ऐसे में बेहतर था कार्यक्रम न होता

संदर्भ: मुक्तिबोध की 50वीं पुण्यतिथि

- दिवाकर मुक्तिबोध 
 देश के शीर्षस्थ कवि श्री विनोद कुमार शुक्ल की 75वीं वर्षगांठ मनाने क्या सरकारी आयोजन की दरकार है? वैसे शुक्ल पिछले वर्ष ही अपना 75वां पूरा कर चुके हैं। उन्हें इष्टमित्रों से जन्मदिन की बधाईयां भी मिलीं और छोटे-मोटे कार्यक्रम भी हुए। अब इसे समारोहपूर्वक मनाने की बात सामने आई है। विभिन्न क्षेत्रों में सुविख्यात एवं कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के अंतर्गत गठित हिन्द स्वराज शोध पीठ के अध्यक्ष कनक तिवारी ने राज्य शासन से अपील की है कि 15 जनवरी 2015 को राज्य सरकार एक वृहद कार्यक्रम आयोजित करके शुक्ल के जन्मदिन का सम्मान करें। 20 सितंबर को राजनांदगांव में स्व. गजानन माधव मुक्तिबोध की 50वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में कनक तिवारी ने मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से यह अपील की। संस्कृति विभाग के इस कार्यक्रम में संस्कृति मंत्री अजय चंद्राकर, स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल, लोक निर्माण मंत्री राजेश मूणत के अलावा स्वयं श्री विनोद कुमार शुक्ल भी मंच पर मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन करते हुए कनक तिवारी ने कहा कि चूंकि वे (तिवारी) पिछले वर्ष भयंकर हृदयाघात से पीड़ित थे अत: शुक्ल की हीरक जयंती शानदार ढंग से मनाई नहीं जा सकी। चूंकि विनोद कुमार जी देश के शीर्षस्थ कवियों में से एक है तथा मुक्तिबोध की परंपरा के प्रथम ध्वजवाहक हैं अत: राज्य सरकार को उनका जन्मदिन कायदे से एक; भव्य कार्यक्रम के जरिए मनाना चाहिए। कनक तिवारी की इस अपील पर मुख्यमंत्री ने सीधी स्वीकारोक्ति न करते हुए गेंद संस्कृति मंत्री अजय चंद्राकर एवं कनक तिवारी के पाले में डाल दी। चूंकि विनोद कुमार शुक्ल मंचस्थ थे अत: वे अपनी ओर से इस प्रस्ताव पर कोई टिप्पणी नहीं कर सके। जबकि यह जानना जरुरी है कि वे ऐसा चाहते हैं अथवा नहीं। वैचारिक विभिन्नताओं के चलते यह कोई आवश्यक नहीं है कि हर साहित्यिक कवि या कलाकार सरकार का कोई ऐसा आतिथ्य स्वीकार करें। छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है और कवि विनोद कुमार शुक्ल कम से कम दक्षिणपंथी विचारधारा के तो नहीं ही हैं। इसीलिए उनकी राय जानना जरुरी है कि राज्य सरकार की पेशकश, बशर्ते वह की जाए, उन्हें मंजूर होगी अथवा नहीं। वैसे रमन सिंह सरकार ने मानवतावादी एवं वामपंथी विचारधारा के कवि मुक्तिबोध की 50वीं वर्षगांठ उनके कर्म क्षेत्र राजनांदगांव में मनाकर विचारों का सम्मान करने की जो पहल की, वह स्वागत योग्य है। यह अलग बात है कि राजनांदगांव में संस्कृति विभाग का यह कार्यक्रम सुपर फ्लाप रहा। 20 सितंबर को शहर में लगभग दिनभर हुई तेज बारिश को कोई बहाना नहीं बनाया जा सकता। दरअसल संस्कृृति विभाग ने यह आयोजन इतनी हड़बड़ी में किया कि निमंत्रण पत्रों पर उन प्रमुख वक्ताओं के नाम भी नहीं छापे जा सके जिन्हें कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था। पटना से प्रख्यात कवि अरुण कमल, सागर से युवा आलोचक पंकज चतुर्वेदी, भोपाल से सुधीर रंजन, रायगढ़ से प्रभात त्रिपाठी, रायपुर से विनोद कुमार शुक्ल एवं राजेन्द्र मिश्र, मुक्तिबोध पर केन्द्रित वैचारिक विमर्श एवं काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किए गए थे। जाहिर है अंतिम समय तक ये नाम तय नहीं हो पाए थे लिहाजा उन्हें कार्ड में स्थान नहीं मिला। चूंकि कार्यक्रम सुनियोजित नहीं था अत: वह स्तरीय भी नहीं बन पाया। दोपहर चार बजे उद्घाटन सत्र की यह हालत थी कि राज्य के तो छोड़िए राजनांदगांव के भी साहित्यकार, कलाधर्मी मौजूद नहीं थे। मुख्यमंत्री ने संबोधित किया दिग्विजय महाविद्यालय के प्राध्यापकों एवं छात्रों को जिनकी संख्या