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'श्रेय' की राजनीति में निपट गया रायपुर साहित्य महोत्सव

-दिवाकर मुक्तिबोध

कुछ तारीखें भुलाए नहीं भूलती। याद रहती हैं, किन्हीं न किन्हीं कारणों से। रायपुर साहित्य महोत्सव को ऐसी ही तारीखों में शुमार किया जाए तो शायद कुछ गलत नहीं होगा। इसकी चंद वजहें है - पहली - 12 से 14 दिसंबर 2014 को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आयोजित साहित्य महोत्सव बेजोड़ था, अद्भुत था। दूसरी वजह - उस सरकार द्वारा आयोजित था जो दक्षिण पंथी विचारधारा से अनुप्राणित है। तीसरी वजह - इस आयोजन में इतना खुलापन था कि माक्र्सवादी विचारधारा से प्रेरित लेखकों, कवियों, कलाकारों एवं अन्य क्षेत्रों के दिग्गज हस्तियों ने इसमें शिरकत की और वैचारिक विमर्श में सक्रिय भागीदारी निभाई। चौथी वजह - सरकारी आयोजन होने के बावजूद विमर्श में सरकार का कोई दखल नहीं रहा। पांचवीं वजह - मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने समारोह का उद्घाटन किया लेकिन वे स्वयं एवं संस्कृति मंत्री मंच पर नहीं, दर्शक दीर्घा में बैठे क्योंकि वामपंथी लेखक ऐसा चाहते थे जिन्होंने समारोह की तैयारियों के दौरान इस तरह की प्रतिक्रिया जाहिर की थी। छठवीं वजह - समारोह अपने उद्देश्य में, राजनीतिक और साहित्यिक दृष्टि से सफल रहा। सातवीं वजह - भाजपा की रमन सिंह सरकार देश भर में यह संदेश देने में कामयाब रही कि वह असहमति का भी सम्मान करती है। आठवीं और मेरे विचार से समारोह की तारीखों को याद रखने की अंतिम वजह है - असहमति के सम्मान का सिर्फ एक साल, 12 से 13 दिसंबर 2014। इस वर्ष यानी 2015 में यह आयोजन नहीं होगा। कारण प्रदेश में सूखा। इसलिए वर्ष 2014 की यें तारीखें जेहन में रहेंगी और याद रखी जाएंगी कि छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय स्तर का कोई साहित्य-संस्कृति का अपूर्व समागम हुआ था जिसमें वामपंथी एवं दक्षिणपंथी लेखक बिरादरी ने एक साथ एक ही मंच साझा किया।
दरअसल इस वर्ष अल्प वर्षा के कारण प्रदेश में भीषण सूखा पड़ा है। ऋण ग्रस्त किसानों द्वारा आत्महत्या की बढ़ती घटनाएं स्थिति की भयावहता की ओर इशारा करती है। लिहाजा किसी भी प्रकार का जश्न मनाने के लिए यह समय उचित नहीं है, ऐसा माना जाता है। पर समाराहों से कन्नी कैसे काटी जा सकती है? प्रदेश में वे तो हो रहे हंै और अच्छे स्तर पर हो रहे हैं। मिसाल के तौर पर 1 नवंबर 2015 को सिर्फ एक दिन के लिए पूरे राज्य में स्थापना दिवस समारोह मनाया गया। यह अलग बात है कि पूर्व की तरह इस बार ज्यादा तामझाम नहीं किया गया। करोड़ों तो खर्च हुए पर पहले ही तुलना में कम। राज्य स्तरीय अलंकरण भी बांटे गए। विजेताओं को पुरस्कृत किया गया। संगीत समारोह भी हुआ। यानी सूखे के बीच में जश्न मना। चलिए और उदाहरण देखें - राजधानी में पहली बार खेलों के अंतरराष्ट्रीय आयोजन हुए। विश्व कप हॉकी लीग फायनल एवं आई.पी.टी.