अजीत जोगी : एक दृष्टि

- दिवाकर मुक्तिबोध
(छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी पर केन्द्रित यह आलेख सन 2009-10 के दरमियान लिखा गया था। लिहाजा उनकी राजनीतिक गैर राजनीतिक कथा यात्रा इसी अवधि तक सीमित है।)
छत्तीसगढ़ की राजनीति में अजीत प्रमोद कुमार जोगी का क्या स्थान होना चाहिए, एक लंबी बहस का विषय है। कांग्रेस की राजनीति में भी उनके संदर्भ में एकबारगी कोई ठोस राय कायम नहीं की जा सकती। इस पर भी काफी मतांतर हो सकता है। दरअसल यह स्थिति इसलिए है क्योंकि जोगी का व्यक्तित्व अजीबोगरीब है। राजनेताओं में वैसे भी व्यक्तित्व की पारदर्शिता का अभाव रहता है। उसमें सच और झूठ की कई परतें होती हैं लिहाजा उन्हें ठीक-ठीक पढ़ा नहीं जा सकता। पढ़ने की कोशिश करें तो उसमें भी काफी वक्त लगता है और ऐसे में यदि जोगी जैसे गूढ़ व्यक्तित्व आपके सामने हों और उसे पढ़ने की चुनौती आपने स्वीकार कर ली हो तो जाहिर सी बात है, आपको काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। उनकी जिंदगी की किताब जिसमें साल दर साल नए-नए पन्ने जुड़ते जा रहे हैं, इतनी विचित्र और हैरतअंगेज है कि उन्हें पढ़ते-पढ़ते न केवल आप रोमांचित होंगे बल्कि इस नतीजे पर पहुंचेगे कि यह आदमी लाजवाब है, जबर्दस्त है, जीवट है और काफी हद तक तानाशाह भी। राजनीति में ऐसी शख्सियतें कम देखने मिलती है जो उसकी धारा को मनमाफिक ढंग से मोड़ने का सामर्थ्य रखते हों। फिर शारीरिक अपंगता के चलते राजनीति की धुरी बने रहना और भी कठिन। जोगी कुछ ऐसे ही शख्स हैं।
जोगी मेरे कभी करीबी नहीं रहे। दरअसल पत्रकारिता के अपने लंबे करियर में मैंने सभी नेताओं से एक समान दूरी बनाए रखी। किसी के कैम्प में शामिल नहीं हुआ हालांकि तोहमत लगाने वाले तीर चलाते रहे, लेकिन मैंने अपने मन को कभी घायल नहीं होने दिया। दृढ़तापूर्वक अपने पेशे को इमानदारी से जीता रहा जिसका अंतत: नतीजा यह निकला कि यह मान लिया गया कि मैं उनके किसी काम का नहीं। अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए न तो मेरा इस्तेमाल किया जा सकता है और न ही मुझे भरमाया जा सकता है। जब यह राय धीरे-धीरे पुख्ता हो गई तब किसी ने नजदीक फटकने की कोशिश नहीं की और न ही दूर भागने की। एक निश्चित दूरी बनाएं रखी। हालांकि लोग-बाग अपने-अपने तरीके से रिश्ते को परिभाषित करते रहे और मैं अपना काम करता रहा। यही स्थिति अभी भी कायम है।
जैसा कि मैंने बताया, जोगी कभी करीबी नहीं रहे। जिस तरह हर नेता के लिए आम तौर पर यह जरुरी होता है कि वह अपनी नेतागिरी को चमकाने अथवा उसे जिंदा रखने के लिए पत्रकारों व रिपोर्टरों को जाने पहिचाने, उनकी खुशामद करें उसी तरह पत्रकारों के लिए भी यह आवश्यक है कि नेताओं की खोज-खबर लेते रहे, उन पर बारीक निगाह रखें ताकि राजनीति के समुद्र में गोता लगाकर खबरों की सीप हासिल की जा सके। यानी दोनों का चोली-दामन का साथ। दोनों का एक दूसरे के बिना काम नहीं चल सकता। लिहाजा अजीत जोगी को मैं खूब अच्छी तरह जानता था। जब वे आई.ए.एस. थे और रायपुर में कलेक्टर। तब और जब वे राजनीति में आए तब भी। उनसे यदा-कदा मुलाकातें हुआ करती थीं। एक प्रशासनिक अधिकारी के रुप में मेरे मन में उनकी कोई छाप नहीं थी लेकिन बाद में एक राजनेता के रुप में और छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री के रुप में मैने उन्हें देखने-समझने की कोशिश की और कई मायनों में वे मुझे अन्य समकालीन राजनेताओं से अलग लगे, प्रभावशाली लगे। उनके व्यक्तित्व को भीतर से झांक न पाने के बावजूद मैं यह राय कायम कर सका कि यदि इस व्यक्ति में कतिपय कमजोरियां न होती तो यह न केवल छत्तीसगढ़ में लंबे समय तक शासन करता बल्कि कांग्रेस की राजनीति में भी धु्रव तारे की तरह चमकता।
जोगी पर आगे कुछ लिखूं, इसके पूर्व यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि उनके व्यक्तित्व का आकलन उनके उन राजनीतिक कार्यों, निर्णयों एवं प्रतिक्रियाओं पर आधारित है जिन्हें मैंने देखा, सुना, पढ़ा एवं महसूस किया है। उनके पूरे प्रशासनिक एवं राजनीतिक करियर का न तो मैं गवाह हूं और न ही मैने उनके साथ कभी कोई समय बिताया है। यह विशुद्ध रुप से उनकी राजनीतिक यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर एक दृष्टि है जिससे उनके व्यक्तित्व को तौला जा सकता है और किसी निष्कर्ष पर भी पहुंचा जा सकता है। लिहाजा इसे सकल अध्ययन नहीं माना जाना चाहिए। जो उनके निकटस्थ हैं, वर्षों से उन्हें देखते आ रहे हैं, उनके कामकाज में सहभागी रहे हैं, उन्हें मार्गदर्शन देते रहे हैं, जो उनके दरबारी हैं अथवा ऐसे लोग जो राजनीति में उनके प्रतिद्वंदी हैं, दुश्मन है और उन्हें तानाशाह मानते है, इन सभी की राय उनके (जोगी) बारे में अलग-अलग हो सकती है। इसलिए जरुरी नहीं है कि मेरे लिखे शब्दों पर ऐसे लोग गौर करें अथवा सहमति में सिर हिलाएं। वे मुझे खारिज भी कर सकते हैं, उल्टा-सीधा भी सोच सकते हैं। ऐसा करने के लिए निश्चितत: वे स्वतंत्र हैं।

