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भ्रष्टाचार का भयावह चेहरा, जान का सौदा

- दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के सवाल पर राज्य सरकार की जीरो टाललेंस की नीति है। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह एवं सरकार के अन्य नुमाइंदे सरकारी एवं गैरी सरकारी कार्यक्रमों में जीरो टॉलरेंस की नीति का एलान भी करते रहे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐलान-ए-जंग का खुद नौकरशाही पर कितना क्या असर हुआ है, यह राज्य में घटित अलग- अलग किस्म की घटनाओं से जाहिर है। कही-कहीं रिश्वतखोरों को सरेआम पीटा जा रहा है तो कहीं भ्रष्ट अफसरशाही से त्रस्त होकर आदमी अपनी जान दे रहा है। हाल ही में दो घटनाएँ ऐसी हुई हैं जो इस बात का अहसास कराती है कि भ्रष्ट नौकरशाही पर सरकार का कोई अंकुश नहीं है तथा जीरो टॉलरेंस की सरकारी घोषणा के बावजूद वह बेखौफ है तथा बिना रिश्वत लिए कोई कागज आगे न बढ़ाने या फाइलों को लटकाए रखने की उसकी नीति यथावत है। यानी जीरो टॉलरेंस केवल घोषणाओं तक सीमित है। लिहाजा आम आदमी को कोई राहत नहीं है। किंतु अब पीडि़तों का मरने-मारने पर उतारु होना इस बात का संकेत है कि यदि सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कानूनों का सख्ती से पालन नहीं किया, नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगा, भ्रष्ट अफसरों एवं कर्मचारियों के खिलाफ दर्ज मामलों में तत्काल दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई, धरपकड़ के अभियान को तेज नहीं किया गया और यदि आम आदमी के लिए प्रशासन को सरल एवं सुगम नहीं बनाया गया तो लोगों को कानून हाथ में लेने से रोका नहीं जा सकेगा। और ऐसी स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए अच्छी नहीं होगी।
       दो घटनाएं मिसाल के रुप में दी जा सकती हैं। हालांकि ऐसे वाकये पहले भी हुए हैं लेकिन इस हद तक नहीं। पूर्व में कई दफे मुख्यमंत्री निवास के सामने आत्महत्या करने की चेतावनी दी गई, कोशिशें भी हुई लेकिन वे कामयाब नहीं होने दी गई। अतीत में हुई ऐसी घटनाएँ इस बात की साक्षी थी कि प्रशासन असंवेदनशील था तथा आम आदमी के दु:ख-दर्द से उसका कोई वास्ता नहीं था जबकि उसकी संवेदनशीलता, पारदर्शिता तथा कामकाज तेजी से निपटाने के संकल्प की दुहाई दी जाती थी। यह स्थिति आज भी नहीं बदली है बल्कि भ्रष्टाचार चरम पर है। भ्रष्ट व्यवस्था का जीता - जागता सबूत और क्या चाहिए कि आम आदमी अपनी जान की भी परवाह न करें। इसी माह की 26 तारीख को राज्य के दूसरे बड़े शहर बिलासपुर से सटे बिल्हा में एसडीएम कार्यालय के सामने युवक कांग्रेस के नेता राजेंद्र तिवारी ने स्वयं पर पेट्रोल छिड़कर आत्मदाह कर लिया। उसका आरोप था कि उसके खिलाफ की गई प्रतिबंधात्मक कार्रवाई में उसे जमानत देने के एवज में एसडीएम अर्जुन सिंह सिसोदिया ने 40 हजार रुपये की मांग की और न देने पर जेल भेजने की धमकी दी। व्यथित 24 वर्षीय राजेंद्र ने एसडीएम दफ्तर के बाहर खुद को आग के हवाले कर दिया। बुरी तरह झुलसे युवा नेता को बचाया नहीं जा सका और कुछ ही घंटों बाद रायपुर के एक अस्पताल में उसकी मौत हो गई। इस घटना से बिल्हा में तनाव फैलना स्वाभाविक था। गुस्साए लोग सड़क पर उतर आए। अगले दिन यानी 27 अक्टूबर को नगर बंद रहा तथा शव के साथ 5 घंटे तक नेशनल हाईवे जाम रखा गया। इस घटना से प्रशासन के होश उड़ गए। प्रशासन ने फौरन कार्रवाई करते हुए एसडीएम अर्जुन सिंह सिसोदिया को हटा दिया और बाद में पूरे मामले की दंडाधिकारी जांच के आदेश दिए। मुख्यमंत्री रमन सिंह ने भी घटना पर दुख व्यक्त किया तथा शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की। उन्होंने इस घटना के साथ ही जीवन लाल मनहर प्रकरण में भी जांच के आदेश दिए। 15 दिन पूर्व ग्राम सेवती निवासी मनहर को प्रतिबंधात्मक धारा 107-16 के मामले में जेल भेज दिया गया था जहां उसकी मौत हो गई। उसके बेटे का आरोप था कि अनुविभागीय दंडाधिकारी सिसोदिया ने जमानत देने के एवज में उससे 50 हजार रुपये की मांग की थी।
