न जोगी खारिज, न वोरा

-दिवाकर मुक्तिबोध
कांग्रेस बैठे-ठाले मुसीबत मोल न ले तो वह कांग्रेस कैसी? अपनों पर ही शब्दों के तीर चलाने वाले नेता जब इच्छा होती है, शांत पानी में एक कंकड़ उछाल देते है और फिर लहरे गिनने लग जाते हैं। छत्तीसगढ़ कांग्रेस में पिछले चंद महीनों से काफी कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। तीसरे कार्यकाल के ढाई साल देख चुकी रमन सरकार के खिलाफ उसका ऐसा आक्रामक रुप इसके पहले कभी देखने में नहीं आया। विशेषकर भूपेश बघेल के हाथों में प्रदेश कांग्रेस की कमान आने के बाद कांग्रेस की राजनीति में एक स्पष्ट परिवर्तन लक्षित है। बरसों से चली आ रही खेमेबाजी तो अपनी जगह पर कायम है पर आतंरिक द्वंद्व और गुटीय राजनीति के तेवर कुछ ढीले पड़े हैं। ऐसा लगता है कि प्रदेश कांगे्रस ने तीन वर्ष बाद सन् 2018 में होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव के लिए अभी से कमर कस ली है और एक सुनियोजित अभियान के तहत राज्य सरकार की नीतियों, उसके कामकाज के तौर-तरीकों, जनता से किए गए उसके वायदे, नीतियों के क्रियान्वयन में हो रही घपलेबाजी तथा आधारभूत संरचनाओं के निर्माण में भारी भ्रष्टाचार से संबंधित मुद्दे खड़े किए जा रहे हैं एवं जनता को सही संदेश देने के लिए सिलसिलेवार धरना प्रदर्शन, रैलियां एवं सभाएं की जा रही हैं। कुल जमा प्रदेश कांग्रेस विधानसभा के भीतर एवं बाहर एक दमदार विपक्ष की भूमिका का निर्वहन कर रही हैं ।
     
प्रदेश कांग्रेस में ऊपरी तौर पर नजर आने वाले दो स्पष्ट खेमे है। संगठन खेमे का नेतृत्व भूपेश बघेल एवं टीएस सिंहदेव करते हैं जिन्हें वयोवृद्ध नेता एवं राष्ट्रीय कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा का आर्शीवाद प्राप्त है। दूसरा खेमा पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का है जो संगठन खेमे से पिछले एक दशक से लड़ रहे हैं। गुटीय प्रतिद्वंद्विता के अनियंत्रित उफान की वजह से ही कांग्रेस पिछले तीन चुनाव हार चुकी है लेकिन अब चौथे के लिए फिलहाल सबक लेती दिख रही है। राज्य विधानसभा के चुनाव में अभी तीन वर्ष पड़े हुए हैं। काफी लंबा वक्त है इसलिए टीएस सिंहदेव द्वारा उछाले गए कंकड़ से राजनीति के अंत:पुर में जो लहरे उठ रही हैं उससे कोई बहुत ज्यादा नुकसान होने की संभावना नहीं है। अलबत्ता निश्चय ही उनका बयान गैरजरुरी था और इससे बाहृय तौर पर कांगे्रस में जो एकता नजर आ रही थी, उसे इससे झटका लगा है और तनाव का फिर  एक नया मोर्चा खुल गया है।
      टीएस सिंहदेव ने हाल ही में एक न्यूज चैनल को दिए गए इंटरव्यू में कह दिया कि मोतीलाल वोरा और अजीत जोगी के दिन लद गए हैं और अगले चुनाव में उनका नाम मुख्यमंत्री के रुप में प्रोजेक्ट नहीं किया जा सकता। उन्होंने इस दौड़ में भूपेश बघेल, चरणदास महंत, रविंद्र चौबे और सत्यनारायण शर्मा के साथ स्वयं को भी शामिल होना बताया। उनके इस बयान के बाद अजीत जोगी की प्रतिक्रिया स्वाभाविक ही थी। कांग्रेस में माहौल गर्म हो गया। अजीत जोगी ने कहा - ''टीएस सिंहदेव अपने मुंह मियां मिट्ठू बन रहे हैं। वे किसी खुशफहमी न रहे। राजशाही का दौर खत्म हो गया है। लोकतंत्र में किसका समय कब खत्म होता है जनता तय करती है। टीएस सिंहदेव, भूपेश बघेल, अजीत जोगी या मोतीलाल वोरा का समय कब खत्म होगा, यह भी जनता तय करेगी।''
    
