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दावे हैं, दावों का क्या

मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह कई बार यह कह चुके हैं कि लोकसभा चुनाव में भाजपा छत्तीसगढ़ की सभी 11 सीटें जीतेंगी। उन्होंने ऐसा विश्वास नरेन्द्र मोदी के छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान भी व्यक्त किया है। हाल ही में नई दिल्ली की दूरदर्शन टीम को दिए गए एक साक्षात्कार में भी मुख्यमंत्री ने कहा कि भाजपा के मिशन 272 के लक्ष्य को पूरा करने में छत्तीसगढ़ का शत-प्रतिशत योगदान रहेगा। उनका मानना है कि लोकसभा चुनाव में राज्य में भाजपा सरकार का दस वर्ष का कामकाज और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी के नाम का प्रभाव जबर्दस्त है और निश्चितत: इसके सकारात्मक परिणाम आएंगे। अब सवाल उठता है कि मुख्यमंत्री के इस विश्वास के पीछे ठोस वजह क्या है? क्या दस साल के कथित सुशासन के अलावा पिछले दो लोकसभा चुनावों एवं राज्य विधानसभा चुनाव में पार्टी का शानदार प्रदर्शन एवं जमीनी पकड़ प्रमुख कारण हैं या मुख्यमंत्री अतिआत्मविश्वास के शिकार हैं? सन् 2009 के लोकसभा चुनाव में रमन के नेतृत्व में पार्टी ने राज्य की 11 में से 10 सीटें जीती थीं। केवल एक सीट कोरबा, कांग्रेस के खाते में गई। अब मुख्यमंत्री कोरबा को भी अपने खाते में डाल रहे हैं जहां से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में केन्द्रीय मंत्री चरणदास महंत चुनाव लड़ रहे हैं। मुख्यमंत्री की सोच के मुताबिक वे भी चुनाव हार रहे हैं। क्या सचमुच ऐसा होने वाला है? क्या महासमुंद से अजीत जोगी जैसे धुरंधर भी चुनाव हार जाएंगे? अगर ऐसा हुआ तो यकीनन यह चमत्कार होगा। लेकिन अगर ऐसा न हुआ तो इसे क्या कहा जाए? क्या मुख्यमंत्री सभी सीटों पर जीत का दावा करके रस्म अदायगी कर रहे हैं? या कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने ऐसा कहा जा रहा है जबकि वास्तविकता कुछ और है? दरअसल पार्टी का प्रदेश नेतृत्व भी इस तथ्य से बेखबर नहीं है कि इस बार के चुनाव, पिछले चुनाव के मुकाबले ज्यादा कठिन एवं संघर्षपूर्ण है। कुछ सीटों मसलन महासमुंद, दुर्ग, बस्तर, कांकेर, सरगुजा, रायगढ़ और रायपुर में कांग्रेस भाजपा को कड़ी टक्कर दे रही है। रायगढ़, राजनांदगांव, और बिलासपुर पार्टी की बेफिक्री वाली सीटें मानी जा रही हैं। दूसरे अर्थ में राज्य की अधिकांश सीटें कड़े मुकाबले में फंसी हुई हैं। इस स्थिति में मुख्यमंत्री का सभी सीटें जीतने का दावा धराशायी होता नज़र आ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार महासमुंद, सरगुजा, दुर्ग एवं कोरबा कांग्रेस के खाते में जाती दिख रही है। यानी यह लगभग निश्चित है कि भाजपा सन् 2004 एवं 2009 के लोकसभा चुनावों के परिणामों को नहीं दोहरा पाएगी।

