मुक्तिबोध:प्रतिदिन (भाग-21)

जलना

और अकस्मात् उसे भान हुआ कि मनुष्य अपने इतिहास से जुदा नहीं है, वह कभी भी अपने इतिहास से जुदा नहीं हो सकता। न अपने बाह्य जीवन के इतिहास से, न अपने अंतर्जीवन के इतिहास से। उसका अंतर्जीवन अपने स्वप्नों में, अपने तर्कों और विश्लेषणों में, डूबता आ रहा है। उसे अधिकार है कि वह उसमें डूबता रहे, अपने से बाहर निकलने की उसे ज़रूरत नहीं है। अपने से बाहर वे निकलें जिनका बाह्य से कोई विरोध हो।
(कहानी, संभावित रचनाकाल 1960 के आसपास, धर्मयुग, अप्रैल 1968 मे प्रकाशित, रचनावली खंड 3 में संकलित)
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सतह से उठता आदमी

कन्हैया गऱीबी को , उसकी विद्रूपताओं को, और उसकी पशु -तुल्य नग्नता को जानता है। साथ ही उसके धर्म और दर्शन को भी जानता है। गांधीवादी दर्शन गऱीबों के लिए बड़े काम का है। वैराग्य भाव, अनासक्ति और कर्मयोग सचमुच एक लौह-कवच है, जिसको धारण करके मनुष्य आधा नंगापन और आधा भूखापन सह सकता है। सिर्फ सहने की ही बात नहीं, वह उसके आधार पर आत्मगौरव आत्मनियंत्रण और आत्म-दृढता  का वरदान पा सकता है। और भयानक प्रसंगों और परिस्थितियों का निर्लिप्त भाव से सामना कर सकता है। मृत्यु उसके लिए केवल एक विशेष अनुभव है। गऱीबी एक अनुभावात्मक जीवन है।
(कहानी, संभावित रचनाकाल 1963-64, रचनावली खंड तीन में संकलित)
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जंक्शन

मैंने बच्चों को सिखा दिया है कि  बेटे, कभी इच्छामय दृष्टि से दुनिया को मत देखना। वह मामूली से मामूली इच्छा भी पूरी नहीं कर सकती। और चाहे जो करो, मौक़ा पडऩे पर झूठ बोल सकते हो, लेकिन यह मत भूलना कि तुम्हारे गऱीब माँ-बाप थे। तुम्हारी जन्मभूमि ज़मीन और धूल और पत्थर से बनी यह भारत की धरती ही नहीं है , वह है -गरीबी। तुम  कटे-पिटे दाग़दार चेहरोंवालों की सन्तान हो। उनसे द्रोह मत करना। अपने इन लोगों को मत त्यागना। प्रगतिवाद तो मैंने अपने घर से शुरू कर दिया था। मेरे बड़े बच्चे को यह कविता रटा दी थी -

'जि़ंदगी की कोख से जन्मा
नया इस्पात
दिल के खून में रंगकर!
तुम्हारे शब्द मेरे शब्द
मानव -देह धारण कर
अरे चक्कर लगा घर-घर , सभी से कह रहे हैं
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....सामना करना मुसीबत का,
बहुत तनकर
ख़ुद को हाथ में रखकर।
उपेक्षित काल -  पीडि़त सत्य -गो के थूथ
उदासी से भरे गंभीर ,
मटमैले गऊ चेहरे।
उन्हीं को देखकर जीना
कि करूणा क्रान्ति की माँ है।
बाक़ी सब हवा -सा है ,धुआँ - सा है।'

(कहानी, संभावित रचनाकाल 1963-64, रचनावली खंड तीन में संकलित)
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विपात्र-1

व्यक्तित्वों की टकराहट बहुत बुरी होती है, ज़हर पचने से फैलता है, कीचड़ उछालने से। उछालने वाले के और झेलने वाले के-दोनों के चेहरे बदसूरत हो जाते हैं। मैं, हमेशा दो प्रकार के परस्पर-विरोधों में भेद करता आया हूँ। एक वे जो सही है-जहां वे तेज़ होते रहने चाहिए, और एक वे जो ग़लत है-जहां वे होने ही नहीं चाहिए। जैसे राजनीति में वैसे ही मानव -संबंधों के क्षेत्र में भी , हमें सही विरोधों को, उनके सही- सही अनुपात में, सही-सही जगह, और सही-सही ढंग से, ज़रूर बनाये रखना चाहिए - यहाँ तक कि तेज़ करना चाहिए। वहाँ झुकने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन, कुछ ऐसे परस्पर -विरोध होते हैं जो हमारी नासमझी, कम-समझी अथवा क्षुद्र अहंमूलक स्वार्थ से उत्पन्न होते हैं। मानव - संबंध उलझ इसलिए जाते हैं कि हम ग़लत जगह झगड़ा कर लेते है और ग़लत जगह झुक जाते हैं।
(लघु उपन्यास, संभावित रचनाकाल 1963-64, रचनावली खंड तीन में संकलित)
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विपात्र-2

