Wednesday, December 10, 2014

पहले से कुछ बेहतर की उम्मीद

रायपुर साहित्य महोत्सव

- दिवाकर मुक्तिबोध

12 दिसंबर से प्रारंभ हो रहे तीन दिवसीय साहित्य महोत्सव के तनिक विवादित होने के बाद अब सवाल है कि गंभीर वैचारिक अनुष्ठान के जिस लक्ष्य को लेकर इसका आयोजन किया जा रहा है वह पूरा होगा अथवा नहीं। देश के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यिक मनीषियों की मौजूदगी में प्रादेशिक साहित्यिकों, साहित्यप्रेमियों एवं लोक कलाकारों को विचार-विमर्श के लिए एक सार्थक मंच उपलब्ध कराना आयोजन का दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य है। यह उद्देश्य भी पूरा होगा या नहीं इस बात का पता तीन दिन तक चलने वाले 53 सत्रों में उपस्थित श्रोताओं की सक्रिय एवं वैचारिक भागीदारी से स्पष्ट हो सकेगा। महोत्सव पर विवाद की परछाइयां मूलत: राजनीतिक हैं तथा उन दो-तीन बड़ी घटनाओं की वजह है जिसने समूचे जनमानस को उद्वेलित, चिंतित और गमगीन कर रखा है। बिलासपुर जिले में आयोजित नसबंदी शिविर में आॅपरेशन के बाद हुई मौतें, जहरीली दवा सिप्रोसिन का प्रदेश के बाजारों में फैलाव, उसके सेवन से स्वास्थ्यगत समस्याएं एवं कुछ का प्राणांत, दवा वापस लेने के तमाम सरकारी प्रयासों के बाद भी ग्रामीण बाजारों में उसकी उपलब्धता तथा सुकमा नक्सल हमले में सीआरपीएफ के जवानों का मारा जाना भीषण त्रासदी के रुप में है और प्रदेश की जनता इससे उबर नहीं पाई है लिहाजा शोक के इस माहौल के बीच रायपुर साहित्य महोत्सव का आयोजन कुछ खटकने वाला जरुर है लेकिन यह भी सत्य है कि भीषण से भीषण त्रासदियों के बावजूद जिंदगी चलती रहती है। न  वह रुकती है और न ही कोई ठहराव आता है अलबत्ता दु:ख और शोक की अनुभूतियां ठंडी नहीं पड़ती। वह सालों-साल मन को सालती रहती है और एक अव्यक्त शोक मन के किसी कोने में फड़फड़ाता रहता है। किन्तु रायपुर साहित्य महोत्सव का आयोजन चूंकि काफी पूर्व  से नियोजित था, लिहाजा इसे भावनात्मक आधार पर स्थगित करने या रद्द करने का कोई तार्किक आधार नहीं था और फिर चूंकि यह राज्य के गठन के 13 वर्षों बाद पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर हो रहा है इसलिए इस वैचारिक अनुष्ठान का अपना महत्व है जो अंतत: समाज, जनसाहित्य और जनसंस्कृति के अंतर संबंधों और उसके विकास में प्रेरक की भूमिका के रुप में दर्ज होने वाला  है, बशर्ते उसकी सफलता असंदिग्ध बनी रहे।
     चूंकि सरकार के स्तर पर आयोजित होने वाले साहित्यिक -सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ विवाद का रिश्ता काफी पुराना है और वह साथ ही साथ चलता है अत: स्वाभाविक था रायपुर साहित्य महोत्सव भी विवादों से परे नहीं रहता लेकिन दिक्कत यह है कि विवाद वैचारिकता के स्तर पर और आयोजन में आमंत्रित विशिष्ट वक्ताओं के चयन एवं उनकी प्रतिबद्धता की वजह से नहीं बल्कि राजनीति के कारण है, यह अलग बात है कि इसे भावनात्मकता से जोड़ दिया गया है। राजनीति में भी केवल कांग्रेस ही अकेली पार्टी है जिसे यह आयोजन गंवारा नहीं। दरअसल इसके पीछे भी उसकी राजनीतिक मजबूरियां हैं। राज्य में नगर निकायों के चुनाव सिर पर है तथा पार्टी ने पिछली घटनाओं को लेकर सरकार की नाक में दम कर रखा है। धरना, प्रदर्शन, धान खरीदी पर सरकार की कथित जनविरोधी