मुक्तिबोध:प्रतिदिन (भाग-22)

दृष्टिकोण का दीवाला-1

सिनेमा व्यवसाय एक सामूहिक व्यवसाय है-ऐसा दृष्टिकोण हमारे निर्माताओं में पैदा होना चाहिये। व्यक्ति की जगह अब उसमें समाज और समस्त हिन्दुस्तान की आत्मा की  पूजा होनी चाहिए। जहाँ एक व्यक्ति के नाम पर हज़ारों- लाखों की होली खेली जाती है- वहाँ हित चिंतन किसी ख़ास निश्चित पैमाने पर ज़रूर होना  चाहिए। 
(पत्रिका, विचार, 5-01-1941, में प्रकाशित, शेष-अशेष में संकलित)  
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दृष्टिकोण का दीवाला-2
फि़ल्म-व्यवसाय कुछ चंद भारतीय पूँजीपतियों के हाथ में हैं । वे जो चाहते हैं, करते हैं । उनकी इच्छाओं पर किसी अन्य सुयोग्य बौद्धिक व्यक्तियों के सुझावों का नियंत्रण एवं सहयोग नहीं है । इससे हुआ यह है कि सिनेमा व्यवसाय कुछ चंद निर्माताओं के डायरेक्टरों की कठपुतली बनकर रह गया है । उसमें प्राण नहीं है। इसलिये उनके चित्रों मे भी प्राण  नहीं होते हैं। यहां तो जहाँ तक मेरा अनुमान है -कुछ दो- एक निर्माताओं को छोड़कर किसी को भी मुल्क के श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम एवं मनस्वी साहित्य सेवियों, श्रेष्ठ बौद्धिक मस्तिष्कों का सहयोग , उनका कुछ भी अंश शायद ही प्राप्त हो। प्राप्त हो कहाँ से ? हमारे निर्माताओं में इस दिशा की ओर प्रवृत्ति ही नहीं है । उनका मस्तिष्क अभी भी कला-शून्य , खोखले डायरेक्टरों  के घेरे में चक्कर काट रहा है। उसी का परिणाम है कि इतना आन्दोलन होने पर भी आज भी 'भोली लुटारिन' और 'छबीली भटियारिन' जैसी फि़ल्मों की अधिकता है। 
(पत्रिका, विचार, 5-1-1941 में प्रकाशित, शेष-अशेष में संकलित)
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दृष्टिकोण का दीवाला-3

यूरोप और अमरीका में ऐसा नहीं है। वार्नर ब्रदरस से लेकर मेट्रो तक-सब कम्पनियों के पास इस व्यवसाय को प्रत्येक पहलू से सलाह देने वाले व्यक्ति मौजूद हैं । उनको अच्छी व ऊँची तनख्वाहें दी जाती हैं। निर्माताओं से लेकर कलाकार तथा अन्य कर्मचारी सब उनकी सबसे अधिक प्रतिष्ठा करते हैं । वहाँ प्रत्येक निर्माता ने कला और जीवन के प्रत्येक पहलू के महान और तपस्वी विशेषज्ञों को रख छोड़ा है । यदि ग्रीटा गारबो के लिए कम्पनी का पूर्व नियुक्त कथा लेखक कहानी नहीं लिख सकता है तो निर्माता अंग्रेज़ी का महान लेखक एडालस हकसले से अनुरोध करता है । और कहानी हकसले लिखते हैं। यह चित्र भी लोकप्रियता और सर्व श्रेष्ठता प्राप्त करता है।
(पत्रिका, विचार, 5-1-1941 में प्रकाशित, शेष-अशेष में संकलित )
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दृष्टिकोण का दीवाला-4

मशीन के भौंडेपन से आँखें मिटकर जैसे आज का इंसान किसी रोमांटिक जगत मे जाकर रहना चाहता है -उसी प्रकार हमारे भारतीय फि़ल्म निर्माता भी दृष्टिकोण की प्रखरता और प्रवृत्ति की सजीवता से घबराकर विलास नगरी में प्रेम और जीवन की माला गूंथ रहे हैं। उस प्रेम की और उस जीवन की, जो खोखला है, शून्य है, रिक्त है, स्पंदनहीन है ।
(पत्रिका, विचार, 5-1-1941 में प्रकाशित, शेष-अशेष में संकलित )