हर आदमी चाहता है कि दूसरा उसे पहचाने , उसके भीतर पहुँचे, और उसकी आत्मा में जो मूल्यवान तत्व हैं उन्हें मान्यता प्रदान करे। लेकिन हर एक को घमंड है कि उसका आत्म -वैभव अद्वितीय है। और चूँकि वह अद्वितीय है इसलिए वह निर्मल और प्रदीप्त है। परिणाम यह होता है कि कोई किसी के भीतर पहुँच नहीं पाता , उसके अन्दर के फास्फार और बाक्साइट को शुद्ध करने का साहस फिर कौन करे? कौन फिज़़ूल लड़ाई -झगड़ा मोल ले? यह मानी हुई बात है कि कोई भी व्यक्ति चाहे जितना भी आत्मालोचन कर सकने का सामथ्र्य रखता हो , वह अपने 'स्व' द्वारा 'निज' का परिष्कार और विकास नहीं कर सकता। मुक्ति अकेले में अकेले नहीं हो सकती। मुक्ति अकेले में अकेले को नहीं मिलती।
(लघु उपन्यास, संभावित रचनाकाल 1963-64, रचनावली खंड तीन में संकलित)
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विपात्र-3

वैसे मैं यह मानने के लिए तैयार हूँ कि आज का प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति प्रेम का भूखा है। प्रेम की यह भूख बढ़ती जा रही है। ज्यों-ज्यों मनुष्य की परिस्थिति बिगड़ती जायेगी, वह सहानुभूति के एक -एक कण को तरसेगा। किन्तु साथ ही प्रेम प्रदान करने की उसकी शक्ति भी कम होती जायगी। एक ओर मात्र अस्तित्व-रक्षा के संघर्ष के कारण हारे-थके लोग अपने आपमें बँधते चले जायेंगे तो दूसरी ओर धन-सम्पन्न व्यक्ति अपनी सम्पन्नता की दीवारों से घिरकर अधिकाधिक अहंबद्ध जायेंगे।
(लघु उपन्यास, संभावित रचनाकाल 1963-64, रचनावली खंड-3 में संकलित)
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                                              विपात्र-4

वासना और वेदना दोनों में एक विचित्रता है। वेदना की अधिकता, कष्टों तथा संकटों की बारम्बारता , मनुष्य को आत्म -बद्ध बना देती है। इस प्रकार आत्म-बद्ध कि सारी दुनिया उसे परायी मालूम होती है, अपरम्पार दूरियाँ फैल जाती है। एक ओर अपनी निस्सहायता की भावना से आत्म-विश्वास का लोप होता है, तो दूसरी  ओर अन्य जन पर विश्वास करने की क्षमता भी कम होते जाती है। वेदना बुरी होती है। वह व्यक्ति को व्यक्ति-बद्ध कर देती है। कहा जाता है, वेदना सबको एक कर देती है। लेकिन, यह ग़लत है। वेदना से प्रताडि़त और दमनग्रस्त  आतंकित व्यक्ति की गतियाँ शिथिल हो जाया करती है। इसलिए विद्रोहियों का दमन किया जाता है। यहीं कारण है कि हज़ारों साल से गऱीब जनता गऱीब हो रही है। वेदना स्वयं कर्म का उत्साह उत्पन्न नहीं कर सकती। मुझे अस्पताल का अनुभव है। हर बीमार अपनी कराहों से घिरा रहता है। एक बीमार की दूसरे बीमार से कोई सहानुभूति लक्षित नहीं होती, और यदि होती भी है तो यह कहा जायेगा कि उसकी वेदना ने उसकी आत्मा को नहीं कुचला है। बाहरी दुनिया आदमी को तकलीफ़ देती है। तकलीफ़ और कष्ट से वेदना उत्पन्न होती है। वेदना आत्मा को कुचल देती है। मनुष्य अपने को हीन और अक्षम अनुभव करने लगता है। किन्तु जिनकी वेदना आत्मा को कुचल नहीं पाती, उनमें तेजस्विता रहती है। वे लोग भी दुनिया मे कुछ कर सकते हैं । वेदना आदमी को ढीला करती है। तेजस्विता उन्हें कस देती है।
(लघु उपन्यास, संभावित रचनाकाल 1963-64, रचनावली खंड तीन में संकलित)
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                                              विपात्र-5

