Skip to main content

मुठभेड़ के नाम पर बंद हो सरकारी हिंसा



- दिवाकर मुक्तिबोध
       आत्मसमर्पित नक्सलियों को छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा नौकरी में लेने की पेशकश क्या राज्य में हिंसात्मक नक्सलवाद के ताबूत पर आखिरी कील साबित होगी? शायद हां, पर इसकी पुष्टि के लिए कुछ वक्त लगेगा जब राज्य सरकार की इस योजना पर पूरी गंभीरता एवं ईमानदारी से अमल शुरु होगा। दरअसल बस्तर और सरगुजा संभाग के आदिवासी बाहुल्य गाँवों में युवाओं के पास कोई काम नहीं है। पढ़ाई-लिखाई से भी उनका रिश्ता टूटता -जुड़ता रहा है। साक्षर, असाक्षर, शिक्षित और अशिक्षित या अर्धशिक्षित युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में सरकार तो विफल थी ही, निजी क्षेत्रों में भी उनके लिए कोई काम नहीं था अत: उन्होंने एक सुविधाजनक रास्ता चुन लिया जो नक्सलवाद की ओर जाता था। यहाँ रोजगार था, एवज में खर्चे के लिए पैसे मिलते थे, दो जून की रोटी की व्यवस्था थी, गोलियों से भरी हुई बंदूकें हाथ में थी, शिकार की भी स्पष्टता थी, पुलिस के जवानों पर अचानक आक्रमण करने एवं घेरकर गोली मारने के अपने अलग मजे थे और थी जंगल की स्वच्छंदता तथा ऐशो आराम। सजा केवल इतनी थी कि उनका आकाश केवल जंगलों और गाँवों तक सीमित था। शहर व कस्बे की सरहदें वे छू सकते थे लेकिन लौटना जंगल की ओर ही था। इसे मामूली सजा मानकर ऐसे युवाओं ने पिछले दो दशकों में छत्तीसगढ़ में हिंसा का जो तांडव पेश किया उससे पूरा देश कांप उठा। नक्सलवाद सबसे बड़ी राष्ट्रीय समस्या घोषित हुई तथा मरने - मारने का खेल शुरु हो गया। इस खूनी खेल में बस्तर-सरगुजा के जंगलों में जीवन-यापन कर रहे वे आदिवासी पिसते चले गए जिनका कसूर सिर्फ इतना था कि वे निरीह थे, बहकावे में आ जाते थे, पुलिस के भी और माओवादियों के भी। इसका फल उन्हें जान देकर भोगना पड़ता था। आंकडं़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में 2005 से अब तक 700 से अधिक आदिवासी मारे गए हैं। फर्जी मुठभेड़ों, अपहृत आदिवासियों एवं माओवादियों द्वारा मुखबिरों को जनअदालत लगाकर हत्या करने की घटनाएँ अलग हैं जो इस संख्या में भारी इजाफा करती हैं।
      बीते 5 वर्षों में नक्सली मोर्चे पर सरकार एवं विचारकों की दृष्टि से काफी कुछ बेहतर घटा है। घोर नक्सल प्रभावित 7 राज्यों में समस्या की तीव्रता कुछ कम हुई है जिसमें छत्तीसगढ़ भी शामिल है। यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि केंद्र एवं राज्य सरकारों की पुलिस व अद्धसैनिक बलों के दबाव की वजह से माओवादियों के कार्यक्षेत्र का दायरा सिमटता जा रहा है और अब छत्तीसगढ़ ही उनकी प्रमुख पनाहगार है जहां वे स्वयं को बेहद सुरक्षित समझते हैं। लेकिन अब उनका यह सुरक्षित गढ़ भी दरक रहा है। विकास, आत्मसमर्पण, मुठभेड़, नई पुर्नवास नीति, नक्सल पीडि़त परिवार के बच्चों की शिक्षा-दीक्षा और अब आत्मसमर्पितों को सरकारी नौकरी देने का फैसला नक्सल मोर्चे पर सरकार की रणनीति का हिस्सा है जिसे वांछित सफलता मिलती दिख रही है। लेकिन यहाँ कुछ सवाल खड़े होते हैं। नक्सलवाद के खात्मे के नाम पर क्या पुलिस को यह छूट दे दी गई है कि शक के आधार पर किसी को भी गोली मार दें? बीती घटनाएँ इस बात की साक्षी हैं जिसमें चौपाल में इकट्‌ठा हुए ग्रामीणों, खेतों में भेड़-बकरी चराने वालों तथा पुलिस को देखकर डर कर भागने वाले लोगों को पुलिस ने भून दिया। उदाहरण के तौर पर दो वर्ष पूर्व की घटना याद आती है। 7 मई 2013 को बीजापुर जिले के एड्समेटा में पूजा के लिए एक स्थल पर इकट्‌ठा हुए आदिवासियों को पुलिस एवं कोबरा बटालियन के जवानों ने घेर लिया और गोलियां बरसाईं। इस गोलीबारी में 3 बच्चों सहित 8 ग्रामीण मारे गए। पुलिस को जब अपनी गलती का एहसास हुआ तो इस घटना को उसने मुठभेड़ की शक्ल दे दी। इसके पूर्व घटित मीना खलको कांड को कौन भूल सकता है? 