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जगत की चेतना

जगत की चेतना
वेदना से मिली है,
इसीलिये अंधेरे में 
ज़मीन के अंधेरे में 
तुम्हारी जड़ों का जाल
मेरी सब जड़ों को 
कसकर फँसाकर 
तोड़ता रहता है,
घेरता रहता है। 
वैसा ऊपर सतह पर 
तुम्हारी छाया ने घेर

धूप का सारा गरम दूध
तुम पी गये।
पत्तों से चाट गये 
सारी हवा 
क्या दिया मुझे
अंधेरी अपनी छाया में रहने का मौक़ा
बस यही!!


इसलिये, ज़मीन के अंधेरे में
मेरी जड़ें तुम्हारी जड़े 
टकराती हैं। 
फँसाती हैं, घेरती हैं,
खाती हैं।
(अंतिम रचना, रचनाकाल संभवत: फऱवरी-मार्च 1964 अपूर्ण, शेष-अशेष में संकलित )

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साहित्य के दृष्टिकोण

कोई भी दृष्टिकोण, यानी कोई भी साहित्यिक 'वादÓ तभी ठीक है जब तक वह जीवन की चेतना से परिपूर्ण हैं। यथार्थवाद, जिसे आजकल वर्गवादी प्रगतिवाद कहते हैं, तभी तक ठीक है जब तक उसका लेखक अपनी स्फूर्ति  वास्तविक स्थिति से पाता है। प्रश्न स्फूर्ति का ही है। केवल ग्रामीण स्थिति देख-भर लेने से या गांव के वातावरण में लेखक के रहने से सच्चे यथार्थवादी साहित्य का जन्म नहीं हो सकता, जब तक लेखक की आत्मा ग्रामीणता में स्वयं नहीं पनपती, और वहां की क्रिया-प्रतिक्रिया से प्रवहनशील होकर साहित्य में नहीं उतरती। हेनरी बारबूस एक सच्चा प्रगतिवादी कलाकार था, क्योंकि उसकी क्रांति की भावना के पीछे उसका स्वयं का जीवन था, जोकि उसके आस-पास की परिस्थिति से पूर्ण सुसंगत और उस का प्रतिनिधित्व करता था।
(कमला, जून 1941 में प्रकाशित, नए साहित्य सौंदर्यशास्त्र व रचनावली खंड 5 में संकलित)
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जीवन विकास की यात्रा

अर्थशास्त्र का कोई भी विद्यार्थी यह समझ सकता है कि पूँजीपति व मज़दूर के हित कभी एक नहीं हो सकते । फिर क्या कारण है कि गांधीजी दोनों के हितों को एक कर देते हैं। शिलर और गांधी दोनों को अपने-अपने युगों से असंतोष है । शिलर के अनुसार भयानक बुद्धिवाद एक ख़तरा है। गांधीजी के लिए यंत्रोंउद्योग के केन्द्रीकरण  से जो कि पूँजीवादी सामाजिक संगठन की विशेषता है, नफऱत है। इस पूँजीवादी केन्द्रीकरण से हमारे जीवन में असंतोष है, और ग्रामों का नाश पास-पास आता जाता है। इसलिये महात्मा गांधी ग्रामोंउद्योगों का संगठन करते हैं जिससे कि किसान self sufficient बन सकें ।
गांधीजी ने ग्रामोउद्योग के साथ-साथ मिलों को भी रहने दिया। मिलों के विरूद्ध जिहाद कभी अंगीकार नहीं किया। स्पष्ट है कि ग्रामोउद्योग  किसानों मे  भी कड़वाहट  को शांत करने का एक नुस्ख़ा है , जिससे बीमारी शांत रूप धारण कर ले (हट तो सकती नहीं) और शोषण के कारणों से दृष्टि हट जाए।
(संभावित रचनाकाल 1940-42, अपूर्ण, शेष-अशेष में संकलित, पृष्ठ 69)
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रचनाकार का मानवतावाद-1

