यादें : जब मुक्तिबोध ने ट्रेन की जंजीर खींची

 - दिवाकर मुक्तिबोध

नाम - श्री कन्हैयालाल अग्रवाल। उम्र 93 साल। मुकाम - राजनांदगांव, छत्तीसगढ़। पीढ़ी दर पीढ़ी। पिछले करीब डेढ़ सौ वर्ष से। व्यवसाय - व्यापार। संस्थान-भारती प्रिंटिंग प्रेस एवं बुक डिपो। स्थापना - 19 अगस्त 1948 स्वास्थ्य - एकदम फिट। चुस्त-दुरुस्त। अभी भी अपने रोममर्रा के काम के लिए किसी के सहारे की जरुरत नहीं, खुद करते हैं।
      यह संक्षिप्त परिचय एक ऐसे व्यक्ति का है जो कट्टर राष्ट्रवादी हैं, चिंतक हैं और जिसने अपने व्यवसाय के हित में कभी कोई अनैतिक कार्य नहीं किए। कोई समझौते नहीं किए। इसलिए सदर बाजार स्थित उनकी प्रिटिंग प्रेस एवं दुकान 66-67 साल पहले जिस हालत में थी, अभी भी उसी हालत में है।
     श्री कन्हैयालाल जी का एक और परिचय है जो साहित्यिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण  है। वे साहित्यिक नहीं है पर साहित्य और साहित्यकारों से उन्हें प्रेम है। विशेष लगाव है। साहित्यिक बिरादरी में प्राय: रोजाना उठना-बैठना होता रहा है और वे मेरे पिता स्व. गजानन माधव मुक्तिबोध के अनन्य मित्र रहे हैं। आज की तारीख में संभवत: पिताजी के एकमात्र जीवित मित्र।
     सन् 1958 में पिताजी नागपुर के ''नया खून''  से विदा लेकर राजनांदगांव दिग्विजय कॉलेज में प्रोफेसरी करने आए थे। इसके पूर्व नागपुर में श्री शरद कोठारी ने उनकी मुलाकात कन्हैयालालजी से करवाई थी। हम सब भाई-बहन छोटे-छोटे थे और राजनांदगांव आने के बाद केवल इतना जानते थे कि पिताजी की मित्र मंडली में कन्हैयालालजी भी है। वे अक्सर हमारे किलापारा स्थित घर में आया करते थे। पिताजी के साथ हम भी उनके यहां जाया करते थे। विशेषकर स्कूल खुलने के दिनों में, जब कापी-किताबों की जरुरत पड़ती थी। इसके अलावा भी दूसरे दिनों में जब मर्जी हो, हम उनके यहां पहुंच जाते थे, साथ में माँ भी हुआ करती थी। चूंकि उनके बेटे-बेटियां हमारी ही उम्र के थे इसलिए हमारी दोस्ती एक अलग रंग की हुआ करती थी। यह रंग कभी हमारे यहां बिखरता था तो कभी उनके यहां। उस जमाने की दोस्ती जिसे अब 50-55 वर्ष हो गए, अभी भी कायम है।
      11 सितंबर 1964 को पिताजी गुजरे और राजनांदगांव से रिश्ता करीब-करीब टूट सा गया। भिलाई नगर और रायपुर में पढ़ाई लिखाई और बाद में नौकरी। इस चक्कर में आधी सदी कब बीत गई पता ही नहीं चला। सालों-साल राजनांदगांव भी नहीं जा पाए अलबत्ता आत्मीय संबंधों की महक हृदय में बनी रही। शहर भले ही छूट जाए लेकिन मन के किसी कोने में वह हमेशा जीवित रहता है तथा एक अनोखे सुख का अहसास देता रहता है। इसलिए सिर्फ काम के सिलसिले में राजनांदगांव प्रवास और बिना किसी से मिले, रायपुर लौट आने के बावजूद उसी ताजगी का एहसास जीवित होता रहा जो बचपन में हुआ करता था। हमारे वास्तव में खूब मजे के दिन थे।
       राजनांदगांव में मेरे लिए ऐसा कुछ नहीं था कि व्यक्तिगत संबंधों पर कोई संस्मरण लिखूं। वहां हमारे कुल जमा वर्ष थे सन् 1958 से 1964 यानी महज 6 साल। वह भी बचपन के 6 वर्ष। इसलिए कभी ख्याल नहीं आया कि पिताजी के मित्रों से, घनिष्ठ मित्रों से जो गिनती के थे, कोई संस्मरणात्मक बातचीत करनी चाहिए। इसकी एक और वजह थी उनके (पिताजी) के साहित्यिक मित्रों ने जिनमें श्री शरद कोठारी एवं रमेश याग्निक (दोनों स्वर्गीय) प्रमुख थे, काफी कुछ लिखा था। इंटरव्यू दिए थे जो पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। इसलिए मेरे लिए कोई गुंजाइश नहीं थी। पर सच तो यही है कि पत्रकार होने के बावजूद मैं इस बारे में सोच नहीं सका और समय की रफ्तार के साथ पिताजी के ये दोनों घनिष्ठ दुनिया से विदा हो गए।
     एक दिन राजनांदगांव प्रवास के दौरान एकाएक ख्याल आया - कन्हैयालालजी से मिलना चाहिए। उनके बारे में, उनके स्वास्थ्य के बारे में रायपुर में सरकारी नौकरी कर रहे उनके बड़े बेटे भारत अग्रवाल से जानकारी मिल जाती थी। वे स्वस्थ्य हैं , अभी भी दुकान का कामकाज देखते हैं। इसलिए उनके स्वास्थ्य के प्रति निश्चितता थी। चूंकि मन उनसे मिलने के लिए उमड़ा जा रहा था, लिहाजा हम चारों भाई बड़े भैया रमेशजी, दिलीप, गिरीश और मैं एक दिन उनके घर-दुकान पहुंच गए। गोरे चिट्टे और दुबले-पतले कन्हैयालालजी के प्रभावशाली व्यक्तित्व पर उम्र की कोई खरोंचे नहीं आई थी। अभी भी वैसे ही थे, ताजा दम। हल्की-फुल्की बातें हुई, कुछ यादें उन्होंने ताजा की। उनका स्नेह भरा आशीर्वाद लेकर हम रायपुर के लिए लौटे तो इस इरादे के साथ कि शीघ्र दुबारा राजनांदगांव जाकर कन्हैयालालजी से पिताजी के संबंध में लंबी बातचीत करेंगे।
      उम्र भले ही कितनी भी क्यों न हो जाए, जिंदगी की भाग-दौड़ कभी कम नहीं होती। सो राजनांदगांव जाने का मामला टलता रहा। आखिरकार नवम्बर 2015 को फिर हम चारों कन्हैयालालजी से मिलने राजनांदगांव पहुंच गए। हमारे लिए यह आश्चर्य की बात थी कि इसके पूर्व कन्हैयालालजी से किसी ने कोई इंटरव्यू नहीं लिया और न ही कोई बातचीत की। जबकि पिताजी के राजनांदगांव के मित्रों का पत्र-पत्रिकाओं में जहां कहीं भी जिक्र हुआ, कन्हैयालालजी भी उसमें नामांकित रहे हंै। सिर्फ नामांकित। यह वंचना शायद इसलिए क्योंकि कन्हैयालालजी साहित्यिक चर्चाओं में केवल श्रोता के रुप में उपस्थित रहते थे। बहस-मुबाहसे में उनकी भागीदारी नहीं हुआ करती थी। खुद कन्हैयालालजी का मानना था कि मुक्तिबोध के साहित्य पर वे क्या बोल सकते थे। लेकिन राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मसलों पर चलने वाले विमर्श में उनकी खूब भागीदारी रहती थी। इसलिए किसी के साथ संस्मरणों को साक्ष करने जैसी बात कभी नहीं बनी अलबत्ता अनौपचारिक बातचीत में वे पिताजी के साथ बिताए गए दिनों का जिक्र अवश्य किया करते थे। बहरहाल हमारे उनके साथ बातचीत महज आधे घंटे चली। इस आधे घंटे में उन्होंने पिताजी से संबंधित कुछ घटनाओं का जिक्र किया जो पिताजी की प्रकृति का आभास कराती है। ये यादें अनोखी हैं, अद्भुत है। उन्हीं की जुबानी संस्मरण के कुछ किस्से सुनिए -
*        मुक्तिबोध सन् 1958 में नागपुर से परिवार एवं साजो सामान के साथ राजनांदगांव आ रहे थे। पैसेंजर से। ट्रेन का नांदगांव में स्टॉपेज महज 1-2 मिनट का था। इतने कम समय में घर-घर गृहस्थी के सामान को उतारना संभव नहीं था। और तो और मुक्तिबोध जी को नींद लग गई है। राजनांदगांव स्टेशन आने पर एक सहयात्री ने उन्हें उठाया। मुक्तिबोध जी घबरा गए। किसी ने उन्हें सलाह दी ट्रेन के शुरु होते ही चेन खींच दीजिए। मुक्तिबोध ने ऐसा ही किया। ट्रेन 5-6 मिनट तक रुकी रही और इस बीच सामान नीचे उतर गया। लेकिन कुछ दिनों बाद मुक्तिबोध के नाम कोर्ट का नोटिस आ गया। अदालत में हाजिरी देने के निर्देश। पेशियां