मुक्तिबोध:प्रतिदिन (भाग-16)


कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी : दो

अभिरुचि के साथ-साथ कई प्रकार के सेन्सर्स लगे रहते हैं। लेखक को अनेक प्रकार के सेन्सर्स यानी गहरे अन्तर्निषेधों का सामना करना पड़ता है। कुछ अन्तर्निषेध ऐसे होते हैं जो उसके काव्यसम्बंधी यथार्थ की संवेदनाओं को भी काटकर फेंक देते हैं। काव्य का जो वास्तविक तत्व है जिसके कारण और जिसके द्वारा सौन्दर्य प्रकट होता है, उसी से पता चल जाता है कि लेखक छद्म भावनाओं का व्यापार कर रहा है या क्या !
(एक साहित्यिक की डायरी, पृष्ठ 117)

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भूल-गलती

भूल-गलती
आज बैठी है जिरहबख्तर पहनकर
तख्त पर दिल के
चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक,
आँखें चिलकती हैं नुकीले तेज पत्थर-सी
खड़ी हैं सिर झुकाये
सब कतारें
बेजुबाँ बेबस सलाम में,
अनगिनत खम्भों व मेहराबों-थमे
दरबारे-आम में।

(काव्य संग्रह, चांद का मुंह टेढ़ा है)
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पता नहीं......

पता नहीं कब, कौन, कहाँ किस ओर मिले,
किस साँझ मिले, किस सुबह मिले !!
यह राह जिन्दगी की
जिससे जिस जगह मिले
है ठीक वहीं, बस वहीं अहाते मेंहदी के
जिनके भीतर
है कोई घर
बाहर प्रसन्न पीली कनेर
बरगद ऊँचा, जमीन गीली
मन जिन्हें देख कल्पना करेगा जाने क्या !!
तब बैठ एक
गम्भीर वृक्ष के तले
टटोलो मन, जिससे जिस छोर मिले,
कर अपने-अपने तप्त अनुभवों की तुलना
घुलना मिलना !!

(काव्य संग्रह, चांद का मुंह टेढ़ा है)
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एक भूतपूर्व विद्रोही का आत्म-कथन

अजीब संयुक्त परिवार है -
औरतें व नौकर और मेहनतकश
अपने ही वक्ष को
खुरदरा वृक्ष-धड़
मानकर घिसती हैं, घिसते हैं
अपनी ही छाती पर जबर्दस्ती
विष-दन्ती भावों का सर्प-मुख।
विद्रोही भावों का नाग-मुख।
रक्त लुप्त होता है !
नाग जकड़ लेता है बाँहों को,
किन्तु वे रेखाएँ मस्तक पर
स्वयं नाग होती हैं!
चेहरे के स्वयं भाव सरीसृप होते हैं,
आँखों में जहर का नशा रंग लाता है।
बहुएँ मुँडेरों से कूद अरे!
आत्महत्या करती हैं!!
ऐसा मकान यदि ढह पड़ा,
हवेली गिर पड़ी
महल धराशायी, तो
बुरा क्या हुआ!
ठीक है कि हम भी तो दब गये,
हम जो विरोधी थे
कुओं-तहखानों में कैद-बन्द
लेकिन हम इसलिए 
मरे कि जरुरत से
ज्यादा नहीं, बहुत-बहुत कम
खंडहर में दबी हुई अन्य धुकधुकियों
सोचो तो
कि
स्पंदन अब ....
पीड़ा भरा उत्तरदायित्व भार हो चला
हम बागी थे!!
कोशिश करो,
कोशिश करो,
जीने की,
जमीन में गड़कर भी।

(काव्य संग्रह, चांद का मुंह टेढ़ा है)
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मुझे कदम-कदम पर

मुझे कदम-कदम पर
चौराहे मिलते हैं
बाँहें फैलाएँ!!
एक पैर रखता हूँ
कि सौ राहें फूटतीं,
व मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ,
बहुत अच्छे लगते हैं
उनके तजुर्बे और अपने सपने..
सब सच्चे लगते हैं,
अजीब-सी अकुलाहट दिल में उभरती है,
मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ
जाने क्या मिल जाए!!

कविताएँ मुसकरा लाग-डाँट करती हैं,
प्यार बात करती हैं।
मरने और जीने की जलती हुई सीढिय़ाँ
श्रद्धाएँ चढ़ती हैं!!

(काव्य संग्रह, चांद का मुंह टेढ़ा है)


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