कविताएं

यों कविताएं मैं नहीं लिखा करता। न पढ़ने में बहुत रूचि है और लिखने का तो प्रश्न ही नहीं। लेकिन जिंदगी के दौर में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जब कविता खुद-ब-खुद अपना रास्ता ढूंढ लेती हैं। कुछ ऐसा ही हुआ। अलग-अलग समय में पता नहीं कैसे मैने दो-चार कविताएं लिख डाली। न किसी को दिखायी और न ही उन्हे छपने योग्य माना। सालों बाद एक दिन कागजों के ढेर को अलटते-पलटते ये कविताएं हाथ लगीं। सोचा और कहीं न सही, इन्हे अपने फेसबुक वॉल पर डाल दूं। सो देख लीजिए। शायद पसंद आ जाए।
--------------------------------------------------------------------------------------
अपने सूरज के लिए
.................................

नंगे, भूखे, बेसहारों
नियति को
अब तो ठोकर मारो
तुम्हारे सीने पर
उनका महल टिका है
अनंत काल से।
हिलना नहीं
हिलना नहीं
कानों में निरंतर
जहर घोलती आवाजें
और
खून की लकीरें खींचते
चाबुक
तुम्हारे हिलने का
उन्हे
कितना डर है
खुद तुम्हे नहीं मालूम।

गहरी-गहरी सांसें
लेने से अब
काम नहीं बनेगा
उठो
प्रयत्नपूर्वक उठो
वे तुम्हें
ठोकरों पर रख लेंगे
बस चले तो
तुम्हारी
एक-एक हड्डी गला देंगे
अपने सूरज के लिये

तुम्हारा घर
(बशर्ते तुम उसे घर कहो)
अंधेरे में
जुगनुओं से
रोशन होता है
छप्पर फाड़कर
झिलमिलाती रोशनी
तुम्हारे लिये
हर दिन
एक नया सूरज है
काश,
तुम उसे पहचानते।

आस-पास
चारों ओर
हवा के कण-कण में
बिखरे
सूरज के ये
अनगिनत चेहरे
विकराल
बेबस और कुरूप
दर्द की लकीरों का
सौन्दर्य समेटे
खामोशी को
आत्मसात किये
जिन्दगी में
हजार-हजार बार
मर रहे हैं।

जीने-मरने की
यह
उबा देने वाली पीड़ा
अपने सूरज को
पहचानने की
अंतिम कोशिश में
ठोकरों पर ठोकरें मार रही है
अपने सूरज को अब
उनकी हथेली पर
दे मारो
यही मौका है
जीने का
जिन्दगी बनाने का।

- दिवाकर मुक्तिबोध


*******************

मै कभी मर नहीं सकता
----------------

उंची उंची इमारतों एवं
टूटी-फूटी झोपड़ियों के
मध्य
जो
गहरी खाई है
क्रंदन और आहों से अटी हुई
उसमे मैं छिपा बैठा हूं
सदियों से
अपना सिर छिपाये
कछुए की तरह
खाल में- घुसा हुआ
अलमस्त

बाहर तलवारें चल रही हैं
हाहाकार मचा हुआ है
लोग चिल्ला रहे हैं
कलप रहे हैं
खिलखिला रहे हैं
पर मेरी पीठ मजबूत है
काफी मजबूत

सदियां बीत गयीं
चांद-सितारे अपनी जगह
अटल हैं
खाल से उठाकर
मैं उन्हे कनखियों से
निहार लेता हूं कभी-कभी
निश्चिन्त हो
फिर खाल में घुस जाता हूं
मुझे कोई फिक्र नहीं
सचमुच।
जब तक सिर पर यह
आसमान है
मै हूं, गरीबी है
अमीर हैं, गरीब हैं
फिर फिक्र किस बात की
तुम तकदीर नहीं बदल सकते
तुम्हारी कोशिश में दम नहीं
इस खाई को कौन
पाट सकता है
मै आश्वस्त हूं
मै कभी नहीं मर सकता।।

