की पड़ताल की जाए कि वास्तव में राज्य के दूरस्थ अंचलों में विशेषकर आदिवासी इलाकों में ये संस्थाएं कैसा काम कर रही हैं। क्या इनके कामकाज से कोई जागृति आई है? क्या आदिवासियों को शिक्षा का महत्व समझ में आ रहा है? क्या कभी किसी मंत्री ने या विभाग के अफसरों ने गांव, देहातों में जाकर आकस्मिक निरीक्षण किया है? क्या कभी अपने माध्यमों से पता लगाने की कोशिश की है कि वित्त पोषित ये संस्थाएं ठीक से काम कर रही हैं अथवा नहीं। क्या कभी इनके द्वारा पेश वित्तीय बिलों की असलियत जांचने की कोशिश की गई है? क्या कभी यह देखा गया है कि इनके संचालकों की माली हालत पहले क्या थी और अब क्या है? क्या इनके बैंक एकाउंट खंगालने की कोशिश की गई? क्या कभी यह जांचने की कोशिश की गई कि इनके तथा परिवार के सदस्यों के नाम पर चल-अचल सम्पत्ति कितनी है और वह कब अर्जित की गई है? वस्तुत: ऐसा कुछ करना इसलिए संभव नहीं है क्योंकि यह सरासर मिलीभगत का मामला है, शेयरिंग का मामला है। जिस व्यवस्था में सरकारी कामकाज देने के एवज में चैक जारी करने के पूर्व कमीशन की नगद राशि पहले ही रखवा ली जाती है, उससे बदलाव की उम्मीद भी क्या की जा सकती है? इसलिए एनजीओ को नोटिस जारी करने से कुछ नहीं होगा। यह तो केवल दबाव बनाने की कसरत है जो बीच-बीच में मामला सधते न देखकर होती रहती है। इसलिए भौतिक संरचनाओं की दृष्टि से गांव-शहर बदल सकते हैं पर व्यवस्था नहीं, क्योंकि वह सरासर भ्रष्टाचार की नींव पर टिकी हुई है।