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रास्ता तो खुला पर है अंधेरा

लोकसभा चुनाव की खबरों की भीड़ में एक खबर दबकर रह गई जबकि वह बेहद महत्वपूर्ण थी। बीबीसी हिन्दी सेवा ने 5 अप्रैल 2014 को एक खबर प्रसारित की जिसमें कहा गया था कि माओवादी कुछ शर्तों के साथ सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं। संगठन की केन्द्रीय कमेटी के प्रवक्ता अभय के हवाले से कहा गया कि वार्ता सचमुच की शांति के लिए और ईमानदारी के साथ होनी चाहिए लेकिन इसके लिए जेल में बंद वरिष्ठ नेताओं को रिहा करना होगा ताकि वार्ता के लिए माओवादियों की तरफ से प्रतिनिधिमंडल का गठन किया जा सके। चूंकि सेन्ट्रल कमेटी के प्रवक्ता अभय के साक्षात्कार के रूप में यह बयान जारी हुआ है लिहाजा इसमें संदेह की गुंजाइश नहीं है और यह माना जाना चाहिए कि पार्टी बातचीत के लिए वाकई तैयार है। यह सुखद है। इसे नक्सल समस्या के समाधान की दिशा में एक नई पहल के रूप में देखा जा सकता है।

तीन वर्ष पूर्व, 1 जुलाई 2010 को 58 वर्षीय चेरिकुटि राजकुमार उर्फ आज़ाद के कथित इनकाउंटर में मारे जाने के बाद यह पहला मौका है जब माओवादियों की तरफ से वार्ता के लिए पहल की गई हो। सीपीआई (माओवादी) सेन्ट्रल कमेटी के प्रवक्ता एवं पोलित ब्यूरो के सदस्य आज़ाद वह शख्स था जिसके प्रयासों एवं मध्यस्थता की वजह से केन्द्र सरकार और माओवादियों के बीच वर्षों से जमी बर्फ पिघल रही थी और वार्ता के लिए वातावरण बन रहा था। इसके पूर्व नई दिल्ली में नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक के बाद तत्कालीन गृहमंत्री पी.चिदम्बरम ने 9 फरवरी 2010 को अपने एक बयान में कहा था कि यदि नक्सली हिंसा छोड़ते हैं तो सरकार किसी भी मुद्दे पर उनसे बातचीत के लिए तैयार हैं लेकिन बाद के बयानों में चिदंबरम ने यह भी कहा था कि यदि नक्सली हिंसा जारी रही तो सरकार का आपरेशन भी जारी रहेगा। छत्तीसगढ़ सहित नक्सल प्रभावित राज्यों में आपरेशन ग्रीन हंट पूरे शबाब पर था तथा तमाम हिंसक वारदातों के बावजूद नक्सली बैकफुट पर नज़र आ रहे थे। लेकिन हिंसा और प्रतिहिंसा के उस दौर में भी केन्द्र सरकार ने वार्ता के लिए दरवाजे खुले रखे। हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में शामिल होने की गृहमंत्री की नक्सलियों से अपील पर अपील का यह नतीजा निकला कि एक सिलसिला शुरु हुआ, कुछ शर्तें एक-दूसरे के सामने रखीं गईं। माओवादियों की प्रमुख शर्त यह थी कि आपरेशन ग्रीन हंट तत्काल बंद किया जाए तथा अर्द्धसैनिक बलों को अपने बैरकों में लौटने के निर्देश दिए जाएं जबकि केन्द्र सरकार चाहती थी कि नक्सली हिंसा बंद करें और हथियार डालें तथा उसके बाद ही वार्ता जैसी कोई चीज संभव होगी। सार्वजनिक रूप से जारी किए गए पत्रों एवं बयानों के बीच वार्ता की दिशा में आगे बढ़ा जा रहा था कि इस बीच आज़ाद की गिरफ्तारी एवं आंध्रप्रदेश के जंगलों में उसके मारे जाने की घटना से नक्सली बिफर गए और वार्ता की सारी संभावनाएं खत्म हो गईं। तब से लेकर अब तक न तो केन्द्र एवं छत्तीसगढ़ सहित नक्सल प्रभावित राज्यों की ओर से बातचीत के लिए वातावरण बनाने की कोशिश की गई और न ही माओवादियों ने ऐसा कोई इरादा जाहिर किया। लेकिन माओवादियों के प्रवक्ता के हालिया बयान से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि माओवादी बातचीत के लिए राजी हैं लेकिन उनकी अपनी कुछ शर्तें हैं। माओवादी प्रवक्ता अभय के बयान को केन्द्र ने कितनी गंभीरता से लिया, फिलहाल इसके कोई संकेत नहीं मिले हैं लेकिन यह खबर मीडिया में भी दबकर रह गई और किसी छोर से कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। यह संभव है लोकसभा चुनाव के बाद नई सरकार इसे संज्ञान में ले या यह भी संभव है कोई प्रतिक्रिया न दें।
दरअसल माओवादी प्रवक्ता के बयान में कुछ बातें ऐसी हैं जिसे स्वीकार करना किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए नामुमकिन है। मसलन अभय का कहना है- ‘‘शांतिवार्ता के लिए जरूरी है कि सरकार माओवादियों के आंदोलन को देश के लोगों का आंदोलन, एक आंतरिक संघर्ष और गृहयुद्ध के रूप में स्वीकार करें। तब कहीं जाकर वार्ता के जरिए बुनियादी मुद्दों को सुलझाया जा सकेगा ताकि गृहयुद्ध खत्म हो जाए।’’ माओवादी प्रवक्ता के इस बयान को कैसे स्वीकार किया जा सकता है? नक्सलियों के द्वारा की गई हिंसा को जिसमें पुलिस, अर्द्धसैनिक बलों के जवानों एवं निरपराध नागरिक बड़ी संख्या में मारे गए हैं और यह दौर अभी भी जारी है, को कैसे जनआंदोलन कह सकते हैं? क्या इसे आंतरिक संघर्ष और गृहयुद्ध कहा जाएगा? क्या लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान होता है? यकीनन जिनके लिए लोकतंत्र के मायने अलग हैंऔर जो अधिनायकवादी हैं, वे ही ऐसा कह सकते हैं? चूंकि हिंसा के जरिए बदलाव माओवादियों की सोच है इसीलिए वे अपने अभियान को जनआंदोलन अथवा गृहयुद्ध की संज्ञा दे सकते हैं और दे रहे हैं। उनकी ऐसी सोच के साथ इत्तफाक रखना लोकतांत्रिक सरकार के लिए संभव नहीं है इसलिए इस बयान को स्वीकार करने का प्रश्न ही नहीं है। यानी अगर इसी मुद्दे पर वार्ता की संभावना टिकी हुई हैं, तो इसे खत्म समझना चाहिए।

