इंतजार है जब लोग कहेंगे बैस मजबूरी नहीं, जरुरी है

- दिवाकर मुक्तिबोध   
      
प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं रायपुर लोकसभा से 7 बार के सांसद रमेश बैस पर अरसे से मेहरबान किस्मत अब रुठती नजर आ रही है। राज्य में मोतीलाल वोरा के बाद बैस को ही किस्मत का सबसे धनी नेता माना जाता है। कांग्रेस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष व कार्यसमिति के सदस्य वयोवृद्ध वोराजी पर किस्मत अभी भी मेहरबान है बल्कि उसमें और चमक पैदा हुई है क्योंकि वे सोनिया गाँधी के सबसे अधिक विश्वासपात्रों में से एक है। पर अब भाजपा में रमेश बैस के साथ ऐसा नहीं है। भाग्य दगा देने लगा है जबकि इसी के भरोसे वे भाजपा की राजनीति में सीढिय़ां चढ़ते रहे हैं। राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों को अभी भी अच्छी तरह याद होगा कि अटलजी के जमाने में लोकसभा चुनाव के दौरान छत्तीसगढ़ में एक नारा बुलंद हुआ करता था - 'अटल बिहारी जरुरी है, रमेश बैस मजबूरी है।Ó इस नारे में सारा फलसफा छिपा हुआ है। लेकिन अब नरेंद्र मोदी-अमित शाह के युग में रमेश बैस न तो जरुरी है और न मजबूरी। इसलिए आगामी लोकसभा चुनाव में जो 2019 में होने वाला है, बैस की पतंग कट सकती है बशर्ते उन पर किस्मत फिर फिदा न हो जाए।
यकीनन बैस के सितारे गर्दिश में चल रहे है। दरअसल मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के सन् 2003 में मुख्यमंत्री बनने के बाद बैस की उनसे कभी नहीं बनी। हुआ यूं कि बैस भविष्य की राजनीति में पढऩे में गच्चा खा गए। अंदाज नहीं लगा पाए कि छत्तीसगढ़ में वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सरकार बन सकती है। उनके पास मौका था। जब वे और रमन सिंह केंद्र में मंत्री थे तो छत्तीसगढ़ भाजपा की बागडोर सम्हालने के लिए उनसे पूछा गया। अध्यक्ष बनने का अर्थ था केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा। बैस राजी नहीं हुए, रमन सिंह तैयार हो गए। बस यहीं बैस चूक गए।  अप्रत्याशित रुप से भाजपा रमन सिंह के नेतृत्व में 2003 का विधानसभा चुनाव जीत गई और स्वाभाविक रुप से उन्हें मुख्यमंत्री चुन लिया गया। काश, यदि बैस से उस समय गलती न हुई होती तो वे रमन सिंह की जगह मुख्यमंत्री होते व लगातार तीसरा कार्यकाल देखते। किन्तु यहाँ किस्मत ने आँखें जरुर तरेर दी पर उन्हें 2004, 2009 व 2014 का लोकसभा चुनाव जीताते गई। इसके पूर्व लोकसभा चुनाव की गिनती करें - 1989, 96, 98, 99 यानी 7 बार लोकसभा के लिए चुना जाना बहुत मायने रखता है। यह बैस की लोकप्रियता का प्रमाण भी है किन्तु इतना सब होने के बावजूद भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उन्हें हाशिए पर ढकेलने तुला हुआ है। क्या गलती हो गई बैस से?
           दरअसल अब भाजपा की राजनीति में खेल, किस्मत का नहीं परफार्मेन्स का है। भाजपा में अटल-आडवाणी व मुरली मनोहर जोशी जैसों का जमाना लद चुका है। एक-एक करके महत्वपूर्ण पदों पर बैठे ऐसे तमाम नेताओं को किनारे किया जा रहा है जो पार्टी की नीतियों एवं मापदण्डों के अनुरुप अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे पा रहे है। बैस अपने ससंदीय जीवन के 30 वर्ष पूर्ण कर चुके है और 7वीं पारी खेल रहे हंै। कुल जमा 32 वर्ष। इस दौरान याद नहीं आता कि ससंद में उन्होंने कभी छत्तीसगढ़ के