कांग्रेस के आंदोलन में आम आदमी

छत्तीसगढ़ प्रदेश कांगे्रस कमेटी के नेतृत्व में देश में बढ़ती महंगाई, राज्य में बिजली दरों मेें वृद्धि, राशन कार्डों में गड़बड़ी, धान के समर्थन मूल्य में बढ़ोत्तरी एवं जनता के अन्य सवालों को लेकर कांगे्रस ने राजधानी में जंगी प्रदर्शन किया। इन मुद्दों पर मुख्यमंत्री के घेराव का पूर्व घोषित संकल्प था और जैसा कि स्वाभाविक था, पुलिस की चाक-चौबंद व्यवस्था के चलते यह घेराव हो नहीं सकता था। यानी मुख्यमंत्री के घेराव की घोषणा औपचारिक मात्र थी। मकसद था जनता से सम्बद्ध सवालों को जोर-शोर से उठाना ताकि उसका सकारात्मक संदेश जाए तथा निष्क्रियता के आरोप एवं चुनाव में पराजय की हताशा से पीछा छूटे। लेकिन क्या ऐसा हो पाया? क्या संगठन के सभी गुटोें ने सरकार के खिलाफ मोर्चे में एकजुटता का परिचय दिया? और क्या इस आंदोलन का आम लोगों पर कोई असर हुआ?
            दरअसल यह एक राजनीतिक पार्टी का राजनीतिक आंदोलन था जिसमें आम आदमी गायब था। राजनीतिक आंदोलन, धरना प्रदर्शन, रैली अमूमन इसी तरह हुआ करते हैं, अपनी ताकत दिखाने के लिए जिसके पीछे मूल भावना राजनीतिक लाभ उठाने, कार्यकर्ताओं में जोश भरने तथा उनकी सक्रियता बनाए रखने के लिए होती है। ऐसे आंदोलन का जनता से सरोकार तो होता है पर इसमें जनता की भागीदारी नहीं होती इसीलिए वे प्राय: परिणाममूलक नहीं होते यानी जनता को इससे कोई सीधा फायदा नहीं पहुंचता, कोई राहत नहीं मिलती। प्रदेश कांग्रेस का 01 जुलाई को प्रदेशव्यापी आंदोलन भी इसी तरह का आंदोलन था जिसमें कार्यकर्ताओं की भीड़ तो थी पर इसमें आम लोगों को शामिल नहीं किया गया था। लिहाजा परंपरागत रूप से पार्टी के पिछले आंदोलनों की कड़ी में एक कड़ी और जुड़ गई। परिणाम की चिंता पार्टी को नहीं थी। उसे लगता है, आंदोलन के जरिए जनता के प्रति राजनीतिक धर्म का उसने निर्वाह कर दिया है।
     फिर ऐसे आंदोलन से फायदा क्या? क्या राजनीतिक आंदोलन जनआंदोलन में तब्दील नहीं हो सकते? देश में ऐसे अनेक आंदोलन हुए हैं जिनकी शुरूआत राजनीति की  बुनियाद पर हुई पर बाद में वे लोक आंदोलन के रूप में तब्दील हुए। लेकिन छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के आंदोलन की बात करें तो ऐसा कुछ नजर नहीं आता। यदि वास्तव में जनता के लिए लड़ाई लड़नी है तो उसमें जन क्यों नहीं होना चाहिए? उसमें निरंतरता क्यों नहीं होनी चाहिए? उसे परिणाम मूलक क्यों नहीं बनाना चाहिए? अण्णा हजारे के आंदोलनों की ताकत क्या किसी से छिपी हुई है? क्या उन्होंने अपने अनेक आंदोलनों को परिणाम मूलक नहीं बनाया? क्या पिछले वर्ष नई दिल्ली में जनलोकपाल विधेयक को लेकर उनके द्वारा किया गया आंदोलन कोई भूल सकता है? क्या उसमें विशाल जनभागीदारी एवं उसकी ताकत के आगे केन्द्र सरकार झुकने मजबूर नहीं हुई? यानी आंदोलनकारी चाहे व्यक्ति हो या संगठन, स्थितियां बदल सकता है, सकारात्मक नतीजे ला सकता है। बशर्ते ऐसी सोच के साथ आगे बढेÞ। प्रदेश कांगे्रस ने यकीनन जनता के प्रासंगिक मुद्दे उठाए। महंगाई से निम्न-मध्यम एवं गरीब वर्ग बेहद त्रस्त हैं। उन्हें राहत चाहिए, फौरी राहत। देश एवं प्रदेश में कांग्रेस विपक्ष की भूमिका में है इसलिए जनता के पक्ष में खड़े होने के लिए उसके पास अच्छा मौका है। सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य जैसी प्राथमिक किन्तु अत्यंत महत्वपूर्ण  समस्याओं के समाधान के लिए वह राज्य सरकार पर वांछित दबाव क्यों नहीं डाल सकती? बिजली दरों में वृद्धि के खिलाफ पार्टी ने पहले भी आंदोलन किए पर क्या कोई नतीजा निकला? क्या बढ़ी दरें घटी? नहीं घटी तो ऐसे आंदोलनों से आम जनता को फायदा क्या हुआ? क्या विपक्ष के रूप में पार्टी ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया? जाहिर है आंदोलनों का उद्देश्य जनता के बीच केवल अपनी छवि बनाने तक सीमित है ताकि चुनावों में उसे इसका राजनीतिक लाभ मिल सके। कांग्रेस के एक जुलाई के प्रदेश व्यापी आंदोलन से भी यही अर्थ ध्वनित होता है?
                जहां तक संगठन की ताकत का सवाल है, वह गुटीय द्वंद के कारण विभाजित है। इसका प्रदर्शन इस आंदोलन में भी हुआ। स्वयं पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी एवं उनका पूरा गुट गायब रहा। क्या यह कृत्य अनुशासनहीनता के दायरे में नहीं है? हल्ला बोल में भी पालिटिक्स? क्या गुटीय हित पार्टी हित से भी प्रबल है? स्पष्ट है पिछली तमाम पराजयों के बावजूद कांग्रेस ने कोई सबक नहीं लिया, अपना चरित्र नहीं बदला? ऐसे में कोई आंदोलन सफल कैसे हो सकता है? पार्टी 1 जुलाई के आंदोलन की सफलता का भले ही दावा करे, वास्तविकता यह है जनता ने इसका कोई नोटिस नहीं लिया वरन जगह-जगह सड़कों के जाम रहने एवं रास्ता रोके जाने की वजह से उसे परेशान ही होना पड़ा। आंदोलन फ्लाप रहा।

   

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