मुक्तिबोध:प्रतिदिन (भाग-15)


हाशिये पर कुछ नोट्स

यह खयाल बिलकुल गलत है कि आलोचना का संबंध बुद्धि से और श्रद्धा का हृदय से होता है। मार्क्सवाद पर लोगों की श्रद्धा हृदय से नहीं बुद्धि से उत्पन्न हुई है। और उसी मार्क्सवाद की बहुतेरी आलोचना अंधी भावना से प्रेरित हुई है। किन्तु इस सिलसिले में मैं यह भी कह दूँ कि किसी भी व्यक्ति पर एकात्म श्रद्धा गलत है। चाहे वे अपने माता हों या पिता। पहले वे मनुष्य हैं, उनका अपना चरित्र है। इस चरित्र को देखेने के लिए आवश्यक निर्मल तटस्थ भाव हममें चाहिए।
(एक साहित्यिक की डायरी, पृष्ठ 48)
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नये की जनम कुण्डली : एक

जो पुराना है, अब वह लौटकर आ नहीं सकता। लेकिन नये ने पुराने का स्थान नहीं लिया। धर्म-भावना गयी, लेकिन वैज्ञानिक बुद्धि नहीं आयी। धर्म ने हमारे जीवन के प्रत्येक पक्ष को अनुशासित किया था। वैज्ञानिक मानवीय दर्शन ने, वैज्ञानिक मानवीय दृष्टि ने धर्म का स्थान नहीं लिया। इसलिए केवल हम अपनी अंत: प्रवृत्तियों के यंत्र से चालित  हो उठे। उस व्यापक उच्चतर सर्वतोमुखी मानवीय अनुशासन की हार्दिक सिद्धि के बिना हम  'नया-नया' चिल्ला तो उठे, लेकिन वह 'नया' क्या है- हम नहीं जान सके! क्यों? नया जीवन, नये मानव-मूल्य, नया इंसान परिभाषा-हीन और निराकार हो गये। वे दृढ़ और व्यापक मानसिक सत्ता के अनुशासन का रुप  धारण न कर सके ! वे धर्म और दर्शन का स्थान जान ले सके !
(एक साहित्यिक की डायरी, पृष्ठ 69)
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विशिष्ट और अद्वितीय

किन्तु हमारे अधिकांश कवि 'अद्वितीय' हैं। वे स्वयं इस अद्वितीयता की रक्षा करते हैं। यों कहिए कि इस अद्वितीयता के कारण ही वे कवि हैं। मैं यह नहीं कहता कि अद्वितीयता उनका दोष है। मैं यह कहना चाहता हूँ कि अद्वितीयता की जो परिभाषा इन कवियों ने अपने लिए छांटकर रखी है वह गलत है। 
(एक साहित्यिक की डायरी, पृष्ठ 92)
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कब तक दरवाजे बन्द रखे

कब तक दरवाजे बन्द रखे यह मन
घर है या यह कोई खन्दक -
उस उदर-शिष्ण से
जीवन कब तक बंधा रहे !!
यह शोचनीय संतुलन किस तरह सधा रहे !!
कब तलक !!

हां यह सही है कि हैं काम बहुत से करने को
जैसे लिखना, पढऩा,
आलोचन-कार्य, कला निर्मिति - 
लेकिन बेशक बाहरवालों को दिलचस्पी
है कतई नहीं इसमें
कि व्यक्तिगत सघन अनुराग जग उठे
आपस में।
कुछ करें, किसी के लिए मरें,
शी:, उसको अमरीका जाना
मुझको मास्को जाना है !!

 (अपूर्ण, संभावित रचनाकाल 1962-63)
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सूखे हुए होठों पर

जहां कहीं जो भी होता मेरी वहाँ छाँह
कहीं मेरा कटता है सिर, कहीं बाँह
कहीं मुझमें शक्ति का अचानक बोध,
कहीं अवरोध।

लगातार चट्टानें कटती हैं, और
वहाँ मेरी किसी नयी मूर्ति का मुख
किन्तु पुन: पुन: मेरी आकृति-भंग
फिर से नव-प्रक्रिया में चलने का दु:ख
हताहत स्वयं के ही दर्दों का शोर।
(भूमिगत जीवन की धारामयी देन
नहीं लेने देती चैन ।)

 (अपूर्ण, संभावित रचनाकाल 1963-64)
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अग्निमुखियों के विवर से

अच्छे इरादे से खड़ी की जो
वह संस्था
उसी में देखते क्या हैं कि
स्टूलों टेबलों पर आलमारी पर
रखे है रिवॉल्वर तैयार छह फैरे
हमेशा बहस करते हैं
धड़ाधड़ स्फोट करते हैं, बड़ा अंधेर

 (अपूर्ण, संभावित रचनाकाल 1963-64)
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आसमान में रह-रह कर

आसमान में रह-रह कर गडग़ड़ा रहीं मोर्टार
आधुनिक ढंग से
और दूसरी जगह डराती हुई कारवाई
जवाब के तेज रंग में कौंध रही हर बार।
देख, दंग हूँ !!
चींख रहे अखबार कि बेघरबार हो गये सवा लाख
बह गये सैकड़़ों,
और मर्द-औरतें
हरहराती मटमैली लहरदार चादरी धार में खड़े हुए
बाढ़ की टेकड़ी में।
सिर पर कंधे पर बच्चे वे दो चार
गुजर रहा जी पर से, बन अंगार
बारिश रुकी घड़ी भर।
लेकिन
आसमान में दमकता आवेश
इन्द्र-महल के शायर, आलिम-फाजिल, मनसबदार
उधार लेकर चला रहे मोर्टार!!
एॅक एॅक, हैण्ड-ग्रिनेड पूरा दृश्य-जंग खूंखार
बादली आसमान में
और, भान में - लाओं फॉरेन एड
चीख रहे अखबार
मर गये आठ हजार!!

 (अपूर्ण, संभावित रचनाकाल 1963-64)
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