- दिवाकर मुक्तिबोध

***************

लौट आओ कामरेड
----------------------

सुनो कामरेड
उठो और लौट आओ
बस्तर के घन जंगलों से
तुम्हारा लौटना ही ठीक है
लौटोगे तो शेष जिंदगी
सांसों में बंधी रहेगी
अस्तित्व तुम्हारा जताती रहेगी
कि तुम कभी जिंदा थे
विचारों की दुनिया में
खूब जिंदा
देश-दुनिया में तुम-तुम थे
तुम्हारी आशाएं, आकांक्षाएं, महत्वाकांक्षाएं
मनुष्य को मनुष्य समझने में
समझाने में
तुम्हारा दिन तुम्हारी रात
केवल तुम-तुम
खौफ और आतंक से दूर
तुम्हारी पहिचान
तुम्हारी जिंदगी।
लेकिन इंसानी फितरत
विचारों पर सवार अविचार
सब तरफ सौदेबाज
लूट-खसोट
आदर्श और सिद्धांतों
का जाम पीते हुए
क्रांति की बातें
तुमने भी की।
है तुम्हे एहसास
40 बरसों में तुमने क्या खोया?
किस दुनिया में भटक रहे हो
क्या-क्या करते रहे हो
क्या तुम नहीं जानते?
एक दिन पेड़-पौधे भी नहीं पहिचानेंगे तुम्हे।
बातें नहीं करेंगे
दोस्ती नहीं दिखाएंगे
ढंक जाएगी
तुम्हारी देह
गिरे हुए पत्तों से
सूख जाएगी तुम्हारी देह
सूखे पत्तों सी
झर जाएगा तुम्हारा अस्तित्व
स्पर्श मात्र से
इसीलिए लौट आओ कामरेड
यदि कुछ सांसें चाहते हो
ताकि जिंदा रह सको
नई क्रांति के लिए
बंदूक की नली से नहीं
आदमीयत के भरोसे।

लोग पूछते हैं
सालों साल बस्तर में
तुमने क्या किया?
कैसे जिया, कितनों को दी जिंदगी
सरगुजा में तुम क्या करते रहे
क्यों अपनी देह पर
कांटे उगाते रहे
सीना छलनी करते रहे
तुमने कोशिश की
दरख्तों से शहद टपके
महुए की खुशबू
जीवन को खूब मदहोश करे
तुम्हारे अधनंगे दोस्त
अज्ञानता की गहरी कंदराओं
से बाहर निकले
चांद को देखें
सूरज देखें
नीले आकाश को छुए।
शोषण को मारे लात
शोषकों को धिक्कार।
लेकिन इसके लिए
नहीं चाहिए थी बंदूक
नहीं चाहिए था गोला-बारूद
इंद्रावती का स्नेहल स्पर्श
जीवन में मिठास घोलने काफी था
बशर्ते तुम
अपनी राह न बदलते।

लेकिन अब और नहीं कामरेड
तुम भटक गए हो
बहक गए हो
तुम्हारे सिद्धांत, तुम्हारे आदर्श
तुम्हारी कमजोर हथेलियां।
फिसल गए तुम
आतंक के हाथों तुम क्लीन बोल्ड हो गए
कितना दुर्भाग्य
कैसी विडम्बना।
सफर पर निकले थे
हमसफर तलाशने । कारवां बनाने।
निरपराध, मासूम जिंदगियां
तुम्हारे गले में
तख्तियां बनकर टंग गई।
कोर्ट में हांका लगा
मानवता के हात्यारों
हाजिर हों।

इसलिए कामरेड
लौट जाओ
कोई नया घर तलाशो।
ताकि तुम्हारी देह सुरक्षित रहे।
उस पर कैक्टस नहीं
गुलाब उगे।
जंगल महक उठे
नए विचारों की खुशबू से।
इंसान और इंसानियत के
पर्याय बनो तुम कामरेड
कह दो उन्हे जो
मासूमों का रक्त बहाते हैं,
तुम्हारी आड़ लेकर।
गला काटते हैं, आंखे निकालते हैं।
हाथ-पैर टुकडे-टुकड़े
कितने निर्मम, कितने नृशंस
माओ का नाम जपते हैं।
क्रांति की बात करते हैं
ऐसे हत्यारों से पीछा छुड़ाओ
तुम कामरेड
अपने दामन को और दागदार होने
से बचाओ तुम कामरेड।
तुमसे उम्मीद
तुमसे आशा
इसलिए लौट आओ कामरेड
बेहतर है लौट आओ।

- दिवाकर मुक्तिबोध
 

-----------------------------------------------------------------------------------------------------------
 

Comments

Popular posts from this blog

पत्थलगड़ी पर सियासत

अजीत जोगी का नया दाँव

मुक्तिबोध:प्रतिदिन (भाग-18)