नीतियां, गर्भाशय कांड, नसबंदी कांड, स्वास्थ्य विभाग में उपकरणों की खरीदी में करोड़ों के घपले, बस्तर में नक्सली हमले में हुई मौतें और इससे निपटने में सरकार विफलता, आदि-आदि मुद्दों को पार्टी आगामी निकाय चुनावों में पूरी तरह से भुनाने की कोशिश में है और इसी संदर्भ में उसे रायपुर साहित्य महोत्सव का मुद्दा हाथ लगा है। इसीलिए उसके विरोध के स्वर तेज है तथा उसका प्रयास है आयोजन में आमंत्रित देश के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार और लोकरंग से जुड़े विशिष्ट लोग रायपुर न आए। पार्टी इस मामले में किस कदर गंभीर है, इसका पता इस बात से भी चलता है कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भूपेश बघेल ने स्वयं टेलीफोन पर सर्वश्री अशोक वाजपेयी, प्रयाग शुक्ल, अपूर्वानंद, नंदकिशोर आचार्य सहित सभी प्रख्यात साहित्यिकों से आयोजन में शामिल न होने की अपील की। तर्क वहीं दिया गया कि राज्य में शोक का माहौल है, शहीदों की अभी तेरहवीं भी नहीं हुई है तथा राज्य आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है अत: ऐसी परिस्थतियों में उनका आना उचित नहीं रहेगा। कांग्रेस अध्यक्ष के इस अनुरोध पर आमंत्रित साहित्यकारों ने किस तरह प्रतिक्रिया व्यक्त की, यह स्पष्ट नहीं है पर यह तय है कि इसने एक संशय का निर्माण तो कर दिया है। संभव है इसके चलते तथा विवाद से बचने के लिए कुछ आमंत्रित वक्ता अपना इरादा बदल दें। वे न आएं। लेकिन इस घटना से भी एक बात पूर्णत: स्पष्ट है कि कांग्रेस का विरोध तार्किक कम राजनीतिक ज्यादा है। शोक का हवाला देकर उसने यह साबित कर दिया है कि  उसका उद्देश्य हर सूरत में त्रासद घटनाओं से सरकार को कटघरे में खड़ा करना है और इसके लिए एक और बहाने के रुप में सरकार द्वारा पोषित साहित्य महोत्सव हाथ लगा है। निश्चिय ही पार्टी को यह सब करने की जरुरत नहीं थी  क्योंकि कांग्रेस नेताओं के विरोध के बाद आयोजनकर्ता, सरकार के जनसंपर्क विभाग ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों को रद्द कर दिया और उसे विमर्श तक सीमित कर दिया है। यह बेहतर है क्योंकि राज्य में एक दशक से सत्तारुढ़ भाजपा सरकार का लोक विमर्श से नाता कम ही रहा है और सरकारी विज्ञापनों में उसका दावा भी है कि राज्य में पहली बार लोक साहित्य की बहार आई है।
           बहरहाल यह अच्छी बात है कि साहित्य और संस्कृति के आयोजनों को राजनीतिक चश्मे से देखने एवं उसके अनुसार साहित्यिक व्यवस्थाएं बनाने के बजाय विचारों को प्रधानता दी जा रही है। रायपुर साहित्य महोत्सव में गैर दक्षिणपंथी विचारकों को भी आमंत्रित करना इस बात का प्रमाण है कि भाजपा सरकार संकीर्णता के घेरे से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है जिसकी शुरुआत अब जाकर हो रही है हालांकि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह पहल आगे भी जारी रहेगी क्योंकि जनता को धर्म की घुट्टी पिलाने के लिए यह कोई राजिम कुंभ मेला नहीं है जिस पर राज्य सरकार प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए खर्च करती है और पार्टी के सत्ता में रहते आगे भी करती रहेगी।