6 जुलाई 2011 को बलरामपुर जिले के चांदो थाना क्षेत्र के अंतर्गत लांगर टोला में 17 वर्षीय मीना खलको को पुलिस ने माआवोदी बताकर उस समय मार गिराया जब वह भेड़ों को चरा रही थी। अनीता झा न्यायिक आयोग की हाल ही पेश रिपोर्ट में उसकी हत्या एवं बलात्कार की पुष्टि हुई तथा इसके आधार पर तत्कालीन थाना प्रभारी सहित 25 पुलिस जवानों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया। इस तरह की अनेक ऐसी घटनाएँ हैं जिनमें निर्दोष नागरिकों की जाने पुलिस की गोली से गई और महिलाएँ सामूहिक अनाचार की शिकार हुई। सुकमा क्षेत्र की आदिवासी महिलाओं का आरोप था कि पिछले महीने (अक्टूबर 2015) बड़ागुड़ा थाना क्षेत्र के चित्रागेलूर, पेदागेलूर, गोदेम और मुर्गीचेरु समेत कई गाँवों में सीआरपीएफ और पुलिस के जवान माओवादियों को तलाशने के नाम पर जबरिया घरों में घुसे, लूटपाट की, मारापीटा और महिलाओं के साथ बलात्कार किया। कांग्रेस ने इस घटना की जांच के लिए सुकमा विधायक कवासी लखमा के नेतृत्व में 11 सदस्यीय जांच दल गठित किया है। पुलिस विभाग ने भी एएसपी इंदिरा कल्याण के नेतृत्व में 4 सदस्यीय टीम बनाई है। इस वाकये के बाद इसी माह 4 नवंबर को सुकमा थाना क्षेत्र के अदलमपल्ली जंगल में पुलिस ने तीन नक्सलियों को मुठभेड़ में मारने का दावा किया है किन्तु दोरनापाल थाने को घेरकर ग्रामीणों ने दावा किया कि मारे गए तीनों आदिवासी किसान थे, नक्सली नहीं।
      ये कुछ उदाहरण हैं जो इस सत्य को स्थापित करते हैं कि केंद्र और राज्य सरकारों के संयुक्त नक्सल विरोधी अभियान में निर्दोष आदिवासियों की भी जाने जा रही हैं। पूर्व के दर्जनों उदाहरणों एवं ताजा घटनाओं से यह भी स्पष्ट होता है कि नक्सली मामले में पुलिस की नीति है - शक है तो गोली मारो, पड़ताल मत करो, गिरफ्तार मत करो। तो क्या एक लोकतांत्रिक देश में नक्सल समस्या के उन्मूलन के नाम पर निर्दोष नागरिकों की बलि मंजूर है? कानून की भाषा में कहा जाता है कि भले ही 99 अपराधी छूट जाए पर एक निरपराध को फांसी नहीं होनी चाहिए। लेकिन यहाँ, बस्तर एवं सरगुजा में क्या हो रहा है? पुलिस के वहशियाना तौर-तरीके से बेकसूर गरीब आदिवासी मारे जा रहे हैं। जब मानवाधिकारवादी उनके पक्ष में खड़े होते है, पीडि़त परिवारों से मिलते हैं, घटनाओं की समीक्षा करते हैं और सही तथ्य जनता के सामने लाते हैं तो सरकार को परेशानी होती है और प्रत्युत्तर में वह नक्सलियों द्वारा आदिवासियों के अपहरण और उनके कत्लेआम पर मानवाधिकारवादियों की चुप्पी पर कटाक्ष करती है, चुनौती देती है। यह दलील तर्कसंगत नहीं है अलबत्ता इसमें शक नहीं कि नक्सली हिंसा पर मानवाधिकारवादी ऐसा करते रहे है लेकिन सवाल सरकारी बंदूक की नली से निकली गोली का है जो सीधे निर्दोष आदिवासियों के सीने में धसती है। इस सरकारी हिंसा को जायज कैसे ठहराया जा सकता है? इसलिए जब सरकारी अत्याचार होते हैं तो मानवाधिकारों की आवाज बुलंद होती है और होती रहेगी।
      बहरहाल बिना गोली चलाए आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित करना, आत्मसमर्पितों को नई जिंदगी देने की व्यवस्था के अंतर्गत उन्हें योग्यतानुसार सरकारी नौकरी में लेने का फैसला व नक्सल हिंसा से प्रभावित परिवार के बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का प्रबंध दशकों से चली आ रही नक्सल समस्या के समाधान की दिशा में बेहतर कदम है किन्तु मुठभेड़ का नाम देकर निर्दोष ग्रामीणों की हत्या का सिलसिला बंद होना चाहिए। अन्यथा इसके लिए न तो पुलिस को माफ किया जा सकता है और न ही सरकार को।

