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मुक्तिबोध:प्रतिदिन (भाग-7)

मुक्तिबोध के पत्र
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मुक्तिबोध रचनावली के खंड छह में उनके द्वारा अपने मित्रों को लिखे गए पत्र संकलित हैं। उनमें से कुछ चिट्ठियों के कुछ अंश यहां दिए जा रहे हैं जिनमें मुक्तिबोध जी की मन:स्थिति, साहित्य व सामाजिक परिवेश के संदर्भ में उनकी चिंताएं दृष्टिगत होती है।

श्री नेमिचंद्र जैन को पत्र 
दिनांक 26-10-1945 
रोज़ लिखने की सोचता हूँ। लिखता भी हूँ पर बहुत थोड़ा। आप विश्वास नहीं करेंगे,  एक कविता को दुरुस्त करने में छह घंटे लगते हैं। मैंने कई सुधार भी दी है। कई तो सुधार की प्रक्रिया में परिवर्तित हो गई है। पता नहीं कब तक मैं कविताओं को यों सुधारता बैठूँगा।
पर अब साहित्यिक श्रम मुझे करने ही पड़ेंगे। हिंदी सुधारने की कोशिश शुरू हो गयी है। छोटी-सी phrase (फ्रेस), कोई चुस्त जबान-बंदी झट नोट कर लिया करता हूँ, बिलकुल शॉ के 'लेडी ऑफ द डार्क' के शेक्सपियर की भांत।
    इससे पहले, मैं हिंदी के साहित्यिक प्रयासों के सिवाय, कभी भी लिखा नहीं करता था। मेरे अत्यन्त आत्मीय विचार मराठी या अंग्रेजी में निकलते थे, जिसका तर्जुमा, यदि अवसर हो तो हिंदी में हो जाता था। इसलिए जानबूझकर यह पत्र हिंदी में लिख रहा हूँ। मेरा खय़ाल है कि मेरी भाषा सुंदर न भी हो सके, वह सशक्त होकर रहेगी, क्योंकि उसके पीछे अंदर का ज़ोर रहेगा। बतलाइए, क्या मेरा सोचना ग़लत है? इसके बारे में आप ज़रूर लिखिये। मुझे साज-सँवार की प्रतिष्ठित बोली पसंद नहीं। चाहता हूँ इसके विषय में आप मत-प्रदान करें। क्या मैंअपनी हिंदी सुधार सकता हूँ? उसे सक्षम, सप्राण और अर्थ-दीप्त कर सकता हूँ ?
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नेमिचन्द्र जैन को पत्र
दिनांक 30-10-1945
नैराष्य के गीत मैंने लिखना बंद सा कर दिया है। और जो भी चमकीले गीत मैंने इधर लिखे हैं, उनमें मात्र क्षोभ और उत्ताप की अग्नि-लताएँ हैं। इन नये गीतों से भी मै नाराज़ हूँ, और आधुनिकतावाद के गीतों में भरी हुई सर्दी की ठिठुरन से तो अब ऊब उठा हूं।
    परंतु आज की वास्तविक परिस्थिति के आदर्शवाद को सही समझते हुए भी बार बार लगता है कि जब तक मैं अपने को पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं कर लेता, और अपना तन-मन-धन एकाग्र नहीं कर लेता तब तक जि़ंदगी गधे की चाल में चलती रहेगी। रहेगी न?
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नेमिचन्द्र जैन को पत्र
दिनांक 4-3-1958
पिछले कई दिनोंं से मेरा स्वास्थ्य जर्जर है, रगें कमज़ोर हो गयी हैं। दवाओं से विशेष लाभ नहीं हो पाया। शरीर आराम व शांतिपूर्ण व्यवसाय माँगता है। शरीर पर अधिक बोझ पड़ते ही, मानसिक थकान और अवसन्नता आ घेरती है। फ़ालतू की झंझटों मन पर भार रहने के फलस्वरूप लिखाई होना बहुत मुश्किल हो जाता है। मुझे आशा है कि राजनांदगांव पहुँचकर मुझे कुछ आराम मिलेगा और स्वयं के साहित्यिक कार्य के लिए कुछ फ़ुरसत मिलेगी। शहर छोटा होने के कारण जिंदगी का अस्तित्व बनाये रखने का संघर्ष भी कुछ कम होगा।
    नौ वर्ष की सरकारी नौकरी ने कुछ नहीं दिया, तोहमत दी, राजनैतिक और सामाजिक तोहमत। प्राइवेट कम्पनियों की नौकरी पर भी अब भरोसा नहीं रहा। माया मिली न राम! ऊपर से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य चौपट हो गया। मैंने कभी किसी से झगड़ा-झांसा नहीं किया, साथ ही अपने अधिकारियों को ख़ुश रखने की अज़हद कोशिश की, फिर भी हानि की हानि।
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श्री नेमिचंद्र जैन को पत्र
दिनांक-26-10-1945
मेहनत करूं तो लेखन से पैसे मिल सकते हैं। इसमें संदेह नहीं। पर साहित्यिक श्रम जितना अधिक आवश्यक है उतना ही अभाव है समय का। दुनिया के सारे कार्यों से निवृत हो, थकी हुई पीठ और बोझिल मस्तिष्क से, टिमटिमाते कंदील के धुँधले प्रकाश में क़लम चलने तो लगती है पर ख़ुद को कोसती हुई। इस मेहनत को देखते हुए, मुझे हर कविता के पाँच रूपये प्रकाशक से चार्ज करना चाहिए ।
(रचनावली खंड 6 द्वितीय संस्करण में संकलित )

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