जोगी से पहली मुलाकात कब हुई, तिथि ठीक से याद नहीं। अलबत्ता रायपुर के कलेक्टर के रुप में मैं उन्हें जानता था। यह भी जानता था, वे लोकप्रिय प्रशासनिक अधिकारी हैं और खेलों में उनकी गहरी रुचि है। रायपुर में स्टेडियम बनाने धन उगाही के लिए उन्होंने लाटरी चलाई थी किन्तु अन्यान्य कारणों से यह प्रयास सफल नहीं हो सका था। कलेक्टरी के दौरान वे सबसे ज्यादा लोकप्रिय युवाओं, खासकर विश्वविद्यालयीन छात्रों के मध्य थे। वे अच्छे और बुरे दोनों को साथ लेकर चलते थे। यानी बदनामशुदा छात्रों की फौज भी उनके साथ हुआ करती थी। बल्कि यो कहें ऐसे लोगों की तादाद उनके पास ज्यादा थी। कुख्यात बालकृष्ण अग्रवाल  उन्हीं का पैदाइश माना जाता है जो छात्र जीवन में उनके साथ जुड़ा और लंबे समय तक उनके साथ बना रहा। जब वे राजनीति में आए तब भी ऐसे लोग उनके इर्द-गिर्द मंडराते रहे। राजनीति में यह बात तो समझ में आती है क्योंकि नेताओं को ऐसे लोगों की जरुरत पड़ती ही है किन्तु कलेक्टर को क्यों ऐसे लोगों की जरुरत होनी चाहिए? सोचें तो प्रतीत होता है, ऐसा स्वभावगत है। पक्ष में दलील दी जा सकती है कि आखिरकार भगवान शिवजी की बारात में भी ऐसे ही लोगों की भरमार थी।
बहरहाल इसमें दो राय नहीं कि जिलाधीश के रुप में अजीत जोगी ने जो लोकप्रियता हासिल की चाहे वह इंदौर हो या रायपुर, वह बेमिसाल है। उनके पूर्व और अब तक रायपुर में ऐसा कोई कलेक्टर नहीं हुआ जिसके अपने कार्यों के जरिए जनता के बीच खास जगह बनाई हो। जोगी की लोकप्रियता इस बात का प्रतीक थी कि वे बहुत जहीन, संवेदनशील एवं कुशल प्रशासक हैं और जिन्हें जनता की नब्ज को पकड़ना खूब अच्छी तरह आता है।
एक राजनेता के रुप में उनके करियर की शुरुआत जिस तरह हुई, यह विवादास्पद है। जोगी का अपना दावा है कि वे राजनीति में स्वइच्छा से नहीं आए, वे लाए गए। हालांकि राजनीति उन्हें प्रिय थी। कांग्रेस की राजनीति में उनके लिए रास्ता बनाया गया और माकूल समय सन 1986 में उन्हें राज्यसभा के जरिए राजनीति के समुद्र में तैरने के लिए धकेल दिया गया। राजीव गांधी से उनके संबंध कितने दृढ़ थे, इस बारे में जोगी का भी कोई दावा नहीं है अलबत्ता सन 1986 में राज्यसभा के लिए उनके नामांकन की बात आई तो प्रधानमंत्री के रुप में राजीव गांधी ने उस पर मोहर लगाई। यह शायद उस परिचय के कारण था जब राजीव पायलट के रुप में इंडियन एयरलाइंस का यात्री विमान दिल्ली से रायपुर लेकर आते थे। कलेक्टर के रुप में जोगी तत्कालीन उड्डयन मंत्री एवं रायपुर लोकसभा से निर्वाचित सांसद पुरुषोत्तम कौशिक के आग्रह पर उनका खास ध्यान रखते थे। निश्चय ही जोगी को राजनीति में लाने एवं सांसद बनाने का श्रेय अर्जुन सिंह एवं दिग्विजय सिंह को है। आई.ए.एस. की नौकरी छुड़वाकर उन्हें क्यों राज्यसभा के लिए कांग्रेस के उम्मीदवार के रुप में नामांकित किया गया, तरह-तरह की बातें हैं। खुद जोगी ने उन अफवाहों का जिक्र किया है जो उन्हें लेकर उस दौरान उड़ी। महासमुंद जिले का कोडार कांड उनका पीछा तो कर ही रहा था, इंदौर के पामोलीव कांड ने उन पर जो कीचड़ उछाला, उससे बचने का एक मात्र उपाय था प्रशासनिक नौकरी छोड़कर राजनीति की राह पकड़ना। कोडार कांड से जोगी किसी तरह अपने को बचा ले गए थे। यह अलग बात है आई. ए.एस. कृपाशंकर शर्मा जो कि बाद में म.प्र. के मुख्य सचिव हुए , की एक सदस्यीय जांच आयोग की रिपोर्ट में उनकी ओर स्पष्ट इशारा किया गया था। बाद में राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो की रायपुर इकाई ने अपनी जांच पड़ताल के बाद राज्य शासन को भेजी गई रिपोर्ट में जोगी को दोषी करार दिया था। हालांकि राजनीतिक दबाव के चलते अंतत: इस रिपोर्ट से जोगी का नाम हटा दिया गया जबकि 14 आरोपियों की सूची में वह प्रथम स्थान पर था।
उन दिनों सन 1986 में मैं दैनिक अमृत-संदेश में था। हमारे संपादक थे श्री गोविंदलाल वोरा। मोतीलाल वोरा जो उस समय म.प्र. के मुख्यमंत्री थे, के अनुज गोविंदलाल जी ने जोगी के आनन-फानन में राज्यसभा के लिए कांग्रेस के उम्मीदवार घोषित हो जाने के संदर्भ में हमें बताया था कि मोतीलाल जी, जोगी के अनुनयन विनय के आगे पिघल गए और उन्होंने अपनी ओर से उनके नाम को हरी झंडी दे दी। पर बात तय मानी जा रही थी कि जोगी यदि राजनीति में नहीं आते तो भ्रष्टाचार के प्रकरणों से उनका बच पाना कठिन था। यह भी स्पष्ट है कि वे राजनीति में लाए नहीं गए थे, उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया था, जैसा कि वे दावा करते हैं। यकीनन उन्होंने इसके लिए अथक प्रयास किया था, अपने लिए राह बनाई थी। हालांकि यह भी सच है कि कांग्रेस को भी उनकी जरुरत थी। जोगी के चयन के पीछे एक बड़ा कारण उनका आदिवासी होना भी था । एक ऐसा पढ़ा लिखा, बुद्धिमान एवं चतुर आदिवासी युवा जिसे तगड़ा प्रशासनिक अनुभव हो, कांग्रेस की राजनीति में आदिवासी मतदाताओं को लुभाने की दृष्टि से मुफीद सिद्ध हो सकता था। लिहाजा जोगी का प्रवेश पार्टी के दीर्घकालीन राजनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए हुआ। यह अलग बात है कि उनकी जाति पर बाद में सवाल खड़े किए गए और मामला अदालत तक पहुंच गया जिस पर अभी भी फैसला होना बाकी है।