           लोक साहित्य आयोजन के परिप्रेक्ष्य में यह कहना अप्रसांगिक नहीं होगा मीडिया का एक वर्ग जो भाजपा की सत्ता में अपने लिए खुशहाली देखता है, अब यह राग अलापने लगा है कि वामपंथी विचारकों और साहित्यकारों का जैसा सम्मान छत्तीसगढ़ में हो रहा है, वैसा देश के किसी और राज्य में नहीं। इसके उदाहरण के रुप में प्रख्यात कवि एवं लेखक स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध का हवाला दिया जा रहा है और यह कहा जा रहा है कि उनके वामंपथी रुझान के बावजूद मुख्यमंत्री डॉ.  रमन सिंह ने पिछले 11 वर्षों में अपने राज में मुक्तिबोध के सम्मान को सरकारी एवं सार्वजनिक स्तर पर बढ़ाया है और उन्हें सर्वाधिक महत्व दिया है। यह कितना सच है, इसका खुलासा इस बात से हो जाता है कि सन् 2000 में नया राज्य बनने के बाद से अब तक मात्र दो या तीन बार सरकार के स्तर पर कार्यक्रम हुए अलबत्ता निजी साहित्यिक संस्थाएं अपने स्तर पर प्रति वर्ष पुण्यतिथि एवं जयंती पर कार्यक्रम करती रहीं। चूंकि स्वर्गीय कवि की 50वीं पुण्यतिथि एवं प्रसिद्ध कविता ‘अंधेरे में ’ के 50 वर्ष भी इसी वर्ष पूरे हुए हैं इसलिए देशभर में साहित्य समारोह के जरिए उन्हें याद किया जा रहा है। मुक्तिबोधजी का अंतिम समय छत्तीसगढ़ में गुजरा है अत: पचासवें पर उन्हें पूरी प्रखरता से याद करना बहुत स्वाभाविक है।
        बहरहाल भाजपा सरकार ने प्रदेश के साहित्यकारों, कलाकारों, रंगकर्मियों एवं लेखकों को देश के मूर्धन्य रचनाकारों के सान्निध्य के साथ-साथ विचारों के आदान-प्रदान के लिए जो अवसर उपलब्ध कराया है, वह एक लोकतांत्रिक सरकार की सही भूमिका को दर्शाता है। ऐसे समय जब असहमतियों को सिरे से खारिज करने का दौर चला हुआ हो और जब विचारों को जानने-समझने की सहनशीलता जवाब दे रही हो, तब लोक साहित्य संवाद जैसे आयोजन निश्चय ही पहले से कुछ बेहतर की संभावना को जगाते है।

Tuesday, December 2, 2014

इस तरह जड़ों से नहीं कटेंगे नक्सली

-दिवाकर मुक्तिबोध

यह तो होना ही था। सुकमा जिले के धुर नक्सली क्षेत्र चिंतागुफा से कुछ किलोमीटर दूर कसलपाड़ में सीआरपीएफ की दो टुकड़ियों को घेरकर नक्सलियों ने जो हमला किया वह कोई नई रणनीति के तहत नहीं था। घात लगाकर गोलियां बरसाने जैसी वारदातें जिसमें जनहानि सुनिश्चित रहती हैं, वे पहले भी कई बार कर चुके हैं। इस बार भी उन्होंने ऐसा ही किया। सर्चिंग आॅपरेशन के लिए निकले केन्द्रीय रिजर्व पुलिस के जवानों को बड़े आराम से अपनी मांद में घुसने दिया और जैसे ही वे टारगेट में आए उन पर गोलियां बरसा दीं। जाहिर है, एकाएक हुए इस हमले में जवानों को संभलने या मोर्चा लेने का मौका नहीं मिला, लिहाजा फटाफट गोलीबारी में 2 अफसरों सहित 13 जवान मारे गए। इस घटना के साथ ही नक्सली यह संदेश देने में कामयाब रहे कि उनकी शक्ति भले ही क्षीण हो गई हो लेकिन मारक क्षमता में किसी तरह की कोई कमी नहीं आई है इसलिए यदि छत्तीसगढ़ सरकार आत्मसमर्पण  करने वाले दूसरी-तीसरी पंक्ति के नक्सलियों की भारी भरकम संख्या देखकर मुदित हो रही हो, तो ऐसा करने का उसे हक है लेकिन नक्सली हिंसकों को बस्तर से समूल नष्ट करने का उसका मकसद कम से कम अर्द्ध सैनिकों एवं पुलिस के जवानों के बूटों से बस्तर के जंगलों को रौंदकर तो  पूरा नहीं हो सकता।
