त्रिकोणीय संघर्ष हुआ तो बनेगी बात


क्या चौथी बार भी रमन?

-दिवाकर मुक्तिबोध        गुजरात लगातार 6वीं बार फतह के बाद भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व भले ही संतोष का अनुभव करें लेकिन यह बात स्पष्ट है कि अगले वर्ष छत्तीसगढ़ सहित 4 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी की राज्य इकाइयों पर दबाव कुछ और बढ़ गया है। यदि पार्टी गुजरात चुनाव हार जाती तो मुंह छिपाने के लिए क्षेत्रीय प्रक्षपों को जगह मिल जाती। पर गुजरात में 22 साल की परिपक्व सत्ता विरोधी लहर का बखूबी सामना करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी ने चुनाव जीत लिया तथा कांग्रेस मुक्त भारत के अपने अभियान की ओर एक कदम और आगे बढ़ाया। अब आगे की जिम्मेदारी उन राज्यों पर हैं जहां अगले वर्ष चुनाव होने है। इनमें प्रमुख हैं छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान व कर्नाटक। तीन राज्यों छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश व राजस्थान में भाजपा की सरकारें है जिसमें छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश में क्रमश: डा. रमन सिंह व शिवराज सिंह चौहान अपना लगातार तीसरा कार्यकाल पूरा करने जा रहे हैं। लोकसभा के चुनाव वर्ष 2019 में होने हैं और इस बात की जमकर चर्चा है कि पूरे देश में लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा के चुनाव करा लिए जाएं। इसके लिए एक विधेयक संसद में पेश होने की संभावना जताई जा रही है। यदि ऐसा होता है तो कुछ विधानसभाओं के अगले वर्ष प्रस्तावित चुनाव टल जाएंगे जिसमें छत्तीसगढ़ भी होगा जहां वर्ष 2018 के नवंबर में चुनाव तय है। जाहिर है मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को अपना साम्राज्य बचाने समय की कुछ और मोहलत मिल जाएगी। 
     भाजपा के केद्रीय नेतृत्व की मंशा एकदम साफ है। पार्टी पिछले तीन वर्षों से नरेंद्र मोदी के जादुई व्यक्तित्व की तूफानी लहरों पर सवार है तथा पूरे देश से कांगे्रस सफाए के लिए इसका पूरा-पूरा लाभ उठाना चाहती है। कांगे्रस सहित समूचा विपक्ष लगभग बिखरी हालत में है तथा उस पर आखिरी चोट करने का मौका लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ-साथ करने से मिल सकता है। वैसे भी गुजरात व हिमाचल प्रदेश हारने के बाद कांग्रेस सिर्फ 5 राज्यों तक सिमट कर रह गई है। जबकि भाजपा का 19 राज्यों में फैलाव है।
बहरहाल लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा चुनाव एक संभावना है। यह खारिज भी हो सकती है। ऐसी स्थिति में जाहिर है छत्तीसगढ़ विधानसभा के चुनाव नियत समय पर ही होंगे। यानी विगत 14 वर्षों से शासन कर रहे मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के पास अपना मुख्यमंत्री पद बचाने, बशर्ते वह बच जाए तथा लगातार चौथी बार भाजपा को सत्ता में लाने के लिए महज 11 महीने शेष हैं। इन 11 महीनों में उन्हें कुछ ऐसा करिश्मा कर दिखाना है जिससे सत्ता विरोधी लहर जो जोर-शोर से चली आ रही है, दब जाए तथा राज्य के मतदाता एक बार फिर भाजपा के पक्ष में फैसला करें। लेकिन सवाल है गुजरात में नरेंद्र मोदी व अमित शाह की जोड़ी ने 22 वर्षीय सत्ताविरोधी लहर को शांत कर दिया था जो मुख्यत: मोदी के चमत्कारिक नेतृत्व व लोक-लुभावन भाषणों की वजह से संभव हुआ था पर रमन सिंह नरेंद्र मोदी नहीं है अलबत्ता उनका व्यक्तित्व भी बेजोड़ है और सार्वजनिक सभाओं में खासकर