बर्खास्तगी,गिरफ्तारी,न्यायिक जांच के बाद आगे क्या?

नसबंदी हादसा


- दिवाकर मुक्तिबोध
बिलासपुर के कानन पेंडारी नसबंदी हादसे की न्यायिक जांच की घोषणा के साथ ही छत्तीसगढ़ सरकार ने संकेत दिया है कि दोषियों को सजा दिलाने के मामले में उसकी नीयत पर शक  करने की जरुरत नहीं है। बिलासपुर के कानन पेंडारी और गौरेला में सरकारी नसबंदी शिविरों में  आपरेशन के बाद अब तक 14 महिलाओं की मृत्यु हो चुकी है। मौत का सिलसिला यद्यपि अभी थमा है, लेकिन 122 अभी भी अस्पतालों में है जिसमें से कई की स्थिति गंभीर है। जन स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने  वाली यह अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी है जिसने राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। चूंकि परिवार नियोजन जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों को आयोजित एवं नियंत्रित करने की जिम्मेदारी अंतत: जिला प्रशासन की होती है लिहाजा इस मामले में वह भी अपनी  जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। इसीलिए सरकार ने घटना के चार दिनों के भीतर ही न केवल न्यायिक जांच की घोषणा की अपितु आॅपरेशन के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार डॉक्टर आर.के. गुप्ता एवं मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. एस सी.भांगे को निलंबित करने के बाद अंतत: बर्खास्त कर दिया। पिछली तमाम बड़ी घटनाओं मसलन बालोद एवं बागबाहरा मोतियाबिंद आॅपरेशन के बाद दर्जनों मरीजों के आंखों की रोशनी खोने का मामला हो या फिर अनेक जिलों में निजी चिकित्सालयों में स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत स्वीकृत राशि हड़पने के लिए जबरिया सैंकड़ों महिलाओं का गर्भाशय निकालने का प्रकरण हो या फिर कांकेर जिले के झलियामारी आदिवासी कन्या छात्रावास की छात्राओं का यौन शोषण हो, कार्रवाई के नाम पर केवल लीपापोती हुई, जांच का नाटक होता रहा, फौरी तौर पर कुछ कर्मचारियों का निलंबन हुआ  लेकिन अंतत: बिना माकूल सजा पाए सभी बहाल भी हो गए। दिलों को झंझोड़ने वाले उस दौर में भी जबरदस्त जन आक्रोश फूटा, राजनीतिक धरने-प्रदर्शन हुए किंतु सरकार की सेहत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। यकीनन नसबंदी हादसा और भी ज्यादा गंभीर है और सरकार के गले की हड्डी बन गया है लिहाजा फौरन एवं सख्त  कार्रवाई करना सरकार की मजबूरी है। इसीलिए प्रथम दृष्टया दोषी चिकित्सकों के निलंबन और बर्खास्तगी के साथ-साथ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने जैसे कदम उठाए गए और न्यायिक जांच की घोषणा की गई। लेकिन इसके साथ ही राज्य सरकार ने पीड़ितों को बेहतर चिकित्सा उपलब्ध कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दिल्ली, हैदराबाद से चिकित्सकों की टीमें आई जो स्थानीय चिकित्सकों के साथ मिलकर मौत से लड़ रही महिलाओं का सम्बल बनी हुई हैं।
           इन कार्रवाइयों के बावजूद सवाल है क्या सरकार अपने स्वास्थ्य मंत्री को भी बर्खास्त करने या, इस्तीफा देने बाध्य करने  या फिर उनका विभाग बदलने पर पुर्नविचार कर रही है? मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने चारों ओर से बढ़ते दबाव को देखते हुए इस मामले में अपने वरिष्ठ मंत्रियों तथा पार्टी संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों से विचार-विमर्श के बाद स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल को न हटाने का फैसला किया। इस फैसले के पीछे राजनीतिक