प्रदेश में इस बार लोकसभा चुनाव के रंग भी कुछ अलग हैं। देशभर में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की हिन्दीभाषी प्रदेशों में आंधी चल रही है लेकिन छत्तीसगढ़ अछूता है। हालांकि मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह एवं भाजपा के नेता इस तथ्य को स्वीकार नहीं करते लेकिन प्रदेश में भाजपा के पक्ष में मोदी लहर जैसा कुछ नहीं है। पार्टी ने यद्यपि अभी अपना चुनाव घोषणा पत्र जारी नहीं किया है किंतु केन्द्र में यूपीए सरकार की हर मोर्चे पर विफलता, महंगाई एवं भ्रष्टाचार उसका प्रमुख मुद्दा है जिसे नरेन्द्र मोदी सहित सभी स्टार प्रचारक भुनाने में लगे हुए हैं। दूसरी ओर कांग्रेस का चुनाव घोषणा पत्र पिछले महीने, 26 मार्च को नई दिल्ली में जारी किया गया। ‘आपकी आवाज, हमारा संकल्प’ नाम से जारी घोषणा पत्र में कांग्रेस ने देश के मतदाताओं को लुभाने बड़े-बड़े वादे किये हैं। मसलन 5 साल में 10 करोड़ युवाओं को प्रशिक्षण एवं रोजगार के अवसर, स्वास्थ्य सुविधाओं एवं आवास का अधिकार, बुजुर्गों एवं शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए सावधि पेंशन योजना, शहरों में रहने वाले झुग्गी-झोपड़ियों को 2017 तक पक्के मकान और सन् 2020 तक 10 करोड़ नए रोजगार का सृजन। इन लोकलुभावन संकल्पों से आम मतदाताओं को अवगत कराने की मुख्य जिम्मेदारी पार्टी कार्यकर्ताओं एवं प्रत्याशियों की है किंतु यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि पार्टीजन और प्रत्याशी घोषणापत्र का न तो महत्व को समझ पा रहे हैं न ही उसके प्रस्तावों से पूर्णत: अवगत हैं। यही कारण है कि कांग्रेस प्रत्याशियों के जनसम्पर्क अभियान एवं सभाओं  में घोषणापत्र के संकल्पों का जिक्र या तो होता ही नहीं है या होता भी है तो सतही तौर पर। दोनों पार्टियों के प्रत्याशियों का पूरा जोर केवल आरोप-प्रत्यारोप पर है।

पूर्व लोकसभा चुनावों की तुलना में इस बार प्रत्याशियों का प्रचार स्थानीय स्तर पर सिमटकर रह गया है। आमतौर पर लोकसभा चुनावों में राष्ट्रीय मुद्दों पर बात की जाती है। प्रादेशिक एवं स्थानीय मुद्दे भी होते हैं लेकिन इस बार प्रचार में स्थानीयता हावी है और यह ठीक भी है। लेकिन राज्य के मतदाता जानना चाहते हैं कि पिछले चुनावों में निर्वाचित सांसदों ने क्षेत्र के विकास के लिए क्या किया? रायपुर लोकसभा से 6 बार चुने गए भाजपा सांसद रमेश बैस, प्रदेशाध्यक्ष विष्णुदेव साय, दिनेश कश्यप तथा एक से अधिक बार चुने गए अन्य सांसदों ने क्या कुछ ऐसा किया है जिससे जनता को राहत मिली हो, उन्हें सुविधाएं मिली हों, उन्हें रोजगार मिलता हो, या नए उद्योग-धंधे खुले हों? या पेयजल, ग्रामीण स्वास्थ्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने योगदान दिया हो या छत्तीसगढ़ में रेल यातायात की सुविधाएं बढ़ाने में केन्द्र पर दबाव बनाने में कामयाब हुए हों? या नक्सलवाद से निपटने सार्थक पहल की हो? दरअसल सांसद के रूप में किसी के खाते में कोई उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं हैं। और तो और सांसद निधि के तहत मिलने वाली करोड़ों रुपए की राशि का सदुपयोग नहीं हुआ तथा अपनों को उपकृत किया गया। ये सारे सवाल मतदाताओं को मथ रहे हैं। लेकिन वे खामोश हैं। यह प्रत्याशियों के लिए राहत की बात है कि छत्तीसगढ़ के मतदाता कोई जवाब-तलब नहीं कर रहे हैं। यदि जवाब-तलब का दौर शुरू हो जाए तो वे मुश्किल में पड़ जाएंगे। बहरहाल आमतौर पर राज्य में ऐसी घटनाएं काफी कम होती हैं जब चुनाव प्रचार के दौरान प्रतिरोध की वजह से प्रत्याशियों को उल्टे पैर लौटना पड़ता हो। चूंकि सांसद निष्क्रिय हैं इसलिए स्थानीय मुद्दे भी मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर पा रहे हैं। वे फिलहाल उदासीन बने हुए हैं। उनकी उदासीनता मतदान के दिन किस तरह टूटेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता है अलबत्ता यह निश्चित प्रतीत होता है कि डॉ.रमन सिंह का सभी 11 सीटें जीतने का सपना पूरा होता नहीं दिख रहा है।

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