मुक्तिबोध:प्रतिदिन (भाग-1)


काफ़ी दिनों से सोच रहा था स्वर्गीय श्री गजानन माधव मुक्तिबोध जी के विविधता से भरे लेखन यथा आलोचना, निबंध, कहानी तथा पत्रों में से कुछ पैराग्राफ़, कविताओं के कुछ अंश, पत्रकारिता करते हुए लिखे गए उनके उनके लेखों से में से चंद पंक्तियाँ जो बार बार पढऩे व उसके गहरे निहितार्थ समझने के लिए बाध्य करती है, अलग से कागज पर उतारूं तथा जब कभी मन करें, उन्हे पढ़कर समझने की कोशिश करूं। पत्रकार हूं, कवि या साहित्यकार नहीं हूँ अलबत्ता साहित्य में मेरी रूचि जरूर है। आप मुझे हिन्दी साहित्य का एक जिज्ञासु पाठक कह सकते हैं जो बिम्ब, प्रतिबिम्ब व प्रतीकों के गहरेपन को, उनके अर्थ को समझने की कोशिश करता है। लिहाज़ा 'मुक्तिबोध : प्रतिदिन' शीर्षक से उनके गद्य व पद्य के अंश जो मेरी अल्प साहित्यिक समझ की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, चयनित है। दरअसल उनका रचना संसार इतना काव्यात्मक, व्यापक एवम् गम्भीर है कि उनके अंशों को उनके समूचे परिदृश्य से बाहर खींचना बेहद कठिन है। ऐसी कोशिश करते वक्त बार बार यह अहसास होता है कि कुछ पीछे छूट गया। अत: उसके सही परिदृश्य को, भावनाओं व विचारों के आवेग को समझने के लिए यकीनन पूरा लेख अथवा पूरी कविता को पढऩा नितांत आवश्यक है। ये उद्धहरण तो केवल विचारों के छोटे-बड़े लेकिन अतिशय महत्वपूर्ण पड़ाव की तरह है जिनकी तीव्रता इन पड़ावों पर कुछ देर रुकने तथा शब्दों की अर्थ-भरी ताकत को समझने के लिए बाध्य करते हैं। इस सच के साथ उद्धरणों की यह श्रृखंला जिनका चयन मुक्तिबोध-रचनावली के अलावा कुछ अन्य किताबें जो रचनावली में भी शामिल है, और स्वतंत्र रुप में भी प्रकाशित है, यहां पेश है। कुछ उद्धहरण अपूर्ण कहानियों से भी हैं तथा कुछ ऐसे भी हैं जो रचनावली में फिलहाल संकलित नहीं है। संभव है उद्धहरणों का यह चयन आपको ठीक लगे। शुरूआत पिताजी की पत्रकारिता से करते हैं। हिंदी साहित्य जगत में मुक्तिबोध जी पत्रकारिता पर ज़्यादा बातें नही हुई। कह सकते हैं उनका पत्रकारीय रूप उपेक्षित ही रहा। जबकि इस विधा पर उनका लेखन काफी है। नागपुर में आकाशवाणी की नौकरी छोडऩे के बाद मुक्तिबोध जी ने उस दौर के प्रखर साप्ताहिक 'नया खून' में बतौर संपादक काम करना शुरू किया था। पत्रकारिता करते हुए राजनीतिक व गैर-राजनीतिक विषयों पर उनका महत्वपूर्ण लेखन यद्यपि इस अख़बार के लिए हुआ लेकिन इसके पूर्व भी 'कर्मवीर' व 'सारथी' में वे लिख रहे थे। मुक्तिबोध रचनावली के छठे खंड में ये लेख संकलित है। रचनावली का प्रकाशन वर्ष 1980 है। इसके कऱीब 29 साल बाद, 2009 में दो अलग किताबें, 'जब प्रश्न चिन्ह बौखला उठे तथा 'शेष-अशेष' शीर्षक से प्रकाशित हुई जिनमे उनके कुछ अप्रकाशित राजनीतिक तथा विविध लेख शामिल हैं, जो रचनावली में नहीं थे। पत्रकारिता करते हुए उनके लिखे लेखों में से उद्धरण उठाने के पूर्व उनकी पत्रकारिता पर रचनावली के संपादक श्री नेमिचन्द्र जैन के विचार जान लेना बेहतर होगा। अपनी संक्षिप्त भूमिका में उन्होंने लिखा है - 'रचनावली के 6 वें खंड मे मुक्तिबोध जी के राजनीतिक विषयों पर लिखे गए लेख संकलित हैं। ये अधिकांशत: उन्होंने 1956 से 1958 के बीच 'नया खून' व 'सारथी' मे लिखे थे। ये लेख मुक्तिबोध जी के पत्रकार रूप को सामने लाते हैं। उन्हें पढ़कर बड़ा सुखद आश्चर्य होता है कि इनमें भी उन्होंने वैसी ही अंतर्दृष्टि व मौलिकता का परिचय दिया है जैसा कि उनके साहित्यिक लेखन में मिलता है। उनके जैसे मनमौजी कवि - साहित्यकार के लिए हर सप्ताह अंतरराष्ट्रीय घटनाओं अथवा देश की राजनीतिक, आर्थिक समस्याओं पर आधारिक एवं अध्ययन पूर्ण ढंग से टिप्पणी करना बहुत आसान काम नहीं रहा होगा। इन निबंधों की भाषा भी अपने विषय के अनुकूल ही नहीं, बल्कि एक ख़ास तरह की सूक्ष्मता का परिचय देती है और विविधता का भी। ये निबंध न सिर्फ मुक्तिबोध के लेखक व्यक्तित्व का एक सर्वथा नया रूप उजागर करते हैं बल्कि हिंदी पत्रकारिता की भाषा को एक नया आयाम भी देते हैं। ********************************************************************************************************************
अतीत
अतीत हमारी समालोचना है, वर्तमान हमारा गतिमान काव्य है और भविष्य हमारी आशा है। भूत, वर्तमान और भविष्य एक ही इतिहास के तीन भाग है जिसका मध्य नितांत छोटा पर महत्वपूर्ण है। मैं दांडेकर महोदय का कृतज्ञ हूँ - इसलिए कि उन्होंने मुझमें पीछे घूमकर देखने की अभिलाषा जागृत कर दी, जिसके वशीभूत हो मैंने एक समय आत्म-चरित्र लिखने का निश्चय सा कर लिया था। और तद्भव आनंद दबा न सकने के कारण मैंने यह बात अपने एक गहरे मित्र को इस शर्त के साथ कही कि वह यह किसी से न कहे। (कर्मवीर, खंडवा, 9 जनवरी और 16 जनवरी 1937 को दो किस्तों में प्रकाशित, रचनावली खंड 6 में संकलित) ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
आधुनिक समाज का धर्म

