नक्सलवाद की विदाई! ऐसे कैसे?

- दिवाकर मुक्तिबोध
  छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने हाल ही में नई दिल्ली में मीडिया ये चर्चा करते हुए कहा था कि राज्य में नक्सली समस्या अब केवल तीन जिलों सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर तक सिमटकर रह गई है। मुख्यमंत्री 28 सितंबर से नई दिल्ली में थे और छत्तीसगढ़ सदन में वे कुछ पत्रकारों से मुखातिब थे। उन्होंने यह भी कहा कि नक्सलियों का विदेशों में नेटवर्क है और अब राज्य में केवल 400 हार्डकोर नक्सली शेष है। मुख्यमंत्री का दावा तो अपनी जगह पर है लेकिन यह भी सच है कि इन तीन जिलों से परे भी आए दिन नक्सली वारदातें होती रहती हैं। पर इसमें शक नहीं कि नक्सलियों के आतंक का दायरा सिमट रहा है। यह अद्र्धसैनिक बलों की भारी संख्या में नक्सली क्षेत्रों में तैनाती, मुठभेड़ों में दर्जनों हार्डकोर माओवादियों के मारे जाने एवं बड़ी संख्या में पुलिस के आगे आत्मसमर्पण की घटनाओं से संभव हुआ है। यह भी स्पष्ट है कि केंद्र व राज्य सरकार के बीच नक्सली मुद्दे पर बेहतर तालमेल है एवं उन्होंने पूरी ताकत झोंक रखी है। नक्सली बैकफुट पर है। उनमें बौखलाहट है। लेकिन वे राज्य से बिदा नहीं हुए है। फिर भी उम्मीद की जा रही हैं कि राज्य सरकार की नई पुनर्वास नीति एवं अत्याधुनिक शस्त्रों से लैस सुरक्षा बलों के दबाव की वजह से देर सबेर राज्य को नक्सली आतंक से छुटकारा मिलेगा। पर यह तभी संभव होगा जब बस्तर संभाग के सभी गाँव खुली हवा में सांस ले सकेंगे। जब गाँवों में विकास कार्य होंगे, सड़कें बनेंगी, शिक्षा और स्वास्थ्य की ओर ध्यान दिया जाएगा, इसके लिए माकूल व्यवस्थाएँ बनाई जाएंगी, ग्रामीणों को रोजगार मिलेगा और केंद्र व राज्य सरकार की तमाम योजनाओं पर ईमानदारी से कार्य होगा। आदिवासियों को हर तरह के शोषण से मुक्त करना नक्सलियों के खिलाफ संघर्ष की पहली जरुरत है इसलिए मूल चुनौती आतंक नहीं, विकास एवं शोषण से मुक्ति की है।
       दरअसल धुर नक्सली क्षेत्रों में विकास कार्य दुष्कर जरुर है किन्तु असंभव नहीं। इसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति चाहिए और जाहिर है सरकार के भीतर और बाहर इसे कुचलने का षड़यंत्र चलता रहता है। हालांकि दिखावे की कोशिशों में कोई कमी नहीं की जाती। बड़ी-बड़ी घोषणाएँ होती हैं, बड़ी-बड़ी बातें की जाती है, हर बड़ी घटना के बाद नक्सलियों को कायर कहा जाता है और जब किसी अफसर का अपहरण होता है तो सरकार शरणागत हो जाती है। छत्तीसगढ़ में ऐसे बहुतेरे उदाहरण हैं जब अपहृत ग्रामीणों को नक्सलियों के पंजे से मुक्त करने के लिए सरकार ने कोई गंभीर प्रयत्न नहीं किए और उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया। पुलिस की मदद करने वाले आदिवासियों के जीवन की सुरक्षा की चिंता नहीं की और उन्हें भी मरने छोड़ दिया। ऐसे मुखबिरों को नक्सलियों ने चुन-चुनकर मारा और उन्हें भी नहीं बख्शा जिन पर उन्हें जरा भी शक था। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष पहले 6 महीने में 11 मुखबिरों की नक्सलियों ने हत्या की।
        बहरहाल नक्सली हिंसा के गिरते ग्राफ से चिंता कुछ कम जरुर होती है और कहीं न कहीं राज्य शासन के प्रयासों की सराहना भी करनी पड़ती है। किन्तु यह तय है, जब तक नक्सल प्रभावित बस्तर का हर गाँव विकास की रोशनी से चकाचक नहीं होगा, नक्सलियों की मौजूदगी बनी रहेगी। सवाल है यह कैसे हो? जान छुड़ाने के लिए बहुत आसानी से कह दिया जाता है, माओवादी विकास कार्य करने नहीं देते, सड़कें उड़ा देते है, स्कूल भवन ध्वस्त करते हैं, वे प्रत्येक ऐसे कार्य में आड़े आते हैं जहां उन्हें आदिवासियों के उठ खड़े होने का अहसास होता हैं। सलवा जुडूम इसका सबसे बेहतर उदाहरण है। केंद्र में यूपीए सरकार के कार्यकाल में, पी. चिदम्बरम के गृहमंत्री रहते, घोषणाएँ की गई थी कि फोर्स की मदद से एक-एक क्षेत्र नक्सलियों से खाली करके वहां पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के बीच विकास कार्य कराए जाएंगें। फोर्स के दबाव से बीते दशक में कुछ क्षेत्र माओवादियों से खाली तो हुए पर गाँवों की बदहाली यथावत है। विकास के उपक्रम के तहत अब राज्य की रमन सिंह सरकार ने नक्सली क्षेत्रों में स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों एवं सामुदायिक अस्पतालों में डॉक्टरों की तैनाती के लिए विशेष पैकेज की घोषणा की है। सवाल है जब बस्तर के सबसे बड़े शहर जगदलपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल के लिए डॉक्टर नहीं मिलते, तब धुर नक्सल क्षेत्रों में विशेष पैकेज का फार्मूला कैसे काम आएगा? यदि कोई डॉक्टर हिम्मत करके, जान की परवाह न करके, सेवा भावना से अभिभूत होकर वहां जाना भी चाहेगा तो क्या उसे उन तथाकथित स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सा से संबंधित समुचित सुविधाएं एवं सुरक्षा उपलब्ध रहेगी? राज्य में स्वास्थ्य संस्थाओं, अस्पतालों का वैसे ही बुरा हाल है। प्रतिवर्ष सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण दूषित पानी के सेवन से, चिकित्सा के अभाव में डायरिया और मलेरिया से दम तोड़ देते हंै। ऐसी स्थिति में सुरक्षा की गारंटी के साथ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक अस्पतालों को चिकित्सा की आधुनिक सुविधाओं एवं दक्ष पैरा मेडिकल स्टॉफ से लैस करना पहली जरुरत है। हालत यह हैं कि मशीनें हैं तो दक्ष तकनीशियन नहीं और दक्ष तकनीशियन है तो मशीन नहीं।
       स्वास्थ्य का ही नहीं प्राथमिक शिक्षा का भी नक्सल प्रभावित बस्तर, सरगुजा में यही हाल है। राज्य सरकार के स्कूली शिक्षा मंत्री केदार कश्यप एवं ग्रामीण विकास मंत्री अजय चंद्राकर ने स्वीकार किया है कि वामपंथी उग्रवाद के कारण 12 जिलों में पिछले 15 वर्षों से करीब दस हजार शिक्षकों की कमी है। इनमें 2300 से अधिक केवल साइंस शिक्षकों के पद रिक्त है इसलिए दोनों संभागों के 64 विकासखण्डों में आउट सोर्सिंग के जरिए शिक्षकों की भर्ती के प्रयत्न किए जा रहे हैं। कांग्रेस ने स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का मुद्दा उठाते हुए सरकार के इस फैसले का जोरदार विरोधर किया है। यह विरोध अब भी जारी है। अब सवाल है, सरकार क्या करें? सरकार के इन नुमाइंदों के अनुसार शिक्षकों की भर्ती के लिए 13 बार विज्ञापन जारी किए गए किन्तु योग्य उम्मीदवार नहीं मिले। इसलिए आउट सोर्सिंग यानी राज्य के बाहर के उम्मीदवारों को मौका देने का निश्चय किया गया। क्या इससे समस्या का समाधान हो पाएगा? शिक्षा के स्तर की तो बात ही छोड़ दें। प्रदेश के मुख्य सचिव विवेक ढांढ ने मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की मौजूदगी में एक कार्यक्रम में कहा कि 6वीं में पढ़ रहे लड़के को तीसरी कक्षा का भी ज्ञान नहीं। और 8वीं का विद्यार्थी पांचवीं की किताब भी नहीं पढ़ सकता। उच्च शिक्षा में भी लगभग यही स्थिति है। इससे पता चलता है कि राज्य में शिक्षा का कैसा बुरा हाल है।
      बहरहाल सरकार के सामने विकास की बड़ी चुनौतियां हैं। राज्य में पिछले 12 वर्षों से भाजपा की सरकार है अत: समय की आड़ लेकर सवालों से बचा नहीं जा सकता। नक्सली आतंक का दायरा यदि सिमट रहा है तो जाहिर है इसका श्रेय सरकार को है किन्तु प्रभावित क्षेत्रों में डॉक्टरों की नियुक्ति का मामला हो अथवा शिक्षा कर्मियों की भर्ती का, बात तब तक नहीं बनेगी जब तक कि न्यूनतम जरुरतें, सुरक्षा और विश्वास के साथ पूरी नहीं होगी। कहा जा सकता है कि अलग राज्य बनने के बाद बीतें 15 वर्षों में आदिवासियों का कुछ भी भला नहीं हुआ है इसलिए प्रदेश में नक्सलवाद की जड़ें कायम है।

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