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मुक्तिबोध:प्रतिदिन (भाग-11)

आधुनिक कविता की दार्शनिक पार्श्वभूमि

स्वाधीनता-प्राप्ति के उपरांत, भारत में अवसरवाद की बाढ़ आयी। शिक्षित मध्यवर्ग में भी उसकी जोरदार लहरें पैदा हुई। साहित्यिक लोग भी उसके प्रवाह में बहे और खूब ही बहे। इस भ्रष्टाचार, अवसरवाद, स्वार्थपरता की पाश्र्वभूमि में, नयी कविता के क्षेत्र में पुराने प्रगतिवाद पर जोरदार हमले किये गये, और कुछ सिद्धांतों की एक रुपरेखा प्रस्तुत की गयी। ये सिद्धांत और उनके हमले, वस्तुत: उस शीत-शुद्ध के अंग थे जिसकी प्रेरणा लंदन और वाशिंगटन से ली गयी थी। पश्चिम की परिपक्व मानववादी परंपरा से साहित्यिक प्रेरणा ग्रहण न करके, उन नये व्याख्याताओं ने उसकी अत्यंत प्रतिक्रियावादी साहित्यिक विचारधारा को अपनाया और फैलाया। नयी कविता के आस-पास लिपटे हुए बहुत-से साहित्यिक सिद्धान्तों में शीत-युद्ध की छाप है।

(नई कविता का आत्म संघर्ष तथा अन्य निंबध, पृष्ठ 37 से)


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धरती आसमान की ओर

अपनी रोज की व्यर्थ कार्य-धारा में।
आज मैं उदास हो गया हूँ।
आसमान के स्तंभ गिर रहे हैं।
धरती स्वयं आसमान की ओर जा रही है।।
एक विश्व-व्यापी परिवर्तन
की मशनरी विनाश की गूंजों में
नये उत्पादन का अभिप्राय
सर्वत्र पसार रही है।
आज मैं - न जाने क्यों - उदास
 हो गया हूं।
अपनी जिन्दगी व्यर्थ मालूम
हो रही है।
सार्थक साभिप्राय कार्य एक तो वैसे ही
अल्प है, फिर उनको निबाह नहीं पाता।
उसके लिए मुझे किसी - से कोई प्रोत्साहन
नहीं है।
कभी मिलता भी है तो दस तरफ से
दस विभिन्न कार्यों के लिए
सारी परिस्थिति मेरे कार्यों के खिलाफ है
मैं कैसे जिऊं!!
मेरे अपने कार्यांश अपने को
पुकार रहे हैं!!

(अपूर्ण, संभावित रचनाकाल 1950-53)

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मालव-निर्झर की झर झर कंचन-रेखा

मालव - निर्झर की झर झर कंचन-रेखा
का जिसने जल सपने में भी देखा
वह मुझे करेगा याद !!
मैने उसके तट जीवन-ज्यामिति पाई
की सी गति पाई
खगोल का आल्हाद
मुझे मिला है ब्रह्माण्डीय किरण का
क्रोध घृणा में तीव्र प्रेम की शंका
मित्रों का सौदार्य

(अपूर्ण, संभावित रचनाकाल 1950-53)

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मेरे सहचर मित्र

मेरे सहचर मित्र,
जिंदगी के फूटे घुटनों से बहती
रक्त-धार का जिक्र न कर के,
तुम कठोर अनुभव के स्याह
पहाड़ी कंधों
पर चढ़ते जाते हो, थूहर
के पंजों से अपने तन के
छिल जाने की फिक्र न कर के!!

(अपूर्ण, संभावित रचनाकाल 1951-52)


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