मैं व्यक्तिवादी (egoist) नहीं हूँ। क्षमा करना। मुझे उससे अत्यन्त घृणा है। मेरा अंतर तो विस्तार चाहता है - वह इतना बड़ा होना चाहता है कि सम्पूर्ण विश्व होगा उसमें समा जाए। परंतु शायद इस जन्म में यह सम्भव नहीं - मुझे कई दफ़ा मरना होगा, तब समझ में आयेगा कि जीवन क्या है। (कर्मवीर 1 अप्रैल 1939 में प्रकाशित, रचनावली खंड - 2 में संकलित) ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नौजवान का रास्ता

अगर नौजवानी की ताक़त को पहाड़ी नदी की शक्ति मान लिया जाए, तो यह निश्चित है कि नौजवानों के दिलोदिमाग़ की ताक़त, ज्ञान और बुद्धि तथा कर्म निश्चय की बिजली में रूपान्तरित करते हुए, देश निर्माण यानी मानव निर्माण की ऊँची से ऊँची मंजि़ल तक पहुँचाया जा सकता है, बंजर परती जि़ंदगी में इश्क़ और इंक़लाब की रूहानियत की फ़सल खड़ी की जा सकती है। * जि़ंदगी बड़ी ही ख़ूबसूरत चीज़ है, वह जीने के लिए है, मरने के लिए नहीं। अच्छे आदमी क्यों दुख भोगे - इतने नेक आदमी और इतना अभाव! दुनिया में बुरे आदमियों की संख्या नगण्य है, अच्छे आदमियों के सबब। जि़ंदगी बहुत ही ख़ूबसूरत चीज़ है, वह जीने के लिए है, मरने के लिए नहीं।
* लेकिन नौजवानों के दिलोदिमाग़ की ताक़त को बिजली में रूपान्तरित करते हुए, देश निर्माण और मानव निर्माण मे लगाने के लिए, जिस बिजलीघर की ज़रूरत होती है, वह हिंदुस्तान में नदारद है। अब देश की उन्नति हो तो कहाँ से हो और कैसे हो। जिस देश में नौजवान मारे मारे फिरते हैं, बेकार रहते है, भूखों मरते है, (बौद्धिक और हार्दिक विकास के लक्ष ही जहाँ गुम है) तो उस देश के नौजवान अगर अपनी ख़ाली जेब और भूख की यन्त्रणाओं को, अपने दुर्भाग्यों को, चवन्नी छाप एक्ट्रेसों की सूरत देखकर दो मिनट के लिए भुलाना चाहता हो तो उस नौजवान की तृषित आँखों को भले ही लोग ग़लत समझे, हम उनके बारे में किसी ग़लतफ़हमी में नही है, क्यों कि हमारा नौजवान बेहद सच्चा है। और बेहद अच्छा है। उसमें बड़ी आग है और बहुत मिठास है। वह दुनिया को उलट सकता है और उलटकर फिर पलट सकता है। लेकिन उसके दिलोदिमाग़ की ताक़त को मानवी बिजली में रूपान्तरित करनेवाला बिजलीघर कहाँ है? वह तो नदारद है। इसलिए अगर हमारे नौजवान में कुछ दोष है, कुछ ख़ामियाँ हैं तो अपराध उनका नहीं है। क्योंकि हमारा नौजवान बहुत सच्चा है और बेहद अच्छा है। (नया खून, 1952, में प्रकाशित, रचनावली खंड - 6 में संकलित) क्रमश:

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