हिन्दी साहित्य-क्षेत्र में शीत-युद्ध अब भी चला हुआ है। साहित्य-क्षेत्र में मध्यवर्ग ही क्रियाशील है, और, संभवत: आगामी दसियों वर्षों तक वह क्रियाशील रहेगा । मध्यवर्ग के ही लेखक आज भी हैं। जीवन की समस्याएँ जटिलतर होती जा रही हैं । ये समस्याएं भिन्न-भिन्न प्रकार की हैं। समाज में आज उत्पीडऩ और शोषण की मात्रा , अतिचार और अत्याचार की मात्रा, और भी अधिक, और भी तीव्र हो रही है । अवसरवाद, भ्रष्टाचार, नैतिकता का ह्रास, मानववादी मूल्यों की अवनति और व्यक्तिबद्ध अहंवादी मूल्यों का बढ़ता हुआ प्रभाव, लूट-खसोट आदि-आदि बातों से सामान्य मानव का दु:ख, अपरिसीम होता जा रहा है ।
(नयी कविता का आत्म संघर्ष, पृष्ठ 174 रचनावली में संकलित)
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रचनाकार का मानवतावाद-2

प्रगतिवादी आन्दोलन यदि बहुत-कुछ पीछे हटा है, तो इसका कारण यह नहीं है कि मध्यमवर्ग पूरा-का-पूरा अवसरवादी हो गया है, यद्यपि उच्च मध्यमवरगीया प्रभुता तथा  बल सम्पन्न पूँजी की सत्ताधारिता ने भी इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण योग दिया है। किन्तु इसका एक कारण यह भी है कि प्रगतिवादी प्रवक्ताओं ने अपनी वही पुरानी छर्रेवाली बन्दूक़ और वही पुराने तमंचे निकाले जिनकी आज कोई क़ीमत नहीं। संक्षेप में, उनके पास,  प्रगतिवादी प्रवक्ताओं के पास, मध्यवर्गीय अन्ध सिद्धांतवादी अहंकार तो था, किन्तु कला की सृजनशील प्रक्रिया में, कला संबंधी समस्याओं में, वह सूक्ष्म गति नहीं थी, जोकि एक जीवन-मर्मज्ञ और कला-मर्मज्ञ के लिए आवश्यक होती है ।
(नयी कविता का आत्म संघर्ष, पृष्ठ 174, रचनावली में संकलित)
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मध्ययुगीन सांस्कृतिक अभ्यत्थान तथा मानव-सामंजस्य की प्रकियाएं

जब धर्म और ईश्वर के नाम पर, परस्पर-घृणा का प्रचार किया जा सकता था, तो धर्म और ईश्वर के नाम पर ही , मानव-मात्र की एकता और प्रेम का प्रचार भी किया जा सकता था। इसमें क्या आश्चर्य है कि बहुत से हिन्दू सूफ़ी हो गये और बहुत से मुसलमान कृष्ण के भक्त हुए, न मालूम कितने ही मुसलमान और अछूत, नानक और कबीर के अनुयायी हुए। राजा भर्तृहरि के गीत गाते हुए न मालूम कितने ही मुस्लिम फ़क़ीर भारतीयों के श्रद्धा-भाजन हुए।
आज भारत में राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति करने के लिए जब जातिवाद और प्रादेशिकतावाद, सिर ताने खड़ा हुआ है, उन दिनों के संतों और फ़क़ीरों, पहुंचे हुए कवियों और सूफिय़ों के नाम स्मरण करके ह्रदय पवित्र हो उठता है क्योंकि उन्होंने जाति, वर्ण और प्रदेश के उपर उठकर, मनुष्य मात्र के लिए सामान्य धर्म की प्रतिष्ठा करने का प्रयत्न किया था। 
(भारत : इतिहास और संस्कृति, रचनावली में खंड संकलित, पृष्ठ 516-517)
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वस्तु और रूप : तीन