बहरहाल राजनयिक के रुप में उनकी पारी की शुरुआत धुधांधार हुई। एक ऐसे व्यक्ति को जो किसी भी राजनीतिक पार्टी का प्राथमिक सदस्य भी न हो, सीधे राज्यसभा का टिकट थमा देना, उस दौर में कम अचरज की बात नहीं थी। इसलिए जब जोगी के प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देने एवं राज्यसभा के लिए कांग्रेस प्रत्याशी के रुप में नामांकित होने की खबर बिजली की तरह फैली, राजनीतिज्ञ एवं गैर राजनीतिक क्षेत्रों में बहस के लिए नया विषय मिल गया। बहरहाल वे लगातार तीन बार राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए, दो बार वे लोकसभा में पहुंचे, एक लोकसभा चुनाव उन्होंने हारा और कुल मिलाकर लगभग 25 वर्षों के अपने राजनीतिक कैरियर में जो अभी जारी है उन्होंने अपना विशेष स्थान बना लिया। वे एक ऐसे विवादित नेता हैं जिन्हें अखबार की सुर्खियों में बने रहना खूब अच्छी तरह आता है।

संसद सदस्य के रूप में जोगी ने विशेष छाप छोड़ी। छत्तीसगढ़ के मामले में वे ज्यादा मुखर थे तथा उन्होंने इस अंचल के मुद्दे जोर-शोर से उठाए भी। कांग्रेस प्रवक्ता के रुप में उन्होंने मीडिया का सामना बेहतर ढंग से किया। एक लेखक के बतौर भी उन्होंने अपनी पहचान बनाई। समय-समय पर विभिन्न अखबारों में सम-सामायिक विषयों पर उनकी लिखी टिप्पणियां ध्यानपूर्वक पढ़ी जाती थीं।
जोगी के राजनीतिक जीवन के दो हिस्से हैं। एक संसदीय राजनीति के जोगी, दूसरे प्रदेश के मुखिया जोगी। उनकी संसदीय यात्रा के दौरान कोई ऐसी घटना नहीं हुई जो उनके स्वभाव एवं चरित्र के विपरीत मानी जाए। वे एक निर्मल जोगी थे, तिकड़मों से दूर, स्वस्थ्य राजनीति के प्रतीक लेकिन प्रदेश के मुखिया के रुप में एक दूसरे जोगी सामने आए, पहले से ठीक उलटे, चालाक, खूंखार और कुटिल राजनीति के पक्षधर। जोगी के ये दो चेहरे, उनका दुहरा व्यक्तित्व। कैसे थे ये जोगी, देखे जरा।
तिथि 1 नवम्बर सन 2000। इस दिन मध्यप्रदेश से अलग होकर नया छत्तीसगढ़ राज्य अस्तित्व में आया और अजीत जोगी इसके प्रथम मुख्यमंत्री के रुप में चुने गए। 90 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में चूंकि कांग्रेसी विधायकों की संख्या सर्वाधिक 48 थी इसलिए संवैधानिक दृष्टि से कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका मिला। इसके पूर्व म.प्र. में रहते हुए राजधानी के सवाल पर एवं नेतृत्व के मुद्दे पर कांग्रेसी राजनीति में खूब रस्साकसी चलती रही। राजधानी के मुद्दे पर भी म.प्र. कांग्रेस बंटी हुई थी तथा प्रथम मुख्यमंत्री का पद हथियाने के लिए भी शतरंजी चालें चली जा रही थीं। नेतृत्व की दौड़ में सबसे आगे थे विद्याचरण शुक्ल। विधायकों का बहुमत भी उनके साथ था। अजीत जोगी समर्थन के मामले में बहुत पीछे थे। आदिवासी नेतृत्व के नाम पर  जब उनकी उम्मीदवारी सामने आई, तब महज 2-3 विधायक उनके साथ थे। कांग्रेस के दिग्गज नेता अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह एवं कमलनाथ की भी उनके नाम पर कोई खास रजामंदी नहीं थी लेकिन विद्याचरण शुक्ल के साथ खांटी विरोध के चलते अजीत जोगी उन्हें मंजूर थे। बहरहाल कांग्रेस हाईकमान के फरमान पर जोगी कांग्रेस विधायक दल के नेता चुन लिए गए और वे प्रथम मुख्यमंत्री बने। नए प्रदेश के शासक के रुप में जब उनकी दूसरी राजनीतिक पारी प्रारंभ हुई तब उनके व्यक्तित्व की भीतरी परतें खुलनी शुरु हुई। वे सन 2003 तक मुख्यमंत्री रहे और इन तीन वर्षों में उनकी छवि एक ऐसे नेता की बनी जो निरंकुश, तानाशाह, तार्किक, दृढ़ इच्छाशक्ति सम्पन्न, कुशल प्रशासक एवं सर्वहारा वर्ग के हितों का रक्षक था। शासक के रुप में उनके कुछ फैसले निश्चय ही सकारात्मक एवं परिणाममूलक थे किन्तु आम जनता के बीच उनकी राजनीतिक छवि निर्मल, सहृदय एवं सरल इंसान की नहीं बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की बनी जो जातिगत राजनीति का कायल था तथा जिसे सवर्णो से दूरी बनाए रखना मंजूर था। सत्ता की राजनीति ने 36 महीनों के भीतर ही कुछ इस तरह कलाबाजियां दिखाई कि उनमें (जोगी) अधिनायकवाद का तत्व अधिक तेजी से उभरा और वह उनके व्यक्तित्व की अच्छाईयों को धुंधला करता चला गया। यही वजह है सन 2003 का राज्य विधानसभा का पहला चुनाव कांग्रेस नहीं जीत सकी हालांकि पार्टी की हार का एक प्रमुख कारण विद्याचरण शुक्ल की बगावत एवं उनके नेतृत्व में प्रदेश राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की चुनाव में मौजूदगी रही। तानाशाही की यह प्रवृत्ति राजनीतिक में जोगी को सर्वप्रिय नहीं बता सकी हालांकि अनुशासन के जिस डंडे से वे अपने समर्थकों को हांकते रहे, यह इसी का परिणाम है कि आज भी प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में उनका गुट ही सबसे बड़ा एवं ताकतवर है। यह कम अचरज की बात नहीं है कि वर्षों से व्हील चेयर पर बैठा इंसान जिसका आधा अंग करीब-करीब निर्जीव है, प्रदेश कांग्रेस का सर्वाधिक ताकतवार नेता बना हुआ है तथा जिसका कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में भी पूरा दखल है और जिसकी बात पार्टी हाईकमान में ध्यान से सुनी जाती है।