      राजेंद्र तिवारी आत्महत्या प्रकरण शासन - प्रशासन के लिए ङ्क्षचता का सबब होना चाहिए। क्योंकि यह एक व्यक्ति की प्रशासन से उपजी हताशा की पराकाष्ठा है। जान की बाजी लगाना सहज नहीं है। चिंता इसलिए भी होनी चाहिए क्योंकि भ्रष्टाचार की वजह से परेशान आम आदमी की प्रतिक्रिया विभिन्न रुपों में सामने आ रही है। मिसाल के तौर पर इसी अक्टूबर की 19 तारीख को इस्पात नगरी भिलाई के निकट जामुल नगर पालिका की व्यवस्था और विकास कार्यों की गुणवत्ता से खिन्न एक युवक मोहित देवांगन ने नगर पालिका अध्यक्ष रेखराम बंछोर से पहले सवाल जवाब किया और बाद में उन पर हंसिये से हमला कर दिया। पालिका दफ्तर में पहुंचे इस युवक ने बंछोर से पूछा आपकी तनख्वाह सिर्फ 30 हजार रुपये महीना है तो आपने दस वर्षों में लाखों की संपत्ति कैसे बनाई? दो चुनावों में आपने 50 लाख से अधिक खर्च किए, कहाँ से आया ये पैसा? अध्यक्ष पर प्राणघातक हमले के बाद हमलावर घटनास्थल से भागा नहीं बल्कि चिल्ला-चिल्लाकर पालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं अव्यवस्था पर रोष प्रकट करता रहा। यह घटना भी इस बात का संकेत है कि प्रशासन के कामकाज एवं भ्रष्टाचार से असंतुष्ट लोगों का धैर्य जवाब देने लगा है तथा वे अब अपने - अपने तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे है।
        छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक भ्रष्टाचार के मामले कोई नई बात नहीं है। दरअसल नक्सली समस्या के बाद यह राज्य की दूसरी सबसे बड़ी समस्या है जो आम आदमी को सीधे प्रभावित करती है। हालांकि समय-समय पर शासन-प्रशासन भ्रष्ट अफसरों, कर्मचारियों के खिलाफ छापे की कार्रवाई करता रहा है किन्तु इन अभियानों का खास असर इसलिए नहीं पड़ता क्योंकि लोकप्रतिष्ठा पर धनपशुता हावी है। अफसरों, कर्मचारियों को इसलिए न तो दण्ड का भय और न ही कानून का, सोने पर सुहाना यह कि न्याय के अत्यधिक विलंब से मामलों को रफा-दफा करने में या स्थितियों को अपने वश में करने में, सबूतों को नष्ट करने में अथवा केस को ढीला करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। सिर्फ पिछले पांच वर्षों की बात करें तो एंटी करप्शन ब्यूरो ने भ्रष्टाचार के दर्जनों मामले पकड़े। ये बड़े मामले थे जिनमें न केवल लाखों की नगद राशि एवं करोड़ों की बेनामी संपत्ति बरामद हुई वरन इनमें प्रशासनिक अधिकारियों एवं कर्मचारियों की संलिप्तता के भी ठोस प्रमाण मिले किन्तु, सजा के नाम पर निलंबन, अथवा जमानत के मिलते तक कुछ दिनों की जेल से अधिक कुछ नहीं हुआ। इस दौरान शायद ही किसी की नौकरी गई हो या कठोर दण्ड मिला हो। दरअसल राज्य में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का मतलब है कुछ दिनों की सनसनी। बाद में सबकुछ पहले जैसा, यथावत। ऐसी स्थिति में स्पष्ट है-संस्थागत भ्रष्टाचार खूब फल-फूल रहा है और रिश्वतखोरों को कानून का कोई भय नहीं है।
        इन दिनों राज्य की रमन सिंह सरकार चौतरफा समस्याओं से घिरी हुई है। संरक्षित जनजाति के पहाड़ी कोरवा लंबूराम की भूख से हुई मौत का मामला हो या फिर कर्ज में डूबे एवं गरीबी की मार से त्रस्त किसानों की आत्महत्याओं के प्रकरण हो या फिर राज्य में सूखे की स्थिति हो या फिर सूखाग्रस्त इलाकों के किसानों का जंगी प्रदर्शन हो, प्राय: सभी मोर्चांे पर सरकार के लिए अप्रिय परिस्थितियां है। राजनीति स्तर पर भी स्थितियां दु:खदायी हंै क्योंकि प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को कई मुद्दे हाथ लगे हंै जिन्हें लेकर वह जनता के बीच में हैं, सड़क पर है। इन विपरीत स्थितियों में प्रशासनिक भ्रष्टाचार की वजह से जान देने अथवा कानून हाथ में लेने की घटनाएं, भले ही वह अभी सीमित संख्या में हो, चिंताजनक है। जिस तरह भूख से हुई मौत के लिए सरकार को जवाबदेह माना जाता है और उसे सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकारी नहीं होता, उसी तरह रिश्वत देने के बजाए जान देने जैसी घटनाओं के लिए भी सरकार को जवाबदेही होना चाहिए। मौत की ऐसी घटनाओं में राज्य की भाजपा सरकार केवल मुआवजा देकर छुट्टी नहीं पा सकती, उसे यह दिखाना होगा कि अपनी जनोन्मुख नीतियों जिनमें भ्रष्टाचार का मुद्दे भी शामिल है, पर वह गंभीर है तथा नौकरशाही उसके वैसे ही नियंत्रण में है जैसे सन् 2000 से 2003 तक अजीत जोगी के नेतृत्व में कांग्रेस शासन के समय में थी।

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