'हाँ, यह सही है कि ऐसे पढ़े-लिखे लोग भी हैं जिन्हें देश की दशा को देखकर अपना कहीं ठिकाना लगता -सा मालूम नहीं होता। वे निराश इसलिए है कि वे किंकर्तव्यमूढ है। वे क्लर्क हैं, वे छोटे अफ़सर, छोटे दुकानदार हैं। वे कालेज के लेक्चरर हैं। वे अपनी जीवन-प्रणाली की रक्षा के लिए चाहे जो करते हैं, कोई रिश्वत खाता है, तो कोई कुंजियाँ लिखता है, तो कोई पैसा लेकर फ़ेल  को पास करता है! उनके लेखे, बेवकूफ़ वह है जिसकी कुछ नहीं चलती, जो अपने पेट को काटकर, बाल-बच्चों को तरसा-तरसाकर जीवन -व्यापन करता है। ऐसे ये लोग हैं! वे शिक्षित हैं, सुसंस्कृत है! अपनी बर्बरता को ढाँकने के लिए रवीन्द्र की जयंतियां मनाते है, अपने पशुत्व को छिपाने के लिए सुंदर भावों से जंगली आत्मा को ढँकते है, पैसा और नाम दोनों कमाते हैं। हवा के रूख को देखकर बात करते हैं , सभा को देखकर टोपी बदलते हैं। और अमरीका जाते हैं, लेकिन अपने ही शहर की गन्दी बस्तियों के घरों में झाँककर नहीं देखते।
    'उनमें से बहुतेरे बुद्धिमान है, बहुतेरे ज्ञान-सम्पन्न भी है, कलाकार हैं और पंडित भी। लेकिन बड़ी -बड़ी किताबें लिखते हुए बंजर है, इसलिए कि उनकी आत्मा ऐसी जनेन्द्रिय के समान है जिसकी तिजारत होती है। आजकल का सेठ साफ़ - साफ़ कहता है कि पैसों से मैं इन्हें खऱीद लूँगा। वह जानता है कि इनसे चाहे जो करवाया जा सकता है। उधर ये खुद खऱीदे जाने का इंतज़ार कर रहे हैं। कोई आये और उनकी बोली लगाये। इनसे हमारे दरमियानी फ़ासले बने रहेंगे, और बने रहने चाहिए, उन्हें बनाये रखना चाहिए। दुनिया के किसी अंधेरे अकेले कोने में मर जाना बुरा नहीं है!'
(लघु उपन्यास, संभावित रचनाकाल 1963-644 , रचनावली खंड तीन में संकलित)
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बाबू रामचन्द्र अग्रवाल

आप पत्रकार हैं। कल तक एक कहानी की मैगज़ीन के आप एडीटर रहे। मालिक ने इन्हीं को ऐसा मूँड़ा कि इन्हें अपनी चालाकी पर अविश्वास -सा होने लगा। लेकिन अपनी चाय-पीती, मारवाडिय़ों के घर का नमक खाती जि़ंदगी पर इन्हें पछतावा नहीं हुआ। होता भी कैसे? अख़बार पूँजीपतियों के हैं। पत्रकार हैं, और पत्रकारिता ही आपका पेशा है, तो समझ लीजिए, आपको अपनी उन्नति के लिए किसी बड़े और भले आदमी के एस्टिब्लिशमेंट में ही, गांधीवादी खद्दर हँसी हँसते हुए, नौकरी करनी होगी। और अगर आप कुछ ज़्यादा आधुनिक और विचारों में उग्र रहने की कोशिश करते हों , तो किसी बड़े अँगरेजी सोशलिस्ट अख़बार का मुँह जोहना होगा। अख़बार की दुनिया ही ऐसी है, अख़बारनवीसी में, अलावा आपकी योग्यता और कौशल के तिकड़म ज़्यादा लाभकर होती है।
(अपूर्ण कहानी, संभावित रचनाकाल, 1950-51, रचनावली खंड तीन  के अपूर्ण कहानियाँ  खंड में संकलित)
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महापुरूष

(18)  ऐसे बहुत से लोग  है जो ईमानदार हैं, सच्चे हैं , किन्तु जिनमें एक प्रकार का बौद्धिक आलस्य है। साथ ही, वे दूसरों को पीटने में अपनी वीरता समझते हैं -भले ही उनके तर्क और उनकी युक्ति निराधार ही क्यों न हो। इस प्रकार, इस उद्देश्य से, वे बहुत सिद्धांतवादी बनते हैं, किन्तु, जीवन के जिन तत्वों के आधार पर व्यापक सामान्यीकरण बनते हैं, (और उन सामान्यीकरणों से  ही सिद्धांत बनते हैं), जीवन के उन तत्वों की तरफ़  वे दृष्टिपात नहीं करते।
(अपूर्ण कहानी, रचनावली खंड तीन में संकलित)
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रचनाकार का मानवतावाद