ऐसे बहुतेरे उदाहरण हंै कि जो यह साबित करते हैं कि जोगी के व्यक्तित्व में राजनीतिक सकारात्मकता का अभाव है। मिसाल के तौर पर उनके शासनकाल में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं पर वहशियाना लाठीचार्ज के मामले को लिया जा सकता है। इस घटना में भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं सांसद नंदकुमार साय गंभीर रुप से घायल हो गए। उनके घुटने पर जो लाठियां पड़ी उसका दर्द वे आजीवन नहीं भूल सकते। उनकी चाल में स्थायी लंगड़ाहट आ गई। इस घटना के बाद राजनीति इस कदर गरमाई कि इसकी जांच के लिए विधानसभा की एक समिति गठित की गई। समिति की रिपोर्ट विधानसभा में पेश की गई और इसे सर्वसम्मति स्वीकार भी कर लिया गया। रिपोर्ट में रायपुर के तत्कालीन कलेक्टर अभिताभ जैन एवं एसपी मुकेश गुप्ता को सदन में बुलाकर भर्त्सना की सजा तजवीज की गई थी तथा निर्णय लेने का अधिकार तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ला पर छोड़ दिया गया था। यह संयोग ही था कि विधानसभा पटल पर रिपोर्ट पेश करने के वक्त मुख्यमंत्री अजीत जोगी सदन में मौजूद नहीं थे। जब उन्हें पता चला तो वे बहुत भन्नाएं तथा उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष को आड़े हाथों लिया। बाद में उनके निर्देश पर सर्वसम्मति से पारित रिपोर्ट रद्द की गई और उनके स्थान पर नई रिपोर्ट तैयार करवाकर खानापूर्ति की गई। जाहिर है इस घटना पर विधानसभा में जोरदार हंगामा हुआ लेकिन विरोध को अनसुना कर दिया गया।
इस घटना के बाद जोगी विधानसभा अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल से इस कदर नाराज हो गए कि उन्होंने जान-बूझकर उनकी उपेक्षा शुरु कर दी। लंबे चौड़े और मजबूत कद काठी के राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल दबंग, मुंहफट एवं निर्भीक राजनेता के रुप में ख्यात थे। वे म.प्र. विधानसभा के भी अध्यक्ष रहे। अपनी बुलंद आवाज और ताबड़तोड़ जवाबी हमले के कारण उनकी छवि एक ऐसे राजनीतिक की थी जिससे पार पाना मुश्किल था लेकिन अजीम शख्सियत का यह नेता भी जोगी के आगे भीगी बिल्ली बना रहा। यह शायद उनकी मजबूरी भी थी क्योंकि उन्हें मालूम था कि विधानसभा चुनाव में उनकी टिकट जोगी की मर्जी पर निर्भर करेगी। लिहाजा वे जोगी को नाराज नहीं करना चाहते थे। इसे उनकी सहनशीलता कहें या कायरता, अंतिम दिनों में उन्हें अपने संवैधानिक अधिकारों का भी ध्यान नहीं रहा। विधानसभा सत्र बुलाने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष का होता है। उनकी स्वीकृति के बिना सत्र नहीं बुलाया जा सकता। लेकिन जोगी की नाराजगी का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि वे विधानसभा सत्र को बुलाने का निर्णय स्वयं करते थे और बगैर विधानसभा अध्यक्ष को सूचित किए नियम की औपचारिकता पूरी कर दी जाती थी। यानी विधानसभा सचिव को जानकारी दे दी जाती थी कि फलां-फलां तारीख को विधानसभा सत्र बुलाया जाए। विधानसभा अध्यक्ष को इसकी खबर बाद में मौखिक रुप से दे दी जाती थी। जोगी के इस अपमानजनक रवैये से आहत राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल खून के घूंट पीकर रह जाते थे क्योंकि उन्हें अपने लिए चुनाव की टिकट सुनिश्चित करनी थी। जोगी ने उन्हें सन 2003 विधानसभा चुनाव की टिकट उनके निर्वाचन क्षेत्र कोटा से दे तो दी पर तरसा-तरसा कर एवं एक तरह से नाक रगड़वाकर। किसी विधानसभा अध्यक्ष के इस तरह के अपमान का दूसरा उदाहरण शायद ही मिले। जोगी ऐसी किसी घटना से इंकार कर सकते हैं। ऐसी घटनाओं का कोई दस्तावेजी प्रमाण भी नहीं हुआ करता। आपबीती बताने के लिए स्वयं राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल भी इस दुनिया में नहीं है लेकिन विधानसभा कार्यालय के किसी कक्ष में आप बैठ जाएं तो चर्चाओं में यह बात स्वयंमेव निकल आती है।
मुख्यमंत्री के रुप में अजीत जोगी के इस रवैय्ये पर आप क्या टिप्पणी करेंगे? यही न कि विरोध को सहन करने की शक्ति नहीं तथा शासक होने के नाते अपनी मर्जी से शासन चलाने की सनक। अन्यथा सरकार के दो मामूली पुर्जों (सरकारी अधिकारी) को शर्मिदगी से बचाने के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था की ऐसी अवमानना नहीं की जा सकती। यह भी निश्चित है कि इस कदम से जोगी का कोई राजनीतिक हित नहीं सध रहा था और न ही ये दोनों अधिकारी उनके बहुत करीब थे। उनको बचाने का शायद यही एक मकसद था कि वे नौकरशाहों को यह संदेश देना चाहते थे कि वे केवल उनसे (जोगी) खौफ खाए बाकि कि उन्हें चिंता करने की जरुरत नहीं है। पक्ष या विपक्ष का कोई भी विधायक उनका बाल बांका नहीं कर सकता। निश्चिय ही पूरे शासनकाल में नौकरशाही उनसे घबराती रही तथा उनके इशारे पर नाचती रही। इसी संदर्भ में यहां यह कहना अप्रसांगिक नहीं होगा कि राज्य विधानसभाओं में विभिन्न मामलों में दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों को बुलाकर फटकार लगाना अनहोनी घटनाएं नहीं है। म.प्र. विधानसभा में मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के शासनकाल में उनके एक अतिप्रिय अधिकारी को किसी गलती के लिए सदन में तलब किया गया था तथा उनकी भर्त्सना की गई थी। सुंदरलाल पटवा ने जांच की प्रक्रिया के दौरान कोई हस्तक्षेप नहीं किया तथा भर्त्सना की सिफारिश को मान्य किया था। यह अलग बात है कि बाद में इस अधिकारी को पदोन्नति दे दी गई। इस उदाहरण से स्पष्ट है जोगी की प्रवृत्तियां व उनकी कार्यशैली अन्य से कितनी भिन्न है।