Comments

Popular posts from this blog

पत्थलगड़ी पर सियासत

दिवाकर मुक्तिबोध    छत्तीसगढ़ में रमन सरकार की तीसरी कार्यकाल जो आगामी नवंबर में पूरा हो जाएगा, राजनीतिक झंझवतों से घिरा रहा है। जिन चुनौतियों का सामना पार्टी एवं सरकार को इस बार करना पड़ रहा है। वैसी चुनौतियां पिछले चुनाव के दौरान भी मौजूद थी किन्तु वे इतनी उग्र नहीं थी। सत्ता विरोधी लहर के तेज प्रवाह के साथ-साथ प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस का पुर्नजीवित होना, उसके धारदार हमले, संगठन की सक्रियता, नेताओं व कार्यकर्ताओं की एकजुटता तो अपनी जगह है ही, बड़ी वजह है विभिन्न मोर्चों पर राज्य सरकार की नाकामी एवं जन असंतोष का विस्फोट। कम से कम गत दो वर्षों से सत्ता एवं संगठन को विभिन्न जनआंदोलनों का सामना करना पड़ा है जिन्हें ऐन-केन प्रकारेण दबाने में सरकार को सफलता जरुर मिली लेकिन राख के नीचे चिंगारियां धधकती रही है। चाहे आंदोलन लंबे समय से संविलियन के लिए संघर्ष कर रहे शिक्षा कर्मियों का हो या फिर किसानों, मजदूरों, बेरोजगार युवाओं एवं आदिवासियों का जिन्हें अपने हक के लिए शहरों एवं राजधानी की सड़कों पर बार-बार उतरना पड़ा है। समाधान किसी मोर्चे पर नहीं है। हालांकि आत्ममुग्धता की शिकार राज्य सरका…

अजीत जोगी का नया दाँव

-दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस की कमान मूलत: किसके हाथ में है ? अध्यक्ष अजीत जोगी के या उनके विधायक बेटे अमित जोगी के हाथ में? यह सवाल इसलिए उठा है क्योंकि अजीत जोगी चुनाव लड़ेंगे या नहीं, लड़ेंगे तो कहाँ से लड़ेंगे, यह पिता के लिए बेटा तय कर रहा है। कम से कम हाल ही में घटित एक दो घटनाओं से तो यही प्रतीत होता है। वैसे भी पुत्र-प्रेम के आगे जोगी शरणागत है। इसकी चर्चा नई नहीं, उस समय से है जब जोगी वर्ष 2000 से 2003 तक कांग्रेस शासित प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। उनके उस दौर में अमित संविधानेत्तर सत्ता के केन्द्र बने हुए थे तथा उनका राजनीतिक व प्रशासनिक कामकाज में ख़ासा दख़ल रहता था। अब तो ख़ैर दोनों बाप-बेटे की राह कांग्रेस से जुदा है और दो वर्ष पूर्व गठित उनकी नई पार्टी ने छत्तीसगढ़ में अपनी जड़ें जमा ली है। यद्यपि कहने के लिए अजीत जोगी अपनी नई पार्टी के प्रमुख कर्ता-धर्ता हैं लेकिन कार्यकर्ता बेहतर जानते हैं कि अमित जोगी की हैसियत क्या है और संगठन में उनका कैसा दबदबा है। पिता-पुत्र के संयुक्त नेतृत्व में छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस अपना पहला चुनाव लड़ रही है। राज्य की 90 सीटों के ल…

मुक्तिबोध:प्रतिदिन (भाग-18)

अगर तुम्हें सचाई का शौक है
अगर तुम्हें सचाई का शौक है तो खाना मत खाओ तुम कहते हैं बुद्धिमान पहनो मत वस्त्र और रहो तुम वनवासी बर्बरों की स्थिति में सड़कों पर फेंक दो अपनों को बच्चों को वीरान सूरज की किरनों से घावों को सेंक लो दुनिया के किसी एक कोने में चुपचाप जहर का घूंट पी मर जाने के लिए माता-पिता त्याग दो अपनी ही जिन्दगी के सिर पर डाल तुम आग लो !! अगर तुम्हें सचाई का शौक है तो बीवी को दुनिया के जंगल में छोड़ दो मृत्यु के घनघोर अँधेरे को ओढ़ लो अगर तुम्हें सचाई का शैक है तो भूखों मर जाओ तुम स्वयं की देह पर केरोसीन डालकर आग लगा भवसागर पार कर जाओ तुम अगर तुम्हें जीने की गरज है तो शरण आओ हमारे  चरण में बैठ जाओ हमारी खटिया पर, पलंग पर लेट जाओ पैर यदि लम्बे हों ज्यादा तो उन्हें काट देंगे हम खटिया के बराबर-बराबर देह छाँट देंगे हम जाते हों हाथ तो उन्हें छाँट डालेंगे पलंग के बराबर-बराबर तुम्हें काट डालेंगे !! हमारी खाट बहुत छोटी है अगर न जम सको तो यह तुम्हारी किस्मत ही खोटी है दीर्घतर हमसे यदि दूर तक जाती हो दृष्टि - निकाल आँखे लेंगे हम कॉक की नयी आँखे बैठाकर काम तुमसे लेंगे हम हम जैसे खोटे स…