माओवादी प्रवक्ता के बयान के अगले हिस्से में कहा गया है कि सरकार को चाहिए कि वह माओवादी आंदोलन को एक राजनीतिक आंदोलन के रूप में स्वीकार करें। माओवादियों के इस विचार को भी स्वीकार करना केन्द्र के लिए संभव नहीं है क्योंकि माओवादी आंदोलन राजनीतिक नहीं हिंसक आंदोलन है और राजनीति और लोकतंत्र से इसका कोई सरोकार नहीं है। यदि यह राजनीतिक आंदोलन होता तो माओवादी एवं इस विचारधारा के समर्थक लोकतंत्र की हिमायत करते हुए देश की मुख्यधारा में शामिल होते। नेपाल के माओवादियों की तरह वे भी चुनाव लड़कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनते पर पिछले 40-45 बरस में ऐसा कोई मौका नहीं आया जब उनके विचारों में कोई तब्दीली आई हो और उन्होंने चुनाव लड़ने का इरादा जाहिर किया हो। ऐसी स्थिति में उनका आंदोलन राजनीतिक आंदोलन कैसे हो सकता है? हालांकि संगठन का कहना है कि उनके आंदोलन का मुख्य एजेंडा है- लोकतंत्र, भूमि सुधार के साथ-साथ कृषि और अर्थव्यवस्था के विकास का आत्मनिर्भर मॉडल का निर्माण ताकि देश के विकास के लिए शांति का लम्बा दौर चले। माओवादियों के इस विचार पर असहमति का प्रश्न नहीं है लेकिन उनके विचार और कर्म दो विपरीत ध्रुव पर खडेÞ नज़र आते हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर सहित नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास को हिंसा के जरिए रोकने की सैकड़ों घटनाएं इसकी साक्षी हैं। यानी लोकतंत्र, विकास एवं भूमि सुधार की दुहाई देना अलग बात है और इस पर अमल करना अलग बात।