राजनेता के रुप में जोगी की निरंकुशता के और भी उदाहरण हैं। विश्व के देशों में जहां-जहां लोकतंत्र है और इस शासन व्यवस्था का सम्मान किया जाता है, ऐसी घटना देखने नहीं मिलेगी जैसा कि छत्तीसगढ़ विधानसभा में घटित हुई थी। 29 सितंबर 2002 को विपक्ष द्वारा रखे गए अविश्वास प्रस्ताव पर सदन में बहस के दौरान सत्ता पक्ष की ओर से केवल एक वरिष्ठ विधायक एवं मंत्री रवीन्द्र चौबे मौजूद थे, शेष सभी विधायक बाहर गलियारे में बैठे रहे। ऐसा मुख्यमंत्री के निर्देश पर सोची-समझी रणनीति के तहत किया गया। यह घोर अलोकतांत्रिक तरीका था। जब बहस पूरी हुई और अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान की घड़ी आ गई, सत्ता पक्ष के सभी विधायक अपनी-अपनी सीट पर पहुंच गए। विपक्ष की ऐसी अवहेलना का कोई और उदाहरण संसदीय विधान के इतिहास में देखने नहीं मिलता। अपने शासनकाल में अजीत जोगी ने सदन में एवं सदन के बाहर विपक्ष की आवाज को करीब-करीब खामोश कर दिया, उसे एकदम बौना बना दिया। भाजपा की जैसी दुर्गति उन्होंने की, वैसी पूर्व में कभी नहीं हुई थी। विपक्ष के एक दर्जन विधायकों को तोड़ने और उनका कांग्रेस प्रवेश कराने की घटना जोगी के कूटनीतिक कौशल की भले ही बानगी रही हो पर इससे उनकी लोकप्रियता के ग्राफ में कोई इजाफा नहीं हुआ बल्कि उनके करियर पर धब्बा ही माना गया क्योंकि जनता को यह बात समझाने की जरुरत नहीं थी कि विधायकों की खरीद फरोख्त नहीं हुई और वे बिना किसी दबाव एवं प्रलोभन के भाजपा छोड़ कांग्रेस में आए। भाजपा विधायक रामदयाल उइके से इस्तीफा दिलवाकर उनकी रिक्त सीट मरवाही से उपचुनाव लड़ना भी जोगी की शातिर राजनीति का एक और उदाहरण है। यद्यपि यह बात सिद्ध नहीं की जा सकी कि भाजपा विधायकों को खरीदा गया, उन्हें पद का प्रलोभन दिया गया अथवा रामदयाल उइके ने जोगी को विधानसभा में पहुंचाने स्वेच्छा से सीट खाली की।
चूंकि सत्ता की राजनीति में जोड़तोड़ को विशेष मान्यता है और इसके सिद्धहस्त खिलाड़ी को अघोषित रुप से विशेष दर्जा मिलता रहा है अत: केन्द्रीय नेतृत्व के सामने जोगी की छवि आला दर्ज के ऐसे राजनेता की बनी जिसे शासन करना खूब अच्छी तरह आता है और जो विपक्ष की कमर तोड़ने में माहिर है। लिहाजा दिल्ली की राजनीति में जोगी को अपनी जगह बनाने में कोई परेशानी नहीं हुई। वे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की नजरों में चढ़ गए, यह अलग बात है कि रास्ता बनाने का काम उनके (श्रीमती गांधी) सचिव विसेंट जार्ज ने किया।
इस बात का जिक्र किया जा चुका है कि प्रशासनिक कौशल के दम पर जोगी ने अपनी अलग छवि गढ़ ली। किसी आईएएस अफसर की मजाल नहीं थी कि वह उनके किसी निर्णय पर बहस करें। उनका काम जोगी के निर्णयों पर तुरंत अमल करना था। अत: फाइलें फटाफट निपटती थीं। जोगी यह जाहिर करने से नहीं चूकते थे, कि वे इस राज्य के बादशाह है। मंत्रियों और राजनेताओं को उन्होंने इस कदर बौना बना दिया था कि उनके कक्ष में मुलाकातियों के लिए कोई कुर्सी नहीं रहती थी। वे अकेले बैठते थे और उनसे मिलने आने वालों को कतार में खड़े रहना पड़ता था। चाहे वे मंत्री हों या विधायक। जोगी के राज में सुखी वहीं थे जिन्होंने उनका आधिपत्य स्वीकार कर लिया था। ऐसे नेताओं, अधिकारियों को उन्होंने अभयदान दिया और जिन लोगों ने सिर उठाने की जुर्रत की, उनका सिर उन्होंने बेरहमी से कुचल दिया।
राजनीति में विरोध को बर्दाश्त न करने एवं विरोधियों को ठिकाने लगाने की प्रवृत्ति जोगी के लिए घातक सिद्ध हुई। उनके तीन साल के शासनकाल के प्रारंभिक महीने यकीनन अच्छे बीते और वे पुराने जोगी ही नजर आए जो कभी कलेक्टर हुआ करते थे और हर वर्ग के लोगों की बातें धैर्य से सुनते थे। लेकिन अपनी सत्ता को बनाए रखने की लालसा जैसे-जैसे तीव्र होती गई, जोगी का चेहरा बदलता गया। हालांकि उन्हें यकीन था जब कभी चुनाव होंगे (जो सन 2003 नवम्बर-दिसंबर में तय थे।) वे आराम से वापसी करेंगे। इस विश्वास की बड़ी वजह थी प्रदेश भारतीय जनता पार्टी की अधमरी हालत जो उनकी बनाई हुई थी। लेकिन उन्हें इस बात का इल्म नहीं था कि उनके बदले हुए चेहरे को, बदले हुए रवैये को, निरंकुशवाद को जनता पसंद नहीं कर रही है। सवर्णों के प्रति उनका दुराग्रह भी छिपा नहीं। इसका स्पष्ट आभास हुआ कि वे जातिवादी हैं और जातीयता की भावना को कम करने के बजाए उसे बढ़ाने का वे कृत्य करते रहे। हीनता की मनोग्रंथि कैसे उनके व्यक्तित्व को कुतर रही थी यह इस बात से जाहिर है कि वे अपने साथ हेलीकाप्टर में निचले तबके के ऐसे लोगों को ले जाना पसंद करते थे जिनकी कोई राजनीतिक हैसियत नहीं थी। हीनता की यह ग्रंथि शायद इस वजह से विकसित हुई कि जोगी खुद नीचे से उपर उठे थे। गरीबी से लड़ते हुए, सर्वहारा होने के दर्द को झेलते हुए, उनके बीच रहते हुए वे बड़े हुए और उन्होंने अपनी कर्मठता से अपनी सामाजिक एवं राजनीतिक हैसियत बनाई। यही दर्द सत्ता के अंतिम वर्ष में बहुत तेजी से उभरा और उनसे ऐसे काम करवाता चला गया जिसकी कीमत उन्हें बाद में चुनाव में चुकानी पड़ी।