मुद्दों को जोर-शोर से उठाया हो। वे दो अलग-अलग अवधि में केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी रहे किन्तु केवल शोभा बनकर रह गए। इसलिए भाजपा तो भाजपा छत्तीसगढ़ में आम व खास चर्चाओं में उन पर ठप्पा लग गया कि वे किसी काम के नहीं। चुनाव जीतना अलग बात है, जीतने के बाद जनता की कसौटी पर खरे उतरना अलग बात। सरल व शान्त स्वभाव के रमेश बैस यही मार खा गए। लोकसभा चुनाव तो जीतते हुए पर अपने कामकाज से केंद्रीय नेतृत्व का दिल नहीं जीत पाए।
लेकिन पिछले चंद वर्षों से वे कुछ करना चाहते थे, कुछ कर दिखाना चाहते थे। वे अविभाजित मध्यप्रदेश व बाद में छत्तीसगढ़ भाजपा संगठन में महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके थे। चूंकि कुछ कर दिखाने की चाहत थी इसलिए वर्ष 2010 में प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में उन्होंने अपनी दावेदारी पेश कर दी। पिछड़े वर्ग से थे, वरिष्ठता के नाते दावेदारी तो बनती थी। लेकिन रमन सिंह की पसंद नहीं थे, इसलिए बैस को निराशा हाथ लगी। वे मनमसोसकर रह गए। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी भड़ास राज्य सरकार के कामकाज पर नुक्ताचीनी करके निकालनी शुरु की। प्रखर आलोचक तो नहीं बने पर हौले-हौले चिमटियां काटते रहे। अप्रत्याशित रुप से जब वर्ष 2014 में केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा सरकार का अभ्युदय हुआ तो उन्हें प्रगाढ़ उम्मीदें नजर आने लगी। लेकिन मोदी मंत्रिमंडल के गठन में उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। 7 बार के सांसद की अहमियत को समझा नहीं गया। खैर दूसरे विस्तार के पूर्व फिर चर्चाओं ने जोर पकड़ा कि इस बार तो मंत्रिमंडल में प्रवेश पक्का है। पर इस बार भी दाल नहीं गली। फिर तीसरे की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखा जाने लगा। पर हत्भाग, फिर निराशा। विष्णुदेव साय मंत्री बन गए - बैस रह गए। कैसे रुठी किस्मत। हाय रे किस्मत।
           यह तो तय है राजनीति में ऐसी स्थितियों का सामना करना बहुत मुश्किल होता है। जी को कड़ा करके चेहरे पर मुस्कान लानी पड़ती है। इंतजार करना पड़ता है, कर्म करते हुए भाग्य कब खिलेगा? लेकिन भाग्य का खिलना तो दूर, उसने एक और पटखनी दे दी। गत 16 वर्षों से जिस प्रदेश कोरग्रुप के वे सदस्य थे, वे वहाँ से भी हटा दिए गए। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने उनके नाम पर मोहर नहीं लगाई। आदिवासी मुख्यमंत्री को अरसे से हवा देने वाले आदिवासी नेता नंदकुमार साय को भी चलता कर दिया। बैस तसल्ली कर सकते है कि मैं नहीं तो साय भी नहीं। बहरहाल भविष्य की राजनीति पर अभी कुछ कहना मुश्किल है। लोकसभा के चुनाव 2019 में होंगे और उसके पूर्व राज्य विधानसभा के चुनाव निपट जाएंगे। इसी बीच समीकरण काफी बदलेंगे। बैस को रायपुर लोकसभा से आठवीं बार टिकिट मिलेगी या नहीं, यह अब उनके राजनीतिक कामकाज के तौर-तरीकों पर निर्भर है। लेकिन उनके लिए फिलहाल आसार अच्छे नहीं नजर आ रहे हैं। यदि उन पर लगा यह तमगा किसी तरह हटा दिया जाए कि बैस मजबूरी नहीं, जरुरी है तो बात बन सकती है। पर क्या ऐसा होगा?

                

Comments

  1. बैस जी की किस्मत वाकई खराब, 7वीं बार भी लोकसभा में तस्वीर की भांति सुशोभित हो रहे है।

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