ग्रामीण अंचलों में उनकी बतकही भी लोगों को लुभाती है। पर यह पर्याप्त नहीं है क्योंकि गुजरात में नरेंद्र मोदी के अलावा विकास का अपना मॉडल है जिसकी पूरे देश में लगभग दो दशकों से चर्चा होती रही है, जबकि छत्तीसगढ़ में पीडीएस सिस्टम के अलावा ऐसा कुछ नहीं है जो देश भर में चर्चित हो, बल्कि राज्य में विकास मूलत: शहर केन्द्रित है। शहरी विकास का यह मॉडल राज्य की गरीबी दूर नहीं कर सका है। राज्य के लगभग 52 फीसदी आदिवासी लोग गरीबी रेखा के नीचे है जबकि कुल बीपीएल 40 प्रतिशत हैं। नीति आयोग की राजधानी रायपुर में 17 नवंबर 2017 को हुई बैठक में इस बात पर चिंता व्यक्त की गई कि छत्तीसगढ़ में शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार व पोषण के क्षेत्रों में विशेष ध्यान देने की जरुरत है। आयोग के अध्यक्ष राजीव कुमार का कहना था कि बस्तर में बहुत ज्यादा काम करने की जरुरत है। स्पष्ट है नीति आयोग रमन सरकार के कामकाज से संतुष्ट नहीं है। 
     खैर, यह तो एक बात हुई। गरीबी और गरीब एक शाश्वस्त सत्य है जिसका चुनाव की राजनीति से कोई सरोकार नही। इंदिरा गांधी ने जरुर गरीबी हटाओ नारा दिया था जिसे दुहराने की जरुरत वर्तमान राजनीति में नहीं है। विकास योजनाओं से गरीबी यदि घट भी रही है तो उसकी रफ्तार बहुत ही सुस्त है। छत्तीसगढ़ भी इससे परे नहीं है। बहरहाल मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के सामने आगामी चुनाव जीतने ढेरों चुनौतियां हंै। पहली चुनौती है कांगे्रस से जो पिछले कुछ महीनों से विशेषकर भूपेश बघेल के नेतृत्व सम्हालने के बाद आक्रामक है और जोर-शोर से जनहित एवं जनसमस्याओं से संबंधित मुद्दे उठाते रही है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि तमाम अंतर विरोधों, भयंकर गुटबाजी, प्रत्याशियों का गलत चयन एवं भीतरघात के बावजूद पिछले तीन विधानसभा चुनावों में कांगे्रस ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी तथा मुकाबला कभी एक तरफा नहीं होने दिया। दोनों के बीच वोटों का अंतर भी 1 प्रतिशत से भी कम रहा तथा भाजपा साधारण बहुमत से केवल 4-5 सीटें ही अधिक जीत पाई। 90 सीटों की विधानसभा में बहुमत के लिए 46 सीट जीतनी जरुरी होती हैं। विधानसभा में सत्तारूढ़ दल की सदस्य संख्या 49 है। यह अंतर ऐसा नहीं है कि पाटा न जा सकें। अगले वर्ष के चुनाव में यह अंतर पट जाए और कांगे्रस जीत जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
     इस संभावना के पीछे कुछ तर्क दिए जा सकते हैं हालांकि भाजपा के पक्ष में भी कुछ बातें है। एकजुटता में कमी के बावजूद कांगे्रस मुद्दे तो उठाती रही है। और आगे भी बहुत तेजी से उठाएगी। राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने का बड़ा प्रभाव पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं और नेताओं पर पड़ा है। प्रदेश की राजनीति में वे अपना बेहतर भविष्य देख रहे हैं। लेकिन कांग्रेस को सबसे ज्यादा नकारात्मक वोटों का सहारा है जिसे सत्ता विरोधी लहर कह सकते हैं। प्रदेश की जनता रमन सिंह को लगातार 14 वर्ष से बतौर मुख्यमंत्री देख रही है। उनके कामकाज पर सवाल नहीं है पर उनकी सरकार, उनके मंत्री, उनकी नौकरशाही लगातार सवालों के घेरे में रही है। आम चर्चा में यह कहा जाता है -  'बहुत हो चुका, अब बदलाव चाहिए।' यह नकारात्मकता या जनता की सोच पार्टी पर भारी पड़ सकती है। प्रदेश कांग्रेस को इस सोच का बड़ा सहारा है बशर्ते वह अंत तक यानी मतदान तक कायम रहे।