नवम्बर 2003 में छत्तीसगढ़ राज्य के पहले चुनाव में जोगी के नेतृत्व में कांग्रेस की पराजय का प्रमुख कारण विद्याचरण शुक्ल एवं उनकी तत्कालीन राष्ट्रवादी कांग्रेस (पवार) की मौजूदगी रही जिसने लगभग 7 प्रतिशत वोट कबाड़कर कांग्रेस की कब्र खोद दी हालांकि उसका (राकांपा) सिर्फ एक विधायक ही चुनकर आया। राकांपा की मौजूदगी और जोगी के प्रति आक्रोश का पूरा फायदा भाजपा को मिला। उस भाजपा को जो चुनाव के पूर्व बिखरी हालत में थी और जिसे कमजोर बनाने में जोगी ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यह कहना उचित ही होगा कि जोगी के प्रति जनआक्रोश नकारात्मक वोटों की शक्ल में भाजपा की झोली में गिरा और उसकी झोली ऐसी भरी कि वह बहुमत के साथ सत्ता में आ गई। जोगी का अतिरेक आत्मविश्वास एवं उनके राजनीतिक कृत्य उन्हें तथा कांग्रेस को ले डूबे। वे ऐसे डूबे कि नवम्बर 2008 में हुए राज्य विधानसभा के द्वितीय चुनाव के दौरान भी जोगी की वापसी का भय मतदाताओं को इस कदर सताया कि उन्होंने भाजपा को फिर सत्ता सौंप दी। चुनाव प्रचार के दौरान जोगी से यह गलती हो गई कि उन्होंने स्वयं को मुख्यमंत्री के रुप में प्रोजेक्ट किया जिसमें हाईकमान की कोई राय नहीं थी। उनका ऐसा करना कांग्रेस को पुन: भारी पड़ा।
यह निश्चित है कि छत्तीसगढ़ की जनता जोगी को मुख्यमंत्री के रूप में देखने अभी भी तैयार नहीं है। उनके तीन वर्ष के शासन को लोग कुशासन के रुप में याद करते हैं जबकि सच्चाई ठीक विपरीत है लेकिन तानाशाह का लेबल उन पर कुछ इस तरह चिपक गया है कि वह उन्हें सत्ता के करीब कभी नहीं आने देगा। यह लेबल तभी उतर सकता है जब पार्टी चुनाव के समय उन्हें कोई जिम्मेदारी न सौंपे और उन्हें स्वयं को मुख्यमंत्री के रुप में पेश करने की इच्छा पर कड़ाई से अंकुश लगाए। नवम्बर 2008 के चुनाव में यदि जोगी ने स्वयं को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित न किया होता तो आज तस्वीर शायद दूसरी होती। जोगी को यह समझ लेना चाहिए कि लोग उनकी बुद्धिमता, कार्यकुशलता, दूरदृष्टि एवं विकासपरक सोच के कायल जरुर हैं किन्तु उन्हें पुन: शासनाध्यक्ष के रुप में स्वीकार करने तैयार नहीं है।
अजीत जोगी के शासनकाल की चर्चा करें तो नि:संदेह उन्हें एक अच्छा शासक माना जाएगा जिसने एक नए राज्य के लिए सबसे बड़ा काम उसे मजबूत आर्थिक आधार देकर किया। यदि आज छत्तीसगढ़ खुशहाली और विकास की ओर तेजी से अग्रसर है तो उसकी बड़ी वजह उसकी आर्थिक नींव है जिस पर अब समृद्धता की इमारत बुलंद हो रही है। आज रमन सरकार को विभिन्न केन्द्रीय योजनाओं के लिए जितना पैसा केन्द्र सरकार से मिल रहा है वह जोगी के शासनकाल से कई गुना अधिक है। नए राज्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक स्रोतों को विकसित करने की होती है। जोगी ने यह काम खूब अच्छी तरह किया। उन्होंने इस राज्य को करमुक्त करने का सपना देखा था। यदि देवभोग की हीरा खदानों से हीरे निकालने का काम शुरु हो गया होता तो नि:संदेह छत्तीसगढ़ देश का पहला ‘कर मुक्त’ राज्य बन जाता लेकिन यह सपना हकीकत से काफी दूर है क्योंकि देवभोग के मामले में रमन सरकार कोई तरजीह नहीं दे रही है। जाहिर ऐसा राजनीतिक कारणों से है।
मुख्यमंत्री के रुप में जोगी के खाते में कई उजली लकीरें है। इस बात में शक नहीं कि गरीब किसानों, मजदूरों, आदिवासियों, हरिजनों तथा सर्वहारा वर्ग के इतर लोगों के प्रति उनके मन में बड़ा दर्द है। दर्द इतना है कि वह सवर्णों के प्रति आक्रोश में बदल गया है। वह उन्हें शोषक मानते हैं। उनके आक्रोश की अभिव्यक्ति उनके शासनकाल में दंडात्मक प्रतिक्रिया के रुप में स्पष्टत: प्रकट हुई। हालांकि वे यह दावा करते हैं कि उनके व्यक्तित्व के निर्माण में, उन्हें आई.ए.एस. से लेकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में सवर्ण नेताओं का प्रमुख योगदान रहा है। यह बात तो ठीक है कि विधान पुरुष स्व. मथुरा प्रसाद दुबे, अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, विद्याचरण शुक्ल, राजीव गांधी एवं अन्य कई सवर्ण नेताओं ने उनका मार्ग प्रशस्त किया किन्तु यह बात भी स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री के रुप में जिस सामाजिक सद्भाव के विस्तार की उनसे उम्मीद की जा रही थी वह पूरी नहीं हुई बल्कि जातीयता की भावना को उन्होंने उभारा एवं प्रश्रय दिया लेकिन सौभाग्य से छत्तीसगढ़ में अनेकानेक जातियों के बीच आपसी सद्भाव, विश्वास, स्नेह एवं सामंजस्य का तत्व इस कदर गहरा है कि कोई भी चोट उसे बिखेर नहीं सकती। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि यहां इक्का-दुक्का घटनाओं को छोड़ कभी जातीय दंगे नहीं हुए। भविष्य में इसकी कोई आशंका भी नहीं है।