माओवादी प्रवक्ता के बयान में आगे कहा गया है- ‘‘सरकार हमारे संगठन पर से प्रतिबंध हटाएं तथा जेलों में बंद वरिष्ठ नेताओं को या तो जमानत पर रिहा किया जाए या मामले हटा लिए जाएं ताकि वार्ता के लिए ये नेता माओवादियों की ओर से प्रतिनिधियों के चयन में मदद कर सकें। अगर सरकार हमारी पेशकश स्वीकार कर शांति-वार्ता के लिए अनुकूल माहौल तैयार कर लेती है तो हम उसमें शामिल होंगे।’’ जहां तक इस पेशकश का सवाल है, केन्द्र इसे स्वीकार कर सकती है लेकिन पूरी तसल्ली के बाद। दरअसल भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) पर लागू प्रतिबंध तभी हटाया जा सकेगा जब संगठन अपने आप को हिंसा से पूरी तरह अलग करें। जेलों में बंद वरिष्ठ नेताओं की जमानत पर रिहाई या मामले वापस लेने का मामला समीक्षा के बाद ही आगे बढ़ सकता है पर यही लंबी कानूनी प्रक्रिया है हालांकि छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा के सिलसिले में जेलों में बंद विचाराधीन बंदियों जिनमें अधिकांश आदिवासी हैं, की रिहाई के लिए पहल हुई तथा अनेक मामले वापस भी लिए गए। लेकिन इसके पूर्व शासन के स्तर पर गठित उच्च स्तरीय समिति ने पहले मामलों की समीक्षा की। केन्द्र के स्तर पर भी ऐसी पहल की जा सकती है बशर्ते इस बात की गारंटी होनी चाहिए कि माओवादी सचमुच वार्ता के इच्छुक हों तथा उसके अनुकूल आचरण करें।

बहरहाल वार्ता के लिए माओवादी प्रवक्ता अभय के विचारों को देखते हुए यह मुश्किल ही है कि बात आगे बढ़ पाएगी। दरअसल यदि माओवादियों को सरकार की नीयत पर शक है तो सरकार को भी उनके इरादे पर संदेह है। ऐसा इसलिए क्योंकि माओवादी प्रवक्ता ने अपने बयान में हिंसक आंदोलन को जनआंदोलन, राजनीतिक आंदोलन, गृहयुद्ध, आंतरिक संघर्ष जैसे लफ्ज़ों का इस्तेमाल किया है। जबकि वार्ता के नाम पर उनके उपयोग की कतई जरुरत नहीं थी। बेहतर होता यदि सीधे-सादे शब्दों में वार्ता की मंशा प्रकट की जाती। यह ठीक है, वार्ता के लिए वातावरण बनाने की दृष्टि से दोनों पक्षों की ओर से कुछ शर्तें स्वाभाविक हैं जिनमें प्रमुख है- माओवादियों का हिंसा से तौैबा करते हुए हथियार डालना तथा सरकार की ओर से आपरेशन ग्रीन हंट को तब तक बंद रखना जब तक शांतिवार्ता मुकम्मल न हो जाए। यकीनन यह आपसी विश्वास का प्रश्न है तथा बगैर विश्वास के इस दिशा में आगे नहीं बढ़ा जा सकता। फिलहाल केवल एक बात जरूर अच्छी हुई है कि माओवादियों ने बातचीत की इच्छा जाहिर की है। इससे कुछ तो उम्मीद बंधती है। संभव है इस दिशा में आगे प्रगति हो। अगर ऐसा हुआ तो नक्सल समस्या के् समाधान का मार्ग प्रशस्त होगा।

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