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दिल्ली पर निगाहें

पांच राज्य विधानसभा के चुनावों में दिल्ली का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। देश की निगाहें इस चुनाव पर इसलिए टिकी हुई हैं क्योंकि पहली बार राजधानी में त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बनी है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी की पार्टी का मुकाबला दो स्थापित राष्ट्रीय दल कांग्रेस एवं भाजपा से है। 70 सीटों के इस चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा, कहा नहीं जा सकता अलबत्ता तीनों पार्टियां बहुमत का दावा कर रही हैं। नक्शा 8 दिसम्बर को साफ हो जाएगा जब मतपेटियों से जनता का फैसला बाहर आएगा। इसमें दो राय नहीं है कि चुनाव प्रचार के दौरान केजरीवाल की पार्टी ने बड़ा दम-खम दिखाया है। स्थानीय मुद्दों को लेकर वह दिल्ली की जनता को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करती करी है कि कांग्रेस अथवा भाजपा के राज में उसका भला नहीं होने वाला। इसमें भी दोय राय नहीं कि आम आदमी की पार्टी ने लोगों के दिलों को झंझोड़ा है और वे उसकी ओर आकर्षित हुए हैं। लेकिन यह आकर्षण उसे सत्ता तक पहुंचा पाएगा अथवा नहीं, कहना कठिन है पर यह भी स्पष्ट है कि उसने एक तीसरी ताकत के रूप में दिल्ली में अपनी धमक बनाई है। पार्टी ने चूंकि शून्य से शुरुआत की है इसलिए उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है अलबत्ता उसे चुनाव में जो कुछ भी हासिल होगा, वह उसे कम से कम दिल्ली की राजनीति में जरूर स्थापित करेगा। कहा जा सकता है कि वह भविष्य की पार्टी है जो कांग्रेस एवं भाजपा के साथ खड़ी नजर आएगी।  अभी तो उसने अपनी मौजूदगी से दोनों को हलाकार कर रखा है। दोनों चिंतित एवं सशंकित हैं। चूंकि दिल्ली में भारी मतदान हुआ है इसलिए नतीजे चौंकाने वाले आ सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो वह राजधानी की राजनीति में ने बदलाव का संकेत होगा।

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