शासक के रुप में जोगी ने बड़ा काम किसानों के हित में उनके धान की विपुल खरीदी के रुप में किया। समर्थन मूल्य पर राज्य के किसानों से धान खरीदी का मतलब था सरकार पर राजस्व का भारी बोझ। पर जोगी ने किसानों को शोषकों के पंजे से मुक्त करने एवं उन्हें आर्थिक सम्बल प्रदान करने खर्च की चिंता नहीं की। किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य प्रदान करने राज्य सरकार की इस अभिनव पहल को जोगी के बाद रमन सरकार को भी जारी रखना पड़ा। रमन सरकार ने दो कदम आगे बढ़ते हुए दो रुपए प्रति किलो की दर से गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को 35 किलो चावल उपलब्ध करने का जो फैसला लिया वह उनकी सत्ता में दोबारा वापसी का एक प्रमुख कारण बना। पिछले (2008) चुनाव में जोगी की ‘एकला चलो’ और भाजपा की दो रुपए किलो चावल नीति कांग्रेस की पराजय एवं भाजपा की सत्ता में पुन: वापसी की प्रमुख वजहें मानी जाती है।
बहरहाल सत्ताधीश के रुप में जोगी की कार्यशैली भले ही विवादास्पद रही हो पर इसमें संदेह नहीं कि उनके कुछ और फैसले भी अच्छी सोच के परिचायक थे। मसलन त्रिवर्षीय चिकित्सा पाठ्यक्रम, पीईटी,पीएमटी पद्धति को समाप्त कर प्रावीण्यता के आधार पर इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश, निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना, भिलाई में आईटी हब, सिंचाई के लिए जोगी डबरी जैसी योजनाएं, सड़कों का जाल, आधारभूत संरचनाएं जिसकी वजह से विभिन्न क्षेत्रों में विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ आदि-आदि। हालांकि निजी विश्वविद्यालय की सोच पर सही ढंग से अमल नहीं हुआ और पीएमटी, पीईटी, चिकित्सा पाठ्यक्रम जैसे फैसलों की भी आलोचना हुई पर उनके ये फैसले दूरगामी हितों के संवर्धन की दृष्टि से थे। छत्तीसगढ़ में ग्रामीण स्वास्थ्य की जैसी दुर्दशा है वह ठीक हो सकती थी बशर्ते त्रिवर्षीय चिकित्सा पाठ्यक्रम को जारी रखा जाता। इसी तरह पीईटी, पीएमटी प्रवेश परीक्षाएं समाप्त करने का फैसला, जिस पर अमल नहीं हो पाया यर्थाथपरक था। आज प्रदेश के 49 इंजीनियरिंग महाविद्यालयों में प्रवेश का यह आलम है कि सीटें रिक्त पड़ी हुई हैं और 12वीं बोर्ड की पूरक परीक्षाओं में उत्तीर्ण छात्रों को प्रवेश दिया जा रहा है। उच्च तकनीकी शिक्षा की ऐसी दुर्दशा इसीलिए है क्योंकि शैक्षणिक स्तर की चिंता नहीं की गई। अपने शासन में जोगी ने प्रवेश परीक्षाएं खत्म करने का फैसला आदिवासी छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए लिया था।
प्रशासनिक कसावट की चर्चा पर हम पहले कर चुके हैं। जवाबदेही तय होने  की वजह से सरकारी कामकाज की गति तीव्र हुई और मामलों को लंबित रखने की प्रवृत्ति घटी। इसका फायदा जनता को मिला। जोगी ने सरकारी खर्चे पर भी नियंत्रण रखा और उन्होंने सार्वजनिक उपक्रम, निगम एवं संस्थाओं के रुप में सफेद हाथी ज्यादा नहीं पाले। खेत और किसान, खेतीहर मजदूर एवं आदिवासियों की समृद्धि उनकी प्राथमिकताएं थी। उनके कार्यकाल में कृषि भी उन्नत हुई पर फसल के चक्रीय परिवर्तन का उनका फार्मूला नहीं चल पाया। वे चाहते थे, धान की फसल लेने के बाद 6 माह तक हाथ पर हाथ धरे बैठा किसान नगद फसलों की ओर प्रवृत्त हो ताकि उसकी आमदनी बढ़े लेकिन उनकी यह बात नहीं चल पाई क्योंकि परंपरागत कृषि से बंधे हुए किसान प्रयोग के लिए राजी नहीं हुए।
जोगी के बारे में यह कहा जाता है कि उन्होंने यदि अपनी कुछ कमजोरियों पर काबू पाया होता तो वे छत्तीसगढ़ में लंबे समय तक शासन करते और उनकी राजनीतिक दूरदर्शिता एवं विद्वता का लाभ राज्य की जनता को, राज्य के सर्वागीण विकास के  रुप में अधिक तेजी से मिलता। छत्तीसगढ़ को ऐसा प्रशासक चाहिए जो उसकी जरुरतों को समझते हुए कार्यों के निष्पादन में बला की तेजी दिखाए। राज्य की अपनी सम्पदा अकूत है और उसे विकास के लिए केन्द्र पर पूर्णत: निर्भर रहने की जरुरत नहीं है। बशर्ते उसकी प्राकृतिक संपदा का भरपूर दोहन हो। छत्तीसगढ़ के गर्भ में लोहा, कोयला, बाक्साइट, टिन, लाइम स्टोन जैसे खनिजों का भंडार है। अकेले देवभोग की हीरा खदानें ही इस राज्य को सर्वाधिक समृद्धशाली बना सकती है।
छत्तीसगढ़ के हितों के संदर्भ में ही जोगी के राज में कुछ ऐसी घटनाएं हुई हंै जो उनकी चिंता, उनका जुझारुपन एवं दृढ़ता को रेखांकित करती है। इसमें प्रमुख है सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बालको का निजीकरण। केन्द्र में सत्तारुढ़ तत्कालीन भाजपा सरकार के नीतिगत निर्णय के तहत भारत एल्यूमीनियम कंपनी (बालको) के 52 फीसदी शेयर स्टरलाइट को महज 550 करोड़ में बेच दिए गए। इस निर्णय का प्रबल विरोध करते हुए जोगी ने सड़क की लड़ाई लड़ी। यह अलग बात है, राजनीतिक कारणों से इस निर्णय को वे रोक नहीं सके। किन्तु इस मुद्दे पर उन्होंने जो दृढ़ता दिखाई, उसकी जमकर प्रशंसा हुई।
 