       दरअसल कसलपाड़ की घटना यकीनन आकस्मिक नहीं थी। नक्सली यदि एक दिसंबर को इस घटना को अंजाम नहीं देते तो वे आगे किसी भी दिन इसी तरह की हिंसा या इससे भयावह हिंसा करते क्योंकि ऐसा करना बस्तर में अपने अस्तित्व के अहसास को कायम रखने एवं राज्य पुलिस एवं केन्द्रीय बलों के बीच खौफ पैदा करने के लिए जरुरी था। इस घटना के बाद अब राज्य एवं केन्द्र सरकार एक बार फिर इस राष्ट्रीय समस्या पर विचार करने मजबूर हो गई है जैसे कि प्रत्येक बड़ी घटना के बाद होती रही है किन्तु हर उच्च स्तरीय बैठकों के बावजूद निष्कर्ष कुछ नहीं निकलता और विचारों की पुनरावृत्ति भर होती  है। माओवादियों के खिलाफ रणनीति में कोई सुधार हुआ हो या उसमें नयापन आया हो, ऐसा कभी नजर नहीं आया जबकि बीते वर्षों में कई बड़ी घटनाएं घटी और नक्सली हमले में सैकड़ों जवान और आम आदमी मारे गए। रणनीति के स्तर पर यही होता रहा है - मसलन नक्सली क्षेत्रों में विकास कार्य, आधुनिक संचार प्रणाली का विकास, आधारभूत संरचनाओं का विकास जिसमें मुख्यतरू सड़कें है, शिक्षा का प्रचार-प्रसार, जागरुकता अभियान, आदिवासियों को भयमुक्त करने अभियान तथा उनके लिए नौकरियों की व्यवस्था। माओवादियों से संवाद सरकार की अंतिम प्राथमिकता है। लेकिन नवंबर 2000 में नया राज्य बनने के बाद बीते 13 वर्षों में छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा में भयावह वृद्धि क्यों हुई, इसका जवाब राज्य सरकार के पास नहीं है क्योंकि रणनीतिक स्तर पर जो कार्य योजना तय हुई है, उस दिशा में बस्तर में कुछ खास नहीं हुआ। भले ही राज्य सरकार यह कहकर अपनी पीठ थपथपाती रहे कि उसने हिंसाग्रस्त सरगुजा संभाग को नक्सली मुक्त कर दिया है लेकिन बस्तर का क्या? बीते 40 वर्षों से वह हिंसा के दंश को झेल रहा है। निरपराध आदिवासियों की मौतें देखता रहा है। क्या यह सिलसिला कभी थमेगा या हिंसा का दौर ऐसे ही जारी रहेगा, भले ही पुलिस या अर्धसैनिक बलों के जवान ही क्यों न मारे जाएं।
          बस्तर में नक्सली हिंसा के संदर्भ में जैसा कि अमूमन होता रहा है, कसलपाड़ घटना भी लापरवाही की चूक है। इसमें कोई शक नही कि राज्य सरकार की परिवर्तित पुनर्वास नीति, जिसमें आर्थिक मुआवजे में जबर्दस्त उछाल लाया गया है, की वजह से नक्सलियों के समर्पण की घटनाओं में खासी वृद्धि हुई है। लेकिन यह पुलिस के दबाव की वजह से कम, माओवादियों के बीच चल रहे आंतरिक द्वंद की वजह से ज्यादा है। फिर भी भारी भरकम मुआवजे की लालच में एवं सरकारी नौकरी के साथ नए सिरे से जीवन प्रारंभ करने की ललक ने आत्मसमर्पण को बढ़ावा मिला है। नक्सल प्रभावित अन्य राज्यों की तुलना में छत्तीसगढ़ में शस्त्र डालने एवं आत्मसमर्पण की घटनाएं बढ़ी है। हाल ही में लोकसभा में गृह राज्यमंत्री किरेन रिजूजू के द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष 11 नक्सल प्रभावित राज्यों में कुल 472 उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण किया जिससे आधे से भी ज्यादा 247 अकेले छत्तीसगढ़ के है। पिछले आंकड़े देखे तो 2011 में 394  आत्मसमर्पितों में से छत्तीसगढ़ से 20 थे जबकि सन 2012 में 445 में से 26 तथा 2013 में 283 में से केवल 28 नक्सलियों ने हथियार डाले। यानी इस संख्या में इस वर्ष बहुत तेजी आई। लेकिन यह सवाल अपनी जगह कायम है कि आत्मसमर्पण में वर्ष दर वर्ष बढ़ोतरी के बावजूद क्या बस्तर या देश से नक्सली आतंक खत्म हो जाएगा? क्या बंदूक की नोक पर ऐसा होगा?