कांग्रेस की राजनीति में यह वाकयुद्ध जारी है। पर यह अभी दोनों के ही बीच में है। कोई तीसरा, चौथा या पांचवां और दोनों खेमों के कांग्रेसी फिलहाल इस विवाद से दूर है। मोतीलाल वोरा ने भी सिंहदेव के विचारों पर कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं दी है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह विवाद ज्यादा तूल नहीं पकड़ेगा और शीघ्र शांत हो जाएगा लेकिन इसने प्रदेश कांग्रेस में एक नई बहस की शुरुआत तो कर दी है। सवाल है कि क्या कांग्रेस भी अपनी नीतियों में परिवर्तन करते हुए राज्य विधानसभा के आगामी चुनावों में मुख्यमंत्री के रुप में किसी को प्रोजेक्ट करेगी? पार्टी की मान्य परपंरा इसके खिलाफ है। कांग्रेस का अब तक का इतिहास रहा है कि आम चुनाव अथवा राज्य के चुनाव में वह किसी नाम को प्रोजेक्ट नहीं करती। चुनाव के बाद आलाकमान के निर्देश पर रायशुमारी की जाती है तथा बहुमत के आधार पर नेता का चयन किया जाता है। अगले वर्ष पश्चिम बंगाल सहित 5 राज्यों में चुनाव होने वाले है और उसके अगले वर्ष यानी 2017 में उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण चुनाव है। यानी अगले दो वर्ष पार्टी के लिए संभावनाओं से भरे हुए है।
     दरअसल बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों से कांग्रेस उत्साहित है। उसकी दृष्टि से परिणाम उसके लिए बेहतर रहे हैं जबकि सत्ता की प्रमुख दावेदारी रही भाजपा को पराजय के बाद अहसास हो रहा है कि मुख्यमंत्री का नाम प्रोजेक्ट न करके उसने गलती की। भाजपा अब पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों के चुनाव के संदर्भ में इस मसले पर विचार कर रही है। कांग्रेस में इस पर कोई गंभीर विचार-विमर्श नहीं है क्योंकि पश्चिम बंगाल में वह प्रमुख प्रतिपक्ष नहीं है। इसलिए उन राज्यों में जहां उसकी द्वितीय हैसियत नहीं है, उसे ऐसा करने की जरुरत नहीं है। उसे वहां बिहार की तरह अपना प्रदर्शन सुधारना है। लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में वह प्रमुख विपक्ष की भूमिका में है इसलिए नाम प्रोजेक्ट करना तार्किक कहा जा सकता है।
      लेकिन ऐसा करने से कांगे्रस के लिए खतरे ज्यादा है। क्योंकि वह पार्टी अनुशासन में भाजपा से बेहतर नहीं है। मिसाल के तौर पर देखें - सिंहदेव ने बयान क्या दिया विवाद का छोटा-मोटा ही सही, तूफान खड़ा हो गया। कल्पना कीजिए यदि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने वास्तव में किसी का नाम मुख्यमंत्री के बतौर प्रोजेक्ट किया तो क्या होगा? जब चुनाव की गंभीर तैयारियों के दौरान ही टिकट वितरण से लेकर चुनाव प्रचार तक आपस में तलवारें चलती हैं और सिपहसलार और प्यादें नापसंदगी व राजनीतिक दुश्मनी की वजह से एक-दूसरे को हराने की जुगत करते हैं, तब सोचा जा सकता है कि मुख्यमंत्री का नाम प्रोजेक्ट होने के बाद भीतरघात की शक्ल कितनी भयावह होगी? इसलिए वर्ष 2018 के राज्य विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस ऐसा कुछ नहीं करेगी जिससे उसकी संभावनाओं पर विराम लगे। अब सवाल है, टीएस सिंहदेव ने ऐसा विवादित बयान क्यों दिया? क्या इसके पीछे कोई खास वजह थी? स्थितियों को भांपने क्या हाईकमान की ओर से कोई संकेत था? या यों ही, बेखयाली में कह दिया ताकि जनता को पता चलें कि भावी मुख्यमंत्री की दौड़ में वे भी शामिल हैं। अंतिम बात ज्यादा सटीक नजर आती हैं।
     अब टीएस सिंहदेव के बयान का दूसरा पक्ष देखें। उन्होंने कहा मोतीलाल वोरा और अजीत जोगी के दिन अब लद गए। यानी अपनी निजी राय में उन्होंने इन दोनों को मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर कर दिया। मोतीलाल वोरा 85 के घेरे में है और चाल-ढाल से काफी अशक्त दिखते हैं किन्तु कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में उनके पैर अभी भी गहराई से जमे हुए हैं। इसलिए ऐन वक्त पर वे छत्तीसगढ़ में टपक पड़े तो हैरानी नहीं होनी चाहिए क्योंकि वे राज्य के कांग्रेसियों के सर्वमान्य है। उनका नाम आने पर सभी दावे-प्रतिदावे पस्त हो जाएंगे। इसलिए यह कहना है कि उनका समय बीत गया है, उचित प्रतीत नही होता। और जहाँ तक अजीत जोगी का सवाल है, वे सन् 2003 के चुनाव से ही दोबारा मुख्यमंत्री बनने की ख्याहिश पाले हुए हैं। सन् 2008 के चुनाव में तो उन्होंने अपनी सभाओं में स्वयं को मुख्यमंत्री के बतौर पेश भी किया। शारीरिक रुप से अशक्त होने के बावजूद उनके तेज में कमी नही आई है तथा उन्होंने अपने गुट को एकजुट और मजबूत रखा है। उन्हें सन् 2018 के चुनाव की प्रतीक्षा है। उनका प्रयास रहेगा, वे नहीं तो उनकी विधायक पत्नी मुख्यमंत्री बने। इसलिए उनके बारे में भी यह कहना कि उनके दिन समाप्त हो चुके है, ठीक नहीं है। फिर यह नहीं भूलना चाहिए कि कांगे्रस एक विस्मृत और मुख्यधारा से हट चुके नेता को भी अप्रतिम सौगात देकर जिंदा कर देती है। पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव इसके सर्वोत्तम उदाहरण है। इसलिए दोनों की भी संभावनाएँ जीवित हैं। कुल मिलाकर सिंहदेव विवाद का पटाक्षेप एक अप्रिय बहस के साथ समाप्त होने वाला है।

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