सत्ताधीश के रुप में जोगी के राजनीतिक जीवन में भूचाल लाने वाली घटनाओं में प्रमुख है राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेता रामअवतार जग्गी की सन 2003 के चुनाव के चंद माह पूर्व हत्या। इस घटना से जोगी का कोई सरोकार नहीं था, यह बात अदालत में सिद्ध हो चुकी है पर इसने जनता के बीच आक्रोश की वह लहर पैदा की जो अंतत: जोगी की सत्ता को तिरोहित कर गई। जोगी को इसका आजीवन मलाल रहेगा कि वे अपने बेटे की राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर अंकुश नहीं लगा सके और न ही प्रशासनिक कामकाज में उसके अप्रत्यक्ष दखल को रोक सके। जग्गी हत्याकांड में आरोपों के छींटे अमित जोगी पर भी उड़े हालांकि वे भी अदालत में आरोप मुक्त हो गए पर पुत्र मोह में फंसे जोगी अपयश से अपने दामन को नहीं बचा सके। कूटनीति के महारथी जोगी से उस समय भी गलती हुई जब 31 मार्च 2003 को उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि केन्द्र सरकार का गृह मंत्रालय कांग्रेस शासित राज्यों में चुनावी तैयारियों पर गुप्त निगाह रख रहा है। इंटेलीजेंस ब्यूरो के दुरुपयोग के इस आरोप को अटल बिहारी सरकार ने बहुत गंभीरता से लिया और जांच के आदेश दिए। ‘आॅपरेशन ब्लेक सी’ के नाम से मशहूर इस कांड के संदर्भ में बाद में सीबीआई ने 7 अक्टूबर 2003 को श्री एमसी गुप्ता की अदालत में जोगी के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया। जांच में यह पाया गया कि जोगी ने अपने पत्र के साथ जो दस्तावेजी सबूत पेश किए थे, वे जाली थे। लिहाजा उन पर धोखाधड़ी और जालसाजी की धाराएं लगाई गई। प्रकरण अभी भी अदालत में विचाराधीन है पर चुनाव के ठीक पूर्व उठे इस प्रकरण ने भी जोगी को राजनीतिक रुप से क्षति पहुंचाई।
जोगी ने अपने शासन के दौर में विपक्ष को एकदम बौना तो बना ही दिया था, सार्वजनिक हितों के सवाल पर अहम फैसले लेने के पूर्व कभी उन्होंने विपक्षी दलों से विचार-विमर्श की जरुरत नहीं समझी। ऐसी कोई बैठक कभी नहीं बुलाई गई। और तो और भाजपा कार्यकर्ताओं पर लाठी चार्ज के विरोध में मुख्यमंत्री कक्ष में सांसद नंदकुमार साय के नेतृत्व में रात भर भाजपा विधायकों द्वारा दिए गए धरने का भी मुख्यमंत्री की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा। एक तरफ विपक्ष के साथ इतना निर्मम व्यवहार और दूसरी तरफ विकास के सवाल पर प्रदेश के स्कूली छात्रों को भी विश्वास में लेने की इच्छा। जोगी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते ही 22 दिसंबर 2000 को राज्य के 16 जिलों के 80 मेधावी छात्रों को राजधानी में बैठक बुलाई और उनसे यह जानने की कोशिश की कि अगले एक दशक तक यानी सन 2010 में राज्य की शक्ल किस तरह की होनी चाहिए। यह एक अभिनव प्रयोग था क्योंकि युवा किस तरह का छत्तीसगढ़ बनाना चाहते हैं, यह उनके विचारों से प्रकट हुआ। इससे यह भी प्रतीत हुआ कि जोगी राज्य के विकास के प्रति बहुत गंभीर है और सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं पर राजनीतिक निर्ममता अपनी जगह पर थी इसलिए उन्होंने विपक्ष को कभी विश्वास में लेने की जरुरत नहीं समझी बल्कि उसकी कमर तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
बहरहाल तमाम विसंगतियों के बावजूद इसमें दो राय नहीं कि जोगी बेहद जीवट है। ऐसी जीवटता उनके समकालीन किसी भी राजनेता में देखने नहीं मिलती। आधे शरीर से लाचार होने के बावजूद उन्होंने अपनी राजनीति को मरने नहीं दिया। सन 2004 में लोकसभा चुनाव के पूर्व जब एक दुर्घटना में उनका आधा अंग जवाब दे गया था, तब यह कहा जाने लगा था कि अब जोगी की राजनीति खत्म। व्हील चेयर पर बैठा आदमी कैसे प्रदेश राजनीति के शीर्ष पर बना रह सकता है? पर इन आशंकाओं को खारिज करते हुए जोगी ने अपना वर्चस्व बनाए रखा। प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में वे अभी भी महत्वपूर्ण बने हुए हैं। कांग्रेस विधायक दल के अधिकांश सदस्य उन्हें अपना नेता मानते हैं और उन्हीं के निर्देश पर अपनी राजनीति करते हैं। प्रदेश कांग्रेस में उनका गुट ही सबसे बड़ा और सर्वाधिक शक्तिशाली है। स्थिति यह है कि एक तरफ विद्याचरण शुक्ल, मोतीलाल वोरा, चरणदास महंत और धनेन्द्र साहू जैसे दिग्गज तो दूसरी ओर अकेले अजीत जोगी जो इन सब पर भारी। व्हील चेयर पर बैठे-बैठे जोगी ने दो चुनाव लड़े एक लोकसभा 2004 और विधानसभा 2008। दोनों चुनावों में उन्होंने अपने गुट का संचालन किया और बड़ी संख्या में चुनावी सभाएं की। यदि शरीर लाचार हो तो मन भी कमजोर पड़ने लगता है लेकिन जोगी में गजब का आत्मबल है। उन्होंने अपनी राजनीतिक हैसियत को कम नहीं होने दिया। निश्चय ही राजनीति में ऐसे लोग बिरले ही होते हंै।
निष्कर्ष के तौर पर, जिसकी चर्चा आमजनों में भी होती है, यह कहा जा सकता है कि यदि जोगी में सकारात्मक शक्तियां प्रबल होती और यदि उन्होंने अपनी कमजोरियों को परख कर उन पर काबू पाया होता तो वे लंबे समय तक छत्तीसगढ़ पर शासन करते। अगरचे ऐसा होता आज शायद छत्तीसगढ़ की विकासपरक छवि अधिक उजली और प्रेरणास्पद होती।

Comments

  1. अच्छी मेहनत से मैटर तैयार किया गया है।

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  2. अच्छी मेहनत से मैटर तैयार किया गया है।

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  3. बेहतरीन लेख। शायद, कूटनीति के महारथी जोगी के जीवन का यही आईना है.

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