मुक्तिबोध:प्रतिदिन (भाग-13)

इसलिए कि मुझे यह गहरी शंका है कि आंदोलनकर्ता भारतीय इतिहास-क्रम को साम्प्रदायिक दृष्टिकोण से पुनर्रचित करना चाहते हैं। वे उसके स्वाभाविक विकास के स्वरुप को , फासिस्त शुद्ध रक्तवादी, आर्यवादी दृष्टिकोण से झुठलाना चाहते हैं। वे हमारी कार्य व्यस्त जनता की धर्म-भावना को उभाड़कर उसके अज्ञान और पिछड़ेपन का फायदा उठाते हुए, देश में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए इतिहास के वैज्ञानिक क्षेत्र में साम्प्रदायिक दृष्टि के हस्तक्षेप को मूर्तिमान करना चाहते हैं। संक्षेप में, वे इतिहास की ऐसी पुनर्रचना चाहते हैं जिसमें उनके शुद्ध रक्तवादी, आर्यवादी जातिवादी साम्प्रदायिक - सांस्कृतिक दृष्टि को समर्थन मिल सके।
    यह एक भयानक प्रवृत्ति हैं, जिससे हर बुद्धिजीवी को, धर्मनिरपेक्ष राज्य को, वैज्ञानिक दृष्टि के अभ्युदय को, लोकतंत्रवादी विचारधारा को, मानव-समानता के सिद्धांत और आदर्श को तथा भारतीय संस्कृति के वास्तविक स्वरुप को बहुत बड़ा खतरा है।

(भारत: इतिहास और संस्कृति पृष्ठ 251)

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एक पत्र भी लिखा नहीं

एक पत्र भी लिखा नहीं हैं बहुत दिनों से
किन्तु याद मन के कोने में
गहन विवेक चेतना सी धक्के देती है
गहरे धक्के
भूरे टूटे हुए बुर्ज को
मेरे खण्डित मनस्तत्व के।
जाने क्यों भयभीत रहा करता हूँ
उस संवेदन-शील चुनौती-से यथार्थ से
जिसके तुम दोनों अविभाज्य अंश हो
प्रतिनिधि हो।
किन्तु धुकधुकी तुम दोनों की
यों समीप इस तरह पास है मेरे
जैसे वह मेरी ही हो
मेरी ही रहती आयी आदिकाल से

(अपूर्ण, संभावित रचनाकाल 1954-56)

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मनुष्य मृत्यु का दानव नहीं

नहीं नहीं संभव नहीं
मनुष्य मृत्यु का दानव नहीं
औद्योगिक सभ्यता के भावों के सत्वों ने
वैचारिक मशीनों ने ढंाचों ने
कल्पना के रॉकेट मिसाइल्स के पाश्र्वों ने
अनु-भूति-उडन्त-अश्वों ने
प्राकृतिक प्राणों को अप्राकृत किया है !!
हृदय की चिडिय़ा को मार कर
उसमें एक छेद कर
उसमें एक बत्ती डाल,
सुलगा दिया है
एस्किमों के बंद हिम-भवन में
असभ्य ही जिया है !!

(अपूर्ण, संभावित रचनाकाल 1956-57)
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मेरे छोटे-छोटे काम

मेरे छोटे-छोटे काम
महत्वपूर्ण है
उतने ही जितना सूरज का उगना
जितना अंतर्राष्ट्रीय चक्र का चलना
वे नहीं न्यून है
उनसे नहीं मुझे विश्राम ।

 (अपूर्ण, संभावित रचनाकाल 1959-60)
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