          केन्द्र में सत्तारुढ़ होने के तुरंत बाद मोदी सरकार के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने नक्सली समस्या को अपनी कार्य सूची में टॉप पर रखा तथा तद्नुसार उच्च स्तरीय बैठकों का भी सिलसिला शुरु हुआ। इस समस्या पर नई राष्ट्रीय नीति की भी परिकल्पना की गई जिसे अमलीजामा पहिनाने की कोशिशें भी प्रारंभ है लेकिन इसके साथ ही नक्सल प्रभावित राज्यों की सरकार को भी पूरी छूट दी गई है कि वे अपने स्तर इस समस्या पर निपटे तथा इसके लिए केन्द्र ने हर तरह की सहायता उपलब्ध कराने का वायदा किया है। चूंकि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद सबसे भीषण है अतरू केन्द्र का पूरा ध्यान इस राज्य पर है किन्तु इसके बावजूद बस्तर में हिंसा इसलिए नहीं थम रही है क्योंकि वहां के आदिवासियों को अपनी सुरक्षा को लेकर सरकार पर विश्वास नहीं है।  वे अभी भी नक्सली आतंक के साए में जी रहे हैं। नक्सलियों को पनाह देना उनकी मजबूरी है। यह इसलिए कि आखिरकार माओवादी सुरक्षा देने के साथ-साथ उन्हें सरकारी शोषण से मुक्त कराते हैं। प्रायरू हर घटना में उन्होंने घात लगाकर जो हमले किए या बारुदी विस्फोट किए वे गांव क्षेत्रों से दूर थे। अतरू कसलपाड़ घटना के संदर्भ में केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह का यह कहना कि नक्सलियों ने स्थानीय निवासियों का ढाल की तरह इस्तेमाल किया और इस वजह से सीआरपीएफ गोली का जवाब गोली से नहीं दे सकी, सही प्रतीत नहीं होता।
नक्सल मोर्चे पर अब जो स्थितियां नजर आ रही हंै उससे यह धारणा बनती है कि बस्तर में अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जूझ रहे माओवादियों के निशाने पर सिर्फ पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान है। हालांकि गांवों में आतंक कायम रखने वे निरअपराध आदिवासियों की जान लेते रहे है। आंकड़े बताते है कि सन 2009 में 586, 2010 में 713, 2011 में 275, 2012 में 146 और 2013 में 123 नागरिक अपनी जान से हाथ धो बैठे। इनमें से अधिकांश छत्तीसगढ़ के हैं। गांव वालों को सबक सीखाने एवं उन्हें पुलिस से दूर रखने के लिए मुखबिरों को जनअदालतें लगाकर निर्मम हत्याएं करना माओवादियों का शगल रहा है। यद्यपि अब ऐसी घटनाएं कम हुई हंै पर बस्तर में तैनात पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवानों को मारना एवं उनके हथियार लूटना उनकी प्राथमिकता है। जाहिर है यह सरकार के साथ अघोषित युद्ध है।
            बहरहाल इस समस्या से निपटने के लिए तेज गति से काम करने की जरुरत है। इस मुगालते में रहना कि माओवादियों की कमर टूट गई, घातक है। कसलपाड़ की घटना से पुनरू यह सबक है कि नक्सल फ्रंट पर थोड़ी सी भी लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जा सकती। नक्सल रणनीतिकार जैसा कि अक्सर बताते है- चहुंओर से प्रयत्न करने की आवश्यकता है। मसलन आदिवासी क्षेत्रों का सर्वागीण विकास, बेहतर संचार प्रणाली, पुलिस का बेहतर सूचना तंत्र और आदिवासियों का विकास जो व्यवस्थागत खामियों के चलते सबसे कठिन और सबसे ज्यादा जरुरी है। लेकिन साथ ही एक सर्वमान्य फार्मूले के तहत माओवादियों से संवाद व उन्हें मुख्य धारा में शामिल करने के पुरजोर प्रयत्न। सरकार पर चूंकि माओवादियों का विश्वास नहीं है इसलिए ज्यादा अच्छा होगा गैर सरकारी संगठन एवं संस्थाएं अथवा मानवतावादी एवं माओवादी विचारक सुलह वार्ता के लिए मध्यस्थता करने की जिम्मेदारी उठाएं। यकीनन नक्सल समस्या का एक मात्र हल यही है।