अत्यल्प थी। सुबह के कार्यक्रम में वर्षा ने बाधा डाली, कनात उखड़ गए, सभा स्थल पर पानी भर गया और पूरी विचार गोष्ठी चौपट हो गई। शाम के कार्यक्रम में खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय द्वारा तैयार की गई ‘अंधेरे में’ की नाट्य प्रस्तुति देखने के लिए इने-गिने लोग मौजूद थे। सोचा जा सकता है कि लोगों की इस कदर कम उपस्थिति से आमंत्रित वक्ता एवं कलाकार कितने मायूस हुए होंगे। सवाल उठता है कि क्या कार्यक्रम को जानबूझकर फ्लाप किया गया? यह आशंका इसलिए है कि राज्य सरकार को राज्य गठन के बीते 13 वर्षों में यह याद नहीं आया कि मुक्तिबोध छत्तीसगढ़ के हंै तथा उनके लेखन का सर्वोत्तम समय इस राज्य में बीता है। उनके नाम पर एक-दो फुटकर आयोजनों के अलावा ऐसा कोई काम नहीं हुआ जो चिरस्थायी हो। राजनांदगांव के ‘त्रिवेणी’ को हम इसलिए नहीं कह सकते क्योंकि यह अकेले मुक्तिबोधजी का स्मारक नहीं है, साथ में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी एवं बलदेव प्रसाद मिश्र भी है। इस एक मात्र यादगार के अलावा उनके नाम पर न तो किसी विश्वविद्यालय में शोध पीठ है और न ही उनके साहित्य के अनुशीलन की पहल हुई है। हालांकि राज्य के विश्वविद्यालयों में साहित्य, पत्रकारिता और संस्कृति के उन्नयन के नाम पर गठित तमाम शोध पीठ सफेद हाथी साबित हुए हैं। इसी संदर्भ में एक बात और स्मरणीय है कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने सन् 2008 में मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कहानी ‘ब्रम्हराक्षस का शिष्य’ के फिल्मांकन को मंजूरी दी थी किन्तु यह मंजूरी राजनीति के भंवरजाल में ऐसी फंसी कि निकल ही नहीं सकी। ऐसी स्थिति में यह सोचना स्वाभाविक है कि क्या राजनांदगांव का आयोजन औपचारिकता को निभाने के लिए किया गया? यह बिना सोचे-समझे, बिना किसी तैयारी के इसलिए कर दिया गया क्योंकि स्वर्गीय कवि को देशभर की साहित्यिक बिरादरी उनकी 50वीं पुण्यतिथि पर शिद्दत से याद कर रही है। यदि सचमुच प्रतिष्ठा के अनुरुप कार्यक्रम आयोजित करने की सरकार की मंशा थी तो बेहतर होता समय लेकर, पूरी तैयारी के साथ आयोजन किया जाता जिसमें शहर एवं राज्य के साहित्यप्रेमियों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाती। पिछले कुछ कार्यक्रमों एवं राजनांदगांव के कार्यक्रम को देखकर ऐसा लगता है कि संस्कृति विभाग बहुत हड़बड़ी में है तथा वह आनन-फानन में राज्य में सांस्कृतिक क्रांति लाना चाहता है। पर जाहिर है कला एवं संस्कृति का उन्नयन इस तरह नहीं होता। 
           अब फिर लौटते है, उद्घाटन समारोह पर। 1 जनवरी 1937 को राजनांदगांव में जन्मे शुक्ल अगले वर्ष 77 के हो जाएंगे। अत: उनके 77 वें को समारोहपूर्वक मनाने में किसे क्या आपत्ति हो सकती है? लेकिन क्या यह जरुरी है कि मंच से संस्कृति मंत्री और सरकार की तारीफ के कसीदे काढ़ते हुए कवि का जन्मदिन मनाने सरकार से याचना की जाए? क्या राजधानी रायपुर एवं राज्य के साहित्यकार, साहित्यप्रेमी, संस्कृति कर्मी, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक संस्थाएं इतनी समर्थ नहीं है कि वे अपने बीच के महाकवि की वर्षगांठ मना सके? सरकार खुद होकर पहल करे तो बात अलग है पर यह तो सरकार के आगे झोली फैलाने जैसी बात है? क्या विनोद कुमार शुक्ल जैसे संवेदनशील व्यक्ति को इस ‘याचना’ से धक्का नहीं लगा होगा? मंच पर मौजूद वे संकोच से गड़ नहीं गए होंगे? क्या संचालक ने सरकार से निवेदन करने के पूर्व उनकी रजामंदी ली थी? यकीनन ऐसा कुछ नहीं हुआ होगा। निश्चय ही इसे कवि पर एकाधिकार जताने एवं सत्ता के साथ नजदीकियां गांठने की कवायद के रूप में देखा जा सकता है।

Comments

  1. no comments ..
    there are certain things not to be told but to be realised ..

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