हिन्दी साहित्य-क्षेत्र में शीत-युद्ध अब भी चला हुआ है। साहित्य-क्षेत्र में मध्यवर्ग ही क्रियाशील है, और, सम्भवत: आगामी दसियों वर्षों तक यह क्रियाशील रहेगा। मध्यवर्ग के ही लेखक आज भी हैं। जीवन की समस्याएं जटिलतर होती जा रही हैं। ये समस्याएं भिन्न-भिन्न प्रकार की हैं। समाज में आज उत्पीडऩ और शोषण की मात्रा, अतिचार और अत्याचार की मात्रा, और भी अधिक, और भी तीव्र हो रही है। अवसरवाद, भ्रष्टाचार, नैतिकता का ह्रास, मानवतावादी मूल्यों की अवनति और व्यक्तिबद्ध अहंवादी मूल्यों का बढ़ता हुआ प्रभाव, लुट-खसोट आदि-आदि बातों से सामान्य मानव का दु:ख, अपरिसीम होता जा रहा है।
(नई कविता का आत्मसंघर्ष, पृष्ठ 175, रचनावली में संकलित)
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शिक्षा के क्षेत्र में संगठित प्रयास जरुरी

आज की जि़ंदगी का हिसाब यह है कि बिना हाथ-पैर मारे कुछ नहीं होता। शिक्षा के क्षेत्र में जहाँ-जहाँ भी जो-जो असंगतियां और त्रुटियां हैं , उन्हें दूर करने के लिए संगठित रूप से प्रयत्न करने होंगे-चाहे वे पाठ्यपुस्तकों के संबंध में हों, पाठ्यक्रम के संबंध में हों तथा ऐसी ही दूसरी बातें हों। शैक्षणिक जीवन में जब तक हम अत्यधिक क्रियाशील नहीं होंगे, जब तक हम दबाव नहीं डालेंगे तब तक सुधार नहीं होगा। केवल निराशाग्रस्त और अगतिक होकर बैठने से काम नहीं चलेगा। इसके विपरीत, जितने भी हम अधिक क्रियाशील होंगे, और शिक्षा के प्रश्नों के बारे में समाज को भी अपने विश्वास में लेने का प्रयत्न करेंगे, उतना ही प्रभाव शिक्षक-समुदाय का बढ़ता जायेगा। शिक्षक-वर्ग , नि:संदेह एक उत्पीडि़त वर्ग है । इसलिए उसकी चेतना भारतीय जन  की सामान्य स्थिति को अधिक सूचित करती है। उसका उत्पीडऩ तभी दूर हो सकता है , जब वह स्वयं प्रभावशाली हो ।
(शिक्षकों की एक सभा में दिये गये भाषण का अंश, राष्ट्रवाणी, जनवरी-फऱवरी 1965 में प्रकाशित, रचनावली खंड 6 में संकलित)

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मध्ययुगीन सांस्कृतिक अभ्यत्थान तथा मानव-सामंजस्य की प्रक्रियाएं

कबीर का कवित्व केवल साहित्यिक महत्व ही नहीं, वरन ऐतिहासिक महत्व रखता है । अक्खड, बेदरकार, बेलौस, बेमुरव्वत, कबीर में मानव-स्नेह का अज निर्झर प्रवाहित होता था। उनके दोहे हम में प्राण-शक्ति का संचार करते हैं। नानक की वाणी ईश्वरीय प्रेरणा से युक्त है, उसमें ज्ञान का प्रकाश तथा भावना का गीलापन है। रैदास के नम्र ह्रदय में सारा विश्व आर्द्रा होकर विराजमान था। सेना नाई और पलटू, ईश्वरीय ज्योति ह्रदय में धारण करके लगभग मसीहा थे, किन्तु न उनका बाना मसीहाई था, न उनका रहना। अगर पलटू सामने आकर खड़े हो जायें तो शायद वे इतने दीन होंगे कि हम अपने बरामदे से उन्हें निकाल देंगे। इसलिए उन दिनों यह खय़ाल था कि नारायण (ईश्वर, भगवान) स्वयं दीन जन का रूप धारण करके घूमते फिरते हैं। पता नहीं, बाहर नंगे पांव घूमते हुए इन दीन जनों में कौन सचमुच भगवान हो।
(भारत : इतिहास और संस्कृति, रचनावली खंड 6 द्वितीय संस्करण, पृष्ठ 523 )

क्रमश:

मुक्तिबोध:प्रतिदिन (भाग-20)

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