एल. (इंडियन प्रीमियर टेनिस लीग) टेनिस जिसमें विदेशी टीमों एवं खिलाडि़यों ने भाग लिया। नवंबर 2015 में हफ्ते-दस दिन चलने वाले विश्व कप हॉकी लीग का आयोजन भव्य और गौरवपूर्ण रहा। दिसंबर में लॉन टेनिस ने भीअपनी चकाचौंध बिखेरी। यह भी भव्य और महत्वपूर्ण आयोजन हुआ, छत्तीसगढ़ सरकार की मेजबानी में। और भी उदाहरण है जो यह जाहिर करते हैं कि शोक अपनी जगह पर है और समारोह अपनी जगह पर। जब ऐसी स्थिति है तो सवाल उठता है - साहित्य-संस्कृति का राष्ट्रीय समारोह क्यों नहीं? वह भी जब देश में असहिष्णुता पर अच्छी खासी बहस चल रही हो तथा साहित्य-संस्कृति के मनीषी इस मुद्दे पर अपनी राय पक्ष या विरोध में व्यक्त कर रहे हो, तब राज्य में साहित्य समारोह के बहाने क्या इस विषय पर चिंतन नहीं किया जा सकता था? संसद में बहस हो सकती है तो राज्य के सार्वजनिक मंच पर क्यों नहीं? क्या सरकार ने तय कर लिया था कि साहित्यिक आयोजन सिर्फ एक वर्ष होगा, हर वर्ष नही। इसकी क्या वजह? यदि ऐसा है तो धार्मिक आयोजन राजिम कुंभ प्रतिवर्ष क्यों? क्यों इस आयोजन पर प्रतिवर्ष 2 से 3 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं?
       दरअसल पिछले वर्ष समारोह के समापन के बाद ही तय हो गया था यह साहित्य महोत्सव पहला और आखिरी है। आयोजन इसलिए हुआ क्योंकि नौकरशाहों में कुछ ऐसे प्रखर बुद्धिजीवी थे जो चाहते थे सरकार को राजनीति से उपर उठकर साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में कुछ ऐसे कार्य करने चाहिए जिससे जनता के बीच अच्छा संदेश जाए और मुख्यमंत्री की छवि भी निखरे। इसी वजह से समारोह में वामपंथी विचारधारा के दिग्गज लेखकों, विचारकों व कलाकारों को भी आमंत्रित किया गया जिन्होंने सरकार का आमंत्रण न केवल स्वीकार किया वरन बाद में आयोजन की भूरि-भूरि प्रशंसा भी की। ऐसे लेखकों में प्रख्यात कवि व आलोचक अशोक वाजपेयी भी शामिल है। लेकिन वामपंथी विचारकों का एक वर्ग इसके खिलाफ था तथा उसने निमंत्रण स्वीकार करने वाले अपने सहविचारकों की खूब लानत -मलानत की। ऐसे लेखकों में प्रमुख है वीरेंद्र यादव व मंगलेश डबराल। वीरेंद्र यादव की प्रतिक्रिया देखिए - ''साहित्य संसार में रायपुर प्रसंग के गहरे निहितार्थ है। इसमें शामिल होने वाले लेखक भाजपा की उस सरकार के जनतांत्रिक होने को वैधता प्रदान कर रहे थे जो माओवाद के उन्मूलन के नाम पर छत्तीसगढ़ राज्य में असहमति की आवाजों और आंदोलनों का क्रूर दमन कर रही है। आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन की कारपोरेट लूट का संगठित अभियान जितना तेज रमन सिंह की सरकार के शासन में है, उतना पहले कभी नहीं था।''
अब मंगलेश डबराल की टिप्पणी - ''यह भाजपा सरकार का आयोजन है। यह क्यों हो रहा है, समझना कठिन है। दरअसल छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड जो तीन नए राज्य बने हैं, उनकी कोई सांस्कृतिक नीति नहीं है। छत्तीसगढ़ भौतिक रुप से सक्षम है लेकिन सांस्कृतिक तौर पर विपन्न। ऐसे में इस आयोजन का मतलब समझना मुश्किल है।''
         साहित्य समारोह के आयोजन के समर्थन में अशोक वाजपेयी ने अपने चर्चित स्तंभ 'कभी-कभार' में लिखा - ''किसी अंचल के शहरों जैसे जयपुर, लखनऊ, आगरा, अजमेर, बनारस, पटना में ऐसे साहित्यिक महोत्सव होते रहे है। लेकिन अधिकांश सरकार की पहल पर नहीं। ऐसे में रायपुर महोत्सव का सरकारी पहल पर होना अनूठा है। लोकतंत्र में हर सरकार की संस्कृति के प्रति जिम्मेदारी होती है। पर सरकार को संस्कृति के मसले को विचारधारा के ऊपर रखना चाहिए और दृष्टियों, शैलियों की बहुलता का सम्मान करना चाहिए।''