अटेण्ड करते-करते मुक्तिबोध परेशान। एक दिन उन्होंने मुझे ये परेशानी बताई। मैंने कहा चिंता ना करें। मैंने पता लगा जज दामले थे। लाँजी वाले मेरे मित्र के बेटे। लेकिन मैं उनसे इस विषय पर सीधी बात नहीं कह सकता था। एक दिन व्यापारिक कार्य से मैं लाँजी गया और दामले के यहाँ भोजन के दौरान उन्हें परेशानी बताई। नतीजा यह निकाला कि अगली ही पेशी में मामला खत्म हो गया। मुक्तिबोधजी ने चैन की सांस ली। मुझे भी अच्छा लगा कि मैं उनके काम आया।
*         एक और घटना है। मुक्तिबोध बहुत स्वाभिमानी थे। आर्थिक संकट से घिरे रहते थे किन्तु किसी से कहते कुछ नहीं थे। उनकी मदद के लिए मुझे एक उपाय सूझा। मैंने उन्हें 500 रुपये दिए और कहा दुर्ग जिले के सामाजिक अध्ययन पर एक किताब लिख दीजिए। मैंने उन्हें संदर्भ देखने कुछ किताबें दे दी। मुक्तिबोधजी ने कहा किताब तो लिख दूंगा पर उसमें मेरा नाम नहीं जाएगा। मैंने कहा मंजूर है। उन्होंने किताब लिखी और वह हीरालाल सोनबोईर के नाम से छपी। अपने लिखे पर दूसरे का नाम देखना सहज नहीं है। पर पैसों की दिक्कत के चलते मुक्तिबोधजी ऐसा लेखन किया करते थे।
*       मुक्तिबोध से पहली मुलाकात नागपुर में हुई, शरद कोठारी के साथ। दिग्विजय कॉलेज नया-नया खुला था। शरद कोठारी चाहते थे, मुक्तिबोध यहां आए। उन्होंने मुझे उनके बारे में बताया। कोठारी के साथ मैं भी कॉलेज प्रबंधन कमेटी का सदस्य था। राजनांदगांव जिले के निर्माता और तत्कालीन मध्यप्रदेश के पूर्व मंत्री किशोरीलाल शुक्ल अध्यक्ष थे। कोठारी निंश्चित थे, मैं कहूंगा तो शुक्ल ना नहीं करेंगे। नागपुर में मुक्तिबोधजी से मुलाकात के बाद मैंने शुक्लजी से बात की। बात बन गई। शुक्लजी ने मंजूरी दी और मुक्तिबोध दिग्विजय कॉलेज में लेक्चरर की नौकरी पा गए। उनका यहां आना कितना सार्थक रहा, यह सभी को ज्ञात है। उनका महत्वपूर्ण लेखन राजनांदगांव में ही हुआ। क्योंकि उनके जीवन में कुछ निश्चिंतता आई थी। अर्थभाव कुछ कम हुआ था।
*     किशोरीलालजी के बारे में कुछ कहूं। वे उदारवादी, सरल व्यक्ति थे। मुक्तिबोधजी माक्र्सवादी थे। उनकी गतिविधियों पर शासन के लोग नजर रखते थे। किशोरीलालजी से पूछा गया कि मुक्तिबोध अपने माक्र्सवादी चिंतन को छात्रों पर थोपने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं? शुक्लजी से रिपोर्ट मांगी गई। उन्होंने शासन को जवाब दिया - मुक्तिबोधजी अध्यापन के दौरान विचारों का घालमेल नहीं कर रहे हैं। वे अपने कत्र्तव्य के प्रति बहुत सचेत और ईमानदार हैं।
*         मुक्तिबोधजी लेखक और कवि हैं, हम इतना ही जानते थे। लेकिन इतने महान थे, इसका अहसास उनकी मृत्यु के बाद हुआ। उन्हें गुजरे हुए 50 साल से ज्यादा हो गए है लेकिन उनकी ख्याति उत्तरोत्तर बढ़ रही है। मुझे गर्व है कि इतने बड़े साहित्यकार मेरे मित्र हैं। राजनांदगांव में रहते हुए उनका मुझे भरपूर स्नेह मिला जो मेरे लिए जीवनभर की पूंजी है।
पिताजी की यादों में खोए कन्हैयालाल अग्रवाल ज्यादा कुछ नहीं कह पाए। लेकिन उनकी ऑखों में यादों के झिलमिलाते अक्स को देखा-पढ़ा जा सकता था। 93 की उम्र में घटनाओं को याद रखना कम बड़ी बात नहीं है। यह हमारा सौभाग्य है कि उनके जैसे प्रखर राष्ट्रवादी एवं उनके स्नेहिल परिवार से हमारे घनिष्ठ संपर्क रहे हैं और वे आज भी हैं।

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