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Showing posts from April, 2017

एक विचार का यों बदल जाना

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-दिवाकर मुक्तिबोध रामचन्द्र गुहा यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का करिश्माई व्यक्तित्व, उनका भाषाई कौशल, लोकदृष्टि और सबका साथ सबका विकास जैसे लोकलुभावन नारे का कमाल है या समानांतर चलते उस खौफ का जो विचारों को रौंदता है, उन्हें बदलने को मजबूर कर देता है। इसे तय कर पाना बड़ा मुश्किल है। वस्तुस्थिति तो वही बता सकता है जो इस दौर से गुजरता है या गुजर रहा है और जो वैचारिक दृष्टि से प्रबल है, लोकतांत्रिक है। करीब दो वर्ष पूर्व देश में घटित विभिन्न घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में सहिष्णुता-असहिष्णुता पर लंबी बहस चली, तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई, साहित्यिक, सांस्कृतिक व कलावादी पुरस्कारों को लौटाने का लंबा चौड़ा सिलसिला शुरू हुआ, इतिहास को बदलने की कुचेष्टा की गई, सांस्कृतिक दुष्चक्र, साम्प्रदायिक भावनाओं का विस्तार, उनका पोषण और फासिस्ट ताकतों का उत्थान देश ने देखा और अभी भी देख रहा है। जनता खामोश है। जो नहीं हैं उन्हें चुप कराया जा रहा है या पक्ष में बोलने के लिए विवश किया जा रहा है। उन्हें हथियार दिखाए जा रहे हैं। शब्दों के हथियार। इसी वर्ष जनवरी 2017 को प्रख्यात लेखक जी. राजशेखर ने देश मे...

'कम सून, बाबा'

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यादें - रश्मि -दिवाकर मुक्तिबोध जिंदगी में कुछ खास तिथियां होती हैं जो ताउम्र साथ चलती हैं - शोक व आल्हाद की तिथियां। अतीत में खो जाने की तिथियां, यादों को ताजा करके प्रफुल्लित होने की तिथियां या फिर गहरे शोक में डूब जाने की तिथियां। 11 सितंबर 1964, 08 जुलाई 2010, 29 जनवरी 2012, 7 अक्टूबर 2015 और अब 22 अक्टूबर 2016। ये मेरी शोक की तिथिया हैं। 1964 को पिताजी गए, 2010 में माँ नहीं रही, 2012 में बड़ी बहन चली गई, 2015 में भाभी नहीं रही और 22 अक्टूबर 2016 को बड़ी बेटी ने साथ छोड़ दिया। अब इनकी भौतिक उपस्थिति नहीं हैं लेकिन स्मृतियां तो हैं जो हर पल, दिलों दिमाग के दरवाजे को खटखटाती हैं, अदृश्य उपस्थिति का एहसास कराती है और जीने का सहारा भी बनती हैं।        बेटी रश्मि को याद करता हूं। जन्म तिथि 1 सितंबर 1979। स्थान रायपुर, छत्तीसगढ़। महामाया मंदिर के परिसर में बने मकान में रहते हुए कामना की थी कि पहली संतान बेटी ही हो। इच्छा पूरी हुई। रश्मि का जन्म हुआ। सीने से लगी उस नन्ही परी के बड़े होने का अहसास तब हुआ जब उसकी शादी हुई और बाद में वह दो प्यारे-प्यारे बच्चों क...