रायपुर महोत्सव पर प्रख्यात कवि विनोद कुमार शुक्ल की टिप्पणी बहुत सहज और सरल थी। उन्होंने कहा - 'कुछ तो हो रहा है' को कहना चाहूंगा - कुछ तो अच्छा होना चाहिए।''
तीन दिन और 53 सत्रों में चले रायपुर साहित्य महोत्सव के आयोजन पर वामपंथी विचारधारा के लोग ही गरजे- बरसे किन्तु, आश्चर्यजनक रुप से दक्षिण मार्ग के समर्थक लेखकों व साहित्यकारों ने खामोशी अख्तियार की। उन्होंने वामपंथियों की बहस में हस्तक्षेप नहीं किया। कोई एतराज नहीं जताया। कोई विवाद में नहीं उलझा। आयोजन आशा से अधिक सफल रहा तथा देश में इसकी अच्छी चर्चा हुई। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह वैसे ही सीधे-सरल राजनेता हैं। समारोह में वे स्वयं होकर लेखकों से एक-एक करके मिले, उनका कुशल-क्षेम पूछा। और मंच साझा न करके उन्होंने वामपंथी लेखकों की भावनाओं का सम्मान किया व राज्य में एक नई मिसाल कायम की। उनकी वैचारिक उदारता की छवि तो निखरी किन्तु आयोजन की निरंतरता को बनाए रखने के लिए वे न तो कठोरता से पेश आए और न ही प्रतिबद्धता दिखाई। राज्य में सूखा तो एक बहाना है, दरअसल साहित्यिक आयोजन, राजनीति और नौकरशाही के द्वंद्व का शिकार हुआ। भाजपा के अंदरखाने में यह चर्चा जोरदार हुई कि बड़ी संख्या में वामपंथी लेखकों को बुलाने की क्या जरुरत थी, क्यों इसे विवादास्पद बनाया गया? विचारधारा के विपरीत क्यों चला गया? कांग्रेस ने सवाल उठाया कि जब राज्य में नक्सली घटनाओं में बड़ी संख्या में आदिवासी मारे जा रहे हों एवं बिलासपुर नसबंदी कांड में दर्जनों महिलाओं की मृत्यु जैसी घटनाएं घटित हुई हों, किसान आत्महत्या कर रहे हों और इस वजह से राज्य में शोक का माहौल हो, तो साहित्य उत्सव क्यों होना चाहिए? नौकरशाही में भी श्रेय को लेकर खींचतान मची। यह कहा गया कि जनसंपर्क विभाग को मेजबानी करने की क्या जरुरत थी? यह संस्कृति विभाग का काम था। मुख्यमंत्री के सामने अपने को बेहतर साबित करने की कोशिश में साहित्य समारोह का आयोजन जनसंपर्क विभाग के आला अफसरों ने किया। जाहिर सी बात है, नौकरशाही के एक बड़े तबके ने आयोजन को पसंद नहीं किया लिहाजा इसकी निरंतरता खटाई में पड़ गई।
       बहरहाल सूखे की मार झेल रहे प्रदेश में साहित्य-संस्कृति की धारा किस तरह बहेगी, फिलहाल कहना मुश्किल है किन्तु यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी वर्ष में राज्य सरकार का धार्मिक अनुष्ठान ''राजिम कुंभ'' होगा अथवा नहीं। करोड़ों के खर्च का यह समारोह विगत वर्षों से नियमित रुप से हो रहा है। यदि अगले वर्ष 2016 में इसका आयोजन स्थगित रखा गया तो मानना होगा सरकार की समदृष्टि है। वरना साहित्य उसी खूंटी में टंगा नजर आएगा जहां कभी-कभार ही उसे हिलाया-डुलाया जाता है। और यह सवाल फिर गूंजेगा - ''पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है।''

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