कारण हैं क्योंकि पार्टी नेतृत्व का मानना है कि यदि स्वास्थ्य मंत्री से इस्तीफा लिया गया तो इससे सत्ता की राजनीति में गलत परंपरा की शुरूआत होगी। चूंकि कांग्रेस राजनीतिक दृष्टि से इस मौके को भुनाने की फिराक में है लिहाजा उसकी मांग को स्वीकार करने  का अर्थ है हथियार डालना। इसीलिए मुख्यमंत्री अपने स्वास्थ्य मंत्री को बचाने की भरसक कोशिश कर रहे है। घटना के तुरंत बाद दिया गया उनका  यह बयान बचकाना ही है कि आपरेशन डॉक्टर करते हैं, स्वास्थ्य मंत्री नहीं। लेकिन अब ग्रामीण विकास एवं पंचायत मंत्री अजय चंद्राकर ने नसबंदी हादसे के लिए सरकार की नैतिक जिम्मेदारी कबूल की है पर स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे के मुद्दे पर सरकार चुप है। यदि नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार की है तो अपने लिए सजा भी खुद तय करे या फिर घटना के लिए खेद व्यक्त करे। दरअसल जन-स्वास्थ्य के संदर्भ में पिछले तमाम हादसे एवं नसबंदी से हुई मौत की घटनाओं को देखते हुए अमर अग्रवाल को स्वयं होकर इस्तीफा देना चाहिए।  लेकिन वे कहते हैं कि वे अपने मामले में खुद फैसला नहीं लेते, उनके इस्तीफे पर पार्टी संगठन या सरकार को फैसला  करना है। मंत्री जब ऐसा बयान दे तो जाहिर सी बात है मुख्यमंत्री फैसला लेने में हिचकिचा रहे हैं। पर यह तय प्रतीत होता है कि कांग्रेस के आंदोलन की आग जैसे ही बुझेगी, मुख्यमंत्री मंत्रिमंडल के फेरबदल के बहाने या तो अमर अग्रवाल को विदा करेंगे या फिर उनका विभाग बदल देंगे। लेकिन इस दौरान इस मामले में सरकार की किरकिरी होती रहेगी और यह बात फिर सिद्ध होगी कि मुख्यमंत्री उचित समय पर उचित फैसले लेने से परहेज करते हैं। जबकि उनके पास जनता को संतुष्ट करने एवं इस हादसे से उबरने का अच्छा मौका है।
           सरकार को विलुप्त होती जनजाति बैगा समुदाय की दो महिलाओं की नसबंदी एवं उनकी मौत का भी जवाब देना है। केंद्र ने वर्ष 1998 से परिवार नियोजन कार्यक्रम के तहत बैगा, कमार, अबुझमाड़िया और बिरहीर जनजातियों के सदस्यों की नसबंदी पर प्रतिबंध लगा रखा है और ये जनजातियां संरक्षित घोषित है। ऐसी स्थिति में दो  बैगा महिलाओं की नसबंदी और उनकी मृत्यु सवालों के घेरे में है और आपराधिक मामला है। जाहिर है कि नसबंदी के आंकडेÞ जुटाने के लिए बिना देखे परखे, बिना पता-साजी किए महिलाओं को नसबंदी शिविरों में लाया गया। जबकि कायदे से शिविरों में लाई गई या स्वेच्छा से  आई तमाम महिलाओं का प्रोफाइल  चेक करने के साथ ही स्वास्थ्य परीक्षण किया जाना चाहिए और उसके बाद ही नसबंदी की जानी चाहिए।
          बहरहाल राज्य सरकार के सामने अब बड़ा सवाल है जनस्वास्थ्य के मामले में जनता का विश्वास कैसे अर्जित किया जाए। सरकारी अस्पतालों में तमाम दुरावस्थाओं और लूट खसोट के बावजूद राज्य की गरीब जनता उन्हीं पर आश्रित है। इस सहारे को चुस्त-दुरुस्त बनाना  राज्य सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है। यह तभी संभव है जब स्वास्थ्य विभाग का प्रशासन जनोन्मुखी और इमानदार हो। प्रशासन किस तरह चलता रहा है यह इसी बात से जाहिर है स्वास्थ्य संचालक आई.ए.एस. कमलप्रीत सिंह साढे तीन  साल तक इस पद पर बने और नसबंदी घटना के बाद हटाए गए। जबकि इस बीच नेत्रकांड एवं गर्भाशय जैसे गंभीर कांड  हो गए। अब उन्हें पदोन्नत करने की तैयारी है। इससे समझा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में शासन-प्रशासन किस तरह चल रहा है।

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