यह बिलकुल सही है कि मनुष्य का जीवन जितना व्यापक, विविध-क्षेत्रीय होगा, तथा जीवन-जगत की विभिन्न विकासमान प्रक्रियाओं में भाग लेता रहेगा, उतना ही वह समृद्ध होगा। सच तो यह है कि वस्तु के परिष्करण के लिए अनुभव-समृद्धि आवश्यक है। इस अनुभव-समृद्धि के बिना, तत्व हल्का रहेगा। साहित्य जीवन का प्रतिबिम्ब है। इसलिए हमें सबसे पहले जीवन की चिंता होनी चाहिए। किन्तु मेरी इस भूमिका को लोग नहीं मानते। वे ऐसे मौक़े पर साहित्यशास्त्रीय ढंग से इस प्रश्न पर विचार करना चाहते हैं। मेरा खय़ाल है कि साहित्य-चिन्ता और जीवन-चिन्ता में जीवन-चिन्ता का स्थान प्रथम और साहित्य-चिन्ता का स्थान द्वितीय है। 
( रचनावली खंड पांच में संकलित )
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काव्य : एक सांस्कृतिक प्रक्रिया-2

लेकिन, वस्तुत:, आधुनिक भाव-बोध क्या है? मैं अपनी खुद की जि़ंदगी और दोस्तों की जि़ंदगी के तजुर्बे से बता सकता हूँ कि अन्याय के खि़लाफ़ आवाज़ बुलंद करना आधुनिक भाव-बोध के अंतर्गत है। आधुनिक भाव-बोध के अंतर्गत यह भी है कि मानवता के भविष्य-निर्माण के संघर्ष में हम और भी अधिक दत्तचित्त हों, तथा हम वर्तमान परिस्थिति को सुधारें, नैतिक ह्रास को थामें, उत्पीडि़त मनुष्य के साथ एकात्म होकर उसकी मुक्ति की उपाय-योजना करें। क्या यह आधुनिक भाव-बोध के अंतर्गत नहीं है कि मैं अपनी लेखनी द्वारा किसी विशेष लोकादर्श के लिए कविता लिखूँ ? क्या जब बंगाल में अकाल पड़ा तब महादेवी से लेकर बच्चन तक ने, मैथिलीशरण गुप्त से लेकर मेरे जैसे तुच्छ कवि ने, कविताएँ नहीं लिखी थीं? क्या यह बात किसी से छिपी है कि कैसी श्रेष्ठ कविताओं का संकलन निकला और उसके पैसे अकाल फ़ंड में गये? क्या यह रेजिमेंटेशन था? क्या यह आधुनिक भाव-बोध के अंतर्गत नहीं आयेगा?
(कृति, मई 1960 में प्रकाशित, नयी कविता का आत्म संघर्ष व रचनावली खंड पांच में संकलित )
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स्वाधीनता -समानता

किन्तु स्वाधीनता तथा समानता का वास्तविक अभिप्राय तो यही है कि हम लोग सामाजिक तथा आर्थिक दासता से न केवल मुक्त हों, वरन वर्गहीन समाज के मानव-लक्ष्यों से अपने को एकाकार करते हुए आगे बढ़ें। स्वाधीनता तथा समानता का लक्ष्य दूसरे को ग़ुलाम बनाना नहीं है, उसे अपने से नीचे बनाना नहीं है। सच्ची स्वाधीनता तथा समानता की स्थापना तो तभी होती है, जब हम उसे पूरे वर्गहीन समाज के सामाजिक लक्ष्यों से एकाकार करें। निश्चय ही, हमारी नैतिकता के नये मानदंड तो सच्ची मानव-मुक्ति के इन्हीं लक्ष्यों की प्राप्ति की दृष्टि से ही निर्णीत होंगे। जब तक हम वर्गहीन समाज की सामूहिक शक्ति से, उद्योगों और खेत-खलिहानों का समाजीकरण नहीं करते, तथा देश का औद्योगीकरण नहीं करते, सृष्टि तथा प्रकृति के वैभव को मानव-मात्र के समान उपयोग के लिए उपलब्ध नहीं करते, तब तक हम देश को, समाज को, जनता को सुखी तथा समृद्ध भी नहीं कर सकते, उसको समान रूप से शैक्षणिक-सांस्कृतिक तथा आर्थिक लाभ भी नहीं दे सकते। इस उद्देश्य की पूर्ति की पहली शर्त पूंजीवाद का अंत तथा समाजवादी समाज-रचना की स्थापना है ।
(कामायनी : एक पुनर्विचार, अध्याय 6 तथा रचनावली में संकलित)

क्रमश:

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