    अंतु-परंतु के बीच कुछ राजनीतिक परिस्थितियां भाजपा के भी अनुकूल है। इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण है पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के नेतृत्व में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ की मौजूदगी। यह कांगे्रस की ही बी पार्टी है जिसे मुख्यमंत्री रमन सिंह तीसरी शक्ति मानते हैं तथा चुनाव में त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बताते हैं। यह स्थिति उनके लिए मुफीद है। चुनाव में इस पार्टी की उपस्थिति से भाजपा विरोधी वोटों का विभाजन होगा जिससे पार्टी की राह आसान हो जाएगी। यानी वर्ष 2003 फिर अपने आप को दुहराएगा। उस चुनावी वर्ष में जो नए राज्य के रुप में छत्तीसगढ़ का पहला विधानसभा चुनाव था, विद्याचरण शुक्ल के नेतृत्व में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने कांग्रेस के प्रतिबद्ध वोटों का ऐसा विभाजन किया कि भाजपा सत्ता में आ गई। एनसीपी प्रदेश में कांग्रेस की बी पार्टी थी जो भाजपा की जीत का कारण बनी। इस समय भी यह बी पार्टी जिसका नेतृत्व अजीत जोगी कर रहे हैं, कांगे्रस की संभावना को कमतर करती है बशर्ते दोनों पार्टियां एक न हो जाए यानी जोगी पुन: कांग्रेस में ले लिए जाएं या फिर दोनों के बीच सीटों का तालमेल हो जाए। चूंकि गुजरात हाथ से फिसल गया हैं लिहाजा कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व नहीं चाहेगा कि छत्तीसगढ़ में इसका दुहराव हो जहां पार्टी की जीत की प्रबल संभावनाएं है। इसलिए केंद्रीय नेतृत्व की पहल पर यह संभव है कि दोनों पार्टियों के बीच सम्मानजनक शर्तों पर तालमेल हो जाए। भूपेश बघेल जिनके खिलाफ बहुचर्चित सीडी सेक्स कांड में सीबीआई ने अपराध दर्ज किया है यदि हटा दिए जाते हैं तो विलय की संभावना और भी प्रबल हो जाएगी। यह बात बहुत स्पष्ट है कि भूपेश बघेल ने ही अजीत जोगी व उनके विधायक पुत्र अमित जोगी को बाहर का रास्ता दिखाया तथा नई पार्टी बनाने मजबूर किया। चर्चा है कि कांग्रेस का एक वर्ग तालमेल के लिए प्रत्यनशील है। और यदि ऐसा कोई गठजोड़ होता है तो यकीनन भाजपा का चौथी बार सत्ता पर काबिज होने का सपना ध्वस्त हो जाएगा। भाजपा के लिए कांगे्रस का एक होना चिंता का विषय है। इसी संदर्भ में अजीत जोगी की पार्टी को तीसरी शक्ति का दर्जा देना, उसकी पीठ थपथपाने जैसा है जिसके राजनीतिक निहितार्थ हैं। इससे यह ध्वनि निकलती है कि डटे रहो - 'हम तुम्हारी हर तरह से मदद करेंगे'। अब बिना भारी भरकम फंड के कोई चुनाव तो लड़ा नहीं जा सकता और नई पार्टी के लिए अपने दम पर पर्याप्त धन का जुगाड़ करना बहुत संभव भी नहीं है। जोगी कांग्रेस को फंड की जरुरत है और यदि कहीं से इसकी आपूर्ति होती है तो उसे स्वीकार करने में दिक्कत क्या है? 
     तो, भाजपा चाहेगी अगला चुनाव त्रिकोणीय हो ताकि उसकी संभावनाएं जीवंत रहे। यह इसलिए भी जरुरी है क्योंकि इसके आधार पर मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह का राजनीतिक भविष्य भी टिका हुआ है। मोदी-शाह की नाराजगी का खतरा वे मोल नहीं ले सकते लिहाजा हर सूरत में चुनाव जीतना चाहेंगे। वे मोदी लहर पर सवार तो रहेंगे पर उनकी नैया गुजरात की तरह छत्तीसगढ़ में भी पार लग जाएगी, फिलहाल कहना जरा मुश्किल हैं।

Comments

Popular posts from this blog

पत्थलगड़ी पर सियासत

अजीत जोगी का नया दाँव

मुक्तिबोध:प्रतिदिन (भाग-18)